शुक्रवार, 15 फ़रवरी 2013

= मन का अंग १० =(२८/३०)

॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
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*मन का मस्तक मूंडिये, काम क्रोध के केश ।*
*दादू विषय विकार सब, सतगुरु के उपदेश ॥२८॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! मन के अहंकार रूपी मस्तक पर काम - क्रोध रूपी बाल हैं, उनको सतगुरु के उपदेश रूपी उस्तरे से मूंडिए ॥२८॥ 
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*करुणा*
*सो कुछ हम थैं ना भया, जा पर रीझे राम ।*
*दादू इस संसार में, हम आये बेकाम ॥२९॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! हरि - स्मरण, सत्संगति जो सुकृत हैं, जिनके करने से प्रभु प्रसन्न होते हैं, सो तो हमारे से हुआ नहीं क्योंकि जड़ बुद्धि होने से किया नहीं ? इस लोक में हमारा मनुष्य - जन्म वृथा ही जा रहा है ॥२९॥ 
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*क्या मुँह ले हँस बोलिये, दादू दीजे रोइ ।*
*जन्म अमोलक आपना, चले अकारथ खोइ ॥३०॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! परमेश्वर के सामने कौन सा मुँह लेकर दिखलाओगे ? उस परमेश्वर के सम्मुख कैसे हँसकर बोलोगे ? ऐसे कौनसे तुम्हारे सत्कार्य हैं ? तुम्हें परमेश्वर के समक्ष में अपने कुकृत्यों को याद करके रोना ही पड़ेगा ! इस अमूल्य जन्म को शुभ कार्यों के बिना निरर्थक ही खोकर गँवाते हो ॥३०॥ 
(क्रमशः)

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