शनिवार, 16 फ़रवरी 2013

= मन का अंग १० =(३१/३३)

॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
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*जा कारण जग जीजिये, सो पद हिरदै नांहि ।*
*दादू हरि की भक्ति बिना, ध्रिक् जीवन कलि मांहि ॥३१॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जिस परमेश्वर की भक्ति के लिए संसार में जन्म लिया था, वह भक्ति तो हृदय में है नहीं । तो ऐसे जीवन को कलियुग में धिक्कार है, जो हरि की भक्ति के बिना जीता है ॥३१॥ 
पद - राम बिना ध्रक ध्रक नर नारी । 
कहाँ तै आई किये संसारी ॥टेक॥ 
रज बिना कैसा रजपूत । 
ज्ञान बिना फोकट अवधूत । 
गणिका का पूत पिता किहि कहै । 
गुरु बिन चेला ज्ञान न लहै । 
कुंवारी कन्या करै सिंगार । 
सोभ न पावै बिन भर्तार । 
कहै कबीर मैं कहता डरूँ । 
सुकदेव कहता मैं क्या करूँ ॥ 
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*किया मन का भावता, मेटी आज्ञाकार ।*
*क्या ले मुख दिखलाइये, दादू उस भरतार ॥३२॥* 
टीका - हे जिज्ञासु ! मन को प्रिय लगने वाले ही काम करो । गुरु आज्ञा और परमेश्वर की मर्यादा को मेट कर अब तुम कौन सा मुँह लेकर परमेश्वर के सामने जाओगे ? जैसे स्त्री पति की आज्ञा और शास्त्र की मर्यादा को मेट कर अपने मन को भाने वाले काम करे तो वह भर्तार को कौनसा मुँह लेकर दिखलाएगी ?।३२॥ 
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*इन्द्री स्वारथ सब किया, मन माँगै सो दीन्ह ।*
*जा कारण जग सिरजिया, सो दादू कछु न कीन्ह ॥३३॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! इस अज्ञानी पुरुष ने इन्द्रियों की विषय - प्रवृत्ति के लिये तो सब कार्य किये हैं । किन्तु परमेश्वर ने जिस कार्य के लिए इस प्राणी को पैदा किया था, उस भक्तिरूप कार्य को इस जीवात्मा ने किंचित् भी नहीं किया है । इसी से यह मन्दभागी है ॥३३॥ 
(क्रमशः)

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