*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*= मन का अंग १० =*
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*किया था इस काम कौं, सेवा कारण साज ।*
*दादू भूला बंदगी, सर्या न एकौ काज ॥३४॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! परम दयालु परमेश्वर ने भक्ति - ज्ञान वैराग्य रूप सेवा के लिए इस जीवात्मा को चौरासी लाख योनियों से निकाल कर अति उत्तम मनुष्य का शरीर दिया है । परन्तु यह अज्ञानी जीव, प्रभु आज्ञा को मेट कर विषयों में आसक्त हो रहा है । इस प्रकार इसने इस लोक और परलोक का कोई भी कार्य, इन्द्रियों के स्वार्थ में लगकर पूरा नहीं किया है ॥३४॥
गुरुदेव ने इसी साखी से रज्जबजी को उपदेश किया था -
"रज्जब तैं गजब किया, सिर पर बांध्या मोड़ ।
आया था हरि मिलन को, करी नरक को ठौड़ ॥"
जिसे सुनते ही रज्जबजी के मुख से ये शब्द निकले -
दादू जैसा गुरु मिल्या, रज्जब सिस्य सुजांण ।
एक सब्द में सुरझिया, मिटगी ऐंचा तांण ॥
ऐसा कहकर रज्जबजी गुरु दादूजी के चरणों में गिर पड़े और उनके सच्चे शिष्य बन गये ।
धर्मे राग: श्रुते चिता, दाने व्यसनमुत्तमम् ।
इन्द्रियार्थेषु वैराग्यं, संप्राप्तं जन्मन: फलम् ॥
धर्मार्थकम मोक्षाणां यस्य कोSपि न जायते ।
अजागलस्तनस्येव तस्य जन्म निरर्थकम् ॥
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*दादू विषै विकार सौं, जब लग मन राता ।*
*तब लग चित्त न आवई, त्रिभुवनपति दाता ॥३५॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जब तक यह मन ‘शब्द’ आदि विषयों से और कामादि विकारों से राता = रत्त और माता = मतवाला रहता है, तब तक इसके चित्त में त्रिभुवनपति परमात्मा हृदय में रहता हुआ भी इसको दिखलाई नहीं पड़ता है ॥३५॥
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*दादू का जाणूँ कब होइगा, हरि सुमिरण इकतार ।*
*का जाणूँ कब छाड़ि है, यह मन विषय विकार ॥३६॥*
टीका - हे सतगुरो ! न मालूम हरि कहिए, पापों को हरने वाले उस प्रभु का नाम - स्मरण अखण्ड वृत्ति से हमारे हृदय में कब होगा ? और यह मन विषय और काम आदि विकारों को न मालूम कब त्यागेगा ? इस प्रकार हमारे मन में यह पश्चात्ताप ही बना रहता है ॥३६॥
(क्रमशः)

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