रविवार, 17 फ़रवरी 2013

= मन का अंग १० =(३७/३९)

॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
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*मन प्रबोध*
*बाद हि जन्म गँवाइया, किया बहुत विकार ।*
*यहु मन सुस्थिर ना भया, जहँ दादू निज सार ॥३७॥* 
टीका - ब्रह्मऋषि दादू दयाल महाराज उपदेश करते हैं कि हे मन ! यह मनुष्य शरीर जो अमूल्य है, इसको तूने नाना विषय - विकार रूप कुसंग में लगाकर और हरि से विमुख होकर सतगुरु के शब्दों में तर्क - कुतर्क करता हुआ यह अमोलक नर - तन प्रभु - चिंतन के बिना व्यर्थ ही खो दिया ॥३७॥ 
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*विषय अतृप्ति*
*दादू जनि विष पीवै बावरे, दिन दिन बाढै रोग ।*
*देखत ही मर जाइगा, तज विषया रस भोग ॥३८॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! इस विषय-भोग रूपी रस में आसक्त मत हो । क्योंकि इन विषय - विकारों से जन्म - मरण रूपी रोग तुझे अधिक प्राप्त होंगे । इस प्रकार विषयों का संकल्प - विकल्प करते रहते यह मानव - जन्म वृथा ही जा रहा है । हे जिज्ञासु ! तुझे जो विषय - भोगों में सुख प्रतीत हो रहा है, उसके मिथ्या मोह को त्याग कर प्रभु के नाम का स्मरण कर ॥३८॥ 
सर्प पराया आपणां, तोड़ जीव को खाइ । 
जहर चढ़ै तबही मरै, नारी नेह न लाइ ॥ 
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*आपा पर सब दूर कर, राम नाम रस लाग ।*
*दादू औसर जात है, जाग सके तो जाग ॥३९॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! मैं मेरा और तू तेरा, इस भेद को छोड़कर राम नाम के स्मरण में एकाग्र बुद्धि हो, क्योंकि मनुष्य जन्म के ये अमूल्य श्‍वास स्मरण के बिना वृथा ही जा रहे हैं । इसलिए विचार - पूर्वक स्वस्वरूप को पहचान ॥३९॥
(क्रमशः)

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