॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*= मन का अंग १० =*
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*मन हरि भावनि*
*दादू सब कुछ विलसतां, खातां पीतां होइ ।*
*दादू मन का भावता, कहि समझावै कोइ ॥४०॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! यह सम्पूर्ण मनुष्य जीवन, खाने - पीने और सांसारिक भोग भोगने में ही बीता जा रहा है, किन्तु फिर भी मन की विषय - वासनाओं का दुराग्रह नहीं मिटा है और यही चाहते हैं कि मन में भाने वाली बात ही कोई संसारीजन सुनावे अर्थात् मनोनुकूल समस्त भोगों को भोगने पर भी मानव को संतोंष नहीं होता है, बल्कि उसका मन अधिक चंचल हो जाता है । इसलिए इस मन को अभ्यास के द्वारा विषयों की तरफ से रोको ॥४०॥
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*दादू मन का भावता, मेरी कहै बलाइ ।*
*साच राम का भावता, दादू कहै सिुण आइ ॥४१॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! विविध विषय - भोगों में जो मन की आसक्ति हो रही है, मन उन्हीं को चाहता रहता है । सतगुरुदेव यह उपदेश करते हैं कि संसारीजन यदि यह चाहें कि हमारे अनुकूल माया प्राप्तिरूप प्रपंच, संसार के भोगों का ही उपदेश करें, तो यह उपदेश हम कभी भी नहीं करेंगे, क्योंकि परमेश्वर को तो भक्ति, ज्ञान, वैराग्य, नाम - स्मरण, ये प्रिय हैं । इसलिए ब्रह्मवेत्ता पुरुष सत्स्वरूप परमेश्वर को भाने वाला उपदेश ही करते हैं और उत्तम जिज्ञासु ही उसको श्रद्धापूर्वक श्रवण करते हैं ॥४१॥
सबसे बूझी बादशाह बहिश्त जोग कै नांहिं ।
सबन कहि रूख राख के, फक्कड़ कही तब जाहिं ॥
दृष्टान्त - एक बादशाह दरबार में सबसे पूछने लगे कि बहिश्त(बैकुन्ठ) किसके लिए है ? मैं उसमें जाउँगा कि नहीं ? सब लोग बादशाह को राजी रखने के लिए बोले - "हुजूर ! बहिश्त में तो आप जैसे पुरुष ही जायेंगे ।" एक फक्कड़ भी बैठे थे । वह बोले - "बादशाह, यह तो तुम्हारे गुलाम हैं, तुम्हारे को प्रिय लगे, वैसी बात कही है ।’ परन्तु वहाँ तो तभी जाओगे, जब वहाँ जाने योग्य कार्य करोगे । नहीं तो, जो नरक बना है, वह तुम्हारे जैसों के लिए ही बना है ।"
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*दादू ये सब मन का भावता, जे कुछ कीजै आन ।*
*मन गहि राखै एक सौं, दादू साधु सुजान ॥४२॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! ईश्वर से अतिरिक्त जितने भी सांसारिक विषय हैं, उनमें मनमुखी पुरुषों की ही आसक्ति होती है । किन्तु साधन - सम्पन्न जो उत्तम जिज्ञासु हैं, उनका निश्चल मन तो सदैव एक परमेश्वर में ही लगा रहता है ॥४२॥
(क्रमशः)

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