सोमवार, 18 फ़रवरी 2013

= मन का अंग १० =(४३/४५)

॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
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*जे कुछ भावै राम को, सो तत कह समझाइ ।*
*दादू मन का भावता, सबको कहि बनाइ ॥४३॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जो राम को प्रिय है ज्ञान - भक्ति - वैराग्य, संतजन उसी को समझाकर उपदेश करते हैं और बाकी संसारीजन के मन को तो विषय - भोग ही प्रिय लगते हैं । जिन्हें सकाम कर्मों के द्वारा इच्छित फल प्राप्त होते हैं, वे उसी मार्ग को समझाकर कहते हैं ॥४३॥ 
मिश्र कथा प्रति दिन करै, मांस दोष कह नांहि । 
एक दिवस सुत कह दियो, नरक जांहि जे खांहि ॥ 
दृष्टान्त - एक राजा के यहाँ एक ब्राह्मण कथा करने रोज आया करते थे । राजा मांस खाता, परन्तु जहाँ मांस - खंडन का प्रसंग आता, उसको ब्राह्मण नहीं सुनाता, क्योंकि वह मन में समझता था कि राजा मांस खाता है । मैं मना करूँगा, तो राजा मेरी कथा नहीं सुनेगा । मेरी रोजी खत्म हो जाएगी । एक दिन ब्राह्मण ने अपना लड़का, कथा करने को भेज दिया । कथा का प्रसंग वहीं से चलना था, जहाँ मांस का खंडन था । वह बोलने लगा - 
दादू मांस आहारि जे नरा ते नर सिंह सियाल ।
बक मंजार सुनहाँ सही, एता प्रत्यक्ष काल ॥ 
हे राजन् ! मांस खाने वाले प्रेत होते हैं, मांस खाने वाले शेर होते हैं, भालू होते हैं, चीते होते हैं, कुत्ते होते हैं, बिल्ली होते हैं, श्याल होते हैं इत्यादि, चौरासी के शरीर पाकर अनेक प्रकार के कष्ट भोगते हैं । इसलिए मांस नहीं खाना चाहिये । यह कहकर कथा समाप्त कर दी । राजा दो मोहर चढ़ाया करता था, आज उसने नहीं चढ़ाई और उदास हो गया । ब्राह्मण का लड़का घर आ गया । ब्राह्मण ने पूछा - भेंट लाया । लड़के ने कहा - नहीं । ब्राह्मण बोला - अरे मूर्ख ! तूने हमारी रोजी आज बन्द कर दी । दूसरे दिन ब्राह्ममण पहुँचे । राजा को आशीर्वाद किया और कथा सुनाने लगे ।" मन मृगा मारै सदा, ताका मीठा मांस । दादू खाबे को हिल्या, ताथैं आन उदास ।" कथा समाप्त हो गई । राजा बोले - कल तो महाराज उस लड़के ने नई ही कथा सुनाई, मांस के बाबत । तुम जानते हो, हम तो मांस रोज खाते हैं । ब्राह्मण बोलेः- राजन् ! वह शब्दों का अर्थ अभी ठीक नहीं कर जानता है, बच्चा है । जो कभी - कभी मांस खाते हैं, वे नरक में जाते हैं और दुःख भोगते हैं । जिनकी खुराक ही हमेशा की है, "जीवो जीवस्य भोजनम्" इत्यादि । "मांसम् मांसेन वर्धते ।" राजन् वे कभी नरक में नहीं जाएंगे । तो आप की तो राजन् खुराक है । आपका जिक्र नहीं है । राजा के मन को भाने वाली कथा सुना दी । राजा ने दो मोहर कल की और दो आज की, चार मोहर चढ़ा दी । ब्राह्मण प्रसन्न हो गया । तभी कहा है- "सत्यं वद, प्रियं वद, न ब्रूयात् सत्यमप्रियम् ।"
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*चाणक उपदेश*
*पैंडे पग चालै नहीं, होइ रह्या गलियार ।*
*राम रथ निबहै नहीं, खाबे को हुशियार ॥४४॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! यह मन हरि प्राप्ति का जो मार्ग ज्ञान, भक्ति, वैराग्य रूप है, उसमें तो चलता नहीं है और विषय - वासना रूपी गलियों का प्रेमी बन रहा है । यह मनुष्य देह रूपी रथ जो राम के पास ले जाने वाला है इसको निषिद्ध भोगों में लगाकर नष्ट कर रहा है और भोग - वासना को भोगने के लिए हुशियार रहता है, अथवा "कहिबे को हुशियार" स्वार्थी गुरु, स्वार्थी पंडित, परमात्मा की प्राप्ति रूपी मार्ग से गिरे हुए उपदेश करने में तो बहुत ही दक्ष हैं, परन्तु सत्य के मार्ग को अपनाने में कायर हैं, दुनियां को मिथ्या उपदेश देकर अपनी रोजी चलाते हैं ॥४४॥ 
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*पर प्रबोध*
*दादू का परमोधै आन को, आपण बहिया जात ।*
*औरों को अमृत कहै, आपण ही विष खात ॥४५॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! ऐसे स्वार्थी गुरु और पंडित, स्वयं का तो परिवार के विषय - भोगों में अपना जीवन नष्ट कर दिया है और दूसरों को ज्ञान का उपदेश करते हैं । खुद तो विष खाते हैं और दूसरों को अमृत(भक्ति ज्ञान रूपी) पीने का उपदेश देते हैं, ऐसे पुरुषों को इस लोक और परलोक में क्लेश ही प्राप्त होता है ॥४५॥ 
आप कछु करता नहिं, पर को दे उपदेश । 
सो बिन करनी कथन है, कोउ न गहत आदेश ॥ 
बिन करनी के कथन का, आदर नहिं भव मांहि । 
वेश्या यदि पतिव्रत कहै, तिय गण मानें नांहि ॥ 
गनिका सिखवत सील, कृपण दिढवै अति दानहि । 
बधिक दया उच्चार, मूढ बहुज्ञान बखान हि ॥ 
कामी इन्द्रिय दमन, जुद्घ को जावै कायर । 
अंध बतावत पंथ, अतिर तिरबे को सायर ॥ 
आपुन बहु बंधन परयो, ओरन मुक्त बखान हि । 
ये सब झूंठी ‘भीखजन’, साँच कौन विधि मानहि ॥ 
भोगी जोग बखान, सील गनिका जु सुनावै । 
सूम दिढावै पुन्य, कौन के हिरदै आवै ॥ 
अंध अंधकर गहै, नाड़ि रोगी सु टटोरै । 
अतिर तिरावै अतिर, बूड़ै सो आरै बोरै ॥ 
सकल अंग भंग गुरु, किये काज कहु कौन सिध । 
आप मरै ओरै अमर, ‘रज्जब’ करै सु कौन बिध ॥ 
(क्रमशः)

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