सोमवार, 18 फ़रवरी 2013

= मन का अंग १० =(४६/८)

॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
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*दादू पंचों ये परमोध ले, इन्हीं को उपदेश ।*
*यहु मन अपणा हाथ कर, तो चेला सब देश ॥४६॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! इन पांच ज्ञानेन्द्रियों को अपने विषयों से हटाकर इस मन को अपने बुद्धि रूप हाथ में ग्रहण करो, फिर सम्पूर्ण संसार के व्यक्ति तुम्हारे शिष्य सेवक होजायेंगे ॥४६॥ 
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*दादू पंचों का मुख मूल है, मुख का मनवां होइ ।*
*यहु मन राखै जतन कर, साधु कहावै सोइ ॥४७॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! इन पांच ज्ञान इन्द्रियों का मूल कारण मुख, कहिए जिह्वा है, क्योंकि योग्य, अयोग्य भोजन की स्थिति में अन्य इन्द्रियां सत, रज आदि भिन्न-भिन्न धर्मों में प्रवृत्त होती हैं और जिह्वा का प्रेरक मन है । जो इस मन को प्रयत्न द्वारा वश में करते हैं, वे आदर्श साधक, कहिए संत हैं ॥४७॥ 
रज्जब रसना तूत तरू, पंच झाड़ का मूल । 
एकै सीचैं सब हरे, जुदे जुदे फल फूल ॥ 
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*दादू जब लग मन के दोइ गुण, तब लग निपना नांहि ।*
*द्वै गुण मन के मिट गये, तब निपनां मिल मांहि ॥४८॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जब तक मन में राग, द्वेष, हर्ष, शोक, शीत, उष्ण आदिक द्वन्द्व विद्यमान हैं, तब तक यह मन पवित्र नहीं कहा जाता । जब श्रवण, मनन, निदिध्यासन से द्वन्द्व भाव मिट गया, तो यह मन पवित्र होकर आत्म - स्वरूप हो जाता है ॥४८॥ 
मन को साधन एक है, निशदिन ब्रह्म विचार । 
सुन्दर ब्रह्म विचार से, ब्रह्म होत तिहि बार ॥ 
मन के हारे हार है, मन के जीते जीत । 
मन ही सेती होत है, पारब्रह्म से प्रीत ॥ 
(क्रमशः)

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