मंगलवार, 19 फ़रवरी 2013

= मन का अंग १० =(४९/५१)

॥दादूराम सत्यराम॥

*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
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*काचा पाका जब लगै, तब लग अंतर होइ ।*
*काचा पाका दूर कर, दादू एकै सोइ ॥४९॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जब तक मन में चंचलता रहती है और अस्थिरता है, तब तक जीव ब्रह्म का भेद है । जब यह मन सब गुणों से मुक्त होकर सहज, कहिए निर्द्वन्द्व स्वभाव का हो गया, तब ही यह मन ब्रह्म स्वरूप हो जाता है ॥४९॥ 
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*मध्य निष्पक्ष*
*सहज रूप मन का भया, तब द्वै द्वै मिटी तरंग ।*
*ताता शीला सम भया, तब दादू एकै अंग ॥५०॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! पूर्वोक्त दो - दो गुण रूप जब मनकी तरंग मिट जाती है और बाहर के विषयों से जब मन अनासक्त हो जाता है, तब फिर इस मन के द्वैतभाव रूप गुण सब विलय हो जाते हैं । उस समय मुक्तजनों का यह मन ब्रह्मस्वरूप हो जाता है ॥५०॥ 
प्रवृत्ति पवन के मिटे, मनसा तरंग विलाइ । 
‘तुलसी’ चित जल समभयो, नभ आतम दरसाइ ॥ 
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*मन*
*दादू बहुरूपी मन जब लगै, तब लग माया रंग ।*
*जब मन लागा राम सौं, तब दादू एकै अंग ॥५१॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! यह मन नाना प्रकार के मायिक विषय - पदार्थों से मिल करके तद्रूप हो जाता है, मन का यही बहुरूप होना है । जब तक मन बहुरूपिया है, तब तक इस पर माया का ही रंग चढ़ा रहता है और जब मन केवल ब्रह्म विचार में ही लीन रहता है, तब यह मन ब्रह्म - स्वरूप हो जाता है ॥५१॥
(क्रमशः)

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