शुक्रवार, 22 फ़रवरी 2013

= मन का अंग १० =(६७/९)

॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
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*घर छाड़े जब का गया, मन बहुरि न आया ।*
*दादू अग्नि के धूम ज्यों, खुर खोज न पाया ॥६७॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! अज्ञानी जीवों का मन, परमेश्‍वर की भक्ति एवं स्वस्वरूप से विमुख होकर जब विषय - विकारों में आसक्त होता है, तब फिर स्वस्वरूप में संलग्न नहीं होता है, अथवा घर स्वरूप जो देह अध्यास और माया प्रपंच है, तिनको त्यागकर, जब ब्रह्मवेत्ता पुरुषों का पवित्र मन स्वस्वरूप में लीन होकर देह अध्यास से मुक्त हो जाता है, तो फिर माया प्रपंच में आसक्त नहीं होता है ॥६७॥ 
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*सब काहू के होत हैं, तन मन पसरैं जाइ ।*
*ऐसा कोई एक है, उलटा मांहिं समाइ ॥६८॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! सब ही ईश्‍वर - विमुखी संसारी पुरुषों के तन, मन, इन्द्रिय, विषय - विकारों में आसक्त रहते हैं । परन्तु ऐसे पुरुष तो कोई बिरले ही हैं, जो अपने तन, मन, इन्द्रियों को निष्क्रिय बनाकर ब्रह्म विचार में संलग्न रहते हैं ॥६८॥ 
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*क्यों करि उलटा आनिये, पसर गया मन फेरि ।*
*दादू डोरी सहज की, यों आनै घर घेरि ॥६९॥* 
टीका - हे सतगुरों ! यह मन पुनः पुनः विषय - वासनाओं में ही संलग्न होता रहता है । आप कृपा करके इस मन को अन्तर्मुख लाने का साधन बताइये ।
हे जिज्ञासुओं ! निर्द्वन्द्व विचाररूपी डोरी अथवा सतगुरुओं की ज्ञानोपदेश रूपी डोरी, उससे इस विषियासक्त मन को बांधो । इस प्रकार अपने मन को अन्तःकरण रूपी घर में बहिर्मुख से अन्तर्मुख घेर कर लाओ और स्वस्वरूप में लगाओ ॥६९॥ 
(क्रमशः)

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