शुक्रवार, 22 फ़रवरी 2013

= मन का अंग १० =(७०/७२)

॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
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*दादू साधु शब्द सौं मिलि रहै, मन राखै बिलमाइ ।*
*साधु शब्द बिन क्यों रहै, तब ही बीखर जाइ ॥७०॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! इस मन को सतगुरु और सतपुरुषों के शब्दों में लगाओ । उनके विचार में तल्लीन करो । हे मुमुक्षुओं ! गुरु उपदेश और संत उपदेश के विचार बिना कोटि उपाय करने से भी मन स्थिर नहीं होगा और संसार की ओर ही दौड़ता रहेगा ॥७०॥ 
शाह पुत्र मदन बस नारी, नग परखत अवस्था गुजारी । 
यूँ जो साध शब्द मन लावै, पति परमेश्‍वर सहजैं पावै ॥ 
दृष्टान्त - १ - एक जौहरी का लड़का था । उसकी स्त्री पतिव्रता थी । स्त्री बोली - आप विदेश जाते हो । आपके बिना मैं किस प्रकार रहूँगी ? आपके बिना मेरा मन कैसे लगेगा ? जौहरी के लड़के ने दो आंदले जवाहरात के भर कर उसको दे दिये । इन नगों की परीक्षा में तुम अपने मन को लगाये रखना । कुछ समय के बाद में आ ही जाऊँगा । दार्ष्टान्त में, साधक को गुरुदेव ने उपदेश किया कि शास्त्रों के शब्दों में, संतों की वाणी रूप शब्दों में, अपने मन को लगाओ । इस प्रकार तुम सहज में ही पति परमेश्‍वर को प्राप्त कर लोगे ।
संत ग्राम बाहर रहै, कथा श्रवण को जाइ । 
संत शब्द लिख ठीकरी, मन बिलमावे आइ ॥ 
दृष्टान्त - २ - एकसन्त ग्राम के बाहर रहते थे और एक सन्त गाँव के अन्दर रहते थे । गाँव वाले सन्त प्रतिदिन भक्तों को कथा सुनाया करते थे । कथा सुनने गाँव के बाहर रहने वाले सन्त भी आया करते थे और कथा के सुने हुए अंशों को अपनी कुटिया में आकर ठीकरियों पर लिख लिया करते थे और इन लिखे हुए सन्तों के शब्दों से अपने मन को भगवान् में लगाया करते थे जिससे उनका मन भक्ति में एकाग्र रहता था, इधर - उधर नहीं जाता था ।
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*चंचल चहुँ दिशि जात है, गुरु बाइक सौं बंध ।*
*दादू संगति साधु की, पारब्रह्म सौं संध ॥७१॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! यह मन बड़ा चंचल है । अन्तःकरण की चारों वृत्तियों द्वारा चारों अवस्थाओं(बाल किशोर युवा वृद्ध) में संसार की ओर दौड़ता है । ऐसे मन को, गुरु के महावाक्य रूपी उपदेश से बांधो और इसे सच्चे संत पुरुषों के सत्संग द्वारा परब्रह्म के स्वरूप में अभेद करो ॥७१॥ 
‘रज्जब’ रहै कपूर मन, मिर्च सु शब्दों मांहि । 
नांतर डाबी डील में, ढूंढे पावै नांहि ॥ 
जैसे कपूर की डली के साथ काली मिर्च रख देने से कपूर उड़ता नहीं है, रुका रहता है, ऐसे ही गुरु और संतों के शब्द काली मिर्च रूप हैं कपूर रूप मन को रोकने के लिए ।
छन्द -
रंकहि नचावै, अभिलाषा धन पायबे की, 
निसदिन सोच करि, ऐसे ही पचत है ।
राजाहि नचावै सब भूमि ही को राज लेवै,
और हु नचावै, कोई देह सूं रचत है ।
देवता असुर सिद्ध, पन्नग सकल लोक, 
कीट पशु पक्षी कहु कैसै के बचत है ।
सुन्दर कहत काहू संत की कही न जाय, 
मन के नचाये सब जगत नचत है ॥ 
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*एक निरंजन नाम सौं, कै साधु संगति मांहि ।*
*दादू मन बिलमाइये, दूजा कोई नांहि ॥७२॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! निराकार निरंजन प्रभु का स्मरण और साधु पुरुषों की सत्संगति, मन को शमन करने के ये दो ही साधन हैं । इसलिए प्रभु - भक्ति और सत्संगति में ही मन को एकाग्र करिये ॥७२॥ 
मुक्ति करन कूँ दोइ हैं, हरिजन हरि का नाम । 
‘तुलसी’ इन सौं प्रीति कर, औरन सौं कहा काम ॥ 
(क्रमशः)

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