शनिवार, 2 मई 2015

*= बनवारीजी को उपदेश(२) =*

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*#श्रीदादूचरितामृत*, *"श्री दादू चरितामृत(भाग-१)"*
लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज,
पुष्कर, राजस्थान ।*
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*~ एकादश विन्दु ~*
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*= बनवारीजी को उपदेश(२) =*
सुख सागर में झूलबो, कश्मल झड़े हो अपार ।
निर्मल प्राणी होयबो, मिलबो सिरजनहार ॥टेक॥
तिहिं संयम पावन सदा, पंक न लागे प्रान ।
कमल विकासे तिहिं तणों, उपजे ब्रह्म गियान ॥१॥
अगम निगम तहँ गम करे, तत्त्वैं तत्त्व मिलान ।
आसन गुरु के आइबो, मुक्तैं महल समान ॥२॥
प्राणी परि पूजा करे, पूरे प्रेम विलास ।
सहजैं सुन्दर सेविये, लागी लै कैलास ॥३॥
रैण दिवस दीसे नहीं, सहजैं पुंज प्रकास ।
दादू दर्शन देखिये, इहिं रस रातो हो दास ॥४॥
अर्थ: - भगवद् भजन रूप सुखसागर में स्नान करने से अपार पाप नष्ट हो जाते हैं । प्राणी निर्मल होकर सृष्टिकर्ता ईश्वर से मिलता है । संयम पूर्वक भजन से प्राणी सदा के लिये अन्यों को पवित्र करने वाला बन जाता है और उसके कोई भी प्रकार का दोष रूप कीचड़ नहीं लगता । उसका हृदय कमल खिल जाता है, उसमें ब्रह्मज्ञान उत्पन्न हो जाता है । वह वेद से भी जो अगम है, उस ब्रह्म के पास पहुंच जाता है और ब्रह्म तत्त्व में आत्म - तत्त्व को मिलाकर गुरु के बताये हुये स्वरूप स्थिति रूप आसन पर स्थिर हो, शरीर - महल में रहते हुये भी शरीर से मुक्त के समान हो जाता है ।
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प्राणी परिपूर्ण रूप से प्रभु की  ही पूजा करता है, तब शनैः शनैः उस सुन्दर सेवा से उसकी वृत्ति सहस्त्रार रूप कैलाश मैं जाकर ब्रह्मस्वरूप में लगती है और वह प्रभु के पूर्ण परमानन्द का उपभोग करता है । समाधि में जहां प्रभु का दर्शन होता है वहां रात्रि - दिन आदि काल - भेद नहीं दीखता, स्वाभाविक प्रकाश पुंज ब्रह्म ही भासता है । हे भगवान् के दास ! तू भी इस भजन - रस में अनुरक्त होकर, उन परब्रह्म के दर्शन कर । 
(क्रमशः)

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