शनिवार, 28 नवंबर 2015

= विन्दु (१)४४ =

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*#श्रीदादूचरितामृत*, *"श्री दादू चरितामृत(भाग-१)"*
लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ।*
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*= विन्दु ४४ दिन २६ =*
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*= जीवन्मुक्ति एवं विदेह मुक्ति वर्णन =*
जीवन्मुक्ति संबन्धी विचार प्रकट करके विदेह मुक्ति संबन्धी विचार कथन करने को दादूजी बोले - विदेह मुक्ति के समय नभ के समान व्यापक ब्रह्म सर्वत्र परिपूर्ण भासते हैं, उसी में प्राण मिल जाते हैं, अन्य लोकों को नहीं जाते हैं -
"तन मन नांहीं मैं नहीं, नहिं माया नहिं जीव ।
दादू एकहि देखिये, दह दिशि मेरा पीव ॥
विदेह मुक्ति में - तन, मन, अहंकार, जीवत्व आदि कुछ भी भासते, सर्वत्र एक अद्वैत ब्रह्म का ही साक्षात्कार होता रहता है ।
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आगे विदेह मुक्ति प्राप्त करने वालों का परिचय दे रहे हैं -
प्राणन खेले प्राण से, मनन हि खेले मन्न ।
शब्दन खेले शब्द से, दादू राम रतन्न ॥
जो अपने प्राणों के व्यापार द्वारा ईश्वर के प्राणों से अभेद रूप खेल खेलता है, नाना प्रकार मनन द्वारा अपने मन को समिष्ट मन में मिलाना रूप और अपने शब्दों द्वारा शब्द ब्रह्म से विचार रूप खेल खेलता है, वह पुरुष रत्न राम का स्वरूप ही हो जाता है ।
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चित्तन खेले चित्त से, बैनन खेले बैन ।
नैनन खेले नैन से, दादू परकट ऐन ॥
अपनी चित्त वृत्तियों द्वारा समष्टि चित्त से चिन्तन रूप, अपनी वाणी द्वारा प्रभु के गीता आदिक वचनों का उच्चारण रूप, अपने नेत्रों से प्रभु के नेत्रों को एकटक देखना रूप खेल खेलता है, ऐसा पुरुष प्रत्यक्ष में ही ब्रह्मस्वरूप होता है । उसका ब्रह्म से भेद कहने मात्र का ही होता है ।
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पाकन खेले पाक से, सारन खेले सार ।
खूबन खेले खूब से, दादू अंग अपार ॥
पवित्र साधनों द्वारा प्रभु की सेवा रूप खेल पवित्र प्रभु से खेलता है । सार रूप विचारों द्वारा विश्व के सार स्वरूप ब्रह्म में ब्रह्म विचार रूप खेल खेलता है, अपने सुन्दर स्वभाव के द्वारा प्रभु की सुन्दरता समझना रूप खेल सुन्दर प्रभु से खेलता है । ऐसे ईश्वर का अंग रूप, वह जीवन्मुक्त आत्मा अपार ब्रह्म रूप ही हो जाता है ।
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नूरन खेले नूर से, तेजन खेले तेज ।
ज्योतिन खेले ज्योति से, दादू एकहि सेज ॥
संसार के दिव्य रूपों के दर्शन द्वारा प्रभु का रूप देखना रूप खेल, शब्दों के ज्ञान प्रकाश से, प्रभु के स्वरूप ज्ञान को समझना रूप खेल, आत्मज्योति के द्वारा ब्रह्मज्योति से ब्रह्मज्योति की प्राप्ति रूप खेल, खेलता है । ऐसा पुरुष ब्रह्म की निर्विकल्प समाधि-शय्या पर ब्रह्मरूप होकर रहता है ।
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दादू जब दिल मिला दयालु से, तब अन्तर कुछ नांहिं ।
ज्यों पाला पाणी मिला, त्यौं हरि जन हरि मांहिं ॥
जब साधन द्वारा मनोवृत्ति दयालु प्रभु में मिल जाती है, तब ज्ञानी भक्त और भगवान् में कुछ भी भेद नहीं रहता है, फिर तो जैसे हिम का पत्थर सूर्यादि के ताप से गलते ही जल में मिल जाता है, वैसे ही प्रारब्ध समाप्ति पर शरीर गिरते ही ज्ञानी भक्त ब्रह्म में मिल जाता है । उसका भिन्न अस्तित्व नहीं रहता ।
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दादू जब दिल मिला दयालु से, तब सब पड़दा दूर ।
ऐसे मिल एक हि भया, बहु दीपक पावक पूर ॥
पराभक्ति द्वारा जब अन्तःकरण की वृत्ति दयालु परमात्मा में मिलती है तब निज स्वरूप के ज्ञान से अविद्यारूप सब पड़दे दूर हो जाते हैं । फिर तो जैसे अनेक दीपक ज्योतियाँ दीपकों को त्याग कर एक व्यापक अग्नि में मिल जाती हैं, वैसे ही आत्मा सूक्ष्म शरीर को त्याग कर ब्रह्म में लय हो जाता है ।
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दादू जब दिल मिला दयालु से, तब अन्तर नांहीं रेख ।
नाना विधि बहु भूषणां, कनक कसौटी एक ॥
जब ज्ञान द्वारा मनोवृत्ति दयालु ब्रह्म में लय हो जाती है, तब उस साधक की आत्मा का ब्रह्म से एक रेखा मात्र भी अन्तर नहीं रहता है । जैसे सुवर्ण के नाना प्रकार के आभूषणों की कसौटी द्वारा परीक्षा करने पर एक सुवर्ण ही सिद्ध होता है, कसौटी आभूषणों के नाम सिद्ध नहीं करती है वा अग्नि द्वारा गल जाने पर एक सुवर्ण ही रहता है, आभूषण नहीं, वैसे ही ब्रह्म ज्ञान होने पर नाना उपाधियों को त्यागकर आत्मा ब्रह्म स्वरूप ही हो जाता है, ब्रह्म से कुछ भी भेद नहीं रहता है ।
(क्रमशः)

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