शनिवार, 28 नवंबर 2015

(३४. आश्चर्य को अंग=६)

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*सवैया ग्रन्थ(सुन्दर विलास)*
साभार ~ @महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य - श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व
राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
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*३४. आश्चर्य को अंग*
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*= इन्दव छन्द =*
*पाप न पुंनि थूल न सून्य न,* 
*बौल न मौंन न सोवै न जागै ।* 
*एक न दोइ पुरुष न जोइ,* 
*कहै कहा कोइ न पीछै न आगै ॥*
*बृद्ध न बाल न कर्म न काल न,*
*ह्रस्व बिसाल न जूझै न भागै ।* 
*बंध न मोक्ष, अप्रोक्ष न प्रोक्ष,*
*न सुन्दर है न असुन्दर लागै ॥६॥* 
*ब्रह्म का कोई कर्म नहीं* : वह(ब्रह्म) न किसी पाप में लिप्त है न पुण्य में । न वह स्थूल है न सूक्ष्म(शून्य) । न वह वक्ता है न मौनी । न सुप्त हैं न जाग्रत् ।
न वह एक है न दो । न वह पुरुष है, न स्त्री । उसको कोई क्या कह सकता है जिसका न आदि(अग्र भाग) है न अन्त(पृष्ट भाग) । 
न वह बालक है न वृद्ध; न वह कर्म है, न काल । न वह ह्रस्व(छोटा), न दीर्घ(विशाल) । न वह युद्धरत रहता है, न युद्ध से भागने वाला(रणछोड़) है ।
उसको न कोई बन्ध है, न मोक्ष । न प्रत्यक्ष है न अप्रत्यक्ष(परोक्ष)। *श्री सुन्दरदास जी* कहते हैं- न वह सुन्दर ही लगता है न असुन्दर; क्योंकि वह निराकार है ॥६॥ 
(क्रमशः)

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