मंगलवार, 19 अप्रैल 2016

= विन्दु (२)७४ =

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*#श्रीदादूचरितामृत*, *"श्री दादू चरितामृत(भाग-२)"*
लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज,
पुष्कर, राजस्थान ।*
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*= विन्दु ७४ =*
*= लोहरवाड़े जाना निषेध करना =*

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वहां का वातावरण देखकर दादूजी महाराज के मुख-कमल से निकल पड़ा ।
"खाड़ा बूजी१ भक्त हैं, लोहरवाड़े मांहिं ।
प्रकटहि पेड़ायत२ बसे तहँ संत काहे को जांहिं॥
भावहीन जो पृथ्वी, दया विहूना देश ।
भक्ति नहीं भगवंत की, तहँ कैसा परवेश॥ "
अर्थात् इस लोहरवाड़े ग्राम में तो संतों को खड्ढे में डालने का ज्ञान रखने वाले१ ही भक्त हैं । प्रकट में ही यहां के लोग बटमार२ हैं । जहां ऐसी भक्ति हो, वहां संत काहे को जाँय । अर्थात् वहां संतों को नहीं जाना चाहिये । जिस पृथ्वी में रहने वाले श्रद्धाभाव से रहित हों और जिस देश में दयाहीन लोग हों तथा भगवान् की भक्ति भी नहीं हो, वहां संत कैसे प्रवेश करेंगे ? अर्थात् वहां संतों को नहीं जाना चाहिये ।
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फिर दादूजी ने कहा - जो हमारे इष्ट में रहेंगे, वे इस लोहरवाड़े ग्राम नहीं आयेंगे, और कदाचित् भूल से आ भी जायेंगे तो यहां का अन्न जल नहीं लेंगे । इस मेरे वचन का उल्लंघन करके यहां का अन्न जल लेगे, वे सुखपूर्वक नहीं रह सकेंगे । भगवान् कि ऐसी ही इच्छा है । उस प्रभु की प्रेरणा से ही यह वचन मेरे मुह से निकला है, इतना कहकर दादूजी वहां से उठकर चल दिये ।
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तब दादूजी के सब शिष्य और अन्य ग्रामों से दादूजी के दर्शनार्थ आये हुये सब भक्त भी दादूजी के साथ ही चल दिये । फिर लोहरवाड़े ग्राम की सीमा से बाहर आकर विश्राम किया ।
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टौंक महोत्सव में दादूजी के शिष्य दयालदासजी देवले वालों ने दादूजी महाराज को निमंत्रण दिया था कि आप आमेर पधारें तब देवले अवश्य पधार कर ही आमेर पधारना । इससे अब दादूजी महाराज ने देवले जाकर आमेर जाने का ही निश्चय किया । फिर लोहरवाड़े से साथ आने वाले भक्त लोग तो अपने-अपने ग्रामों को चले गये और दादूजी महाराज शिष्यों के सहित ब्रह्म चिन्तन करते हुये देवले की ओर आगे बढ़ने लगे ।
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इधर लोहरवाड़े की घटना की सूचना टौंक में माधवकाणी और नरहरिदास को मिली तब उन्होंने टौंक मंडल के वैष्णवों की सभा बुलाकर लोहरवाड़े के महन्त को भेष बाहर निकालने का प्रस्ताव रक्खा । वह बहुमत से पास हो गया । उस मंडल के प्रधान उस समय माधवकाणी ही थे । अतः उस प्रस्ताव के पास होने में कुछ भी अड़चन नहीं आई थी । फिर लोहरवाड़े के महन्त को भेष से बाहर निकाल दिया गया । उसकी पंक्ति पूजा अदि सब बन्द कर दिये गये ।
(क्रमशः)


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