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॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली*
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
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*देषत ही सब परत हैं हो,*
*नरक कुंड के मांहिं ।*
*या नारी के नेह सौं हो,*
*बेगि रसातलि जांहिं ॥६॥*
*नारी घट दीपग भयौ हो,*
*ता मैं रूप प्रकाश ।*
*आइ परै निकसै नहीं,*
*करत सबनि कौ नाश ॥७॥*
*जरि जरि मुये पतंग ज्यौं हो,*
*गये जन्म कौं रोइ ।*
*सुन्दरदास कहा कहै हो,*
*संत कहै सब कोइ ॥८॥*
इसको देखते ही सभी प्राणी इसके नरककुण्ड में गिरने को सन्नद्ध हो जाते हैं । परिणाम यह होता है कि वे इस नारी के स्नेहबन्धन में बंध कर शीध्र ही अपने लिये नरकगमन का मार्ग बना लेते हैं ॥६॥
नारी का शरीर दीपक है तो उसका रूप प्रकाश है । इस प्रकाश के चक्र में जो पड़ा वह निकल नहीं पाया । अन्त में अपने साथियों का भी नाश कर दिया ॥७॥
वे पतंग, जो इस प्रकाश के चक्र में पड़े, वे स्वयं तो नष्ट हुए ही, साथ में अपने साथियों का भी नाश कर दिया । महाराज सुन्दरदासजी कहते हैं – यह बात मैं ही नहीं कह रहा, अपितु सब सन्त भी यही बात कहते हैं ॥८॥
(क्रमशः)

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