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श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य ।
साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ Tapasvi Ram Gopal
(श्री दादूवाणी ~ गुरुदेव का अंग)
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*सतगुरु मिलै तो पाइये, भक्ति मुक्ति भंडार ।*
*दादू सहजैं देखिए, साहिब का दीदार ॥५७॥*
सद्गुरु भक्ति तथा मुक्ति के आगार(भण्डार) हैं । अतः जिसने सद्गुरु को प्राप्त कर लिया उसके लिये भक्ति तथा मुक्ति दोनों ही दुर्लभ नहीं है । ब्रह्म की प्राप्ति भी स्वतः हो जायेगी ॥५७॥
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*दादू सांई सतगुरु सेविये, भक्ति मुक्ति फल होइ ।*
*अमर अभय पद पाइये, काल न लागै कोइ ॥५८॥*
सद्गुरु और परमात्मा की सेवा से भक्ति और मुक्ति –दोनों ही साधक को हस्तगत हो जाती हैं । और भक्ति-मुक्ति द्वारा उसके लिये अमर अभय पद भी दुर्लभ नहीं है तथा वह काल से भी मुक्त हो जाता है ॥५८॥
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*गुरु बिना ज्ञान नहीं*
*इक लख चन्दा आण घर, सूरज कोटि मिलाय ।*
*दादू गुरु गोविन्द बिन, तो भी तिमिर न जाय ॥५९॥*
*अनेक चंद उदय करै, असंख्य सूर प्रकास ।*
*एक निरंजन नांव बिन, दादू नहीं उजास ॥६०॥*
अनेकों सूर्य चन्द्रमाओं के प्रकाश से भी अन्तःस्थ अविद्यान्धकार का नाश नहीं हो सकता; क्योंकि वहां तक उनका प्रकाश पहुँचता ही नहीं है । तथा अविद्यान्धकार को नाश करने की सूर्य-चन्द्र के प्रकाश में योग्यता भी नहीं है ।
जैसे जात्यन्ध को सूर्य-चन्द्र के प्रकाश से भी रूप का ज्ञान नहीं हो पाता, वैसे ही गुरु के ज्ञान के विना करोड़ों कल्पों में भी साधक को तत्त्वज्ञान नहीं हो सकता । सद्गुरु की कृपा से तो अविद्या के नष्ट हो जाने से श्रद्धा पैदा होती है । फिर साधक शान्त दान्त विरक्त तपोनिष्ठ हो कर गुरुभक्ति करता है, उस गुरुभक्ति के प्रताप से वह ब्रह्मनिष्ठ गुरु के पास जाकर प्रदक्षिणापूर्वक दण्डवत् प्रणाम करके अतिनम्रतापूर्वक कहता है- “हे भगवन् ! हे गुरो ! कृपा करके मुझे ज्ञान दीजिये !”
इस प्रकार बार बार प्रार्थना करता है । तब शिष्य को ज्ञान प्राप्त होता है । गुरुप्राप्ति भी भगवत्कृपा से ही होती है, अन्यथा नहीं । अतएव श्रुति में कहा है- “वरुण का बेटा भृगु अपने पिता(वरुण) के पास जा कर बोला कि हे भगवन् ! मुझे ब्रह्मज्ञान प्रदान करें ॥५९-६०॥”
(क्रमशः)

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