शनिवार, 29 अगस्त 2026

*२६. भजन प्रताप का अंग ~४५/४८*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२६. भजन प्रताप का अंग ~४५/४८*
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*पहले चंम सु चूमिये, जे बाँध्या बीच मुसाफ१ ।*
*तो जाति पाँति क्या पूछिये, सुहबत२ देखो साफ ॥४५॥*
यदि मित्र१ अपने प्रेम में बँध गया है और पहले चमड़ा चूम लिया है, तो फिर जाति पाँति क्या पूछता है ? शुद्ध मित्रता२ ही देखना चाहिये । भगवान शुद्ध प्रेम को ही देखते हैं, जाति, पांति, आकृति को नहीं देखता ।
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*ग्वाल भीलनी सौ मिल खेले, शंख बजाया कौने काज ।*
*शाक अरोज्ञा कौनै के घर, नीच ऊंच की रही न लाज ॥४६॥*
भगवान राम ने भिलनी के बेर खाये, भगवान कृष्ण ग्वाल बालों के साथ खेलते रहे, जिसके जिमाने पर पांडवो के यज्ञ में शंख बजा था, वह वाल्मीक कौन था ? सरगरा था, जिसके घर जाकर शाक खाया था, ये विदुर कौन थे ? दासी पुत्र थे । अत: भगवान को नीच वा ऊंच के घर जाने पर कभी भी लज्जा नहीं आती, वे तो शुद्ध भक्ति से ही प्रेम करते हैं । वह चाहे किसी में भी हो, उसी के यहां जा पहुंचते हैं ।
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*नामहिं भजैं सु निर्मले, नीच ऊंच राव रंक ।*
*जन रज्जब रस लीजिये, ईख बंक निष्कलंक ॥४७॥*
ईख बाँका होने पर भी उसको दोष रहित जानकर उसका रस ग्रहण करते हैं, वैसे ही जो नाम-स्मरण करते हैं, वे चाहे जाति से ऊंच हो वा नीच हो - राजा हो वा रंक हो, शरीर की आकृति भी कैसी ही हो वे निर्मल ही माने जाते हैं उनसे भगवत् कथा श्रवण रूप रस लेना चाहिये ।
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*साधू चन्दन चंद का, बंक वर्ण कोउ नाँहिं ।*
*वह शीतल रू सुगंध वहै, वहिके गोविंद माँहिं ॥४८॥*
संत, चन्दन और चन्द्रमा की आकृति का टेढापन और रंग को कोई नहीं देखता, किन्तु संत में गोविन्द की अनुभूति, चन्दन की सुगंध और चन्द्रमा की शीतलता को सभी देखते हैं । संत में गोविन्द की अनुभूति भजन का प्रताप है ।
(क्रमशः)

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