शनिवार, 29 अगस्त 2026

*४६. परमारथ कौ अंग ५७/६१*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री @महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी, @Rgopaldas Tapsvi, बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ @Premsakhi Goswami*
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*४६. परमारथ कौ अंग ५७/६१*
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परमारथ पूरण भगति, परमारथ सुख होइ ।
कहि जगजीवन कबीर गोरख, दादू नांमां जोइ ॥५७॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि परमार्थ में ही भक्ति की पूर्णता है वह ही सुख कारक है । इसके प्रमाण कबीर साहिब गोरखनाथ जी, व दादू जी महाराज हैं ।
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परमारथ की ऊपजी, भाव भगति गुर ज्ञांन ।
कहि जगजीवन हरि हरि बांणी, रांम रांम रस पान ॥५८॥
संत जगजीवन जी क हते हैं कि जिसके मन में भक्ति का भाव हो गुरु महाराज का ज्ञानामृत हो जो वाणी से हरि नाम उच्चारें व राम नाम रस का पान करें ।
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भू पृथिवी हरि हरि सबद, ख३ रुचि रांम निवास ।
इहिं परमारथ ए बूझै, सु कहि जगजीवनदास ॥५९॥
(३. ख=आकाश)
संत जगजीवन जी कहते हैं कि जिसकी आधार रूपी पृथ्वी व जिसके आवृत आकाश से राम नाम ध्वनित हो । ऐसे जन ही परमार्थ जानते हैं । ऐसा संत कहते हैं ।
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सत की चेरी लिच्छमी४, पांय पड़ी फिर आइ ।
कहि जगजीवन दलिदर५, सत धरम देखि बिलाइ ॥६०॥
{४. लिच्छमी=लक्ष्मी (=सम्पति)} {५. दलिदर=दारिद्र्य=निर्धनता (अकिंच्चनता)}
संत जगजीवन जी कहते हैं कि लक्ष्मी साधु जन की दासी है । वह उनके चरणौं में रहती है । ओर गरीबी संतो का सत्य धर्म देखकर ही भाग जाती है ।
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कहि जगजीवन सत धरम, लिच्छमी तहँ ही जानि ।
दूरि करण हरि दरिद्दर, रांम रिदै मंहि आंनि ॥६१॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि जहाँ सत्यधर्म है वहां ही लक्ष्मी निवास करती है । जब किसी का दारिद्रय दूर करना होता है तो प्रभु उसके मन में राम नाम स्मरण कर देते हैं जिससे लक्ष्मी वास होता है
इति परमारथ कौ अंग संपूर्ण ॥४६॥
(क्रमशः)

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