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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री @महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी, @Rgopaldas Tapsvi, बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ @Premsakhi Goswami*
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*४६. परमारथ कौ अंग ३७/४०*
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उतपति ए सब रांम थैं, प्रलै काल मन जोइ ।
कहि जगजीवन रांम बिन, खाली ठौर१ न कोइ ॥३७॥
(१. खाली ठौर=रिक्त स्थान)
संत जगजीवन जी कहते हैं कि सब उत्पत्ति सेहोती है व मन द्वारा प्रलय होती है । हर स्थान पर प्रभु है उनके बिना कोइ स्थान नहीं है ।
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रांम धरा धर ब्योम धर, रांम सकल धर धीर ।
कहि जगजीवन रांम अधर हरि, रांम निरंजन थीर ॥३८॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि राम धरती आकाश व सर्वत्र विराजते हैं राम बिना आधार है और सब राम से ही आधार पाते हैं । वे निरंजन स्थिर हैं ।
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पाप परहिंडौ२ परसतां, मारजनी३ कर साह ।
कहि जगजीवन खंडणी४, चाकी५ चूल्ही६ चाह ॥३९॥
(२. परहिंडो=घर में पेय जल रखने का स्थान) {३. मारजनी=मार्जनी(झाड़ू)} (४. षंडणी=मिर्च मसाला पीसने की शिला या ओखली) (५. चाकी=गेहूँ पीसने की चक्की) (६. चूल्ही=रोटी, दाल, भात बनाने का स्थान)
संत जगजीवन जी कहते हैं कि जहां के परिंडे में पाप स्पर्श हो जहाँ झाडूसाह के हाथ हो जो सब साफ करदे चाहे पुण्य हो या पाप वहां कैसी चौका चूल्हा व सिला हो ।
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ए पंच दोष७ तब ऊतरै, जब ग्रिहि भोजन ले साध ।
कहि जगजीवन हरि भगत, सुमिरै अलख अगाध ॥४०॥
(७. पंच दोष=पाँच सूना । १. चूल्हा, २, चक्की, ३. ओखली, ४. घड़ा, ५. झाड़ू) -गृहस्थ धर्म में ये पाँचों हिंसा के स्थान है । यदि कोई गृहस्थ किसी साधु को नित्य भिक्षा दे तो उसके ये दोष नष्ट होते रहते हैं ।
संत जगजीवन जी कहते हैं कि परिंडा जहाँ पीने योग्य जल है चूल्हा चक्की ओखली व झाड़ू ये पांच के हिंसात्मक दोष साधुजन को नित्य भोजन या भिक्षा कराने से नष्ट हो जाते हैं ।
(क्रमशः)

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