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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४७. अध्यातम कौ अंग २९/३२*
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र रौ म मौ अक्षर उभै, ए गुर ग्यांन निवास ।
अबिगत आग्या१२ चक्रषट१३ खोजौ, सु कहि जगजीवनदास ॥२९॥
{१२. आग्या=आज्ञा(हटयोग का षष्ठ) चक्र} {१३. चक्र षट=छह चक्र(उपरि लिखित)}
र-रौं और म-मौं ये दोनों अक्षर गुरु के ज्ञान का निवास हैं । जगजीवनदास जी महाराज कहते हैं अविगत ब्रह्म को आज्ञा चक्र में और इन छहों चक्रों में खोजो ।
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मूल चक्र मंहि महारस, मन पावन मथि धाम ।
कहि जगजीवन मेर परि, सैर सिरै१४ सुख नांम ॥३०॥
(१४. सैर सिरै=उत्तम साधना)
मूलाधार चक्र में महारस भरा है, जो मन को पवित्र करने वाला परम धाम है । संत जगजीवन जी कहते हैं मेरुदंड पर उत्तम साधना करने से उस सुख-स्वरूप नाम की प्राप्ति होती है ।
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इन्द्री चक्र अगाध हरि, अबिगत अलख अनंत ।
कहि जगजीवन उनमनी, केई जन परसैं कंत१५ ॥३१॥
(१५. परसै कंत=ब्रह्म साक्षात्कार)
इन्द्री चक्र में वह अगाध हरि अविगत, अलख और अनंत रूप में है । जगजीवन जी महाराज कहते हैं उनमनी अवस्था में कोई बिरला जन ही उस कांत रूप ब्रह्म का साक्षात्कार कर पाता है ।
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नाभि चक्र नीझर झरै, निरमल नूर निवास ।
अनहद बांणी ऊपजै, सु कहि जगजीवनदास ॥३२॥
नाभि चक्र में अमृत का झरना झरता है, वहाँ निर्मल प्रकाश का निवास है । संत जगजीवनदास जी कहते हैं वहीं से अनहद वाणी उपजती है ।
(क्रमशः)

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