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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४७. अध्यातम कौ अंग ८९/९२*
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आधारे आधार हरि, स्वाधिष्टांन हरि ग्यांन ।
मणिपूर पूरण ब्रह्म हरि, अनाहद धरि ध्यानं ॥८९॥
संत श्री जगजीवन दास जी कहते हैं कि मूलाधार चक्र में आधार स्वरूप परमात्मा हरि का निवास है । स्वाधिष्ठान चक्र में उसी हरि को ज्ञान स्वरूप में जानो । मणिपूर चक्र में वे ही पूर्ण ब्रह्म के रूप में स्थित हैं और अनाहत चक्र में उन्हीं का ध्यान धरना चाहिये । अर्थात् प्रत्येक चक्र में उसी एक हरि की ही अनुभूति करनी है ।
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कहि जगजीवन विसुद्ध शुद्ध मन, आग्या अम्रित पांन ।
पार ब्रह्म सूँ प्रीति करि, रांम परसि तजि आंन ॥९०॥
विशुद्ध चक्र में मन को पूर्ण रूप से शुद्ध करके और आज्ञा चक्र में अमृत का पान करके, अर्थात् कुण्डलिनी को ऊपर उठाकर ब्रह्मरंध्र के अमृत का अनुभव करके, उस पारब्रह्म परमात्मा से ही सच्ची प्रीति जोड़ो । एक श्री राम के स्पर्श - भजन में ही लगो और अन्य सभी आसक्तियों को छोड़ दो ।
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षट चक्र पिछांण धरि, हरि भजि रांम निवास ।
परम जोति तन मन बिलै५, सु कहि जगजीवनदास ॥९१॥
{५. बिलै=लीन(अन्तर्भूत) कर}
इस प्रकार इन षट् चक्रों को पहचान कर, इनमें स्थित रहस्य को धारण करके, जो हरि का भजन करता है और राम के निवास - स्वरूप में लीन रहता है, उसका तन और मन दोनों परम ज्योति स्वरूप ब्रह्म में लीन हो जाते हैं - बिलय हो जाते हैं । ऐसा संत जगजीवन दास जी कहते हैं ।
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तेज पुंज प्रकास हरि, रंध्र रोधि६ रस चाखि ।
कहि जगजीवन भगति करि, अनहद बांणी भाखि७ ॥९२॥
(६. रोधि=नव द्वारों पर संयम कर) (७. भाखि=बोले)
जब साधक नव द्वारों पर संयम करके - इन्द्रियों को रोककर - ब्रह्मरंध्र में स्थित तेज के पुंज, प्रकाश स्वरूप हरि के दिव्य रस को चख लेता है, तब उसके हृदय में अनहद नाद की वाणी स्वयं प्रकट होने लगती है । जगजीवन दास जी कहते हैं कि यही सच्ची भक्ति है ।
(क्रमशः)

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