गुरुवार, 1 अक्टूबर 2026

योग-शक्ति बलवान

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*दादू सिरजनहारा सबन का, ऐसा है समरत्थ ।*
*सोई सेवक ह्वै रह्या, जहँ सकल पसारैं हत्थ ॥*
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एक दिन अलखरामजी कुछ भक्तों के साथ डूंगरी पर विराज रहे थे कि सहसा आकाश से कुछ गेहूं के दाने सबके बीच में पड़े । तब भक्तों ने पूछा - भगवन् ! गेहूं के दाने आकाश से किसने डाले ? अलखरामजी ने कहा - एक सेवड़ा अपनी मंत्र शक्ति से गेहूं की राशि आकाश मार्ग द्वारा उड़ा कर ले जा रहा है । उसी राशि से ये दाने यहां पड़ गये हैं । अलखरामजी की डूंगरी पर आते ही गेहूं की राशि की उड़ान मंद पड़ गई थी । इससे कुछ दाने वहां पड़ गये थे यह बात अलखरामजी ने भक्तों को बताई ।
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तब वहां बैठे हुए सभी भक्तों ने प्रार्थना की कि महाराज ! यह गेहूं की राशि यहां से आगे नहीं जानी चाहिये । चौकड़ी की सीमा से आगे जाने पर आप जैसे संतों का अपमान होगा । भक्तों की प्रार्थना से अलखरामजी ने गेहूं की राशि को अपनी योग शक्ति से वहां ही गिरा ली । कारण - मंत्र शक्ति से योग-शक्ति बलवान होती है । कहा भी है -
मंत्र शक्ति से योग की, शक्ति अधिक दिखलाय ।
अलखराम ने नाजकी, राशि लिई पटकाय ॥२७॥ह.त.१०॥
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अतः सेवड़ा की मंत्र शक्ति गेहूं राशि को आगे नहीं ले जा सकी । गेहूं की राशि की नियत समय पर जब उस सेवड़े के पास नहीं पहुँची और इधर यह बात भी अति शीघ्र चारों ओर फैल गई थी कि अलखरामजी ने आकाश मार्ग से जाती हुई गेहूं की राशि अपने स्थान डूंगरी पर गिरा ली है, वे अति समर्थ संत हैं । सेवड़ा के पास भी यह बात शीघ्र ही पहुँच गई । सेवड़ा यह सुनकर अति क्रुद्ध हो गया और उसने अलखरामजी को मारने के लिये ३ फुट लम्बी, दो फुट चौड़ी और दो फुट मोटी शिला अपनी मंत्र शक्ति से अलखरामजी पर चलाई ।
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वह शिला अलखरामजी की डूंगरी पर आई तब उसके आने का भारी शब्द हुआ । अलखरामजी बैठे भजन कर रहे थे । उनको ज्ञात हो गया कि यह शिला सेवड़ा की चलाई हुई आई है । वे अपनी योग शक्ति से उसे पीछे लौटाकर सेवड़ा को मार सकते थे किन्तु वे संत थे । ऐसा कैसे कर सकते थे । उन्होंने शिला को कहा - यहां ही गिरजा क्यों चक्कर काट रही है ? कारण - अलखरामजी पर तो पड़ नहीं सकती थी । इससे वहां चक्कर काट रही थी ।
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अलखरामजी की आज्ञा से वहां ही जिस स्थान पर गिरने का हाथ से संकेत किया वहां ही गिर गयी । उसे देखकर अलखरामजी ने कहा - अच्छी आई हमारे स्नान के लिये काम आयेगी ऐसी शिला यहां थी भी नहीं । वह शिला अभी तक वहां ही पड़ी है । फिर अपनी शक्तियों को कुंठित देखकर सेवड़ा डर गया तथा सोचा अब तो अलखरामजी की शरण जाना ही अच्छा है । वह अलखरामजी महाराज की शरण में आया और प्रणाम करके दीन भाव से क्षमा मांगने लगा ।
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अलखरामजी ने कहा - क्षमा तो तब करेंगे जब तुम आगे ऐसा काम न करने की प्रतिज्ञा करोगे । तुमने कुछ भी नहीं सोचा कि जिस किसान ने कितना परिश्रम करके गेहूं तैयार किया था, उसके लिये कुछ भी नहीं छोड़ा सब उड़ा लाये, यह कितना अन्याय है । सेवड़े ने कहा - आज्ञानुसार ही करूंगा । आगे मैं ऐसा कभी भी नहीं करूंगा । फिर अलखरामजी ने पूछा - कहां से और किसका उड़ाया था ? उसका पता हम को बताओ या इस गेहूं राशि को जहां से उड़ाई थी वहां ही पहुँचा दो ।
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फिर अलखरामजी को उसने कहा - बताने से तो मेरे पर विपत्ति आयेगी, सरकार मुझे तंग करेगी । अतः मैं इसको जहां से लाया वहां ही पहुँचा देता हूं । आप तो सर्वज्ञ हैं सब जानते हैं किन्तु मेरे हित के लिये ही मुझे कह रहे हैं । अतः इसको गुप्त ही रहने दें किसी को नहीं बतावें कि - अमुक के गेहूं थे और अमुक ने उड़ाये थे । अलखरामजी ने कहा - इस गेहूं राशि को ठिकाने भेज दो ।
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सेवड़ा ने भेज दी और अलखरामजी ने अपनी योग शक्ति से जान लिया कि जिसके गेहूं थे उसके पास पहुँच गये और सेवड़ा अलखरामजी को प्रणाम करके अपने घर आ गया । एक दिन अलखरामजी भक्तों व शिष्यों के सहित डूंगरी के स्थान में विराज रहे थे और दादूराम मंत्र की ध्वनि कर रहे थे । फाल्गुण का महीना था । उस समय गुहाला की ओर से ओलों की वर्षा आने लगी । ध्वनि करने वाले भक्तों ने जब उसे देखा तो घबरा कर बोले - महाराज ! इन ओलों से सारी खेती नष्ट हो जायेगी और किसान बुरी तरह मारे जायेंगे । अतः आपसे प्रार्थना है - आप इस विपत्ति से चौकड़ी को तो अवश्य बचावें ही ।
(क्रमशः)

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