शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2026

*४७. अध्यातम कौ अंग ९३/९६*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४७. अध्यातम कौ अंग ९३/९६*
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मूल चक्र इन्द्री चक्र, नाभि चक्र निज ठांम ।
कहि जगजीवन ह्रिदै चक्र मंहिं, बिन रसनां रटि रांम ॥९३॥
संत जगजीवन दास जी कहते हैं कि मूलाधार, स्वाधिष्ठान(इन्द्री) चक्र और नाभि चक्र - ये तीनों अपने-अपने स्थान पर स्थित हैं । ये साधना की प्रारम्भिक सीढ़ियाँ हैं । इनसे ऊपर उठकर जब साधक हृदय चक्र में आता है, तब वहाँ जीभ से नहीं, बल्कि बिना रसना के ही - अजपा जाप से - निरन्तर राम नाम का स्मरण चलने लगता है । यही सच्चा आंतरिक भजन है ।
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कंठचक्र करतार हरि, भंवरचक्र पिव पास ।
ए षट चक्र निवास हरि, सुकहि जगजीवनदास ॥९४॥
कंठ चक्र में सृष्टि के करतार - सृजनहार - हरि का निवास है, वहाँ वाणी शुद्ध होती है । और भँवर चक्र - आज्ञा चक्र / सहस्रार - में पहुँचकर जीव अपने प्रियतम परमात्मा के अत्यंत निकट, उसके पास पहुँच जाता है । जगजीवन दास जी सुखपूर्वक कहते हैं कि इस प्रकार ये जो षट् चक्र हैं, वे और कुछ नहीं, बल्कि उस एक हरि के ही निवास स्थान हैं ।
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यहु परंपरा१ सुद्धता बांण, हरि भजि रांम पिछांण ।
कहि जगजीवन ऊपजै, आनंद सौं चित आंण ॥९५॥
(१. परंपरा=वाणी की शुद्धता हेतु योगियों की परम्परा)
यह योगियों की परम्परा से चली आई वाणी की शुद्धता का मार्ग है । हे जीव ! हरि को भज और राम को पहचान । जगजीवन दास जी कहते हैं कि इससे चित्त में आनंद के साथ(परमात्मा का) प्राकट्य होता है ।
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मायाधर२ मनसा रमण, विद्याधर३ विद्वांस४ ।
कहि जगजीवन ग्यांनधर५, पारब्रह्म के अंस६ ॥९६॥
(२. मायाधर=पाषण्डी पुरुष)   (३. विद्याधर=विद्याप्रेमी) 
(४. विद्वांस=शास्त्रज्ञ)    (५. ग्यांनधर=ज्ञानी)   (६. पारब्रह्म के अंस=परब्रह्म के अंग हो जाते हैं)
इस दोहे में चार प्रकार के पुरुष बताये हैं -
मायाधर - जो माया में रमण करने वाला पाखण्डी है, विद्याधर - जो केवल विद्या से प्रेम करने वाला है, विद्वांस - जो केवल शास्त्रों को जानने वाला है, और ज्ञानधर - जो सच्चा ज्ञानी है ।
जगजीवन दास जी कहते हैं कि इनमें से ज्ञान को धारण करने वाला ज्ञानी ही पारब्रह्म का अंश - अंग - बन जाता है, उसी में लीन हो जाता है ।
(क्रमशः)

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