बुधवार, 7 अक्टूबर 2026

*४७. अध्यातम कौ अंग ११३/११६*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४७. अध्यातम कौ अंग ११३/११६*
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कहि जगजीवन सब रही, प्रेम प्रीति पिव प्यास ।   
 दूर गई सब अविद्या१, परम पुरिष की आस ॥११३॥
(१. अविद्या=अज्ञान)
संत जगजीवन दास जी कहते हैं कि प्रियतम परमात्मा के लिए प्रेम, प्रीति और प्यास बनी रहे जी । जब परम पुरुष की सच्ची आस लगती है, तो सारी अविद्या / अज्ञान अपने आप दूर हो जाता है ।
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कहि जगजीवन सब रही, दूर गई सब आंन ।
परम पुरिष सौं प्रीति करि, रांम कहैं गुरु ग्यांन ॥११४॥ 
संत जगजीवन दास जी कहते हैं कि जब परम पुरुष से सच्ची प्रीति लग जाती है, तो दूसरी सब आन-उपासना दूर हो जाती है । गुरु का सच्चा ज्ञान यही है कि केवल राम-नाम में ही रम जाओ ।
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कहि जगजीवन सब रही, देह गई हरि मांहि ।
तेज पुंज मंहि तेज तन, कोइ गुन व्यापै नांहि ॥११५॥
संत जगजीवन दास जी कहते हैं कि साधक की देह हरि में लीन हो गई है । अब वह सब जगह उसी को देखता है । उसका शरीर तेज के पुंज में तेज रूप हो गया है, अब उस पर कोई गुण, माया का विकार, असर नहीं करता है ।
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कहि जगजीवन रांमजी, अनहद सबद अगाध ।
परम गुरु परगट कहैं, जाहि पिछांणै साध ॥११६॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि रामजी का नाम अनहद, असीम और अगाध शब्द है । परम गुरु इसे प्रत्यक्ष रूप में बताते हैं, और सच्चा साधु ही इसे पहचान पाता है ।
(क्रमशः) 

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