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🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*दादू सोई हमारा सांइयां, जे सबका पूरणहार ।*
*दादू जीवन मरण का, जाके हाथ विचार ॥*
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जोधपुर नरेश मालबदेव ने बीकानेर पर आक्रमण कर दिया था । उस युद्ध में भीमराज के पिता जैतसिंह की मृत्यु हो गई तथा बीकानेर मालबदेव के अधिकार में आ गया । सब सरदारों ने जैतसिंह के परिवार को कल्याणमल और भीमराज के साथ सुरक्षित सिरसा में पहुँचा दिया । मालबदेव बीकानेर का प्रबन्ध सरदार कूं पा और पंचायण को देकर मेड़ता चला गया ।
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इधर सिरसा से भीमराज मंत्री नगराज के साथ दिल्ली में शेरशाह के पास गया । मालबदेव ने वीरमदेव से मेड़ता छीन लिया तब वीरमदेव भी कल्याणमल के पास सिरसा होता हुआ भीमराज के पास दिल्ली चला आया । फिर भीमराज और वीरमदेव की सहायता के लिये शेरशाह ने एक विशाल सेना लेकर उन दोनों के साथ मालबदेव पर चढ़ाई की । मार्ग में कल्याणमल भी मिल गये । इनकी विशाल शक्ति जानकर मालबदेव ने कूं पा के पास सूचना भेजी कि— बीकानेर के गढ़ को खाली करके तुरन्त चले आओ । तब वह गढ़ को खाली करके जोधपुर चला गया ।
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भीमराज ने अपने चाचा रावत किशनसिंह की सहायता से बीकानेर के गढ़ पर अधिकार करके अपने भाई कल्याणमल की दुहाई फेर दी । उक्त प्रकार भीमराज ने बीकानेर के गये हुये राज्य पर अपने भाई का पुनः अधिकार कराया । इससे कल्याणमल ने भीमराज को वि. सं. १६०२ में भीमसर की जागीर और “गई भूमिका बाहुड़” का विरुद देकर सम्मानित किया । भीमराज की वीरता से प्रभावित होकर अकबर बादशाह ने भीमराज और चिन्दरागीपुर के राजा चन्द्रसेन को सैन्यदल के साथ काबुल के मिर्जा हाकिम को जय करने के लिये भेजा था ।
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भीमराज ने बड़ी वीरता से युद्ध करके मिर्जा हाकिम को हराया किन्तु युद्ध में वे स्वयं भी घायल होकर गिर पड़े और मूर्च्छित हो गये थे । जब मिर्जा अपने दल सहित इनसे सन्धि करने जा रहा था, तब भीमराज के सैनिकों ने समझा कि मिर्जा हाकिम पुनः आक्रमण करने के लिये आ रहा है । अतः वे भीमराज को मृत समझ कर भाग गये । यही राघवदासजी ने अपनी भक्तमाल में संक्षेप में मू. छ. ४८७ में कहा है, देखिये -
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मू. छ.- उत्तर देश नरेश को बालक, आय मिल्यो पतिशाह के तांई ।
पेल¹ दिये मजबूत मवासे² में, जातहि रारि³ परी⁴ परघो घांईं ॥
चाकर लोग चम्मकि गये भज, ठाकुर खेत रह्यो उहि ठांई ।
राघो कहै सत सुन्दरदासजि, के रक्षपाल भये तहं सांई ॥४८७॥¹
भेज ²रक्षा ³युद्ध ⁴हुआ ⁵घाव । अन्य शब्द सब सरल हैं ।
फिर जब चिन्दरागीपुर के सैनिकों को यह ज्ञात हुआ तब वे भीमराज को उठाकर महाराज चन्द्रसेन के डेरे में ले गये । भीमराज को छोड़कर भागे हुये सैनिकों ने भीमराज के घर को उनके वीरगति पाने की सूचना दे दी । फिर जब भीमराज होश में आये तब भीमराज ने काबुल के मिर्जा हाकिम को दिल्लीपति की अधीनता स्वीकार करने की सलाह दी । मिर्जा हाकिम ने भीमराज की सलाह मान ली ।
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फिर एक पक्ष तक चिन्दरागीपुर के राजा- चन्द्रसेन ने भीमराज की सेवा की और अच्छे हो गये तब मार्ग के लिये खर्च, कपड़ा, हथियार और एक घोड़ा देकर घर को भेज दिया । वे बादशाह के पास आये । बादशाह ने प्रसन्न होकर इनका मुजरा माफ कर दिया । फिर ये बीकानेर जा रहे थे तब मार्ग में मथुरा में स्नान करने आये । यही भक्तमाल में संक्षेप से राघवदासजी ने मू. छ. ४८८ में कहा है, देखिये—
मू. छ.- करतार सुनी करुणा जनकी, जन चार¹ विचार रु ले घर आये ।
रीति बड़ों कि बड़ो पहचानत, सार² करी बहु भांति जिमाये ॥
कपड़ा हथियार तुरंग³ खरची, दिड यूं करके घर को पहुँचाये ।
राघो कहै सत सुन्दर दास जि, आवत ही मथुरा मधि न्हाये ॥४८८॥¹
सेवक ²सेवा ³घोड़ा ।
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मथुरा में भीमराजजी को अपने राजपुरोहित प्रहलादजी अपने साथियों के साथ मिले । वे भीमराजजी का ही गया श्राद्ध कराकर आये थे । प्रहलादजी ने जब इनको देखा तो उनको अति आश्चर्य हुआ । उन्होंने सोचा जिनका मैं गया श्राद्ध करा कर आया हूँ वे तो ये सामने जीवितावस्था में दीख रहे हैं । फिर उनके मन में संकल्प हुआ कोई और हो सकते हैं । कभी एक समान आकृति के मिल भी जाते हैं । फिर भी बात करने से पूरा निर्णय होगा ।
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प्रहलादजी पास आये तब भीमराजजी ने उनको प्रणाम किया और पूछा— आप यहां कैसे पधारे हैं ? यात्रा करने आये हैं या और किसी कार्य- वश आये हैं ? तब प्रहलादजी का कंठ रुक गया, वे बोल न सके और उनके नेत्रों से अश्रु भी टपकने लगे । भीमराजजी ने पूछा— गुरुजी ! ऐसी क्या बात है ? जो आपकी ऐसी स्थिति हो गई है । प्रहलादजी बोले— महाराज ! क्या कहूँ कहा नहीं जाता है । भीमराजजी बोले— कहना तो पड़ेगा ही, क्यों संकोच करते हो ? कह दो ।
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प्रहलादजी बोले— हमको आपकी वीरगति का समाचार मिला था । इससे महारानी आपकी कुल परम्परा के अनुसार सती हो गई है और आप के पुत्र नारायणदास को आपकी गद्दी पर बैठा दिया है तथा मैं आपका गया— श्राद्ध कराकर लौटा हूँ । यहां आते ही आपका दर्शन हुआ है । इससे मुझे हर्ष और दुःख दोनों ने घेर लिया है । हर्ष तो आपके मिलने का है । दुःख महारानी के सती होने का है । इतना कहकर प्रहलादजी मौन हो गये ।
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फिर भीमराजजी ने कहा— अच्छा, जो हरि इच्छा होती है, वही होता है । जितने दिन का संस्कार था उतने दिन संयोग रहा, फिर वियोग तो होना ही था । दोनों में से एक तो जाता ही है । आप क्यों दुःखी होते हैं ? प्रहलादजी ने कहा— ठीक है महाराज जो होना था सो हो गया, अब राज-धानी को पधारें । घर पर चलकर सबको हर्षित करें । तब भीमराजजी ने कहा— अब घर जाकर क्या करना है ? घर तो गृहणी तक ही होता है । अब मैं घर नहीं चलूंगा, अब तो किसी उच्चकोटि के संत की शरण होकर भजन ही करूंगा, आप जाओ । कहा भी है-
कभी कभी तो होत है, दुःख से भी वैराग ।
नारि सती सुन विरत भये, सुन्दर तज अनुराग ॥१६०॥ ह. त. अ।
(क्रमशः)

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