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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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४९. भ्रम विधवंस कौ अंग १७/२०
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गया प्रयाग बनारसी, इहाँ ही जगन्नाथ३ ।
जगजीवन इस जीव का, जे हरि पकड़ै हाथ ॥१७॥
(३. जगन्नाथ=जगन्नाथपुरी का मन्दिर)
गया, प्रयाग, बनारस और जगन्नाथ धाम सब यहीं इसी घट में मिल जाते हैं, अगर हरि कृपा करके इस जीव का हाथ पकड़ ले । संत जगजीवन जी कहते हैं कि भगवान के मिलते ही सारी तीर्थ यात्रा पूरी हो जाती है, फिर कहीं बाहर जाने की आवश्यकता नहीं रहती ।
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जगजीवन पटु४ कर ह्रिदै, सब तीरथ का राइ ।
सकल साध पावन भए, जीवन जांनै ताहि ॥१८॥
(४. पटु=सत्कर्म में कुशल, स्वच्छ, निर्दोष)
संत जगजीवन जी कहते हैं कि अपने हृदय को ही पवित्र कर लो, वही सब तीर्थों का राजा है । जो इस हृदय रूपी तीर्थराज को पहचान लेता है, उसका जीवन पावन हो जाता है, और सभी साधु संत भी उसे पवित्र मानते हैं, सबसे बड़ा तीर्थ अपना शुद्ध हृदय ही है ।
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अड़सठ तीरथ सब करै, फिर फिर बार हजार ।
जगजीवन हरि भगति बिन, अंट पड़ै मुझ छार५ ॥१९॥
(५. छार=धूल)
कोई व्यक्ति अड़सठ तीर्थों की यात्रा हजार-हजार बार भी कर ले, फिर भी क्या होगा । सांय जगजीवन जी कहते हैं कि हरि भक्ति के बिना वह सब राख में मिल जाता है, व्यर्थ चला जाता है । भाव ये है कि गिनती से मुक्ति नहीं मिलती, एक बूंद सच्ची भक्ति हजार तीर्थों से भारी होती है ।
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बासी६ बस्या बनारसी, मांहि विषै की प्यास ।
(तौ) मगहर मरण गति सोभई७, सुकहि जगजीवनदास ॥२०॥
{६. बासी=पुराने समय से(चिर काल से)} (७. सोभई=शोभा देना)
कोई व्यक्ति बनारस जैसे पवित्र धाम में बरसों से बसा हुआ है, पर भीतर अभी भी विषयों की प्यास लगी है, तो उसका बनारस में रहना व्यर्थ है । संत जगजीवनदास जी कहते हैं कि उससे तो मगहर में वैराग्य और हरि नाम के साथ मरना भी ज्यादा शोभा देता है, क्योंकि स्थान बड़ा नहीं होता, मन की पवित्रता ही बड़ी होती है ।
(क्रमशः)

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