बुधवार, 28 अक्टूबर 2026

*४९. भ्रम विधवंस कौ अंग ६१/६४*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४९. भ्रम विधवंस कौ अंग ६१/६४*
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*रांम बिमुख जनमैं मरै, मरै बसै बसिमार ।* 
*कहि जगजीवन रांम रटि, हरि भजि उतरै पार ॥६१॥*  
संत जगजीवन साहेब कहते हैं, जो जीव राम से विमुख है, वह जन्म लेता है और मर जाता है, मर कर फिर नर्क में बसता है और फिर राम को भूल जाता है । यही उसका बार-बार का चक्कर है । इसलिए हे जीव, राम नाम को रट ले, हरि को भज ले, इसी से तू इस भवसागर से पार उतर जाएगा ।
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*कहि जगजीवन पवन नहिं, मन नहिं मोहि सरीर ।*
*अबिगत अलख अगाध है, सतगुरु सा हित धीर ॥६२॥*
संत जगजीवन दास जी कहते हैं, परमात्मा न तो पवन जैसा प्राण है, न मन है, न यह मोह वाला शरीर है । वह तो अबिगत है, अलख है, अगाध है, अर्थात इंद्रियों से परे है । उस परमात्मा तक पहुंचाने वाला, उसका सच्चा हितैषी और धीरज बंधाने वाला केवल सतगुरु ही है ।
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*जहं लग प्रतिमा पूजि सब, सब तीरथ फिर न्हाइ ।*
*कहि जगजीवन भाव सिध४, कोइ जन हरि गुण गाइ ॥६३॥*
(४. भावसिध=भाव भक्ति से पूर्ण साधक)
जहाँ तक सब लोग प्रतिमाओं की पूजा कर लेते हैं, सब तीर्थों में घूम-घूम कर नहा लेते हैं, पर इससे सिद्धि नहीं मिलती । संत जगजीवन साहेब कहते हैं, भाव से ही सिद्धि मिलती है, कोई बिरला जन ही सच्चे भाव से हरि के गुण गाता है और वही पार होता है ।
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*बेद५ कतेब६ मसीत७ देहुरा८, दोइ पष रहतां रांम ।*
*कहि जगजीवन जुगल मधि, कोइ जन सुमिरै नांम ॥६४॥*
(५. बेद=हिन्दुओं का पवित्र ग्रन्थ)   (६. कतेब=पवित्र कुरान) 
(७. मसीति=मस्जिद)   (८. देहुरा=देवालय या देवमूर्ति)
वेद हिन्दुओं के पास है, कतेब मुसलमानों के पास, मसीत यहाँ है तो देहुरा वहाँ है, इन दो पक्षों के बीच में ही लोग राम को बाँट कर रह गए हैं । संत जगजीवन दास जी कहते हैं, इन दोनों पक्षों के झगड़े के बीच में रहकर भी कोई बिरला जन ही है, जो पक्षपात छोड़कर सच्चे राम नाम को सुमिरता है । वही सच्चा सुमिरन है ।
(क्रमशः)

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