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🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*दादू तन मन लाइ कर, सेवा दृढ़ कर लेइ ।*
*ऐसा समर्थ राम है, जे मांगै सो देइ ॥*
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कृष्णदास मोहन मगन, अजमेरी ऊधो रहै ।
गगन मगन खेलत फिरै, यथा शक्ति हरिहरि कहै ॥
परमारथ में निपुन अति, आये को जल अन्न दें ।
संतन को उर भाव बहु, सन्मुख जाय रु धामलें ।
ये करणी कर्तव्य भले, ज्यों राजस वृत्ति रिषन के ।
एक टेक हरि नाम की, हापाजी के शिषन के ॥६७०॥भक्तमाल
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कृष्णदासजी और मोहनदासजी ये दोनों भजन में ही निमग्न रहते थे । अजमेर वाले उद्धवजी ब्रह्म रूप गगन में निमग्न रहकर ब्रह्मानन्द रूप खेल खेलते थे और यथा शक्ति हरि हरि करते हुये विचरते थे । ये सब परमार्थ में अति चतुर थे । आने वाले अतिथियों को अन्न जल देते थे । संतों के प्रति इन के हृदय में बहुत प्रेम था । सामने जाकर स्थान पर लाते थे । ये सब करने योग्य कर्तव्य कर्म को अच्छी प्रकार करते थे । जैसे ऋषियों में कर्म करना रूप राज वृत्ति थी, ऐसे ही इन संतों में भी थी । इस प्रकार कर्तव्य कर्म करते रहने पर भी हापाजी के शिष्यों में हरि नाम चिन्तन करने की तो टेक ही थी अर्थात् नाम चिन्तन निरंतर करते ही रहते थे ।
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*हरिदासजी का ब्रह्मलीन होना*
हरिदासजी महाराज अपने जीवन में परम विरक्त रहते हुये हरि भजन ही करते रहे थे तथा अपने प्रसंग में आने वालों को उपदेश द्वारा हरि भक्त बनाते हुये आयु समाप्त होने पर हिन्डौन में ही ब्रह्मलीन हुये थे ।
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*हिन्डौन की महन्त परंपरा*
हरिदासजी महाराज की हिन्डौन की गद्दी की महन्त परंपरा इस प्रकार है—१- हरिदासजी, २- उद्धवदासजी, ३- परशुरामजी, ४- हृदयरामजी(मास्टर नारायण स्वामी ने हृदयरामजी के स्थान में उदयरामजी लिखा है किन्तु सुन्दरोदय और वंश दीपिका में मुझे हृदयरामजी ही मिला है ।), ५- जोगीदासजी(जोगीदासजी के आगे मास्टर नारायण स्वामी ने गिरधरदासजी लिखा है किन्तु सुन्दरोदय और वंश दीपिका में यह नाम मुझे नहीं मिला ।), ६- जयरामदासजी, ७- अमोलकदासजी, ८- लक्ष्मणदासजी । इससे आगे हिन्डौन की परंपरा नहीं मिल सकी है । हिन्डौन में इस परंपरा का स्थान केशवपुरा में चार मंजिल का है, नोहरा के सामने है, नोहरा में ही उक्त महन्तों के चरण बताये जाते हैं । किन्तु अब स्थान किसी महाजन के कब्जे में है । इति श्री तृतीय अध्याय समाप्त: ३ ।
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*अथ अध्याय ४*
*राघवदासजी*
राघवदासजी हरिदासजी हापा के शिष्य थे । पूर्वाश्रम का परिचय इन्होंने भक्तमाल में किंचित दिया है । सो इस प्रकार है—
छप्पय—नमो तात हरिराज, नमो रतनाई माई ।
जीव वध रु मद मांस, छुड़ायो केशीबाई ॥
सत संगति गति ज्ञान, ध्यान ध्वनि धर्म बतायो ।
परमहंस हरिदास, परख पूरो गुरु पायो ॥
रघवा रजमो¹ पाय के, रामरटत उमग्यो हियो ।
दादूजी के पंथ को, तबहि तनिक वर्णन कियो ॥६७२॥
चौपाई- पीपा वंशी चांगल गोत, हरिहृदय कीन्हों उद्योत ॥७५०॥
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उक्त पद्यों से ज्ञात होता है—राघवदासजी पीपा वंशी चांगल गोत्र के हरिराज के पुत्र थे । इनकी माता का नाम रतनाई था । जाति के क्षत्रिय होने से शिकार करना, मद्य पीना, मांस खाना इनका स्वाभाविक काम था किन्तु केशीबाईजी ने उक्त तीनों—शिकार, मद्य, मांस इनका छुड़ा दिया था । फिर इन्होंने पूरी परीक्षा करके पूरे परमहंस हरिदासजी को गुरु रूप में प्राप्त किया था ।
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उनकी सत्संगति से ज्ञान में गति होने लगी फिर तो राघवदासजी ने गुरुजी के बताये हुये निर्गुण ध्यान, अनाहत व अनहद ध्वनि और भागवत् धर्म में उनकी वृत्ति लीन रहने लगी थी । इसी कारण से रामजी का कृपा रूप बल¹ प्राप्त करके राम-राम करने से मेरा हृदय उमंग धाया था । इसी से मेरे से दादूजी के साधन मार्ग द्वारा भजन करने वाले संतों का कुछ वर्णन हो सका है । राघवदासजी के जन्म स्थान का तो पता नहीं लग सका है । उन्होंने उक्त ही परिचय दिया है ।
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मंगलदासजी जाखल की ढाणी वालों ने भी सुन्दरोदय ग्रंथ में लिखा है—
छप्पय—“दास हरि शु प्रताप, शिष्य राघो रज वंशी ।
खींची चांगल गोत, प्रेम पर ब्रह्म हुलंसी ॥
रहै उदेई धाम, काल बिरखा करवाई ॥
ल्यया करोली राय, धामरची उदक चढ़ाई ॥
जन यश वाणी सहस रवि, सुख सुकुंज की ठाम तिन ।
राजाराम नन्दराम हि, हरिनारायण पाठ धनि ॥सुन्दरोदय॥”
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राजा पीपाजी की वंश परंपरा में चांगल गोत्र के खींची क्षत्रिय राघवजी गुरुदेव हरिदासजी हापा के उपदेश रूप प्रताप से परब्रह्म में प्रेम करने लगे थे । उस प्रेम में उनकी बुद्धि बहुत प्रसन्न हुई थी । फिर राघवदासजी ने अपना साधन धाम उदेई धाम में बनाया था । उदेई में ही रहकर सार भजन करते थे । उदेई गंगापुर के पास है ।एक समय उदेई में दुष्काल पड़ गया था । पानी की भारी कमी आ गई थी । तब जनता को दुःखी देखकर आपका दया भाव गई थी । इससे उदेई के तालाब पर गये और उसके पूरे भराव के चिन्ह स्थान पर खड़े होकर बोले “जब तक तालाब पूरा भरकर पानी मेरे घर तक लगेगा तब तक मैं यहां से नहीं उठूंगा” ।
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यह बात कह वहां बैठकर सच्चे के लिये भगवान् से प्रार्थना की और भगवान् का ध्यान करने लगे । फिर भगवान् ने उदेई में वर्षा की और तालाब पूरा भर गया, राघवदासजी के पानी आ लगा, तब वे वहां से उठे थे । ऐसे दयालु थे । राघवदासजी की यह घटना सुनकर तत्कालीन उस प्रदेश के नरेश ने उनको ५१ बीघा भूमि भेंट की थी । कहा भी है—
संत लोक हित के लिये, दृढ़ प्रतिज्ञा सब काल ।
राघवदास उठे तभी, भरा भली विधि ताल ॥२३४॥दृ.त.११
(क्रमशः)
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