बुधवार, 28 अक्टूबर 2026

*३०. तीर्थ सत्संग का अंग ~१/४*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*३०. तीर्थ सत्संग का अंग ~१/४*
इस अंग में सत्संग रूप तीर्थ संबंधी विचार कर रहे हैं ~
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*साधु सलिता१ शब्द जल, इहिं गंगा कोई जाय ।*
*रज्जब रज मल२ ऊतरे, मन भागीरथि न्हाय ॥१॥*
संत रूप नदी१ में शब्द रूप जल है, इस गंगा में स्नानार्थ कोई बिरला ही जाता है, जो उक्त भागीरथी गंगा में स्नान करता है उसके मन के पाप२ और अविद्या रूप रज दोनों ही हट जाते हैं ।
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*साधु तीरथ ज्ञान जल, बिरला पावे कोय ।*
*रज्जब यहु अठसठ अगम, प्राप्त भाग्य से होय ॥२॥*
संत रूप तीर्थ का ज्ञान जल किसी बिरले साधक को ही प्राप्त होता है, यह संततीर्थ ६८ तीर्थ करने वालों से तो अगम ही है अर्थात उन्हें प्राप्त होना कठिन है, यह तो बड़े भाग्य से ही मिलता है ।
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*महन्त मुखहि मंदाकिनी, वाणी वारि१ प्रवाह ।*
*गगन गंग निर्मल बहै, मन मज्जन२ कर न्हाह३ ॥३॥*
महान् संतों का मुख ही मंदाकिनी गंगा है, उनकी वाणी ही उसमें जल१ का प्रवाह है, यह निर्मल ज्ञान गंगा आकाश में ही बहती है अर्थात शब्द आकाश का गुण है, उसी में चलता है, इस ज्ञान गंगा में स्नान३ करके मन को उज्वल२ करो ।
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*चिदानन्द के चरण निज, साधू के उर माँहिं ।*
*पेखो पति के पगन को, ठाहर और सु नाँहिं ॥४॥*
चेतन-आनन्द स्वरुप परमात्मा के निजी अर्थात आत्मस्वरूप चरण संतों के हृदय में हैं, अपने स्वामी परमात्मा के पाद पद्मों को वहां ही देखो, एनी स्थान में उनका दर्शन नहीं हो सकेगा ।
(क्रमशः)

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