बुधवार, 7 अक्टूबर 2026

*४७. अध्यातम कौ अंग ११७/१२०*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४७. अध्यातम कौ अंग ११७/१२०*
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कहि जगजीवन रांमजी, उत्तम सबद अगाध ।
सतगुर दीजै दया करि, सकल२ बिचारै साध ॥११७॥
(२. सकल=समस्त)
संत जगजीवनदास जी महाराज कहते हैं रामजी का उत्तम शब्द बहुत गहरा और अगाध है । हे सतगुरु, दया करके यह मंत्र दीजिए, जिसे सभी साधु विचार कर अपनाते हैं ।
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त्रिय३ संगी त्रिय देवता, ब्रह्मा बिषनु महेस ।
कहि जगजीवन तहां बसि, निरखै रांम नरेश ॥११८॥
(३. त्रिय=तीन) 
तीन गुणों के साथ तीन देवता ब्रह्मा, विष्णु और महेश हैं । संत जगजीवन जी कहते हैं कि साधक वहीं बस कर, उनसे परे राम रूपी राजा के दर्शन करता है ।
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नख सिख हरि हरि बिदेही४, रांम नांम रस देह ।
कहि जगजीवन निहकाम अष्टांग, जोग धारनां एह ॥११९॥
(४. विदेही=ब्रह्म)
नख से शिखा तक हर अंग में हरि ही बसे हैं, विदेही ब्रह्म रूप हो गया है और देह राम नाम के रस से भरी है । संत जगजीवन जी कहते हैं कि यही निष्काम अष्टांग योग की सच्ची धारणा है ।
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न्यौली५ बांधी भुयंगड़६, कुम्भक पूरक सास ।
करम अष्टांग जोग७ धारनां, सु कहि जगजीवनदास ॥१२०॥
(५. न्यौली=नेती, धोती आदि योग के षट् कर्मों में से एक)
{६. भुयंगड=भुजंग (सर्प) (कुण्डली)}  (७. अष्टांग जोग=यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, ध्यान, धारणा, समाधि- ये योग के आठ साधन हैं)
नेती-धोती आदि षट्कर्म से शरीर शुद्ध करके, कुण्डलिनी रूपी सर्प को बांध कर, कुम्भक और पूरक प्राणायाम द्वारा श्वास को साध कर कर्म करना ही अष्टांग योग की धारणा है, ऐसा संत जगजीवन दास जी कहते हैं ।
इति अध्यातम कौ अंग संपूर्ण ॥४७॥
(क्रमशः)

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