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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४९. भ्रम विधवंस कौ अंग ५७/६०*
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*परमेसुर का देहुरा, परमेसुर का साध ।*
*कहि जगजीवन देव हरि, अबिगत रांम अगाध ॥५७॥*
संत जगजीवन दास जी कहते हैं कि यह मानव शरीर ही परमात्मा का सच्चा मंदिर है, और इस शरीर में रहने वाला साधक-हृदय ही परमात्मा का सच्चा सेवक है । हरि रूपी देवता कोई बाहर नहीं, वह अव्यक्त और अगाध राम ही सबके भीतर विराजमान है । इसलिए बाहर के मंदिर से बड़ा मंदिर तुम्हारा अपना शरीर है ।
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*जहँ पत्थर का देहुरा, पत्थर मांही देव ।*
*कहि जगजीवन बेद मत, पंच२ सुहाई सेव२ ॥५८॥*
(२-२. पंच सुहाई सेव=पंचों को अपनी सेवा की आवश्यकता थी, अतः उन ने वेदों का अर्थ अपने अनुकूल प्रचारित कर दिया)
जहाँ पत्थर का मंदिर बनाकर पत्थर की ही मूर्ति को देव मान लिया जाता है, वहाँ भक्ति केवल बाहरी रह जाती है । संत जगजीवन साहेब कहते हैं कि वेद का सच्चा मत यह है कि वह निर्गुण परमात्मा पाँचो तत्वों में, पाँचो प्रकार से सेवने योग्य है, केवल पत्थर में ही नहीं । अर्थात चेतन को जड़ में मत ढूंढो ।
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*मगहर क्षेत्र तीरथ गया, कासी किया निवास ।*
*जगन्नाथ डोरी खैंची, सु कहि जगजीवनदास ॥५९॥*
कोई मगहर जैसे अपवित्र माने जाने वाले क्षेत्र में जाकर, कोई गया जैसे तीर्थ में जाकर, कोई काशी में निवास करके, तो कोई जगन्नाथ पुरी में जाकर डोरी खींचकर समझता है कि उसे मोक्ष मिल जाएगा । संत जगजीवन दास जी कहते हैं कि तीर्थ-स्थान बदलने से मुक्ति नहीं मिलती, मुक्ति तो मन की निर्मलता से मिलती है । कबीर साहेब ने भी मगहर में ही देह त्याग कर यही बताया था ।
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*पांचौं इंद्री जीत मन, आदि बरै भरतार ।*
*ए सब त्यागै रांम रमि, अस्म३, पंक, जलधार३ ॥६०॥*
(३-३. अस्म मूर्तिपूजा, पंक=गंगा की मिट्टी का शिव लिंग बना कर पूजना, तथा जलधार=शिवलिंग पर चढ़ाना । इन तीनों ही कर्मो को त्याग कर रामभजन में मन लगाना चाहिये)
जो साधक पाँचो इंद्रियों को जीत लेता है और मन रूपी पति को आदि पुरुष, सच्चे भरतार परमात्मा में लगा देता है, वही सच्चा सुहागन है । संत जगजीवन साहेब कहते हैं कि जो राम में रम जाता है, वह इस अस्थिर संसार को, जो कीचड़ और पानी की धारा के समान क्षणभंगुर है, त्याग देता है ।
(क्रमशः)

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