बुधवार, 31 अगस्त 2016

=१६४=

卐 सत्यराम सा 卐 
भाई रे यूं विनशै संसारा, काम क्रोध अहंकारा ॥ टेक ॥
लोभ मोह मैं मेरा, मद मत्सर बहुतेरा ॥ १ ॥
आपा पर अभिमाना, केता गर्व गुमाना ॥ २ ॥
तीन तिमिर नहिं जाहीं, पंचों के गुण माहीं ॥ ३ ॥
आतमराम न जाना, दादू जगत दीवाना ॥ ४ ॥
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(((((((((( कुबेर का अहंकार ))))))))))
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कुबेर को अपनी संपत्ति और ऐश्वर्य पर अहंकार हो गया था. वह अक्सर इसका दिखावा करते रहते थे. देवों पर धौंस जमाते थे. मौके-बेमौके ऐश्वर्य की डींगे हांकते रहते थे.
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एक बार कुबेर कैलाश पर शिवजी के दर्शनों के लिए गए. मस्तमौला भोले शंकर के सामने कुबेर को सीधे-सीधे शेखी बघारने की हिम्मत नहीं हो रही थी.
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औघड़दानी महादेव कुबेर के धाम सोने की अलकापुरी तो जाने से रहे लेकिन बिना वहां ले गए कुबेर अपना ऐश्वर्य भगवान को दिखाएं कैसे ? 
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कुबेर ने शिवजी को अलकापुरी ले जाने की तरकीब निकाली. कुबेर ने कहा- महादेव आपके आशीर्वाद से मैं एक विशाल भोज का आयोजन कर रहा हूं. 
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इसमें सभी देव, यक्ष, नाग, किन्नर, गंधर्व आदि आमंत्रित हैं. लेकिन बिना आपके पधारे वह आयोजन अधूरा रह जाएगा.
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शिवजी तो अंतर्यामी ठहरे. उनसे कोई क्या छिपा सकता है. वह कुबेर के मन की बात समझ गए. उन्होंने सोचा कि इनका अभिमान चूर होना जरूरी है.
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महादेव ने कहा- मैं तो कैलाश के अलावा कहीं जाता नहीं. इस तरह के आयोजनों से तो मुझे दूर रखो. अगर आप गणेशजी को बुला सकें तो अच्छा होगा.
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कुबेर बात का मर्म नहीं समझे, छूटते ही बोले- अवश्य प्रभु. गणों के साथ गणेश जी भी आएंगे. मैं उनसे विनती करूंगा.
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महादेव ने कहा- कुबेर सोच-विचार कर निर्णय करिएगा. हमारे लंबोदर की खुराक कुछ ज्यादा है. कई बार वह भोजन करना आरंभ करते हैं तो कई दिनों तक रूकते नहीं.
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कुबेर का अभिमान जागा- प्रभु मैंने जितना बड़ा आयोजन रखा है उतना बड़ा आयोजन आज तक किसी ने न तो किया है और न ही कर सकेगा.
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कुबेर गणेशजी को निमंत्रण देने गए. गणेश जी भी दिव्यदृष्टि से सारी बातें जान गए. उन्होंने निमंत्रण स्वीकार तो लिया लेकिन कुबेर को सावधान किया कि भोजन की कमी न होने पाए.
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कुबेर तिलमिला गए. उनका अभिमान सर चढ़कर बोला- गणेश जी अभी तो आप बालक हैं. मैं अलकापुरी में ऐसा प्रबंध करुंगा कि स्वयं प्रजापति भी अचंभित रह जाएंगे.
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भोज में गणेश जी तब पहुंचे जब सारे देवता भोजन कर चुके थे. कुबेर ने गणेश जी को चिढ़ा दिया- गणेशजी मुझे तो लगता था कि आप आएंगे नहीं और मेरा भोजन बर्बाद हो जाएगा. आपके लिए तो अलग से प्रबंध करना पड़ता है.
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गणेश जी ने आसन लगाया और बोले- भोजन लाओ. आज मैं भरपेट भोजन करुंगा. गणेश जी ने खाना शुरू किया और थोड़ी देर में कुबेर की रसोई खाली हो गई. 
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नौकरों ने झटपट और भोजन पकाया. लंबोदर के सामने कुबेर के नौकर भोजन से भरी थाली रखकर खड़े भी नहीं हो पाते और गणेश जी आंख मूंदकर गटक जाते और नई फरमाइश कर देते.
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उनकी थाली खाली होने लगी. गणेश जी ने कहा- कुबेर आपके स्वादिष्ट पकवानों ने मेरी भूख जगा दी. मैं ठहर नहीं सकता. अगर भोजन नहीं मिला तो मैं आपको ही खा जाउंगा.
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कुबेर के पसीने छूट गए, प्राण खतरे में नजर आने लगे. मृत्यु को सामने देख वह ब्रह्माजी के शरण में भागे.
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ब्रह्माजी ने कहा- कुबेर आपके अभिमान से यह सब हुआ है. अब शिवजी के अलावा कोई दूसरा नहीं बचा सकता आपको.
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कुबेर कैलाश भागे और शिवजी के चरणों में लोट गए. अपने अपराध के लिए क्षमा मांगी और काल रूपी गणेश जी से रक्षा की प्रार्थना की. महादेव ने कहा- गणेशजी को पान से भरी थाली परोस दो.
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कुबेर ने अपने हाथों से पानों का बीड़ा सजाकर पूरी थाली गणेश जी के सामने रख दी. क्रोध में गणेश जी उसे गटक गए और भोजन की मांग करने लगे.
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बजाय और भोजन का प्रबंध करने के कुबेर चुपचाप हाथ जोड़ खड़े हो गए. गणेश जी कुबेर को दबोचने के लिए बढ़े तो ब्रह्माजी ने टोका.
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ब्रह्माजी ने कहा- गजानन शास्त्रों के अनुसार अब आपका भोजन पूर्ण हो चुका. पान तो मुखशुद्धि है जो भोजने के बाद ग्रहण किया जाता है. आपने तो पान भी खा लिया. कुबेर को आप क्षमा कर अभयदान दें.
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कुबेर ब्रह्माजी का संकेत मिलते ही गणेश जी के पांव में लोट गए. ब्रह्मा के वचनों से गजानन का क्रोध शांत हो गया था. उन्होंने कुबेर को क्षमा कर दिया.
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गजानन ने कुबेर को आशीर्वाद दिया कि मेरे आशीर्वाद से कभी तुम्हारा कोष खाली नहीं होगा. जिस प्रयोजन में तुम्हारा आह्वान किया जाएगा वह मेरे आशीर्वाद से निर्विघ्न रहेगा.
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(((((((((( जय जय श्री राधे ))))))))))
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=१६३=

卐 सत्यराम सा 卐 
ना हम छाड़ैं ना गहैं, ऐसा ज्ञान विचार ।
मध्य भाव सेवैं सदा, दादू मुक्ति द्वार ॥ 
सहज शून्य मन राखिये, इन दोन्यों के मांहि ।
लै समाधि रस पीजिये, तहाँ काल भय नांहि ॥ 
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साभार ~ Anand Nareliya
एक आदमी आया बुद्ध के पास, भर दुपहरी थी, और उसने आकर बुद्ध को कहा कि मेरे कुछ प्रश्न हैं और मैं पूछना चाहता हूं;मैं ज्यादा देर ठहर भी नहीं सकता, मैं जल्दी में हूं —और जल्दी में तो सभी हैं, समय भागा जा रहा है, कल का भरोसा नहीं है। इसलिए आप टालना मत, मुझे उत्तर अभी चाहिए। और यह भी आप से निवेदन कर दूं कि मुझे शब्दों में उत्तर नहीं चाहिए, मुझे तो आप असली चीज कह दें, असली चीज दिखा दें, एक झरोखा खोल दें; एक झलक हो जाए, दरस—परस करवा दें। और उसकी आंखों से आंसू बहने लगे।

बुद्ध ने आखें बंद कर लीं। आनंद जो उनके पास बैठा था बड़ा हैरान हुआ कि अब यह मामला कैसे हल होगा? यह आदमी कहता है —शब्द में कहें मत, दरस—परस करवा दें! हमें सुनते—सुनते वर्षो हो गये तब दरस—परस नहीं हुआ और यह इतनी जल्दी मे है! अधैर्य की भी एक सीमा होती है! और बुद्ध कुछ क्षण चुप रहे, फिर उन्होंने आंख खोली, उस आदमी ने झुककर चरण छुए और कहा—आप की बड़ी अनुकंपा है। मैं धन्यभाग! आप ने बड़ी कृपा की मैं किन शब्दों मे धन्यवाद करूं? याद रखूंगा यह क्षण। यह भूले न भूलेगा। यह मेरे जीवन की सबसे बड़ी संपदा है। यह मेरे भीतर दीये की तरह जलेगा। मौत के क्षण में भी यह मेरे साथ होगा। मैं अनुगृहीत हूं। और वह आदमी झुकता है और झुकता है और झुकता है।

आनंद और चकित होता है।

उसके जाते ही वह बुद्ध से पूछता है—यह मामला क्या है? हुआ क्या? मैं भी बैठा था, मुझे तो कोई दरस—परस नहीं हुआ। कुछ दिखायी भी नहीं पड़ा, कुछ… और आप ने कुछ कहा भी नहीं, आप आंख बंद करके बैठ गये, वह आदमी बैठा रोता रहा, और इतनी जल्दबाजी में लेन—देन हो गया! न इस हाथ से उस हाथ में कुछ चीज गयी, न कुछ मुझे दिखायी पड़ा, और मैं भर अकेला यहां था जो ठीक—ठीक आंख खोले बैठा था—आप भी आंख बंद किये थे, उस आदमी की आखें भी आधी बंद थीं। बुद्ध ने कहा—आनंद, मुझे याद है भलीभांति… आनंद बुद्ध का चचेरा भाई था, दोनों साथ—साथ बड़े हुए थे—आनंद बड़ा भाई था—साथ—साथ खेले थे, साथ—साथ घुड़सवारी की थी, शिकार किये थे, साथ—साथ गुरुकुल में रहे थे… बुद्ध ने कहा मुझे भलीभांति पता है आनंद, बचपन में तुझे घोड़ों का बड़ा शौक था, इसलिए तुझे उसी प्रतीक मे कहता हूं—

ऐसे घोड़े होते हैं कि मारो और मारो तो भी चलते नहीं। आनंद ने कहा—यह बात सच है। ऐसे घोड़े मैं जानता हूं। और ऐसे भी घोड़े होते हैं आनंद, कि मारो तो चलते हैं, न मारो तो नहीं चलते। और ऐसे भी घोड़े होते हैं आनंद, कि मारने की जरूरत नहीं होती, सिर्फ कोड़ा फटकारना पड़ता है। और ऐसे भी घोड़े होते हैं आनंद कि कोड़ा फटकारना भी नहीं पड़ता, कोड़े की मौजूदगी काफी है। और तूने ऐसे भी घोड़े शायद देखे होंगे कि कोड़े की मौजूदगी की भी जरूरत नहीं, कोड़े की छाया काफी है। ऐसे कुलीन घोड़े भी होते हैं कि कोड़े की छाया काफी है। आनंद ने कहा—यह बात मेरी समझ में आती है। वह तो भूल ही गया इस आदमी को, वह तो घोड़ों की बात उसकी समझ मे आयी—घोड़ों का प्रेमी था। बुद्ध ने कहा—यह ऐसा ही घोड़ा था, इसको सिर्फ छाया काफी है;फटकारना भी नहीं पड़ा, कोड़ा दिखाना भी नहीं पड़ा, सिर्फ छाया। इधर मैंने आंख क्या बंद कीं कि उधर उसने आखें खोल लीं। लेन—देन हो गया है। मौन ही मौन में हो गया है। यह संतरण मौन है।

तो ऐसे लोग हैं जो मौन मे समझ लेंगे। मगर बहुत विरले हैं ऐसे लोग। फिर जो लोग मौन में समझ लेंगे, उनके लिए किसी के द्वारा बताया जाना आवश्यक नहीं है। अगर यह आदमी बुद्ध के पास न आता, तो भी समझकर ही मरता। यह आदमी बिना समझे नहीं मर सकता था। हो सकता था किसी वृक्ष के पास बैठकर समझ जाता—क्योंकि वृक्ष भी मौन हैं। और हो सकता था किसी पहाड़ की कंदरा में बैठकर समझ जाता—क्योंकि पहाड़ भी मौन हैं। और हो सकता था चांद को देखकर समझ जाता—क्योंकि चांद भी मौन है। यह आदमी देर—अबेर समझ ही जाता। बुद्ध के पास आने से चलो घटना जल्दी घट गयी। मगर यह आदमी समझता तो जरूर। जो इतने जल्दी समझ गया, जो इतनी त्वरा से समझा, इतनी तीव्रता से समझा, इसके भीतर गहन प्यास थी। यह आदमी निन्यानबे डिग्री पर उबलता हुआ पानी था। जरा सा धक्का कि सौ डिग्री हो गया और उड़ गया। शायद बुद्ध के पास न आता तो दो—चार साल लग जाते—या दो—चार जन्म—लेकिन क्या मूल्य है दो—चार जन्मों का भी इस लंबे विस्तार में? दो पल से ज्यादा मूल्य नहीं। मगर यह पहुंच तो जाता।

शांडिल्य कहते है—ऐसे लोग हैं जो मौन से समझ लेंगे। मगर वे तो विरले है। जो कोड़े की छाया से चलेंगे ऐसे घोड़े तो विरले है। अधिक तो ऐसे हैं जिन्हें शब्दों की जरूरत होगी। फिर शब्दों के मारे—मारे भी कहां चलते है? उनके लिए कहना होगा, उनके लिए बोलना होगा। और वे ही बहुमत में हैं, जो शब्दों से भी कहने पर नहीं समझ पाएंगे। जो शब्दों से कहने पर नहीं समझ पाते, वे मौन को तो कैसे समझेगे? इसलिए बुद्धियां अलग—अलग प्रकार की हैं।

ओशो

= सर्वंगयोगप्रदीपिका (तृ.उ. २/३) =

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🙏 *श्री दादूदयालवे नमः ॥* 🙏
🌷 *#श्रीसुन्दर०ग्रंथावली* 🌷
रचियता ~ *स्वामी सुन्दरदासजी महाराज*
संपादक, संशोधक तथा अनुवादक ~ स्वामी द्वारिकादासशास्त्री
साभार ~ श्री दादूदयालु शोध संस्थान
अध्यक्ष ~ गुरुवर्य महमंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमारामजी महाराज
https://www.facebook.com/DADUVANI
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*सर्वांगयोगप्रदीपिका (ग्रंथ२)*
**अथ हठयोग नामक - तृतीय उपदेश**
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*= योगसाधना के लिये उचित स्थान =*
*प्रथम सु धर्म देश कहुं ताकै ।*
*भलौ राज्य कछु दखल न जाकै ।* 
*तहां जाइ कै मठिका करई ।*
*अल्प द्वार अरु छिद्रसु भरई ॥२॥*
(अब गुरुदेव योगसाधना के लिये उपयुक्त स्थान का वर्णन करते हैं -) साधक को योगक्रिया के लिये ऐसा देश चुनना चाहिये जहाँ धार्मकि समाज का बहुमत हो, उस देश का राजा ऐसा हो जो प्रजा की सामाजिक, धार्मिक क्रियाओं में हस्तक्षेप न करता हो, जिसका राज्य शान्त तथा शत्रुपक्ष से निष्कण्टक हो । ऐसे देश में जाकर योगी को एकान्त स्थान में मठ(रहने का स्थान) बनाना चाहिये, जो बहुत अधिक खिड़की व दरवाजेवाला न हो ॥२॥
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*लिप्त करै चाहुं ओर सुगंधा ।*
*कूप सहित मठ इहिं बिधि बंधा ।* 
*तामहिं पैठि करै अभ्यासा ।*
*गुरु गमि हठ करि जीतै स्वासा ॥३॥* 
उसकी दीवारों पर चारों ओर सुगन्धित लेप कर देना चाहिये, ताकि प्राणायाम की क्रियाओं के समय दुर्गन्ध वायु न फैले । मठ के एक किनारे पर जल इत्यादि की सुविधा के लिये एक कूआ भी बनाना चाहिये, ताकि यथासमय स्नान, शुद्धि आदि में कोई बाधा न पड़े । ऐसे मठ में बैठ कर गुरु के दिये हुये उपदेश और ज्ञान के अनुसार ही योगक्रिया(प्राणायाम) का अभ्यास करना चाहिये ।(क्योंकि यह योगक्रिया एकान्ततः गुरुपदेश के बिना अतीव कष्ट-साध्य है ।) ॥३॥ 
(क्रमशः)

= विन्दु (२)८४ =

#‎daduji 
॥ दादूराम सत्यराम ॥
**श्री दादू चरितामृत(भाग-२)** लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥

**= विन्दु ८४ =** 

**= भ्रम नाशक उपदेश =** 
राजा रायसिंह को उक्त प्रश्न किस देव की पूजा करते हो का उत्तर देते हुये उसका भ्रम दूर करने का परमशांत परमदयालु संत प्रवर दादूजी ने यह पद बोला - 
"जग अंधा नैन न सूझे, 
जिनके सिरजे ताहि न बूझे ॥ टेक ॥ 
पाहण की पूजा करै, कर आतम घाता । 
निर्मल नैन न आव ही, दोखज दिशि जाता ॥ १ ॥ 
पूजैं देव दिहाड़िया, माहामाई मानैं । 
परकट देव निरंजना, ताकी सेव न जानैं ॥ २ ॥
भैरूं भूत सब भरम के, पशु प्राणी ध्यावैं । 
सिरजनहारा सबनका, ताको नहिं पावैं ॥ ३ ॥ 
आप स्वारथ मेदनी, का का नहिं करहीं । 
दादू सांचे राम बिन, मर मर दुख भरहीं ॥ ४ ॥"
उपास्य संबंधी भ्रम दूर कर रहे हैं - जगत् के प्राणी अज्ञान से अन्धे हो रहे हैं, उनके नेत्रों से उनका हित अनहित भी नहीं दीखता और जिस प्रभु ने उन्हें उत्पन्न किया है, उसको भी वे नहीं समझ पाते हैं । इसलिए पत्थर की पूजा करते हैं और बलि देने के निमित्त बकरे आदि का घात करते हैं । निर्मल साधन इनकी दृष्टि में नहीं आता है अर्थात् नहीं करते हैं । इसी कारण नरक की ओर जाते दिखाई दे रहे हैं । भैरूं आदि देवताओं को पूजते हैं । महामाई को मानते हैं और बुरी दशा को प्राप्त होते हैं किन्तु जो सब विश्व में प्रकट निरंजन देव हैं, उनकी भक्ति करना नहीं जानते हैं । भैरूं भूतादि सब भ्रम मय हैं । पशुवों के समान प्राणी ही उनकी उपासना करते हैं । इसीलिए सर्व विश्व के रचियता जो प्रभु हैं, उन्को न प्राप्त होकर जन्मादि प्रवाह में ही बहते हैं । अपने स्वार्थ सिद्धि के लिये पृथ्वी के प्राणी क्या - क्या नहीं करते है ? सभी कुछ कर डालते हैं किन्तु सत्य स्वरूप राम की उपासना बिना बारंबार मर - मर के जन्मते हैं और नाना क्लेश भोगते हैं । 
(क्रमशः)

मंगलवार, 30 अगस्त 2016

=१६२=

卐 सत्यराम सा 卐 
निराधार घर कीजिये, जहँ नांहि धरणि आकास । 
दादू निश्चल मन रहै, निर्गुण के विश्वास ॥ 
मन चित मनसा आत्मा, सहज सुरति ता मांहि । 
दादू पंचों पूरि ले, जहँ धरती अंबर नांहि ॥ 
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साभार ~ Gems of Osho 
भगवान, क्या परमात्मा का अस्तित्व सिद्ध किया जा सकता है? 

मुल्ला नसरुद्दीन नदी के किनारे गया था तैरना सीखने। जो उस्ताद उसे तैरना सिखाने को थे, वह तो एकदम चौंके, क्योंकि मुल्ला जैसे ही तट पर गया नदी के, पत्थर पर पैर फिसल गया काई जमी होगी भड़ाम से गिरा, एक पैर तो पानी में भी पड़ गया, कपड़े भी भींग गए, एकदम उठा और घर की तरफ भागा। उस्ताद ने कहा कि बड़े मियां, कहां जाते हो? 
मुल्ला ने कहा कि अब जब तक तैरना न सीख लूं, नदी के पास पैर न रखूंगा। यह तो खतरनाक धंधा है! यह तो उसकी दुआ कहो, यह तो उसकी कृपा कहो। अगर जरा और फिसलकर अंदर चला गया होता, तो उस्ताद, तुम तो खड़े थे बाहर, तुम तो देखते ही रहे, हम काम से गए थे! अब तो तैरना सीख लूंगा, तभी पानी के पास फटकूंगा। 
अगर अब तैरना कहां सीखोगे? कोई गद्दे किए बिछा कर तैरना सीखा जाता है। और गद्दे तकिए बिछाकर तुम कितना ही तैरने का अभ्यास कर लो, पानी में काम न आएगा, खयाल रखना। हाथ पैर पटकना सीख लोगे गद्दे तकिए पर, लेकिन पानी में सब बेकाम हो जाएगा। नहीं, तैरना सीखने के लिए भी पानी के पास जाना ही पड़ता है। 
परमात्मा का अस्तित्व कैसे सिद्ध करोगे? तर्क से? विचार से? 
तो तो तुम उल्टे काम में लग गए। परमात्मा को जाना है लोगों ने निर्विचार से। परमात्मा को जाना है लोगों ने हृदय से। और तुम सिद्ध करने लगे बुद्धि से। नहीं सिद्ध होगा, तो आज नहीं कल तुम कहोगे: है ही नहीं। और एक बार तुम्हारे मन में यह बात गहरी बैठ गई कि है ही नहीं, तो बस अटक गए। तो तुम्हारा विकास अवरुद्ध हुआ। गलत प्रश्न न पूछो! 
पूछो कि क्या मैं हूं? पूछो कि कैसे मैं जानूं कि मैं कौन हूं? 
परमात्मा को छोड़ो! परमात्मा से लेना देना क्या है? पहले पानी की बूंद तो पहचान लो, फिर सागर को पहचान लेना। अभी बूंद से भी पहचान नहीं और सागर के संबंध में प्रश्न उठाए। वे प्रश्न व्यर्थ हैं। उनके उत्तर सिर्फ नासमझ देने वाले मिलेंगे। हां, किताबों में इस तरह के प्रमाण दिए हुए हैं, बड़े बड़े प्रमाण दिए हुए हैं, बड़े पंडित, शास्त्री प्रमाण देते हैं ईश्वर के होने का। और उनके प्रमाण सब बचकाने, दो कौड़ी के! क्योंकि प्रमाण कोई दिया ही नहीं जा सकता। क्या प्रमाण हैं उनके? इस तरह के प्रमाण कि जैसे कुम्हार घड़ा बनाता है। बिना कुम्हार के घड़ा कैसे बनेगा? इसी तरह परमात्मा ने जगत को बनाया, वह कुम्भकार है कुम्हार है।…
कर दिया शूद्र उसको भी!…
अब जरा कोई इन बुद्धिमानों से पूछे कि अगर घड़े को बनाने के लिए कुम्हार की जरूरत है, तो कुम्हार को बनाने के लिए भी तो किसी की जरूरत है! वह कहते हैं, हां, परमात्मा ने कुम्हार को बनाया। फिर तुम्हारी दलील का क्या होगा? परमात्मा ने संसार बनाया, फिर परमात्मा को किसने बनाया? 
यही तो बुद्ध ने पूछा, महावीर ने पूछा और पंडितों की बोलती बंद हो गई। पंडित तो नाराज हो गए। इसको वह अतिप्रश्न कहते हैं। तुम पूछे कि संसार किसने बनाया, तो सम्यक प्रश्न। और कोई पूछे कि भई, जब बिना बनाए कोई चीज बनती ही नहीं, तो परमात्मा को किसने बनाया? तो अतिप्रश्न। तो जबान काट ली जाएगी। यह न्याय हुआ? तुम्हारा ही तर्क जरा आगे खींचा गया। और फिर इसका अंत कहां होगा? अगर तुम कहो कि हां, परमात्मा को फिर और किसी बड़े परमात्मा ने बनाया, और उसको फिर किसी और बड़े परमात्मा ने बनाया, तो इसका अंत कहां होगा? यह तो अंतहीन शृंखला हो जाएगी, व्यर्थ शृंखला हो जाएगी। नहीं, ऐसे प्रमाणों से कुछ सिद्ध नहीं होता। ऐसे प्रमाणों से सिर्फ प्रमाण देने वालों की नासमझी, बुद्धिहीनता, असंवेदनशीलता सिद्ध होती है और कुछ भी सिद्ध नहीं होता। परमात्मा सिद्ध नहीं होता, सिर्फ प्रमाण देने वालों का बुद्धूपन सिद्ध होता है। बुद्ध परमात्मा का प्रमाण नहीं देते। 
बुद्ध परमात्मा का प्रमाण बनते हैं। भेद को समझ लेना। बुद्ध प्रमाण बनते हैं परमात्मा का, बुद्ध प्रमाण होते हैं परमात्मा का। मैं तुमसे कहूंगा, तुम भी प्रमाण बनो। तुम भी प्रमाण बन सकते हो, क्योंकि तुम्हारे भीतर भी बुद्धत्व छिपा पड़ा है। झरने को तोड़ने की जरूरत है। जरा चट्टान हटाओ विचारों की और फूटने दो भाव का झरना! नाचो, गाओ जीवन के उत्सव को अनुभव करो! और तुम्हें पता चल जाएगा कि परमात्मा है। जिस दिन तुम जानोगे कि जीवन एक रास है; एक महोत्सव है, राग से, रंग से भरा; एक इंद्रधनुष है, सतरंगा; एक संगीत है, अदभुत स्वरों से पूर्ण, उस दिन परमात्मा का प्रमाण मिल गया। 
हालांकि तुम वह प्रमाण किसी और को भी न दे सकोगे। गूंगे का गुड़ हो जाता है वह अनुभव। मगर धन्य हैं वे, जिन्हें कुछ ऐसा अनुभव मिल जाता है जिसे वह कह नहीं पाते। इस जगत में सर्वाधिक धन्य वे ही हैं, जिन्हें गूंगे का गुड़ मिल जाता है। 
सपना यह संसार ~ ओशो

=१६१=

卐 सत्यराम सा 卐 
शब्द सरोवर सुभर भर्या, हरि जल निर्मल नीर । 
दादू पीवै प्रीति सौं, तिन के अखिल शरीर ॥ 
शब्दों मांहिं राम-रस, साधों भर दीया । 
आदि अंत सब संत मिलि, यों दादू पीया ॥
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साभार ~ Ravi Sharma 
एक संत थे। वे एक जाट के घर गए। जाट ने उनकी बड़ी सेवा की। सन्त ने उसे कहा कि रोजाना नाम - जप करने का कुछ नियम ले लो। 
## जाट ने कहा बाबा, हमारे को वक्त नहीं मिलता। सन्त ने कहा कि अच्छा, रोजाना ठाकुर जी की मूर्ति के दर्शन कर आया करो। 
## जाट ने कहा मैं तो खेत में रहता हूं और ठाकुर जी की मूर्ति गांव के मंदिर में है,कैसे करूँ?संत ने उसे कई साधन बताये, कि वह कुछ -न-कुछ नियम ले लें। पर वह यही कहता रहा कि मेरे से यह बनेगा नहीं, मैं खेत में काम करू या माला लेकर जप करूँ। इतना समय मेरे पास कहाँ है? बाल -बच्चों का पालन पोषण करना है। आपके जैसे बाबा जी थोडे ही हूँ। कि बैठकर भजन करूँ। 
संत ने कहा कि अच्छा तू क्या कर सकता है? जाट बोला कि पडोस में एक कुम्हार रहता है। उसके साथ मेरी मित्रता है। उसके और मेरे खेत भी पास -पास है। और घर भी पास -पास है। रोजाना एक बार उसको देख लिया करूगाँ। सन्त ने कहा कि ठीक है। उसको देखे बिना भोजन मत करना। जाट ने स्वीकार कर लिया। जब उसकी पत्नी कहती कि भोजन कर लो। तो वह चट बाड पर चढ़कर कुम्हार को देख लेता। और भोजन कर लेता। इस नियम में वह पक्का रहा। 
एक दिन जाट को खेत में जल्दी जाना था। इसलिए भोजन जल्दी तैयार कर लिया। उसने बाड पर चढ़कर देखा तो कुम्हार दिखा नहीं। पूछने पर पता लगा कि वह तो मिट्टी खोदने बाहर गया है। जाट बोला कि कहां मर गया, कम से कम देख तो लेता। 
अब जाट उसको देखने के लिए तेजी से भागा। उधर कुम्हार को मिट्टी खोदते -खोदते एक हाँडी मिल गई। जिसमें तरह -तरह के रत्न, अशर्फियाँ भरी हुई थी। उसके मन में आया कि कोई देख लेगा तो मुश्किल हो जायेगी। अतः वह देखने के लिए ऊपर चढा तो सामने वह जाट आ गया। कुम्हार को देखते ही जाट वापस भागा। तो कुम्हार ने समझा कि उसने वह हाँडी देख ली। और अब वह आफत पैदा करेगा। कुम्हार ने उसे रूकने के लिए आवाज लगाई। जाट बोला कि बस देख लिया, देख लिया। कुम्हार बोला कि अच्छा, देख लिया तो आधा तेरा आधा मेरा, पर किसी से कहना मत। 
जाट वापस आया तो उसको धन मिल गया। उसके मन में विचार आया कि संत से अपना मनचाहा नियम लेने में इतनी बात है। अगर सदा उनकी आज्ञा का पालन करू तो कितना लाभ है। ऐसा विचार करके वह जाट और उसका मित्र कुम्हार दोनों ही भगवान् के भक्त बन गए। तात्पर्य यह है कि हम दृढता से अपना एक उद्देश्य बना लें, नियम ले लें  
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= सर्वंगयोगप्रदीपिका (तृ.उ. १) =

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🙏 *श्री दादूदयालवे नमः ॥* 🙏
🌷 *#श्रीसुन्दर०ग्रंथावली* 🌷
रचियता ~ *स्वामी सुन्दरदासजी महाराज*
संपादक, संशोधक तथा अनुवादक ~ स्वामी द्वारिकादासशास्त्री
साभार ~ श्री दादूदयालु शोध संस्थान
अध्यक्ष ~ गुरुवर्य महमंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमारामजी महाराज
https://www.facebook.com/DADUVANI
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*सर्वांगयोगप्रदीपिका (ग्रंथ२)*
**अथ हठयोग नामक - तृतीय उपदेश** 
{सांगोपांग भक्तियोग का वर्णन कर अब योग की चर्चा प्रारम्भ करते हैं । ग्रन्थ-कर्ता ने इस प्रकरण में योग के चार विभाग इस तरह किये हैं - हठयोग, राजयोग, लक्ष्ययोग और अष्टांगयोग । इनमें पहले हठयोग को कहते हैं । पिछले ‘ज्ञानसमुद्र’ ग्रन्थ में ‘हठयोगप्रदीपिका’ और गोरखपद्धति’ के अनुसार विस्तार से हठयोग का वर्णन हो चुका है, यहाँ केवल उसका दिग्दर्शन मात्र है । या जो वहाँ बातें छूट गयी हैं(जैसे योग के लिये उचित स्थान, कर्तव्याकर्तव्य तथा पथ्यापथ्य) उनका विशेष वर्णन है ।}
.
*= हठयोग निरुक्ति =* 
*= चौपई =* 
*अबहि कहूँ हठयोग सुनाई ।*
*आदिनाथ के बन्दौं पाई ।* 
*रवि शशि दोऊ एक मिलावै ।*
*याही तें हठयोग कहावै ॥१॥* 
हे शिष्य ! अब मैं तुम्हें हठयोग का भलीभाँति व्याख्यान कर सुनाता हूँ । परन्तु उससे पूर्व सब योगविद्याओं के आचार्यों के आदिगुरु भगवान् शिव तथा प्रथम आचार्य परमसिद्ध महात्मा आदिनाथ के चरणकमलों की वन्दना करना अपना कर्तव्य समझाता हूं । 
इसके बाद सर्वप्रथम ‘हठयोग’ शब्द का अर्थ तुम्हें बतला दूँ - योगी द्वारा शरीर में सूर्यनाड़ी(इड़ा) तथा चन्द्रनाड़ी(पिंगला) को सुषुम्णा के साथ मिला देना ही हठयोग है । (इन दोनों नाड़ियों के मिलाने की विधि पीछे ज्ञानसमुद्र में प्राणायाम विधि में विस्तार से बता चुके हैं ।) ॥१॥
(क्रमशः)

= विन्दु (२)८४ =

#‎daduji 
॥ दादूराम सत्यराम ॥
**श्री दादू चरितामृत(भाग-२)** लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥

**= अथ विन्दु ८४ =** 

दादूजी ने राजा रायसिंह को यह पद बोला - 
**= निज पंथ का स्वरूप =**
"भाई रे ऐसा पंथ हमारा, 
द्वै पख रहित पंथ गह पूरा, अवरण एक आधारा ॥ टेक ॥ 
वाद विवाद काहू से नांहीं, मांहिं जगत तैं न्यारा । 
सम दृष्टि स्वभाव सहज में, आपहि आप विचारा ॥ १ ॥ 
मैं तैं मेरी यहु मति नांहीं, निर्वेरी निरकारा । 
पूरण सबहि देख आपा पर, निरालम्ब निरधारा ॥ २ ॥
काहू के सँग मोह न ममता, संगी सिरजनहारा । 
मन ही मन से समझ सयाना, आनन्द एक अपारा ॥ ३ ॥ 
काम कल्पना कदे न कीजे, पूरण ब्रह्म पियारा । 
इहिं पंथ पहुँच पार गह दादू, सो तत सहज संभारा ॥ ४ ॥" 
हे भाई ! हमारा पंथ तो ऐसा है - उसमें एक ही ब्रह्म का ही आधार रहता है, किन्तु हिन्द्दु, मुसलमान पना आदि द्वैत पक्ष नहीं होता है । न वर्ण विभाग ही है । उसको जो ग्रहण करता है, वह पूर्णब्रह्म को प्राप्त होकर, स्वयं भी पूर्ण ही हो जाता है । उसमें किसी के वाद विवाद करने की आवश्यकता नहीं रहती है । उसका पथिक जगत् में रहकर भी जगत् से अलग ही रहता है । सहज स्वभाव ही उसमें समदृष्टि रहती है तथा अपने आप ही आत्म स्वरूप का विचार करता है । "मैं, तू, मेरी, तेरी ।" यह भेद बुद्धि उसमें नहीं रहती है । वह सबसे निर्वेर होकर, अपने पराये सब में निराकार, निरालम्ब, पूर्णब्रह्म को निश्चय पूर्वक देखकर सम हो जाता है । किसी के साथ मोह, ममता नहीं करता है । परमात्मा को ही अपना साथी समझता है तथा वह बुद्धिमान् विचार द्वारा अपने मन ही मन में समझकर अपार अद्वैतानन्द को प्राप्त होता है । अतः सांसारिक कामना युक्त कल्पना कभी भी मत कर और इस उक्त मार्ग के द्वारा संसार के पार पहुँचकर परम प्रिय पूर्णब्रह्म को अद्वैतात्म रूप से ग्रहण कर । वही परब्रह्म तत्त्व हमने सहज समाधि में देखा है । 
(क्रमशः)

= परिचय का अंग =(३४/६)

॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥
श्री दादू अनुभव वाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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**= परिचय का अँग ४ =**
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साधू जन क्रीड़ा करैं, सदा सुखी तिहिं गाँव ।
चलु दादू उस ठौर की, मैं बलिहारी जाँव ॥३४॥
जिसमें देव, दानव, नाग, नर आदि सँपूर्ण सँसार के प्राणी बसते हैं, उस ईश्वर रूप ग्राम के शुद्ध ब्रह्म रूप स्थान में सँतजन अभेद चिन्तन रूप क्रीड़ा करते हुये निरँतर ब्रह्मानन्द में निमग्न रहते हैं । मैं उस शुद्ध ब्रह्म रूप स्थान की बलिहारी जाता हूं । हे जिज्ञासु ! तू भी निदिध्यासन द्वारा उसी में चल । वही नित्यानन्द स्वरूप है । जगत दु:खमय है ।
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दादू पसु१ पिरँनि२ के, पेही३ मँझि कलूब४ ।
बैठौ आहे बीच में, पाण५ जो महबूब६ ॥३५॥
जो सँसार बन्धन से मुक्त करने वाले, अपने५ आत्म स्वरूप प्रेम - पात्र६ स्वामी३ हैं, वे तेरे शरीर के मध्य हृदय४ में ही स्थित हैं, उन परम - प्रिय२ परमेश्वर के वास्तव स्वरूप को देख१ ।
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नैनहुं वाला निरख कर, दादू घालै हाथ ।
तब ही पावे राम - धन, निकट निरंजन नाथ ॥३६॥
आत्मानात्म विवेक - नेत्र वाला जिज्ञासु अनात्म रूप सँसार को मिथ्या देखकर, सत्य - स्वरूप आत्मा की ओर अन्त:करण - वृत्ति रूप हाथ डालता है अर्थात् आत्मा में वृत्ति स्थिर करता है, तब ही निदिध्यासन द्वारा ज्ञान - नेत्र की ज्योति बढ़ाकर विश्व के स्वामी माया रहित राम रूप धन को अत्यन्त समीप, आत्म स्वरूप से प्राप्त करता है ।
(क्रमशः)

सोमवार, 29 अगस्त 2016

=१६०=

卐 सत्यराम सा 卐
दादू माया सौं मन रत भया, विषय रस माता ।
दादू साचा छाड़ कर, झूठे रंग राता ॥ 
माया देखे मन खुशी, हिरदै होइ विकास ।
दादू यहु गति जीव की, अंत न पूगै आस ॥ 
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साभार ~ Gems of Osho
कल रात मैं एक कहानी पढ़ रहा था....

ईश्वर ने दुनिया बनाई। अलग अलग जातियां बनाईं। हिंदुओं से पूछा: तुम क्या चाहते हो? उन्होंने कहा: गायत्री मंत्र। जैनों से पूछा: तुम क्या चाहते हो? उन्होंने कहा: नमोकार मंत्र। मुसलमानों से पूछा: तुम क्या चाहते हो? उन्होंने कहा: कुरान। ईसाइयों से पूछा: तुम क्या चाहते हो? ऐसे वह पूछता गया अलग अलग लोगों से, अलग अलग देशों से, अलग अलग जातियों से। और सबसे आखिरी में बनाया उसने अमरीकन। पूछा: तुम क्या चाहते हो। उसने कहा: डालर! ईश्वर थोड़ा हैरान हुआ। उसने कहा: देखो, तुम्हारे सामने ही किसी ने गायत्री, किसी नि ने गीता, किसी ने कुरान, किसी ने बाइबिल, किसी ने तालमुद, किसी ने नमोकार, मंत्र, तंत्र, यंत्र, ध्यान, प्रार्थना, पूजा, ये सब चीजें मांगी और तू मांगता है डालर! अमरीकन ने कहा: फिक्र छोड़ो, सिर्फ डालर मुझे चाहिए और सब मंत्रतंत्र जानने वाले लोग अपने आप डालर के पीछे चले आएंगे।

वैसा ही हुआ भी है। सारी दुनिया अमरीका की तरफ भागी जा रही है। अब काबा में काबा नहीं है और काशी में काशी नहीं है। काशी काबा के सब पंडित पुरोहित तुम्हें कैलिफोर्निया में मिलेंगे!

भयभीत आदमी अगर भय के कारण गायत्री भी मांग ले तो उसकी गायत्री खरीदी जा सकती है। भय के कारण अगर कोई भगवान का नाम लेता हो तो उसका भगवान भी खरीदा जा सकता है। क्योंकि भयभीत मूलतः लोभी होता है। लोभी ही भयभीत होता है।

लोग प्रार्थनाएं क्या कर रहे हैं मांगते क्या हैं प्रार्थना में? यही कि और धन दे, कि और पद दे, कि और प्रतिष्ठा दे! संसार ही मांगते हैं। ओ जाते परमात्मा के पास हैं, परमात्मा को छोड़ कर और सब मांगते हैं।

सपना यह संसार ~ ओशो

=१५९=

卐 सत्यराम सा 卐
दादू चारै चित दिया, चिन्तामणि को भूल ।
जन्म अमोलक जात है, बैठे माँझी फूल ॥ 
दादू निबहै त्यौं चलै, धीरै धीरज मांहि ।
परसेगा पीव एक दिन, दादू थाके नांहि ॥ 
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साभार ~ Vidya Bhaskar Dwivedi
'समय और धैर्य' जीवन के लक्ष्यों को पाने के लिए आवश्यक :-

एक साधु था, वह रोज घाट के किनारे बैठ कर चिल्लाया करता था, जो चाहोगे सो पाओगे” जो चाहोगे सो पाओगे।”

बहुत से लोग वहाँ से गुजरते थे पर कोई भी उसकी बात पर ध्यान नहीँ देता था और सब उसे एक पागल आदमी समझते थे।

एक दिन एक युवक वहाँ से गुजरा और उसनेँ उस साधु की आवाज सुनी, “जो चाहोगे सो पाओगे” जो चाहोगे सो पाओगे।” और आवाज सुनते ही उसके पास चला गया।

उसने साधु से पूछा - “महाराज आप बोल रहे थे कि ‘जो चाहोगे सो पाओगे’ तो क्या आप मुझको वो दे सकते हो जो मैँ जो चाहता हूँ ?”

साधु उसकी बात को सुनकर बोला - “हाँ बेटा तुम जो कुछ भी चाहता है मैँ उसे जरुर दुँगा, बस तुम्हें मेरी बात माननी होगी। लेकिन पहले ये तो बताओ कि तुम्हें आखिर चाहिये क्या?”

युवक बोला - मेरी एक ही ख्वाहिश है मैँ हीरों का बहुत बड़ा व्यापारी बनना चाहता हूँ। साधू बोला, कोई बात नहीँ मैँ तुम्हे एक हीरा और एक मोती देता हूँ, उससे तुम जितने भी हीरे मोती बनाना चाहोगे बना पाओगे !” और ऐसा कहते हुए साधु ने अपना हाथ आदमी की हथेली पर रखते हुए कहा, पुत्र, मैं तुम्हे दुनिया का सबसे अनमोल हीरा दे रहा हूं, लोग इसे ‘समय’ कहते हैं, इसे तेजी से अपनी मुट्ठी में पकड़ लो और इसे कभी मत गँवाना, तुम इससे जितने चाहो उतने हीरे बना सकते हो

युवक अभी कुछ सोच ही रहा था कि साधु उसका दूसरी हथेली, पकड़ते हुए बोला, पुत्र, इसे पकड़ो, यह दुनिया का सबसे कीमती मोती है, लोग इसे “धैर्य” कहते हैं, जब कभी समय देने के बावजूद परिणाम ना मिले तो इस कीमती मोती को धारण कर लेना, याद रखना जिसके पास यह मोती है, वह दुनिया में कुछ भी प्राप्त कर सकता है।

युवक ने गम्भीरता से साधु की बातों पर विचार करते हुए निश्चय किया कि आज से वह कभी अपना समय बर्वाद नहीं करेगा और हमेशा धैर्य से काम लेगा। इस विचार को अपने अंदर आत्मसात करते हुए उसने हीरों के एक बहुत बड़े व्यापारी के यहाँ काम शुरू किया और फिर अपनी मेहनत एवं ईमानदारी के बल पर एक दिन खुद भी हीरों का बहुत बड़ा व्यापारी बन गया ।

मित्रों, इस कथा का सार यह है कि ‘समय’ और ‘धैर्य’ वह दो हीरे-मोती हैं जिनके बल पर हम बड़े से बड़ा लक्ष्य प्राप्त कर सकते हैं। अतः ज़रूरी है कि हम अपने कीमती समय को बर्वाद ना करें और अपनी मंज़िल तक पहुँचने के लिए धैर्य से काम लें

= विन्दु (२)८४ =

#‎daduji 
॥ दादूराम सत्यराम ॥
**श्री दादू चरितामृत(भाग-२)** लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥

**= अथ विन्दु ८४ =** 

**= रायसिंह के प्रश्नोत्तर =**
रायसिंह ने पूछा - तुम्हारा धर्म कौन सा है ? व्यवहार कैसा है ? कर्तव्य क्या है ? और कथनी क्या है ? दादूजी ने कहा - राम नाम का चिन्तन करना ही हमारा धर्म । पांचों ज्ञानेन्द्रियों को जीतने का यत्न करना ही हमारा व्यवहार है । जो पूर्वकाल के संतों ने किया है, वही हमारा कर्तव्य है और कथन हमारा सबके प्रति यही है कि - सब अपने मन की वृत्ति को निरंजन राम के स्वरूप में लीन करो । फिर राजा ने पूछा तुम्हारा पंथ कौन सा है ? और तुम किस देव की पूजा करते हो ? तब परम संत दादूदयालुजी ने यह पद कहा - 
"मैं पंथी एक अपार का, मन और न भावे । 
सोइ पंथ पावे पीव का, जिसे आप लखावे ॥ टेक ॥ 
को पंथ हिन्दू तुरक के, को काहूँ राता । 
को पंथ सोफी सेवड़े, को संन्यासी माता ॥ १ ॥ 
को पंथ जोगी जंगमा, को शक्ति पंथ ध्यावें । 
को पंथ कमड़े कापड़ी, को बहुत मनावें ॥ २ ॥ 
को पंथ काहूं के चले, मैं और न जानूं । 
दादू जिन जग सिरजिया, ता ही को मानूं ॥ ३ ॥"
अपने मार्ग का निर्णय करके दिखा रहे हैं - हम तो अद्वैत, अपार, परब्रह्म की प्राप्ति के साधन रूप मार्ग में चल रहे हैं, हमारे मन को अन्य कोई भी अच्छा नहीं लगता है । उस प्रभु की प्राप्ति का मार्ग, वही प्राप्त कर सकता है, जिसे प्रभु स्वयं ही दिखाते हैं । नहीं तो - कोई हिन्दू और कोई तुरकों के पंथ में चलता है । कोई अन्य किसी में अनुरक्त है । कोई सूफी, कोई सेवड़े कोई संन्यासियों के पंथ में मस्त रहता है । कोई योगी, कोई जंगम और कोई शक्ति पंथ की उपासना करता है । कोई चमार साधु कामड़ों के और कोई नाना कपड़ों की गुदड़ी रखने वाले अघोरियों के पंथ में चलता है । कोई बहुतों को मानता है । कोई किसी के भी पंथ में चले किन्तु हम तो अन्य को हितकर न जानकर जिसने संसार की रचना की है, उस प्रभु की प्राप्ति के मार्ग को ही अपने कल्याण का साधन मानते हैं । राजा ने फिर कहा - उस पंथ का स्वरूप क्या है ? 
(क्रमशः)

= परिचय का अंग =(३१/३)


॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥
**श्री दादू अनुभव वाणी टीका** ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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**= परिचय का अँग ४ =**
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जहं तन मन का मूल है, उपजै रव१ ओंकार ।
अनहद सेझा शब्द का, आतम करे विचार ॥३१॥
जहां स्थूल शरीर और सूक्ष्म शरीर का मूल कारण अज्ञान है, जहां ॐ की ध्वनि१ प्रकट होती है, जो अनाहत शब्दों का उद्गम स्थान है, जिज्ञासु जन जहां विचार द्वारा आत्मा के सामान्य रूप को अज्ञान के प्रकाशक रूप से देखते हैं ॥३१॥ 
.
भाव भक्ति लै ऊपजै, सो ठाहर निज सार ।
तहं दादू निधि पाइये, निरन्तर निरधार ॥३२॥
जहां से भाव अर्थात् सँपूर्ण त्रिपुटियों की उत्पत्ति होती है और लै अर्थात् सँपूर्ण त्रिपुटियाँ जहां लीन होती हैं, भक्ति अर्थात् अनुराग वृत्ति का भी जहां से सूक्ष्म रूप निकलता है, वही मणि - पूरक चक्र(नाभि कमल) विश्व के सार स्वरूप अपने आत्मा की अनुभूति का स्थान है । उसी में सँपूर्ण आधारों से रहित, निराधार, सदा एक रस रूप, और सँपूर्ण सँसार प्रलय काल में जिसमें अन्तर्हित रूप से रहता है, वह परमात्मा रूप निधि आत्मरूप से प्राप्त होती है ॥३२॥ 
विशेष विवरण - सुषुप्ति अवस्था में पुरितत् नामक नाड़ियों के जाल नाभि स्थान में ही "कुछ नहीं जान सका" ऐसी अज्ञान की प्रतीति होती है । ढाई वर्ष तक नाभि स्थान पर ॐ का ध्यान करने से वहां ही ओंकार - ध्वनि प्रकट होती है और शाँत - ध्वनि एकान्त स्थान में रात्रि के समय नाभि स्थान पर घड़ी की आवाज के समान साधक को कट - कट रूप से सुनाई पड़ती है ।
अनाहत शब्द प्रकट रूप से तो अनाहत चक्र में ही सुनाई पड़ते हैं किन्तु निकलते नाभि स्थान से ही हैं, नाभि ही उनका सेझा(उद्गम स्थान) है । आत्मा के सामान्य रूप का अनुभव सुषुप्ति में "सुख से सोया" के रूप में नाभि - कमल में ही होता है । सुषुप्ति समाप्त होने पर ही नाभि - कमल से त्रिपुटी रूप भाव व्यक्त होते हैं और सुषुप्ति के आरँभ में नाभि - कमल में ही लय होते हैं । सुषुप्ति में भक्ति का भी सँस्कार ही रहता है और सुषुप्ति समाप्ति पर ही भक्ति प्रकट रूप से भासती है ।
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एक ठौर सूझै सदा, निकट निरँतर ठाँव ।
तहां निरंजन पूरि ले, अजरावर तिहिं नाँव ॥३३॥
देवताओं से भी अति श्रेष्ठ होने के कारण उन परमात्मा का नाम अजरावर है । उनका विशेष रूप से निरँतर निवास स्थान अनाहत चक्र के समीप अष्टदल कमल है । ध्यानावस्था में सदा एकमात्र अष्टदल कमल पर ही उनका साक्षात्कार होता है । वहां ही अपनी अन्त:करण की वृत्ति को स्थिर करके माया रहित परब्रह्म का साक्षात्कार कर ले ॥३३॥
(क्रमशः)

= सर्वंगयोगप्रदीपिका (द्वि.उ. ५०/५१) =

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🙏 *श्री दादूदयालवे नमः ॥* 🙏
🌷 *#श्रीसुन्दर०ग्रंथावली* 🌷
रचियता ~ *स्वामी सुन्दरदासजी महाराज*
संपादक, संशोधक तथा अनुवादक ~ स्वामी द्वारिकादासशास्त्री
साभार ~ श्री दादूदयालु शोध संस्थान
अध्यक्ष ~ गुरुवर्य महमंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमारामजी महाराज
https://www.facebook.com/DADUVANI
*योगचतुष्टय की महिमा-* 
*भक्ति मंत्र लय कीनी चरचा ।*
*समझै सन्त करै जो परचा ।* 
*एक किये तिहुं लोक बड़ाई ।*
*चार्यौं की कछु कही न जाई ॥५०॥* 
इस तरह हमने भक्तियोग, मन्त्रयोग, लययोग तथा चर्चायोग का संक्षेप से वर्णन कर दिया है । इन योगों के विषय में तत्त्वतः वही सन्त-महात्मा जान सकता है जो इनका तल्लीनता से अभ्यास करते हुए अनुभव करने का प्रयास कर रहा हो । इनमें से किसी एक योग का अभ्यास भी यथार्थतया कोई कर ले तो वह बड़ा भाग्यशाली है, यदि किसी को चारों योग हस्तामलक हो जायँ तो उसका कहना ही क्या है ! ॥५०॥ 
*- दोहा -* 
*ये चार्यौं अंग भक्ति के, नौधा इनहीं मांहि ।* 
*सुन्दर घट महिं कीजिये, बाहरि कीजै नांहि ॥५१॥* 
इति श्रीसुन्दरदासविरचितायां सर्वांगयोगप्रदीपिकायां भक्तियोग-नामा द्वितीयोपदेशः ॥२॥ 
इस तरह हमने इन भक्तियोग के अन्तर्गत चारों योगों का व्याख्यान कर दिया । नवधा भक्ति भी इन्हीं के अन्तर्भूत है । महाराज श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं—इस नवधा भक्ति का अभ्यास बाहर के मठ-मन्दिरों में बैठकर नहीं, मानसोपचार विधि से अन्तर्मन के द्वारा ही करना चाहिये । इसी में साधक का कल्याण है ॥५१॥ 
= श्री स्वामी सुन्दरदासजी द्वारा रचित सर्वांगयोगप्रदीपिका ग्रन्थ का भक्तियोग नामक द्वितीय उपदेश समाप्त = 
(क्रमशः)

रविवार, 28 अगस्त 2016

=१५८=

卐 सत्यराम सा 卐
गर्व न कीजिये रे, गर्वै होइ विनाश ।
गर्वै गोविन्द ना मिलै, गर्वै नरक निवास ॥ टेक ॥
गर्वै रसातल जाइये, गर्वै घोर अन्धार ।
गर्वै भौ-जल डूबिये, गर्वै वार न पार ॥ १ ॥
गर्वै पार न पाइये, गर्वै जमपुर जाइ ।
गर्वै को छूटै नहीं, गर्वै बँधे आइ ॥ २ ॥
गर्वै भाव न ऊपजै, गर्वै भक्ति न होइ ।
गर्वै पिव क्यों पाइये, गर्वै करै जनि कोइ ॥ ३ ॥
गर्वै बहुत विनाश है, गर्वै बहुत विकार ।
दादू गर्व न कीजिये, सन्मुख सिरजनहार ॥ ४ ॥
==============================
साभार ~ Rajnish Gupta
(((((((((( ऋषि अष्टावक्र ))))))))))
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उद्दालक ऋषि ने अपने प्रिय शिष्य कहोड़ के साथ अपनी पुत्री सुजाता का विवाह कर दिया था. 
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एक बार जब सुजाता गर्भवती थी और कहोड़ वेद पाठ कर रहे थे. वह बार-बार उच्चारण में चूक कर रहे थे. तभी सुजाता के गर्भ से आवाज़ आई- 
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“आपका उच्चारण अशुद्ध है”. यह सुनते ही कहोड़ कुपित हुए. उन्होंने पूछा कि कौन है जो मेरे उच्चारण को चुनौती दे रहा है, मेरे समक्ष प्रकट हो.
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फिर से आवाज आई- पिताजी में आपका अंश हूं जो माता के गर्भ में स्थित हूं. आप जैसे ज्ञानी के मुख से अशुद्ध उच्चारण सुनकर मैंने टोका.
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कुपित होकर कहोड़ ने शाप दिया- तू जन्म से पूर्व ही मीनमेख निकालने लगा है. तेरे आठ अंग टेढ़े हो जाएंगे. 
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कहोड़ शास्त्रार्थ से धन प्राप्ति की इच्छा के साथ राजा जनक के दरबार में पहुंचे.
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जनक के राजपुरोहित बन्दी विद्वानों को शास्त्रार्थ की चुनौती देते और हारने वाले को जल में डुबोकर मार डालते. बंदी ने कुतर्कों से कहोड़ को पराजित कर दिया और पानी में डुबाकर मार डाला.
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शाप के प्रभाव से कहोड़ को आठ स्थानों से टेढ़े अंगों वाला पुत्र जन्मा. इसलिए उसका अष्टावक्र नाम पड़ा. 
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कहोड़ की मृत्यु के बाद पुत्री सुजाता अपने बेटे अष्टावक्र को लेकर पिता के आश्रम में आ गई. अष्टावक्र के हाथ-पैर टेढ़े-मेढ़े थे, कद नाटा था, पीठ पर कूबड़ निकला था, चेहरा भद्दा था पर मां सुजाता का वही एक आसरा था.
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अष्टावक्र शरीर से भले बेढंगे थे, पर बुद्धि बड़ी तीव्र थी. अपनी तीव्र बुद्धि के कारण उसने थोड़ी ही उम्र में वेद-शास्त्रों तथा धर्म-ग्रन्थों का अच्छा अध्ययन कर लिया. 
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एक दिन अष्टावक्र अपने नाना की गोद में बैठा था तभी उद्दालक का पुत्र श्वेतकेतु आया.
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श्वेतकेतु बोला- अष्टावक्र, तू यहां से हट. अपने पिता की गोद में मैं बैठूंगा. यह मेरे पिता हैं, तू अपने पिता की गोद में जाकर बैठ. 
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अष्टावक्र तो उद्दालक को ही पिता मानता था. उसे पहली बार पता चला कि उसके पिता नहीं हैं और अपनी मां से पिता के बारे में पूछने लगा.
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सुजाता को हारकर सब बताना पड़ा. अष्टावक्र ने निश्चय किया कि पिता को छल से मारने वाले मूर्ख को सबक सिखा कर रहेगा.
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वह उद्दालक के पास पहुंचे और राजा जनक के दरबार में जाकर बन्दी से शास्त्रार्थ करने की आज्ञा मांगी.
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महर्षि बोले- अभी तुम्हारी शिक्षा पूरी नहीं हुई है. तुम्हारे शरीर तथा आयु को देखते हुए तुम्हें जनक के दरबार में कोई घुसने भी न देगा, शास्त्रार्थ तो दूर की बात है. परंतु अष्टावक्र अडिग रहे.
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अष्टावक्र मां तथा गुरु की आज्ञा लेकर चल पड़े. जब वह नगर में पहुंचे तो संयोगवश महाराजा जनक उसी राजमार्ग से आ रहे थे. राजा की सवारी के आगे चलने वाले नौकरों ने राह बनाने के लिए अष्टाव्रक को धकेल दिया.
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अष्टावक्र बोले- मार्ग पर चलने की प्राथमिकता अन्धे, बहरे, स्त्री, अपंग, असहाय तथा भारवाही व्यक्तियों को दी जानी चाहिए. राजा को अपने लिए ऐसी प्रथम सुविधा नहीं लेनी चाहिए.
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राजा जनक अष्टावक्र की बातें सुन लीं. उन्हें लगा कि यह बालक ठीक ही कह रहा है. उसे रास्ते से हटाये बिना वह एक किनारे से आगे बढ़ गए. 
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अष्टावक्र जनक के महल पर पहुंचे. राजमहल के द्वार पर द्वारपाल ने उसे रोककर पूछा कि वह कौन है और क्यों अन्दर जाना चाहता है ? 
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अष्टावक्र ने अपना परिचय तथा आने का कारण बताया. सुनकर द्वारपाल बोला- अभी तुम बालक हो. यज्ञ-वेदी पर वेद-पाठ करने की बजाय, किसी आचार्य के आश्रम में जाकर अध्ययन करो.
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अष्टावक्र ने ऊंची आवाज में कहना शुरू किया. ‘‘ज्ञान का उम्र से क्या सम्बन्ध ! मेरी उम्र भले ही कम है, लेकिन मैंने शास्त्रों का अध्ययन किया है. शरीर से मैं कुरूप हूं, परंतु शरीर से कुरुप होने का अर्थ बुद्धि से कुरूप होना नहीं है.
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सेमल का वृक्ष बड़ा हो जाने पर भी शक्तिशाली नहीं होता. आग की छोटी-सी चिंगारी में भी किसी को जला देने की वैसी ही ताकत होती है जैसी आग के बड़े अंगारे में.
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उम्र से विद्वता का कोई संबंध नहीं. तुम मेरे आने की सूचना महाराजा जनक को दो.
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जनक ने अष्टावक्र को राजदरबार में बुला लिया. अष्टावक्र की उम्र तथा टेढ़े-मेढ़े अंगों को देख कर सब दरबारी हँसने लगे. उन्हें हँसता देख अष्टावक्र भी बड़े जोर से हंस पड़े.
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राजा जनक ने उत्सुकता से पूछा- ब्राह्मण देवता ! आप क्यों हंस रहे हैं ? 
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अष्टावक्र बोले- मैं तो यह समझकर आया था कि यह विद्वानों की सभा है और मैं बन्दी से शास्त्रार्थ करूंगा, पर मुझे लगता है कि मैं मूर्खों की सभा में आ गया हूं.
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मैंने अपने हंसने का कारण बता दिया, अब आप अपने मूर्ख दरबारियों से पूछें कि वे किस कारण हंसे ? 
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अपनी इस शारीरिक दशा का कारण मैं नहीं. कारण तो वह कुम्हार यानी ईश्वर है, जिसने मुझे ऐसा बनाया. किस पर हंसे ये मूर्ख ?
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जनक लज्जित हो गए. उन्होंने अष्टाव्रक को आसन दिया और कहा, मुझे तथा मेरे दरबारियों को क्षमा करें. अभी आप बन्दी से शास्त्रार्थ करने की आयु के नहीं हैं. शास्त्रार्थ में हारने वाले को जल-समाधि लेनी पड़ती है. अभी आप और अध्ययन करें.
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अष्टाव्रक शास्त्रार्थ की जिद पर अड़े रहे. शास्त्रार्थ शुरू हुआ और जल्द ही बन्दी हार.गया. शर्त के अनुसार स्वयं जल-समाधि लेने के लिए तैयार हो गया.
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अष्टावक्र ने कहा- बन्दी ! मैं ऋषि काहोड़ का पुत्र हूं. तुमने कुतर्कों से उन्हें पराजित कर जल-समाधि दे दी थी. मैं भी तुम्हें शर्त के अनुसार जल-समाधि दे सकता हूं, पर मैं वैसा करूँगा नहीं.
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जीवन लेना सहज है, पर जीवन देना बड़ी बात है. ज्ञान मानवता के विकास के लिए होना चाहिए, न कि उसको नष्ट करने के लिए. मुझे यह वचन दो कि इस प्रकार गर्व में आकर किसी का जीवन नष्ट नहीं करोगे.
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बन्दी का घमण्ड चूर-चूर हो गया था. जनक के चरणों में गिरकर बोला- मैं वरुण का पुत्र हूं. बारह वर्षों में पूर्ण होने वाले एक यज्ञ का अनुष्ठान मेरे पिता ने किया था. 
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उस यज्ञ के लिए जरूरी कुछ विद्वानों का चयन करके मैंने जल में डूबोकर वरुण लोक भेजा. अनुष्ठान पूर्ण हो चुका है. वे सभी विद्वान अब वापस आ रहे हैं. मैं अष्टावक्र को प्रणाम करता हूं जिनके कारण मेरे पिता से भेंट होगी.
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उसी समय वरुण के यज्ञ में गए सभी ब्राह्मण राजा जनक के समीप प्रकट हुए. उसमें कहोड़ भी थे. अष्टावक्र अपने पिता के साथ दरबार से विदाई लेकर चल पड़े.
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रास्ते में समंगा नदी पड़ी. कहोड़ ने अष्टावक्र से कहा - पुत्र तुम इस नदी में स्नान करो. अष्टावक्र स्नान कर बाहर निकले तो उनके सारे अंग ठीक हो गए थे. कहोड़ ने वरूण के यज्ञ से अर्जित पुण्यों के बल पर पुत्र को स्वस्थ कर दिया.
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(((((((((( जय जय श्री राधे ))))))))))
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=१५७=

卐 सत्यराम सा 卐
दादू जीवै पलक में, मरतां कल्प बिहाइ ।
दादू यहु मन मसखरा, जनि कोई पतियाइ ॥ 
दादू मूवां मन हम जीवित देख्या, जैसे मरघट भूत ।
मूवां पीछे उठ उठ लागै, ऐसा मेरा पूत ॥ 
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साभार ~ Awes NIRAJ(G+)

एक संत थे, बड़े तपस्वी और बहुत संयमी। लोग उनके धैर्य की प्रशंसा करते थे। एक दिन उनके मन में विचार आया कि उन्होंने खान-पान पर तो संयम कर लिया, लेकिन दूध पीना उन्हें बहुत प्रिय था। उसे त्याग करने के बारे में मन बनाया। इस तरह संत ने दूध पीना छोड़ दिया।
सभी लोगों को बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होंने इस व्रत का कड़े नियम से पालन किया। ऐसा करते हुए कई साल बीत गए। एक दिन संत के मन में विचार आया कि आज दूध पिया जाए। फिर तो न चाहते हुए भी उनकी दूध पीने की इच्छा प्रबल हो गई। तभी उन्हें एक धनी व्यक्ति के यहां से भोजन का बुलावा आया। उन्होंने उस सेठ से कहा, आज सिर्फ मैं दूध पीना चाहूंगा।
उन सेठजी को पता था कि संत ने दूध न पीने का कठिन दृढ़ निश्चय किया है। शाम को सेठजी ने 40 घड़े संत की कुटिया के बाहर रखवाये। उन सभी में दूध भरा हुआ था। सेठजी पहुंचे और कहा आप ये पूरा दूध पी लीजिए।
संत ने कहा, मुझे अकेले को ही दूध पीना है फिर आप इतने घड़े क्यों ले आए? सेठजी ने कहा, महाराज आपने दूध पीना 40 साल से छोड़ रखा है, उस हिसाब से दूध के 40 बड़े घड़े आपके सामने हैं।
संत, सेठजी की बातों को समझ गए। उन्होंने क्षमा मांगते हुए कहा, मैंने मन के टूटते संयम पर अब नियंत्रण पा लिया है।
संक्षेप में मन किसी भी उम्र में विपरीत प्रभाव डाल देता है। इसके नियंत्रण का एक ही उपाय है। और वो है अभ्यास। किंतु सतत् अभ्यास जड़ता के रूप में न हो जाए, इसलिए इसमें चैतन्यता बनाए रखनी चाहिए।
मनुष्य का मन चंचल बच्चे की तरह होता है। वह कभी तो मान जाता है और कभी उछल कूद करने लगता है। अतः उसे नियंत्रित करने के नए-नए उपाय खोजने पड़ते हैं। जिस मनुष्य का मन नियंत्रण में रहता है। उसके निर्णय कभी गलत नहीं होते हैं

= सर्वंगयोगप्रदीपिका (द्वि.उ. ४८/९) =

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🙏 *श्री दादूदयालवे नमः ॥* 🙏
🌷 *#श्रीसुन्दर०ग्रंथावली* 🌷
रचियता ~ *स्वामी सुन्दरदासजी महाराज*
संपादक, संशोधक तथा अनुवादक ~ स्वामी द्वारिकादासशास्त्री
साभार ~ श्री दादूदयालु शोध संस्थान
अध्यक्ष ~ गुरुवर्य महमंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमारामजी महाराज
https://www.facebook.com/DADUVANI
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*सर्वांगयोगप्रदीपिका (ग्रंथ२)*
*भक्तियोग नामक द्वितीय उपदेश*
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*तूं जु अगाध अपार सु देवा ।*
*निगम नेति जानैं नहिं भेवा ।*
*तेरा को करि सकै बखाना ।*
*चकित भये सब संत सुजाना ॥४८॥* 
हे देव, आप तो अगाध(गम्भीर) हैं, अपार हैं । आप के लिये तो वेदशास्त्र भी(आप के रहस्य के विषय में निश्चित जानकारी न होने पर) ‘नेति, नेति’ कह कर चुप हो बैठे । आपको ‘इदमित्थम्’ कह कर निश्चयपूर्वक कौन कह सकता है ? यहाँ तक कि सब ज्ञानी सन्त-महात्मा भी, जो दिन-रात आप के ही ध्यान में लगे रहते हैं वे भी, आप का वर्णन करने में थक गये ॥४८॥
*तेरी गति तूं ही पै जानैं ।*
*मेरी मति कैसै जु प्रवानैं ।* 
*कीरी पर्वत कहा उचावै ।*
*उदधि थाह कैसैं करि आवै ॥४९॥* 
आप अपना रहस्य स्वयं ही जानते हैं, मुझ मन्दगति की क्या मजाल है कि आपके विषय में सप्रमाण कुछ कह सकूँ ! कभी चींटी ने पर्वत की ऊँचाई का सही वर्णन किया है, या कोई आज तक समुद्र की गम्भीरता का ठीक-ठीक पता लगा पाया है ! ॥४९॥ 
(क्रमशः)

= विन्दु (२)८४ =

#‎daduji 
॥ दादूराम सत्यराम ॥
**श्री दादू चरितामृत(भाग-२)** लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥

**= अथ विन्दु ८४ =**
**= खाटू पधारना =** 
दूसरे दिन शिष्यों के सहित दादूजी पत्रवाहक के साथ ईडवा से खाटू को चले और शनैः शनैः ब्रह्मचिन्तन करते हुये खाटू पहुँच गये । किन्तु पीछे से एक गोकुलिये गुसांइयों का शिष्य जिसका नाम आत्मबिहारी ने फत्तू लिखा है । वह जाति से ब्राह्मण था । उसको जब ज्ञात हुआ कि राजा ने दादूजी को बुलाया है । तब उसने राजा से कहा - आपने दादू को क्यों बुलाया है ? उसके साथ और भी साधु होंगे । यह व्यर्थ का खर्च शिर पर क्यों लिया है ? राजा ने कहा - बहुत अच्छे महात्मा हैं, मेरे काका भीमसिंह(बड़े सुन्दरदासजी) भी उनके शिष्य हैं । उसने कहा - दादू में अच्छापना कुछ नहीं है । अच्छेपने का केवल प्रचार करके उसके शिष्य भोले लोगों को ठगते हैं । तुम्हारे काका उसके शिष्य हो गये तो क्या हुआ । एक ने भूल की हो तो क्या उसके पीछे वाले सब भूल करते रहैं ? यह कोई बुद्धिमानी की बात है क्या ? आपको यह भूल नहीं करनी चाहिये थी, इससे तो यहाँ के लोग और बिगड़ेंगे । दादू में क्या अच्छापन है । अच्छापन तो उसने त्याग दिया है और उसके संग में जाते हैं, वे भी अच्छापन को त्याग देते हैं । राजा ने पूछा - वह कौन सा अच्छापन है जिसको दादूजी ने त्यागा है और उनके संग से अन्य लोग भी त्याग देते हैं ? उसने कहा - दादू ने भक्तों के मुख्य चिन्ह माला तिलक त्याग दिये हैं मूर्तिपूजा नहीं करता है, पूरा - पूरा नास्तिक है । इस से बुरा और क्या होगा जो साधु कहलाकर भी माला, तिलक, कंठ तथा शिर पर धारण नहीं करे । इत्यादिक बहुत - सी अंडबंड बातें सुनाकर राजा को बहका दिया । अंत में राजा ने कहा - अब तो बुला लिये इससे यदि वे आ गये तो उन के पास जाना तो पड़ेगा ही । उसने कहा - अनादर कर देना चाहिये । अनादर होगा तब अपने आप ही यहां से चला जाएगा । 
इधर पत्र वाहक ने जाकर राजा को सूचना दी दादूजी आ गये हैं । तब राजा ने दादूजी को अपने पास बुलाने की बात कहकर अर्थात् यहां बुला लाओ कहकर राजा ने कहा - वे यहां क्यों नहीं आये ? पत्र वाहक ने कहा - वे महात्मा हैं, उनके कोई इच्छा तो है नहीं । राजा महाराजाओं के पास तो कोई इच्छा लेकर जाते हैं । राजा ने कहा - इच्छा नहीं थी तो यहां तक कैसे आये ? पत्र वाहक ने कहा आपकी प्रार्थना से हम लोगों पर दया करके आये हैं । फिर श्रद्धा कम हो जाने से राजा ने दादूजी को अपने पास ही बुलवाया और विशेष स्वागत सत्कार न करके ही दादूजी से प्रश्न पूछने का विचार किया । वह की दादूजी की अवस्था को तो जानता ही नहीं था । फिर बहकाने से और भी अधिक भ्रम में पड़ गया था । इसलिये मन में यह सोचकर कि मैं पूछूंगा, उन प्रश्नों के उत्तर उनको आयेंगे नहीं तब आप ही अनादर हो जायगा । फिर जैसा उसने सोचा था वैसा ही किया । दादूजी के आने पर उनका समादर न करके । 
(क्रमशः)

शनिवार, 27 अगस्त 2016

=१५६=

#daduji 
卐 सत्यराम सा 卐
दादू जे जे चित बसै, सोई सोई आवै चीति ।
बाहर भीतर देखिये, जाही सेती प्रीति ॥ 
जिसकी सुरति जहाँ रहै, तिसका तहँ विश्राम ।
भावै माया मोह में, भावै आतम राम ॥ 
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साभार ~ Anand Nareliya
अष्टावक्र के संबंध में दूसरी बात जो ज्ञात है, वह है जब वे बारह वर्ष के थे। बस दो ही बातें ज्ञात हैं। तीसरी उनकी अष्टावक्र—गीता है; या कुछ लोग कहते हैं ‘अष्टावक्र—संहिता’। जब वे बारह वर्ष के थे तो एक बड़ा विशाल शास्त्रार्थ जनक ने रचा। जनक सम्राट थे और उन्होंने सारे देश के पंडितों को निमंत्रण दिया। और उन्होंने एक हजार गायें राजमहल के द्वार पर खड़ी कर दीं और उन गायों के सींगों पर सोना मढ़ दिया और हीरे—जवाहरात लटका दिये, और कहा, ‘जो भी विजेता होगा वह इन गायों को हांक कर ले जाये।’
बड़ा विवाद हुआ! अष्टावक्र के पिता भी उस विवाद में गये। खबर आई सांझ होते—होते कि पिता हार रहे हैं। सबसे तो जीत चुके थे, वंदिन नाम के एक पंडित से हारे जा रहे हैं। यह खबर सुन कर अष्टावक्र भी राजमहल पहुंच गया। सभा सजी थी। विवाद अपनी आखिरी चरम अवस्था में था। निर्णायक घड़ी करीब आती थी। पिता के हारने की स्थिति बिलकुल पूरी तय हो चुकी थी। अब हारे तब हारे की अवस्था थी।
अष्टावक्र दरबार में भीतर चला गया। पंडितों ने उसे देखा। महापंडित इकट्ठे थे! उसका आठ अंगों से टेढ़ा—मेढ़ा शरीर! वह चलता तो भी देख कर लोगों को हंसी आती। उसका चलना भी बड़ा हास्यास्पद था। सारी सभा हंसने लगी। अष्टावक्र भी खिलखिला कर हंसा। जनक ने पूछा. ‘और सब हंसते हैं, वह तो मैं समझ गया क्यों हंसते हैं, लेकिन बेटे, तू क्यों हंसा?’
अष्टावक्र ने कहा. ‘मैं इसलिए हंस रहा हूं कि इन चमारों की सभा में सत्य का निर्णय हो रहा है!’ बड़ा… आदमी अनूठा रहा होगा! ‘ये चमार यहां क्या कर रहे हैं?’
सन्नाटा छा गया!.. चमार! सम्राट ने पूछा. ‘तेरा मतलब?’ उसने कहा: ‘सीधी—सी बात है। इनको चमड़ी ही दिखायी पड़ती है, मैं नहीं दिखायी पड़ता। मुझसे सीधा—सादा आदमी खोजना मुश्किल है, वह तो इनको दिखायी ही नहीं पड़ता; इनको आड़ा—टेढ़ा शरीर दिखायी पड़ता है। ये चमार हैं! ये चमड़ी के पारखी हैं। राजन, मंदिर के टेढ़े होने से कहीं आकाश टेढ़ा होता है? घड़े के फूटे होने से कहीं आकाश फूटता है? आकाश तो निर्विकार है। मेरा शरीर टेढ़ा—मेढ़ा है, लेकिन मैं तो नहीं। यह जो भीतर बसा है इसकी तरफ तो देखो! इससे तुम सीधा—सादा और कुछ खोज न सकोगे।’
यह बड़ी चौंकाने वाली घोषणा थी, सन्नाटा छा गया होगा। जनक प्रभावित हुआ, झटका खाया। निश्चित ही कहां चमारों की भीड़ इकट्ठी करके बैठा है! खुद पर भी पश्चात्ताप हुआ, अपराध लगा कि मैं भी हंसा। उस दिन तो कुछ न कहते बना, लेकिन दूसरे दिन सुबह जब सम्राट घूमने निकला था तो राह पर अष्टावक्र दिखायी पड़ा। उतरा घोड़े से, पैरों में गिर पड़ा। सबके सामने तो हिम्मत न जुटा पाया, एक दिन पहले। एक दिन पहले तो कहा था, ‘बेटे, तू क्यों हंसता है?’ बारह साल का लड़का था। उम्र तौली थी। आज उम्र नहीं तौली। आज घोड़े से उतर गया, पैर पर गिर पड़ा—साष्टांग दंडवत! और कहा : पधारें राजमहल, मेरी जिज्ञासाओं का समाधान करें! हे प्रभु, आयें मेरे घर! बात मेरी समझ में आ गई है! रात भर मैं सो न सका। ठीक ही कहा : शरीर को ही जो पहचानते हैं उनकी पहचान गहरी कहां! आत्मा के संबंध में विवाद कर रहे हैं, और अभी भी शरीर में रस और विरस पैदा होता है, घृणा, आकर्षण पैदा होता है! मर्त्य को देख रहे हैं, अमृत की चर्चा करते हैं! धन्यभाग मेरे कि आप आये और मुझे चौंकाया! मेरी नींद तोड़ दी! अब पधारो!
राजमहल में उसने बड़ी सजावट कर रखी थी। स्वर्ण—सिंहासन पर बिठाया था इस बारह साल के अष्टावक्र को और उससे जिज्ञासा की। पहला सूत्र जनक की जिज्ञासा है। जनक ने पूछा है, अष्टावक्र ने समझाया है।
इससे ज्यादा अष्टावक्र के संबंध में और कुछ पता नहीं है—और कुछ पता होने की जरूरत भी नहीं है। काफी है, इतना बहुत है। हीरे बहुत होते भी नहीं, कंकड़—पत्थर ही बहुत होते हैं। हीरा एक भी काफी होता है। ये दो छोटी—सी घटनाएं हैं।
एक तो जन्म के पहले की : गर्भ से आवाज और घोषणा कि ‘क्या पागलपन में पड़े हो? शास्त्र में उलझे हो, शब्द में उलझे हो? जागो! यह ज्ञान नहीं है, यह सब उधार है। यह सब बुद्धि का ही जाल है, अनुभव नहीं है। इसमें रंचमात्र भी सार नहीं है। कब तक अपने को भरमाये रखोगे?’
और दूसरी घटना : राजमहल में हंसना पंडितों का और कहना अष्टावक्र का, कि जीवन में देखने की दो दृष्टियां हैं—एक आत्म—दृष्टि, एक चर्म—दृष्टि। चमार चमड़ी को देखता है। प्रज्ञावान आत्मा को देखता है।
तुमने गौर किया? चमार तुम्हारे चेहरे की तरफ देखता ही नहीं, वह जूते को ही देखता है। असल में चमार जूते को देख कर सब पहचान लेता है तुम्हारे संबंध में कि आर्थिक हालत कैसी है; सफलता मिल रही है कि विफलता मिल रही है, भाग्य कैसा चल रहा है। वह सब जूते में लिखा है। जूते की सिलवटें कह देती हैं। जूते की दशा कह देती है। जूते में तुम्हारी आत्मकथा लिखी है। चमार पढ़ लेता है। जूते में चमक, जूते का ताजा और नया होना, चमार तुमसे प्रसन्नता से मिलता है। जूता ही उसके लिए तुम्हारी आत्मा का सबूत है।
दर्जी कपड़े देखता है। तुम्हारा कोट—कपड़ा देख कर समझ लेता है, हालत कैसी है।
सबकी अपनी बंधी हुई दृष्टियां हैं।
सिर्फ आत्मवान ही आत्मा को देखता है। उसकी कोई दृष्टि नहीं है। उसके पास दर्शन है।
Osho