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🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
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भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामीआत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामीअर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #.९४)*
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*९४. तत्व उपदेश । पंचम ताल*
*बंदे हाजिरां हजूर वे, अल्लह आली नूर वे ।*
*आशिकां रा सिदक साबित, तालिबां भरपूर वे ॥टेक॥*
*वजूद में मौजूद है, पाक परवरदिगार वे ।*
*देख ले दीदार को, गैब गोता मार वे ॥१॥*
*मौजूद मालिक तख्त खालिक, आशिकां रा ऐन वे ।*
*गुदर कर दिल मग्ज भीतर, अजब है यहु सैंन वे ॥२॥*
*अर्श ऊपर आप बैठा, दोस्त दाना यार वे ।*
*खोज कर दिल कब्ज कर ले, दरूने दीदार वे ॥३॥*
*हुशियार हाजिर चुस्त करदा, मीरां मेहरवान वे ।*
*देख ले दर हाल दादू, आप है दीवान वे ॥४॥*
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भा० दी०-सर्वश्रेष्ठपरमात्मन: स्वरूपं भक्तास्तत्संमुखीभूय ध्यायन्ति । जगन्नियामकस्य परं पावनं रूपमस्मिन्नेव शरीरे वर्तते । भक्तास्तत्स्वरूपं निर्विकल्पसमाधावान्तर्मुखवृत्त्या पश्यन्ति । स: सृष्टिनियन्ता परमात्मा हृदयसिंहासने सततं विराजते । प्रेमानुबन्धिनो भक्ता तत्र तं पश्यन्ति । हे जीव ! त्वमपि मनोऽभ्यन्तरे विराजमानं तत्स्वरूपं हृदयकमले पश्य । सः सर्वज्ञो मे परमात्मा सुहद् हृदयाकाशेऽष्टदलकमले विराजते । अतस्त्वं स्वमनो विजित्य हृदयाभ्यन्तरे तद्दर्शनं विधेहि । आत्मनो मनस्तदाराधने संनियोजय । हे जीव ! सावधानेन दृढेन मनसा संमुखीभूय तं प्रभुं पश्य ।
स: प्रभुः
हृदयप्रदेशे प्रतिक्षणं विराजते । उक्तं च तैतरीयोपनिषदि-
सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म, यो वेद निहितं गुहायां परमे व्योमन् । सोऽमृतमश्नुते सर्वान् कामान् सह ब्रह्मणा विपश्चितेति ।
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भक्त लोग भगवान् के सर्वश्रेष्ठ रूप का सन्मुख बैठ कर ध्यान करते हैं । सब जगत् का पालन करने वाले उस परमात्मा का परम पवित्र रूप इसी शरीर में स्थित है, भक्त लोग उस स्वरूप को निर्विकल्प समाधि में अन्तर्मुखवृत्ति से देखते हैं । वह सृष्टि-कर्ता परमात्मा हृदय-सिंहासन पर विराजते हैं । प्रेमी भक्त उनको वहां ही देखते हैं ।
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मस्तक के अन्दर उस रूप को जान कर हृदय-कमल में तुम भी उसको देखो । यह सर्वज्ञ परमात्मा मेरा तो मित्र है और हृदयाकाश में अष्टदल-कमल पर विराजता हैं । अपने मन को जीत कर उसका नित्य दर्शन करो और अपने मन को उसके भजन में तल्लीन करो और उसका सामने बैठ कर ध्यान करो ।
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तैतरीयोपनिषद् में –
वह ब्रह्म सत्य स्वरूप अनन्त है, जो परम विशुद्ध आकाश में रहते हुए भी प्राणियों के हृदय रूप गुहा में छिपा हुआ है । जो उस ब्रह्म को जानता है, वह उस विज्ञान-स्वरूप ब्रह्म में समस्त भोगों का अनुभव करता है । यहां पर भोगों के अनुभव का तात्पर्य यह है की वह परमात्मा को प्राप्त सिद्ध-पुरुष इन्द्रियों द्वारा बाह्य-विषयों का सेवन करते हुए भी स्वयं सदा परमात्मा में स्थित रहता है ।
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उसके मन, बुद्धि और इन्द्रियों के व्यवहार, उनके द्वारा होने वाली सभी चेष्टायें, परमात्मा में स्थित रहते हुए ही होती हैं । आवश्यकतानुसार इन्द्रियों द्वारा विषयों का उपभोग करते हुए भी परमात्मा से एक क्षण के लिये भी अलग नहीं होता । सदा कर्मों से निर्लेप रहता है ।
(क्रमशः)