मंगलवार, 31 अगस्त 2021

शब्दस्कन्ध ~ पद #.९४

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भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामीआत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामीअर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #.९४)*
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*९४. तत्व उपदेश । पंचम ताल*
*बंदे हाजिरां हजूर वे, अल्लह आली नूर वे ।*
*आशिकां रा सिदक साबित, तालिबां भरपूर वे ॥टेक॥*
*वजूद में मौजूद है, पाक परवरदिगार वे ।*
*देख ले  दीदार को, गैब गोता मार वे ॥१॥*
*मौजूद मालिक तख्त खालिक, आशिकां रा ऐन वे ।*
*गुदर कर दिल मग्ज भीतर, अजब है यहु सैंन वे ॥२॥*
*अर्श ऊपर आप बैठा, दोस्त दाना यार वे ।*
*खोज कर दिल कब्ज कर ले, दरूने दीदार वे ॥३॥*
*हुशियार हाजिर चुस्त करदा, मीरां मेहरवान वे ।*
*देख ले दर हाल दादू, आप है दीवान वे ॥४॥*
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भा० दी०-सर्वश्रेष्ठपरमात्मन: स्वरूपं भक्तास्तत्संमुखीभूय ध्यायन्ति । जगन्नियामकस्य परं पावनं रूपमस्मिन्नेव शरीरे वर्तते । भक्तास्तत्स्वरूपं निर्विकल्पसमाधावान्तर्मुखवृत्त्या पश्यन्ति । स: सृष्टिनियन्ता परमात्मा हृदयसिंहासने सततं विराजते । प्रेमानुबन्धिनो भक्ता तत्र तं पश्यन्ति । हे जीव ! त्वमपि मनोऽभ्यन्तरे विराजमानं तत्स्वरूपं हृदयकमले पश्य । सः सर्वज्ञो मे परमात्मा सुहद् हृदयाकाशेऽष्टदलकमले विराजते । अतस्त्वं स्वमनो विजित्य हृदयाभ्यन्तरे तद्दर्शनं विधेहि । आत्मनो मनस्तदाराधने संनियोजय । हे जीव ! सावधानेन दृढेन मनसा संमुखीभूय तं प्रभुं पश्य । 
स: प्रभुः
हृदयप्रदेशे प्रतिक्षणं विराजते । उक्तं च तैतरीयोपनिषदि-
सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म, यो वेद निहितं गुहायां परमे व्योमन् । सोऽमृतमश्नुते सर्वान् कामान् सह ब्रह्मणा विपश्चितेति ।
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भक्त लोग भगवान् के सर्वश्रेष्ठ रूप का सन्मुख बैठ कर ध्यान करते हैं । सब जगत् का पालन करने वाले उस परमात्मा का परम पवित्र रूप इसी शरीर में स्थित है, भक्त लोग उस स्वरूप को निर्विकल्प समाधि में अन्तर्मुखवृत्ति से देखते हैं । वह सृष्टि-कर्ता परमात्मा हृदय-सिंहासन पर विराजते हैं । प्रेमी भक्त उनको वहां ही देखते हैं । 
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मस्तक के अन्दर उस रूप को जान कर हृदय-कमल में तुम भी उसको देखो । यह सर्वज्ञ परमात्मा मेरा तो मित्र है और हृदयाकाश में अष्टदल-कमल पर विराजता हैं । अपने मन को जीत कर उसका नित्य दर्शन करो और अपने मन को उसके भजन में तल्लीन करो और उसका सामने बैठ कर ध्यान करो । 
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तैतरीयोपनिषद् में –
वह ब्रह्म सत्य स्वरूप अनन्त है, जो परम विशुद्ध आकाश में रहते हुए भी प्राणियों के हृदय रूप गुहा में छिपा हुआ है । जो उस ब्रह्म को जानता है, वह उस विज्ञान-स्वरूप ब्रह्म में समस्त भोगों का अनुभव करता है । यहां पर भोगों के अनुभव का तात्पर्य यह है की वह परमात्मा को प्राप्त सिद्ध-पुरुष इन्द्रियों द्वारा बाह्य-विषयों का सेवन करते हुए भी स्वयं सदा परमात्मा में स्थित रहता है । 
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उसके मन, बुद्धि और इन्द्रियों के व्यवहार, उनके द्वारा होने वाली सभी चेष्टायें, परमात्मा में स्थित रहते हुए ही होती हैं । आवश्यकतानुसार इन्द्रियों द्वारा विषयों का उपभोग करते हुए भी परमात्मा से एक क्षण के लिये भी अलग नहीं होता । सदा कर्मों से निर्लेप रहता है ।
(क्रमशः)

*१८. साध को अंग ~ ११७/१२०*

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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*१८. साध को अंग ~ ११७/१२०*
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जगजीवन मीठा सबद, मीठा माँहै रांम ।
सोई मीठा हरि भगत, जे मीठा सुमिरै रांम ॥११७॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि राम नाम शबद ही मीठा है और यह मिठास राम नाम की है । जो इसका स्मरण करते हैं वे हरि भक्त भी मधुर हैं ।
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जगजीवन मीठी कथा, मिसरी७ कीरतन सार ।
मीठी रसनां कथित८ गुण, मीठा करत बिचार ॥११८॥
{७. मिसरी=मिश्री(मधुर)}   (८. कथित=धर्मकथा में कहे गये )
संतजगजीवन जी कहते हैं कि प्रभु की कथा मधुर है और संकीर्तन सार मिश्री है । धर्म कथा और भी मीठी है जो प्रभु के गुण कहती है । ये सब विचार भी मीठे हैं ।
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जगजीवन मीठी भगति, मीठा हरि का नांम ।
मीठी संगति साध की, जासौं परसैं रांम ॥११९॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि भक्ति मीठी है प्रभु का नाम मीठा है साधु जन की संगति मीठी है जिसे  राम जी का सानिध्य मिलता है ।
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जगजीवन बैकुंठ९ है, जहां कथा कीरतन नांम ।
तेतीस कोटि मुनि लीन रहैं, द्रवैं दया करि रांम ॥१२०॥
(९. बैकुंठ=विष्णु लोक)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जहाँ स्मरण कीर्तन है वहाँ ही बैकुंठ है । तैंतीस करोड़ मुनि जन वहां रमण करते हैं प्रभु भक्ति में लीन रहते हैं ।तब प्रभु दया कर द्रवित होते हैं ।
(क्रमशः) 

 

*धनैं खेत गेहूँ लुणे*

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*दादू दीया है भला, दीया करौ सब कोइ ।*
*घर में धर्या न पाइये, जे कर दीया न होइ ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ गुरुदेव का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*धनाजी*
*मूल छप्पय -*
*संतन के मुख नाखि के, धनैं खेत गेहूं लुणे ॥*
*बीज बाँहणै लग्यो, साधु भूखे चलि आये ।*
*मगन भयो मन मांहिं, सब गेहूं बरताये ॥*
*मात पिता तैं डरत, रिक्त ऊंमरा कढाये ।*
*भक्त भाव सौं भजे, और तें बधे सवाये ॥*
*राघव प्रति अचरज भयो, बिन बाहे निपजे सुणे ।*
*संतन के मुख नाखिके, धनैं खेत गेहूँ लुणे ॥१६३॥*
धना का जन्म वैशाख कृ० ८ को हुआ था । धना भक्त बीज बोने लगा था कि भूखे संत वहां आ गये ।
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संत-दर्शन से धना अपने मन में प्रति प्रसन्न हुआ । बीज के सब गेहूं संतों के भोजन के लिये दे दिये और माता पिता के भय से खेत में खाली ऊमरे कढ़ा दिये ।
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फिर भक्ति-भाव से हरि भजन करने लगा । बिना बीज भी उसके खेत के गेहूँ अन्य पड़ोसियों के खेतों से सवाये बढ़ते हुये दिखाई देते थे । अति आश्चर्य हुआ, जो बिना बोये ही उत्पन्न हुये थे ।
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यह सुनने में आता ही है कि - संतों के मुख में डाल कर भी धना ने अपने खेत में से गेहूँ काटे अर्थात् बीज संतों के मुख में डाला गया और उत्पन्न हुआ खेत में ।
(क्रमशः)

सोमवार, 30 अगस्त 2021

= १८२ =

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*वाहला मारा हृदया भीतर केम न आवै,*
*मने चरण विलम्ब न दीजे रे ।*
*दादू तो अपराधी तारो, नाथ उधारी लीजे रे ॥*
(#श्रीदादूवाणी ~ पद्यांश. १२८)
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साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
साभार ~ ### स्वामी श्री नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, अजमेर ###
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श्री दृष्टान्त सुधा - सिन्धु --- *४ पाद सेवन भक्ति*
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*॥ पद सेवक किसी निमित्त से स्वामी से दूर जाता है तो स्वामी उसके पास जाते हैं ॥*
पद सेवक कोउ निमित्त से, यदपि दूर होजाय ।
तो स्वामी करके कृपा, तिहिं समीप में आय ॥११९॥
दृष्टांत कथा – १.विष्वक्सेन, २.सुसेन, ३.बल, ४.प्रबल, ५.जय, ६.विजय, ७.भद्र, ८.सुभद्र, ९.नन्द, १०.सुनन्द, ११.चंड, १२.प्रचण्ड, १३.कुमुद, १४.कुमुदाक्ष, १५.शील, १६.सुशील ।
ये सोलह पार्षद भगवान् के समीप रहकर उनकी चरण सेवा करते हैं । सनकादिक के शाप से जय विजय को दूर जाना पड़ा था तब भगवान् को भी अवतार लेकर उनके पास जाना पड़ा था । यह प्रसिद्ध है । इससे सूचित होता है कि पद सेवक भक्त यदि किसी निमित्त से भगवान् के चरण कमलों से दूर हो भी जाय तो भगवान् उसके पास ही पहुँच जाते हैं

= १८१ =

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*संग तुम्हारे सब सुख होहि,*
*चरण कमल मुख देखूं तोहि ॥*
*अनेक जतन कर पाया सोइ,*
*देखूं नैनहुँ तो सुख होइ ॥*
(#श्रीदादूवाणी ~ पद्यांश. १९)
==================
साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
साभार ~ ### स्वामी श्री नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, अजमेर ###
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श्री दृष्टान्त सुधा - सिन्धु --- *४ पाद सेवन भक्ति*
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*॥ पाद सेवक सदा स्वामी के साथ रहता है ॥*
पद सेवक भगवान् के, रहता है नित साथ ।
लक्ष्मण घर पर नाहिं रहे, कहा यदपि रघुनाथ ॥११८॥
दृष्टांत कथा – यदपि रघुनाथ रामचन्द्रजी ने लक्ष्मणजी को अयोध्या में ही रहने को कहा था किन्तु वे रामजी के पद सेवक थे, इसलिये अयोध्या नहीं रह सके और रामजी के साथ ही वन को गये थे । इससे सूचित होता है कि पाद सेवक सदा स्वामी के पास ही रहना चाहता है ।

*सकाम निष्काम का अंग १५९(५/८)*

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श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
*दादू अपणे अपणे घर गये, आपा अंग विचार ।*
*सहकामी माया मिले, निहकामी ब्रह्म संभार ॥*
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*सकाम निष्काम का अंग १५९*
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सहकामी दीपक दशा, पाये तेल उजास ।
रज्जब हीरा संतजन, सहज सदा प्रकाश ॥५॥
सकामी की अवस्था दीपक के समान है । जैसे दीपक तेल को प्राप्त करके ही प्रकाश करता है, वैसे ही सकामी प्राणी कामना प्राप्त होने से ही प्रसन्न होता है, निष्कामी संत जन हीरा के समान है । जैसे हीरा स्वाभाविक सदा प्रकाश देता है, वैसे ही संत जन सदा ज्ञान प्रकाश प्रदान करते ही हैं ।
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सहकामी फल ले फिरै, मिलै न सांई मांहिं ।
रज्जब रीझे राम बिन, सो सेवक कछु नाँहिं ॥६॥
सकामी फलाशा लेकर संसार में ही भ्रमण करते हैं, ब्रह्म में नहीं मिल सकते । जो राम के बिना अन्य में अनुरक्त होता है, वह सेवक कुछ नहीं है ।
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चौरासी लख जीव की, चरण शरण तल चाहि१ ।
रज्जब अधर२ अकाश३ रुख४, ऊंची अगम अचाहि५ ॥७॥
आशा१ वाले की स्थिति चौरासी लाख जीवों के चरण तल की शरण में रहती है अर्थात वह सब के पेरों के नीचे रहता है । आशा रहित५ की इच्छा४ सबसे ऊंची उठकर माया रहित२ अगम ब्रह्म३ को प्राप्त करने की होती है ।
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तब लग चेरा१ लच्छि का, चाह तले ह्वै चित ।
रज्जब रही गुलाम२ गति३, होत अचाही नित्त ॥८॥ 
जब तक चित्त भोगासा के नीचे है, तब तक लक्ष्मी का ही दास१ है और जब सदा के लिये भोगासा रहित हो जाता है तब गुलाम की चेष्टा२ पीछे रह जाती है अर्थात फिर वह माया का दास३ नहीं हो सकता ।
(क्रमशः)

*ब्रह्माण्ड तलातल को*

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*सतगुरु काढे केस गहि, डूबत इहि संसार ।*
*दादू नाव चढाइ करि, कीये पैली पार ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ गुरुदेव का अंग)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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एक एक तरह के अनार है । एक खास प्रकार हैं, जिसमें थोड़ी देर तो एक तरह की फुलझड़ियाँ होती हैं, फिर कुछ देर बन्द रहकर दूसरे तरह के फूल निकलने लगते हैं, फिर और किसी तरह के फूल, मानो फुलझड़ियों का छूटना बन्द ही नहीं होता ।
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“एक तरह के अनार और हैं । आग लगाने से थोड़ी ही देर के बाद वह भुस्स से फूट जाते हैं । उसी तरह बहुत प्रयत्न करके साधारण आदमी अगर ऊपर चला भी जाता है तो फिर वह लौटकर खबर नहीं देता । जीवकोटि के जो हैं, बहुत प्रयत्न करने पर उन्हें समाधि हो सकती है, परन्तु समाधि के बाद न वे नीचे उतर सकते हैं और न उतरकर खबर ही दे सकते हैं ।
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“एक हैं नित्यसिद्ध की तरह । वे जन्म से ही ईश्वर की चाह रखते हैं, संसार की कोई चीज उन्हें अच्छी नहीं लगती । वेदों में होमापक्षी की कथा है । यह चिड़िया आकाश में बहुत ऊँचे पर रहती हैं । वहीं वह अण्डे भी देती है । इतनी ऊँचाई पर रहती है कि अण्डा बहुत दिनों तक लगातार गिरता रहता है । गिरते गिरते अण्डा फूट जाता है । तब बच्चा गिरता रहता है ।
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बहुत दिनों तक लगातार गिरता रहता है । गिरते ही गिरते उसकी आँखें भी खुल जाती हैं । जब मिट्टी के समीप पहुँच जाता है, तब उसे ज्ञान होता है । तब वह समझ लेता है कि देह में मिट्टी के छू जाने से ही जान जायगी । तब वह चीख मारकर अपनी माँ की ओर उड़ने लगता है । मिट्टी से मृत्यु होगी, इसीलिए मिट्टी देखकर हुआ है । अब अपनी माँ को चाहता है । माँ उस ऊँचे आकाश में है । उसी ओर बेतहाशा उड़ने लगता है, फिर दूसरी ओर दृष्टि नहीं जाती ।
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"अवतारों के साथ जो आते हैं, वे नित्यसिद्ध होते हैं, कोई अन्तिम जन्मवाले होते हैं ।
(विजय से) “तुम लोगों को दोनों ही है, योग भी है और भोग भी । जनक राजा को योग भी था और भोग भी था । इसीलिए उन्हें लोग राजर्षि कहते हैं । राजा और ऋषि दोनों ही । नारद देवर्षि हैं, और शुकदेव ब्रह्मर्षि ।
“शुकदेव ब्रह्मर्षि हैं, शुकदेव ज्ञानी नही, पुञ्जीकृत ज्ञान की मूर्ति हैं । ज्ञानी किसे कहते हैं ? जिसे प्रयत्न करके ज्ञान हुआ है । शुकदेव ज्ञान की मूर्ति हैं, अर्थात् ज्ञान की जमायी हुई राशि है । यह ऐसे ही हुआ है, साधना करके नहीं ।”
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बातें कहते हुए श्रीरामकृष्ण की साधारण दशा हो गयी है । अब भक्तों से बातचीत कर सकेंगे ।
केदार से उन्होंने संगीत गाने के लिए कहा । केदार गा रहे हैं । उन्होंने कई गाने गाये । एक का भाव नीचे दिया जाता है –
“देह में गौरांग के प्रेम की तरंगें लग रही हैं । उनकी हिलोरों में दुष्टों की दुष्टता बह जाती है । यह ब्रह्माण्ड तलातल को पहुँच जाता है । जी में आता है, डुबकर नीचे बैठा रहूँ परन्तु वहाँ भी गौरांग-प्रेम-रूपी घड़ियाल से जी नहीं बचता, वह निगल जाता है । ऐसा सहानुभूतिपूर्ण और कौन है, जो हाथ पकड़कर खींच ले जाय ?"
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गाना हो जाने पर श्रीरामकृष्ण फिर भक्तों से बातचीत कर रहे हैं । श्रीयुत केशव सेन के भतीजे नन्दलाल वहाँ मौजूद थे । वे अपने दो-एक ब्राह्मभक्तों के साथ श्रीरामकृष्ण के पास ही बैठे हुए हैं ।
श्रीरामकृष्ण - (विजय आदि भक्तों से) - कारण(शराब) की बोतल एक आदमी ले आया था, मैं छूने गया, पर मुझसे छुई न गयी ।
विजय – अहा !
श्रीरामकृष्ण - सहजानन्द के होने पर यों ही नशा हो जाता है । शराब पीनी नहीं पड़ती । माँ का चरणामृत देखकर मुझे नशा हो जाता है, ठीक उतना जितना पाँच बोतल शराब पीने से होता है ।
(क्रमशः)

शब्दस्कन्ध ~ पद #.९३

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भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामीआत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामीअर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #.९३)*
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*९३. गरु ज्ञान । त्रिताल*
*ऐसा रे गुरु ज्ञान लखाया, आवै जाइ सो दृष्टि न आया ॥टेक॥*
*मन थिर करूँगा, नाद भरूँगा, राम रमूंगा, रस माता ॥१॥*
*अधर रहूँगा, करम दहूँगा, एक भजूंगा, भगवंता ॥२॥*
*अलख लखूंगा, अकथ कथूंगा, एक मथूंगा, गोविन्दा ॥३॥*
*अगह गहूँगा, अकह कहूँगा, अलह लहूँगा, खोजन्ता ॥४॥*
*अचर चरूंगा, अजर जरूंगा, अतिर तिरूंगा, आनन्दा ॥५॥*
*यहु तन तारूं, विषय निवारूं, आप उबारूं, साधन्ता ॥६॥*
*आऊँ न जाऊँ, उनमनि लाऊँ, सहज समाऊँ, गुणवंता ॥७॥*
*नूर पिछाणूं, तेजहि जाणूं, दादू ज्योतिहि देखन्ता ॥८॥*
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भा० दी०-यो जायते म्रियते वा, स परमात्मा न हि भवतीति मे गुरुणाऽहं बोधितोऽस्मि । अहमपि तं परमोपदेशमनुसरामि । तदुपदेशानुसारेणाऽनाहतनादं श्रृणोमि । रामभक्तिरसे ।रन्तुमभिलषामि । निर्मायिको भूत्वा कर्मराशीन् क्षपयिष्यामि । इन्द्रियातीतं परब्रह्माधिगच्छामि । अनिर्वचनीयमपि ब्रह्मज्ञानद्वारेणानुभवामि । वेदैर्ज्ञातव्यस्य ब्रह्मणो मननं करिष्यामि । सर्वैरलभ्यं तद् ब्रह्म समाधावहं पश्यामि । तदेव मे स्वरूपमिति न्चियेन तद् दृढीकरिष्यामि । निष्पाप: सन् स्वान्तरङ्गसाधनैरात्मानमुद्धृत्य निराधारे ब्रह्मणि विचरामि । दुर्धरं दुरवगाहं ब्रह्म बुद्धौ दधामि । संसार- सागरं तीर्खा परमानन्दमनुभवामि । नहि लोकान्तरं गन्तुमिच्छामि किन्तून्मनीमुद्राद्वारा प्राणान् विलाप्य तेज: स्वरूपं ब्रह्मसाक्षात्कृत्य ज्योति: पश्यन् सशरीरं ब्रह्मणि लयं गच्छामीति मदीया द्रढीयसी धारणागुरुकृपात: प्रादुरभूत् ।
उक्तं कठे-
यथोदकं शुद्ध शुद्धमासिक्तं तादृगेव आत्मा भवति गौतम॥ एवं मुनेर्विजानत भवति न संदृशे तिष्ठति रूपमस्य न चक्षुषा पश्यति कश्चनम् । हृदा मनीषा मनसाऽभिक्लृप्तो य एतद् विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥
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मेरे गुरु ने मुझे ऐसा ज्ञान दिया है कि जो जन्म-मरण वाला है, वह ब्रह्म नहीं होता । अतः मैं उसी ज्ञान का अनुसरण करूंगा । उस उपदेश के अनुसार अनाहत नाद का श्रवण करूंगा । भक्ति रस में ही रमण करूंगा । मायातीत होकर भक्ति के द्वारा कर्म-राशि को नष्ट कर डालूंगा, इन्द्रियातीत परब्रह्म को प्राप्त करूंगा । 
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जो कहने में नहीं आता, उस ब्रह्म को ज्ञान द्वारा अनुभव करूंगा । जो वेदों से भी नहीं जाना जाता उसका मनन करूंगा तथा मन, वाणी का अविषय जो ब्रह्म है, उसका साक्षात्कार करूंगा । जो सर्वसाधारण प्राणियों से अलभ्य है, उसको समाधि में साधनों से खोज कर अनुभव द्वारा “वह मैं ही हूं” ऐसी दृढ़ धारणा करूंगा । 
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निष्पाप होकर अन्तरंग साधनों से अपनी आत्मा का उद्धार कर के निराधार ब्रह्म में विचरण करूंगा । जो पचाने योग्य नहीं है और जो दुर्धारण है उसको भी बुद्धि में धारण करूंगा । मेरा लोकान्तर में गमन नहीं होगा । संसार को पार करके परमानन्द का अनुभव करूंगा । उन्मनी मुद्रा द्वारा प्राणों का विलाप न करके तेजःस्वरूप ब्रह्म को जान कर, ज्योति में ज्योति मिलाकर, ब्रह्म में लीन हो जाऊंगा । ऐसी मेरी दृढ़ धारणा गुरु कृपा से बनी है ।
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कठोपनिषद् में –
जिस प्रकार निर्मल जल में मेघों द्वारा सब ओर से वर्षाया हुआ पानी निर्मल जल जैसा ही हो जाता है, उसी प्रकार हे गौतमवंशी नाचिकेत ! एक मात्र ब्रह्म ही सब कुछ है । ऐसा जानने वाले मुनि का, संसार से पार हुए महापुरुष का, आत्मा ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है और भी लिखा है कि – उस ज्ञानी के प्राण इस शरीर को छोड़ कर कहीं बाहर नहीं जाते किन्तु यहां ही आकाश-स्वरूप ब्रह्म में लीन हो जाते हैं ।
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इस परमेश्वर का वास्तविक रूप अपने सामने प्रत्यक्ष विषय रूप में नहीं ठहरता, उसको कोई भी चर्म-चक्षुओं द्वारा नहीं देख पाता । मन से बारंबार चिन्तन करके ध्यान में लाया हुआ परमात्मा निर्मल और निश्चल हृदय में विशुद्ध बुद्धि के द्वारा देखने में आता है । जो इसको जानते हैं, वे अमर हो जाते है और आनन्दस्वरूप ब्रह्मभाव को प्राप्त हो जाते हैं ।
(क्रमशः)

*१८. साध को अंग ~ ११३/११६*

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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*१८. साध को अंग ~ ११३/११६*
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जगजीवन भगवत भगत, ए दोइ सदा अबंध ।
और बंधे भ्रम जेवड़े२, प्रव्रिति पावक दंध ॥११३॥
(२. जेवड़ा=मोटी रस्सी)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि भागवत और भक्त दोनों मुक्त हैं । और अन्य सब भ्रमित हैं जो अपनी प्रवृति से दहते रहते हैं ।
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जहां साध तहां रांमजी, जहां नांम तहँ रांम ।
कहि जगजीवन भगति हरि, प्रेम भगति निज ठांम ॥११४॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जहाँ साधु जन हैं वहाँ प्रभु भी हैं जहां स्मरण है वहाँ राम नाम भी है । भक्ति का स्वरुप ही परमात्मा है ।
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वांणी जांणी पिछांणी, जे व्रित सोई कांम ।
कहि जगजीवन साध कै, उर३ चिति४ रसनां५ रांम ॥११५॥
(३. उर=ह्रदय)   (४. चिति=मन)   (५. रसनां=जिह्वा) 
संतजगजीवन जी कहते हैं कि वाणी से ही व्यक्तित्व की पहचान होती है । जिसकी जैसी वृत्ति होती है उसका वैसा ही आचरण होता है साधु जन के हृदय मे चित में व जिह्वा पर राम नाम ही रहता है ।
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जगजीवन मीठा भजन, मीठा भाव अगाध ।
मीठा हरि गुन ऊचरै, ते निति६ मीठा साध ॥११६॥
{६. निति=नित्य(=सदा)}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि भजन मीठा है भाव मीठा है । जो नित्य मीठे हरि नाम का उच्चारण करते हैं वे ही सच्चे साधु जन हैं ।
(क्रमशः) 

*पीपहि के गुन पार न होई*

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*दादू दीये का गुण तेल है, दीया मोटी बात ।*
*दीया जग में चाँदणां, दीया चालै साथ ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ गुरुदेव का अंग)*
===========
*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
.
*काल पर्यो शत पन्द्रह बीसक,*
*द्वन्द्व मच्यो मरि है सब लोई ।*
*स्वामिन के सु दया मन में अति,*
*देत सदाव्रत आवत कोई ॥*
*पात भयो धन भूमि गड्यो बहु,*
*देत लुटाय न राखत सोई ।*
*कान सुने जितने परिचै कहि,*
*पीपहि के गुन पार न होई ॥१६३॥*
वि. स. १५२० का अकाल पड़ा था, उस समय अन्न की कमी से बड़े उपद्रव होने लगे थे । भूख से सब लोग मर रहे थे ।
.
पीपाजी के मन में तो अति दया थी । उन्होंने सदाव्रत देना आरम्भ कर दिया था । सबको भोजन व वस्त्रादि देते थे ।
.
उन दिनो भगवत् कृपा से भूमि में गड़ी हुई बहुत-सी धनराशि उनको मिल गई थी । उनने उस को भूखों को खिलाने और वस्त्रादि देने में खर्च कर दिया था । पास कुछ भी रक्खा था ।
.
जितने उनके चरित्रों का परिचय हमको अपने श्रवणों से सुनने को प्राप्त हुआ है, वे सब तो कह दिये हैं । बाकी पीपाजी के गुण तो अपार हैं, उनका पार तो कौन पा सकता है ।
(क्रमशः)

शनिवार, 28 अगस्त 2021

= १८० =

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*मैं जु चरण चित चाहना,*
*तुम सेवक-सा धारना ॥*
*तेरे दिन प्रति चरण दिखावना,*
*कर दया अंतर आवना ॥*
(#श्रीदादूवाणी ~ पद्यांश. २१)
==================
साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
साभार ~ ### स्वामी श्री नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, अजमेर ###
.
श्री दृष्टान्त सुधा - सिन्धु --- *४ पाद सेवन भक्ति*
##################
*सुमरण सह पद चिन्तन है पद सेवना ।*
*शिर पर पद राज धरे लखे पर देखना ॥*
*जो अपने को प्रिय उस ईश स्वरूप का ।*
*चरण ध्यान हिय करें सु परम अनूप का ॥*
.
*॥ उत्तम पाद सेवक भक्त पद नहीं त्यागते ॥*
उत्तम पद सेवक कभी, तजत पदों को नांहि ।
श्री लक्ष्मीजी निरंतर, रहती हरिपद मांहि ॥११६॥
दृष्टांत कथा – श्री लक्ष्मीजी सदा भगवान् के चरणों की सेवामें ही संलग्न रहती हैं । कभी भी भगवान् के पाद पद्मों की सेवा नहीं छोड़तीं । इससे ज्ञात होता है कि उत्तम पाद सेवक भक्त भगवान् के पाद पद्मों का त्याग नहीं करता ।
.
*॥ पाद सेवन भक्ति से महानता ॥*
ईश्वर पद सेवा किये, सेवक होत महान ।
हुये इसी से शेषजी, जाने सकल जहान ॥११७॥
दृष्टांत कथा – श्री शेषनागजी भगवान् की पाद सेवन भक्ति से ही महानता को प्राप्त हुये हैं, यह प्रसिद्ध है । इससे सूचित होता है कि भगवत् पाद सेवन भक्ति से महानता प्राप्त होती है ।

= १७९ =

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*दादू दुखिया तब लगै, जब लग नाम न लेहि ।*
*तब ही पावन परम सुख, मेरी जीवनि येहि ॥*
==================
साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
साभार ~ ### स्वामी श्री नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, अजमेर ###
.
श्री दृष्टान्त सुधा - सिन्धु --- *३ स्मरण भक्ति*
##################
*गुरु दादू 'रु कबीर की, काया भई कपूर।*
*रज्जब अज्जब देखिया, सर्गुण निर्गुण नूर॥*
*॥ उत्तम जापकों के शव भी अदृश्य ॥*
उत्तम जापक जनों के, शव भी लय होजात ।
नानक दादु कबीर के, पुष्प मिले प्रख्यात ॥११५॥
दृष्टांत कथा – नाम के उत्तम जापक तथा महान प्रचारक गुरु नानकजी, दादूजी और कबीरजी के शवों के स्थान में पुष्प ही मिले थे तीनों सन्तों के शव अदृश्य होगये थे, यह प्रसिद्ध है । इससे सूचित होता है कि उत्तम जापकों शव भी जलाने गाडने आदि योग्य नहीं रहकर अदृश्य ही होजाते हैं ।
.
*॥ स्मरण जनित सुख ॥*
सुमिरण सुख अति श्रेष्ठ सिद्धि भण्डार है । 
इसके सन्मुख स्वर्गानन्द असार है ॥
'नारायण' इसका नहिं वार न पार है । 
बुद्धि गलित होजाती करत विचार है ॥
सहन शक्ति संतोष साम्यता सत्यता । 
धारे मन के माँहि सु विषय अनित्यता ॥
'नारायण' जो तजे संग जग जनन का । 
आता है आनन्द उसे हरि भजन का ॥
.
*॥ नाम स्मरण की प्रेरणा ॥*
दीर्घ आयु एश्वर्य और यशवान भी । 
कवि कोविद कालज्ञ भूप बलवान भी ॥
जन्म मरण दुख लहैं सभी आत्मज्ञ विन । 
आत्म ज्ञान का हेतु भजे नित नाम किन ॥

*सकाम निष्काम का अंग १५९(१/४)*

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श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
.
*मन चित मनसा पलक में, सांई दूर न होइ ।*
*निष्कामी निरखै सदा, दादू जीवन सोइ ॥*
===============
*सकाम निष्काम का अंग १५९*
इस अंग में सकाम और निष्काम संबंधी विचार कर रहे हैं ~
.
सहकामी सौंघे सदा, निष्कामी निरमोल ।
जन रज्जब पाये परखि, समझे साधू बोल ॥१॥
सकामी सदा ही सस्ते रहते हैं, निष्कामी सदा अनमोल रहते हैं । समझे हुये संतों के वचनों से हम सकामी निष्कामी जनों की परीक्षा कर पाये हैं ।
.
सहकामी संकट सदा, निष्कामी निर्बंध ।
रज्जब आशा नाश ह्वै, अमर अनाशा कंध४ ॥२॥
सकाम को सदा दु:ख ही रहता है । निष्काम बंधन रहित रहता है । जब आशा नष्ट हो जाती है, तब आशा रहित शरीर४धारी ब्रह्म को प्राप्त होकर अमर होता है ।
.
आशा उलझी१ आसिरै२, निर आशा निरधार ।
रज्जब व रमति३ रली४, वह रमता की लार५ ॥३॥
आशा युक्त जीवात्मा जन, धन, धामादि का आश्रय२ लेकर उन्हीं में फंस१ जाती है । निराश जीवात्मा निराधार प्रभु परायण होती है । वह आशा युक्त तो संसार-भ्रमण३ करने वाले प्राणियों में मिल४ जाती है और वह आशा रहित सबमें रमने वाले राम के साथ५ हो जाती है अर्थात ब्रह्म को प्राप्त हो जाती है ।
.
सहकामी संसार बस, गुड़ी१ रूप उनहार२ ।
जन रज्जब निष्काम के, आभे३ का औतार४ ॥४॥
सकाम पतंग१ के समान२ है, जैसे पतंग उड़ाने पर आकाश में जाकर भी पृथ्वी पर ही बसता है, वैसे ही सकामी उंचा स्वर्गादि में जाकर भी पुन: पृथ्वी पर ही बसता है । निष्कामी बादल३ के जन्म४ के समान है, जैसे बादल आकाश में उत्पन्न होकर आकाश में ही लय हो जाते हैं । वैसे ही निष्कामी ब्रह्म में लय होता है ।
(क्रमशः)

*महाष्टमी के दिन राम के घर पर श्रीरामकृष्ण*

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*दादू जिन प्राणी कर जानिया, घर वन एक समान ।*
*घर मांही वन ज्यों रहै, सोई साधु सुजान ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ मध्य का अंग)*
===============
साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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(३)*महाष्टमी के दिन राम के घर पर श्रीरामकृष्ण*
.
आज रविवार, महाष्टमी है, २८ सितम्बर, १८८४ । श्रीरामकृष्ण देवी-प्रतिमा के दर्शन के लिए कलकत्ता आये हुए हैं । अधर के यहाँ शारदीय दुर्गोत्सव हो रहा है । श्रीरामकृष्ण का तीनों दिन न्योता है । अधर के यहाँ प्रतिमादर्शन करने के पहले आप राम के घर जा रहे हैं । विजय, केदार, राम, सुरेन्द्र, चुनीलाल, नरेन्द्र, निरंजन, नारायण, हरीश, बाबूराम, मास्टर आदि बहुत भक्त साथ में हैं; बलराम और राखाल अभी वृन्दावन में हैं ।
.
श्रीरामकृष्ण - (विजय और केदार को देखकर, सहास्य) - आज अच्छा मेल है । दोनों एक ही भाव के भावुक हैं ! (विजय से) क्यों जी शिवनाथ की क्या खबर है ? क्या तुमने –
विजय - जी हाँ, उन्होंने सुना है । मेरे साथ तो मुलाकात नहीं हुई परन्तु मैने खबर भेजी थी और उन्होंने सुना भी है ।
.
श्रीरामकृष्ण शिवनाथ के यहाँ गये थे, उनसे मुलाकात करने के लिए, परन्तु मुलाकात नहीं हुई । बाद में विजय ने खबर भेजी थी, परन्तु शिवनाथ को काम से फुरसत नहीं मिली, इसलिए आज भी नहीं मिल सके ।
श्रीरामकृष्ण - (विजय आदि से) – मन में चार वासनाएँ उठी हैं ।
"बैंगन की रसदार तरकारी खाऊँगा । शिवनाथ से मिलूँगा । हरिनाम की माला लाकर भक्तगण जप करें, मैं देखूँगा और आठ आने का कारण(शराब) अष्टमी के दिन तान्त्रिक साधक पीयेगा, मैं देखकर प्रणाम करूंगा ।"
.
नरेन्द्र सामने बैठे हुए थे । उनकी उम्र २२-२३ की होगी । ये बातें कहते कहते श्रीरामकृष्ण की नरेन्द्र पर दृष्टि पड़ी । श्रीरामकृष्ण खड़े होकर समाधिमग्न हो गये । नरेन्द्र के घुटने पर एक पैर बढ़ाकर उसी भाव से खड़े हैं । बाहर का कुछ भी ज्ञान नहीं है, आँखों की पलक नहीं गिर रही है ।
.
बड़ी देर बाद समाधि भंग हुई अब भी आनन्द का नशा नहीं उतरा है । श्रीरामकृष्ण आप ही आप बातचीत कर रहे हैं । भावस्थ होकर नाम जप रहे हैं । कहते हैं –
“सच्चिदानन्द ! सच्चिदानन्द ! कहूँ ? नहीं, आज तू कारणानन्ददायिनी है – कारणानन्दमयी । सा रे ग म प ध नि । नि में रहना अच्छा नहीं । बड़ी देर तक रहा नहीं जाता । एक स्वर नीचे रहूँगा ।
.
"स्थूल, सूक्ष्म, कारण और महाकारण । महाकारण में जाने पर चुप है । वहाँ बातचीत नहीं हो सकती ।
"ईश्वर कोटि महाकारण में पहुँचकर लौट सकते हैं । वे ऊपर चढ़ते हैं, फिर नीचे भी आ सकते हैं । अवतार आदि ईश्वर कोटि हैं । वे ऊपर भी चढ़ते हैं और नीचे भी आ सकते हैं । छत के ऊपर चढ़कर, फिर सीढ़ी से उतरकर नीचे चल-फिर सकते हैं । अनुलोम और विलोम । सात मंजला मकान है, किसी की पहुँच बाहर के फाटक तक ही होती है, और जो राजा का लड़का है, उसका तो वह अपना ही मकान है, वह सातों मंजिल पर घूम-फिर सकता है ।
(क्रमशः)

शब्दस्कन्ध ~ पद #.९२

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🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
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भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामीआत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामीअर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #.९२)*
.
*९२. ईश्‍वर चरित । त्रिताल*
*ये सब चरित तुम्हारे मोहना, मोहे सब ब्रह्मण्ड खंडा ।*
*मोहे पवन पानी परमेश्‍वर, सब मुनि मोहे रवि चंदा ॥टेक॥*
*साइर सप्त मोहे धरणी धरा, अष्ट कुली पर्वत मेरु मोहे ।*
*तीन लोक मोहे जगजीवन, सकल भुवन तेरी सेव सोहे ॥१॥*
*शिव बिरंचि नारद मुनि मोहे, मोहे सुर सब सकल देवा ।*
*मोहे इन्द्र फणीन्द्र पुनि मोहे, मुनि मोहे तेरी करत सेवा ॥२॥*
*अगम अगोचर अपार अपरम्परा, को यहु तेरे चरित न जानैं ।*
*ये शोभा तुमको सोहे सुन्दर, बलि बलि जाऊँ दादू न जानैं ॥३॥*
.
भा० दी०-हे विश्वविमोहनप्रभो ! यदिदं दृश्यमानं त्वन्मायाकल्पितं जगदस्ति, तेन कार्येण सर्वेऽपि ब्रह्माण्डजीवा विमुह्यन्ति । हे परमेश्वर ! वायुर्जलं सूर्यश्चचन्द्रसप्तसमुद्राः पृथ्वी तद्धारकः शेषोऽष्टविधजातयो महीधरा: समेरुस्तथा त्रयोलोकास्तव मायया विमुग्धास्तवस्वरूपानभिज्ञाः सन्ति ।
हे जगजीवन ! तव सपर्यासंलग्नास्त्रिभुवनस्था: प्राणिनो मनोज्ञा भवन्ति । ब्रह्मशिवनारदादयः सुरगणा ग्रामदेवा इन्द्रादयो वासुकिशेषादिप्रभृतयश्च तव मायामोहान्वितास्तव स्वरूपं विस्मरन्ति । हे निर्मायिक प्रभो! भवान् परात्परोऽस्ति । भक्च्चरित्रं बुद्धिगम्यं न भवति । तस्येन्द्रियातीतत्वादपारत्वाच्च भवन्तं को हि विज्ञातुं प्रभवेत् । एतैश्चरितैर्भवानेव शोभते । अहन्तु भवन्तमाद्यन्तहीनं मन्यमानो भवच्चरणकमलयोः प्रणतोऽस्मि ।
उक्तमैतरेयोपनिषदि- आत्मा वा इदमन आसीत् । नान्यत्किंच नमिषत् ॥ स ईक्षते लोकानुसृजा इति । स इमॉल्लोकानसृजत । अम्भो मरीचीर्मरमापोऽदोऽम्भः परेण दिवं द्यौः प्रतिष्टात्तरिक्षमरीचयः पृथिवी मरो या अधस्तात्ता आपः ।
स ईक्षेतेमे नु लोका लोकपालान्नुसृजा इति ।
सोऽद्भय एव पुरुषं समुद्धृत्यामूर्छयत् ।
मुण्डकेऽप्युक्तम्-
एतस्माज्जायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि च ।
खं वायुर्योतिराप: पृथिवी विश्वस्य धारिणी ॥
अग्निर्मूर्धा चक्षुषी चन्द्रसूर्यो दिश: श्रोत्रे वाग् विवृतष्च वेदाः । वायुःप्राणो हृदयं विश्वमस्य पद्भ्यां पृथिवी होष सर्वभूतान्तरात्मा ॥
.
हे विश्व को मोहित करने वाले प्रभु ! जो कुछ यह दिखने वाला जगत् है, वह सब आपने अपनी माया से रचा है । इस कार्य को देख कर सारे ब्रह्माण्ड के प्राणी मोहित हो रहे हैं । हे परमेश्वर ! आपने वायु, जल, सूर्य, चन्द्रमा, सात समुद्र, पृथिवी तथा उसको धारण करने वाला शेष, अठारह प्रकार की जाति वाले सुमेरु आदि पर्वत, तीनों लोक, इन सबको आपने अपने माया से रचा है ।
.
इस कार्य से हे जगत् के जीवन स्वरूप परमात्मन् ! आप तो परात्पर हैं । आप के चरित को कोई बुद्धि से नहीं जान सकता है क्योंकि आप अपार और इन्द्रियातीत हैं । इन चरितों में आपकी शोभा उचित ही है । मैं तो आपके आदि, अन्त को न जानकर आपके चरण-कमलों नतमस्तक हूं ।
.
ऐतरेयोपनिषद में –
यह जगत् प्रकट होने से पहले एक मात्र परमात्मा ही था, उसके सिवा दूसरा कोई भी चेष्टा करने वाला नहीं था । उस परम-पुरुष परमात्मा ने निश्चय ही “इन लोकों की रचना करूं,” इस प्रकार विचार किया और उसने अम्भ(ध्युलोक) तथा उसके ऊपर के लोक मरीचि(अन्तरिक्ष लोक) मर(मृत्यु लोक) जल(पाताल) नीचे के लोक, इन सब लोकों की रचना की ।
.
ध्युलोक(स्वर्ग लोक) से ऊपर के लोक तथा उनके आधारभूत ध्युलोक को भी रचा । ये सब अम्भ नाम से कहलाये हैं । अन्तरिक्ष लोक(भुवलोक) ही मरीचि है । यह पृथ्वी ही मर(मृत्यु) लोक के नाम से कही गई है । जो पृथ्वी के नीचे भीतरी भाग में(स्थूल) पातालादि लोक हैं, वे जल के नाम से कहें गये हैं ।
.
उसने फिर विचार किया कि ये तो हुए लोक, अब लोकपालों की भी रचना मुझे अवश्य करनी चाहिये । यह विचार करके उस ने जल से ही हिरण्यगर्भ रूप पुरुष को निकाल कर उसे मूर्तिमान् बनाया ।
.
मुण्डक में – इसी परमेश्वर से प्राण उत्पन्न होता है तथा मन(समस्त इन्द्रिया) आकाश, वायु, तेज, जल, और संपूर्ण प्राणियों को धारण करने वाली पृथ्वी, ये सब उत्पन्न होते हैं ।
.
इस परमेश्वर का अग्नि मस्तक है, सूर्य चन्द्रमा दो नेत्र है, सब दिशायें दोनों कान है, और प्रकट वेद ही वाणी है, तथा वायु प्राण है । यह जगत् हृदय है । इनके दोनों पैरों से पृथ्वी उत्पन्न हुई है । यह ही सब प्राणियों का अन्तरात्मा है । यही भगवान् की माया है, जिससे सभी प्राणी मोहित हो रहे हैं ।
(क्रमशः)

*१८. साध को अंग ~ १०९/११२*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*१८. साध को अंग ~ १०९/११२*
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मांगि कह्यां मांगौ भगति, द्रवौ दया करि रांम ।
कहि जगजीवन प्रेम रस, सतसंगति हरि नांम ॥१०९॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि अगर प्रभु कुछ मांगने को कहे तो भक्ति मांगे और कहे कि हे प्रभु आप दया करें यह ही प्रेम रस है और परमात्मा से सत्संगति मांगे व प्रभु स्मरण मांगे ।
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सकल बस्तु११ का मूल हरि, रांम नांम आधार ।
कहि जगजीवन साध सब, एही अरथ बिचार ॥११०॥
(११. बस्तु=लौकिक पदार्थ)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि सभी वस्तु का मूल या उद्गम हरि है और आधार राम नाम है । सभी संत ऐसा ही विचारकर नाम स्मरण में ही लगे रहते हैं ।
.
उर मंहि अबिगत एक तत, आनंद रूपी नांम ।
कहि जगजीवन साध कै, अलख निरन्जन रांम ॥१११॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि साधु जन के ह्रदय में एक परम तत्त्व जिसका नाम आनंद है रहता है । और उन अलख निरंजन परमात्मा का नाम ही रहता है ।
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उभै अबंध१ दोइ सदा फल, बिरष बेलि बिन जांम ।
कहि जगजीवन साध हरि, निरभै निहचल ठांम ॥११२॥
(१. अबंध=न बाँधने योग्य)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि भागवत व भगत दोनों फल, बिना वृक्ष व बेल के जन्मते हैं । संत कहते हैं कि साधु जन व प्रभु भी निर्भय व निश्चल हो एक स्थान पर रहते हैं ।
(क्रमशः)

*ब्राह्मण आय कही इक स्वामिन*

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*है तो रती, नहीं तो नांहीं, सब कुछ उत्पति होइ ।*
*हुक्मैं हाजिर सब किया, बूझे बिरला कोइ ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ समर्थता का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*ब्राह्मण आय कही इक स्वामिन,*
*अन्न उपावन बैल दिवैये ।*
*तेलक छोकर पाँवन ल्यावत,*
*बैल दियो द्विज जाय उपैये ॥*
*बालक रोवत धाम गयो पितु,*
*सूरजसेन हि जाय कहैये ।*
*भूप पठावत जाहु उन्हों पहि,*
*आय पर्यो पग है घर जैये ॥१६२॥*
.
एक दिन पीपाजी स्नान करने गये थे । वहां एक ब्राह्मण रोता हुआ पीपाजी से बोला अन्न उत्पन्न करने के लिये मुझे एक बैल चाहिए । आप किसी से दिलवा दीजिये । बैल बिना हम सब भूखों मरेंगे ।
.
उसी समय एक तेली का लड़का अपने बैल को पानी पिलाने आया था । उसी बैल की नाथ पीपाजी ने ब्राह्मण के हाथ में पकड़ा दी और कहा - जाकर अन्न उत्पन्न करो ।
.
तेली का लड़का रोता हुआ घर गया । तब उसका पिता सूर्यसेन मल्ल के पास जाकर पुकारा ।
.
राजा ने कहा तुम पीपाजी के पास ही जाओ । तेली आकर पीपाजी के चरणों में पड़ गया । पीपा जी ने कहा - तेरा बैल तेरे घर पर ही है जाकर देख । उसने आकर घर पर देखा तो बैल घर पर ही सदा की भांति बँधा है ।
(क्रमशः)

शुक्रवार, 27 अगस्त 2021

= १७८ =

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*दादू दुखिया तब लगै, जब लग नाम न लेहि ।*
*तब ही पावन परम सुख, मेरी जीवनि येहि ॥*
==================
साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
साभार ~ ### स्वामी श्री नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, अजमेर ###
.
श्री दृष्टान्त सुधा - सिन्धु --- *३ स्मरण भक्ति*
##################
*॥ नाम जप का प्रत्यक्ष फल ॥*
नाम जाप का प्रत्यक्ष फल, कहीं सु देखा जाय ।
बचे विभूति सहज ही, माधव में मन लाय ॥११४॥
दृष्टांत कथा – कलकत्ते की बात है, विभूतिभूषण के मास्टर प्रायः लड़कों को बहुत पीटा करते थे और अपने जाति वालों को दूसरों से दूना पीटते थे । विभूतिभूषण और और उनके एक भतीजे मास्टर की जाति के थे । भतीजे को चौगुना पीटा जाता था । 
.
विभूतिभूषण पढ़ने में अच्छे थे । अपना पाठ प्रति दिन याद कर ही लिया करते थे । किन्तु एक दिन उनसे भी प्रमाद हुआ । मास्टर एक –एक लड़के से पाठ पूछते हुये और गलती पर उन्हें पीटते हुये आ रहे थे । विभूतिभूषण डर गये और उन्हें याद आया कि विपत्ति में भगवान् का 'माधव' नाम जपना चाहिये । 
.
वे जपने लगे; उनका भतीजा भी चुपके से उनके पास आकर बोला – 'आज तो बचाओ ।' विभूतिभूषण ने उसे भी चुपके से कहा – माधव – माधव जपो ।' ना मालुम मास्टर को क्या सूझा वह दोनों लड़कों को छोड़ कर आगे निकल गया । और फिर छुट्टी का घंटा हो गया । इससे सूचित होता है कि कहीं २ तो नाम जाप का फल प्रत्यक्ष भी देखा जाता है ।

= १७७ =

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*शरीर सरोवर राम जल, माहीं संजम सार ।*
*दादू सहजैं सब गए, मन के मैल विकार ॥*
==================
साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
साभार ~ ### स्वामी श्री नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, अजमेर ###
.
श्री दृष्टान्त सुधा - सिन्धु --- *३ स्मरण भक्ति*
##################
*॥ नाम स्मरण से बुरी आदतें भी छूट जाती हैं ॥*
खोटी आदत भी छुटे, नाम लिये सत ज्ञान ।
गाँजा और शराब तज, होगये सुखी महान ॥११३॥
दृष्टांत कथा – एक सेठ गाँजा पीने की आदत से लाचार थे । एक दिन एक सन्त के पास जाकर बोले _ 'भगवान् ! मेरी गाँजा पीने की आदत नहीं छूटती ।' सन्त – 'तुम रात को सोने से पहले दस हजार राम नाम का जप किया करो ।' सेठ ने वैसा ही किया । थोड़े ही दिनों में उसकी वह आदत सर्वथा छूट गयी ।
.
२. एक मुंशी थे तो बड़े ओहदे पर किन्तु उनमें शराब की बड़ी बुरी आदत थी इससे सब धन साफ़ होगया । एक दिन वे काशी के सन्त श्री श्यामचरणजी के पास गये और अपनी स्थिति भी बतलाई । सन्त ने कहा – 'राम राम' करो और कोई मार्ग नहीं है ।' मुंशी ने वैसा ही किया । फिर तो क्या था उनको बोतल से सदा के लिये ही छुट्टी मिल गयी । उपरोक्त दोनों कथाओं से ज्ञात होता है कि राम नाम स्मरण से बुरी आदतें भी छूट जाती हैं ।

*जतन का अंग १५८(९/१३)*

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*साँई को मिलबे के कारण,*
*त्रिकुटी संगम नीर नहाई ।*
*चरण-कमल की तहँ ल्यौ लागै,*
*जतन जतन कर प्रीति बनाई ॥*
(श्री दादूवाणी ~ पद ७१)

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श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*जतन का अंग १५८*
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स्वाति बूंद राखै शकति, साधु शब्द यूं राखि ।
रज्जब निपजहिं मुक्त मन, सब समझ्यों की साखि ॥९॥
जैसे स्वाति विंदु को शुक्ति यत्न से रखती है, समुद्र में रहने पर भी समुद्र का जल अपने में नहीं आने देती । तब ही मोती श्रेष्ठ बनता है । वैसे ही संतों के शब्दों को रखना चाहिये । सांसारिक वासना मन में नहीं आने देनी चाहिये । तब ही मन ज्ञान युक्त होता है समझे हुये सभी संतों की यही साक्षी है ।
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देही अरु दरियाव का, पाणी परसै नांहि ।
तो मन मोती नीपजै, सुरति१ सीप के मांहि ॥१०॥
जब समुद्र का जल मोती को स्पर्श नहीं करे, तब ही सीप में मोती अच्छा बनता है । वैसे ही शरीर का पानी वीर्य अर्थात काम वासना मन को स्पर्श नहीं करे तब ही ब्रह्माकार वृत्ति१ द्वारा मन श्रेष्ठ बनता है ।
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रे रज्जब आधान के, अबला१ चलै जत्न ।
तो सुत साबत नीपजे, आदम अजब रत्न ॥११॥
गर्भाधान की रक्षा के लिये नारी१ यत्न से चलती है । सब व्यवहार सावधानी से करती है, तब ही पुत्र ठीक तरह उत्पन्न होता है । वैसे ही जो सावधानी पूर्वक साधन से रहता है, वही मनुष्य अदभुत रत्न अर्थात ज्ञानी होता है ।
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रंचक१ रंचक ॠद्धि२ करि, राजा भरहिं भंडार ।
रज्जब बूंद हिं बूंद मिल, होत समुद्र अपार ॥१२॥
बिंदु बिंदु मिलकर समुद्र अपार बन जाता है । किंचित१ किंचित ऐश्वर्य२ से राजा अपना भण्डार भर लेता है वैसे ही थोड़े थोड़े साधन से व्यक्ति को महान ज्ञान होता है ।
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रज्जब जोड्या पषैन१ जुडै खजानूं, नीर रहै तुछ२ तेणि३ नडौ४ ।
शब्द ही शब्द साधु बड़ कहिये, ज्यों बूंद ही बूंद समुद्र बडौ ॥१३॥
पैसा१-पैसा जोड़ने से खजाना जुड़ जाता है । थोड़ा२ थोड़ा जल संग्रह होने पर उससे३ नाडा४(छोटी तलिया) बन जाता है । बिंदु बिंदु करके ही विशाल समुद्र बनता है । वैसे ही शब्दों ही शब्दों के विचार से संत महान कहलाता है ।
इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित जतन का अंग १५८ समाप्तः ॥सा. ४९९५॥
(क्रमशः)

*गृही ब्राह्मभक्त को उपदेश*

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*दादू जिन प्राणी कर जानिया, घर वन एक समान ।*
*घर मांही वन ज्यों रहै, सोई साधु सुजान ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ मध्य का अंग)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*गृही ब्राह्मभक्त को उपदेश*
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विजय - जी, आप कुछ उपदेश दीजिये ।
श्रीरामकृष्ण - (समाज-गृह के चारों ओर नजर डालकर सहास्य) - यह(ब्राह्मसमाज) एक तरह से अच्छा है । इसमें राब भी है और शीरा भी । (सब हँसते हैं ।) नक्श खेल जानते हो ? सत्रह से अधिक होने पर बाजी बरबाद हो जाती है । यह एक प्रकार का ताशों का खेल है । जो लोग सत्रह नुक्ताओं से कम में रह जाते हैं - जो लोग पाँच में रहते हैं, सात या दस में, वे होशियार हैं । मैं अधिक चढ़कर जल गया हूँ ।
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"केशव सेन ने घर में लेक्चर दिया था । मैंने सुना था । बहुत से आदमी बैठे थे । चिक के भीतर औरतें भी थीं । केशव ने कहा, 'हे ईश्वर, तुम आशीर्वाद दो कि हम लोग भक्ति की नदी में बिलकुल डूब जांय ।' मैंने हँसकर केशव से कहा, 'भक्ति की नदी में अगर बिलकुल ही डूब जाओगे, तो चिक के भीतर जो बैठी हुई हैं, उनकी दशा क्या होगी ? इसलिए एक काम याद रखना, जब डूबना है, तब कभी-कभी तट पर लग जाया करना । बिलकुल ही तलस्पर्श न कर लेना ।' यह बात सुनकर केशव तथा दूसरे लोग हँसने लगे ।
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"खैर, आन्तरिकता के रहने पर संसार में भी ईश्वर की प्राप्ति हो सकती है । 'मैं' और 'मेरा' यही अज्ञान है । हे 'ईश्वर, तुम और तुम्हारा’ यह ज्ञान है ।
"संसार में इस तरह रहो जैसे बड़े आदमियों के घर की दासी । सब काम करती है, बाबू के बच्चे की सेवा करके उसे बड़ा कर देती है, उसका नाम लेकर कहती है, यह मेरा हरि है । परन्तु मन ही मन खूब जानती है कि न यह घर मेरा है और न यह लड़का । वह सब काम तो करती है, परन्तु उसका मन उसके देश में लगा रहता है । उसी तरह संसार का सब काम करो, परन्तु मन ईश्वर पर रखो और समझो कि घर, परिवार, पुत्र सब ईश्वर के हैं । मेरा यहाँ कुछ भी नहीं है । मैं केवल उनका दास हूँ ।
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"मैं मन से त्याग करने के लिए कहता हूँ । संसार छोड़ने के लिए मैं नहीं कहता । अनासक्त होकर, संसार में रहकर, अन्तर से उनकी प्राप्ति की इच्छा रखने पर, उन्हें मनुष्य पा सकता है ।
(विजय से) “मैं भी आँखें मूंदकर ध्यान करता था । उसके बाद सोचा, क्या इस तरह करने पर(आँखें मूँदने पर) ईश्वर रहते हैं और इस तरह करने पर(आँखें खोलने पर) ईश्वर) नहीं रहते ? आँखें खोलकर भी मैंने देखा, सब भूतों में ईश्वर विराजमान हैं । मनुष्य, जीव-जन्तु, पेड़-पौधे, सूर्य-चन्द्र, जल-स्थल और अन्य सब भूतों में वे हैं ।
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"मैं क्यों शिवनाथ को चाहता हूँ ? जो बहुत दिनों तक ईश्वर की चिन्ता करता है, उसके भीतर सार पदार्थ रहता है । उसके भीतर ईश्वर की शक्ति रहती है । जो अच्छा गाता और बजाता है, कोई एक विद्या बहुत अच्छी तरह जानता है, उसके भीतर भी सार पदार्थ है, ईश्वर की शक्ति है । यह गीता का मत है । चण्डी में है, जो बहुत सुन्दर हैं, उसके भीतर भी सार पदार्थ है, ईश्वर की शक्ति है ।
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(विजय से) अहा ! केदार का कैसा स्वभाव हो गया है; आते ही रोने लगता है । दोनों आँखें सदा ही फूली हुई-सी दीख पड़ती हैं ।”
विजय - वहाँ केवल आप ही की बातें होती हैं और वे आपके पास आने के लिए व्याकुल हो रहे हैं ।
कुछ देर बाद श्रीरामकृष्ण उठे । ब्राह्मभक्तों ने नमस्कार किया । उन्होंने भी नमस्कार किया । श्रीरामकृष्ण गाड़ी पर बैठे । अधर के यहाँ श्री दुर्गा के दर्शन करने के लिए जा रहे हैं ।
(क्रमशः)

शब्दस्कन्ध ~ पद #.९१

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भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामीआत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामीअर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #.९१)*
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*९१. (फारसी) हित उपदेश । पंचम ताल*
*बाबा मर्दे मर्दां गोइ, ये दिल पाक कर्दम धोइ ॥टेक॥*
*तर्क दुनियाँ दूर कर दिल, फर्ज फारिग होइ ।*
*पैवस्त परवरदिगार सौं, आकिलां सिर सोइ ॥१॥*
*मनी मुरदः हिर्स फानी, नफ्स रा पामाल ।*
*बदी रा बरतरफ करदः, नाम नेकी ख्याल ॥२॥*
*जिंदगानी मुरदः बाशद, कुंजे कादिर कार ।*
*तालिबां रा हक, हासिल, पासबाने यार ॥३॥*
*मर्दे मर्दां सालिकां सर, आशिकां सुलतान ।*
*हजूरी होशियार दादू, इहै गो मैदान ॥४॥*
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भा० दी०-भक्तियुक्त: शुद्धान्त:करणो निर्मुक्तमाय: शान्तात्मा पुरुष एव सर्वपुरुषश्रेष्ठः । यत: संत्यक्तसंसारसङ्गो वाक्कायमनोभिर्भगवन्तमेव स्मरति सः । स एव मनुष्येषु बुद्धिमान् । स तु कर्तव्यं संपाद्य यो निचलेन चित्तेन विश्वम्भरं परमात्मानमेव स्मरति । किञ्च नश्वरपदार्थानां तृष्णां वासनाञ्च विहाय न दुष्कृतं कर्माचरति । किन्तु परोपकाररतो भवति जीवदवस्थायामेव निर्द्वन्द्वो भवेत् । प्रभुप्राप्त्यर्थ संसारोपरतो जायेत एतादृशैः साधनैरेव जिज्ञासुः सत्यफलमश्नुते । सर्वरक्षकपरमात्मैव सत्सुहृदस्ति । प्रभुप्राप्तिपथपथिकाः सन्त एव भवन्ति । त एव सन्त: प्रभुप्रेमिसाधकानामग्रगण्या मन्यन्ते ।प्रभुसमीपस्था अपि सावहिता भवन्ति । अस्मिन्नेव शरीरे इन्द्रियार्थान् जयन्ति । तानि विजित्य प्रभुसामीप्यमधिगच्छन्ति ।
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पुरुषों में श्रेष्ठ पुरुष वही है जो अपने अन्तःकरण को पवित्र करके शान्त वृत्ति से रहता है । संसार की आसक्ति को त्यागकर मन, वाणी, शरीर से सच्ची भक्ति द्वारा भगवान् का स्मरण करता है । कर्तव्य कर्म कर के निश्चित मन से विश्वम्भर परमात्मा का चिन्तन करता है, मनुष्यों में वह ही बुद्धिमान् है । जो निरहंकारी होता है ।
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नश्वर पदार्थों की तृष्णा और विषय-वासना को त्याग कर दुष्कृत कर्म नहीं करता, किन्तु परोपकार में लगा रहता है । जीवित अवस्था में ही मृतक की तरह निर्द्वन्द्व हो जाता है । प्रभुप्राप्ति के लिये संसार से उपराम रहता है । इन साधनों से ही जिज्ञासु सत्य स्वरूप फल को प्राप्त कर लेता है । सब का रक्षक परमात्मा ही सच्चा मित्र है ।
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संत ही प्रभु प्राप्ति के मार्ग के पथिक हैं । वे ही प्रभु-प्रेमी साधकों में अग्रणी सम्राट् होते हैं । प्रभु के पास रहते हुए भी सदा सावधान रहते हैं । इसी शरीर में इन्द्रियों पर विजय पाई जाती है । इन्द्रियों का जीत कर प्रभु के पास जा सकता है ।
(क्रमशः)