गुरुवार, 31 मार्च 2016

= १९३ =

卐 सत्यराम सा 卐
अपने अपने पंथ की, सब को कहै बढाइ ।
तातैं दादू एक सौं, अन्तरगति ल्यौ लाइ ॥ 
दादू द्वै पख दूर कर, निर्पख निर्मल नांव ।
आपा मेटै हरि भजै, ताकी मैं बलि जांव ॥ 
दादू तज संसार सब, रहै निराला होइ ।
अविनाशी के आसरे, काल न लागै कोइ ॥ 
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साभार ~ Anand Nareliya

स्वर्ग और पृथ्वी का आलिंगन—(प्रवचन—पैंसठवां)...osho
“यदि सम्राट और भूस्वामी इस निष्कलुष स्वभाव को शुद्ध रख सकें, तो सारा संसार उन्हें स्वेच्छा से स्वामित्व प्रदान करेगा।’

इस तरह के वचन कनफ्यूशियस को ध्यान में रख कर कहे गए हैं। क्योंकि कनफ्यूशियस समझा रहा था सम्राटों को, राजकुमारों को, भूस्वामियों को कि तुम इस तरह से जीओ, इस तरह का व्यवहार करो, इस तरह उठो, इस तरह बैठो; तुम्हारा आचरण, तुम्हारी नीति, तुम्हारा आदर्श ऐसा हो; तुम्हारा जीवन मर्यादा का जीवन हो; सब लोग देखें और तुम्हारे आचरण से प्रभावित हों; तुम्हारा उठना-बैठना भी शाही हो, वह भी साधारण न हो; तभी तुम लोगों के ऊपर स्वामित्व रख सकोगे।

लाओत्से कहता है, यह स्वामित्व झूठा है। लाओत्से कहता है कि यदि सम्राट और भूस्वामी अपने भीतर के निष्कलुष स्वभाव को शुद्ध रख सकें, तो सारा संसार उन्हें स्वेच्छा से स्वामित्व प्रदान करेगा।

यह एक अलग तरह का स्वामित्व है। जो इसलिए नहीं कि तुम्हारे आचरण से कोई प्रभावित होता है, इसलिए भी नहीं कि तुम्हारे व्यवहार से कोई प्रभावित होता है, बल्कि सिर्फ इसलिए कि तुम जैसे हो, तुम्हारा होना ही चुंबक है, तुम्हारा अपना स्वाभाविक होना ही आकर्षण है। पहला जो आकर्षण है, वह चेष्टित है, उसमें हिंसा है, उसमें दूसरे का ध्यान है। दूसरा जो आचरण है, वह चेष्टित नहीं है, वह प्रवाह है। और उसमें हिंसा नहीं है, उसमें दूसरे का कोई ध्यान नहीं है।

लाओत्से के अनुयायी एक बहुत अनूठी बात मानते रहे हैं। लाओत्से कहता था कि अगर एक गांव में चार आदमी भी मेरी बात समझ जाएं, और चार आदमी भी मेरी बात को समझ कर स्वाभाविक जीने लगें, तो पूरा गांव मैं बदल दूंगा। उन चार आदमियों को गांव में लोगों को बदलने जाने की जरूरत नहीं है। उन्हें किसी से कहने की भी जरूरत नहीं है कि तुम अच्छे हो जाओ। उनकी मौजूदगी लोगों को अच्छा करने लगेगी। वे जहां से गुजरेंगे, वहां उनकी हवा, उनका जादू काम करने लगेगा। और लोगों को कभी यह पता भी नहीं चलेगा कि कौन उन्हें बदल रहा है। क्योंकि लाओत्से कहता है, यह पता चल जाए कि कोई तुम्हें बदल रहा है तो इससे भी प्रतिरोध पैदा होता है।

बाप बेटे को बदलना चाहता है तो बेटा सख्त हो जाता है। पत्नी पति को बदलना चाहती है तो पति सख्त हो जाता है। क्योंकि अहंकार बदला जाना पसंद नहीं करता। कोई पसंद नहीं करता कि कोई आपको बदले। क्योंकि जैसे ही कोई आपको बदलता है, उसका मतलब हुआ कि वह आप जैसे हो उसको स्वीकार नहीं करता; वह आपको प्रेम नहीं करता। आप जैसे हो, अस्वीकृत हो। पहले वह कांट-छांट करेगा, पहले वह आपको अपने अनुकूल बनाएगा और फिर वह आपको पसंद करेगा। लेकिन दुनिया में कोई भी बदला जाना इसलिए पसंद नहीं करता। इसलिए बाप जब बदलने की कोशिश करता है बेटे को तो भूल करता है। शायद इसी कारण बेटा फिर कभी भी बदला नहीं जा सकेगा। और जब गुरु शिष्य को बदलने की कोशिश करता है तो बाधा खड़ी हो जाती है। जब नेता अनुयायियों को बदलने की कोशिश करते हैं तो अनुयायी नहीं बदलते, अनुयायी भी फिर नेता को बदलने की कोशिश में संलग्न हो जाते हैं। और अक्सर अनुयायी सफल हो जाते हैं और नेता हार जाते हैं। स्वाभाविक है, क्योंकि अनुयायी बहुत हैं और नेता अकेला है।

सुना है मैंने कि जब फ्रांस की क्रांति हुई तो पेरिस के एक मुहल्ले में जोर का उपद्रव मचा हुआ था और एक गिरोह आग लगाने जा रहा था। तो दो पुलिस के आदमियों ने, उस गिरोह में जो आदमी नेता जैसा मालूम पड?ता था, उसको पकड़ लिया। तो उसके वचन बड़े प्रसिद्ध हो गए हैं। उस आदमी ने कहा कि डोंट प्रिवेंट मी; लेट मी गो। आई हैव टु फालो दैट क्राउड, बिकाज आई एम देयर लीडर। रोको मत, मुझे जाने दो; क्योंकि मुझे इस भीड़ के पीछे जाना है, क्योंकि मैं उनका नेता हूं।

नेता को भीड़ के पीछे चलना पड़ता है। नेता अपने अनुयायियों का भी अनुयायी होता है। उसको देखना पड़ता है कि अनुयायी क्या चाहते हैं। नेता अनुयायियों को बदलने में लगे रहते हैं, अनुयायी नेताओं को बदल लेते हैं। बदलने की चेष्टा में हिंसा है। और इसलिए जो ज्यादा है संख्या में, वह जीत जाता है।

लाओत्से कहता है, अगर किसी को बदलने की कोशिश करनी पड़े तो वह आदमी काम का ही नहीं जो बदलने में लगा है। बदलाहट एक आंतरिक घटना है। और जैसे ही कोई व्यक्ति अपने स्वभाव के साथ जीता है, उसके पास जाकर आपकी श्वास की गति बदल जाती है, उसके पास जाकर आपके हृदय की धड़कन बदल जाती है, उसके पास जाकर आपके भीतर का सब कुछ बदलने लगता है। उसकी मौजूदगी!

सूफी फकीर इस तथ्य को स्वीकार करते रहे हैं। और इसलिए सूफी फकीरों का एक नियम रहा है कि किसी को पता मत चलने दो, चुपचाप रहे आओ। तुम्हारा चुपचाप रहना लोगों को बदलने में सुगमता देगा।

एक सूफी फकीर हुआ, झुन्नून। वर्षों तक वह शिष्यों में बैठा रहता था और एक नकली आदमी को गुरु बना कर बैठा दिया। वह गुरु शिक्षा देता था, समझाता था, और झुन्नून शिष्यों में बैठा रहता था। यह तो बहुत बाद में लोगों को पता चला कि यह आदमी झुन्नून नहीं है। फिर झुन्नून कौन है? पता चलने पर पता चला कि जो वर्षों से शिष्यों में बैठा रहता है। और जब उससे पूछा गया तो उसने कहा, इस भांति मैं तुमको आसानी से बदल सकता हूं। तुम्हारा ध्यान लगा रहता है वहां बोलने वाले पर और इधर मैं चुपचाप तुम्हारे पास।

लाओत्से कहता है कि अगर भूस्वामी, सम्राट, गुरु, नेता–वे जो लोगों को प्रभावित करते हैं–केवल अपने भीतर के स्वभाव के साथ जी सकें, तो संसार उन्हें स्वेच्छा से स्वामित्व प्रदान करेगा।

अभी तो उनको स्वामित्व बड़ी छीन-झपटी से लेना पड़ता है। अपने नेताओं की आप हालत देखें! किस बामुश्किल वे नेता बने रहते हैं, कितनी जद्दोजहद से नेता बने रहते हैं। आप लाख उपाय करो, वे नेता बने रहते हैं। हजार लोग उनकी टांगें खींच रहे हैं और वे नेता बने हुए हैं। उनका एक ही काम है चौबीस घंटे–कैसे नेता बने रहें। ऐसा लगता है कि कोई उनको नेता रखने को राजी नहीं है।

इसलिए आप देखते हैं, एक नेता पद से नीचे उतर जाए, फिर आपको पता ही नहीं चलता कि वह कहां गया। अखबारों में नाम नहीं, कोई खबर पूछता नहीं। अजीब स्वामित्व था यह भी कि कल अखबारों में बड़ी सुर्खी उसी नाम की थी; अब सिर्फ एक बार आपको पता चलेगा जब वे इस संसार को छोड़ेंगे। तब अखबार के एक कोने में खबर छपेगी कि उनका देहावसान हो गया। उसके पहले आपको अब पता चलने वाला नहीं है कि वे कहां हैं। यह स्वामित्व, यह नेतृत्व, यह प्रभाव बड़ा अदभुत मालूम होता है; कि पद से उतरते ही खो जाता है। जैसे व्यक्ति का कोई मूल्य नहीं है, सिर्फ पद का मूल्य है। असल में, पद की तलाश वे ही व्यक्ति करते हैं जिनके भीतर कोई मूल्य नहीं है। क्योंकि पद का मूल्य उनको मूल्य होने का भ्रम दे देता है; पद की गरिमा से वे गरिमायुक्त हो जाते हैं। पद से हटते से ही गरिमा खो जाती है; फिर उन्हें कोई पूछता नहीं।

लाओत्से कहता है कि अगर कोई व्यक्ति अपने निसर्ग के साथ जी रहा हो, जैसा परमात्मा ने, जैसा ताओ ने उसे चाहा है, जैसी उसकी नियति है उसके अनुकूल बह रहा हो, तो उसके पास एक स्वामित्व होता है, एक नेतृत्व, एक गुरुत्व, जो आरोपित नहीं है, जो चेष्टित नहीं है, जिसको उसने किसी के ऊपर डाला नहीं है, जो उसकी सहज मालकियत है। और तब उसे एक स्वामित्व मिल जाता है, जो संसार उसे स्वेच्छा से देता है।

= १९२ =

卐 सत्यराम सा 卐
मति मोटी उस साधु की, द्वै पख रहित समान ।
दादू आपा मेट कर, सेवा करै सुजान ॥ 
कछु न कहावै आपको, काहू संग न जाइ ।
दादू निरपख ह्वै रहै, साहिब सौं ल्यौ लाइ ॥ 
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साभार ~ Anand Nareliya

ताओ उपनिषाद (भाग–3) प्रवचन–64...osho 
हर आदमी अनूठा पैदा होता है। और हम आदर्श देते हैं उसको कुछ होने के कि तू यह हो जा! कठिनाई है मां-बाप की, क्योंकि उनको भी पता नहीं कि घर में जो पैदा हुआ है, वह क्या हो सकता है। किसी को भी पता नहीं। अभी तो वह जो पैदा हुआ है, उसको भी पता नहीं कि वह क्या हो सकता है। सारा जीवन अज्ञात में विकास है। तो मां-बाप की बेचैनी यह है कि कोई ढांचा क्या दें वे?

तो जो पहले लोग हो चुके हैं चमकदार, उनका ढांचा देते हैं कि तुम ऐसे हो जाओ। वह ढांचा फांसी बन जाता है। और वह ढांचा ही प्रकृति के प्रतिकूल ले जाने का कारण हो जाता है।

फिर हम ढांचे में ढाल कर व्यक्तियों को खड़ा कर देते हैं। वे फंसे हुए लोग हैं, जिनके चारों तरफ लोहे की जंजीरें हैं सख्त। उनमें से निकलना मुश्किल है। जब तक मनुष्यता यह स्वीकार न कर ले कि प्रत्येक व्यक्ति अनूठा है, और किसी की कापी न है और न हो सकता है। दो व्यक्ति समान नहीं हैं; हो भी नहीं सकते; होना भी नहीं चाहिए। अगर आप कोशिश करके राम हो भी जाएं, तो आप एक बेहूदा दृश्य होंगे, और कुछ भी नहीं। राम का होना तो एक बात है, आपका होना सिर्फ नकल होगा। झूठे होंगे आप। सच्चे राम होने का कोई उपाय नहीं। कारण? क्योंकि सच्चे राम होने के लिए बड़ी कठिनाई है। कठिनाई क्या है? यह नहीं कि राम होना बड़ा कठिन है। राम बिना कोशिश किए हो गए, इसलिए बहुत कठिन तो मालूम नहीं होता। या कि बुद्ध होना बहुत कठिन है? बुद्ध बिना कोशिश किए हो गए; कोई बहुत कठिन नहीं है। कठिनाई दूसरी है।

एक-एक व्यक्ति इतिहास, समय और स्थान के ऐसे अनूठे बिंदु पर पैदा होता है, उस बिंदु को दुबारा नहीं दोहराया जा सकता। वह बिंदु एक दफा आ चुका, और अब कभी नहीं आएगा। इसलिए कोई आदमी दोहर नहीं सकता। इसलिए सब आदर्श खतरनाक हैं।

फिर हम किसी व्यक्ति को स्वीकार नहीं करते हैं। हम सब का अहंकार है भीतर; वह सिर्फ अपने को स्वीकार करता है और अपने अनुसार सबको चलाना चाहता है। इस दुनिया में सबसे खतरनाक और अपराधी लोग वे ही हैं, जो अपने अनुसार सारी दुनिया को चलाना चाहते हैं। इनसे महान अपराधी खोजने कठिन हैं; भला आप उनको महात्मा कहते हों। आपके कहने से कोई फर्क नहीं पड़ता।

जब भी मैं कोशिश करता हूं कि किसी को मेरे अनुसार चलाऊं, तभी मैं उसकी हत्या कर रहा हूं। मेरे अहंकार को तृप्ति मिल सकती है कि मेरे अनुसार इतने लोग चलते हैं; लेकिन मैं उन लोगों को मिटा रहा हूं।

इसलिए वास्तविक धार्मिक गुरु आपको आपके निसर्ग की दिशा बताता है; आपको अपने अनुसार नहीं चलाना चाहता। आपको कहता है कि आप अपने अनुसार ही हो जाएं, और इस होने के लिए जो भी त्यागना पड़े और जो भी मुसीबत झेलनी पड़े, वह झेल लें। क्योंकि सब मुसीबतें छोटी हैं, अगर उस आनंद का पता मिल जाए, जो स्वयं के अनुसार होने से मिलता है। सब मुसीबतें छोटी हैं; उसकी कोई कीमत नहीं है। सब मुसीबतें आसान हैं।

और आप दूसरे के अनुसार बनने की कोशिश करते रहें, तो आप दुखी, और दुखी, और दुखी होते चले जाएंगे। कभी आपको आनंद की कोई झलक न मिलेगी।

आनंद की झलक का मतलब ही है कि मेरी प्रकृति और विराट की प्रकृति के बीच कोई तालमेल खड़ा हो गया, कोई हार्मनी आ गई। अब दोनों एक लय में बद्ध होकर नाच रहे हैं। मेरा हृदय विराट के हृदय के साथ लयबद्ध हो गया; मेरा स्वर और विराट का स्वर मिल गया; अब दोनों में जरा भी फासला नहीं है।

तो मुझे अपने ही अनुसार, अपने ही जैसा होना चाहिए। इसके लिए कोई मुझे सहायता नहीं देगा। सब इसमें बाधा डालेंगे; क्योंकि सब चाहेंगे कि उनके अनुसार हो जाऊं।

मां-बाप चाहते हैं; फिर स्कूल में शिक्षक हैं, वे चाहते हैं; फिर नेता हैं, फिर महात्मा हैं, फिर पोप हैं, शंकराचार्य हैं, वे चाहते हैं कि मेरे अनुसार हो जाओ। इस दुनिया में आपको चारों तरफ, जैसे बहुत से गिद्ध आप पर टूट पड़े हों, वे सब आपको अपना भोजन बनाना चाहते हैं। इसमें आप भूल ही जाते हैं कि आप सिर्फ अपने जैसे होने को पैदा हुए थे। पर एक बात तो पक्की है कि आप दुखी होते रहते हैं। उस दुख को ही पहचानें। अगर आप दुखी हैं, तो समझ लें कि यह पक्की है बात, आप निसर्ग के प्रतिकूल चल रहे हैं। दुख काफी सबूत है।

और जब आप दुखी होते हैं तो पता है, आप क्या करते हैं? आप जब दुखी होते हैं, तब आप वही भूल दोहराते हैं जिसके कारण आप दुखी हैं। तब आप किसी से पूछने जाते हैं कि कोई रास्ता बताइए, जिस पर मैं चलूं और मेरा दुख मिट जाए। वह आपको रास्ता बताएगा कोई न कोई। वह रास्ता उसका होगा। और हो सकता है, उस पर चलने से उस आदमी का दुख भी मिट गया हो। मगर वह रास्ता उसका होगा। और दूसरे का रास्ता आपका रास्ता नहीं हो सकता। आपको अपना रास्ता खोजना पड़ेगा।

आप दूसरों के रास्तों से परिचित हो लें, इससे सहयोग मिल सकता है। आप दूसरे के रास्तों को पहचान लें, इससे अपने रास्ते की खोज में सहारा मिल सकता है। लेकिन किसी दूसरे के रास्ते पर अंधे की तरह चले अगर आप, तो आपको अपना रास्ता कभी भी नहीं मिलेगा। कितने लोग महावीर के पीछे चले हैं, और एक भी महावीर नहीं हो सका। और कितने लोग बुद्ध के पीछे चले हैं, और एक भी बुद्ध नहीं हो सका। क्या कारण है? इतना अपव्यय हुआ है शक्ति का, कारण क्या है?

कारण एक है: आपका रास्ता किसी दूसरे का रास्ता नहीं है, और किसी दूसरे का रास्ता आपका रास्ता नहीं है। आत्माएं अद्वितीय हैं, और हर आत्मा का अपना रास्ता है।

तो क्या करें? अपने दुख को समझें, अपने दुख के कारण को खोजें कि मेरे दुख का कारण क्या है। उस कारण से हटने की कोशिश करें। रास्ते मत खोजें, दूसरों से जाकर मत पूछें। क्या है दुख का कारण आपका?

= १९१ =

卐 सत्यराम सा 卐
अध्यात्म
योग समाधि सुख सुरति सौं, सहजैं सहजैं आव ।
मुक्ता द्वारा महल का, इहै भक्ति का भाव ॥ ९ ॥ 
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! लय योग के द्वारा सुरति को लगाओ और सहजावस्था को प्राप्त होओ । इस प्रकार धीरे - धीरे अभ्यास द्वारा परमेश्वर की तरफ में लगाओ । यह मनुष्य देह मुक्तिरूपी महल का दरवाजा है । इस प्रकार परमेश्वर में भाव सहित प्रेमा भक्ति द्वारा लय लगाओ ॥ ९ ॥ 

सहज शून्य मन राखिये, इन दोनों के मांहि ।
लै समाधि रस पीजिये, तहाँ काल भय नांहि ॥ १० ॥ 
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! योग में तो मन को निद्र्वन्द्व कहिए, निर्विकल्प स्वरूप बना कर स्वस्वरूप में स्थिर करिये, किन्तु परमेश्वर में लय रूप समाधि द्वारा स्थिरता करके भक्ति द्वारा भगवद् दर्शन रूप अमृत का पान करिए । वहाँ फिर किसी भी प्रकार के काल का भय नहीं रहता । तात्पर्य यह है कि तत्वबोध लक्ष्य तो योग का भी वही है, किन्तु भक्तिरूप लय का मार्ग सुगम है ॥ १० ॥ 
(श्री दादूवाणी ~ लै का अंग)
चित्र सौजन्य ~ नरसिँह जायसवाल

= ज्ञानसमुद्र(तृ. उ. ६५-६) =

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स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - श्रीसुन्दर ग्रंथावली 
संपादक, संशोधक तथा अनुवादक ~ स्वामी द्वारिकादासशास्त्री
साभार ~ श्री दादूदयालु शोध संस्थान, 
अध्यक्ष ~ गुरुवर्य महमंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमारामजी महाराज
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*= ज्ञानसमुद्र ग्रन्थ ~ तृतीय उल्लास =*
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*अथ कुंभक नाम ~ छप्पय* 
*सूरयभेदन१ प्रथम, द्वितीय उज्जाई कहिये ।* 
*शीतकार पुनि त्रितिय, शीतली चतुरथ ग्रहिये ॥*
*पंचम है भस्त्रिका, भ्रामरी षष्ट सु जांनहुँ ।* 
*मूरछना सप्तमं अष्टमं, केवल मांनहुँ ॥*
*ये कुम्भक अष्ट प्रकार के, होइ पवन इम रोधनं ।* 
*तब मुद्राबंध लगाइ यहिं, प्रथम करै घट शोधनं ॥६५॥*
(१- ‘सूर्यभेदनमुज्जायी सीत्कारी सीतली तथा । 
भस्त्रिका भ्रामरी मूर्च्छा ह्नाविनीत्यष्ट कुंभका:’ ॥४४॥ इत्यादि ।)
*(आठ प्रकार के कुम्भक ये हैं-) १. सूर्यभेदन, २. उज्जायी, ३. शीत्कार, ४. शीतली, ५. भस्त्रिका, ६. भ्रामरी, ७. मूर्छना, और ८. केवल(ह्नाविनी) ।* योग ग्रन्थों में इन आठ प्रकार के कुम्भकों का वर्णन हुआ है । इनके साधन(अभ्यास) से प्राणवायु के अवरोध पर योगी का पूर्ण नियन्त्रण हो जाता है । इन कुम्भकों की साधना के बाद योगी को मुद्रा तथा बन्धों का भी अभ्यास करना चाहिये । इससे योगी के शरीर की बाह्याभ्यन्तर शुद्धि होती है । यह शुद्धि चित्तवृतिनिरोध में सहायक होती है ॥६५॥
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*अथ नादवर्णनं ~ दोहा*
*जबहिं अष्ट कुम्भक सधहिं, बाजै अनहद नाद ।* 
*दश प्रकार की धुनि सुनहिं, छूटहि सकल विसाद ॥६६॥*
(अब नाद का वर्णन करते हैं -) जब साधक को पूर्वोक्त अष्ट प्रकार के कुम्भकों का समयक् अभ्यास हो जाता है, तो उसके कानों में शरीरस्थ अनाहत नाद(अनहद नाद=बिना बजाये ही बाजै का शब्द) सुनायी पडने लगता है । यह नाद आठ प्रकार का है । इस नाद के अभ्यास से योगी के सभी चित्त विकार विनष्ट होने की स्थिति में पहुँच जाते हैं और चित्तनिरोध में यह पूर्ण सहायक है ॥६६॥     
(२- ‘‘अनाहतस्य शब्दस्य ध्वनिर्य उपलभ्यते ।
ध्वनेरन्तर्गत ज्ञेयं ग्येयस्यान्तर्गतं मनः । 
मनस्तत्र लयं याति तद्विष्णो: परमं पदम्’’ ॥१००॥ 
-हयोगप्रदीपिका उप० ४)
(क्रमशः)

= विन्दु (२)७३ =

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*#श्रीदादूचरितामृत*, *"श्री दादू चरितामृत(भाग-२)"*
लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज,
पुष्कर, राजस्थान ।*
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*= अथ विन्दु ७३ =*
*= टौंक संत संमेलन में दादूजी के अनन्त शरीर =*
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भोजन राशि अटूट होने का चमत्कार देखकर संमेलन में आये हुये सभी संप्रदायों के संतों ने दादूजी के कर-कमलों से प्रसाद लेने की इच्छा प्रकट करी और माधवकाणी को कहा कि - दादूजी के हाथों से हम सब को प्रसाद दिलाने की व्यवस्था करो, कारण, संत दादूजी तो साक्षात् ब्रह्मरूप ही हैं । कहा भी है
"परसादी मांगे सब भेखा, दादू ब्रह्मरूप कर देखा"
(जनगोपाल.)
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किंतु यह शंका स्वाभाविक होती है कि कुछ वैष्णव तो स्वयं पाकी होते हैं, वे किसी अन्य का हाथ लगने पर खाते ही नहीं हैं, उन्होंने दादूजी के हाथ का प्रसाद लेने की इच्छा क्यों करी होगी, इस पर भी कहा है -
"गुरु दयाकर छाया गेरी, मिटी चरम दृष्टि सब केरी "
(जनगोपाल.)
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माधवकाणी ने दादूजी के पास जाकर कहा - स्वामिन् ! यहां आये हुये सभी संप्रादायों के संत आप के कर-कमलों से प्रसाद लेने का आग्रह कर रहे हैं किंतु आप कैसे दे सकेंगे ? प्रसाद बांटने की स्थिति ऐसी होती है कि लोग बांटने वाले को चारों ओर से घेर लेते हैं । इस लिये मेरे विचार से तो आपको प्रसाद बांटने से कष्ट होगा ।
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तब दादूजी ने कहा - यदि सब संत चाहते हैं तब तो मुझे कोई कष्ट नहीं होगा । और प्रसाद बांट दिया जायगा । फिर माधवकाणी ने कहा - प्रसाद किस वस्तु का बांटा जाय ? दादूजी ने कहा चार मूठी लौंग ले आओ वे सब के लिये बहुत हैं ।
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माधवकाणी ने सब संतों को सूचित कर दिया कि दादूजी महाराज अपने कर-कमलों से प्रसाद सत्संग समाप्ति पर बांटेंगे, उस समय सब उपस्थित हो जायें उसके पश्चात् वे नहीं देंगे । फिर दादूजी की आज्ञानुसार चार मूठी लौंग दादूजी महाराज के पास लाकर रखदीं ।
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फिर सत्संग समाप्ति पर दादूजी प्रसाद बांट ने को खड़े हुये तब सब भेषधारी प्रसाद के लिये एक साथ ही झुकने लगे यह देखकर माधवकाणी उच्च स्वर से कहने लगे - आप लोग एक दूसरे को दबाते हुये झुकें नहीं, प्रसाद सब को मिलेगा, अधिक झुकने से वृद्ध संत नीचे दब जायेंगे ।
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उस समय टीलाजी ने भी दादूजी महाराज को कहा - गुरुदेव सभी भेष धारी प्रसाद के लिये आग्रह पूर्वक आगे बढ़ रहे हैं । इतने में ही दादूजी ने अपनी योग-शक्ति से अपने अनन्त शरीर बनाकर उसी क्षण में सब के हाथों में अपने हाथों द्वारा लौंग प्रसाद सब को दे दिया । उस समय बड़े-बड़े महन्त, आचार्य और परम-प्रवीण विद्वान संतों ने भी हठकर के प्रसाद लिया था । प्रसाद लेकर सब शाँतभाव से हट गये ।
(क्रमशः)

= स्मरण का अंग =(२/७-९)


॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥
"श्री दादू अनुभव वाणी" टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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= स्मरण का अँग २ =
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दादू नीका नाम है, सो तू हिरदै राखि ।
पाखँड प्रपँच दूर कर, सुन साधू जन की साखि ॥७॥
यज्ञ - योगादि साधनों के साधक को पतन का भय रहता है, नाम - साधना के साधक को नहीं । इसलिए नाम - स्मरण उत्तम साधन है । सँतों की साधन विषयक साखियें सुनकर उनके विचार द्वारा पाखँड प्रपँच को दूर करके तू वह नाम - स्मरण ही निरन्तर हृदय में रख ।
दादू नीका नाम है, आप कहै समझाइ ।
और आरँभ सब छाड़ि दे, राम नाम ल्यौ लाइ ॥८॥
स्वयँ भगवान् भी बारँबार अपने भक्तों को समझा - समझा कर कहते रहते हैं कि - "मेरे नाम चिन्तन द्वारा मेरे परायण रहने वाला भक्त ही मुझे प्रिय होता है ।" इस भगवद् वचन से भी नाम - स्मरण परम श्रेष्ठ साधन सिद्ध होता है । इसलिए जन्म - मरण रूप चक्र में फिराने वाले निषिद्ध कर्म, सकाम शुभकर्म आदि अन्य सभी आरँभों को त्याग कर राम नाम - स्मरण में ही अखँड वृत्ति लगा ।
राम भजन का सोच क्या, करताँ होइ सो होइ ।
दादू राम संभालिये, फिर बूझिये न कोइ ॥९॥
राम भजन के फल का, क्या विचार करना है ? भजन करने से जो होता है वही होगा अर्थात् राम ही प्राप्त होगा । राम भजन द्वारा सब सँसार में राम को ही देख, सब को राम रूप देखने का अभ्यास हो जाने पर फिर कोई भी प्रश्न पूछने की आवश्यकता नहीं रह जाती है ।
(क्रमशः)

बुधवार, 30 मार्च 2016

= १९० =

卐 सत्यराम सा 卐
दादू दया दयालु की, सो क्यों छानी होइ ।
प्रेम पुलक मुलकत रहै, सदा सुहागनी सोइ ॥
दादू बिगसि बिगसि दर्शन करै, पुलकि पुलकि रस पान ।
मगन गलित माता रहै, अरस परस मिलि प्राण ॥ 
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साभार ~ Anand Nareliya

स्वर्ग और पृथ्वी का आलिंगन—(प्रवचन—पैंसठवां)...osho
उपयोगिता का अर्थ यह है कि जो हम कर रहे हैं, उसका कोई उपयोग नहीं; कहीं जाना है, कहीं कोई मंजिल है, जिस तरह से हम पहुंच जाएं।

लेकिन लाओत्से कहता है कि ताओ मंजिल नहीं है। इसलिए उसने नाम दिया है ताओ। ताओ का अर्थ है दि वे, मार्ग। ताओ कोई मंजिल नहीं है कि जहां पहुंचना है। मार्ग ही ताओ है, मार्ग ही परमात्मा है। प्रतिपल मंजिल है। और प्रतिपल का उपयोग जो साधन की तरह करेगा वह उपयोगितावादी है, और जो प्रतिपल का उपयोग साध्य की तरह करता है वह उत्सववादी है। इस फर्क को ठीक से समझ लें। तब जीने के ढंग दो ढंग के हो सकते हैं। एक कि आप सब कुछ कर रहे हैं कहीं पहुंचने के लिए, और जहां पहुंचना है वह आगे है। अक्सर तो वहां कोई पहुंचता नहीं कभी, क्योंकि मरने तक हम टालते ही चले जाते हैं। और एक दूसरा रास्ता है कि जहां हमें पहुंचना है, वहां हम अभी हैं; अब हमें सिर्फ भोगना है, इस क्षण को।

आप मुझे सुन रहे हैं। आप दो ढंग से सुन सकते हैं। एक ढंग तो यह है कि मुझे सुन कर आपको कोई ज्ञान प्राप्त करना है, कि मुझे सुन कर आपको कुछ रास्ता निकालना है, कि मुझे सुन कर आप उसका कुछ उपयोग करेंगे। तो फिर आपका सुनना एक काम है। और दूसरा कि आप मुझे सुन रहे हैं, यह सुनना ही आनंद है। इससे कहीं पहुंचना नहीं, इससे कुछ उपयोग नहीं करना, इससे कोई ज्ञान इकट्ठा नहीं करना, कोई पंडित नहीं बन जाना, कहीं जाना नहीं। यह सुनने का जो क्षण है, यह आनंदपूर्ण है, यह एक उत्सव है। तब प्रतिपल आप आनंदित हैं। इसकी उपयोगिता बाहर नहीं है, भीतर है।

इसका यह अर्थ नहीं है कि इससे आपको लाभ न होगा; इससे ही लाभ होगा। क्योंकि प्रतिपल जो आपने आनंद लिया है, वही इकट्ठा हो जाएगा, उसकी राशि बन जाएगी। और जिसने टाला है, उसके हाथ खाली रह जाएंगे। क्योंकि जिसने प्रतिपल इकट्ठा नहीं किया, वह आखिर में इकट्ठा कैसे कर लेगा? क्षण तो खो जा रहे हैं।

लाओत्से बिलकुल गैर-उपयोगितावादी है। वह जो परम सत्य है, वह जो परम जीवन का तत्व है, गैरत्तराशी लकड़ी की तरह है; कोई उसका उपयोग नहीं कर सकता।

= १८९ =

卐 सत्यराम सा 卐
सदा लीन आनन्द में, सहज रूप सब ठौर ।
दादू देखै एक को, दूजा नाहीं और ॥ 
दादू जहँ तहँ साथी संग है, मेरे सदा अनंद ।
नैन बैन हिरदै रहै, पूरण परमानंद ॥ 
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साभार ~ Anand Nareliya
स्वर्ग और पृथ्वी का आलिंगन—(प्रवचन—पैंसठवां)...osho
परमात्मा का उपयोग करने की कभी भूल कर मत सोचना; जीवन का उपयोग करने की कभी भूल कर मत सोचना। जीवन को व्यर्थ गंवाना हो तो तरकीब है यह कि उसका कुछ उपयोग सोचना। और जीवन का सच में कुछ उपयोग कर लेना हो तो उपयोग की बात ही छोड़ देना, और जीवन को आनंद की तरह, उत्सव की तरह लेना।
लेकिन हम परमात्मा का भी उपयोग करते हैं। इसलिए जब हम दुख में होते हैं तब हम परमात्मा की तरफ जाते हैं। क्योंकि सुख में उसका कोई उपयोग नहीं है। क्या उपयोग है? सुख में कोई परमात्मा को याद नहीं करता। कोई जरूरत ही नहीं तो याद क्या करना!
मैंने सुना है, एक ईसाई घर में मां अपने बेटे से सुबह पूछ रही है कि रात तूने प्रार्थना की या नहीं? तो उसने कहा, रात तो कोई जरूरत ही नहीं थी, सभी कुछ ठीक था; प्रार्थना का कोई सवाल ही न था।
प्रार्थना तो हम तभी करते हैं…। आज ही मैं किसी का जीवन पढ़ रहा था। उसकी पत्नी कार में एक दुर्घटना में चोट खा गई। उसके पहले कभी वह चर्च नहीं गई थी। लेकिन इस रविवार को वह चर्च पहुंची। हाथ पर, पैर पर पट्टियां बंधी हैं। चर्च का पादरी भी चौंका, क्योंकि वह महिला कभी चर्च आई नहीं थी, पति सदा अकेला ही आता था। प्रवचन के बाद जब लोग चर्च से विदा होने लगे तो पादरी ने महिला को रोक कर कहा, क्या ज्यादा घबड़ा गई हो दुर्घटना से, क्योंकि चर्च आने का और कोई कारण नहीं दिखाई पड़ता।
दुख में जब हम होते हैं तो परमात्मा की याद आती है; क्योंकि अब उसका कुछ उपयोग हो सकता है। सुख में हम होते हैं तो हम उससे बचना ही चाहेंगे; कहीं उधार मांगने लगे, कुछ और उपद्रव…। परमात्मा भी मिलना चाहे आप जब सुख में हों, तो आप कहेंगे, अभी ठहरो, अभी कोई जरूरत नहीं। प्रार्थना करते हैं तो कुछ मांगने के लिए, स्मरण करते हैं तो कुछ मांगने के लिए।
लाओत्से कहता है, ध्यान रखना, उसका कोई भी उपयोग नहीं हो सकता। और जब तक तुम उपयोग की भाषा में सोचते हो तब तक तुम्हारा उससे कोई संबंध नहीं हो सकता। जिस दिन उपयोग की भाषा बंद और उत्सव की भाषा शुरू, उस दिन परमात्मा से संबंध हो जाता है। फिर चाहे मंदिर जाओ, न जाओ; फिर चाहे उसका स्मरण करो, न करो; फिर चाहे धर्म की ऊपरी व्यवस्था से तुम्हारा नाता बने, न बने; लेकिन जीवन को उत्सव में जो बदल लेता है, वह जीवन को प्रार्थना में बदल लेता है।



= १८८ =

卐 सत्यराम सा 卐
दादू यहु मन तीनों लोक में, अरस परस सब होइ ।
देही की रक्षा करैं, हम जनि भींटै कोइ ॥ ९२ ॥ 
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! शरीरधारी संसारिक जन, शरीर की पवित्रता और आचार - विचार का नाना प्रकार से विचार करके लोक - व्यवहार में छूआछूत का भाव दर्शाते हैं अर्थात् आडम्बर करते हैं । परन्तु यह मन त्रिलोकी में अच्छे बुरे नीचे - ऊँचे, सभी पदार्थों के साथ ओत - प्रोत होकर बर्ताव करता है । इस मन की स्थिति पर कोई संसारीजन ध्यान नहीं देते, बल्कि शास्त्रों का अध्ययन करने वाले पंडित भी इस मन को निषिद्ध वासनाओं से निग्रह नहीं कर पाते ॥ ९२ ॥ 
आसा तृष्णा चूहड़ी, काम क्रोध चांडाल । 
इन ऊपर चौका फिरै, तो सांचो आचार ॥ 

दादू देह जतन कर राखिये, मन राख्या नहीं जाइ ।
उत्तम मध्यम वासना, भला बुरा सब खाइ ॥ ९३ ॥ 
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! संसारिक लोग शरीर को अनेक साधनों की कसौटी दे - देकर कस लेते हैं, परन्तु मन को काबू में नहीं कर पाते । मन तो भला - बुरा, उत्तम - मध्यम सभी पदार्थों को संकल्पों के द्वारा भोगता रहता है । इसलिए शरीर की अपेक्षा मन को ही वश में करके रखना चाहिये । यह मन ही मनुष्य से अनर्थ करा देता है ॥ ९३ ॥ 
काया कसणी अनंत विधि, दे दे देही दंड । 
‘सुन्दर’ मन भाग्या फिरै, सप्त द्वीप नौ खंड ॥ 

सूरसेन पूजा करै, पीपै पूछी आइ । 
जीन करावत मूढ़ तहां, मोची के घर जाइ ॥ 
दृष्टान्त - १ ~ टोडा रायसिंह के राजा सूरसेन थे । उन्होंने पीपाजी महाराज से उपदेश ग्रहण किया था । बहिरंग लोगों के कहने से गुरुदेव पीपा जी महाराज में उसने श्रद्धा कम कर ली । पीपा जी महाराज ने विचार किया कि यह गुरु में अश्रद्धा करके नरक में जाएगा । इसलिये इसको उपदेश करना चाहिए । यह विचार कर महाराज राजभवन में आये । द्वारपाल पीपाजी से बोला कि राजा साहब की आज्ञा है कि कोई भी हमारी आज्ञा के बिना, अंदर न आने पावे । महाराज बोले ~ जाओ, उससे कह दो कि गुरु महाराज आये हैं । सूरसेन बोला ~ “बोल दो, अभी भगवान् की पूजा कर रहे हैं । ठहरो ।” द्वारपाल आकर बोला ~ राजा जी भगवान् की पूजा कर रहे हैं, आप ठहरो । उस समय पीपाजी महाराज ने अन्तर्वृत्ति होकर सूरसेन के मन को देखा कि चमारों के यहां घोड़े की जीन सिलाने का विचार कर रहा है । उस समय राजा हाथों से तो भगवान् की पूजा कर रहा था और मन में यह संकल्प करता था कि मेरे घोड़े की जीन फट गई, अभी पूजा के बाद मोची को बुलाकर जीन ठीक कराऊँगा । तब पीपा जी महाराज ने बाहर से आवाज दी “ मूर्ख ! क्या पूजा करता है ?” मन तो चमारों के यहां जीन - तोबरे सिला रहा है ?” यह सुनते ही राजा पूजा छोड़कर दौड़ा । पीपा जी महाराज के चरणों में नमस्कार किया और अपना अपराध क्षमा कराया । यही ब्रह्मऋषि सतगुरु कहते हैं कि “देह जतन करि राखिये, मन राख्या नहीं जाइ.” संसारिक पुरुषों से ।
शश चकोर मिल मीनि पै, गये करावन न्याव । 
ध्यान खोल नेरे लिये, खाये करके डाव ॥ 

दृष्टान्त ~ २ ~ एक(शश) खरगोश और चकोर में विवाद हुआ । खरगोश कहता है कि मैं भारी हूँ और चकोर अपने को भारी बताता था । उसी समय उन दोनों ने एक आँख मूँदे बिल्ली को देखा और सोचा कि वह कोई महात्मा है, हमारा न्याय कर देगी । उसके पास गये और अपने विवाद की बात बताई तो उसने अपनी आँखे खोलकर कहा - मेरे पास आओ, मैं तुमको बराबर कर दूँगी । खरगोश को भारी बताकर उसका माँस तोड़ खाया । फिर चकोर को भारी बताकर उसका माँस तोड़ खाया । इस प्रकार वह उनका बारी - बारी से माँस खाती जाती है । दार्ष्टान्त - बिल्ली ने शरीर को ध्यानस्थ कर रखा था, परन्तु मन तो दूसरों को मारने के विचार में ही लगा था । उक्त प्रकार का साधन भगवत् प्राप्ति का साधन नहीं हो सकता । तभी महाराज ने कहा है - “देह जतन कर राखिये, मन राख्या नहिंजाइ ।”
(श्री दादूवाणी ~ मन का अंग)
चित्र सौजन्य ~ नरसिँह जायसवाल

= ज्ञानसमुद्र(तृ. उ. ६३-४) =


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स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - श्रीसुन्दर ग्रंथावली 
संपादक, संशोधक तथा अनुवादक ~ स्वामी द्वारिकादासशास्त्री
साभार ~ श्री दादूदयालु शोध संस्थान, 
अध्यक्ष ~ गुरुवर्य महमंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमारामजी महाराज
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*= ज्ञानसमुद्र ग्रन्थ ~ तृतीय उल्लास =*
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*अधमे द्वादश मात्रा उक्तं ।* 
*मध्यम मात्रा द्विगुणा युक्तं ।* 
*उत्तम मात्रा त्रिगुणा कहिये ।* 
*प्रणायाम सु निर्णय लहिये१ ॥६३॥*
{१- ‘प्रथमे द्वादशी मात्रा मध्यमे द्विगुणा मता । 
उत्तमे त्रिगुणा प्रोक्ता प्राणायामस्य निर्णय:’ (गोरक्ष पद्धति, २.श०, ५.श्‍लो,) पूरक में १२, कुम्भक में १६, रेचक में१०, यह कनिष्ट । और इसकी द्विगुणी २४, ३२, २० । मध्यम । और तिगुणी ३६, ४८, ३० उत्तम ।}
यह १२ मात्रा की विधि(१२, १६, १०) साधारण(कनिष्ठ) कहलाती है । यदि योगी इसी विधि को(अभ्यासपूर्वक) द्विगुणित कर दे(अर्थात्२४, ३२, २० कर दे) तो यह मध्यम विधि कहलाती है । और उसे यदि धीरे धीरे त्रिगुणित (३६, ४८, ३०) कर दे तो यह उत्तम है । इस तरह प्राणायाम विधि के उत्तम, मध्यम, और कनिष्ठ भेद जानने चाहिये ॥६३॥ (यह श्रीगोरखनाथजी का मत हुआ) । 
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*सोरठा*
*कुम्भक२ अष्ट सु विद्धि, दश ही प्रकार की ।* 
*बंध तीन तिनि मद्धि, उत्तम साधन योग के ॥६४॥*
(२- आठ प्रकार के कुम्भक के भेद, ‘हठयोगप्रदीपिका’ ग्रन्थ के उपदेश २ श्‍लो० ४४ से ७८ तक है ।)
योग के उत्तम साधनों में, योगी को आठ प्रकार के कुम्भक, दस प्रकार की मुद्राओं तथा उन्हीं के अन्तर्गत तीन बन्धों का ज्ञान अत्यन्त आवश्यक है ॥६४॥
(क्रमशः)

= विन्दु (२)७२ =

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*#श्रीदादूचरितामृत*, *"श्री दादू चरितामृत(भाग-२)"*
लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज,
पुष्कर, राजस्थान ।*
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*= विन्दु ७२ =*
*= सत्संग संकीर्तन =*
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भगवद् विश्वास पूर्वक भजन करने की प्रेरणा करते हैं - हे पागल ! सत्य स्वरूप प्रभु का भजन मत छोड़, वे पूर्ण प्रभु सबकी इच्छा पूर्ण करने वाले हैं । उन्होंने तुझे उत्पन्न किया है, इससे उनको तेरे भरण-पोषण की सारी चिन्ता है और वे तुझे देने में सदा वीर रहते हैं ।
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गर्भवास में जिन्होंने जठराग्नि के पास रहने पर भी उसकी तप्त से तुझे अलग रख कर युक्ति पूर्वक शीतलता सिंचन करते हुये माता के खान-पानादि से प्राणों का आधार भोजन दिया था देख, क्रौंच पक्षी कहां अण्डा धरता है और कहां संचार करता है, वहां हिमालय में प्रभु को छोड़ कर उसका रक्षक कौन है ? हिम नष्ट करता है, वहां भी जो प्रभु क्रौंच के अण्डों की रक्षा करते आ रहे हैं, वे ही हमारे स्वामी हैं ।
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जल, स्थल और नभ में जितने भी जीव हैं, उन सबका भरण-पोषण करते हैं । अरे ! तू नर होकर भी क्यों दुःखी१ हो रहा है ? वे प्रभु तो शिला के बीच, जहां पहुँचाने का कोई मार्ग भी नहीं होता है, वहां भी शक्कर खाने वाले कीट को शक्कर पहुंचा देते हैं । जिन प्रभु ने यह सृष्टि रचना का भार अपने ऊपर लिया है, वे ही निर्वाह भी करेंगे । उन प्रभु को एक क्षण भी मत भूल, इसी से तेरा जीवन सार्थक होगा ।
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इस पद को सुनाकर माधवकाणी का धैर्य बढ़ाया । फिर बोले - "आपने जो-जो भोजन सामग्री बनाई है, उसमें से थोड़ी-थोड़ी सब एक ही थाल में यथा स्थान रखकर ऊपर एक शुद्ध श्वेत वस्त्र से ढंककर यहां ले आओ ।" माधव काणी - जो आज्ञा कहकर भंडार में गये और उक्त प्रकार सब वस्तुयें थाल में सजा कर दादूजी के पास ले आये ।
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फिर दादूजी ने प्रभु से प्रार्थना करके कि - आप अपने भक्त माधव की लज्जा अवश्य रखिये । भक्तों के लिये तो आप ही कल्पवृक्ष हैं । ऐसी प्रार्थना करके दादूजी ने परिचय भोग लगाया अर्थात् प्रभु के प्रकट होने पर भोग लगाया क्योंकि परिचय भोग का ही महान् माहात्म्य है, जैसे -
"परिचय सेवा आरती, परिचय भोग लगाय ।
दादू उस सु प्रसाद की, महिमा कही न जाय ॥"
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फिर वह प्रभु का भोगरूप प्रसाद माधव काणी को देकर कहा - यह थाल का प्रसाद आप अपने भंडार की भोजन राशि की जो जो वस्तु इसमें है वह वह उसी वस्तु में मिलादें फिर आप अपनी इच्छानुसार जिमायें व बाँटे कुछ भी कमी नहीं आयेगी । कहा भी है -
"परसादी ले गंज(राशि) में राखी,
भयो अटूट सन्त सब साखी ।"
(जनगोपाल)
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अर्थात् दादूजी के द्वारा भोग लगाने के पश्चात् भोग थाल का प्रसाद गंज(भोजन राशि) में मिला देने के पश्चात् वह भोजन ही अटूट हो गया । जो पहले एक दिन के लिये भी बहुत कम प्रतीत हो रहा था, वही फिर उत्सव के सात दिन तक चलता रहा । संत, भक्त तथा गरीब आदि वहाँ आने वालों को खूब खिलाया और बाँटा पर उसमें कुछ भी कमी नहीं आई । कहा भी है -
"परिचय भोग लगाइया, स्वामी समर्थ राम ।
सात दिवस तक जीमिया, साधू सब ही धाम ॥"
इति श्री दादूचरितामृत विन्दु ७२ समाप्तः ।
(क्रमशः)

= स्मरण का अंग =(२/४-६)

॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥
"श्री दादू अनुभव वाणी" टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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= स्मरण का अँग २ =
.
मन प्रबोध
दादू नीका नाम है, तीन लोक तत सार ।
रात दिवस रटबौ करो, रे मन इहै विचार ॥४॥
४ - ९ में मन को नाम स्मरण का उपदेश दे रहे हैं - स्वर्ग, मृत्यु, पातालादि सभी विश्व का सार तत्व जो परमात्मा है, उसकी प्राप्ति के सभी साधनों में नाम स्मरण ही अति श्रेष्ठ और सुगम साधन है । अत: हे मन ! इस मनुष्य शरीर में रहते हुए विचार पूर्वक कामादि दोषों को त्याग कर निरन्तर नाम - जप किया कर ।
दादू नीका नाम है, हरि हिरदै न विसार ।
मूरति मन माँहीं बसे, श्वासैं श्वास संभार ॥५॥
नाम - स्मरण में देश कालादि नियम न होने से यह साधन सबके लिए अच्छा है । हृदय से हरि को न भूल, हरि की मूर्ति आत्म रूप से हृदय में स्थित है । श्वास - प्रश्वास के साथ स्मरण करते हुए हृदयस्थ हरि को देखने का यत्न कर ।
श्वासैं श्वास संभालताँ, इक दिन मिल है आइ ।
सुमिरण पैंडा सहज का, सद्गुरु दिया बताइ ॥६॥
श्वास - प्रश्वास के साथ स्मरण करने से एक दिन अवश्य प्रकट रूप से हृदय में आकर प्रभु मिलेंगे । ब्रह्म प्राप्ति रूप सहजावस्था की प्राप्ति का मार्ग भी स्मरण ही है, यह हमारे सद्गुरु ने प्रथम ही काँकरिया तालाब पर बता दिया था ।
(क्रमशः)

मंगलवार, 29 मार्च 2016

= १८७ =

卐 सत्यराम सा 卐
भाव भक्ति उपजै नहीं, साहिब का प्रसंग ।
विषय विकार छूटै नहीं, सो कैसा सत्संग ॥ 
बासण विषय विकार के, तिनको आदर मान ।
संगी सिरजनहार के, तिन सौं गर्व गुमान ॥
अंधे को दीपक दिया, तो भी तिमिर न जाय ।
सोधी नहीं शरीर की, तासन का समझाइ ॥ 
===============================
साभार ~ Manoj Puri Goswami
निष्काम एवं संकल्प रहित कर्म योग-यात्रा को आगे बढ़ाते हैं 
--- गीता श्लोक 6।3 ~

गणित में 2+1=3 होता है, तीन में एक एवं दो, दोनों हैं लेकिन दिखते नहीं, ठीक इस तरह गीता का भी समीकरण है --- प्रकृति + पुरुष = मनुष्य, जिसमें न तो प्रकृति दिखती है और न पुरुष । गणित समीकरण के तीन में एक एवं दो को देखनें वाला बुद्धिबादी गणितज्ञ कहलाता है और गीता के समीकरण में मनुष्य में प्रकृति-पुरुष को देखनें वाला तत्त्व-ज्ञानी होता है । गीता सूत्र 6.3 कह रहा है --- योग में इच्छा-संकल्प की उर्जा नहीं होती -- इस बात को समझना चाहिए । योग क्या है ? किसी भी तरह से परमात्मा में रूचि पैदा करनें का मार्ग, योग है - जिसमें गुणों के तत्वों को समझ कर ऐसा बन जाना होता है की गुणों के तत्वों का स्वतः त्याग हो जाता है । 
यह यात्रा अंतहीन यात्रा है जिसका प्रारम्भ तो है लेकिन कोई अंत नहीं । योग सिद्धि से बैराग्य मिलता है जिसमें गुणों के तत्वों का त्याग हो जाता है लेकिन अहंकार एक मात्र तत्त्व ऐसा है जो पुनः योग को खंडित कर देता है । योग खंडित होना क्या है ?
योगी जब अपनें प्रसंशकों से घिरता जाता है तब उस पर राजस-तामस गुणों का प्रभाव एवं अहंकार का असर दिखने लगता है और इस स्थिति को कहते हैं --- योग खंडित होना ।
बिषय से बैराग्य तक की यात्रा कर्म-योग की यात्रा है जो एक सुलभ यात्रा है लेकिन बैराग्य से आगे की यात्रा ज्ञानकी यात्रा है जो परा भक्ति में प्रवेश कराती है । ज्ञान की यात्रा में गुण तत्वों का असर तो नहीं होता लेकिन जैसे - जैसे गुण तत्वों की पकड़ कमजोर होती जाती है, अहंकार और पैना होता जाता है , जो इस बात को समझकर चलते हैं, उनको बुद्धत्व मिलता है और जो नहीं चल पाते, वे योग का ब्यापार करनें लगते हैं । गीता गुणों का योग है, जहां -----
न भोग का स्वाद मिलता है
न चाह होती है
न अहंकार होता है
न सुख-दुःख होता है
न मन होता है और
न लक्ष्य का पता होता है ।
====ॐ=====

= १८६ =

卐 सत्यराम सा 卐
जहँ सेवक तहँ साहिब बैठा, सेवक सेवा मांहि ।
दादू सांई सब करै, कोई जानै नांहि ॥
दादू सेवक सांई वश किया, सौंप्या सब परिवार ।
तब साहिब सेवा करै, सेवक के दरबार ॥ 
==========================
साभार ~ Krishnacharandas Aurobindo

।। जय श्री राधे जय जगन्नाथ जय श्रीकृष्ण ।।
जगन्नाथस्वामी नयनपथगामी भवतुमे.....!!!
जगन्नाथजी का एकमात्र विग्रह ऐसा है की जो अतिप्राचीन है.....जिनके साथ कई संतों की कथायें जुडी हैं....!!
करमाबाई जाट की बेटी होकर भी उनके हाथ से भगवान प्रत्यक्ष प्रकट होकर खिचडी का भोग आरोगते थे.... और खिचडी का भोग पाने के लिये जगन्नाथजी ने उस माता करमाबाई को पुरी में बुला लिया था.......!!! जब वे वृध्द हो गई तो जिद करके कृष्ण-बलदाऊ करमा माता को बिना स्नान किये ही खिचडी बनाने को बाध्य करते.....!!! पुजारियो ने जब भगवान की माता करमाबाई के खिचडी के प्रति ऐसी(दिव्य) आसक्ति देखी तो रसोईघर के पीछे उनके रहने की व्यवस्था कर दी....!!!
कारे मुसलमान भक्त था....जिसे लोगों ने सीढ़ियों पर रोका था(ईन्दिरा को भी रोका था)...... तो कारे ने कातर स्वर से पुकारा.....
"कारे करारपर खडा तेरे दरबार विच।
अटकी हैं नाव अब तो जरा गौर किजिये।
हिंदुओं का नाथ तो हमारा कुछ दावा नहीं।
जगतका नाथ हौ अब तो सुध लिजिये।।"
तब तुरंत जगन्नाथजीने कारेको सीढ़ियों पर दर्शन दिये....!!
माधवदासबाबा को अतिसार हुआ था तो टट्टीमें लथपथ रहते थे..... कोई सेवा न करता...... तब भगवान ने प्रत्यक्ष होकर बहोत मना करने पर भी उनके शौच के वस्त्र धोना, स्नान कराना आदि किया...!! माधवदासजी ने बहोत प्रार्थना की शरीर पुरा करने की.... तब भगवान ने उनका १५ दिन का प्रारब्ध अपने उपर लिया....!!! तबसे हर साल १५ दिन दर्शन बंद होता है... कोई भोग नहीं लगता..... केवल दवा...!!!! ऐसी जगन्नाथजी की लीलायें कई हैं....!!! जयदेवजी के गीत-गोविंद के श्रीराधागोविंदजी के शृँगार के पदगान सुनकर ही रसिकशिरोमणी जगन्नाथ जी शयन करते हैं....!!!

साभार ~ हरि हरि
श्री जगन्नाथ मंदिर पुरी मेँ ~ 
श्री जगन्नाथ जी की महत्वपूर्ण लीला नव कलेवर अनुष्ठान क्रिया होने जा रही है.... नवकलेवर यानी नया शरीर। इसमें विश्वविख्यात जगन्नाथ मंदिर में रखे भगवान जगन्नाथ, बालभद्र, सुभद्रा और सुदर्शन की पुरानी मूर्ति को नई मूर्ति से बदला जाता है। इसका आयोजन तब होता है, जब हिंदू कैलेंडर में आषाढ़ के दो महीने होते हैं, जैसा कि इस साल हो रहा है। ऐसा संयोग 12 या 19 वर्षों में एक बार होता है। आखिरी नवकलेवर वर्ष 1996 में मनाया गया था। भगवान की नई मूर्तियां नीम की विशेष किस्म की लकड़ी से बनाई जाती है, इसे स्थानीय भाषा में दारु ब्रह्मा कहते हैं। इस समारोह में न सिर्फ मूर्तियां बदली जाती हैं बल्कि रहस्यमयी अनुष्ठान के जरिये 'ब्रहमा शक्ति' भी पुरानी मूर्ति से नई मूर्ति में स्थानांतरित की जाती है। 
इस प्रक्रिया की शुरुआत जगन्नाथ को दोपहर का भोग लगाने के बाद होती है। भगवान व उनके भाई-बहनों के लिए विशेष तौर पर 12 फुट की माला, जिसे धन्व माला कहते हैं, तैयार की जाती है। पूजा के बाद यह माला 'पति महापात्र परिवार' को सौंप दी जाती है, जो पुरी से 50 किलोमीटर दूर स्थित काकतपुर तक मूर्तियों के लिए लकड़ी खोजने वाले दल की अगुआई करते हैं। काकतपुर में मां मंगला का मंदिर है। वृक्षों की खोज पर निकला दल यात्रा के दौरान पुरी के पूर्व राजा के महल में रुकता है। सबसे बड़ा दैतापति(सेवक) मंदिर में ही सोता है और माना जाता है कि देवी उसके सपने में आकर उन नीम के वृक्षों की सही जगह की जानकारी देती हैं, जिनसे तीनों मूर्तियां बननी हैं।
ये कोई साधारण नीम के वृक्ष नहीं होते। चूंकि भगवान जगन्नाथ का रंग सांवला है, इसलिए जिस वृक्ष से उनकी मूर्ति बनाई जाएगी वह भी उसी रंग का होना चाहिए। हालांकि भगवान जगन्नाथ के भाई-बहन का रंग गोरा है इसलिए उनकी मूर्तियों के लिए हल्के रंग का नीम वृक्ष ढूंढा जाता है। जिस वृक्ष से भगवान जगन्नाथ की मूर्ति बनाई जाएगी, उसकी कुछ खास पहचान होती है, जैसे उसमें चार प्रमुख शाखाएं होनी जरूरी हैं। ये शाखाएं नारायण की चार भुजाओं की प्रतीक होती हैं। वृक्ष के समीप ही जलाशय, श्मशान और चीटियों की बांबी हो यह बहुत जरूरी होता है। वृक्ष की जड़ में सांप का बिल होना चाहिए और वृक्ष की कोई भी शाखा टूटी या कटी हुई नहीं होनी चाहिए। वृक्ष चुनने की अनिवार्य शर्त होती है कि वह किसी तिराहे के पास हो या फिर तीन पहाड़ों से घिरा हुआ हो। उस वृक्ष पर कभी कोई लता नहीं उगी हो और उसके नजदीक ही वरुण, सहादा और बेल के वृक्ष हों(ये वृक्ष बहुत आम नहीं होते हैं)। और चिह्निïत नीम के वृक्ष के नजदीक शिव मंदिर होना भी जरूरी है। 
मूर्तियों के लिए नीम के वृक्षों की पहचान करने के बाद एक शुभ मुहुर्त में मंत्रों के उच्चारण के बीच उन्हें काटा जाता है। इसके बाद इन वृक्षों की लकडिय़ों को रथों पर रखकर दैतापति जगन्नाथ मंदिर लाते हैं, जहां उन्हें तराशकर मूर्तियां बनाई जाती हैं। मूर्तियां बदलने का यह समारोह मशहूर रथ यात्रा से तीन दिन पहले होता है, जब 'ब्राह्मण' या पिंड को पुरानी मूर्तियों से निकालकर नई मूर्तियों में लगाया जाता है। मूर्तियां बदलना इतना आसान नहीं है और इसके लिए कड़े नियम होते हैं, जिनका पालन करना अनिवार्य है। नियमानुसार मूर्तियां बदलने के लिए चुने गए दैतापतियों की आंखों पर पट्टी बांध दी जाती है, पिंड बदलने से पहले उनके हाथ कपड़े से बांध दिए जाते हैं और लकड़ी की खोज शुरू होने के पहले ही दिन से उन्हें बाल कटवाने, दाढ़ी बनाने या मूंछ कटाने की अनुमति नहीं होती है। मध्यरात्रि में दैतापति अपने कंधों पर पुरानी मूर्तियां लेकर जाते हैं और भोर से पहले उन्हें समाधिस्त कर दिया जाता है। यह ऐसी रस्म है, जिसे कोई देख नहीं सकता और अगर कोई देख ले तो उसका मरना तय होता है। इसी वजह से राज्य सरकार के आदेशानुसार इस रस्म के दौरान पूरे शहर की बिजली बंद कर दी जाती है। अगले दिन नई मूर्तियों को 'रत्न सिंहासन' पर बैठाया जाता है.......
 जय श्री राधे जय जगन्नाथ जयश्रीकृष्ण 

= १८५ =

卐 सत्यराम सा 卐
(राग केदार)
म्हारा रे वाहला ने काजे, हृदये जोवा ने हौं ध्यान धरूं ।
आकुल थाये प्राण मारा, कोने कही पर करूँ ॥ टेक ॥
संभार्यो आवे रे वाहला, वेहला एहों जोई ठरूं ।
साथीजी साथे थइ ने, पेली तीरे पार तरूं ॥ १ ॥
पीव पाखे दिन दुहेला जाये, घड़ी बरसां सौं केम भरूं ।
दादू रे जन हरि गुण गाता, पूरण स्वामी ते वरूं ॥ २ ॥
===================================
साभार ~ वाया ~ Savita Savi Lumb "भगवान् श्रीकृष्ण"

भक्त शिरोमणी संत नरसी मेहता तथा ‘केदार’ राग का जादू...!

भगवान का नाम होश खोकर सुंदरता से आलापना ही उनकी चाह, ब्रह्मानंद था। भजन गाते केदार राग में वे रंग जाते। इस राग की रसमोहिनी से प्रत्यक्ष श्रीकृष्ण उन्हें अंकित हुए थे । 
इस राग से उन्होंने अनेकों के दुख दूर किए तथा कितने ही लोगों का सुख बढाया था। राग के स्वरों से सर्पदंश हुए एक हरिजन बालक के प्राण वापस आए थे । एक बार एक भला गृहस्थ ब्राह्मण नरसी के पास आया । बेटी की शादी हेतु धन कहां से लाया जाए यह चिंता उसे सता रही थी । नरसी ने उससे पूछा, ‘‘कितना धन चाहिए ?’’ ब्राह्मण ने डरते डरते उत्तर दिया, ‘‘५०० रुपये.’’ 
वे साहूकार के घर गए । लोभी तथा चाणाक्ष साहूकार को नरसी का भक्ति वैभव मालूम था । उनके केदार राग की कीर्ती उसने सुनी थी । उसने कहा, ‘‘पैसे देता हूं; किंतु धरोहर क्या रखोगे?’’ साहूकार ने एक मार्ग सुझाया, ‘‘तुम्हारा केदार राग धरोहर रखो । पैसा देता हूं ।’’ संत नरसी मेहता के पास वह ही एक मूल्यवान चीज थी। फिर भी ‘अब श्रीकृष्ण के प्रत्यक्ष दर्शन से वंचित रहुंगा । जीवन का सर्वश्रेष्ठ आनंद खो बैठुंगा’, यह विचार उनके मनमें नहीं था । उन्होंने कहा, ‘‘केदार राग धरोहर के रूप में रखो; किंतु ब्राह्मण को धन दो।’’ ‘ब्याज समेत पैसा वापस होने तक नरसी केदार राग भूले से भी गाएगा नहीं’, यह प्रमुख शर्त थी । 
मंगल कार्य संपन्न हुआ । उस आनंद के सामने अपने नुकसान की खंत संत नरसी को नहीं लगी । केदार राग के बिना भजन, कीर्तन शुरू था; किंतु मजा नहीं था, मन लग नहीं रहा था । भगवान के प्रत्यक्ष दर्शन बिना हृदय की प्यास बुझ नहीं रही थी । 
दिन-पर-दिन निकल गए; किंतु धन नहीं मिल रहा था। साहूकार का कर्जा नहीं उतर रहा था तथा केदार राग बंधमुक्त हुए बिना नरसीं को शांति नहीं मिल रही थी । उसी समय निंदकों ने भी उनकी भक्ति झूठी होने के आरोप किए । राजा द्वारा नरसीं को बुलाया गया । उनकी भक्ति की परिक्षा लेना तय हुआ- ‘राजमहल के एक कक्ष में श्रीकृष्ण की एक मूर्ति रखी गई । 
मूर्ति के हाथ में एक पुष्पहार दिया गया । उस मूर्तिके आगे नरसीं अपना भजन, कीर्तन करें । श्रीकृष्ण सजीव होकर नरसीं के गले में पुष्पहार पहनाए । यदि यह बात विशिष्ट कालावधिमें घटित नहीं हुई, तो नरसी के उपर लगाए आरोप सही मानकर शासन किया जाएगा ।’ यह राजाज्ञा नरसीं को सुनाई गई । नरसी अविचल थे ! उन्होंने कहा, ‘‘प्रभूकी इच्छा होगी वैसा ही होगा ।’’ नरसीं ने श्रीकृष्ण के सामने आसन जमाया, टाळवीणा ली । ‘नरसीं की भक्ति सच्ची अथवा निंदकों की आसुरी शक्ति सच्ची’, यह निर्णय लगना था । 
नटनागर को भक्तों की परिक्षा लेने का शौक ! नरसीं हेतु प्रकट होना, श्रीकृष्ण के लिए असंभव थोडे ही था ! केदार राग आलापे बिना श्रीहरी अपनी जगह से न हिले, क्या संत नरसी मेहता की साधना, भक्ति इतनी लूली-लंगडी, दुबली थी ? 
समय आगे-आगे जा रहा था । बीच रात का समय आया । नरसीं की कसौटी का क्षण दूर नहीं था । विरोधकों की आशाएं जागृत हुई । उसी समय नगरी में चमत्कार हुआ । साहूकार के दरवाजे पर हलकी सी थपकी हुई । नरसी मेहता की आवाज उसे सुनाई दी, ‘‘कृपा करके दरवाजा खोलिए ।’’ साहूकार ने स्वागत किया। नरसीं ने ब्याज एवं मूल रखा तथा कहा, ‘‘पैसे वापस करने में देर हुई । क्षमा करना । ‘केदार’ राग मुक्त हुआ ऐसी रसीद दो ।’’ 
साहूकार ने पैसे लिए तथा करार पत्र निकाला । पैसा पहुंचनेके हस्ताक्षर कर कागज संत नरसी मेहता को दे दिया । इधर भजन करते संत नरसी मेहता ने ऐसे ही आंख खोलकर कृष्णमूर्ति की तरफ देखा। उतने में एक कागज हलके से उनके सामने आया । ब्याज-मूल पहुंचने का साहूकार का हस्ताक्षर किया करारपत्र देंखकर नरसी अचंभित हुए ! उनके आनंदकी सीमा नहीं रही। श्रीकृष्णकी लीला अगाध थी । उनका केदार मुक्त हुआ था! नरसीं ने केदार राग में भजन आलापना आरंभ किया। 
केदार के स्वरों से एक अलग ही दिव्य स्वरभावविश्व निर्माण हुआ ।
श्रीकृष्ण की मूर्ति की चारों ओर एक तेजोवलय निर्माण हुआ । निंदकों का दिल धक से रह गया ! नरसीं की आखों से प्रेमाश्रू बहने लगे । इतनी देर जड अचेतन श्रीकृष्णमूर्ति सजीव हो गई तथा अपने हाथ की पुष्पमाला नरसीं के गले में डालने हेतु आगे बढने लगी । केदार की स्वलहरों से प्रसन्न हुए, भक्तों की लाज रखने वाले गिरधर नागर अपने भक्तके गले में माला पहनाकर क्षणार्ध में अंतर्धान हो गए......!

= ज्ञानसमुद्र(तृ. उ. ६१-२) =

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स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - श्रीसुन्दर ग्रंथावली 
संपादक, संशोधक तथा अनुवादक ~ स्वामी द्वारिकादासशास्त्री
साभार ~ श्री दादूदयालु शोध संस्थान, 
अध्यक्ष ~ गुरुवर्य महमंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमारामजी महाराज
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*= ज्ञानसमुद्र ग्रन्थ ~ तृतीय उल्लास =*
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*अथ गोरक्ष-उक्ति ~ चर्पट*
*सोहं सोहं सोहं हंसो ।* 
*सोहं सोहं सोहं अंसो ।* 
*स्वासो स्वासं सोहं जापं ।* 
*सोहं सोहं आपै आपं१॥६१॥*
(१-सोहं-हंसो ~ यह ‘हंस’ नाम का ‘अजपा’ गायत्रीमन्त्र है । ‘गोरक्षपद्धति’ शतक -१ के श्‍लोक ४२-४६ तक इसका वर्णन है । 
‘हकारेण बहिर्याति सकारेण विशेत्पुन: । 
हंसहंसेत्यमुं मंत्रं जीवो जपति सर्वदा ।’
‘अजपानाम गायत्री योगिनां मोक्षदायिनी’ । इत्यादि । 
‘योगचिन्तामणि’ आदि ग्रन्थों में भी इसका वर्णन है ।)
(परमसिद्ध महात्मा श्रीगोरखनाथजी कहते हैं-) जो योगी ‘सोहं-हंसो’ नामक ‘अजपा’ गायत्री मन्त्र का स्वास-स्वास पर जप करता है, अर्थात् हकार का उच्चारण करते समय स्वास को बाहर फेंकता है तथा सकार के उच्चारण के साथ स्वास अन्दर खींचता है तो वह योगी एक दिन मोक्ष पद प्राप्त कर लेता है, अर्थात् वह ‘सोहं’ स्वरुप योगज्ञान का अधिष्ठाता बन जाता है ॥६१॥
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*द्वादश मात्रा पूरक करणं ।* 
*द्वादश मात्रा कुंभक धरणं ।* 
*द्वादश मात्रा रेचक जाणं ।* 
*पूरबवत् सु विपर्यय ठाणं ॥६२॥* 
(गोरक्ष भगवान् का मत है-) पहले पूरक की मात्रा(बारह बार ॐ का उच्चारण) करनी चाहिये, फिर बारह मात्रा कुम्भक की और अन्त में बारह मात्रा ही रेचक की करनी चाहिये । फिर दूसरे प्राणायाम में यही विधि विपरीत गति से भी अपनानी चाहिये ॥६२॥
(क्रमशः)

= विन्दु (२)७२ =

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*#श्रीदादूचरितामृत*, *"श्री दादू चरितामृत(भाग-२)"*
लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज,
पुष्कर, राजस्थान ।*
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*= विन्दु ७२ =*
*= सत्संग संकीर्तन =*
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टौंक संत संम्मेलन में अपने शिष्यों के सहित दादूजी पधारे हैं, यह सुनकर संत तथा भक्त लोग बहुत संख्या में वहाँ आ गये थे । गृहस्थ तो अपने खाने-पीने का प्रबन्ध आपही करते थे किंतु संत भी बहुत आ गये थे ।
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माधवकाणी को इतना भरोसा नहीं था कि इतने अधिक संत पधार जायेंगे । उन्होंने जितने निमंत्रण दिये थे उनसे दुगनी सामग्री तो तैयार की थी किंतु अब आये हुये संत समुदाय को देखते हुये तो उनकी सामग्री तो कुछ भी नहीं थी अर्थात् बहुत कम ज्ञात होती थी ।
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यह देखकर माधवकाणीजी ने दादूजी के पास आकर प्रार्थना की - भगवन् ! इस समय मैं आपकी शरण आया हूं, आपके बिना अन्य कोई भी मेरी लाज बचाने वाला मुझे नहीं दीख रहा है । इस समय आपही मेरी लज्जा रख सकेंगे ।
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*= भोजन सामग्री अपार होना =*
माधवकाणी की बात सुनकर दादूजी ने कहा सब की लज्जा परमेश्वर रखते हैं, आपकी लज्जा भी वे रखेंगे किंतु आप यह तो बतायें, आपको इस समय क्या कष्ट है ? माधवकाणी ने कहा - भगवन् ! जन समुदाय को देखते हुये भोजन सामग्री अति अल्प है और अब पंक्ति का समय भी होने वाला है । मैं किसी भी प्रकार पंक्ति के समय तक इतनी सामग्री तैयार करने में असमर्थ हूँ ।
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माधवकाणी का उक्त वचन सुनकर परम योगेश्वर दादूजी महाराज ने कहा - चिन्ता मत करो, निरंजनदेव पास में ही हैं फिर यह पद सुनाया -
"जनि सत छाडे बावरे, पूरक है पूरा,
सिरजे की सब चिन्त है, देबे को शूरा ॥टेक॥
गर्भवास जिन राखिया, पावक तैं न्यारा ।
युक्ति यत्न कर सींचिया, दे प्राण अधारा ॥१॥
कुंज कहा धर संचरे, तहां को रखवारा ।
हिम हरते जिन राखिया, सो खसम हमारा ॥२॥
जल थल जीव जिते रहैं, सो सबको पूरे ।
संपट शिला में देत हैं, काहे नर झूरे१ ॥३॥
जिन यह भार उठाइया, निर्वाहे सोई ।
दादू छिन न विसारिये, तातैं जीवन होई ॥४॥
(क्रमशः)


सोमवार, 28 मार्च 2016

= १८४ =

卐 सत्यराम सा 卐
दादू मन भुजंग यहु विष भर्या, निर्विष क्योंही न होइ ।
दादू मिल्या गुरु गारड़ी, निर्विष कीया सोइ ॥ 
दादू जीव जंजालों पड़ गया, उलझ्या नौ मण सूत ।
कोई इक सुलझे सावधान, गुरु बाइक अवधूत ॥ 
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साभार ~ Manoj Puri Goswami 
~ आसान रास्ता~
एक बार एक डाकू गुरु नानक के पास गया और उनके चरणों में गिरकर बोला - 'मैं अपने जीवन से परेशान हो गया हूं। जाने कितनों को मैंने लूटकर दुखी किया है। मुझे कोई रास्ता बताइए ताकि मैं इस बुराई से बच सकूं।'
गुरु नानक ने बड़े प्रेम से कहा - 'यदि तुम बुराई करना छोड़ दो तो बुराई से बच जाओगे।' गुरु नानक की बात सुनकर डाकू बोला - 'अच्छी बात है, मैं कोशिश करूंगा।' यह कहकर वह वापस चला गया। कुछ दिन बीतने के बाद वह फिर उनके पास लौट आया और बोला - 'मैंने बुराई छोड़ने की बहुत कोशिश की, लेकिन छोड़ नहीं पाया। अपनी आदत से मैं लाचार हूं। मुझे कोई अन्य उपाय बताइए।'
गुरु जी बोले - 'अच्छा, ऐसा करो कि तुम्हारे मन में जो भी बात उठे, उसे कर डालो, लेकिन रोज-रोज दूसरे लोगों से कह दो।' डाकू को बड़ी खुशी हुई कि इतने बड़े संत ने जो मन में आए, सो कर डालने की आज्ञा दे दी। अब मैं बेधड़क डाका डालूंगा और दूसरों से कह दूंगा। यह तो बहुत आसान है। वह खुशी-खुशी उनके चरण छूकर घर लौट गया। कुछ दिनों बाद डाकू फिर उनके पास जा पहुंचा। गुरु नानक ने पूछा - 'अब तुम्हारा क्या हाल है?'
डाकू बोला - 'गुरुजी, आपने मुझे जो उपाय बताया था, मैंने उसे बहुत आसान समझा था, लेकिन वह तो निकला बड़ा मुश्किल। बुरा काम करना जितना मुश्किल है तो उससे कहीं अधिक मुश्किल है - दूसरों के सामने उसे कह पाना। इस काम में बहुत ज्यादा कष्ट होता है।' इतना कहकर डाकू चुप हो गया और फिर बोला - 'गुरुजी इसलिए अब दोनों में से मैंने आसान रास्ता चुन लिया है। मैंने डाका डालना ही छोड़ दिया है।' गुरु नानक मुस्करा दिए

= १८३ =

卐 सत्यराम सा 卐
मन के मतै सब कोई खेलै, गुरु मुख बिरला कोई । 
दादू मन की मानैं नहीं, सतगुरु का सिष सोइ ॥ 
दादू भक्त कहावैं आपको, भक्ति न जानैं भेव । 
सुपनै ही समझैं नहीं, कहाँ बसै गुरुदेव ॥
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साभार ~ Madhusudan Murari
सत्य को स्वंय से अधिक और कहीं भी नहीं पाया जा सकता।
स्वंय के संग की अद्भुत पराकाष्ठा को छुने वाले ही वास्तविक सत्संगी होते हैं। तत्वज्ञान के झूठे पुरोधा अवश्य ही पंचतत्वोँ का अपमान करते हैं। ये ऐसा ही है जैसे इंद्रियोँ का दमन करके कोई ईश्वर प्राप्ति की कुचेष्टा करे जो की दंम्भ की श्रेणी में आता है, पाखंड की श्रेणी में आता है।
वास्तविक सत्संग प्रेमी इस पोँगापंथी को क्षण भर में पहचान लेते हैँ क्योँकि वे जानते हैं सत्संगी होना नपुसंको(मानसिक रूप से) का काम नहीं है जो सम्मोहन को ही सत्संग समझ लेते हैँ। अस्तित्व की अखंड और अंतिम माँग है सत्संग। पुरुषार्थ की अंतिम उत्कृष्ट अभिलाषा है सत्संग। ये अभिलाषा सभी में जाग्रत नहीं होती और जिस में भी जाग्रत होती है स्वत: जाग्रत होती है। इसी वजह से धर्म और अध्यात्म हमेँशा कलंकित होता आ रहा है। पूरी संभावना है कि आगे भी कलंकित होता रहेगा