🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*कारज को सीझै नहीं, मीठा बोलै बीर ।*
*दादू साचे शब्द बिन, कटै न तन की पीर ॥*
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ओशो...
हमारे पास क्या है? ज्ञान के नाम पर हमारे पास शब्दों के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है।
किन्हीं के पास हिंदुओं के शब्द हैं, किन्हीं के पास मुसलमानों के शब्द हैं, किन्हीं के पास जैनों के शब्द हैं, किन्हीं के पास ईसाइयों के शब्द हैं। शब्दो के अतिरिक्त हमारे पास संपत्ति क्या है? अगर हम भीतर खोजने जाए तो शब्दों के अतिरिक्त हमारे पास क्या है? और शब्द का क्या मूल्य हो सकता है?
एक सम्राट के द्वार पर एक कवि ने एक दिन सुबह आकर सम्राट की प्रशंसा में कुछ गीत कहे, कुछ कविताएं कहीं।
फिर कवि तो रुकते नहीं शब्दों का महल बनाने में। वे तो कुशल होते हैं। उन्होंने, उस कवि ने सम्राट को सूरज बना दिया, सारे जगत का प्रकाश बना दिया।
उस कवि ने सम्राट को जमीन से उठाकर आसमान पर बिठा दिया उसने अपनी कविता में जितनी प्रशंसा कर सकता था, की। सम्राट ने उससे कहा, धन्य हुआ तुम्हारे गीत सुनकर। बहुत प्रभावित हुआ।
एक लाख स्वर्ण मुद्राएं कल तुम्हें भेंट कर दी जाएंगी। कवि तो दीवाना हो गया। सोचा भी न था कि एक लाख स्वर्ण मुद्राएं मिल जाएगी। आनंद विभोर घर लौटा, रात भर सो नहीं सका।
बार-बार खयाल आने लगा, एक लाख स्वर्ण मुद्राएं। क्या करूंगा। न मालूम कितनी योजनाएं बना लीं। कवि था, शब्दों का मालिक था। बहुत शब्द जोड़ लिए। सारी भविष्य स्वर्णमय हो गया सारा भविष्य एक सपना हो गया। जीवन एक धन्यता मालूम होने लगी।
सुबह जल्दी ही, सूरज अभी निकल ही नहीं पाया कि द्वार पर पहुंच गया राजा ने सम्राट ने बिठाया और थोड़ी देर बाद पूछा, कैसे आए हैं?
उस कवि ने पूछा, कहीं भूल तो नहीं गया सम्राट! पूछता है कैसे आए हैं उसने कहा कि पूछते हैं कैसे आया हूं? रात भर नहीं सो सका, क्या पूछते हैं आप? कल कहा था आपने की एक लाख स्वर्ण मुद्राएं भेंट करेंगे
सम्राट हंसने लगा, कहा, बड़े नासमझ हैं आप। आपने शब्दों से मुझे प्रसन्न किया था, मैंने भी शब्दों से आपको प्रसन्न किया था इसमें लेने-देने का कहां सवाल आता है?
कैसी एक लाख स्वर्ण मुद्राएं? आपने कुछ शब्द कहे थे, कुछ शब्द मैंने कहे थे। शब्द के उत्तर में शब्द ही मिल सकते हैं। स्वर्ण मुद्राएं? कैसे? तब कवि को पता चला कि शब्द अपने में थोथे हैं। उनके भीतर कोई कंटेंट नहीं हैं।
शब्द अपने आपमें पानी पर खींची गयी लकीरों से ज्यादा नहीं हैं। लेकिन हमारे पास क्या है? शब्दों के अतिरिक्त कुछ और है।
शब्दों पर हम जीते और लड़ते भी हैं। मैं कहता हूं, मैं हिंदू हूं। मैं कहता हूं, मैं मुसलमान हूं। कोई कैसे मुसलमान हो गया, कोई कैसे हिंदू हो गया?
कुछ शब्द हैं जो कुरान से लिए गए हैं, कुछ शब्द हैं जो गीता से लिए गए हैं। कुछ शब्द हैं जो इस मुल्क में पैदा हुए है, कुछ शब्द है जो उस मुल्क में पैदा हुए हैं।
और शब्दों को हमने इकट्ठा कर लिया तो एक तरफ के शब्द मुसलमान बना लेते हैं, दूसरे तरह के शब्द हिंदू बना लेते हैं, तीसरे तरह के शब्द जैन बना देते हैं। क्योंकि किसी के भीतर कुरान है, किसी के भीतर बाइबिल है, किसी के भीतर गीता है। शब्दों के अतिरिक्त हमारी संपदा क्या है?
और इन कोरे शब्द पर हम लड़ते भी है और जीवित आदमी की छाती में तलवार भी भौंक सकते है। मंदिर भी जला सकते हैं, मस्जिद में आग भी लगा सकते हैं। क्योंकि मेरे शब्द अलग है आपके शब्द अलग है।
आदमी शब्दों पर जी रहा है हजार वर्षों से और सोच रहा है कि शब्दों में कोई बल है, कोई संपदा है, कोई संपत्ति है। शब्द एकदम बोझ हैं, लेकिन शब्दों से भ्रम जरूर पैदा होता है।
जैसे उस कवि को भ्रम पैदा हुआ एक लाख स्वर्ण मुद्राओं का। रात भर उसे उसने गिनती की। हाथ में स्वर्ण मुद्राएं पड़ी। रात भर उसने सपने बनाए कि अब क्या करूं और क्या न करूं? कितना बड़ा भवन बनाऊं, कितना बड़ा रथ खरीदूं, कितना बड़ा बगीचा लगाऊं, क्या करूं, क्या न करूं? लेकिन हाथ में कुछ भी न था। एक लाख स्वर्ण मुद्रा का शब्द था। शब्द से उसने फैलाव कर लिया।
हमारे हाथ में क्या है? आत्मा, परमात्मा, मोक्ष, जन्म, जीवन, प्रेम, आनंद हमारे पास शब्दों के अतिरिक्त और क्या है?
लेकिन शब्द से जरूर भ्रम पैदा होता है। छोटा-सा बच्चा स्कूल में पढ़ता है, सी ए टी कैट, कैट यानि बिल्ली। बार-बार पढ़ता है, सी ए टी कैट, कैट यानि बिल्ली। सी ए टी कैट, कैट यानी बिल्ली। सीख जाता है, फिर वह कहता है कि मैं जान गया। कैट यानि बिल्ली। लेकिन उसने जाना क्या है? उसने दो शब्द जाने कैट भी एक शब्द है, बिल्ली भी एक शब्द है।
बिल्ली को जाना उसने? लेकिन वह कहता है कि मैंने जान लिया। कैट यानि बिल्ली। उसने दो शब्द जान लिए, दोनों का अर्थ जान लिया। शब्द भी शब्द हैं, अर्थ भी शब्द। और बिल्ली पीछे छूट गयी, वह जो जीवित प्राण है बिल्ली का। उसे उसने बिलकुल नहीं जाना, लेकिन वह कहेगा कि मैं जानता हूं कैट यानि बिल्ली। लेकिन बिल्ली को पता भी नहीं होगा कि मैं कैट हूं या बिल्ली हूं। बिल्ली के पता भी नहीं होगा कि आदमी ने मुझे क्या शब्द दे रखे हैं।
और आदमी जमीन पर न हो, तो बिल्ली का क्या नाम होगा? कोई भी नाम होगा। लेकिन बिल्ली फिर भी होगी। शब्द कोई भी न होगा, बिल्ली फिर भी होगी। आकाश में तारे होंगे, शब्द कोई न होगा। आदमी नहीं होगा तो। सूरज उगेगा लेकिन शब्द को नहीं होगा। वृक्षों में फूल खिलेंगे लेकिन कोई फूल गुलाब का नहीं होगा। कोई चमेली का नहीं होगा।
शब्द आदमी का इनवेंशन है, आदमी की ईजाद है। लेकिन शब्द से एक भ्रम पैदा होता है।
मैंने सीख लिया कि इस फूल का नाम गुलाब है तो मैं समझता हूं, मैं गुलाब को समझ गया? मैंने शब्द सीख लिया कि इस फूल का नाम गुलाब है तो मैं समझता हूं, मैं गुलाब को समझ गया? शब्द सीख लेने से गुलाब को समझने का क्या संबंध है?
लेकिन जो आदमी गुलाबों की जितनी जातियों का नाम जानता है, समझता हूं मैं गुलाबों का उतरा ही बड़ा जानकार हूं। जितने प्रकार के गुलाबों का नाम बता सकता है, कहेगा कि मैं उतना जानकार हूं। जानकार वह किस चीज का है--गुलाब का या शब्दों का, नामों का? हो सकता है, गुलाब से उसकी कोई पहचान ही नहीं हुई हो। गुलाब को उसने जाना ही न हो कभी? गुलाब से सौंदर्य ने उसे कभी पकड़ा ही न हो, गुलाब कभी उसकी आत्मा पर चित्र न बना हो, गुलाब कभी उसके भीतर प्रविष्ट न हुआ हो। कभी वह गुलाब के भीतर प्रविष्ट न हुआ हो। उसे गुलाब का कोई पता ही न हो, लेकिन वह कहता है, मैं जानता हूं क्योंकि इस फूल का नाम गुलाब है।
हम शब्द सीख रहे हैं, और शब्दों को ज्ञान समझ रखा है। आदमी को अज्ञान में बनाए रखने का सबसे बड़ा कारण है कि आदमी ने शब्दों को ज्ञान मान लिया है। जब तक शब्दों को ज्ञान समझा जाएगा तब तक मनुष्य जाति के जीवन में ज्ञान का कोई जन्म नहीं हो सकता है। शब्द ज्ञान नहीं है। सत्य शब्द के पीछे है, सत्य शब्द के पहले है। सत्य शब्द मिट जाते हैं तब भी शेष रह जाता है। सत्य को हम शब्द देते हैं लेकिन सत्य शब्द नहीं है। लेकिन यह भूल पैदा हो जाती है।
कोई मुझे मिलता है, मैं पूछता हूं, आपका परिचय? वह बता देता, मेरा नाम राम है। फिर मैं दूसरे लोगों को कहता हूं, मैं राम को जानता हूं, मैं जानता क्या हूं? मैं एक शब्द जानता हूं राम, और इस आदमी का नाम राम है, इतना जानने को मैं कहता हूं, मैं जानता हूं, मैं परिचित हूं, मैं भली-भांति जानता हूं। लेकिन उस राम के पीछे क्या छिपा है उस व्यक्ति में क्या छिपा है? उस शब्द में क्या छिपा है?
उस शब्द के पार वह जो असली आदमी है वह क्या है? शब्द तो हैं कि सिंबल है, प्रतीक है। वह असली आदमी, सब्स्टेंस क्या है? उसका मुझे कोई पता नहीं है, लेकिन हम नाम जानकर कहने लगते कि मैं परिचित हूं। हमने सब नाम सीख रखे हैं।
हमने अपने बाबत भी नाम सीख रखे हैं--शरीर आत्मा, परमात्मा, सब हमने सीख रखे हैं। कोई पूछे कौन हैं आप? तो सीखा हुआ आदमी कहेगा मैं आत्मा हूं। आत्मा अमर है। लेकिन सब शब्द हैं, कोरे शब्द हैं क्योंकि किताब में पढ़ लिए गए हैं। जाना कुछ भी नहीं गया है।
हम सब शब्दों की मालकियत कर बैठे हैं। शब्दों को पकड़कर बैठ गए हैं। और जो आदमी शब्दों का जितना कुशल कारीगर होता है वह उतना ज्ञानी मालूम पडता है।
शब्दों से ज्ञान को कोई संबंध नहीं है। इसलिए हम पंडितों को ज्ञानी समझ लेते हैं। पंडित भूलकर भी ज्ञानी नहीं होता। होना भी चाहे तो नहीं हो सकता है जब तक कि पंडित होना मिट न जाए। दुनिया में अज्ञानियों को ज्ञान मिल सकता है लेकिन पंडितों को कभी नहीं मिलता है।
क्योंकि शब्द पर उनकी इतनी पकड़ है गीता उन्हें कंठस्थ है बाइबिल उन्हें पूरी याद है, उपनिषद उन्हें पूरे रटे हैं। वे कहीं बच्चों वाला काम कर रहे हैं सी ए टी कैट यानि बिल्ली। वह उपनिषद कंठस्थ कर लिए हैं, गीता कंठस्थ कर ली है। जब भी पूछिए तो गीता बोलना शुरू हो जाती है, उपनिषद निकलनी शुरू हो जाती है। हमें लगता है, आदमी बहुत ज्ञानी है। लेकिन क्या निकल रहा है बाहर? सिवाय शब्दों के और कुछ भी नहीं। शब्द के कारण मनुष्य अपने को जानने से वंचित है।
फिर क्या रास्ता हो सकता है? शब्दों से कोई ऊपर उठे तो स्वयं को जान कसता है? सत्य के पार उठे, शब्द को छोड़े, शब्द के पीछे जाए, फूल शब्द को छोड़ दे, और जो फूल है उस तक पहुंच। गुलाब शब्द को छोड़ दे और जो गुलाब का फूल है वस्तुतः उस तक जाए, तो शायद जान भी सकता है।
अमृत द्वार-(विविध) -प्रवचन-03