शनिवार, 31 अगस्त 2019

= सुन्दर पदावली(२५.राग ऐराक - ४/२) =

#daduji
॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥ 
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली* 
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी, 
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान) 
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*तिनका रे यह औजूद है सो तैं महल बनाया ।* 
*नव दरवाजे साजि कैं दसवैं कपाट लगाया ॥२॥* 
*आपन रे बैठा गोपि ह्वै ब्यापक सब घट मांहीं ।* 
*करता हरता भोगता लिपै छिपै कछु नांहीं ॥३॥* 
*ऐसी रे तेरी साहिबी सो तूं ही भल जांनै ।* 
*सिफति तुम्हारी सांइया सुन्दरदास बषानै ॥४॥* 
उनकी इस विशेषता के सहारे से ही आपने यह सृष्टि का इतना लम्बा चौड़ा प्रासाद(महल) बनाया । इसमें अपने नौ द्वार बनाकर दशम द्वार पर कपाट(फाटक =अवरोधक) लगा दिये ॥२॥ 
तथा आप स्वयं रक्षक के रूप में वहाँ सर्वत्र व्यापक रहते हुए विराज गये; क्योंकि आप ही यहाँ कर्ता, हर्ता(नाशक) भोक्ता के रूप में दिखायी देते हैं । आपके लिये यहाँ कुछ गुप्त भी तो नहीं है ॥३॥ 
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं इस सृष्टि पर आपका ऐसा स्वामित्व आप ही यथार्थ रूप से जानते हैं ॥४॥१९८॥
(क्रमशः)

= ३० =

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*करणी किरका को नहिं, कथनी अनंत अपार ।*
*दादू यों क्यों पाइये, रे मन मूढ गँवार ॥*
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राधे राधे
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कसाई के पीछे घिसटती जा रही बकरी ने सामने से आ रहे संन्यासी रूपधारी व्यक्ति को देखा तो उसकी उम्मीद बढ़ी । मौत आंखों में लिए वह फरियाद करने लगी - "महाराज ! मेरे छोटे-छोटे मेमने हैं, आप इस कसाई से मेरी प्राण-रक्षा करें । मैं जब तक जियूंगी, अपने बच्चों के हिस्से का दूध आपको पिलाती रहूंगी"
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बकरी की करुण पुकार का संन्यासी रूपधारी व्यक्ति पर कोई असर न पड़ा । वह निर्लिप्त भाव से बोला— मूर्ख, बकरी क्या तू नहीं जानती कि मैं एक संन्यासी हूं, जीवन-मृत्यु, हर्ष-शोक, मोह-माया से परे । हर प्राणी को एक न एक दिन तो मरना ही है समझ ले कि तेरी मौत इस कसाई के हाथों लिखी है, यदि यह पाप करेगा तो ईश्वर इसे भी दंडित करेगा…
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‘मेरे बिना मेरे मेमने जीते-जी मर जाएंगे…’ बकरी रोने लगी । 
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‘नादान, रोने से अच्छा है कि तू परमात्मा का नाम ले, याद रख मृत्यु नए जीवन का द्वार है, सांसारिक रिश्ते-नाते प्राणी के मोह का परिणाम हैं, मोह माया से उपजता है और माया विकारों की जननी है, विकार आत्मा को भरमाए रखते हैं…
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बकरी निराश हो गई, उस संन्यासी से व्यक्ति के पीछे एक कुत्ता भी आ रहा था अब उस कुत्ते से रहा न गया, उसने पूछा— ‘महाराज, क्या आप मोह-माया से पूरी तरह मुक्त हो चुके हैं ?’
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‘बिलकुल, भरा-पूरा परिवार था मेरा सुंदर पत्नी, भाई-बहन, माता-पिता, चाचा-ताऊ, बेटा-बेटी बेशुमार जमीन-जायदाद…मैं एक ही झटके में सब कुछ छोड़कर परमात्मा की शरण में चला आ आया । सांसारिक प्रलोभनों से बहुत ऊपर... जैसे कीचड़ में कमल… वो संन्यासी वेशभूषा वाला डींग मारने लगा... 
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‘आप चाहें तो बकरी की प्राणरक्षा कर सकते हैं । कसाई आपकी बात नहीं टालेगा’... कुत्ता बोला ...
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‘मौत तो निश्चित ही है, आज नहीं तो कल, हर प्राणी को मरना है’ तभी एकदम से सामने एक काला भुजंग नाग फन फैलाए दिखाई पड़ा । संन्यासी के पसीने छूटने लगे, उसने कुत्ते की ओर मदद के लिए देखा । कुत्ते की हंसी छूट गई ।
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‘मृत्यु नए जीवन का द्वार है… उसको एक न एक दिन तो आना ही है…’ कुत्ते ने संन्यासी के वचन दोहरा दिए, ‘मुझे बचाओ’ अपना ही उपदेश भूलकर संन्यासी रूपधारी गिड़गिड़ाने लगा । मगर कुत्ते ने उसकी ओर ध्यान न दिया ।
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‘आप अभी यमराज से बातें करें, जीना तो बकरी चाहती है इससे पहले
कि कसाई उसको लेकर दूर निकल जाए, मुझे अपना कर्तव्य पूरा करना है…’ 
कहते हुए वह छलांग लगाकर नाग के दूसरी ओर पहुंच गया । फिर दौड़ते
हुए कसाई के पास पहुंचा और उस पर टूट पड़ा । आकस्मिक हमले से कसाई के औसान बिगड़ गए, वह इधर-उधर भागने लगा । बकरी की पकड़ ढीली हुई तो वह जंगल में गायब हो गई ।
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कसाई से निपटने के बाद कुत्ते ने संन्यासी की ओर देखा । वह अभी भी ‘मौत’ के आगे कांप रहा था । कुत्ते का मन हुआ कि संन्यासी को उसके हाल पर छोड़कर आगे बड़ जाये । लेकिन मन नहीं माना । 
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वह दौड़कर विषधर के पीछे पहुंचा और पूंछ पकड़कर झाड़ियों की ओर उछाल दिया, बोला- ‘महाराज, जहां तक मैं समझता हूं, मौत से वही ज्यादा डरते हैं, जो केवल अपने लिए जीते हैं । धार्मिक प्रवचन उन्हें उनके पाप बोध से कुछ पल के लिए बचा ले जाते हैं… जीने के लिए संघर्ष अपरिहार्य है, संघर्ष के लिए विवेक, लेकिन मन में यदि करुणा-ममता न हों तो ये दोनों भी आडंबर बन जाते हैं ।'
कबीर दास जी का एक दोहा 
तन को जोगी सब करें मन को बिरलो कोय....
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यही आज के सन्यासियों का हाल है हम आपसे कहेंगें मोह माया में मत पड़ो खुद अपने ठहरने के लिये हर शहर AC आश्रम लग्जरी गाड़ियां बाकी कहना बेकार है । बस इतना कहूंगा जो दया और प्रेम की बात भी न कर पाये जो सिर्फ कर्मफल के नाम पर बच निकलने का प्रयास करे वो सन्यासी तो क्या इंसान कहलाने लायक भी नहीं ।
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और अंत में इस पोस्ट का एक सार जब आपका धर्म संकट में हो तब दया धर्म को बचाना है । 
जय श्री राधे कृष्ण

= २९ =

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🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*दादू कोटि अचारिन एक विचारी,*
*तऊ न सरभर होइ ।*
*आचारी सब जग भर्या, विचारी विरला कोइ ॥*
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साभार ~
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*"अंधा अनुकरण"*
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आज मैं एक अत्यंत बोधप्रद कहानी आपके साथ शेयर कर रहा हूँ जो मैंने बचपन में सुनी थी। 
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एक बार की बात है जब एक गांव में एक महाराज सत्यनारायण देव की कथा कर रहे थे... गाव के सभी भक्त कथा का रसपान करने वहा आये हुए थे। सभी ने मन लगाकर कथा सुनी कथा जब पूर्ण हो गई तब कथा करने वाले महाराज को नियम अनुसार दक्षिणा और अनाज देने के लिए भक्त कतार में खड़े हो गए। 
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अनाज/दक्षिणा देते समय कतार में सबसे आगे एक स्त्री खड़ी थी, उसने अनाज व दक्षिणा तो दिया साथ में महाराज के ललाट पर कुमकुम तिलक भी किया। तिलक करने के बाद वह स्त्री नीचे एक पीपल के वृक्ष का पत्ता पड़ा था, उस पर कुमकुम लगा के चली गई। 
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कतार में सब खड़े थे सबने यह देखा, और एक के बाद एक सभी वही करने लगे. सब महाराज को तिलक लगाते और नीचे पड़े पत्ते पर भी तिलक करते। ऐसा उन सभी लोगो ने किया जो कतार में खड़े थे। महाराज अपनी दक्षिणा बटोरने में व्यस्त थे। 
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लेकिन वहा एक सज्जन युवक यह सब देख रहा था... उसके मन प्रश्न हुआ कि "सब महाराज को तिलक कर रहे हे वहां तक तो ठीक है, लेकिन नीचे पड़े पत्ते पर सब तिलक क्यों कर रहे है?" 
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उसने यह प्रश्न सभी से पूछा सब का एक ही उत्तर था "आगे वाला कर रहा हे इस लिए" तब वह युवक सबसे पहले जो स्त्री खड़ी थी उसके घर गया क्योकि अब तक वो घर जा चुकी थी। 
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वहाँ पहुँचने के बाद उस युवक ने उस स्त्री से पूछा "आपने उस पीपल के पत्ते पर तिलक क्यों किया?" स्त्री ने कहा... "केसा तिलक? मैंने तो वहा मेरा जो कुमकुम वाला हाथ था उसको पोंछने के लिए उस पत्ते का उपयोग किया..." 
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वह युवक जोर-जोर से हंसने लगा लोगों की मूर्खता पर और अपने घर चल दिया... मित्रों इसे कहा जाता है अंधानुकरण.... आज यह सार्वत्रिक देखने को मिल रहा है। चाहे वह सामजिक क्षेत्र हो, राजनीति, अर्थकारण, शिक्षण या आध्यात्म. हर जगह पर मात्र अंधानुकरण। 
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सबसे ज्यादा यह आध्यात्म और धर्म में आज छुपा हुआ है। हमारा वैदिक धर्म सत्य और विज्ञान की नींव पर खड़ा है प्रत्येक कृति के पीछे तर्क और विज्ञान आवश्यक है। 
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= *उपदेश चेतावनी का अंग ८२(१५७-६०)* =

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🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷 
*दादू कहै-*
*उठ रे प्राणी जाग जीव, अपना सजन संभाल ।*
*गाफिल नींद न कीजिये, आइ पहुंता काल ॥* 
*(श्री दादूवाणी ~ काल का अंग)*
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**श्री रज्जबवाणी** 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
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*उपदेश चेतावनी का अंग ८२*
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रोग रहित मिनखा जनम, हरिसिद्धि१ घर ठाट । 
ता पर राम न सुमरिये, तो रज्जब भूल निराट२ ॥१५७॥
मनुष्य शरीर रोग रहित है, घर में लक्ष्मी१ का ठाट है, इतना होने पर भी राम का स्मरण नहीं करता है तो बड़ी२ ही भूल करता है ।
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चित्राम१ सकल बाजी चिहर२, भोला देख न भूल ।
बिच बाजीगर सत्य है, सो पकड़ी मन मूल ॥१५८॥
ईश्वर रूप बाजीगर की संसार रूप बाजी की रौनक२ चित्र१ के समान है, हे भोले जीव ! इसे देखकर भुलावे में मत पड़, इसके बीच में ईश्वर रूप बाजीगर सत्य है, उसी अपने मूल कारण को पकड़ अर्थात उसका भजन कर । 
यह ठग बाजी ठग्ग की, ठग्या सकल संसार । 
तू रज्जब देखै हि जनि, जे न ठगावण हार ॥१५९॥ 
यह माया की ठगबाजी है, इसने सब संसार को ठगा है, यदि तू ठगाने वाला नहीं है तो इसकी और देख ही मत । 
रज्जब अज्जब काम यहु, हरि सुमरो हित१ लाय । 
उलझ न अलि२ अल३ आसिरै, जो दीसै सो जाय ॥१६०॥ 
हरि से प्रेम१ लगाकर हरि का भजन कर, यही अदभुत कार्य है । हे जीव रूप भ्रमर२, माया३ के आश्रय मत फँस, जो भी मायिक संसार दीखता है सो सब नष्ट हो जायगा । 
(क्रमशः)

= ३२ =


#daduji
॥ दादूराम सत्यराम ॥ 
*श्री दादू अनुभव वाणी, द्वितीय भाग : शब्द* 
*राग गौड़ी १, गायन समय दिन ३ से ६* 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
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३२ - मृगोक्ति उपदेश । झपताल
मोह्यो मृग देख वन अँधा, 
सूझत नहीं काल के फँधा ॥टेक॥
फूल्यो फिरत सकल वन माँहीं, 
शिर साँधे शर सूझत नाँहीं ॥१॥
उदमद१ मातो वन के ठाट, 
छाड़ चल्यौ सब बारह२ बाट ॥२॥
फँध्यो न जाने वन के चाइ३, 
दादू स्वाद बंधानो आइ ॥३॥
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मृग के दृष्टांत से उपदेश कर रहे हैं - 
विचार नेत्रों से हीन जीव रूप मृग, सँसार - वन को देखकर मोहित हो रहा है । इसे काल का कर्म - फल रूप जाल का फँदा नहीं दीख रहा है । 
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यह प्रसन्न हुआ वन के सँपूर्ण विषय - वृक्षों में विचर रहा है, किन्तु इसके पीछे कालरूप व्याध, इसके शिर पर आयु समाप्ति रूप बाण सँधान किये हुये आ रहा है, वह इसे नहीं दीखता । 
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यह स्त्री - पुत्रादि रूप वृक्षों द्वारा सँसार - वन की सजावट देखकर मतवाले के समान उन्मत्त१ हो रहा है और अपने कल्याण के सभी साधनों को छोड़कर, बहिर्मुख२ हुआ पतन की ओर जा रहा है । 
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यह सँसार - वन के विषय - वृक्षों को खाने की आशा३ में जाल नहीं दिखने से अपने को फँदे में आया हुआ नहीं समझता किन्तु विषय स्वाद के कारण ही कर्म - बँधन में आ बंधा है ।
(क्रमशः)

= ८ =

卐 सत्यराम सा 卐
*जहँ मन राखै जीवतां, मरतां तिस घर जाइ ।*
*दादू वासा प्राण का, जहँ पहली रह्या समाइ ॥* 
*(श्री दादूवाणी ~ मन का अंग)* 
=====================
साभार ~ Tapasvi Ram Gopal
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*सप्रेम जिसका स्मरण करे उसी का रूप हो जाता है -*
#############################
जिहिं सप्रेम सुमरण करत, हो उसका ही स्वरूप ।
सुमरण करके भैंस का, बना भैंस ही रूप ॥१००॥
एक मनुष्य एक संत के पास गया और बोला - "भगवन् ! मुझे भजन करने की रीति बतलावें ?" संत ने उसे नाना रीति से भजन करना बताया किन्तु उसका मन नहीं लगा ।
तब संत ने उससे पूछा - "तेरा सबसे अधिक प्रेम किसमें है ?" उसने कहा - "मेरी भैंस में है ।" 
संत - अच्छा, फिर तू कुटिया में बैठ कर भैंस का ही स्मरण कर ।" वह वैसा ही करने लगा । 
कुछ दिन बाद एक दिन स्मरण में बैठे हुये उसको संत ने सहसा पुकारा बाहर आने को कहा, वह बोला -"कुटिया का द्वार चौड़ा कम है, मेरे सींग अड़ेंगे, मुझ से नहीं निकला जायेगा ।
संत ने कहा - "ठीक है किन्तु तू अपने सिर को टेढ़ा करके निकल आ ।" तब उसने इस प्रकार सिर टेढ़ा किया जिससे सींग, द्वार की ऊंचाई और निचाई की ओर हो जाय । फिर वह निकल कर बाहर आ गया । 
तब संत ने समझाया कि - "जिस प्रकार तूने भैंस का स्मरण किया उसी प्रकार भगवान का कर ।" उसके भी समझ मे आ गया । 
इससे सूचित होता है कि सप्रेम जिसका स्मरण किया जाता है तब अन्त में स्मरणकर्ता उसी का रूप हो जाता है । महाराज पुण्डरीकजी स्थूल शरीर से ही चतुर्भुज रूप हो गये थे यह कथा पुराण में प्रसिद्ध है ।
### श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ###
### श्री नारायणदासजी पुष्कर, अजमेर ###
######## सत्य राम सा

= ७ =

卐 सत्यराम सा 卐
*दादू सूतां पीछे सुरति निरति सूं,**बालक ज्यूं पय पीवे ।*
*ऐसे अन्तर लगन नाम सूं, आतम जुग-जुग जीवे ॥* 
*(श्री दादूवाणी ~ परिचय का अंग)* 
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साभार ~ Tapasvi Ram Gopal
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*स्मरण रहस्य को विरले संत ही जानते है -*
###########"#"##########
जानत सुमरण भेद को, साधु विरला कोय ।
वैरागी लख नाम ले, दादू सम नहिं होय ॥९२॥
आमेर नगर में एक वैरागी साधु ने सन्तप्रवर दादूजी से प्रश्न किया - "हे भगवन् ! मैं प्रतिदिन एक लाख नाम जप करता हूं तो भी मुझे आपके समान लाभ नहीं हुआ, क्यों कि मुझे आपके समान सन्त कोई नहीं मानते ।" 
यह सुनकर दादूजी बोले - "आपके और मेरे स्मरण में कुछ भेद है, वास्तव नाम स्मरण इसे कहते हैं -
"अलख नाम अंतरि कहे, सब घट हरि-हरि होय ।
दादू पाणी लूंण ज्यों, नाम कहावे सोय ॥" 
अर्थात भीतर निरंतर रोम-रोम से स्मरण होता रहे जैसे जल और नमक एक हो जाते हैं उसी प्रकार नाम और मन में भेद नहीं रहे तब ही वास्तव नाम स्मरण कहलाता है । इससे सूचित होता है कि नाम स्मरण के रहस्य को कोई बिरले संत ही जानते हैं ।
### श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ###
### श्री नारायणदासजी पुष्कर, अजमेर ###
######## सत्य राम सा

शुक्रवार, 30 अगस्त 2019

= सुन्दर पदावली(२५.राग ऐराक - ४/१) =

#daduji
॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥ 
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली* 
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी, 
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान) 
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*रासा रे सिरजनहार का सौ मैं निस दिन गाऊं ।* 
*करजोरें बिनती करौं क्यौं ही जौ दरसन पाऊं ॥(टेक)* 
*उतपति रे सांई तैं किया प्रथम हि वो ओंकारा ।* 
*तिसतें तीन्यौं गुन भये पीछै पंच पसारा ॥१॥* 
मैं इस सृष्टि के एकमात्र रचयिता प्रभु का गुणगान निरन्तर करता रहता हूँ । तथा अपने हाथ जोड़कर उनसे निरन्तर विनती करता रहता हूँ कि किसी प्रकार मुझको उनके दर्शन हो जायँ ॥टेक॥ 
हे स्वामिन् ! एक ओंकार अक्षर का आश्रय लेकर तीनों गुणों की रचना कर उनसे यह पाँच तत्त्वों की रचना की ॥१॥
(क्रमशः)

= २८ =

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🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*देखत अंधे, अंध भी अंधे, जब लग सत्य न सूझै ।*
*देखत देखे, अंध भी देखे, जब राम सनेही बूझै ॥*
(श्री दादूवाणी ~ पद. ३०६)
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साभार ~ @प्रताप चौहान

🙏🏻 *मैं नेत्रहीन भी हूँ, नेत्रवान भी !* 🙏🏻
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आपने उपनिषदों में महामनस्विनी गार्गी का नाम पढा होगा। ऋषि याज्ञवल्क्य की भार्या मैत्रेयी के संदर्भ में भी सुना होगा। ऐसी ही उतमकोटीय विदुषी थी- सुवर्चला। महाभारत ग्रन्थ के शान्तिपर्व में देवी सुवर्चला का वर्णन है। ऋषि देवल की पुत्री सुवर्चला ज्ञानमणि और ओजपूर्ण व्यक्तित्व की धनी थी। दार्शनिक मेधा वाली यह विदूषी सौन्दर्य की भी स्वामिनी थी। 
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जब इनकी विवाहोचित आयु हुई, तो पिता देवल चिंतित हुए कि ऐसी अद्वितीय पुत्री के सुयोग्य वर कहाँ से लाएँ। पुत्री सुवर्चला पिता के चिंतन से भिज्ञ थी। इसलिए उसने सुझाव दिया - 'पिताश्री, आप एक स्वंयवर का आयोजन कीजिए। उसमे उच्च कोटि के विद्वत पुरुषो को आमंत्रण भेजिए। मैं उस सभा में एक विशिष्ट प्रश्न पूछूँगी। जो मेरे प्रश्न का यथोचित उतर दे देगा, उसी का मै पति रुप में वरण करुँगी।'
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पिता ने प्रसन्नतापूर्वक पुत्री की अभिलाषा पूर्ण की। निश्चित दिवस स्वंयवर का आयोजन किया गया। सुदूर राज्यों से राजपुरुष व विद्वानजन सभा में भरपूर उत्सुकता से पहुँचे। देवी सुवर्चला ने भरी सभा में प्रश्न उछाला -
*'यद्-यास्ति समितौ वित्रो अंधनंधः समे पतिः।'*
*आप में से वह पुरुष आगे आए, जो अंधा भी है और आँखवाला भी है : जो नेत्रहीन होने के साथ-साथ नेत्रवान भी है। वही मेरा पति होने के लिए उपयुक्त है।* 
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शर्त सुनते ही सभा उद्वेलित हो गई। भला यह कैसी विचित्र प्रहेलिका है ! दोनों स्थितियाँ तो विरोधाभासी है। एक ही पुरुष में दोनों की विद्यमानता कैसे हो सकती है? विद्वत समाज अनुतरित रह गया। 
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फिर एक दिन ऋषि देवल के आश्रम में उपनिषदों के विचारवान श्वेतकेतु का पदार्पण हुआ। श्वेतकेतु ने सुवर्चला की शर्त सुनी, तो तुरन्त उसमे निहित विचार और मर्म को जान गए। उन्होने ऋषि देवल से कहा 'आप अपनी पुत्री को यहाँ बुला लें। मैं उतर देने हेतु प्रस्तुत हूँ।' सुवर्चला आई, तो ऋषिकुमार ने उन्हें सम्बोधित करते हुए कहा -
श्वेतकेतु - *देवी ! तुम्हारी कथनी के अनुसार मैं वह पुरुष हूँ, जो अंधा भी हूँ, आँखवाला भी हूँ।* 
सुवर्चला - *कृपया विवेचना कीजिए, कैसे?* 
श्वेतकेतु - *अंधोहमत्र तत्वं हिं - मैं नेत्रहीन हूँ। यह सत्य है। जिस प्रकार संसार लौकिक नेत्रों के द्वारा बाहरी दृश्यों का दर्शन करता है, मैं उस लौकिक दृष्टि से देखता ही नहीं। अतः मैं सांसारिक दृष्टिकोण से, स्थूल नजरिए से अंधा ही हूँ। परन्तु इसी के साथ मैं नेत्रवान भी हूँ। जिस ब्रह्म की शक्ति से मनुष्य देखता है, सुनता है, सूंघता है, बोलता है, स्वाद लेता है, ग्रहण करता है, अपना जीवन यापन करता है - वास्तव में वही परम इन्द्रिय है, समस्त ऐन्द्रिक अनुभवों का कारण है। वही वास्तविक नेत्र भी है। मैंने तत्वज्ञान द्वारा उसी नेत्र को उपलब्ध किया है। ब्रह्म का साक्षात्कार कर, उसकी चैतन्यता से चेतन होकर ही दृश्यों को देखता अथवा जानता हूँ अथवा उनका अनुभव करता हूँ। अतः मैं आध्यात्मिक दृष्टिकोण या सूक्ष्म नजरिए से नेत्रवान हूँ।*
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यह महाभारत कालीन दृष्टांत अत्यंत सूक्ष्म हैं। यह लौकिक अथवा अलौकिक, दोनो प्रकार के ज्ञान और अनुभूतियों के विज्ञान को उजागर करता है। विज्ञान की शैली में कहे, तो यह *'Science of Cognition'* की और संकेत करता है, जो वर्तमान समय में मनोविज्ञान, दर्शनशास्त्र, भौतिकी, जीव-विज्ञान आदि क्षेत्रो की जिज्ञासाओं का केन्द्र बना हुआ है।
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रुद्र प्रताप सिंह, 
इस्कॉन - लखनऊ

= २७ =

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*दादू हाडों मुख भर्या, चाम रह्या लिपटाय ।*
*मांहैं जिभ्या मांस की, ताही सेती खाइ ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ मन का अंग)* 
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साभार ~ Shaily Rai

चमड़ी के प्रेमी
🌛🌞🌻🌼🌸🌺🌾🌹🌷💐🍄🍁🍂🍃🎋🎍🍀🌿🌱🌴🌳🌲🎄
मैं एक गांव में ठहरा हुआ था। वहां गोली चली। चार लोगों को गोली लग गई, तो उनका पोस्टमार्टम होता था। मेरे एक मित्र, जो चमड़ी के बड़े प्रेमी हैं…।
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अधिक लोग होते हैं। उपनिषद कहते हैं इस तरह के लोगों को चमार–चमड़ी के प्रेमियों को। चमड़े के जूते बनाने वाले को नहीं; जरूरी नहीं कि वह चमार हो। लेकिन चमड़ी के प्रेमी को !
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तो एक चमड़ी के प्रेमी मेरे मित्र थे। मुझे मौका मिला, मैंने उनसे कहा कि चलो, डाक्टर परिचित है, मैं तुम्हें पोस्टमार्टम दिखा दूं। उन्होंने कहा, उससे क्या होगा? मैंने कहा, थोड़ा देखो भी, आदमी के भीतर क्या है, उसे थोड़ा देखो।
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पोस्टमार्टम के गृह में भीतर प्रवेश किए, तो भयंकर बदबू थी, क्योंकि लाशें तीन दिन से रुकी थीं। वे नाक पर रूमाल रखने लगे। मैंने कहा, मत घबड़ाओ। जिन चमड़ियों को तुम प्रेम करते हो, उनकी यही गति है। थोड़ा और भीतर चलो। उन्होंने कहा, बहुत उबकाई आती है। वॉमिट न हो जाए ! मैंने कहा, हो जाए तो कुछ हर्जा नहीं है। और भीतर आओ।
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जब हम गए, तो डाक्टर ने एक आदमी, जिसके पेट में गोली लगी थी, उसके पूरे पेट को फाड़ा हुआ था। तो सारी मल की ग्रंथियां ऊपर फूटकर फैल गई थीं। वे मेरे मित्र भागने लगे। मैं उन्हें पकड़ रहा हूं, खींच रहा हूं; वे भागते हैं! कहते हैं, मुझे मत दिखाओ ! उन्होंने आंखें बंद कर लीं। मैंने कहा, आंखें खोलो। ठीक से देख लो। 
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उन्होंने कहा, मुझे मत दिखाओ, नहीं तो मेरी जिंदगी खराब हो जाएगी ! तुम्हारी जिंदगी क्यों खराब हो जाएगी? उन्होंने कहा, फिर मैं किसी शरीर को प्रेम न कर पाऊंगा। जब भी शरीर को देखूंगा, तो यह सब दिखाई पड़ेगा।
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बुद्ध कहते थे, जब शरीर आकर्षक मालूम पड़े, तो थोड़ा भीतर गौर करना कि है क्या वहां? तो शायद शरीर का जो राग है, वह टूट जाए और वैराग्य उत्पन्न हो।
गीता दर्शन ~ ओशो

= *उपदेश चेतावनी का अंग ८२(१५३-५६)* =

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*राम बिना किस काम का, नहीं कौड़ी का जीव ।*
*सांई सरीखा ह्वै गया, दादू परसै पीव ॥* 
*(श्री दादूवाणी ~ परिचय का अंग)*
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**श्री रज्जबवाणी** 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
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*उपदेश चेतावनी का अंग ८२*
विभूति१ भूत२ बहु विधि बध्या, चकहु३ चक्कवै४ राज । 
भजन विमुख विद्या सभी, सो रज्जब किहिं काज ॥१५३॥ 
ऐश्वर्य१ के द्वारा प्राणी२ बहुत प्रकार से बढ़ता है तो पृथ्वी३ का चक्रवर्ती४ राजा हो जाता है किन्तु प्रभु के भजन बिना वह राज्य तथा सभी प्रकार की विद्यायें किस काम की हैं ? 
बुद्धि विद्या रु विभूति१ यहु, हय२ गय३ हेम४ अपार । 
जन रज्जब बे काम के, जे भजै न सिरजन हार ॥१५४॥ 
बुद्धि, विद्या, ऐश्वर्य१, अश्व२, हाथी३, सुवर्ण४ ये सब अपार हो तो भी व्यर्थ है यदि हरि भजन नहीं करे तो । 
रज्जब रिधि१ जीव को दई२, राम रहम३ कर राग४ ।
पटा लहै परि पीठ दे , मस्तक बड़े अभाग ॥१५५॥
राम ने दया३ और प्रेम४ करके जीव को संपति दी२ है, यह संपति१ का पटा प्रभु से लेकर प्रभु को पीठ देता है भजन नहीं करता तो समझो इसके मस्तक पर दुर्भाग्य ही आ बैठा है ।
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रज्जब उल्लू आदमी, रारि१ मयी रिधि२ जाण ।
प्रकट प्रभाकर पुण्य दिशि, जे पलक न खोलै प्राण३ ॥१५६॥
मनुष्य उल्लू है, संपत्ति२ उसके नेत्र१ है, ऐसा जानो ! सूर्य के उदय होने पर उल्लू सूर्य की और अपने नैत्र की पलक नहीं खोलता, वैसे ही कृपाण प्राणी३ पुण्य की ओर अपनी संपत्ति को नहीं लगाता । 
(क्रमशः)

= ३१ =


#daduji
॥ दादूराम सत्यराम ॥ 
*श्री दादू अनुभव वाणी, द्वितीय भाग : शब्द* 
*राग गौड़ी १, गायन समय दिन ३ से ६* 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
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यूट्यूब पर श्रवण हेतु ☛ http://youtu.be/D8mZaqFEcQo
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३१ - मन प्रबोध । पँजाबी त्रिताल
मन रे, राम बिना तन छीजे ।
जब यहु जाय मिले माटी में, 
तब कहु कैसे कीजे॥टेक॥
पारस परस कंचन कर लीजे, 
सहज सुरति सुखदाई ।
माया बेलि विषय फल लागे, 
तापर भूलन भाई॥१॥
जब लग प्राण पिंड है नीका, 
तब लग ताहि जनि१ भूले । 
यहु सँसार सेमल के सुख ज्यों, 
तापर तूँ जनि फूले ॥२॥
अवसर यही जान जगजीवन, 
समझ देख सचु पावे ।
अँग अनेक आन मत भूले, 
दादू जनि१ डहकावे ॥३॥
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*मन को उपदेश कर रहे हैं -* 
हे मन ! राम भजन के बिना शरीर क्षीण हो रहा है, फिर जब यह नर शरीर मिट्टी में मिल जायेगा, तब बता तू अन्य शरीरों में कैसे राम - भजन कर सकेगा ? 
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अत: शीघ्र ही ब्रह्माकार वृत्ति द्वारा सुखप्रद सहज समाधि में ब्रह्मरूप पारस से मिलकर मन - लौह को कंचन - सा निर्मल कर ले । हे भाई ! माया बेलि के तो विषय रूप विष - फल ही लगे हैं, उन पर तू भूलकर भी मत जाना । 
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जब तक स्थूल - सूक्ष्म - शरीर अच्छे हैं तब तक प्रभु का भजन करना मत१ भूल । शरीर रोगी या अति वृद्ध होने पर भजन होना कठिन है । यह सँसार सेमल वृक्ष के समान प्रतीति मात्र ही सुखप्रद है । सेमल के लाल छूलों को देखकर माँस के लोभ से गिद्ध आते हैं और निराश होते हैं । शुक पक्षी उसके फल को खाने के लिए उसके पास जाता है किन्तु उसमें रुई निकलने से वह भी निराश ही होता है । वैसे ही साँसारिक सुख से किसी की भी आशा पूर्ण नहीं होती, उस सुख पर तू मत प्रसन्न हो ।
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यह अच्छा अवसर है, जग - जीवन परमात्मा को ही अपना जान कर विचार द्वारा उनका साक्षात्कार कर, तो तुझे परमानन्द प्राप्त होगा । परमात्मा से अन्य स्त्री - पुत्रादि अनेक शरीरों को देखकर उनकी आसक्ति द्वारा प्रभु को मत भूल व उनमें मोह बहकावे में मत आ ।
(क्रमशः)

= ६ =

卐 सत्यराम सा 卐
*सहजैं ही सब होइगा, गुण इन्द्रिय का नास ।*
*दादू राम संभालतां, कटैं कर्म के पास ॥* 
*दुख दरिया संसार है, सुख का सागर राम ।*
*सुख सागर चलि जाइए, दादू तज बेकाम ॥* 
*दादू दरिया यहु संसार है, तामें राम नाम निज नाव ।*
*दादू ढील न कीजिये, यहु औसर यहु डाव ॥* 
*(श्री दादूवाणी ~ स्मरण का अंग)* 
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साभार ~ Tapasvi Ram Gopal
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*नाम स्मरण से सब दु:खों का नाश -*
#############""##"###
नाम स्मरण से सहज ही, सबही खेद नशाय ।
इक दुखिया के प्रश्न पर, दादू यही उपाय ॥८६॥ 
संतवर दादूजी से एक दुखिया मनुष्य ने अपने दु:ख निवृति का उपाय पूछा । दादूजी बोले -
"दादू दुखिया तब लगे, जब लग नाम न लेहि ।
तब ही पावन परमसुख, मेरी जीवन येहि ॥"
अर्थात तू तब तक ही दुखी है जब एक भगवान की शरण होकर भगवत् नाम स्मरण नही करता । जब नाम स्मरण करने लगेगा तब तू परम पवित्र सुख को प्राप्त हो जायेगा । देख, मेरा जीवन तो नाम स्मरण के ही आधार है । 
इससे सूचित होता है कि नाम स्मरण से सब दु:ख नष्ट हो जाता है ।
### श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ###
### श्री नारायणदासजी पुष्कर, अजमेर ###
######## सत्य राम सा

= ५ =

卐 सत्यराम सा 卐
*दादू हमको सुख भया, साध शब्द गुरु ज्ञान ।*
*सुधि बुधि सोधी समझकर, पाया पद निर्वाण ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ गुरुदेव का अंग)* 
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साभार ~ Tapasvi Ram Gopal
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*श्रवण से जीवन में तत्काल परिवर्तन -*
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बदलत जीवन श्रवण से, क्षण में देखा जाय ।
बखना का बदला तुरंत, दादु वचन मन लाय ॥३१॥
नरेना ग्राम में संतवर दादूजी मार्ग से जा रहे थे । बखना अपने साथियों के साथ चङ्ग बजाते हुये होली के गीत गा रहे थे । 
उन्हें देखकर दादूजी ने कहा - "अरे ! तेरा यह सुन्दर शरीर तो भगवान ने भक्ति करने के लिये रचा था । तू यह गंदे गीत क्यों गा रहा है ? भगवान के गुण क्यों नहीं गाता ? 
यह सुनते ही बखना के शरीर में बिजली सी दौड़ गई । तत्काल उनका जीवन बदल गया । वे दादूजी के चरणों में आ पड़े और आगे चलकर अच्छे संत तथा बाणीकार भी हुये । 
इससे सूचित होता है कि श्रवण से क्षण भर में जीवन बदल जाता है ।
### श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ##
### श्री नारायणदासजी पुष्कर, अजमेर ###
######## सत्य राम सा

गुरुवार, 29 अगस्त 2019

= सुन्दर पदावली(२५.राग ऐराक - ३/२) =

#daduji

॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥ 
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली* 
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी, 
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान) 
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*ब्यापक रे तीनौं लोक मैं जल थल अग्नि मंझारी ।* 
*पवन अकाश जहां तहां सब मैं सिफति तुम्हारी ॥३॥* 
*हम तुम रे अंतरि क्यौं भया यह मोहि अचिरज आवै ।* 
*बार बार करि बीनती सुन्दरदास सुनावै ॥४॥* 
हे भगवन् ! इन तीनों लोगों में आपही व्याप्त हैं, भले ही फिर वह अग्नि हो या वायु हो, आकाश हो । इनमें आपकी विशेषता ही जहाँ तहाँ दिखायी दे रही है ॥३॥ 
अतः मुझको आश्चर्य हो रहा है कि फिर भी आपमें और मुझमें ऐसा अन्तर क्यों हो गया । महात्मा सुन्दरदासजी बार-बार विनती करते हुए आपसे इतना ही जानना चाहते हैं । कृपया हमें बताइए ! ॥४॥
(क्रमशः)

= २६ =

🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*दादू यहु मन तीनों लोक में, अरस परस सब होइ ।*
*देही की रक्षा करैं, हम जनि भींटै कोइ ॥*
====================
साभार ~ @Anish Singh

*जिसके भीतर जो मैल रहता है ! वही बाहर झलकता है !!*.....
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प्रकाश को अंधकार का पता नहीं। प्रकाश तो सिर्फ प्रकाश को ही जानता है। जिनके हृदय प्रकाश और पवित्रता से आपूरित हो जाते हैं, उन्हें फिर कोई हृदय अंधकार पूर्ण और अपवित्र नहीं दिखाई पड़ता। जब तक हमें अपवित्रता दिखाई पड़े, जानना चाहिए कि उसके कुछ न कुछ अवशेष जरूर हमारे भीतर हैं। वह स्वयं के अपवित्र होने की सूचना से ज्यादा और कुछ नहीं है।
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सुबह की प्रार्थना के स्वर मंदिर में गूंज रहे थे। आचार्य रामानुज भी प्रभु की प्रार्थना में तल्लीन से दीखते मंदिर की परिक्रमा करते थे। और तभी अकस्मात एक चांडाल स्त्री उनके सम्मुख आ गई। 
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उसे देख उनके पैर ठिठक गये, प्रार्थना की तथाकथित तल्लीनता खंडित हो गई और मुंह से अत्यंत कलुष शब्द फूट पड़े : ''चांडालिन मार्ग से हट, मेरे मार्ग को अपवित्र न कर।'' प्रार्थना करती उनकी आंखों में क्रोध आ गया और प्रभु की स्तुति में लगे होठों पर विष। 
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किंतु वह चांडाल स्त्री हटी नहीं, अपितु हाथ जोड़कर पूछने लगी, ''स्वामी, मैं किस ओर सरकूं? प्रभु की पवित्रता तो चारों ओर ही है ! मैं अपनी अपवित्रता किस ओर ले जाऊं?'' मानों कोई परदा रामानुज की आंखों के सामने से हट गया हो, ऐसे उन्होंने उस स्त्री की ओर देखा। 
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उसके वे थोड़े से शब्द उनकी सारी कठोरता बहा ले गये। श्रद्धावनत उन्होंने कहा, ''मां, क्षमा करो। भीतर का मैल ही हमें बाहर दिखाई पड़ता है। जो भीतर की पवित्रता से आंखों को जांच लेता है, उसे चहुं ओर पावनता ही दिखाई देती है।''
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प्रभु को देखने का कोई और मार्ग मैं नहीं जानता हूं। एक ही मार्ग है और वह है - सब ओर पवित्रता का अनुभव होना। जो सब में पावन को देखने लगता है, वही और केवल वही प्रभु की कुंजी उपलब्ध कर पाता है।
🙏🙏🌹🌹🔥🔥
*ओशो*.....✍
☀ ‘पथ के प्रदीप’

= २५ =

🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*कारज को सीझै नहीं, मीठा बोलै बीर ।*
*दादू साचे शब्द बिन, कटै न तन की पीर ॥*
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ओशो...

हमारे पास क्या है? ज्ञान के नाम पर हमारे पास शब्दों के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है।

किन्हीं के पास हिंदुओं के शब्द हैं, किन्हीं के पास मुसलमानों के शब्द हैं, किन्हीं के पास जैनों के शब्द हैं, किन्हीं के पास ईसाइयों के शब्द हैं। शब्दो के अतिरिक्त हमारे पास संपत्ति क्या है? अगर हम भीतर खोजने जाए तो शब्दों के अतिरिक्त हमारे पास क्या है? और शब्द का क्या मूल्य हो सकता है?

एक सम्राट के द्वार पर एक कवि ने एक दिन सुबह आकर सम्राट की प्रशंसा में कुछ गीत कहे, कुछ कविताएं कहीं।

फिर कवि तो रुकते नहीं शब्दों का महल बनाने में। वे तो कुशल होते हैं। उन्होंने, उस कवि ने सम्राट को सूरज बना दिया, सारे जगत का प्रकाश बना दिया।

उस कवि ने सम्राट को जमीन से उठाकर आसमान पर बिठा दिया उसने अपनी कविता में जितनी प्रशंसा कर सकता था, की। सम्राट ने उससे कहा, धन्य हुआ तुम्हारे गीत सुनकर। बहुत प्रभावित हुआ।

एक लाख स्वर्ण मुद्राएं कल तुम्हें भेंट कर दी जाएंगी। कवि तो दीवाना हो गया। सोचा भी न था कि एक लाख स्वर्ण मुद्राएं मिल जाएगी। आनंद विभोर घर लौटा, रात भर सो नहीं सका।

बार-बार खयाल आने लगा, एक लाख स्वर्ण मुद्राएं। क्या करूंगा। न मालूम कितनी योजनाएं बना लीं। कवि था, शब्दों का मालिक था। बहुत शब्द जोड़ लिए। सारी भविष्य स्वर्णमय हो गया सारा भविष्य एक सपना हो गया। जीवन एक धन्यता मालूम होने लगी।

सुबह जल्दी ही, सूरज अभी निकल ही नहीं पाया कि द्वार पर पहुंच गया राजा ने सम्राट ने बिठाया और थोड़ी देर बाद पूछा, कैसे आए हैं?

उस कवि ने पूछा, कहीं भूल तो नहीं गया सम्राट! पूछता है कैसे आए हैं उसने कहा कि पूछते हैं कैसे आया हूं? रात भर नहीं सो सका, क्या पूछते हैं आप? कल कहा था आपने की एक लाख स्वर्ण मुद्राएं भेंट करेंगे

सम्राट हंसने लगा, कहा, बड़े नासमझ हैं आप। आपने शब्दों से मुझे प्रसन्न किया था, मैंने भी शब्दों से आपको प्रसन्न किया था इसमें लेने-देने का कहां सवाल आता है?

कैसी एक लाख स्वर्ण मुद्राएं? आपने कुछ शब्द कहे थे, कुछ शब्द मैंने कहे थे। शब्द के उत्तर में शब्द ही मिल सकते हैं। स्वर्ण मुद्राएं? कैसे? तब कवि को पता चला कि शब्द अपने में थोथे हैं। उनके भीतर कोई कंटेंट नहीं हैं।

शब्द अपने आपमें पानी पर खींची गयी लकीरों से ज्यादा नहीं हैं। लेकिन हमारे पास क्या है? शब्दों के अतिरिक्त कुछ और है।

शब्दों पर हम जीते और लड़ते भी हैं। मैं कहता हूं, मैं हिंदू हूं। मैं कहता हूं, मैं मुसलमान हूं। कोई कैसे मुसलमान हो गया, कोई कैसे हिंदू हो गया?

कुछ शब्द हैं जो कुरान से लिए गए हैं, कुछ शब्द हैं जो गीता से लिए गए हैं। कुछ शब्द हैं जो इस मुल्क में पैदा हुए है, कुछ शब्द है जो उस मुल्क में पैदा हुए हैं।

और शब्दों को हमने इकट्ठा कर लिया तो एक तरफ के शब्द मुसलमान बना लेते हैं, दूसरे तरह के शब्द हिंदू बना लेते हैं, तीसरे तरह के शब्द जैन बना देते हैं। क्योंकि किसी के भीतर कुरान है, किसी के भीतर बाइबिल है, किसी के भीतर गीता है। शब्दों के अतिरिक्त हमारी संपदा क्या है?

और इन कोरे शब्द पर हम लड़ते भी है और जीवित आदमी की छाती में तलवार भी भौंक सकते है। मंदिर भी जला सकते हैं, मस्जिद में आग भी लगा सकते हैं। क्योंकि मेरे शब्द अलग है आपके शब्द अलग है।

आदमी शब्दों पर जी रहा है हजार वर्षों से और सोच रहा है कि शब्दों में कोई बल है, कोई संपदा है, कोई संपत्ति है। शब्द एकदम बोझ हैं, लेकिन शब्दों से भ्रम जरूर पैदा होता है।

जैसे उस कवि को भ्रम पैदा हुआ एक लाख स्वर्ण मुद्राओं का। रात भर उसे उसने गिनती की। हाथ में स्वर्ण मुद्राएं पड़ी। रात भर उसने सपने बनाए कि अब क्या करूं और क्या न करूं? कितना बड़ा भवन बनाऊं, कितना बड़ा रथ खरीदूं, कितना बड़ा बगीचा लगाऊं, क्या करूं, क्या न करूं? लेकिन हाथ में कुछ भी न था। एक लाख स्वर्ण मुद्रा का शब्द था। शब्द से उसने फैलाव कर लिया।

हमारे हाथ में क्या है? आत्मा, परमात्मा, मोक्ष, जन्म, जीवन, प्रेम, आनंद हमारे पास शब्दों के अतिरिक्त और क्या है?

लेकिन शब्द से जरूर भ्रम पैदा होता है। छोटा-सा बच्चा स्कूल में पढ़ता है, सी ए टी कैट, कैट यानि बिल्ली। बार-बार पढ़ता है, सी ए टी कैट, कैट यानि बिल्ली। सी ए टी कैट, कैट यानी बिल्ली। सीख जाता है, फिर वह कहता है कि मैं जान गया। कैट यानि बिल्ली। लेकिन उसने जाना क्या है? उसने दो शब्द जाने कैट भी एक शब्द है, बिल्ली भी एक शब्द है।

बिल्ली को जाना उसने? लेकिन वह कहता है कि मैंने जान लिया। कैट यानि बिल्ली। उसने दो शब्द जान लिए, दोनों का अर्थ जान लिया। शब्द भी शब्द हैं, अर्थ भी शब्द। और बिल्ली पीछे छूट गयी, वह जो जीवित प्राण है बिल्ली का। उसे उसने बिलकुल नहीं जाना, लेकिन वह कहेगा कि मैं जानता हूं कैट यानि बिल्ली। लेकिन बिल्ली को पता भी नहीं होगा कि मैं कैट हूं या बिल्ली हूं। बिल्ली के पता भी नहीं होगा कि आदमी ने मुझे क्या शब्द दे रखे हैं।

और आदमी जमीन पर न हो, तो बिल्ली का क्या नाम होगा? कोई भी नाम होगा। लेकिन बिल्ली फिर भी होगी। शब्द कोई भी न होगा, बिल्ली फिर भी होगी। आकाश में तारे होंगे, शब्द कोई न होगा। आदमी नहीं होगा तो। सूरज उगेगा लेकिन शब्द को नहीं होगा। वृक्षों में फूल खिलेंगे लेकिन कोई फूल गुलाब का नहीं होगा। कोई चमेली का नहीं होगा।

शब्द आदमी का इनवेंशन है, आदमी की ईजाद है। लेकिन शब्द से एक भ्रम पैदा होता है।

मैंने सीख लिया कि इस फूल का नाम गुलाब है तो मैं समझता हूं, मैं गुलाब को समझ गया? मैंने शब्द सीख लिया कि इस फूल का नाम गुलाब है तो मैं समझता हूं, मैं गुलाब को समझ गया? शब्द सीख लेने से गुलाब को समझने का क्या संबंध है?

लेकिन जो आदमी गुलाबों की जितनी जातियों का नाम जानता है, समझता हूं मैं गुलाबों का उतरा ही बड़ा जानकार हूं। जितने प्रकार के गुलाबों का नाम बता सकता है, कहेगा कि मैं उतना जानकार हूं। जानकार वह किस चीज का है--गुलाब का या शब्दों का, नामों का? हो सकता है, गुलाब से उसकी कोई पहचान ही नहीं हुई हो। गुलाब को उसने जाना ही न हो कभी? गुलाब से सौंदर्य ने उसे कभी पकड़ा ही न हो, गुलाब कभी उसकी आत्मा पर चित्र न बना हो, गुलाब कभी उसके भीतर प्रविष्ट न हुआ हो। कभी वह गुलाब के भीतर प्रविष्ट न हुआ हो। उसे गुलाब का कोई पता ही न हो, लेकिन वह कहता है, मैं जानता हूं क्योंकि इस फूल का नाम गुलाब है।

हम शब्द सीख रहे हैं, और शब्दों को ज्ञान समझ रखा है। आदमी को अज्ञान में बनाए रखने का सबसे बड़ा कारण है कि आदमी ने शब्दों को ज्ञान मान लिया है। जब तक शब्दों को ज्ञान समझा जाएगा तब तक मनुष्य जाति के जीवन में ज्ञान का कोई जन्म नहीं हो सकता है। शब्द ज्ञान नहीं है। सत्य शब्द के पीछे है, सत्य शब्द के पहले है। सत्य शब्द मिट जाते हैं तब भी शेष रह जाता है। सत्य को हम शब्द देते हैं लेकिन सत्य शब्द नहीं है। लेकिन यह भूल पैदा हो जाती है।

कोई मुझे मिलता है, मैं पूछता हूं, आपका परिचय? वह बता देता, मेरा नाम राम है। फिर मैं दूसरे लोगों को कहता हूं, मैं राम को जानता हूं, मैं जानता क्या हूं? मैं एक शब्द जानता हूं राम, और इस आदमी का नाम राम है, इतना जानने को मैं कहता हूं, मैं जानता हूं, मैं परिचित हूं, मैं भली-भांति जानता हूं। लेकिन उस राम के पीछे क्या छिपा है उस व्यक्ति में क्या छिपा है? उस शब्द में क्या छिपा है?

उस शब्द के पार वह जो असली आदमी है वह क्या है? शब्द तो हैं कि सिंबल है, प्रतीक है। वह असली आदमी, सब्स्टेंस क्या है? उसका मुझे कोई पता नहीं है, लेकिन हम नाम जानकर कहने लगते कि मैं परिचित हूं। हमने सब नाम सीख रखे हैं।

हमने अपने बाबत भी नाम सीख रखे हैं--शरीर आत्मा, परमात्मा, सब हमने सीख रखे हैं। कोई पूछे कौन हैं आप? तो सीखा हुआ आदमी कहेगा मैं आत्मा हूं। आत्मा अमर है। लेकिन सब शब्द हैं, कोरे शब्द हैं क्योंकि किताब में पढ़ लिए गए हैं। जाना कुछ भी नहीं गया है।

हम सब शब्दों की मालकियत कर बैठे हैं। शब्दों को पकड़कर बैठ गए हैं। और जो आदमी शब्दों का जितना कुशल कारीगर होता है वह उतना ज्ञानी मालूम पडता है।

शब्दों से ज्ञान को कोई संबंध नहीं है। इसलिए हम पंडितों को ज्ञानी समझ लेते हैं। पंडित भूलकर भी ज्ञानी नहीं होता। होना भी चाहे तो नहीं हो सकता है जब तक कि पंडित होना मिट न जाए। दुनिया में अज्ञानियों को ज्ञान मिल सकता है लेकिन पंडितों को कभी नहीं मिलता है।

क्योंकि शब्द पर उनकी इतनी पकड़ है गीता उन्हें कंठस्थ है बाइबिल उन्हें पूरी याद है, उपनिषद उन्हें पूरे रटे हैं। वे कहीं बच्चों वाला काम कर रहे हैं सी ए टी कैट यानि बिल्ली। वह उपनिषद कंठस्थ कर लिए हैं, गीता कंठस्थ कर ली है। जब भी पूछिए तो गीता बोलना शुरू हो जाती है, उपनिषद निकलनी शुरू हो जाती है। हमें लगता है, आदमी बहुत ज्ञानी है। लेकिन क्या निकल रहा है बाहर? सिवाय शब्दों के और कुछ भी नहीं। शब्द के कारण मनुष्य अपने को जानने से वंचित है।

फिर क्या रास्ता हो सकता है? शब्दों से कोई ऊपर उठे तो स्वयं को जान कसता है? सत्य के पार उठे, शब्द को छोड़े, शब्द के पीछे जाए, फूल शब्द को छोड़ दे, और जो फूल है उस तक पहुंच। गुलाब शब्द को छोड़ दे और जो गुलाब का फूल है वस्तुतः उस तक जाए, तो शायद जान भी सकता है।

अमृत द्वार-(विविध) -प्रवचन-03

= *उपदेश चेतावनी का अंग ८२(१४९-५२)* =

🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷

🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷 
*आज्ञा मांही बाहर भीतर, आज्ञा रहै समाइ ।*
*आज्ञा मांही तन मन राखै, दादू रहै ल्यौ लाइ ॥* 
*(श्री दादूवाणी ~ निष्काम पतिव्रता का अंग)*
=============== 
**श्री रज्जबवाणी** 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
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*उपदेश चेतावनी का अंग ८२*
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मन उनमनी लागा रहै, माया मध्य न जाय । 
ब्रह्म अग्नि में जारै बीज हिं, बहुरि उगै नहिं आय ॥१४९॥
मन सहज समाधि में लगा रहे, माया में नहीं जाय, ब्रह्म ज्ञानाग्नि में अज्ञान रूप बीज को जला दे, जिससे पुन: नहीं उगे अर्थात जन्म लेकर संसार में न आवे । 
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रज्जब राखै मीच मन, हरि को भूलै नाँहिं । 
यहु दीक्षा उपदेश यहु, साधों के मत माँहिं ॥१५०॥
मृत्यु को मन में याद रक्खे, हरि का स्मरण न भूले, संतों के सिद्धान्त में यही गुरु दीक्षा है और यही संत - शास्त्रों का उपदेश है । 
राग करोहु रंकार१ से, अलिफ२ अराधो३ मन्न४ । 
रे रज्जब संसार में, और न ऐसा धन्न५ ॥१५१॥ 
राम मंत्र के बीज "राँ१" से प्रेम कर, संसार के आदि२ स्वरूप राम की मन४ से उपासना३ कर, हे प्राणी ! संसार में ऐसा धन५ अन्य कोई भी नहीं है । 
बहु विद्या रु विभूति१ बहु, बहु सुन्दर सुकुलीन । 
रज्जब चहुं२ में चूक३ यहु, सुमिरण सुकृत हीन ॥१५२॥ 
विद्या वाले विद्धान बहुत हैं, ऐश्वर्य१ वाले धनी बहुत हैं, सुन्दर बहुत हैं और सुकुलीन भी बहुत हैं, किन्तु हरि - स्मरण और पुण्य कर्म से हीन हैं वा हरि - स्मरण रूप सुकृत से हीन हैं तो वो उक्त चारों२ में ही भूल३ हैं । 
(क्रमशः)

= ३० =


#daduji
॥ दादूराम सत्यराम ॥ 
*श्री दादू अनुभव वाणी, द्वितीय भाग : शब्द* 
*राग गौड़ी १, गायन समय दिन ३ से ६* 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
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३० - उपदेश चेतावनी । त्रिताल
का जिवना का मरणा रे भाई,
जो तैं राम न रमसि अघाई ॥टेक॥
का सुख सँपति छत्रपति राजा,
वनखँड जाइ बसे किहिं काजा ॥१॥
का विद्या गुन पाठ पुरानाँ,
का मूरख जो तैं राम न जानाँ ॥२॥
का आसन कर अहनिशि जागे,
का फिर सोवत राम न लागे ॥३॥
का मुक्ता, का बँधे होई,
दादू राम न जाना सोई ॥४॥
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*यथार्थ ब्रह्मज्ञान से ही जीवन की सफलता है यह बता रहे हैं -* 
.
हे भाई ! यदि तू राम के स्वरूप में अरस - परस होकर अद्वैतानन्द से तृप्त नहीं हुआ तो अधिक जीने में और मरणे में क्या विशेषता है ? 
.
छत्रपति राजा होकर सँपत्ति का सुख लिया तो भी क्या तृप्ति होती है ? यदि राज्यादि से तृप्ति हो जाती तो राजा लोग किस लिये वन में जाकर बसे थे ? 
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हे अज्ञ ! यदि तूने राम को नहीं जाना तो तेरे अधिक विद्या, गुनने, कला सीखने और पुराण - पाठ करने से क्या लाभ है ? 
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यदि राम के चिन्तन में नहीं लगे तो सिद्धि प्राप्ति के लिये आसन लगा कर दिन - रात जागने से या सोने से क्या लाभ है ? 
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जिनने राम को अद्वैत रूप से नहीं जाना, उनकी मुक्तता और बद्धता में क्या विशेषता है ? वे तो दोनों ही समान हैं, अर्थात् वाणी मात्र से अपने को मुक्त कहने वाला भी बद्ध ही है ।
(क्रमशः)

श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ~ १/४

🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*दादू जैसे श्रवणा दोइ हैं, ऐसे होंहि अपार ।*
*राम कथा रस पीजिये, दादू बारंबार ॥* 
*(श्री दादूवाणी ~ परिचय का अंग)* 
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साभार ~ Tapasvi Ram Gopal 

*कथा श्रवण से मोह शांत -*
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कथा श्रवण से होत है, मोह शांत सत जान ।
हुआ गरुड़जी का तरत, रामरूप पहचान ॥१९॥
लंका युद्ध के समय मेधनाथ ने जब श्री रामचन्द्र आदि को नागपाश में बांध लिया था तब नारदजी ने गरुड़जी को भेजा । 
गरुड़जी ने सब सर्पों को खा लिया । इससे मेधनाद की माया तो नष्ट हो गई किन्तु गरुड़जी को मोह(भ्रम) हो गया ।
*"यदि रामचन्द्र ईश्वर होते तो राक्षस की माया से कैसे बंध जाते ।"*
इस संशय की निवृति के लिये गरुड़जी ब्रह्माजी के पास गये । ब्रह्माजी ने शिवजी पास भेजा । शिव जी ने काकभुशुण्डि के पास भेजा । काकभुशुण्डि ने रामायण कथा सुनाई तब गरुड़जी का भ्रम दूर हुआ । इससे सूचित होता है कि कथा श्रवण से मोह शांत हो जाता है ।
###श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ### श्री नारायणदासजी पुष्कर अजमेर ###
######## सत्य राम सा

श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ~ १/३

🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*परम कथा उस एक की, दूजा नांही आन ।*
*दादू तन मन लाइ कर, सदा सुरति रस पान ॥* 
*(श्री दादूवाणी ~ साधु का अंग)* 
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साभार ~ Tapasvi Ram Gopal
*कथा श्रवण से महान उन्नति -*
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कथा श्रवण से होत हैं, उन्नति परम सुजान ।
नारद सुन कर हो गये, ब्रह्म पुत्र महान ॥१८॥
नारद जी पूर्व जन्म में दासी पुत्र थे । उनकी माता ऋषियों की सेवा करती थी । माता काम-काज करने में लगी रहती थी और बालक ऋषियों के पास कथा श्रवण करता रहता था । 
कथा श्रवण के प्रताप से ही उनके मन में भक्ति, ज्ञान और वैराग्य प्रगट हो गये थे । और उसी कथा के प्रताप से वह बालक आगे चल कर ब्रह्मा जी का पुत्र होकर नारदजी के नाम से प्रसिद्ध हुआ । 
इससे सूचित होता है कि कथा श्रवण से महान उन्नति होती है ।
### नवधा भक्ति ### ### श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ##
### श्री नारायणदासजी पुष्कर, अजमेर ###
######## सत्यराम सा

बुधवार, 28 अगस्त 2019

= सुन्दर पदावली(२५.राग ऐराक - ३/१) =

#daduji
॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥ 
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली* 
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी, 
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान) 
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*प्रीतम रे मेरा एक तूं और न दूजा कोई ।* 
*गुप्त भया किस कारनै काहे न परगट होई ॥(टेक)* 
*हृदै रे मेरै तूं बसै रसना नाम तुम्हारा ।* 
*श्रवनहुं तेरे गुन सुनौं नैंनहु पीव पियारा ॥१॥* 
*नष शिष रे तूंही रमि रह्या रोम रोम घट सारै ।* 
*मन मनसा मैं तूं बसै छिन छिन सुरति संभारै ॥२॥* 
हे मेरे प्रियतम ! मेरे एकमात्र साथी आप हैं, अन्य कोई नहीं । अतः आप कहाँ छिपे हुए हैं । मेरे सन्मुख क्यों नहीं आते ॥टेक॥ 
मेरे हृदय में आपका ही नाम है । जिह्वा भी दिनरात आपका ही नाम रटती रहती है । मेरे कान भी लोगों द्वारा की गयी आपकी प्रशंसा ही सुनते रहते हैं । हे प्रिय ! मेरे नेत्रों के लिये भी एकमात्र आप ही प्रियदर्शन हैं ॥१॥ 
मेरे नख से शिखा तक समस्त शरीर के रोम रोम में आपका ही वास है । अधिक क्या कहूँ मेरा मन एवं उसकी वासना(इच्छा) में भी आप ही रमे हुए हैं; क्योंकि वहाँ भी मैं आपका ही चिन्तन करता रहता हूँ । अर्थात् मेरी सुरति(मानसिक ध्यान) आप में ही लगी रहती है ॥२॥
(क्रमशः)