गुरुवार, 29 जून 2023

*(२)श्रीरामकृष्ण तथा अवतारवाद*

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*काया की संगति तजै, बैठा हरि पद मांहि ।
दादू निर्भय ह्वै रहै, कोई गुण व्यापै नांहि ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ सजीवन का अंग)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*(२)श्रीरामकृष्ण तथा अवतारवाद*
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श्रीरामकृष्ण मास्टर से डाक्टर सरकार की बातें कह रहे हैं । पहले दिन मास्टर श्रीरामकृष्ण का हाल लेकर डाक्टर सरकार के पास गये थे ।
श्रीरामकृष्ण - तुम्हारे साथ क्या-क्या बातें हुई ?
मास्टर - डाक्टर के यहाँ बहुत सी पुस्तकें हैं । मैं वहाँ बैठा हुआ एक पुस्तक पढ़ रहा था । उसी से कुछ अंश पढ़कर डाक्टर को सुनाने लगा । सर हम्फ्रे डेवी की पुस्तक है । उसमें अवतार की आवश्यकता पर लिखा गया है ।
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श्रीरामकृष्ण – हाँ ? तुमने क्या कहा था ?
मास्टर - उसमें एक बात यह है कि ईश्वर की वाणी आदमी के भीतर से होकर बिना आये मनुष्य उसे समझ नहीं सकते । इसीलिए अवतार की आवश्यकता है ।
श्रीरामकृष्ण – वाह ! ये सब तो बड़ी अच्छी बातें हैं ।
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मास्टर - लेखक ने उपमा दी है कि सूर्य की ओर कोई देख नहीं सकता, परन्तु सूर्य की किरणें जिस जगह पर पड़ती है (Reflected Rays) वहाँ लोग देख सकते हैं ।
श्रीरामकृष्ण - यह तो बड़ी अच्छी बात है, कुछ और है ?
मास्टर - एक दूसरी जगह लिखा था, यथार्थ ज्ञान विश्वास है ।
श्रीरामकृष्ण - ये तो बहुत सुन्दर बातें है । विश्वास हुआ तब तो सब कुछ हो गया ।
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मास्टर - लेखक ने स्वप्न में रोमन देव-देवियों को देखा था ।
श्रीरामकृष्ण - क्या इस तरह की पुस्तकें निकल रही हैं ? ऐसी जगह वे ही (ईश्वर) काम कर रहे हैं । और भी कोई बात हुई ?
मास्टर - वे लोग कहते हैं, हम संसार का उपकार करेंगे । तब मैंने आपकी बात कही ।
श्रीरामकृष्ण (सहास्य) - कौनसी बात ?
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मास्टर - शम्भु मल्लिक-वाली बात । उसने आपसे कहा था, ‘मेरी इच्छा होती है कि रुपये लगाकर कुछ अस्पताल और दवाखाने, स्कूल आदि बनवा दूँ । इससे बहुतों का उपकार होगा ।’ आपने उससे कहा था, ‘अगर ईश्वर सामने आये तो क्या तुम कहोगे, मेरे लिए कुछ अस्पताल, दवाखाने और स्कूल बनवा दो ?’ एक बात मैंने और कही थी ।
श्रीरामकृष्ण - जो कर्म करने के लिए आते हैं उनका दर्जा अलग है । हाँ, कौनसी बात ?
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मास्टर – मैंने कहा, ‘यदि आपका उद्देश्य श्रीकाली की मूर्ति का दर्शन करना है तो सड़क के किनारे खड़े होकर गरीबों को भीख बाँटने में ही अपना सब समय लगा देने से क्या लाभ होगा ? पहले आप किसी प्रकार मूर्ति के दर्शन कर लें । फिर जी भर के भीख दें !’
श्रीरामकृष्ण - और भी कोई बात हुई ?
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मास्टर - आपके पास जो लोग आते हैं, उनमें बहुतों ने काम को जीत लिया है, यह बात हुई । डाक्टर ने कहा, ‘मेरा भी कामभाव दूर हो गया है, इतना समझ लेना ।’ मैंने कहा, ‘आप तो बड़े आदमी हैं । आपने काम को जीत लिया तो कोई आश्चर्य की बात नहीं । क्षुद्र प्राणियों में भी, उनके पास रहकर, इन्द्रियों को जीतने की शक्ति आ रही है, यही आश्चर्य है ।’ फिर मैंने वह बात कही जो आपने गिरीश घोष से कही थी ।
श्रीरामकृष्ण (सहास्य) - क्या कहा था ?
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मास्टर- आपने गिरीश घोष से कहा था, ‘डाक्टर तुमसे ऊँचे नहीं चढ़ सका ।’ वही अवतारवाली बात ।
श्रीरामकृष्ण - अवतार की बात उससे (डाक्टर से) कहना । अवतार वे हैं जो तारते हैं । इस तरह दस अवतार हैं, चौबीस अवतार है और असंख्य अवतार भी हैं ।
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मास्टर - गिरीश घोष की वे (डा. सरकार) खूब खबर रखते हैं । यही पूछते रहे कि गिरीश घोष ने क्या बिलकुल शराब पीना छोड़ दिया ? उन पर खूब नजर है ।
श्रीरामकृष्ण - क्या गिरीश घोष से यह बात तुमने कही थी ?
मास्टर - जी हाँ, कही थी, और बिलकुल शराब छोड़नेवाली बात भी ।
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श्रीरामकृष्ण - उसने क्या कहा ?
मास्टर - उन्होंने कहा, ‘तुम लोग जब कह रहे हो, तो इस दशा में इसे श्रीरामकृष्ण की बात समझकर मान लेता हूँ - परन्तु मैं स्वयं अब जोर देकर कोई बात न कहूँगा ।’
श्रीरामकृष्ण - (आनन्दपूर्वक) - कालीपद ने कहा है, उसने एकदम शराब पीना छोड़ दिया है ।
(क्रमशः)

*श्री रज्जबवाणी पद ~ १६६*

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*यहु रस मीठा जिन पिया, सो रस ही मांहि समाइ ।*
*मीठे मीठा मिल रह्या, दादू अनत न जाइ ॥*
(श्री दादूवाणी ~ पद्यांश. ५८)
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*श्री रज्जबवाणी पद ~ भाग २*
अथ राग वसंत १४(गायन समय प्रभात ३-६ बजे तथा वसंत ॠतु)
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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१६६ रस-मत्त । त्रिताल
मतवाले रे मतवाले,
निर्मल भक्ति प्रेम रस पीवै, देह गलित१ गुण गाले२ ॥टेक॥
विरह दरीबे३ में जन बैठे, पल पल पीवै प्याले ।
विसरे देह गेह सुख सम्पति, माया ओढन डाले ॥१॥
भाठी४ भाव सुधा रस निकसे, सुरति मंडी५ तिस नाले६ ।
मगन होय पंचों मिल बैठे, निमष सके नहिं चाले ॥२॥
अह निशि सदा एक रस लागे, बैठि इंकत निराले७ ।
रज्जब चरण शरण तिन चेरा, जे रस रूप विचाले८ ॥३॥१॥
प्रेम भक्ति में मत्त संतों का परिचय दे रहे हैं -
✦ जिनने निर्मल प्रेमाभक्ति रूप रस पान करते हुये देहाभिमान को नष्ट१ करके गुणों को नष्ट२ कर डाला है, वे मतवाले हो रहे हैं ।
✦ विरह रूप बाजार३ में बैठे हुये संत जन क्षण क्षण में प्रेम भक्ति रूप रस का प्याला पीते रहते हैं । रसमें मत्त होकर शरीर, घर, सांसारिक सुख और संपत्ति को भूल जाते हैं । माया रूप ओढने के वस्त्र को दूर डाल देते हैं ।
✦ श्रद्धा रूप भट्टी४ के पास से प्रेमाभक्ती रूप रस निकलता है । उनकी वृत्ति उस श्रद्धा रूप भट्टी के पास६ बैठकर उक्त रस के पान में लगी५ रहती है । पंच ज्ञानेन्द्रिय भी रस पान में निमग्न होकर मनोवृति के साथ ही बैठी रहती है । मन की वृत्ति के बिना वे एक निमिष भी अन्यत्र नहीं जा सकतीं ।
✦ इस प्रकार उनके मन इन्द्रिय विषयों से अलग७ हो, एकान्त में बैठकर दिन रात सदा एकरस भक्ति रस पान में लगे रहते हैं । जो सदा उक्त प्रकार भक्ति रस के बीच८ में ही निमग्न रहते हैं, मैं उनका सेवक होकर उनके चरण कमलों की शरण हूँ ।
(क्रमशः)

शब्दस्कन्ध ~ पद #३४८

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भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामीआत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामीअर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #३४८)*
*राग विलावल ॥२१॥(गायन समय प्रातः ६ से ९)*
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*३४८. परिचय परीक्षा । यति ताल*
*राम मिल्या यूँ जानिये, जाको काल न व्यापै ।*
*जरा मरण ताको नहीं, अरु मेटै आपै ॥टेक॥*
*सुख दुख कबहुँ न ऊपजै, अरु सब जग सूझै ।*
*कर्म को बाँधै नहीं, सब आगम बूझै ॥१॥*
*जागत ह्वै सो जन रहै, अरु जुग जुग जागै ।*
*अंतरजामी सौं रहै, कछु काई न लागै ॥२॥*
*काम दहै सहजैं रहै, अरु शून्य विचारै ।*
*दादू सो सब की लहै, अरु कबहुं न हारै ॥३॥*
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आत्मा के साक्षात्कार किये हुए जीवन्मुक्त के लक्षण बतला रहा हैं । जिसने भगवान् के स्वरूप को प्राप्त कर लिया है, उसको यम का भी भय नहीं लगता क्योंकि वह ब्रह्म रूप हो गया है ।
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कठोपनिषद् में कहा है कि –
इसी के भय से अग्नि तपता है सूर्य तपता है । तथा इसी के भय से इन्द्र वायु पाचवें मृत्यु देवता अपने-अपने काम में प्रवृत्त रहते हैं । बुढ़ापा मरण आदि शरीर धम्रों से भी वह व्याप्त नहीं होता ।
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क्योंकि वह तो आत्मस्वरूप है । किसी भी पदार्थ का अभिमान नहीं करता । वियोगजन्य दुःखों से तथा अभिलषित पदार्थों की प्राप्ति से प्रसन्न नहीं होता । क्योंकि सारे पदार्थ मायिक होने से मिथ्या है । मिथ्या पदार्थों की प्राप्ति या नाश से कोई भी प्रसन्न या दुःखी नहीं होता ।
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इसी अभिप्राय से गीता “यो न ह्र्ष्यति ब द्वेष्टि न शोचति न कांक्षति” ऐसा कहा हैं । जीवन्मुक्त का कोई कर्मों से बन्धन नहीं होता । श्रुति में कहा है कि ज्ञानी की हृदयग्रन्थि नष्ट हो जाती है । सारे संशय निवृत्त हो जाते हैं और सारे कर्म ध्वस्त हो जाते हैं । क्योंकि उसने उस परावर परमात्मा को जान लिया और वह मोह निशा में नहीं सोता, कारण कि उसके अज्ञान के नष्ट हो जाने से अज्ञानकार्य मोह आदि की उत्पत्ति नहीं हो सकती ।
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अतः ज्ञानी सर्वदा जागता रहता है । प्रत्यगात्मा से अभिन्न होने के कारण वह सर्वविकार रहित होता है आत्मज्ञान से जिसके काम क्रोध आदि नष्ट हो गये हैं तथा जो सदा ब्रह्म विचार में संलग्न है । वह संसार में व्यवहार करता हुआ भी आकाश की तरह निर्लेप तथा सब धर्मों से अतीत हो जाता है । किसी का पक्ष लेकर वाद-विवाद नहीं करता । किन्तु सदा ब्रह्मनिष्ठ रहता है ।
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गीता में लिखा है कि – अपने अधीन किये हुए अन्तःकरणवाला तथा वश में की हुई रागद्वेष से रहित इन्द्रियों द्वारा शब्दादिविषयों को प्राप्त करता हुआ भी ज्ञानी महात्मा प्रसाद स्वच्छता(आत्मा के साक्षात्कार की योग्यता) को प्राप्त हो जाता है । क्योंकि रागद्वेष से प्रयुक्त इन्द्रियाँ ही दोष की हेतु हैं ।
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जब मन वश में है तो रागद्वेष पैदा ही नहीं हो सकते, उनके अभाव में तदधिना इन्द्रिय प्रवृत्ति भी नहीं हो सकती । अवर्जनीय जो विषयों की उपलब्धि हैं वह दोषजनक नहीं मानी जाती जिससे ज्ञानी का चित्त व्यवहारकल में भी स्वच्छ रहता है । अर्थात् अबाधित आत्मज्ञान के सामर्थ्य से बाधित जो भेद प्रतीति है, वह दोष को पैदा नहीं कर सकती ।
(क्रमशः)

*बिसास सुमिरण कौ अंग ॥*

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी*
*दादू निर्विकार निज नांव ले, जीवन इहै उपाय ।*
*दादू कृत्रिम् काल है, ताके निकट न जाय ॥*
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*बिसास सुमिरण कौ अंग ॥*
जे डँक लागै सरप का, ताथैं लहरि न जाऊँ ।
बिसपालण बषनां कहै, नाराइण कौ नाऊँ ॥७॥
कदाचित् राम-नाम की साधना करने वाले प्रारम्भिक स्थिति के साधक की सांसारिक माया मोह रूपी सर्प के डंक प्रभावित = आकर्षित करते भी हैं तो *उसके पास उस आकर्षण को समाप्त करने के लिये रामजी का नाम सर्वदा उपलब्ध रहता है । जिससे लहरि = राम के प्रति एकान्तिक निष्ठा समाप्त नहीं* है क्योंकि सारी विघ्न बाधाओं को शमित करने की सामर्थ्य राम नाम में है । यहाँ सर्प संसार का, सर्प का डंक = संसार के प्रति आकर्षण का प्रतीक है । लहरि = प्रभाव । बिसपालण = विष के प्रभाव को समाप्त करने वाला । नाऊं = नाम ॥७॥
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*अखण्ड सुमिरण कौ अंग ॥ कुंडलिया छंद ॥*
बषनां बहुतेरी करौ हरि सुमिरण की प्यास ।
राम नाम जपिबौ करौ छह रुति बारह मास ॥
छह रुति बारह मास देखि अैसी बिधि कीजै ।
माया तैं मन टालि नांव गोब्यंद का लीजै ॥
बिन लीयाँ न पावस्यौ बात जे करौ अनेरी ।
हरि सुमिरण की प्यास करौ बषनां बहुतेरी ॥८॥
बषनां जी कहते हैं, राम नाम स्मरण करने की प्यास = अभिलाषा प्रभूत मात्रा में करनी चाहिये । रामनाम का जप छहों ऋतुओं और बारहों मासों में अहर्निश करना चाहिये । रामनाम का जप अखण्ड तैलधारावत् पूर्ण श्रद्धा तथा विश्वास के साथ करना चाहिये । वस्तुतः राम नाम जप करने की विधि यही है । साथ ही मन में से माया एवं तज्जन्य संसार का आकर्षण सर्वथा हटाकर गोविन्द = रामजी के नाम का स्मरण करना चहिये । बिना राम नाम जप के रामजी की प्राप्ति सर्वथा असंभव है । अनेरी = अन्य साधनों से रामजी की प्राप्ति दुष्कर ही है । दादूजी महाराज ने कहा है...
“रात दिवस का रोवणा, पहर पलक का नाहिं ।
रोवत रोवत मिल गये, दादू साहिब माहिं ॥”
यहाँ रोवणा = रोना राम-नाम स्मरण के लिये आया है ॥८॥
(क्रमशः)

बुधवार, 28 जून 2023

*३७. निगुणां कौ अंग ५/८*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री @महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी, @Ram Gopal Das बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ @Premsakhi Goswami*
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*३७. निगुणां कौ अंग ५/८*
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निगुणां नीलज्ज नांऊं तजि, कहै कथा कछु आंन ।
जगजीवन जे सुणत हैं, फूटौ तिनका कांन ॥५॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि निगुणा जीव जो प्रभु कृपा नहीं मानते वे स्मरण छोड़कर और ही विषयक कहते रहते हैं और जो उनकी बात सुनते हैं वे भी पाप के भागीदार होते हैं संत कहते हैं कि उनके तो कान ही फूटजाने चाहिए ।
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जे गुरु कह्या सो नां करै, करै पराई बात ।
कहि जगजीवन भ्रमै नर, रांम बिमुख दिन रात ॥६॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जो गुरु का कहा न करे और दूसरी बात ही करते रहे संत कहते हैं कि वे नर भ्रमित हो प्रभु विमुख हो दिन रात डोलते रहते हैं ।
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निगुणांहरि गुण गमावै, औगुण अंग सुहाइ ।
कहि जगजीवन जगतगुरु, रांम न परसै ताहि ॥७॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि निगुणा जीव गुणों को नष्टकर अवगुणों को अपनाता है संत कहते हैं ऐसै जीव को प्रभु कभी नहीं अपनाते ।
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कहि जगजीवन रांमजी, मूरख मिलै न बाग ।
लुबधि१ लाय२ लागी रहै, अंदर परलै आग३ ॥८॥
(१. लुबधि=लुब्धि, लोभ) (२. लाय=अग्नि) (३.परलै आग=प्रलय अग्नि)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि मूरख को कभी भी कृपा नहीं दिखती वह लोभ की अग्नि में जलता हुआ प्रलय अग्नि में दग्ध होता है ।
(क्रमशः)

*६. अलिभगवान् जी की पद्य टीका*

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*दादू नारायण नैना बसै, मनही मोहन राइ ।*
*हिरदा मांही हरि बसै, आतम एक समाइ ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ निष्काम पतिव्रता का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*६. अलिभगवान् जी की पद्य टीका*
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*रामहि पूज अलीभगवान्,*
*वृन्दावन आय रु और भई है ।*
*रास विलास निहार विहार हिं,*
*प्यास बढ़ी रस राशि नई है ।*
*चाह सु रासविहारि हि पूजन,*
*बात सुनी गुरु रीति गई है ।*
*आत भये वन जाय परे पग,*
*ईश तुम शिर के सु दिई है ॥३४७॥*
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अलिभगवान् को उनके गुरुजी ने राममंत्र दिया था और श्रीरामजी की ही सेवा पूजा सदा आप सावधानी से करते थे । किन्तु वृन्दावन में आने पर उनकी दशा दूसरी ही हो गई...
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अर्थात् रास के प्रेमी हो गये और रास-विलास देखकर रस-राशि विहारी जी श्रीकृष्ण के दर्शन की नूतन अभिलाषा उनको बहुत बढ़ गई । अब उनके मन में रासविहारी जी का पूजन करने की इच्छा रहती थी ।
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इनकी यह बात कि - गुरुजी की बताई हुई उपासना की रीति तो उनके हृदय से चली गई है, और अब वे श्रीकृष्ण जी के भक्त बन गये हैं, सुनकर गुरुजी वृन्दावन में आये तब...
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अलिभगवान् उनके पास जाकर तथा चरणों में सिर रख विनय करने लगे- "यद्यपि आप गुरु ईश्वर रूप हैं और आपका उपदेश मेरे शिर पर है तथापि अब मेरा मन रासबिहारी की उपासना में आनन्द मानता है । अलिभगवान् की उक्त बात सुनकर गुरुजी ने कह दिया कि- "रासविहारी जी भी तो रामजी के ही अवतार हैं, रासविहारी को ही भजा करो, इससे कुछ हानि नहीं है ।"
(क्रमशः)

सुरेन्द्र की भक्ति गीता

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*जब मन ही सौं मन लागा,*
*तब ज्योति स्वरूपी जागा ।*
*जब ज्योति स्वरूपी पाया,*
*तब अन्तर मांही समाया ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ पद्यांश. ७९)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*परिच्छेद १२२~श्यामपुकुर में श्रीरामकृष्ण*
*(१)सुरेन्द्र की भक्ति गीता*
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आज विजयादशमी है । १८ अक्टूबर १८८५ । श्रीरामकृष्ण श्यामपुकुरवाले मकान में हैं । शरीर अस्वस्थ रहता है, कलकत्ते में चिकित्सा कराने के लिए आये हैं । भक्तगण निरन्तर रहते और उनकी सेवा किया करते हैं । भक्तों में से अभी तक किसी ने संसार का त्याग नहीं किया । वे लोग अपने घर से आया-जाया करते हैं ।
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जाड़े का मौसम है, सबेरे आठ बजे का समय है । श्रीरामकृष्ण अस्वस्थ हैं, बिस्तर पर बैठे हुए हैं, जैसे पाँच वर्ष का बालक जो माता के सिवा और कुछ नहीं जानता । सुरेन्द्र आये और आसन ग्रहण किया । नवगोपाल, मास्टर तथा और भी कई लोग उपस्थित हैं । सुरेन्द्र के यहाँ दुर्गापूजा हुई थी । श्रीरामकृष्ण नहीं जा सके; भक्तों को प्रतिमा के दर्शन करने के लिए भेजा था । आज विजयादशमी है, इसीलिए सुरेन्द्र का मन कुछ उदास है ।
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सुरेन्द्र - मैं घर से भाग आया ।
श्रीरामकृष्ण (मास्टर से) - प्रतिमा पानी में डाल दी गयी तो क्या, माँ बस हृदय में विराजती रहें ।
सुरेन्द्र ‘माँ माँ’ करके जगदीश्वरी के सम्बन्ध में बहुत कुछ कहने लगे ।
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श्रीरामकृष्ण सुरेन्द्र को देखते हुए आँसू बहाने लगे । मास्टर की ओर देखकर गद्गद स्वर से कहने लगे, “अहा ! कैसी भक्ति है ! ईश्वर के लिए कैसा अगाध प्रेम !”
श्रीरामकृष्ण - कल साढ़े सात बजे के लगभग मैने देखा, तुम्हारे दालान में श्रीदेवीप्रतिमा है, चारों ओर ज्योति हो ज्योति है । सब एकाकार हो गया है - यह और वह । दोनों जगह के बीच मानो ज्योति की एक तरंग बह रही है - इस घर से तुम्हारे उस घर तक ।
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सुरेन्द्र - उस समय मैं देवोजीवाले दालान में खड़ा हुआ “माँ माँ” कहकर उन्हें पुकार रहा था । मेरे भाई मुझे छोड़कर ऊपर चले गये थे । मेरे मन में ऐसा जान पड़ा कि माँ कह रही हैं, ‘मैं फिर आऊँगी ।’
दिन के ग्यारह बजे का समय है । श्रीरामकृष्ण को पथ्य दिया गया । मणि मुँह धुलाने के लिए उनके हाथों पर पानी डाल रहे हैं ।
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श्रीरामकृष्ण (मणि से) - चने की दाल खाकर राखाल कुछ अस्वस्थ है । आहार सात्विक करना अच्छा है । तुमने गीता में नहीं देखा ? क्या तुम गीता नहीं पढ़ते ?
मणि - जी हाँ, युक्ताहार की बातें हैं । सात्विक आहार, राजसिक आहार और तामसिक आहार; और सात्त्विक दया, राजसिक दया और तामसिक दया भी हैं । सात्विक अहं आदि सब है ।
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श्रीरामकृष्ण - तुम्हारे पास गीता है ?
मणि - जी हाँ, है ।
श्रीरामकृष्ण - उसमें सब शास्त्रों का सार है ।
मणि - जी हाँ, ईश्वर को अनेक प्रकार से देखने की बातें लिखी हैं; आप जैसा कहते हैं, अनेक मार्गों से उनके पास जाना; ज्ञान, भक्ति, कर्म, ध्यान आदि अनेक मार्गों से ।
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श्रीरामकृष्ण - कर्मयोग का अर्थ जानते हो ? सब कर्मों का फल ईश्वर को समर्पण कर देना ।
मणि - जी हाँ, मैंने देखा है । गीता में लिखा है, कर्म भी तीन तरह से किये जा सकते हैं ।
श्रीरामकृष्ण - किस किस तरह से ?
मणि – प्रथम, ज्ञान के लिए । दूसरा, लोक-शिक्षा के लिए । तीसरा, स्वभाववश ।
(क्रमशः)

मंगलवार, 27 जून 2023

*श्री रज्जबवाणी पद ~ १६५*

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*हिरदै की हरि लेइगा, अंतरजामी राइ ।*
*साच पियारा राम को, कोटिक करि दिखलाइ ॥*
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*श्री रज्जबवाणी पद ~ भाग २*
राग सोरठ १३ (गायन ९ से १२ रात्रि वा वर्षा ॠतु)
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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१६५ प्रभु सर्वज्ञता । तिलवाड़ा
मेरो नाह१ निकुल२ निज ज्ञानी हो,
कहा करूं कछु कहत न आवे, प्रगट गुप्त नहिं छानी३ हो ॥टेक॥
अंतर्यामी अंदर देखे, ता सौं कहा दुरानी४ हो ।
वक्त्र५ बनाय कहै बिच औरै, या परि अर्ज न मानी हो ॥१॥
सर्वंगी समझै सब ठाहर, जो नख शिख मन सानी६ हो ।
न्याय नीति वा७ सम को नांही, छाने८ दूध रु पानी हो ॥२॥
सूधी९ सुरति१० न साँची उपजी, दिल सौं दिल न ठरानी११ हो ।
रज्जब रुचि१२ भरि कैसे पावै, गति१३ गोविन्द नहिं जानी हो ॥३॥३॥
प्रभु की सर्वज्ञता दिखा रहे हैं -
✦ हमारे प्रभु१ किसी के वश में नहीं है इससे अकुल२ हैं । किसी दूसरे के उपदेश से ज्ञानी नहीं हुये हैं, इसलिये निज ज्ञानी है । उनके विषय में क्या कहूं, कुछ कहा नहीं जाता, संसार की प्रकट और गुप्त दोनों ही बातें उनसे छिपती३ नहीं हैं, वे सर्वज्ञ हैं, सब जानते हैं ।
✦ वे अंतरयामी भीतर ही सब देख लेते हैं, उनसे क्या बात छिपाई४ जा सकती है ? भीतर तो दूसरी बात हो और मुख५ से दूसरी बना कर कहें, तब इस चालाकी से वे प्रार्थना करने पर भी नहीं मानते ।
✦ वे तो सर्व रूप हैं । वे सब स्थानों में रहते हुये जो नख से शिखा तक तथा मन में मिली६ हैं उन सब भावनाओं को समझते हैं । उनके७ समान न्याय नीति में निपुण कोई भी नहीं है, वे तो दूध और पानी को अलग८ अलग करने वाले हैं ।
✦ जिसकी वृत्ति९ सरल१० नहीं है, जिसमें सच्ची प्रीति उत्पन्न नहीं हुई है, जिसके हृदय की भावना से दूसरे का हृदय शीतल११ नहीं होता और जिसने गोविन्द की चेष्टा१३ को नहीं जाना है, वह इच्छा१२ भर कर प्रभु को कैसे प्राप्त कर सकता है ।
इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित सोरठ राग १३ समाप्तः ।
(क्रमशः)

शब्दस्कन्ध ~ पद #३४७

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भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामीआत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामीअर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #३४७)*
*राग विलावल ॥२१॥(गायन समय प्रातः ६ से ९)*
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*३४७. साधु परीक्षा । दादरा*
*सोई साधु शिरोमणि, गोविंद गुण गावै ।*
*राम भजै विषिया तजै, आपा न जनावै ॥टेक॥*
*मिथ्या मुख बोलै नहीं, पर निंदा नाँहीं हीं ।*
*औगुण छाड़ै गुण गहै, मन हरि पद मांहीं ॥१॥*
*निर्वैरी सब आतमा, पर आतम जानै ।*
*सुखदाई समता गहै, आपा नहीं आनै ॥२॥*
*आपा पर अंतर नहीं, निर्मल निज सारा ।*
*सतवादी साचा कहै, लै लीन विचारा ॥३॥*
*निर्भय भज न्यारा रहै, काहू लिप्त न होई ।*
*दादू सब संसार में, ऐसा जन कोई ॥४॥*
.
जो साधु भगवान् के गुणानुवाद गाता है । विषयों की आसक्ति को छोड़कर भगवान् का भजन करता है । किसी प्रकार का अभिमान नहीं करता मिथ्या नहीं बोलता । निन्दा नहीं करता । दूसरे के अवगुणों को त्यागकर गुण ही ग्रहण करता है । जिस का मन प्रभु भक्ति में लगा हुआ है । किसी से वैरभाव नहीं रखता । दूसरों को भी अपने समान ही समझता है ।
.
सबको सुख देने वाली समत्व बुद्धि को धारण करता है । अपना पराया जिसके मन में भेद नहीं हैं तथा सबको परमात्मरूप से ही देखता है । सत्य बोलना और सत्य ब्रह्म का सच्चा उपदेश करना । जिसका मन सतत ब्रह्म में ही लीन रहता हो । निर्भय हो, तथा वैराग्यवान् होकर भगवान् को भजता है । सबसे निर्लिप्त रहता हो । ऐसा साधु भक्त सब भक्तों में शिरोमणि माना गया है । परन्तु ऐसे भक्त विरले ही होते हैं ।
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श्रीमद्भागवत में –
महापुरुष वे ही कहलाते हैं जो समचित्त परमशान्त क्रोधहीन सबके हितचिन्तक और सदाचारसंपन्न हो । श्रीभागवत के ११ स्क. अ. २ –
भगवान् समस्त प्राणियों में आत्मरूप से स्थित हैं । जो कहीं भी न्यूनाधिकता न देखकर सर्वत्र परिपूर्ण भगवत्सत्ता को ही देखता है और साथ ही समस्त प्राणी और समस्त पदार्थ आत्मस्वरूप भगवान् में अध्यस्त रूप से स्थित है । ऐसा जिसका अनुभव है वह भगवान् का परम प्रेमी उत्तम भक्त है । जो इन्द्रियों के द्वारा शब्द स्पर्श रूप आदि विषयों को ग्रहण करता है ।
किन्तु अपनी इच्छा के विपरीत विषयों से द्वेष नहीं करता तथा अनुकूल विषयों के मिलने पर हर्षित नहीं होता । उसकी यह दृष्टि बनी रहती है कि यह सब भगवान् की माया है । ऐसे भाव वाला उत्तम सन्त हैं । जो धन सम्पत्ति अथवा शरीर आदि में यह अपना है और यह पराया है ऐसा भेद नहीं रखता । समस्त पदार्थों में सम स्वरूप परमात्मा को देखता है । समभाव रखता है । किसी घटना से या संकट में विक्षिप्त नहीं होता किन्तु शांत रहता है । वह उत्तम भक्त है ।
(क्रमशः)

*भजन जड़ी कौ अंग ॥*

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी*
*दादू निर्विष नाम सौं, तन मन सहजैं होइ ।*
*राम निरोगा करेगा, दूजा नांही कोइ ॥*
========
*भजन जड़ी कौ अंग ॥*
अमर जड़ी पानैं पड़ी, सो सूंघी सत जाणि ।
बषनां बिसहर सौं लड़ै, न्यौल जड़ी के पाणि ॥५॥
राम-गुरु-कृपा से जिस भाग्यशाली साधक का, अमरजड़ी = राम-नाम-स्मरण में, पानै पड़ी = चित्त आसक्त हो जाता है, सतजाणि = सत्य जानिये कि रामनाम रूपी जड़ी भवबाधा रूपी रोग को निर्मूल करने के लिये अत्यन्त = सस्ते दामों में = अनायास ही मिल गई है ।
ऐसा साधक इस न्यौलजड़ी = को बस में कर लेने वाली जड़ी बूँटी = राम-नाम-स्मरण के पाणि = बल से आवागमन भयानक बिसहर = साँप से लड़कर उसे अपने वशीभूत कर लेता है और मोक्ष रूपी लक्ष्य प्राप्त कर लेता है ॥५॥
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कीड़ी कुंजर सौं लड़ै, गाइ सिंघ कै संग ।
बषनां भजन प्रताप थैं, निबला सबलौं अंग ॥६॥
कीड़ी = चींटी रूपी सुरति कुंजर = हाथी रूपी अहंकारादि दुष्टवृत्तियों से लड़ती है । गाय रूपी जीवात्मा सिंघ रूपी विषय भोगों से लड़ता है । बषनांजी कहते हैं, ये दोनों ही निर्बल हैं तथापि रामनाम-भजन रूपी सबल = बलशाली का आश्रय पाकर ये अपने शत्रुओं से लड़ती हैं और मोक्ष रूपी विजय हासिल करती हैं । अथवा ये निर्बल भी राम-नाम के प्रभाव से सबल हो जाती है ॥६॥
(क्रमशः)

सोमवार, 26 जून 2023

*३७. निगुणां कौ अंग १/४*

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*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ @Premsakhi Goswami*
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*३७. निगुणां कौ अंग १/४*
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निगुणां सेती गुण किया, निरफल जांहि अचेत ।
जगजीवन ऊसर बोयाँ, कहि क्यूं निपजै खेत ॥१॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि प्रभु की सत्ता को न मानकर यदि कुछ उद्यम किया तो वह निःफल ही जायेगा जैसे बंजर भूमि में बोया बीज निष्फल हो जाता है ।
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निगुणा सगुंणा का कहै, जिन मंहि भगति न भाव ।
कहि जगजीवन जहँ नीर नहिं, तहां क्यों चाले नाव ॥२॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जीव सगुण, निर्गुण क्या करता है यदि अंतर में भक्ति का भाव नहीं है । संत कहते है कि जहां जल ही नहीं है वहां नाव कैसे चलेगी ।
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हरि तजि औगुण राख चित, दुःख कर देह दहंत ।
कहि जगजीवन अलख हरि, ते नहिं साध कहंत ॥३॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जो प्रभु को छोड़कर अवगुण चित में रखते हैं उनकी देह दुख से जलती रहती है संत कहते हैं कि वे प्रभु पर भरोसा करनेवाले साधु नहीं हैं ।
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दिल दाझै४ दुरमति५ ह्रिदै, जिनके मांही दोख ।
जगजीवन हरि थैं बिमुख, तिनकी मुकति न मोख ॥४॥
(४. दाझै=जला दे) (५. दुरमति=दुर्मति=कुबुद्धि)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जो दूसरों का दिल जलाते हैं जो दुर्बुद्धि है जिनके हृदय मे ये दोष है वे प्रभु विमुख हैं उनकी मुक्ति व मोक्ष कुछ भी नहीं हो सकता है ।
(क्रमशः)

*लोकनाथजी गोस्वामी*

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*समता के घर सहज में, दादू दुविध्या नांहि ।*
*सांई समर्थ सब किया, समझि देख मन मांहि ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ समर्थता का अंग)*
==========
*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
.
*लोकनाथजी गोस्वामी*
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*कृष्ण जु चैतनि के भृत उत्तम,*
*लोकहु नाथ सबै सुखदाई ।*
*कृष्ण प्रियासु विहार रहै मन,*
*ज्यों जल मीन निशा दिन जाई ॥*
*भागवतं रस गान सु प्रान हि,*
*गावत हैं तिन से मितराई ।*
*माग चलै पगु लागि रसिक्कसु,*
*नेह सु रीति दया तैं जिताई ॥३४९॥*
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लोकनाथजी महाप्रभु श्रीकृष्ण चैतन्य जी के श्रेष्ठ शिष्य थे और सभी को सुख देने वाले थे । श्रीराधाकृष्ण जी के लीला रूप विहार में आपका मन सदा लगा रहता था ।
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जैसे मच्छी के रात्रि दिन जल में ही व्यतीत होते हैं, वैसे ही आपके रात्रि-दिन राधाकृष्ण की भक्ति में ही व्यतीत होते थे ॥ वृन्दावन धाम में आपका अति प्रेम था ।
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श्रीमद्भागवत का गायन रूप रस आपके प्राणों के समान था । जो श्रीमद्भागवत का गायन करते थे, उनसे आप मित्रता करते थे और कहते थे कि ये हमारे मित्र हैं ।
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एक दिन भागवत रस के रसिकशिरोमणि आम मार्ग चलते हुये एक सज्जन को श्रीमद्भागवत गाते हुये सुनकर उसके चरणों में पड़ गये थे और दया करके प्रेम की यह उत्तम रीति सबको बता दी, जिससे श्रीमद्भागवत के महात्म्य का ज्ञान और उसमें अन्य की भी श्रद्धा हो । एक दिन इनके ठाकुरजी के भूषण चोर चुराकर चल दिये किन्तु थोड़ी ही दूर जाकर अन्धे हो गये और लौटकर पीछे वहाँ ही आ गये । आपके चरणों में पड़ गये । आपने उन पर कृपा ही की थी ।
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५. हृषीकेशजी — ने भी वृन्दावन की मधुर भक्ति का रसपान करके परम तृप्ति लाभ की थी ।
(क्रमशः)

रविवार, 25 जून 2023

‘देह’ खोल मात्र है ...

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*नाहीं ह्वै करि नाम ले, कुछ न कहाई रे ।*
*साहिब जी की सेज पर, दादू जाई रे ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ परिचय का अंग)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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मास्टर के प्रति आत्मज्ञान का उपदेश – ‘देह’ खोल मात्र है ....
बृहस्पतिवार, २८ सितम्बर, पूर्णिमा की रात को श्रीरामकृष्ण अपने कमरे में तख्त पर बैठे हैं । गले के रोग से पीड़ित हैं ।
मास्टर आदि भक्तगण जमीन पर बैठे हैं ।
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श्रीरामकृष्ण (मास्टर के प्रति) - कभी कभी सोचता हूँ, यह देह केवल खोल है । उस अखण्ड (सच्चिदानन्द) के अतिरिक्त और कुछ नहीं है ।
“भाव का आवेश होनेपर गले का रोग एक किनारे पड़ा रहता है । अब थोड़ा-थोड़ा वह भाव हो रहा है और हँसी आ रही है ।”
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द्विज की बहन और छोटी दादी श्रीरामकृष्ण की अस्वस्थता का समाचार पाकर देखने के लिए आयी हैं । वे प्रणाम करके कमरे के एक कोने में बैठीं । द्विज की दादी को श्रीरामकृष्ण कह रहे है, “ये कौन हैं ? जिन्होंने द्विज को पाला पोसा है ? अच्छा, द्विज ने एकतारा क्यों खरीदा है ?”
मास्टर – जी, उसमें दो तार हैं ।
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श्रीरामकृष्ण - उसके पिता उसके विरोधी हैं । सब लोग क्या कहेंगे ? उसको तो गुप्त रूप से ईश्वर को पुकारना ही ठीक है ।
श्रीरामकृष्ण के कमरे की दीवाल पर टँगा हुआ गौर-निताई का एक चित्र था । गौर-निताई दल-बल के साथ नवद्वीप में संकीर्तन कर रहे हैं - वह इसी का चित्र है ।
रामलाल (श्रीरामकृष्ण के प्रति) - तो फिर यह चित्र इन्हें ही (मास्टर को) देता हूँ ।
श्रीरामकृष्ण - बहुत अच्छा, दे दो ।
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श्रीरामकृष्ण कुछ दिनों से प्रताप की दवा ले रहे हैं । आज रात रहते ही उठ पड़े हैं, इसलिए मन बेचैन है । हरीश सेवा करते हैं, उसी कमरे में हैं, वहीं राखाल भी हैं । श्रीरामलाल बाहर के बरामदे में सो रहे हैं । श्रीरामकृष्ण ने बाद में कहा, ‘प्राण बेचैन होने से हरीश को बाँह में लेने की इच्छा हुई । मध्यम नारायण तेल मालिश करने से अच्छा हुआ, तब फिर नाचने लगा ।’
(क्रमशः)

शनिवार, 24 जून 2023

*श्री रज्जबवाणी पद ~ १६४*

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*सकल शिरोमणि बुनै विचारा, सान्हां सूत न तोड़ै ।*
*सदा सचेत रहै ल्यौ लागा, ज्यौं टूटै त्यौं जोड़ै ॥*
(श्री दादूवाणी ~ पद्यांश. २९८)
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*श्री रज्जबवाणी पद ~ भाग २*
राग सोरठ १३ (गायन ९ से १२ रात्रि वा वर्षा ॠतु)
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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१६४ मनोपदेश । कहरवा
रे सुन कोली प्राण१ हमारा, तू करिले काम सँवारा२ ।
करगहि३ बैठि गजी४ बुणि लीजे, बढता५ भला तुम्हारा ॥टेक॥
नौ सौ पूरि६ निरंतर तांणां, भाव भक्ति करि भेवो७ ।
मांडी महर८ तेल तत्व निर्मल, प्रेम छांट दे लेवो ॥१॥
बैठि विचार सुनि फणी९ फहम१० की, सर्व सूत भरि लीजे ।
मन चित लाय कृत्य११ करि कोली, तार न टूटण दीजे ॥२॥
बाणें बाहि१२ वस्तु वित१३ ऊंचा१४, ज्यों१५ उस हाटि विकावै ।
लेऊ राम महा अति चौकसि१६, और न नीड़ै१७ आवै ॥३॥
ऐसी समझि१८ बुणी रे बुणकर, फेरी ऊलटि नहीं आवै ।
रज्जब रहै राम घर रेजा, दर्श दाति१९ वित२० वित पावै ॥४॥२॥
मन को ज्ञान रूप वस्त्र बनाने का उपदेश कर रहै हैं -
✦ अरे हमारे मन१ रूपी कोली ! तू हमारी बात सुनकर अपने ज्ञान रूप वस्त्र बनाने का काम अच्छी२ प्रकार कर ! शरीर रूप करघा३(वस्त्र बनाने का स्थान) पर बैठकर ज्ञान रूप वस्त्र४ बुन ले । इससे तेरे भले पन की वृद्धि५ होगी ।
✦ निरंतर नौ सौ नाड़ियों को ताणों में लगा६ और भाव भक्ति रूप जल से भिगो७ । हरि गुरु दया८ की मांडी बना और उसमे निर्मल तत्त्व विचार रूप तेल डाल कर ताणों के सूत में लगा तथा प्रेम रूप जल से छाँट छाँट कर काम में ले ।
✦ विचार पूर्वक बैठकर बुद्धि१० रूप नलिका९ में साधन करने की भावना रूप बाँणा का सूत भर ले । अरे मन रूपी कोली ! सुन, पीछे चित लगाकर काम११ कर । साधन भावना रूप तार टूटने मत दे अर्थात निरंतर साधन कर ।
✦ बाणें के तारों को ताणें में डालकर१२ ब्रह्म साक्षात्कार रूप श्रेष्ठ१४ धन१३ देने वाली वस्तु तैयार कर, जिससे१५ उस ब्रह्म की निर्द्वन्द्वावस्था रूप हाट पर बिक सके । निरंजन राम ही बड़ी सावधानी१६ से ग्रहण करें और कोई भी समीप१७ भी न ही आवे ।
✦ संशय विपर्य्य रहित ऐसी बुद्धि१८ से निर्दोष ज्ञान रूप वस्त्र बुण जिसके बुणने पर जीवित्मा पुन: लौटकर संसार में नहीं आवे । जीवात्मा को दर्शन दान१९ रूप धन२० मिले स्वरूप घर में ही रहे, राम से अलग नहीं रहे । मूक्तावस्था में ज्ञाता ज्ञान, ज्ञेय, तीनों एक ही हो जाते हैं ।
(क्रमशः)

शब्दस्कन्ध ~ पद #३४६

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🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
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भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामीआत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामीअर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #३४६)*
*राग विलावल ॥२१॥(गायन समय प्रातः ६ से ९)*
===========
*३४६. पतिव्रता । राज विद्याधर ताल*
*मूल सींच बधै ज्यों बेला, सो तत तरुवर रहै अकेला ॥टेक॥*
*देवी देखत फिरै ज्यों भूलै, खाइ हलाहल विष को फूलै ।*
*सुख को चाहे पड़ै गल फाँसी, देखत हीरा हाथ तैं जासी ॥१॥*
*केई पूजा रच ध्यान लगावैं, देवल देखैं खबर न पावैं ।*
*तोरैं पाती जुगति न जानी, इहि भ्रम भूल रहै अभिमानी ॥२॥*
*तीर्थ व्रत न पूजै आसा, वन खंड जाहिं रहैं उदासा ।*
*यूं तप कर-कर देह जलावैं, भरमत डोलैं जन्म गवावैं ॥३॥*
*सतगुरु मिलै न संशय जाई, ये बँधन सब देइ छुड़ाई ।*
*तब दादू परम गति पावै, सो निज मूरति मांहि लखावै ॥४॥*
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जैसे वृक्ष तथा लता के जड़ में जल देने से उसकी शाखा प्रशाखाओं का सिंचन स्वयमेव हो जाता है और जल सिंचन से वे वृद्धि को भी प्राप्त होते हैं । परन्तु समय आने पर जब पत्ते सूख जाते हैं तो गिर जाते हैं । केवल मूल ही शेष रहता है । ऐसे ही सबका मूल कारण ब्रह्म है, उसकी उपासना से देवताओं की उपासना स्वयमेव हो जाती है ।
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प्रलय में जब सबका विनाश हो जाता है तब ब्रह्म ही शेष रहता है । क्योंकि वह अविनाशी है । अतः सभी साधकों को ब्रह्म की ही उपासना करनी चाहिये । जैसे कोई विष खाकर भ्रान्ति से अपनी मृत्यु को भूलकर इधर-उधर घूमता रहता है ऐसे ही देवोपासक भी भक्ष्य अभक्ष्य कर बिना विचार किये ही मद्य, मांसादिकों को खाकर उसके परिणाम को न सोचकर केवल देवदर्शन से ही अपने को कृतकृत्य मानते हुए संसार में भटकते रहते हैं ।
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अन्त में उनको दुःख ही प्राप्त होता है क्योंकि सकाम देवोपासना से आज तक किसी को मुक्ति प्राप्त नहीं हुई है । किन्तु बार-बार जन्म मरण के द्वारा संसार में कष्ट ही पाते रहते हैं । अन्त में यम के पाशों से बंधकर पीड़ित होते रहते हैं । ऐसे मनुष्यों का नरदेह ऐसे व्यर्थ ही चला जाता है । क्योंकि ज्ञान के बिना किसीका भी मोक्ष नहीं हो सकता है ।
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वे सकाम कर्माभिमानी पुरुष सत्पुरुषों का संग भी नहीं करते । बिना संग के भगवत्प्राप्ति का उपाय भी उन्हें नहीं मिलता । वे आन्तरसाधना के बिना केवल पत्रपुष्पादिकों से उन देवताओं की अर्चना करते हैं । कभी-कभी गांव को छोड़कर वनों में निवास करते हैं । कामनाओं को लेकर नाना ब्रतानुष्ठान करते हैं । पंचाग्नि तप तपते हैं । तीर्थों में जाते रहते हैं ।
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अग्नि में अपने शरीर को जलाते हैं । परन्तु ज्ञानशून्य ऐसे साधनों से भगवान् की प्राप्ति नहीं होती । वे केवल अपनी आत्मा को क्लेश ही देते हैं । सद्गुरु के बिना उनका संशय भी निवृत्त नहीं होता न कर्मबन्धन ही कटते । अतः जो अनन्य भावना से पतिव्रता नारी की तरह परमात्मा की अभेदोपासना करता है तब उसी को साक्षात्कार होता है न कि भेदोपासना करने वालों को ।
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श्रीमद्भागवत में लिखा है कि –
जिस प्रकार वृक्ष की जड़ में पानी देने से उसके तना शाखा उपशाखा आदि का पोषण स्वयं ही हो जाता है ऐसे ही प्राणों को भोजन देने से समस्त इन्द्रियां पुष्ट हो जाती हैं उसी तरह भगवान् की पूजा से ही सब की पूजा हो जाती है । गीता में कहा है कि अल्पबुद्धि वाले जो देवताओं की उपासना करते हैं उनको नाशवान् फल मिलता है ।
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देवपूजक देवलोक में जाते हैं मेरी उपासना करने वाले मेरे लोक में जाते हैं । लोग करोड़ों यज्ञ करते हैं, गंगास्नान के लिये गंगाजी जाते हैं । परन्तु यह सार्वभौम सिद्धांत है कि ज्ञानहीन को मुक्ति नहीं मिल सकती है । चाहे गंगा सागर जावो चाहे ब्रतों का पालन करो अथवा दान करो । परन्तु इन सब साधनों से सो जन्म में अज्ञान के बिना मुक्ति नहीं हो सकती ।
(क्रमशः)

*कोइ कुपछ का फेर है*

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी*
*पशुवां की नांई भर भर खाइ, व्याधि घणेरी बधती जाइ ।*
*पशुवां नांई करै अहार, दादू बाढै रोग अपार ॥*
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इहिं औषद तैं साध सब, अनत उधारी देह ।
कोइ कुपछ का फेर है, नहीं त औषद ऐह ॥३॥
बषनां से किसी ने प्रश्न किया कि आपने भवबाधा काटने की जो औषधि बताई है, उसे ही औषधि क्यों मानी जाए । भगवत्प्राप्ति के तो और भी अनेक मार्ग हैं । इस पर बषनांजी कहते हैं, इस रामनाम-स्मरण रूपी औषधि से समस्त साधु संतों के साथ-साथ अनंत भक्तों ने अपने मनुष्य-जन्म का उद्धार = मोक्ष प्राप्त किया है । यदि किसी को रामनाम का अवलंबन लेने के उपरांत भी भगवत्प्राप्ति नहीं हुई है तो इसमें रामनाम की कमी न होकर रामनाम जप करने की कुपछ = कुपथ्य = प्रक्रिया का ही दोष है । अन्यथा कलियुग में भवबाधा काटने का इससे व्यतिरिक्त और दूसरा कोई मार्ग ही नहीं है ॥३॥
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*संजम सुमिरण कौ अंग ॥*
सत जत साच खिमा दया, भाव भगति पछ लेह ।
तौं अमर औषदी गुण करै, बषनां उधरै देह ॥४॥
सत = सत्त्व = अन्तःकरण = माँ, बुद्धि, चित्त और अहंकार का निग्रह ; जत = इन्द्रिय-निग्रह; साच = सत्य भाषण; खिमा = क्षमाभाव; दया = दयाभाव; भाव = श्रद्धा; भगति = गुरु-रामजी की अनन्य व निष्कामभक्ति के पथ्य के साथ अमर औषधि = रामनाम-जप अपना पूर्ण प्रभाव प्रकट करता है । राम नाम स्मर = प्रभाव से शरीर का उद्धार अर्थात् जीव शिव हो जाता है ॥४॥
(क्रमशः)

शुक्रवार, 23 जून 2023

*३६. निंदा कौ अंग ७/९*

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*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ @Premsakhi Goswami*
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*३६. निंदा कौ अंग ७/९*
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जिनकी रसनां रस नहीं, प्रेम भगति नहीं प्यास ।
ते नर नागा१३ मनमुखी, सु कहि जगजीवनदास ॥७॥
१३. नागा=नग्न (निर्लज्ज) ।
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जिनकी जिह्वा में मधुरता नहीं है । जिन्हें प्रेम भक्ति की प्यास नहीं है । वे जीव निर्लज्ज स्वेच्छाचारी है ऐसा संत कहते हैं ।
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खर की सीख१ र ऊचरै, रांम भगति बिन स्वान ।
कहि जगजीवन हरि तज दसि२ दे, तिहिं तत आंख न कान ॥८॥
(१. खर की सीख=मूर्ख की शिक्षा) (२. दसि=कह दे)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि मूर्ख या गधे जैसे लोगों की शिक्षा पा बिना प्रभु की भक्ति के मूर्ख जन र शब्द का उच्चारण करते हैं ।
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साधन की निन्दा करै, अपसद३ भाखैं आंन ।
जगजीवन ते सुनत हैं, फूटॏं तिन का कांन ॥९॥
(३. अपसद=अपशब्द=गाली गलौज)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि प्रभु पाने के साधन जप तप की जो निंदा करते हैं और अपशब्द का उच्चारण करते हैं और दूसरो को कहते हैं । उनकी बात जो सुनते उनके कान ही फट जायें ।
इति निन्दा को अंग संपूर्ण ॥३६॥
(क्रमशः)

*४. विपुल बीठलजी*

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*दादू जब दिल मिली दयालु सौं,*
*तब अंतर कुछ नांहि ।*
*ज्यों पाला पाणी कों मिल्या,*
*त्यों हरिजन हरि मांहि ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ परिचय का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*४. विपुल बीठलजी*
.
*बीठलदास बड़े हरिदास जु,*
*दाह उठी गुरु के सु वियोगा ।*
*रास समाज विराज बड़े जन,*
*बोल लिये सुन आवत योगा ॥*
*देख विहार जुगल्लकिशोर हु,*
*गान रु तान सुने मन शोगा२ ।*
*जाय मिले उन भाव धर्यो तन,*
*और गये सब देखत लोगा ॥३४८॥*
.
विपुल बीठलजी लीला तथा गुरुनिष्ठा के भक्त थे और स्वामी हरिदास जी के बड़े शिष्य थे । अपने श्रेष्ठ गुरुजी के परमधाम पधारने पर गुरुवियोग से आपके हृदय में अति दुःख रूप दाह हुआ था । आप कहीं जाते नहीं थे ।
.
एक रात्रि को वृन्दावन में रास समाज में महान् पुरुष विराजे हुए थे । उस समय उन महानुभावों ने आपको भी बुलाया । तब उनकी आज्ञा से आप आकर उन महानुभावों से मिल कर विराजे ।
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उस समय श्रीयुगल सरकार की लीला का दर्शन करके तथा गान और तान की अपार माधुरी सुनकर वियोग जन्य दुःख-शोक२ बढ जाने से आप बेसुध हो गये ।
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उसी अवस्था में श्रीगुरु हरिदास जी और युगल सरकार का दिव्य दर्शन करके विपुल बीठल जी रस-सागर में निमग्न हो गये और जो भाव आपने हृदय में धारण किया था, शरीर को छोड़कर, उसी में जा मिले । फिर और सब लोग भी आपकी भक्ति को देखते हुए और आपका जयघोष करते हुए अपने अपने स्थानों को चले गये ॥
(क्रमशः)

गुरुवार, 22 जून 2023

= ५५ =

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*दादू औगुण गुण कर माने गुरु के,*
*सोई शिष्य सुजाण ।*
*सतगुरु औगुण क्यों करै, समझै सोई सयाण ॥*
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*साभार : @Shakti Singh*
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*सन्त की आश्चर्य-कहानी*
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किसी नगर में राजकन्या का विवाह था, मंगल के बाजे बज रहे थे। उसी नगर में एक सिद्ध महात्मा रहते थे। महात्मा बाजों की आवाज सुनकर दरबार में गये। राजा से यह मालूम होने पर कि राजकन्या का विवाह हैं, उन्होंने कन्या को देखना चाहा। राजा ने कन्या को बुलाया। राजकन्या ने आकर महात्मा के चरणों में प्रणाम किया। महात्मा ने न मालूम किस अभिप्राय से उसको नखशिख देखकर राजा से कहा–'इस लड़की का हमसे विवाह कर दो।'
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राजा तो सुनते ही सहम गया। राजा बुद्धिमान् था, महल में जाकर एक जोड़ी बहुमूल्य मोती लाया। मोती का आकार मुर्गी के अण्डे जितना था और उनसे शारदीय पूर्णिमा के चन्द्रमा की-सी ज्योति छिटक रही थी। राजा ने नम्रता से कहा–'भगवन् ! हमारे कुल की रीति है–जो इस तरह के १०८ मोतियों का हार कन्या को देता है, उसी से हम कन्या का विवाह करते हैं।'
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महात्मा ने निर्विकार चित्त से, पर उत्साह से कहा–'हाँ, हाँ, तुम्हारी कुल की प्रथा तो पूरी होनी ही चाहिये। ये दोनों मोती के दाने मुझे दे दो, इसी नमूने के एक सौ आठ मोती मैं ला देता हूँ। परन्तु खबरदार ! तब तक लड़की को किसी दूसरी से ब्याह न देना।' राजा ने सोचा था–'महात्मा मोती की बात सुनकर निराश हो लौट जायँगे।' परन्तु यहाँ तो दूसरी ही बात हो गयी।
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राजा जानता था–महात्मा ऊँचे दर्जे के सिद्ध पुरुष हैं, उनकी आज्ञा न मानने से अमंगल हो सकता है; अतएव राजा ने दोनों मोती उनको दे दिये और कहा–'भगवन् ! आगे लग्न नहीं है, आप जल्दी लौटियेगा।' राजा ने सोचा–'ऐसे मोती कहीं मिलेंगे नहीं; महात्मा सच्चे पुरुष हैं, लौट ही आयेंगे। तब लड़की का विवाह निर्दिष्ट राजकुमार के साथ कर दिया जायगा।' राजा ने विवाह स्थगित कर दिया।
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महात्मा मोती के दाने झोली में डालकर चल दिये। तीन दिन हो गये। महात्मा समुद्र के किनारे बैठे कमण्डलु भर-भर समुद्र का जल बाहर उलीच रहे हैं। उन्हें खाना-पीना-सोना कुछ भी स्मरण नहीं है। न थकावट है न विषाद है; न निराशा है न विराम है। एक लगन से कार्य चल रहा है। महात्मा की अमोघ क्रिया से प्रकृति में हलचल मची। अन्तर्जगत् में क्षोभ उत्पन्न हो गया। समुद्र देव ब्राह्मण का रूप धरकर बाहर आये।
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ब्राह्मण ने पूछा–'भगवन् ! यह क्या कर रहे हैं ?' समाधि से जगे हुए की भाँति उनकी ओर देखकर सहज सरलता से महात्मा बोले–'एक सौ आठ मोती के दाने चाहिये। समुद्र में पानी नहीं रहेगा, तब मोती मिल जायँगे।' ब्राह्मण ने कहा–'समुद्र क्या इसी तरह से और इतना जल्दी बिना पानी का हो जायगा?' महात्मा ने कहा–‘हाँ, हाँ, हो क्यों नहीं जायगा। पानी तो उलीच ही रहे हैं, दो दिन आगे-पीछे होगा। अपने को कौन-सी जल्दी पड़ी है।'
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ब्राह्मण बोला–'अगर समुद्र आपको मोती दे दे तो ?' महात्मा बोले–‘तो फिर क्या हमारा समुद्र से कोई वैर है जो हम उसे बिना पानी का बनायेंगे?' ब्राह्मण रूपी समुद्र बोला–‘अच्छा, तो लीजिये।' समुद्र की एक तरंग आयी और मोतियों का ढेर लग गया। महात्मा ने झोली से दोनों मोती निकाले। उनसे ठीक मिला-मिलाकर १०८ मोती चुनकर झोली में डाल लिये और चलने के लिये उठ खड़े हुए !
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ब्राह्मण-वेशधारी समुद्र ने कहा–'भगवन् ! कुछ मोती और ले जाइये न ?' महात्मा बोले–'हमें संग्रह थोड़े ही करने हैं। जरूरत थीं, उतने ले लिये। अब हम व्यर्थ बोझ क्यों ढोयें।' महात्मा ने आकर राजा को बुलाया और पहले के दो दाने समेत १०८ मुर्गी के अण्डे जैसे पूनम के चाँद-से चमकते मोती के दाने राजा के सामने रख दिये। राजा आश्चर्यचकित हो गया। महात्मा के परम सिद्ध होने का उसे पूर्ण विश्वास हो गया।
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राजा ने सोचा–'ऐसे विलक्षण शक्तिशाली पुरुष से लड़की का विवाह करने में लड़की को तो किसी दु:ख की सम्भावना है नहीं। परन्तु इनसे कुछ काम और क्यों न ले लिया जाय।' राजा की एक दूसरे बड़े राजा से शत्रुता थी; वह राजा तो मर गया था, उसका छोटा कुमार था। उसने सोचा–'शत्रु का बीज भी अच्छा नहीं; महात्मा के हाथों यह कण्टक दूर हो जाय तो अच्छा।'
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यह सोचकर राजा ने कहा–'भगवन् ! मोती तो बड़े अच्छे आप ले आये। एक काम और है, अमुक राज्य के राजकुमार का सिर आने पर लड़की का ब्याह होगा, ऐसा प्रण है। अतएव यदि हो सके तो आप इसके लिये चेष्टा करें।' महात्मा ने कहा–'अरे, इसमें कौन बड़ी बात है, अभी जाता हूँ। महात्माजी उस राज्य में गये। राजमाता से मिले। राजमाता ने महात्मा का नाम सुन रखा था, इससे उसने बड़ी अच्छी आवभगत की।
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महात्मा बोले–‘माई ! हम तो एक काम से आये हैं, तुम्हारे कुमार का हमें सिर चाहिये। हमने एक राजा से कहा था–'अपनी कन्या का ब्याह हमसे कर दो; उसने कहा है कि अमुक राजकुमार का सिर ला देंगे, तब विवाह होगा। अत: तुम हमें अपने लड़के का सिर दे दो।' एकलौता लड़का था और वही राज्य का अधिकारी था। महात्मा के वचन सुनकर राजमाता के प्राण सूख गये। परन्तु हृदय में श्रद्धा थी; उसको विश्वास था कि सच्चे महात्मा से किसी का कोई अकल्याण नहीं हो सकता।
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राजमाता बोली–भगवन् ! लड़के का सिर मैं कैसे उतारूँ। आप इस लडके को ही ले जाइये।' महात्मा बोले–'यह और अच्छी बात है; उसने तो सिर ही माँगा था, हम तो पूरा ले जाते हैं। फिर सिर उतारकर हमें क्या करना है।' राजमाता बोली–‘भगवन् ! इसे मैं आपके हाथों में सौंप रही हूँ।' महात्मा बोले–‘हाँ, हाँ, भगवान् सब मंगल करेंगे।'
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राजकुमार को लेकर महात्मा अपनी नगरी में लौटे और राजमहल में जाकर बोले–'लो, यह समूचा राजकुमार ! अब पहले विवाह करो; खबरदार ! जब तक विवाह न हो, लड़के को छूना मत।' राजा ने आनन्द-मग्न होकर कहा–'ठीक है, भगवन् ! ऐसा ही होगा।' महात्मा ने कहा–'तो बस, अब देर न करो !'
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विवाहमण्डप रचा हुआ था ही। चौकी बिछायी गयी। महात्माजी दूल्हा बने। कन्या आयी। कन्या को महात्माजी ने एक बार नखशिख देखा। अकस्मात् महात्मा बोल उठे–'अरे ! उस राजकुमार को तो यहाँ बुलाओ !' राजकुमार बुलाया गया। महात्मा ने उसे कन्या के बगल में खड़ा कर दिया। फिर दोनों को एक बार नखशिख देखकर बोले–'भई ! जोड़ी तो यही सुन्दर है। राजा ! बस, अभी इस राजकुमार से राजकुमारी का ब्याह कर दो। खबरदार, जो जरा भी चीं-चपट की।'
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राजा नहीं न कर सका। राजकुमारी का विवाह शत्रु राजकुमार से हो गया। महात्मा के विचित्र आचरण का रहस्य अब राजा की समझ में आया, राजा का मन पलट गया। शत्रु मित्र हो गया ! महात्मा अपनी कुटिया पर जाकर पूर्ववत् धूनी तापने लगे। इस कहानी से यह मालूम हो गया कि सन्त पुरुष की क्रियाएँ किसी अज्ञात उद्देश्य से बड़ी विलक्षण हुआ करती हैं, उनकी क्रियाओं से उनकी स्थिति का पता लगाना बहुत ही कठिन होता है।
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तथापि आजकल के जमाने में जहाँ लोग नाना प्रकार से ठगे जा रहे हैं। विशेष सावधानी रखना ही उत्तम हैं। श्रद्धा और सेवा करके सत्संग करना चाहिये और जिन सन्त पुरुष के संग से अपने में दैवी सम्पदा की वृद्धि, भगवान् की ओर चित्तवृत्तियों का प्रवाह, शान्ति और आनन्द की वृद्धि प्रतीत हो, उन्हीं को सन्त मानकर उनसे विशेष लाभ उठाना चाहिये।
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अपनी बुद्धि जिनको सन्त स्वीकार न करे, उनकी निन्दा तो नहीं करनी चाहिये; परन्तु अपना उनसे कोई गुरु-शिष्य का सम्बन्ध नहीं रखना चाहिये। निन्दा तो इसलिये नहीं कि प्रथम तो किसी की भी निन्दा करना ही बहुत बुरा है; दूसरे, हम सन्त का बाहरी आचरण से निर्णय भी नहीं कर सकते।

= ५४ =

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*साहिब जी के नांव में,*
*सब कुछ भरे भंडार ।*
*नूर तेज अनन्त है, दादू सिरजनहार ॥*
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*साभार : @Shakti Singh*
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*असली-गहना*
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एक राजा थे।उनका नाम था चक्रवेणु। वह बड़े ही धर्मात्मा थे। राजा जनता से जो भी कर लेते थे सब जनहित में ही खर्च करते थे उस धन से अपना कोई कार्य नहीं करते थे। अपने जीविकोपार्जन हेतु राजा और रानी दोनोँ खेती किया करते थे। उसी से जो पैदावार हो जाता उसी से अपनी गृहस्थी चलाते, अपना जीवन निर्वाह करते थे। राजा-रानी होकर भी साधारण से वस्त्र और साधारण सात्विक भोजन करते थे।
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एक दिन नगर में कोई उत्सव था तो राज्य की तमाम महिलाएं बहुत अच्छे अच्छे वस्त्र और बेशकीमती गहने धारण किये हुए आई और जब रानी को साधारण वस्त्रों में देखा तो कहने लगी कि आप तो हमारी मालकिन हो और इतने साधरण वस्त्रों में बिना गहनों के जबकि आपको तो हम लोगों से अच्छे वस्त्रों और गहनों में होना चाहिए।
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यह बात रानी के कोमल हृदय को छू गई और रात में जब राजा रनिवास में आये तो रानी ने सारी बात बताते हुए कहा कि आज तो हमारा बहुत अपमान हुवा। सारी बात सुनने के बाद राजा ने कहा क्या करूँ मैं खेती करता हूँ जितना कमाई होती है घर गृहस्थी में ही खर्च हो जाता है।क्या करूँ? प्रजा से आया धन मैं उन्हीं पर खर्च कर देता हूँ, फिर भी आप परेशान न हों, मैं आपके लिए गहनों की ब्यवस्था कर दूंगा। तुम धैर्य रखो।
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दूसरे दिन राजा ने अपने एक आदमी को बुलाया और कहा कि तुम लंकापति रावण के पास जाओ और कहो कि राजा चक्रवेणु ने आपसे कर मांगा है और उससे सोना ले आओ। वह व्यक्ति रावण के दरबार मे गया और अपना मन्तब्य बताया इस पर रावण अट्टहास करते हुए बोला – अब भी कितने मूर्ख लोग भरे पड़े है। मेरे घर देवता पानी भरते हैं और मैं कर दूंगा। उस व्यक्ति ने कहा कि कर तो आप को अब देना ही पड़ेगा। अगर स्वयं दे दो तो ठीक है। 
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इस पर रावण क्रोधित होकर बोला कि ऐसा कहने की तेरी हिम्मत कैसे हुई। जा चला जा यहां से.... रात में रावण रानी मन्दोदरी से मिला तो यह कहानी बताई मन्दोदरी पूर्णरूपेण एक पतिव्रता स्त्री थी। यह सुनकर उनको चिन्ता हुई और पूछी कि फिर आपने कर दिया या नहीं ? तो रावण ने कहा तुम पागल हो मैं रावण हूँ, क्या तुम मेरी महिमा को जानती नहीं। क्या रावण कर देगा। इस पर मन्दोदरी ने कहा कि महाराज आप कर दे दो वरना इसका परिणाम अच्छा नहीं होगा। मन्दोदरी राजा चक्रवेणु के प्रभाव को जानती थी क्योंकि वह एक पतिव्रता स्त्री थी। रावण नहीं माना।
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जब सुबह उठकर रावण जाने लगा तो मन्दोदरी ने कहा कि महाराज आप थोड़ी देर ठहरो मैं आपको कुछ दिखाती हूँ। रावण ठहर गया। मन्दोदरी प्रतिदिन छत पर कबूतरों को दाना डाला करतीं थी। उस दिन भी दाना डाली और जब कबूतर दाना चुगने लगे तो बोली कि अगर तुम सब एक भी दाना चुगे तो तुम्हें महाराजाधिराज रावण की दुहाई है, कसम है। रानी की इस बात का कबूतरों पर कोई असर नहीं हुआ और वह दाना चुगते रहे।
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मन्दोदरी ने रावण से कहा कि देख लिया न आपका प्रभाव। रावण ने कहा तू कैसी पागल है पक्षी क्या समझें कि क्या है रावण का प्रभाव तो मन्दोदरी ने कहा कि ठीक है अब दिखाती हूँ आपको फिर उसने कबूतरों से कहा कि अब एक भी दाना चुना तो राजा चक्रवेणु की दुहाई है। सारे कबूतर तुरन्त दाना चुगना बन्द कर दिया। केवल एक कबूतरी ने दाना चुना तो उसका सिर फट गया, क्योंकि वह बहरी थी सुन नही पाई थी। रावण ने कहा कि ये तो तेरा कोई जादू है, मैं नही मानता इसे। और ये कहता हुआ वहां से चला गया।
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रावण दरबार मे जाकर गद्दी पर बैठ गया तभी राजा चक्रवेणु का वही व्यक्ति पुनः दरबार मे आकर पूछा की आपने मेरी बात पर रात में विचार किया या नहीं। आपको कर रूप में सोना देना पड़ेगा। रावण हंसकर बोला कि कैसे आदमी हो तुम देवता हमारे यहां पानी भरते हैं और हम कर देंगे। तब उस ब्यक्ति ने कहा कि ठीक है आप हमारे साथ थोड़ी देर के लिए समुद्र के किनारे चलिये। 
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रावण किसी से डरता ही नहीं था सो कहा चलो और उसके साथ चला गया। उसने समुद्र के किनारे पहुंचकर लंका की आकृति बना दी और जैसे चार दरवाजे लंका में थे वैसे दरवाजे बना दिये और रावण से पूछा कि लंका ऐसी ही है न ? तो रावण ने कहा हाँ ऐसी ही है तो ? तुम तो बड़े कारीगर हो। वह आदमी बोला कि अब आप ध्यान से देखें – 
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महाराज चक्रवेणु की दुहाई है” ऐसा कहकर उसने अपना हाथ मारा और एक दरवाजे को गिरा दिया। इधर बालू से बनी लंका का एक एक हिस्सा बिखरा उधर असली लंका का भी वही हिस्सा बिखर गया। अब वह आदमी बोला कि कर देते हो या नहीं ? नहीं तो मैं अभी हाथ मारकर सारी लंका बिखेरता हूँ। रावण डर गया और बोला हल्ला मत कर ! तेरे को जितना सोना चाहिए चुपचाप लेकर चला जा। रावण उस ब्यक्ति को ले जाकर कर के रूप में बहुत सारा सोना दे दिया।
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रावण से कर लेकर वह आदमी राजा चक्रवेणु के पास पहुंचा और उनके सामने सारा सोना रख दिया चक्र वेणु ने वह सोना रानी के सामने रख दिया कि जितना चाहिए उतने गहने बनवा लो। रानी ने पूछा कि इतना सोना कहाँ से लाये ? राजा चक्रवेणु ने कहा कि यह रावण के यहां से कर रूप में मिला है। रानी को बड़ा भारी आश्चर्य हुआ कि रावण ने कर कैसे दे दिया ?
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रानी ने कर लाने वाले आदमी को बुलाया और पूंछा कि कर कैसे लाये तो उस ब्यक्ति ने सारी कथा सुना दी। कथा सुनकर रानी चकरा गई और बोली कि मेरे असली गहना तो मेरे पतिदेव जी हैं !! दूसरा गहना मुझे नहीं चाहिए। गहनों की शोभा पति के कारण ही है। पति के बिना गहनों की क्या शोभा ? जिनका इतना प्रभाव है कि रावण भी भयभीत होता है। उनसे बढ़कर गहना मेरे लिए और हो ही नहीं सकता। रानी ने उस आदमी से कहा कि जाओ यह सब सोना रावण को लौटा दो और कहो कि महाराज चक्रवेणु तुम्हारा कर स्वीकार नहीं करते।
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मित्रों" मनुष्य को देखा देखी न पाप, न पुण्य करना चाहिए और सात्विक रूप से सत्यता की शास्त्रोक्त विधि से कमाए हुए धन में ही सन्तोष करना चाहिए। दूसरे को देखकर मन को बढ़ावा या पश्चाताप नहीं करना चाहिए। धर्म मे बहुत बड़ी शक्ति आज भी है। करके देखिए !! निश्चित शांति मिलेगी।
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आवश्यकताओं को कम कर दीजिए जो आवश्यक-आवश्यकता है उतना ही खर्च करिये शेष परोपकार में लगाइए। भगवान तो हमारे इन्हीं कार्यो की प्रतीक्षा में बैठे हैं, मुक्ति का द्वार खोले, किन्तु यदि हम स्वयं नरकगामी बनना चाहें तो भगवान का क्या दोष..?

भक्तों के साथ नृत्य

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*साहिब जी के नांव में, भाव भगति विश्‍वास ।*
*लै समाधि लागा रहै, दादू सांई पास ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ स्मरण का अंग)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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(४)
अस्वस्थ श्रीरामकृष्ण तथा डाक्टर राखाल । भक्तों के साथ नृत्य ।
श्रीरामकृष्ण दक्षिणेश्वर मन्दिर में भक्तों के साथ अपने कमरे में बैठे हैं । रविवार, २० सितम्बर, १८८५ ई., शुक्ला एकादशी । नवगोपाल, हिन्दू स्कूल के शिक्षक हरलाल, राखाल, लाटू, कीर्तनकार गोस्वामी तथा अन्य लोग उपस्थित हैं । बड़ा बाजार के डाक्टर राखाल को साथ लेकर मास्टर आ पहुँचे । डाक्टर से श्रीरामकृष्ण के रोग की जाँच करायेंगे ।
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डाक्टर देख रहे हैं कि श्रीरामकृष्ण के गले में क्या रोग हुआ है । वे मोटे आदमी हैं, उँगलियाँ मोटी मोटी हैं ।
श्रीरामकृष्ण (हँसते हुए, डाक्टर से) - जो लोग ऐसा ऐसा करते है (अर्थात् कुश्ती लड़ते हैं) उनकी तरह हैं, तुम्हारी उँगलियाँ ! महेन्द्र सरकार ने देखा था, परन्तु जीभ को इतने जोर से दबा दिया था कि बहुत तकलीफ हुई । जैसे गाय की जीभ दबाकर पकड़ी हो !
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डाक्टर राखाल - जी, मैं देखता हूँ, आपको कुछ कष्ट न होगा ।
डाक्टर द्वारा दवा की व्यवस्था करने के बाद श्रीरामकृष्ण फिर बातचीत कर रहे हैं ।
श्रीरामकृष्ण (भक्तों के प्रति) – भला, लोग कहते हैं, ये यदि साधु हैं तो इन्हें रोग क्यों होता है ?
तारक - भगवानदास बाबाजी बहुत दिनों तक रोग से बिस्तर पर पड़े रहे ।
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श्रीरामकृष्ण – मधु डाक्टर साठ वर्ष की अवस्था में वेश्या के लिए उसके घर पर खाना लेकर जाता है, और इधर उसे कोई रोग नहीं है ।
गोस्वामी - जी, आपका जो रोग है, यह दूसरों के लिए है । जो लोग आपके यहाँ आते हैं, उनका अपराध आपको लेना पड़ता है । उन्हीं सब अपराध-पापों को लेने से आपको रोग होता है ।
एक भक्त - यदि आप माँ से कहें, ‘माँ, इस रोग को मिटा दो’, तो जल्द ही मिट जाय ।
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श्रीरामकृष्ण - रोग मिटाने की बात कह नहीं सकता; फिर हाल में सेव्य-सेवक भाव कम हो रहा है । एक बार कहता हूँ, ‘माँ, तलवार के खोल की जरा मरम्मत कर दो’, परन्तु उस प्रकार की प्रार्थना कम होती जा रही है । आजकल ‘मैं’ को खोजने पर भी नहीं पाता । देखता हूँ, वे ही इस खोल में विद्यमान हैं ।
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कीर्तन के लिए गोस्वामी को लाया गया है । एक भक्त ने पूछा, ‘क्या कीर्तन होगा ?’
श्रीरामकृष्ण अस्वस्थ हैं, कीर्तन होने पर भावावस्था आयेगी, यही सब को भय है ।
श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं, “होने दो थोड़ासा । कहते हैं, मेरा भाव होता है – इसीलिए भय होता है । भाव होने पर गले के उसी स्थान में जाकर लगता है ।”
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कीर्तन सुनते सुनते श्रीरामकृष्ण भाव को सम्हाल न सके । खड़े हो गये और भक्तों के साथ नृत्य करने लगे ।
डाक्टर राखाल ने सब देखा, उनकी किराये की गाड़ी खड़ी है । वे और मास्टर उठ खड़े हुए, - कलकत्ता जायेंगे । दोनों ने श्रीरामकृष्णदेव को प्रणाम किया । श्रीरामकृष्ण (स्नेह के साथ, मास्टर के प्रति) - क्या तुमने खाया है ?
(क्रमशः)