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*काया की संगति तजै, बैठा हरि पद मांहि ।
दादू निर्भय ह्वै रहै, कोई गुण व्यापै नांहि ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ सजीवन का अंग)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*(२)श्रीरामकृष्ण तथा अवतारवाद*
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श्रीरामकृष्ण मास्टर से डाक्टर सरकार की बातें कह रहे हैं । पहले दिन मास्टर श्रीरामकृष्ण का हाल लेकर डाक्टर सरकार के पास गये थे ।
श्रीरामकृष्ण - तुम्हारे साथ क्या-क्या बातें हुई ?
मास्टर - डाक्टर के यहाँ बहुत सी पुस्तकें हैं । मैं वहाँ बैठा हुआ एक पुस्तक पढ़ रहा था । उसी से कुछ अंश पढ़कर डाक्टर को सुनाने लगा । सर हम्फ्रे डेवी की पुस्तक है । उसमें अवतार की आवश्यकता पर लिखा गया है ।
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श्रीरामकृष्ण – हाँ ? तुमने क्या कहा था ?
मास्टर - उसमें एक बात यह है कि ईश्वर की वाणी आदमी के भीतर से होकर बिना आये मनुष्य उसे समझ नहीं सकते । इसीलिए अवतार की आवश्यकता है ।
श्रीरामकृष्ण – वाह ! ये सब तो बड़ी अच्छी बातें हैं ।
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मास्टर - लेखक ने उपमा दी है कि सूर्य की ओर कोई देख नहीं सकता, परन्तु सूर्य की किरणें जिस जगह पर पड़ती है (Reflected Rays) वहाँ लोग देख सकते हैं ।
श्रीरामकृष्ण - यह तो बड़ी अच्छी बात है, कुछ और है ?
मास्टर - एक दूसरी जगह लिखा था, यथार्थ ज्ञान विश्वास है ।
श्रीरामकृष्ण - ये तो बहुत सुन्दर बातें है । विश्वास हुआ तब तो सब कुछ हो गया ।
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मास्टर - लेखक ने स्वप्न में रोमन देव-देवियों को देखा था ।
श्रीरामकृष्ण - क्या इस तरह की पुस्तकें निकल रही हैं ? ऐसी जगह वे ही (ईश्वर) काम कर रहे हैं । और भी कोई बात हुई ?
मास्टर - वे लोग कहते हैं, हम संसार का उपकार करेंगे । तब मैंने आपकी बात कही ।
श्रीरामकृष्ण (सहास्य) - कौनसी बात ?
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मास्टर - शम्भु मल्लिक-वाली बात । उसने आपसे कहा था, ‘मेरी इच्छा होती है कि रुपये लगाकर कुछ अस्पताल और दवाखाने, स्कूल आदि बनवा दूँ । इससे बहुतों का उपकार होगा ।’ आपने उससे कहा था, ‘अगर ईश्वर सामने आये तो क्या तुम कहोगे, मेरे लिए कुछ अस्पताल, दवाखाने और स्कूल बनवा दो ?’ एक बात मैंने और कही थी ।
श्रीरामकृष्ण - जो कर्म करने के लिए आते हैं उनका दर्जा अलग है । हाँ, कौनसी बात ?
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मास्टर – मैंने कहा, ‘यदि आपका उद्देश्य श्रीकाली की मूर्ति का दर्शन करना है तो सड़क के किनारे खड़े होकर गरीबों को भीख बाँटने में ही अपना सब समय लगा देने से क्या लाभ होगा ? पहले आप किसी प्रकार मूर्ति के दर्शन कर लें । फिर जी भर के भीख दें !’
श्रीरामकृष्ण - और भी कोई बात हुई ?
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मास्टर - आपके पास जो लोग आते हैं, उनमें बहुतों ने काम को जीत लिया है, यह बात हुई । डाक्टर ने कहा, ‘मेरा भी कामभाव दूर हो गया है, इतना समझ लेना ।’ मैंने कहा, ‘आप तो बड़े आदमी हैं । आपने काम को जीत लिया तो कोई आश्चर्य की बात नहीं । क्षुद्र प्राणियों में भी, उनके पास रहकर, इन्द्रियों को जीतने की शक्ति आ रही है, यही आश्चर्य है ।’ फिर मैंने वह बात कही जो आपने गिरीश घोष से कही थी ।
श्रीरामकृष्ण (सहास्य) - क्या कहा था ?
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मास्टर- आपने गिरीश घोष से कहा था, ‘डाक्टर तुमसे ऊँचे नहीं चढ़ सका ।’ वही अवतारवाली बात ।
श्रीरामकृष्ण - अवतार की बात उससे (डाक्टर से) कहना । अवतार वे हैं जो तारते हैं । इस तरह दस अवतार हैं, चौबीस अवतार है और असंख्य अवतार भी हैं ।
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मास्टर - गिरीश घोष की वे (डा. सरकार) खूब खबर रखते हैं । यही पूछते रहे कि गिरीश घोष ने क्या बिलकुल शराब पीना छोड़ दिया ? उन पर खूब नजर है ।
श्रीरामकृष्ण - क्या गिरीश घोष से यह बात तुमने कही थी ?
मास्टर - जी हाँ, कही थी, और बिलकुल शराब छोड़नेवाली बात भी ।
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श्रीरामकृष्ण - उसने क्या कहा ?
मास्टर - उन्होंने कहा, ‘तुम लोग जब कह रहे हो, तो इस दशा में इसे श्रीरामकृष्ण की बात समझकर मान लेता हूँ - परन्तु मैं स्वयं अब जोर देकर कोई बात न कहूँगा ।’
श्रीरामकृष्ण - (आनन्दपूर्वक) - कालीपद ने कहा है, उसने एकदम शराब पीना छोड़ दिया है ।
(क्रमशः)











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