गुरुवार, 30 नवंबर 2017

= १९४ =

#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
*साचा सिर सौं खेल है, यह साधु जन का काम ।*
*दादू मरणा आसँघै, सोई कहैगा राम ॥* 
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साभार ~ स्वामी सौमित्राचार्य
“प्रपत्ति”
‘नमामि भक्तमाल को’
राजा जगदेव जी – २
राजा जगदेव जी की रिझवार निष्ठा का वर्णन हुआ, अब उनकी धर्म निष्ठा का वर्णन सुनिए. एक यवन राजकुमारी इनकी रिझवार निष्ठा पर आसक्त हो गयी और उसने अपने पिता से कहा कि उसे राजा से विवाह करना है. बादशाह ने राजा को बुलाकर बहुत समझाया, फिर अनेक प्रकार का प्रलोभन दिया और अंत में भय भी दिखाया पर राजा नहीं माने. बादशाह ने खींज कर राजा को मार डालने का आदेश दे दिया.
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जब बधिक लोग राजा को मारने लेकर जा रहे थे तब राजकुमारी ने उन्हें रोककर कहा कि उसे राजा से प्यार है. राजा को नहीं मारा जाए और उसने राजा को अपने सामने बुलाया. उसे लगा कि अगर राजा उसे एक बार देख लेंगे तो विवाह से मना नहीं करेंगे. राजकुमारी ने राजा से उसकी ओर देखने को कहा पर राजा ने मुँह मोड़ लिया. तब राजकुमारी ने गुस्से में आकर सिपाहियों से कहा कि राजा का सिर काटकर उसके पास लाया जाए. ऐसा ही किया गया. पर जब राजा का कटा हुआ सिर राजकुमारी के सामने रखा गया तो वह सिर भी पीछे मुड़ गया. राजा की ऐसी धर्म निष्ठा देखकर सभी प्रभावित हो गए.
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जो धर्म पर चलता है उसकी कभी हार नहीं होती है. हारता तो सदा अधर्मी ही है. अधर्मी का प्रयोजन कभी सफल नहीं होता है. जो धर्मनिष्ठ है उसका धर्म उसके एक अंग को भी झुकने नहीं देता है.
“स्वामी सौमित्राचार्य”

= १९३ =


卐 सत्यराम सा 卐
*अपनी अपनी जाति सौं, सब को बैसैं पांति ।*
*दादू सेवग राम का, ताके नहीं भरांति ॥* 
*चोर अन्याई मसखरा, सब मिलि बैसैं पांति ।*
*दादू सेवक राम का, तिन सौं करैं भरांति ॥* 
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साभार ~ Dana Mahiya
**प्रेज़ेंट्स** ओशो ~ बिखरे मोती
दोस्तोवस्की ने एक छोटी—सी कथा लिखी है। लिखा है कि जीसस के मरने के अठारह सौ वर्ष बाद जीसस को खयाल आया कि मैं पहले जो गया था जमीन पर, तो बे समय पहुंच गया था। वह ठीक वक्त न था, लोग तैयार न थे और मुझे मानने वाला कोई भी न था। मैं अकेला ही पहुंच गया था। और इसलिए मेरी दुर्दशा हुई; और इसलिए लोग मुझे स्वीकार भी न कर पाए, समझ भी न पाए। और लोगों ने मुझे सूली दी, क्योंकि लोग मुझे पहचान ही न सके। अब ठीक वक्त है। अगर मैं अब वापस जमीन पर जाऊं, तो आधी जमीन तो ईसाइयत के हाथ में है। हर गांव में मेरा मंदिर है। जगह— जगह मेरे पुजारी हैं। जगह—जगह मेरे नाम पर घंटी बजती है, और जगह—जगह मेरे नाम पर मोमबत्तियां जलाई जाती हैं। आधी जमीन मुझे स्वीकार करती है। अब ठीक वक्त है, मैं जाऊं।
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और जीसस यह सोचकर एक रविवार की सुबह बैथलहम, उनके जन्म के गांव में वापस उतरे। सुबह है। रविवार का दिन है। लोग चर्च से बाहर आ रहे हैं। प्रार्थना पूरी हो गई है। और जीसस एक वृक्ष के नीचे खड़े हो गए हैं। उन्होंने सोचा है कि आज वह अपनी तरफ से न कहेंगे कि मैं जीसस क्राइस्ट हूं। क्योंकि पहले एक दफा कहा था, बहुत चिल्लाकर कहा था कि मैं जीसस क्राइस्ट हूं; मैं ईश्वर का पुत्र हूं मैं तुम्हारे लिए संदेश लेकर आया परम जीवन का, और जो मुझे समझ लेगा, वह मुक्त हो जाएगा, क्योंकि सत्य मुक्त कर देता है। लेकिन इस बार, अब तो वे लोग मुझे वैसे ही पहचान लेंगे, घर—घर में तस्वीर है। अब तो कोई जरूरत न होगी मुझे घोषणा करने की।
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वे चुपचाप खड़े रहे। लोगों ने पहचाना जरूर, लेकिन गलत ढंग से पहचाना। भीड़ इकट्ठी हो गई, और लोग हंसने लगे, और मजाक करने लगे। और किसी ने कहा कि बिलकुल बन—ठन कर खड़े हो! बिलकुल जीसस जैसे ही मालूम पड़ते हो! खूब स्वांग रचा है! अभिनेता कुशल हो, जरा भी भूल—चूक निकालनी मुश्किल है ! जीसस को कहना ही पड़ा कि तुम गलती कर रहे हो। मैं कोई अभिनय नहीं कर रहा हूं। मैं वही जीसस क्राइस्ट हूं जिसकी तुम पूजा करके बाहर आ रहे हो।
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तो लोग हंसने लगे और उन्होंने कहा कि जल्दी से तुम यहां से भाग जाओ, इसके पहले कि मंदिर का प्रधान पुरोहित बाहर निकले। नहीं तो तुम मुसीबत में पड़ोगे। और रविवार का दिन है, चर्च में बहुत लोग आए हुए हैं, व्यर्थ तुम्हारी मारपीट भी हो जा सकती है। तुम भाग जाओ। जीसस ने कहा, क्या कहते हो, ईसाई होकर ! पहली दफा जब मैं आया था, तो यहूदियों के बीच में आया था, कोई ईसाई न था; तो मुझे कोई पहचान न सका। यह स्वाभाविक था। लेकिन तुम भी मुझे नहीं पहचान पा रहे हो ! और तभी पादरी आ गया।
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चर्च के बाहर और लोग आ गए और बाजार में भीड़ लग गई। जीसस पर जो लोग हंस रहे थे, वे जीसस के पादरी के चरणों में झुक—झुक कर नमस्कार करने लगे ! लोग जमीन पर लेट गए। बड़ा पादरी ! बड़ा पुरोहित मंदिर के बाहर आया है ! जीसस बहुत चकित हुए। फिर भी जीसस के मन में एक आशा थी कि लोग भला न पहचान पाएं, लेकिन मेरा पुजारी तो पहचान ही लेगा! लेकिन पादरी के जब लोग चरण छू चुके, और उसने आंखें ऊपर उठाकर देखा, तो कहा कि बदमाश को पकड़ो और नीचे उतारो ! यह कौन शरारती आदमी है? जीसस एक बार आ चुके, और अब दुबारा आने का कोई सवाल नहीं है। लोगों ने जीसस को पकड़ लिया। जीसस को अठारह सौ साल पहले का खयाल आया। ठीक ऐसे ही वे तब भी पकडे गए थे। लेकिन तब पराए लोग थे और तब समझ में आता था। लेकिन अब अपने ही लोग पकडेंगे, यह भरोसे के बाहर था। और जीसस को जाकर चर्च की एक कोठरी में ताला लगाकर बंद कर दिया गया।
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आधी रात किसी ने दरवाजा खोला, कोई छोटी—सी लालटेन को लेकर भीतर प्रविष्ट हुआ। जीसस ने उस अंधेरे में थोड़े से प्रकाश में देखा, पादरी है, वही पुरोहित ! उसने लालटेन एक तरफ रखी, दरवाजा बंद करके ताला लगाया। फिर जीसस के चरणों में सिर रखा और कहा कि मैं पहचान गया था। लेकिन बाजार में मैं नहीं पहचान सकता हूं। तुम हो पुराने उपद्रवी ! हमने अठारह सौ साल में किसी तरह व्यवसाय ठीक से जमाया है। अब सब ठीक चल रहा है, तुम्हारी कोई जरूरत नहीं; हम तुम्हारा काम कर रहे हैं। तुम हो पुराने उपद्रवी! अगर तुम वापस आए, तो तुम सब अस्तव्यस्त कर दोगे, तुम हो पुराने अराजक। तुम फिर सत्य की बातें कहोगे और सब नियम भ्रष्ट हो जाएंगे। और तुम फिर परम जीवन की बात कहोगे, और लोग स्वच्छंद हो जाएंगे।
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हमने सब ठीक—ठीक जमा लिया है, अब तुम्हारी कोई भी जरूरत नहीं है। अब तुम्हें कुछ भी करना हो, तो हमारे द्वारा करो। हम तुम्हारे और मनुष्य के बीच की कड़ी हैं। तो मैं तुम्हें भीड़ में नहीं पहचान सकता हूं। और अगर तुमने ज्यादा गड़बड़ की, तो मुझे वही करना पड़ेगा, जो अठारह सौ साल पहले दूसरे पुरोहितों ने तुम्हारे साथ किया था। हम मजबूर हो जाएंगे तुम्हें सूली पर चढ़ाने को। तुम्हारी मूर्ति की हम पूजा कर सकते हैं और तुम्हारे क्रास को हम गले में डाल सकते हैं, और तुम्हारे लिए बड़े मंदिर बना सकते हैं, और तुम्हारे नाम का गुणगान कर सकते हैं, लेकिन तुम्हारी मौजूदगी खतरनाक है।
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जब भी ईश्वर अपने परम ऐश्वर्य में कहीं प्रकट होगा, तब उसकी मौजूदगी खतरनाक हो जाती है। वे जो हमारे क्षुद्र अहंकार हैं, उन क्षुद्र अहंकारों को बड़ी पीड़ा शुरू हो जाती है। जब भी विराट ईश्वर सामने होता है, तो हमारा क्षुद्र अहंकार बेचैन हो जाता है। हम मरे हुए ईश्वर को पूज सकते हैं, जीवित ईश्वर को पहचानना मुश्किल है।
-गीता-दर्शन-भाग-5-प्रवचन-115/
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= अजब ख्याल अष्टक(ग्रन्थ २५-१/२) =

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🙏 *श्री दादूदयालवे नमः ॥* 🙏
🌷 *#श्रीसुन्दर०ग्रंथावली* 🌷
रचियता ~ *स्वामी सुन्दरदासजी महाराज*
संपादक, संशोधक तथा अनुवादक ~ स्वामी द्वारिकादासशास्त्री
साभार ~ श्री दादूदयालु शोध संस्थान,
अध्यक्ष ~ गुरुवर्य महमंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमारामजी महाराज
https://www.facebook.com/DADUVANI
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*= अजब ख्याल अष्टक(ग्रन्थ २५) =*
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{यह अजब ख्याल भ्रष्टक भी पीरमुरीद अष्टक की तरह सूफी फकीरों की भाषा और पद्धति पर लिखा गया है । इसमें भी फारसी अरबी के शब्द प्रयुक्त हुए हैं । अजब ख्याल कहने से यह प्रयोजन है कि यह दुनिया अजायबान(आश्चर्य) से भरी हुई है मानों एक ख्यालखाना(कल्पनालोक) अजायब घर है और उस मालिक परवरदिगार की महिमा सोचते-विचारते बहुत आश्चर्य प्रगट होते हैं बुद्धि कुछ काम नहीं करती । आश्चर्य तभी होता है जब साधारण से विशेष व अतिविशेष अद्भुत चमत्कारी पदार्थ दृष्टिगत हों}
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*= दोहा =*
सिजदा१ सिरजनहार२ कौं मुरसिद३ कौं ताजीम४ ।
सुन्दर तालिब५ करत है, बन्दौं६ को तसलीम७ ॥१॥
(१. सिजदा=दण्डवत ।) (२. सिरजनहार=स्त्रष्टा ।)
(३. मुरसिद=मुरशिद, गुरु ।) (४. तालिब=शिष्य ।)
(५. ताजीम=इज्जत और सद्भाव से शिष्टाचार ।)
(६. बन्दौं=ईश्वरभक्त, साधु सन्तजन ।) (७. तसलीम=प्रणाम ।)
महात्मा कहते हैं - इस ग्रन्थ को प्रारंभ करने से पूर्व(मंगलाचरण के रूप में मैं शिष्य सुन्दरदास अपने स्रष्टा(सिरजनहार = पैदा करनेवाले) को दण्डवत प्रणाम और सद्गुरु को सादर प्रणाम करता हूं । इसी तरह सब सन्तों का नम्रता के साथ आदर करना अपना कर्तव्य समझता हूं ॥१॥
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*सुन्दर इस औजूद८ मौं९, अजब चीज है बाद१० ।*
*तब पावै इस भेद कौं, खूब मिलै उस्ताद ॥२॥*
(८. औजूद = वजूद, शरीर, काया ।) (मौं९ = मैं, अन्दर ।)
(१०. वाद = कलाम, वचन ।)
श्री सुन्दरदास जी कहते हैं - इस मनुष्य शरीर को पाकर सबसे अद्भुत बात होती है-गुरु का उपदेश । जिज्ञासु परम गुह्य तत्व का भेद(ज्ञान)तभी पा सकता है जब उसे सद्गुरु मिले ॥२॥
(क्रमशः)

विरक्त का अंग १५(१७-२०)

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卐 सत्यराम सा 卐
*दादू जब घट अनुभै उपजै, तब किया कर्म का नाश ।*
*भय अरु भ्रम भागे सबै, पूरण ब्रह्म प्रकाश ॥*
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**श्री रज्जबवाणी** 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
साभार विद्युत् संस्करण ~ Mahant Ramgopal Das Tapasvi 
*विरक्त का अंग १५*
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मनसा वाचा कर्मना, गहै न त्यागन हार । 
रज्जब रुचे न ऊगले, उर अबला रु आहार ॥१७॥ 
जो मन, वचन, कर्म से त्याग देता है, वह पुन: ग्रहण नहीं करता, जैसे वमन करे हुये आहार को ग्रहण करने की इच्छा नहीं होती, वैसे ही त्यागी हुई नारी की इच्छा नहीं होती । 
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रज्जब रवि को दरशते, अरुचि छींक चखि नीर । 
शक्ति सुन्दरी सन्मुखै, सो गति साधू वीर१ ॥१८॥ 
सूर्य के समाने देखने से देखने की रूचि नहीं होती, छींकै आने लगती है और नेत्रों में पानी आने लगता है, देखने वाले की स्थिति बिगड़ जाती है, वैसे ही हे भाई१ स्वर्णादि माया और नारी के सामने देखने से विरक्त की स्थिति भी बिगड़ जाती हो । 
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कायर कोट२ हुं सौ गिर हिं, कंध न लेहि करवाल१ । 
त्यों अधपति३ अबल४ हुं सु डरि, गहै गरीबी हाल ॥१९॥
कायर कंधे पर तलवार१ रखकर युद्ध में नहीं जाते तो भी किले२ पर से युद्ध करने वाले वीरों की तलवारों की चमक देख के भय से चक्कर खाकर नीचे गिर जाते हैं, वैसे ही राजा३ लोग विरक्तों के समान काम से युद्ध तो कहां सकते हैं, केवल काम के शस्त्र नारी४ से ही डरकर गरीबी दशा में आ जाते हैं, अर्थात दीन गरीब प्राणी के समान नारी के आगे उसकी गुलामी करते हैं । 
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साधु सुत के जावणै२, हरि सिद्धि नहिं हेत । 
पूत नीपजे मात मरि, खोटा३ खच्चर बेत१ ॥२०॥ 
खच्चरी के पेट रूप स्थान१ से जब खच्चर जन्मता है तब पेट को फाड़कर माता के मरने पर ही जन्मता है, अत: माता की दृष्टि से बुरा३ है । वैसे ही परमात्मा के विरक्त संतरूप पुत्र जन्मता२ है तब उसका हरि सिद्धि(माया) से प्रेम नहीं होता है, वह माया को नष्ट करके अर्थात मिथ्या समझ कर के ही होता है ।
(क्रमशः)

= साधु का अँग =(१५/९७-९९)

#daduji
卐 सत्यराम सा 卐 
*श्री दादू अनुभव वाणी* 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
*साधु का अँग १५* 
साधु शब्द सुख बरषि हैं, शीतल होइ शरीर ।
दादू अंतर आतमा, पीवे हरि जल नीर ॥९७॥
सँत अपने शब्दों द्वारा आनन्द की वर्षा करते हैं जिससे ईर्ष्यादि रूप जलन मिट कर अन्त:करण समता रूप शीतलता को प्राप्त होता है और जैसे तालाब का जल नदी के जल को पान करता है, वैसे ही अन्तर - साक्षी आत्मा रूप नीर ब्रह्म - साक्षात्कार रूप जल को पान करता है=ब्रह्म से अभेद हो जाता है ।
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दादू दत१ दरबार का, को साधू बांटे आइ ।
तहां रामरस पाइये, जहं साधू तहं जाइ ॥९८॥
कोई विरले उत्तम सँत ही आकर सत्संग - सभा में भगवद् प्राप्ति का हेतु उपदेश रूप दान१ वितरण करते हैं । अत: जहां सन्त हो, वहां ही साधक जाय, क्योंकि वहां ही राम - भक्ति - रस का उपदेश प्राप्त होता है ।
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*चौप चर्चा*
दादू श्रोता स्नेही राम का, सो मुझ मिलवहु आणि१ ।
तिस आगे हरिगुण कथूँ, सुनत न करई काणि२॥९९॥
भगवत् - कथा कहने की उत्कंठा दिखा रहे हैं - हे परमेश्वर ! हमें वह श्रोता आकर१ मिले जो आपका स्नेही हो और सत्संग में आकर श्रवण करते समय लोक - लज्जादि२ न करके प्रेम पूर्वक मनन द्वारा धारण करे । हम उसके आगे हरिगुण कथन करेंगे । 
(क्रमशः)

बुधवार, 29 नवंबर 2017

= १९२ =

卐 सत्यराम सा 卐
*दादू जन ! कुछ चेत कर, सौदा लीजे सार ।*
*निखर कमाई न छूटणा, अपने जीव विचार ॥* 
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साभार ~ Hansraj Taneja via @Mukesh Kumar‎

ज्ञान मार्ग से उपजी वैज्ञानिकता - श्री शम्भू नाथ शुक्ल

बुद्ध चरित में एक कथा है—बुद्ध के अंतिम समय में उनके प्रिय शिष्य आनंद ने उनसे पूछा कि भगवन‍‍् इस पृथ्वी लोक में कौन-सा अपराध ज्यादा पातक देता है, जान-बूझकर किया गया अपराध अथवा अनजाने में हुआ अपराध? बुद्ध ने आनंद की उम्मीद के विपरीत कहा कि अज्ञानतावश हुआ अपराध। आनंद हतप्रभ रह गया। भगवन‍् किस तरह का उपदेश दे रहे हैं? भला जान-बूझकर किया गया अपराध क्षम्य है और अनजाने में किया अपराध ज्यादा पातक का भागी कैसे बना सकता है? उसने फिर पूछा यह कैसे भगवन‍्? मुझे तो लगता है कि अनजाने में किया गया अपराध क्षमा के योग्य है। आनंद को लग रहा था कि वे शायद उसकी जिज्ञासा को समझ नहीं पाए। पर भगवान बुद्ध अपनी ही बात पर कायम थे। उन्होंने फिर वही जवाब दिया।

शिष्य आनंद की जिज्ञासा का शमन करते हुए बुद्ध ने कहा कि देखो आनंद मैं तुमको एक उदाहरण दे रहा हूं। मान लो एक व्यक्ति खूब गर्म लोहे की छड़ पर अनजाने में बैठ जाता है और दूसरा उस छड़ की गर्माहट को जानते हुए, तो बताओ अग्नि का ताप किसको ज्यादा जलाएगा? आनंद ने कहा कि भगवन‍् जो अनजाने में उस गर्म लोहे की छड़ पर बैठा है। बुद्ध बोले- तो यही बात मैं भी कह रहा हूं प्रिय आनंद। अनजाने में किया गया अपराध ज्यादा पातक का भागी बनाता है। पर आनंद को अभी भी यह बात समझ में नहीं आई। उसने कहा कि मुझे लगता है कि अनजाने या भोले आदमी द्वारा किया गया अपराध क्षम्य होना चाहिए। एक आदमी जानबूझ कर अपराध कर रहा है पर दूसरा बेचारा भूलवश, तो जाहिर है कि अपराध उसी का बड़ा समझा जाएगा जिसने जानबूझ कर किया। बुद्ध बोले—आनंद जो अज्ञान के कारण अपराध करता है वह अधिक दोषी इसलिए भी है कि उसने ज्ञान को नहीं स्वीकारा। हर चीज का ज्ञान जरूरी है आनंद और इसके लिए जरूरी है अनवरत ज्ञान का अभ्यास। जो अज्ञान में अपराध करेगा वह भीषण अपराध करेगा पर जानबूझ कर करने वाला अपराध छोटा होगा। अब आनंद की समझ में आया कि वे ज्ञान की महिमा का बखान कर रहे हैं।

भगवान बुद्ध का आशय ज्ञान की रोशनी से था। उनका मानना था कि हर आदमी अपने दुख से सिर्फ तब ही उबर सकता है जब वह अज्ञान से ज्ञान की तरफ जाए। यह ज्ञान की रोशनी ही उसे उसके सारे दुखों से उबारने में सहायक होगी। बुद्ध का सारा जोर प्राणियों को ज्ञानवान बनाना था और इसी का नतीजा था कि बुद्ध का दर्शन मनुष्य को अंधविश्वास की तरफ नहीं ले जाता और जिन प्रश्नों के उत्तर ज्ञात न हों, बुद्ध उन प्रश्नों को मानव जीवन के लिए व्यर्थ मानकर छोड़ने की सलाह देते हैं। बुद्ध कहते हैं कि ईश्वर है अथवा नहीं या आत्मा है अथवा नहीं, इसे जान लेने या न जान लेने से मनुष्य का कुछ बनता-बिगड़ता नहीं। इसलिए ऐसे फिजूल प्रश्नों को छोड़ देना ही श्रेयस्कर होगा भंते। मनुष्य जीवन के बाकी सभी उपादेयों को समझ लेने की बात बुद्ध करते हैं पर ईश्वर के बारे में वे चुप साध जाते हैं। यही कारण है कि बुद्ध के बाद ही भारत में ज्ञानवाद की आंधी चल पड़ी और ज्यादातर वैज्ञानिक खोजें तथा चिकित्सा विज्ञान की उपलब्धियां बुद्ध के बाद की हैं।

कणाद के दर्शन के जिस अणुवाद का ज्ञान हमें मिलता है वह भी बुद्ध के परवर्ती काल का है। बुद्ध ने जीवन को वैज्ञानिक पद्धति से समझने का प्रयास किया और जाना भी। लेकिन बौद्ध धर्म में चूंकि निजी मोक्ष पर जोर इतना था कि शुरू में बुद्धचर्या मात्र कुछ बौद्ध भिक्षुओं तक ही सिमटी रही। पर जब बुद्ध मार्ग का विस्तार हुआ तो महायान संप्रदाय का जन्म हुआ और बुद्ध का दर्शन आम आदमी तक भी पहुंचा। सिर्फ साधकों पर जोर होने के कारण बुद्ध का पूर्ववर्ती काल सिमटा हुआ ही रहा है पर जैसे-जैसे सबकी साझेदारी स्वीकार हुई, बौद्ध धर्म का इतना विस्तार हुआ कि देश और काल की सीमाएं लांघते हुए बौद्ध धर्म पश्चिम एशिया से लेकर दक्षिण-पूर्व एशिया में तो पहुंचा ही। यूरोप के स्पेन में आज भी बौद्ध मठ मिल जाते हैं। यह भी कहा जाता है कि ईसाई मत में जो करुणा का आग्रह है वह बौद्ध मत से ही आया। पर ईसाई मत में ईश्वर की सत्ता स्वीकार करने के बाद भी उसमें वैज्ञानिकता रही और निरंतर इस मत को और धारदार तथा आधुनिक जीवनशैली के अनुकूल बनाया गया पर बौद्ध मत कुछ सीमा तक प्रगति करने के बाद पीछे घिसटता चला गया। और आज खुद भारत में ही बौद्ध मत के अनुयायियों की संख्या एक करोड़ से ऊपर नहीं है।

यह एक अजीब बात है कि जिस धर्म ने सबसे पहले ईश्वर की सत्ता को नकारा और सिर्फ ज्ञान की पहुंच को ही सत्य माना, उस धर्म का वजूद भारत में भले न हो पर पूरा दक्षिण-पूर्व एशिया तथा मध्य एशिया आज भी उसी धर्म को अपना आदर्श मानता है। चीन हो या जापान अथवा थाईलैंड या वियतनाम अथवा कंबोडिया, बर्मा या मलयेशिया और इंडोनेशिया आदि सभी जगह आदर्श बौद्ध ही हैं। मलयेशिया और इंडोनेशिया में राजकीय धर्म भले इस्लाम हो पर वहां पर आम जनता की जीवनशैली पर बुद्ध के ही आदर्श हावी हैं और यही कारण है कि इन दोनों ही मुल्कों में इस्लाम का दखल बस मस्जिदों तक सीमित है। चीन और जापान में धर्म अध्यात्म का अबूझ रूप लेकर नहीं फैला बल्कि वहां बुद्ध चर्या का ज्ञान स्वरूप ही पसंद किया गया। यही कारण है कि बुद्ध वहां धर्म के प्रतीक हैं पर जीवन शैली में जो खुलापन और आध्यात्मिकता है वह प्रवृत्तिवादी है जो यहां के लोगों को निरंतर शोध और वैज्ञानिकता की तरफ ले जाती है। इन मुल्कों में धर्म त्राता का रूप तो है पर अंधविश्वास के रूप में कतई नहीं। वहां धर्म उपासना तक ही सीमित है और जीवन शैली में जो वैज्ञानिकता है वह बुद्ध धर्म के ज्ञानमार्ग के कारण ही। ऐसे में बुद्ध का उपदेश याद आता है—भंते, अज्ञान ही सबसे बड़ा अपराध है और पातक है, इसलिए अज्ञान को त्यागो और ज्ञान की रोशनी की तरफ निरंतर चलते रहो। चरैवति! चरैवति !

= १९१ =

卐 सत्यराम सा 卐
*अर्थ आया तब जानिये, जब अनर्थ छूटे ।*
*दादू भाँडा भरम का, गिरि चौड़े फूटे ॥* 
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साभार ~ Hansraj Taneja via @Ravi Kant‎

निर्वाण उपनिषद --ओशो (प्रवचन --14)
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इसलिए संन्यासी के पास अगर कोई रहे, तो बड़ी मुश्किल में पड़ जाता है। संन्यासी तो मुश्किल में होता है अपने ढंग की, लेकिन उसकी मुश्किल तो ठीक है, उसके पास कोई रहे, तो बहुत मुश्किल में पड़ जाता है। क्योंकि संन्यासी भ्रम नहीं पोसना चाहता और जो भी उसके पास रहेगा, वह भ्रम पोसना चाहता है। अगर संन्यासी सत्य के ही साथ सीधा जीता है, तो जो भी उसके निकट है, वह अड़चन में पड़ना शुरू हो जाता है। क्योंकि संन्यासी ऐसी बातें कहेगा, इस ढंग से जीएगा कि आप अपने भ्रमों को न पोस पाएंगे। इसलिए एक बहुत दुर्घटना इस जमीन पर घटती रही है और वह यह है कि इस जमीन पर जिन लोगों ने भी सत्ये की खोज की है, उनके आसपास के लोग कभी भी उनको प्रेम भी नहीं कर पाए और कभी उनको समझ भी नहीं पाए।
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सुकरात की पत्नी तक, जो निकटतम थी उसके, उसको नहीं समझ पाई, क्योंकि सुकरात कोई भ्रम में सहायता न देगा । तो सुकरात और उसकी पत्नी की कलह अनिवार्य हो गई, क्योंकि पत्नी चौबीस घंटे भ्रमों की मांग कर रही है और सुकरात कोई भ्रम नहीं दे सकता। पत्नी के मन में कहीं तो आकांक्षा होती है कि कभी सुकरात कहे कि तुम सुंदर हो। लेकिन सुकरात कहता है, सौंदर्य तो मन का भाव है। शरीर से उसका कोई संबंध नहीं है। खयाल है। उसका कोई अर्थ नहीं है। अब यह पत्नी बड़ी मुश्किल में पड़ेगी। पत्नी चाहती है कि सुकरात कभी कहे कि तुम्हारे बिना मैं न जी सकूंगा। सुकरात कहता है, सब सबके बिना जी सकते हैं। बल्कि अगर सुकरात से सच पूछो,तो वह कहेगा कि तुम्हारे बिना मैं ज्यादा आसानी से जी सकूंगा। लेकिन यह पत्नी के मन को तो बड़ी तकलीफ होगी, बड़ी पीड़ादाई हो जाएगी बात। बहुत कठिन हो जाएगा, क्योंकि उसके कोई सपने खडे न हो पाएंगेे और वह तैयारी में नहीं है तोड़ने की।
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इसलिए जब जीसस ने अपनी मां को कहा कि कोई मेरी मां नहीं है, कोई मेरा पिता नहीं है, तो हम समझ सकते हैं कि मां को कैसी पीड़ा हुई होगी। बेटा चोर होता, बेईमान होता और कह देता कि कोई मेरी मां नहीं, तो मां प्रसन्न भी हो सकती थी कि झंझट मिटी। बदनामी अपने सिर न आएगी। बेटा हो गया है पैगंबर। हजारों लोग उसे भगवान का बेटा मानने लगे हैं। मां बहुत आतुरता से आई होगी कि भीड़ के सामने जीसस कह देगा कि तू मेरी मां है। और जीसस ने कह दिया कि नहीं, कौन किसकी मां! कौन किसका बेटा! कोई किसी का कोई भी नहीं है। तो हम समझ सकते हैं कि मां को, मां के भ्रम को कैसा धक्का लगा होगा।
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जब बुद्ध ने अपने पिता को कहा कि आप नहीं जानते कि मैं कौन हूं आप मुझे नहीं पहचानते। तो बुद्ध के पिता तो क्रोध से भर गए। उन्होंने कहा, मैं तुझे नहीं पहचानता? मैंने तुझे पैदा किया! ये तेरी हड्डीयां, और तेरा खून, और तेरा मांस मेरा है। तेरी रगों में जो बह रही है ताकत, वह मेरी है। और मैं तुझे नहीं पहचानता? तू नहीं था, उसके पहले मैं था। बुद्ध ने कहा, वह सब ठीक है। वह खून भी आपका होगा, हड्डियां भी आपकी होंगी, वह शरीर भी आपका होगा, लेकिन मेरा उससे कुछ लेना—देना नहीं, मैं और ही हूं। बुद्ध के बाप ने कहा, तू मुझ से पैदा हुआ है ! बुद्ध ने कहा, वह भी ठीक है। लेकिन आप एक चौराहे की तरह थे, जिस पर से मैं आया, लेकिन मेरी यात्रा आपके मिलने के बहुत पहले से चल रही है। आप एक रास्ता थे, जस्ट ए पैसेज, जिससे मैं आया, वह ठीक है। लेकिन अगर दरवाजा यह कहने लगे कि चूंकि मैं उसमें से निकला, इसलिए वह मुझे जानता है, तो आति हो जाएगी। बाप तो आग—बबूला हो गया। उन्होंने कहा, तू मुझे सिखाता है? सभी बाप आग—बबूला हो जाएंगे कि तू मुझे सिखाता है? बुद्ध सत्य की बात कर रहे हैं, कठिनाई वहीं है और बाप अभी भ्रमों के बीच जीना चाहता है।
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बुद्ध की पत्नी ने अपने बेटे को कहा कि राहुल, अपने बाप से वसीयत मांग ले। ये तेरे बाप खड़े हैं। व्यंग्य गहन था। बुद्ध के पास तो कुछ भी न था देने को। लेकिन पत्नी रोष में थी। यह आदमी छोड्कर भाग गया था। बेटे ने तो पहली दफा ही बुद्ध को होश में देखा था, क्योंकि बेटा तो पहले ही दिन का था, पैदा ही हुआ था, तब बुद्ध घर से निकल गए थे। बारह साल बाद लौटे हैं। तो राहुल को सामने खड़ा करके उनकी पत्नी ने कहा कि ये रहे तुम्हारे पिता, जिन्होंने तुम्हे जन्म दिया। भाग गए जन्म देकर। अब मिले हैं, मौका मत चूकना। फिर भाग जाएंगे। इनसे ले लो वसीयत कि मेरे लिए क्या देते हो जगत में! मुझे पैदा कर दिया, तो है क्या?
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बुद्ध की पत्नी जो व्यंग्य कर रही है, वह भ्रमों की दुनिया का व्यंग्य है। लेकिन बुद्ध ने कहा कि मेरे निकट आ, बड़ी संपदा मेरे पास है, वह मैं तुझे देता हूं। और जो दिया, वह भिक्षा—पात्र था। और आनंद को कहा, आनंद संन्यास में दाक्षित करो राहुल को। पत्नी तो कांप गई, रोने लगी, लेकिन राहुल दीक्षित हो चुका था। बुद्ध ने कहा, जो मेरे पास श्रेष्ठ है, वही तो मैं दूं। जो संपदा है, वही मैं दूं। जिसको छोड गया था, वह विपदा थी। अब मैं संपदा लेकर आया हू। वही मैं देता हूं।
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बुद्ध के बाप रोने लगे और उन्होंने कहा कि तू बर्बाद करके रहेगा। अकेला तू मेरा बेटा था। तेरे जाने से भारी उपद्रव हुआ। अब तेरा बेटा ही मालिक है सारे साम्राज्य का। इसको भी तू संन्यासी कर रहा है ! बुद्ध ने कहा, आप भी राजी हो जाएं। क्योंकि यह साम्राज्य पाकर आपको क्या मिला? मुझे छोड्कर क्या खो गया? और यह मेरा बेटा भी इसी चक्की में पिसता रहे, तो क्या मिल जाएगा? मैं इसे संपदा देता हूं। लेकिन सबको लगा कि बुद्ध भारी अन्याय कर रहे हैं। सारे गांव में दुख की लहर फैल गई कि बारह साल के लड़के को दीक्षा दे दी। हद अन्याय है। लेकिन बुद्ध जहां जीते हैं, वहा भ्रमों का जगत नहीं है। संन्यासी चौबीस घंटे भ्रम तोड़ने में लगा रहता है। और भ्रम टूटते हैं, तो ही तीन गुणों के पार यात्रा शुरू होती है।

= पीर- मुरीद अष्टक(ग्रन्थ २४-८) =

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🙏 *श्री दादूदयालवे नमः ॥* 🙏
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रचियता ~ *स्वामी सुन्दरदासजी महाराज*
संपादक, संशोधक तथा अनुवादक ~ स्वामी द्वारिकादासशास्त्री
साभार ~ श्री दादूदयालु शोध संस्थान,
अध्यक्ष ~ गुरुवर्य महमंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमारामजी महाराज
https://www.facebook.com/DADUVANI
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*= पीर- मुरीद अष्टक(ग्रन्थ २४) =*
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*हैरान है हैरान है, हैरान निकट न दूर ।*
*भी सखुन क्यों करि कहैं तिसकौं,*
*सकल है भरपूर ॥*
*सम्बाद पीर मुरीद का यह,*
*भेद पावै कोइ ।*
*जो कहैं सुन्दर सुनै उही सुन्दर होइ ॥८॥*
॥ स्माप्तोSयं पीर-मुरीद अष्टक ग्रन्थः ॥
हर एक ज्ञानी उस ब्रह्म का साक्षात्कार करने के बाद उस का जैसा का तैसा वर्णन करने में हैरान हो जाता है, चकित रह जाता है, अवाक् हो जाता है । उसे निकट भी नहीं कह सकते(क्योंकि वह अदृश्य है), दूर भी नहीं कह सकते(क्योंकि वह सर्वव्यापक है), वाणी के द्वारा उसका कितना सा वर्णन हो सकता है जो इस विश्व में व्याप्त है ।
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इस तरह यह गुरु-शिष्य-संवाद पूरा हुआ । इस संवाद का वास्तविक रहस्य(सचाई) कोई विरला व्यक्ति ही समझ सकता है, कह सकता है । इस भेद(रहस्य) को कहने(उपदेश करने) वाला(गुरु) और सुनने वाला(शिष्य) - दोनों ही उत्तम हैं, जगत् में श्रेष्ठ हैं, पूज्य हैं, वन्दनीय हैं । उन्हीं दोनों का जीवन सफल है(क्योंकि एक उस ब्रह्म को पा चुका है दूसरा प्रयास करके पाने जा रहा है) ये ही दोनों धन्य हैं, बाक़ी दुनिया तो चौरासी लाख योनियों के आवगमन में ही फँसी हुई है ॥८॥
*= ॥ पीर-मुरीद अष्टक समाप्त ॥ =*
(क्रमशः)

विरक्त का अंग १५(१३-१६)

#daduji

卐 सत्यराम सा 卐
*दादू जब घट अनुभै उपजै, तब किया कर्म का नाश ।*
*भय अरु भ्रम भागे सबै, पूरण ब्रह्म प्रकाश ॥*
========================
**श्री रज्जबवाणी** 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
साभार विद्युत् संस्करण ~ Mahant Ramgopal Das Tapasvi 
*विरक्त का अंग १५*
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रज्जब तूटी त्रिभुवन, करतों त्रिय तिरस्कार । 
सो योगी यशवंत जग, जग में जै जै कार ॥१३॥ 
नारी का त्याग करते ही तीनों भुवनों के विषय सुखों से वृत्ति हट जाती है, जो तन मन से नारी का त्याग कर देता है, वह योगी जगत् में यश का भागी होता है और उसकी जगत् में जय ध्वनी होती है । 
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रज्जब आये रहत१ में, उर अबला अनमेल । 
तन से तिय तिरस्कार कर, खेल चले यह खेल ॥१४॥ 
जो शरीर से नारी का त्याग करके मन से भी नारी से नहीं मिले वे ही यह वैराग्य का खेल खेलकर तथा संसार से चलकर ब्रह्म स्वरूप में आये हैं, अर्थात ब्रह्म१ रूप हुये हैं । 
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नर नारी न्यारा भया, निकस गया नौ खंड । 
रज्जब रखता राम सौं, रही सु माया मंड१ ॥१५॥ 
विरक्त नर तन मन से नारी से अलग हो जाता है, उसी समय नौ खंड के विषय सुखों से निकल जाता है और राम में अनुरक्त होकर ब्रह्म रूप हो जाता है, फिर माया उसका क्या कर सकती है ? वह तो ब्रह्मांड१ में ही रह जाती है । ब्रह्म में माया का अभाव है । 
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रज्जब त्यागी घर घरनि, पर नारी न सुहाय ।
अहि अपनी तज काँचुली, का की पहरे जाय ॥१६॥ 
जो विरक्त निज नारी का त्याग देता है, उसे पर नारी अच्छी नहीं लगती, सर्प काँचुली त्यागकर किसी अन्य सर्प की पहनने कब जाता है ? 
(क्रमशः)

= साधु का अँग =(१५/९४-६)

#daduji
卐 सत्यराम सा 卐 
*श्री दादू अनुभव वाणी* 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
*साधु का अँग १५* 
दादू सब जग फटिक पषाण है, साधू सैन्धव होइ ।
सैन्धव एकै ह्वै रह्या, पानी पत्थर दोइ ॥९४॥
सँपूर्ण जगत के दँभी - जन श्वेत पत्थर के समान हैं और सँत सैन्धव के समान हैं । सँत - सैन्धव ब्रह्म - जल में मिल कर अद्वैत भाव से रहता है और दँभी - पत्थर ब्रह्म - जल से भिन्न द्वैत भाव से रहता है ।
*साधु परमार्थी*
को साधु जन उस देश का, आया इहिं सँसार । 
दादू उसको पूछिये, प्रीतम के समचार ॥९५॥
९५ - ९८ में सँत परमार्थी होते हैं, यह कह रहे हैं - जिसमें परब्रह्म का साक्षात्कार होता है, उस निर्विकल्प समाधि देश का यदि कोई सँत लोक - कल्याणार्थ इस सँसार दशा में उतर कर उपदेश करता हो तो उसको अपने प्रियतम परब्रह्म की प्राप्ति के साधन रूप समाचार पूछना चाहिए, क्योंकि उसे पूरा अनुभव है । साँसारिक विषय नहीं ।
समाचार सत पीव के, को साधू कहेगा आइ ।
दादू शीतल आतमा, सुख में रहे समाइ ॥९६॥
परब्रह्म - प्राप्ति के सच्चे साधन रूप समाचारों का उपदेश, परब्रह्म को प्राप्त कोई विरला ही सन्त आकर करेगा । उसके उपदेश द्वारा विषमता रूप जलन मिट कर बुद्धि को समता रूप शीतलता प्राप्त होगी और वह मनन - निदिध्यासन द्वारा ब्रह्मानन्द में लीन रहेगी ।
(क्रमशः)

मंगलवार, 28 नवंबर 2017

= १९० =


卐 सत्यराम सा 卐
*साचा समर्थ गुरु मिल्या, तिन तत्त दिया बताइ ।*
*दादू मोटा महाबली, घट घृत मथि कर खाइ ॥* 
*मथि करि दीपक कीजिये, सब घट भया प्रकाश ।*
*दादू दीवा हाथि करि, गया निरंजन पास ॥* 
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साभार ~ Hansraj Taneja via Prem Arora
ओशो : सहज योग--(प्रवचन--19)
प्रेम प्रार्थना है
मैं तो कहता हूं: जो है, इस क्षण, अभी, यहां, उसे जानो। मानने पर मेरा जोर नहीं है। क्योंकि जो भी तुम्हें मनाता है, वही तुम्हें गुलाम बना लेगा। मनाने का अर्थ है: तुम्हारे हाथ में झूठ पकड़ा देना। जो तुम्हारा अनुभव नहीं है, वह झूठ है। मेरा अनुभव मेरे लिए सत्य है। तुम्हारा अनुभव तुम्हारे लिए सत्य होगा। मेरा अनुभव तुम्हारे लिए कभी सत्य नहीं हो सकता। 
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मैंने स्वाद लिया, तुम्हें तो स्वाद नहीं आया। मैंने संगीत सुना, तुम्हारे कान तो वैसे के वैसे वंचित रहे। मैंने भोजन किया, मेरी भूख मिटी; तुम्हारी तो न मिट जायेगी। अगर मेरे भोजन करने से मेरे संन्यासी की भूख नहीं मिटती; तो मैं परमात्मा को जान लूं, इससे मेरा संन्यासी कैसे परमात्मा को जान सकेगा? जब शरीर की भूख तक नहीं मिटती, तो आत्मा की भूख कैसे मिट जायेगी?
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इसलिए स्मरण रहे कि सत्य जब भी जानने वालों के हाथ से गैर-जाननेवालों के हाथ में जाता है, उसी प्रक्रिया में झूठ हो जाता है। दूसरे का सत्य तुम्हारे लिए झूठ है। इसलिए मैं कोई धारणाएं नहीं दे रहा हूं। अगर कुछ मैं दे रहा हूं तो जागरण, होश। इसलिए मेरी धारणाओं पर बलिदान करने का तो कोई सवाल ही नहीं है, कोई प्रश्न ही नहीं है।
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त्याग और बलिदान मेरी जीवन-शैली के अंग ही नहीं हैं। मैं तुमसे कुछ भी मेरे लिए छोड़ो, ऐसा न कहता हूं न कह सकता हूं। हां, तुम्हें जो दिखाई पड़ने लगे व्यर्थ है, वह छूट जायेगा और जो सार्थक है, तुम उसे पकड़ने लगोगे। लेकिन यह घटना घटेगी तुम्हारे भीतर, तुम्हारे अंतरतम में; तुम्हीं इसके निरीक्षक, तुम्हीं इसके मालिक होओगे। मैं तुम्हारा मालिक नहीं हूं, ज्यादा-से-ज्यादा तुम्हारा संगी-साथी हूं। 
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बुद्ध ने स्वयं को कहा है, मैं कल्याण-मित्र हूं। वही मैं तुमसे कहता हूं: मैं तुम्हारा कल्याण-मित्र हूं। तुम मेरे शिष्य हो, इससे तुम यह मत समझ लेना कि मेरे भीतर कोई गुरु-भाव है। तुम जरूर मेरे शिष्य हो, क्योंकि तुम अभी तलाश कर रहे हो। लेकिन जहां तक मेरा संबंध है, मैं तुम्हारा गुरु नहीं हूं, न तुम मेरे शिष्य हो। क्योंकि मुझे तो वह दिखाई पड़ रहा है: तुम जिसे तलाश कर रहे हो, वह तुम्हारे भीतर मौजूद है। मेरी तरफ से तो मैं मित्र हूं, तुम्हारी तरफ से गुरु हूं। 
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तुम अज्ञानी हो। तुम अज्ञानियों की सारी धारणाएं गलत हैं। उसी में यह धारणा भी सम्मिलित है कि मैं तुम्हारा गुरु हूं, कि तुम मेरे शिष्य हो। जब दीया जलेगा, तुम्हारे भीतर रोशनी होगी, ये धारणाएं भी विदा हो जायेंगी। न तुम पाओगे कि तुम शिष्य हो, न तुम पाओगे कि मैं गुरु हूं। न रहेगा मैं, न रहेगा तू; परमात्मा ही रह जाता है--न कोई शिष्य, न कोई गुरु। और जहां दोनों खो जाते हैं, वहीं सत्य का प्रथम साक्षात्कार है।

= १८९ =

卐 सत्यराम सा 卐
*मन ही सौं मन सेविये, ज्यौं जल जलहि समाइ ।*
*आत्म चेतन प्रेम रस, दादू रहु ल्यौ लाइ ॥*
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साभार ~ Hansraj Taneja via Prem Arora

ओशो : कहे होत अधीर--(प्रवचन--12)
मेरे देखे, अगर तुम परमात्मा के निकट आना चाहते हो तो सत्यनारायण की कथा तुम्हें उसके निकट नहीं लाएगी। क्योंकि तुम्हारी सत्यनारायण की कथा में न तो सत्य है और न नारायण है; वह तो पंडित—पुरोहित का व्यवसाय है। यज्ञ—हवन, आग में फेंका गया घी, गेहूं, चावल—पागलपन है, विक्षिप्तता है, अपराध है। 
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देश भूखा मरता हो और हजारों मनों का अनाज, सैकड़ों पीपे घी प्रतिवर्ष बहाया जाता है अग्नि में। तुम पागल हो ! यह धर्म नहीं है। जलानी है अपने भीतर की मशाल। और उसके जलाने का सुगमतम जो उपाय है, वह है सृजनात्मक हो जाओ। जीवन को वैसा ही मत छोड़ो जैसा तुमने पाया था।
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जीवन को कुछ सुंदर करो। उठाओ तूलिका, जीवन को थोड़े रंग दो ! उठाओ वीणा, जीवन को थोड़े स्वर दो ! पैरों में बांधो घूंघर, जीवन को थोड़ा नृत्य दो ! प्रेम दो ! प्रीति दो ! तोड़ो उदासी। जीवन को थोड़ा उत्सव से भरो ! और तुम जितने सृजनात्मक हो जाओगे उतना ही तुम पाओगे, तुम परमात्मा के करीब आने लगे। क्योंकि परमात्मा अर्थात सृजनात्मकता। उसके करीब आने का एक ही उपाय है: सृजन।
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इसलिए मैं निरंतर कहता हूं कि तुम्हारे पंडित—पुजारी से तो कवि, चित्रकार, मूर्तिकार, अभिनेता कहीं ज्यादा करीब होता है परमात्मा के। अभिनेता जब अभिनय में अपने को पूरी तरह डुबा देता है तो वह प्रार्थना का क्षण है। चित्रकार जब चित्र बनाने में बिलकुल लवलीन हो जाता है, तल्लीन हो जाता है, भूल ही जाता है अपने को—तब वह प्रार्थना का क्षण है। जब भी तुम सृजन की किसी क्रिया में अपने को पूरा गला देते हो, पिघला देते हो—मिट जाते हो। कवि, चित्रकार, अभिनेता, मूर्तिकार कहीं ज्यादा करीब हैं परमात्मा के—पंडित, पुरोहितों, दार्शनिकों, विचारकों से। लेकिन कवि हो, चित्रकार हो, मूर्तिकार हो, बस क्षण भर को डूबता है, फिर बाहर निकल आता है; उसकी डुबकी गहरी नहीं।
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तीन छोटे—छोटे बच्चे बात कर रहे थे। एक बच्चे ने कहा कि तैरना तो कोई मेरे पिताजी से सीखे, क्या डुबकी मारते हैं ! दूसरे ने कहा, तुम्हारे पिताजी, डुबकी ! फिर निकलते हैं या नहीं? निकल आते हैं। उसने कहा, डुबकी मेरे पिताजी मारते हैं। आधा—आधा घंटे तक पता ही नहीं चलता।
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तीसरे ने कहा, यह भी कोई डुबकी है ! मेरी पिताजी ने डुबकी सात साल पहले मारी थी, अभी तक नहीं लौटे। और मैं मां से पूछता हूं, कब लौटेंगे? मां कहती है, अब वे आने वाले नहीं, वे डुबकी मार ही गए। डुबकी इसको कहते हैं !

= पीर- मुरीद अष्टक(ग्रन्थ २४-७) =

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🙏 *श्री दादूदयालवे नमः ॥* 🙏
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रचियता ~ *स्वामी सुन्दरदासजी महाराज*
संपादक, संशोधक तथा अनुवादक ~ स्वामी द्वारिकादासशास्त्री
साभार ~ श्री दादूदयालु शोध संस्थान,
अध्यक्ष ~ गुरुवर्य महमंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमारामजी महाराज
https://www.facebook.com/DADUVANI
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*= पीर- मुरीद अष्टक(ग्रन्थ २४) =*
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*जब कह्या तालिब सखुन ऐसा,*
*पीर पकरी मौन ।* 
*कौ कहेगा न कह्या न किनहूँ,*
*अब कहै कहि कौंन ॥*
*तब देखि बोर मुरीद की,*
*उन पीर मूंदे नैंन ।* 
*जौ खूब तालिब होइगा,*
*तौ समझि लेगा सैन ॥७॥*
जब उस जिज्ञासु ने ऐसा प्रश्न किया, तब गुरुदेव चुप रह गये । क्योंकि ऐसे गूढ़ प्रश्न का उत्तर कौन दे पायगा ? आज तक बड़ा से बड़ा ज्ञानी भी इसका उत्तर नहीं दे सका है तो अब कौन उत्तर दे ? 
गुरुदेव ने शिष्य की उत्कण्ठा देखकर अपनी आँखे मूंद ली और ध्यानस्थ हो गये । इस तरह गुरुदेव ने अपने व्यवहार से संकेत द्वारा शिष्य को उस ब्रह्म के विषय में सब कुछ बता दिया । अर्थात् मौन द्वारा उन्होंने मौन संकेत द्वारा उस ब्रह्म का वाणी द्वारा वर्णन नहीं हो सकता; क्योंकि वह अनिवर्चनीय है, और आँखे मूंद कर ध्यानस्थ होने से गुरु का तात्पर्य है कि जो उस ब्रह्म का ध्यानस्थ होकर चिन्तन करेगा वही उस ब्रह्म का साक्षात्कार कर सकेगा, अन्य कोई नहीं । 
इस तरह दो संकेतों के सहारे विवेकी शिष्य को ब्रह्म-प्राप्ति का उपाय बता दिया । बलिहारी है ऐसे सच्चे गुरु की ! ॥७॥ 
(क्रमशः)

विरक्त का अंग १५(९-१२)

#daduji


卐 सत्यराम सा 卐
*चार पदार्थ मुक्ति बापुरी, अठ सिधि नव निधि चेरी ।
माया दासी ताके आगे, जहँ भक्ति निरंजन तेरी ॥*
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**श्री रज्जबवाणी** 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
साभार विद्युत् संस्करण ~ Mahant Ramgopal Das Tapasvi 
*विरक्त का अंग १५* 
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पाइ परी पाई नहीं, ऋद्धि सिद्धि निधि ऐन१ । 
रज्जब त्यागी ते पुरुष, संतति शक्ति न सैन ॥९॥ 
जो नाना प्रकार के ऐश्वर्य, अष्टसिद्धि, नौ निधि साक्षात्१ पैरों में पड़ने पर भी उनको नहीं प्राप्त के समान ही समझते हैं अर्थात उससे उपराम ही रहते हैं । संतान तथा मायिक सुख प्राप्ति के लिये संकेत मात्र ही नहीं करते, उद्योग तो कैसा, वे ही त्यागी पुरुष हैं । 
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मुख की सिलक गूदा की ढीमा, 
त्यागत सोच नहीं कुछ जीमा । 
त्यों विभूति बरतणि ले डारी, 
यूं माया मुनिवर सौ न्यारी ॥१०॥
मुख की लार पंक्ति वा वमन और गुदा का मल इनको त्यागने से मन में कुछ भी चिन्ता नहीं होती, वैसे ही विरक्त पुरुष माया को कार्य में लेकर पटक देते हैं, उसमें राग नहीं करते, इसी से माया मुनिवरों से अलग ही रही है । 
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सोने मुख पीला किया, रूपे किया सुश्वेत । 
जन रज्जब सु वियोग ही, साधु किया नहीं हेत ॥११॥
संतों ने प्रेम नहीं किया, संतों के वियोग दु:ख के कारण ही सोना पीला पड़ गया और चाँदी श्वेत हो गई । 
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जोड़े के सुख से रह्या, जड़ काटी जग माँही ।
रे रज्जब संसार में, सो फिर आवे नाँहिं ॥१२॥
जो नारी पुरुष के जोड़े से होने वाले सुख से अलग रहा है और जगत के धनादि में जो अपनी आसक्ति रूप जड़ जमी थी उसे वैराग्य से काट दी है, वह पुन: संसार में नहीं आता ब्रह्म में लीन हो जाता है ।
(क्रमशः)

= साधु का अँग =(१५/९१-९३)


#daduji 
卐 सत्यराम सा 卐 
*श्री दादू अनुभव वाणी* 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
*साधु का अँग १५* 
दादू अवगुण छाड़ै गुण गहै, सोई शिरोमणि साध । 
गुण अवगुण तैं रहित है, सो निज ब्रह्म अगाध ॥९१॥
जो अपने हृदय के काम - क्रोधादिक अवगुणों को त्यागे और दूसरों के अवगुण देखना त्यागे तथा क्षमादि दैवी गुणों को धारण करे और दूसरों के गुण ही देखे, वही शिरोमणि सँत माना जाता है और जो गुण - अवगुण से रहित है, वह तो सबका निज - स्वरूप अगाध ब्रह्म रूप ही होता है ।
*जग जन विपरीत*
दादू सैन्धव फटिक पषाण१ का, ऊपरि एकै रँग ।
पानी माँहीं देखिये, न्यारा न्यारा अँग ॥९२॥
९२ - ९४ में जगत् के पाखँडी जन और सन्त जन की विपरीतता बता रहे हैं - सैंधव नमक का और श्वेत बिल्लौर पत्थर१ का ऊपर से तो एक - सा ही रँग दिखाई देता है, किन्तु जल में डालकर देखोतो उनका स्वरूप भिन्न - भिन्न प्रतीत होता है । सैंधव पानी में घुल जायगा, किन्तु पत्थर नहीं । वैसे ही सन्त और पाखँडी जनों का ऊपर से भेष तो एक सा ही भासता है किन्तु साधना की परिपाकावस्था में अपने आप ही भेद खु जाता है, वही आगे दिखा रहे हैं ।
दादू सैंधव के आपा नहीं, नीर खीर परसँग ।
आपा फटिक पषाण के, मिले न जल के संग ॥९३॥
सैंधव में कठौरता न होने से वह जल में दुग्ध के समान मिल जाता है । श्वेत पत्थर में कठौरता होने से वह जल में नहीं मिलता । वैसे ही सच्चे सँत में जीवत्व अहँकार न होने से वह ब्रह्म में लय हो जाता है । दँभी में जीवत्व अहँकार होने से वह ब्रह्म में लय नहीं हो पाता । 
(क्रमशः)

सोमवार, 27 नवंबर 2017

= १८८ =

卐 सत्यराम सा 卐
*कहबा सुनबा मन खुशी, करबा औरै खेल ।*
*बातों तिमिर न भाजई, दीवा बाती तेल ॥*
*दादू करबे वाले हम नहीं, कहबे को हम शूर ।*
*कहबा हम थैं निकट है, करबा हम थैं दूर ॥* 
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साभार ~ Dana Mahiya
"इतना ज्ञान, तो फिर **क्यों नहीं हैं ख़ुश** धरती पर लोग"

एक दिन यमराज और चित्रगुप्त आपस में बात कर रहे थे। अचानक से यमराज ने चित्रगुप्त से पूछा, "चित्रगुप्त, एक बात बताओ, वहाटसअप और फ़ेस्बुक पर होने वाले ज्ञान के आदान प्रदान को देखकर तो लगता है कि मनुष्यलोक में सभी लोग एकदम मज़े में होंगे और स्वर्ग का आनन्द ले रहे होंगे पर उनके चेहरों को देखकर एेसा मालूम तो नहीं पडता. क्या प्रोब्लम हो सकता है"

चित्रगुप्त हल्के से मुस्कुराये और बोले, "महाराज, कल मैंने आपको आपके पेट दर्द के लिए आयुर्वेद का एक बेहतरीन इलाज वहाटसअप पर भेजा था, वो आपको कैसा लगा?"

यमराज ने बड़े ही उत्साह के साथ तुरंत उत्तर दिया और बोले, "जरूर ही बहुत अच्छा होगा चित्रगुप्त क्योंकि मैंने तुरंत उसे मेरे सारे ग्रुप्स पर फॉरवर्ड कर दिया था. और तुरंत बहुत सारे लाइकस भी आ गए थे. और तो और, अब वही मैसेज मुझे वापस भी आने लगे हैं."

यमराज का उत्तर सुनकर चित्रगुप्त बोले, "वो तो ठीक है महाराज, - पर क्या आपने वो नुस्खा आजमाया?"

यमराज बड़े ही उदास होकर बोले - "नहीं चित्रगुप्त, मैं उस नुस्ख़े को नहीं आज़मा पाया क्योंकि मैं पूरा समय उस नुस्ख़े को सभी लोगों को फ़ॉर्वर्ड करने में व्यस्त रहा."

इसपर चित्रगुप्त ने उत्तर दिया, "तो महाराज, बस यही प्रोब्लम है. ज्ञान तो बहुत है पर जीवन मैं उतारने का समय किसी के पास नहीं। बस सब फ़ॉर्वर्ड करने में लगे रहते हैं।"

= १८७ =

卐 सत्यराम सा 卐
*दादू शब्द अनाहद हम सुन्या, नखसिख सकल शरीर ।*
*सब घट हरि हरि होत है, सहजैं ही मन थीर ॥* 
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साभार ~ Dana Mahiya
**श्रवण**
यह एक विज्ञान है, गहन विज्ञान । श्रवण रहस्यों पर ही गहन शोध हो तो अनुपम परिणाम आ सकते है । ईश्वर की कृपा से साधना भक्ति से परा भक्ति पर गहन रहस्यों का कभी कुछ शोध हो ।
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नवधा में श्रवण प्रथम है, यह रहस्य है अभी तक । सत्संग - कथा आदि पर हम जोर देते बहुत सुनते है परन्तु श्रवण है क्या ? सुनने से क्या होता है ? और कैसा श्रवण हो ? क्या श्रवण शक्ति वास्तव में कुछ अनुपम वस्तु दे सकती है ? आदि ... श्रवण के लिये आवश्यक है श्रोता । जल के लिये आवश्यक है प्यासा । 
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श्रोता कौन है, जिसमें स्वत्व का लोप हो । जो अनभिज्ञ हो । ज्ञाता तो वक्ता होगा, श्रोता नहीं । संसार में बाहरी रूप से सभी श्रोता लगते, परन्तु वास्तविक श्रोता कभी वक्ता नही हो सकता । वह पी रहा है, पिने पर तर्क वितर्क और प्रतिक्रिया भी नहीँ देगा, बस पियेगा सदा ही । कथित धार्मिक जगत में आपको वास्तविक श्रोता नहीं मिलेंगे, वहाँ सब वक्ता ही, श्रोतव्य का अभिनय । अथवा वक्ता होने हेतु ही श्रोता । श्रवण विज्ञान पर गहन शोध होने पर ही उसका महत्व निकल सकेगा ।
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बालक नेत्र से नही प्रथम शब्द से ही जगत की और आकर्षित होता । उसके भीतर शोर उतरता, उसमें धीरे धीरे हित और व्यर्थ शब्द की विभक्ति स्वतः होने लगती । जैसे बाज़ार का शोर और उस शोर में माँ की आवाज़ । नन्हा शिशु भीतर जाने वाली कौनसा शब्द मेरे हेतु है कौनसा नही इससे विचलित हो उठता है और रोता है । अवस्था होने पर हम गहन शोर में भी हमें सुनना वह सुन सकते है । जैसे विद्यालय में खेलते बालकों के बीच गहन शोर में शिक्षक वार्ता करते है और अवांछनीय श्रवण का सहज त्याग करते है, ऐसा हम सब करते हैं । 
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किसी शोर की जगह आप वॉइस रिकॉर्ड कीजिये, उसे सुनिये उसमें इतनी तरह के शोर को आप महसूस करेगें जो आपने स्वयं रिकॉर्ड के समय नहीं सुना जबकि वह ध्वनि हमारी कर्ण शक्ति के अनुरूप ही थी, यन्त्र सभी ध्वनियों को रिकॉर्ड करता है और हमारे भीतर उनका चुनाव गहरा जाता है । शहरी को यातायात का शोर प्रभावित नहीं करता, वन्य जीव या भील आदि हेतु वह कर्ण शक्ति के लिए हानिकर है । यहीं चुनाव, की जो सुनना वही सुनाई आवे श्रवण भक्ति रहस्य है । अर्थात् मूल में अनहद सुनाई आवे, या रस जगत में श्यामसुन्दर की नित्य वेणु ध्वनित हो, हमें श्यामसुन्दर की सुननी ही नहीँ अतः सुन नहीं पाते, जब सत्य से प्रीत होगी तो वही ही सुनाई आएगा जो सत्य शब्द है । 
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श्रवण की गहनता साधना की समाधि से भी गहन है । समाधि शून्य अवस्था है, श्रवण में जगत की शून्यता से वास्तविक शब्द को सुन लेना सिद्ध होगा । ऐसी गहन श्रवण शक्ति कुदरत में अनुभूत होती है जिनका लौकिक जगत में पारलौकिक सौंदर्य और रस प्रकट सा लगता है । भक्ति पथ पर चलने वाला केवल वक्ता हुआ तो वह भक्त नही भगवान ही होना चाहता है, भक्त अनुरक्त, जीव नित्य दास है, ईश्वर से अभिन्न परन्तु भक्ति में वह ईश्वर का सेवक । सेवा-सेव्य-सेवक-स्वामी सभी एक । परन्तु एकता से रस की सिद्धि नही होगी, उस हेतु सेवक ही होना होगा । 
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माँ के गर्भ में शिशु जब होता है तो वह उसे अपने में होकर भी पृथक् अनुभूत करती है, और अपने में होने पर भी उसकी सेवा भी करती है, जैसे कई महिला तब ही दूध आदि पान करती है वह गर्भवती हो यह सेवा है नन्हें शिशु की । स्वयं हेतु का भी त्याग इसमे और यही भावना गोपी जीवन का रहस्य, कुछ भी पीकर पुष्टि प्रियतम की । नवधा भक्ति का एक एक सोपान आश्रय को गाढ़ा करेगा और आत्म निवेदन स्वतः हो जाएगा । वस्तुतः सेवक होना सरल नहीँ और जो सेवक होना नही चाहे वह भक्त नही हो सकता ।
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जगत में सेवा भी आज बड़ा व्यापार, होटल आदि रूप में । वहाँ सेवा का अभिनय, वहाँ सेवा की शिक्षा-दीक्षा होती । वेटर को भोजन हेतु आने वाले से आत्मीय प्रेम नहीँ । परन्तु सेवा कला सीख वह अभिनय सुंदर करता है जिससे वहाँ बैठे व्यक्ति की सत्ता सिद्ध होती, प्रत्येक व्यक्ति राजा होना चाहता है, ईश्वर होना चाहता है अतः होटल आदि में उनकी यह भावना सिद्ध हो जाती है । वास्तविक चाकर कभी स्वामी होना चाहता ही नहीँ । होटल का वेटर भी कहीं और जाकर ऑर्डर को व्याकुल रहता है, वह वास्तविक सेवक नहीँ । 
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अतः श्रवण का पायदान ही भक्ति में पार नही हो सकता है, आज व्यवस्था बदल गई है परन्तु कुछ समय पूर्व पाठशाला में अध्यापक से जो श्रद्धा विकसित होती वह जीवन भर रहती । अब तो छात्र अध्यापक से आंतरिक क्षोभ रखते है, अगर श्रद्धा रहे अपने विद्यालय में अपने अध्यापक के प्रति तो श्रवण भक्ति का स्वभाविक अभ्यास होगा और श्रद्धा से प्रत्येक शब्द जीवन बनाने वाला सिद्ध होगा, जहाँ शिक्षक में श्रद्धा वहाँ वह आध्यात्मिक गुरु का ही दर्शन करते है । ऐसे छात्र का जीवन सदा गहरा होता है क्योंकि प्रति पल जीवन भर वह प्राप्त ज्ञान और जीवन पथ को अपने अध्यापक से प्राप्त जानता है, स्वयं के सामर्थ्य से नहीँ । अहंकार के ना होने पर जीवन दिव्य वस्तु है क्योंकि वह अपने सामर्थ को नही । अपितु कृपा की सिद्धि करती है ।
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श्रुति और स्मृति दोनों ही परम्पराएँ श्रवण आधारित रही हैं, आज शास्त्र और ग्रन्थ प्रकाशित हैं, पहले वह सन्त और गुरूजन में ही रहते और वाणी रूप प्रकट होते जिन्हें श्रवण की सिद्धि से ही सटीक ग्रहण किया जा सकता था । तब श्रवण गहरा था क्योंकि तब अगर कोई शब्द सुनने से चूक हो तो सारा श्लोकार्थ बदल जाता । अतः श्रवण ही पात्र रहा सदियों तक । आज पुस्तकें है, कोई वस्तु छुट गई पुनः - पुनः देख सकते है सो सटीकता नहीं रही, गहनता नहीं रही, मन का एक समय एक जगह होना नहीं रहा ।
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शिशुत्व में प्रत्येक जीव श्रवण से ही सीखता है । शिशुत्व की श्रवणा विकसित है, क्योंकि वह सुनकर ही सीख रहा इसलिये नन्हा शिशु चीन में जन्म ले तो सहजता से वह कठिन भाषा सीख जाता है जो विद्वानों का विषय है । श्रवण रहस्य पर आप भी चिंतन कीजिये । मेरा मानना श्रवण करना आ जावे तो ईश्वर से गहनतम और आंतरिक सम्बंध रहें । जिन्हें अपने इष्ट के अतिरिक्त अन्य कुछ सुनाई न आवें वह श्रवण भक्ति सोपान पर खड़े हैं । वहाँ नित्य भगवत् नाम ध्वनित होता है । मन्त्र सिद्धि पर स्वयं का ग्रहण मन्त्र ही नित्य भीतर सुनाई आने लगता है, यह अनन्यता से ही होगा । जिसे और भी कुछ इस समय भाने लगे तो नहीं होगा । जागृत नाम जहाँ कृपा से प्रकट हो जाता है वहाँ श्रवण शक्ति अन्य ध्वनि कैसे सुन सकती है । जो बहुत कुछ सुन ईश्वर के लिये क्या है वह चुन लेते है वह श्रवण भक्ति के उपासक हैं - साधक हैं...
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वास्तविक शरणागत, सम्पूर्णता से ईश्वर रूपी रस समुद्र में डूब गया अतः वह किस अधिकार से द्वितीय वस्तु की कल्पना भी कर सकता है । उसके कर्ण भी समर्पित और कर्ण शक्ति भी । अतः वह सर्व इंद्रिय से नित्य एक ही रस पी रहा । ज्ञानेन्द्रियों द्वारा ईश्वर का भजन मन के निरोध से पूर्व असम्भव है, श्रवण कर्ण रूपी ज्ञानेन्द्रिय का भजन । सुहृद जन से सुनी बात पर सरलता से विश्वास सम्भव और उसे जीवन भर मिटाना आसान नहीँ अतः दादी आदि की बात जीवन भर पत्थर की लकीर । कोई दादी विवाह में जूते को प्रणाम करा दे तो वह भी भगवान, परम्पराओं में श्रद्धा होती है कारण ... अनुसरण । वास्तविक श्रवण होने पर अन्य लौकिक श्रवण तनिक असर नहीं करते । सर्वधर्मान् परितज्य ... !! तुम ही मुझे सुनाई आने लगो । इस पर विस्तार से वैज्ञानिक समीक्षा जीवन में कभी ... 
@सत्यजीत "तृषित"

= पीर- मुरीद अष्टक(ग्रन्थ २४-६) =

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🙏 *श्री दादूदयालवे नमः ॥* 🙏
🌷 *#श्रीसुन्दर०ग्रंथावली* 🌷
रचियता ~ *स्वामी सुन्दरदासजी महाराज*
संपादक, संशोधक तथा अनुवादक ~ स्वामी द्वारिकादासशास्त्री
साभार ~ श्री दादूदयालु शोध संस्थान,
अध्यक्ष ~ गुरुवर्य महमंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमारामजी महाराज
https://www.facebook.com/DADUVANI
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*= पीर- मुरीद अष्टक(ग्रन्थ २४) =*
*तब कहै तालिब सुनौं मुरसिद,*
*जहां बैठा आप ।*
*वह होइ जैसा कहौ तैसा,*
*जिसै माइ न बाप ॥*
*बैठा उठा कहिये तिसै,*
*औजूद जिसकै होइ ।*
*बेचूंन उसकौ कहत हैं अरु,*
*बेनिमू नै सोइ ॥६॥*
तब जिज्ञासु ने अपने सद्गुरु से प्रश्न किया - भगवन् ! वह ब्रह्म जहाँ विराजमान है, उसका कुछ तो वर्णन कीजिये ? आप तो कहते हैं कि वह अपने जैसा आप ही है, उसके माता-पिता(उत्पादक धर्म) कोई नहीं है ।
बैठना- उठना आदि क्रियाएँ उसी में कही जा सकती हैं जो शरीरधारी हो, जिसका शरीर ही नहिं हैं उसमें सब क्रियाएँ कैसे होगी ! जो निद्रर्व्यक और निरुपम है उसको मेरे जैसा नादान कैसे समझ सकता हैं ? ॥६॥
(क्रमशः)

विरक्त का अंग १५(५-८)

#daduji

卐 सत्यराम सा 卐
*फल पाका बेली तजी, छिटकाया मुख मांहि ।*
*सांई अपना कर लिया, सो फिर ऊगै नांहि ॥* 
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**श्री रज्जबवाणी** 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
साभार विद्युत् संस्करण ~ Mahant Ramgopal Das Tapasvi 
*विरक्त का अंग १५* 
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बपु१ वसुधा२ सौं वैर विधि, विरच्या३ लग बैकुण्ठ । 
रज्जब रूचे न विनशती४, यहु उर अंतर अण्ट५ ॥५॥ 
विरक्त का मन शरीर१ तथा पृथ्वी२ के भोगों से और बैकुण्ठ तक से जैसे वैर के द्वारा वैरी से उपराम होता है, वैसे ही उपराम३ हो जाता है, उसे विनाशी४ माया रुचि कर नहीं लगती, विरक्त के हृदय में यह वैराग्य की गाँठ५ ही लग जाती है, अर्थात वह वैराग्य को नहीं छोड़ता । 
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माया काया मत मतैं१, विरच्या प्राण प्रचण्ड२ । 
रज्जब न्यारा नाम बल, नजर नहीं नौ खंड ॥६॥ 
तीव्र२ वैराग्य युक्त प्राणी माया, शरीर और सांसारिक मन के विचारों२ से उपराम हो जाता है, निरंजन राम के नाम चिन्तन के बल से सबसे ही अलग रहता है, इस नौ खंड वाली पृथ्वी के किसी भी पदार्थ पर उसकी रागयुक्त दृष्टि नहीं पड़ती । 
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विरच्या बरते बरतणिहिं, तन मनत्रितिरस्कार । 
जन रज्जब रत नाम सौं, यहु विरक्त व्यवहार ॥७॥ 
उपरामता से सब कार्य करता है, तीनों लोकों के भोगों का तन - मन से अनादर करता है और निरंतर निरंजन राम के नाम में अनुरक्त रहता है, वही विरक्त पुरुष का व्यवहार है । 
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रज्जब रूठा ऋद्धि सौं, सिद्धि सुहावे नाँहिं । 
इन आगे इसका धणी, सो बैठा मन माँहिं ॥८॥ 
विरक्त पुरुष ऐश्ववर्य से उपराम रहता है, सिद्धियाँ उसे प्रिय नहीं लगती, इन सिद्धि आदि से परे इनका स्वामी परमात्मा है, वही विरक्त के मन में निरंतर स्थिर रहता है ।
(क्रमशः)


= साधु का अँग =(१५/८८-९०)


#daduji 
卐 सत्यराम सा 卐 
*श्री दादू अनुभव वाणी* 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
*साधु का अँग १५* 
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साहिब का उनहार सब, सेवक माँहीं होइ । 
दादू सेवक साधु सो, दूजा नाहीं कोइ ॥८८॥ 
परमात्मा के समान ही भक्त में दिव्य गुण होते हैं । अत: वह परमात्मा ही श्रेष्ठ भक्त के रूप में अवतरित होता है । इस कारण कोई भी श्रेष्ठ भक्त परमात्मा से भिन्न नहीं होता ।
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जब लग नैन न देखिये, साधु कहैं ते अँग । 
तब लग क्यों कर मानिये, साहिब का प्रसंग ॥८९॥ 
सँतजन ब्रह्म साक्षात्कार होने पर जो निर्द्वन्द्वता, समतादि लक्षण आते बताते हैं, जब तक वे लक्षण विचार - नेत्रों से जिस व्यक्ति में नहीं दिखाई देते, तब तक उस व्यक्ति की यह बात कि - "मुझे ब्रह्म का साक्षात्कार हो गया है" कैसे मानी जा सकती है ? 
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दादू सो जन साधू सिद्ध सो, सोइ सकल शिरमौर ।
जिहिं के हिरदै हरि बसे, दूजा नाहीं और ॥९०॥
जिसके हृदय में हरि का विशेष रूप से निवास है, वही सँत है, वही सिद्ध है और वही सर्व - श्रेष्ठ है । दूसरा और कोई भी सँत, सिद्ध और सर्वश्रेष्ठ नहीं हो सकता । 
(क्रमशः)

रविवार, 26 नवंबर 2017

= १८६ =


卐 सत्यराम सा 卐
*दादू इस आकार तैं, दूजा सूक्षम लोक ।*
*तातैं आगे और है, तहँ वहाँ हर्ष न शोक ॥* 
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साभार ~ oshoganga
कुत्रापि खेदः कायस्य जिह्वा कुत्रापि खेद्यते।
मनः कुत्रापि तत्त्यक्त्वा पुरुषार्थे स्थितः सुखम्॥
(अष्टावक्र: महागीता) 

'कहीं तो शरीर का दुख है, कहीं वाणी दुखी है और कहीं मन दुखी होता है। इसलिए तीनों को त्याग कर मैं पुरुषार्थ में, आत्मानंद में सुखपूर्वक स्थित हू।
कुत्र अपि कायस्थ खेद............।
दुख हैं शरीर के, हजार दुख हैं। शरीर में सब रोग छिपे पड़े हैं। समय पा कर कोई रोग प्रगट हो जाता है, परन्तु पड़ा तो होता ही है भीतर। सब रोग ले कर हम पैदा हुए हैं। शरीर को तो व्याधि कहा है ज्ञानियों ने। सब व्याधियों की जड़ वहां है, क्योंकि शरीर पहली व्याधि है। शरीर में होना ही व्याधि में होना है। शरीर में होना उपाधि में होना है। 
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उलझ गए फिर और उलझनें तो अपने आप आती चली जाती हैं। तो शरीर का दुख है कहीं। कहीं कोई दुखी है बीमारी से, कहीं कोई दुखी है बुढ़ापे से, कहीं कोई दुखी है कि कुरूप है। और आश्चर्य यह है कि, जो स्वस्थ हैं वे सुखी नहीं हैं। जो सुंदर हैं वे भी सुखी नहीं हैं। तो ऐसा लगता है कि शरीर के साथ सुख संभव ही नहीं है। रोगी दुखी है, समझ में आता है; परन्तु स्वस्थ क्या कर रहा है? वह भी कोई सुखी नहीं दिखायी पड़ता।
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इस जीवन में कुछ ऐसा होता है कि शरीर के साथ सुखी होना संभव ही नहीं है। शरीर के साथ सुख का कोई संबंध नहीं है। कहीं तो शरीर का दुख है, कहीं वाणी दुखी है। कोई इसलिए दुखी है कि उसके पास बुद्धि नहीं है, विचार नहीं, वाणी नहीं। और जिनके पास बुद्धि है, वाणी है, विचार है, उनसे पूछो। उनमें से अनेक आत्महत्या कर लेते हैं, पागल हो जाते हैं।
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जिनके पास वाणी नहीं है, वे गूंगे हैं। और जिनके पास वाणी है, वे विक्षिप्त हो जाते हैं। जिनके पास विचार नहीं है, वे दीन-हीन हैं, वे तड़पते हैं कि यदि, हमारे पास बुद्धि होती। जिनके पास है, वे बुद्धि का क्या करते हैं? स्वम् के लिए और उलझने खड़ी कर लेते हैं, हजार उलझनें खड़ी कर लेते हैं, चिंताओं का जाल, संताप का जाल फैला लेते हैं। जनक कहते हैं: बड़े अदभुत दुख हैं शरीर के, वाणी के, मन के, इसलिए मैं तीनों को त्याग कर, अपने में डूब कर, वहां खड़ा हो गया हूं, जहां न मैं वाणी हूं, न शरीर, न मन। उस साक्षी भाव में सुखपूर्वक स्थित हूं।

= १८५ =

卐 सत्यराम सा 卐
*दादू निबहै त्यौं चलै, धीरै धीरज मांहि ।*
*परसेगा पीव एक दिन, दादू थाके नांहि ॥* 
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साभार ~ ‎Anand Nareliya

एक राजा हुआ, उसने दूर-दूर खबर की कि जो भी धर्म श्रेष्ठ होगा उसे मैं स्वीकार करूंगा। अनेक-अनेक पंडित आए, समझाते थे कि हमारा धर्म श्रेष्ठ है, दूसरा पंडित समझाता कि हमारा धर्म श्रेष्ठ है। वे विवाद भी करते, एक-दूसरे को हराने और पराजित करने की कोशिश भी करते। लेकिन राजा के सामने कुछ सिद्ध न हो पाया कि कौन धर्म चरम धर्म है, कौन सर्वोत्कृष्ट धर्म है। और जब यही सिद्ध न हुआ तो राजा अधर्म के जीवन में जीता रहा। उसने कहा, जिस दिन सर्वश्रेष्ठ धर्म उपलब्ध हो जाएगा उस दिन मैं धर्म का अनुसरण करूंगा। जब तक सर्वश्रेष्ठ धर्म का पता ही नहीं है तो मैं कैसे जीवन को छोडूं और बदलूं ! तो जीवन तो वह अधर्म में जीता रहा, लेकिन सर्वश्रेष्ठ धर्म की खोज में पंडितों के विवाद सुनता रहा। सभी धर्मों के लोग आए। और किसी भी धर्म का आदमी आया, उसने कहा, मेरा धर्म श्रेष्ठ है, दूसरों के नीचे हैं। राजा उनकी दलीलें सुनता; दूसरों को आमंत्रित करता, उनकी दलीलें सुनता। ऐसे जीवन बीता। जीवन तो है छोटा और दलीलें तो हैं बड़ी। तो दलीलों में तो जीवन बिलकुल बीत ही सकता है, कोई कठिनाई नहीं है।
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फिर तो राजा बूढ़ा होने लगा और घबड़ा गया कि अब क्या होगा? अधर्म का जीवन दुख देने लगा, पीड़ा लाने लगा। लेकिन जब श्रेष्ठ धर्म ही न मिले तो वह चले भी कैसे धर्म की राह पर? अंततः एक भिखारी उसके द्वार पर आया और उस भिखारी ने कहा कि मैंने सुना है कि तुम पीड़ित हो और परेशान हो। तुम्हारे चेहरे से भी दिखाई पड़ता है।
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उस राजा ने कहा, मैं सर्वश्रेष्ठ धर्म की खोज में हूं। भिखारी ने कहा, सर्वश्रेष्ठ धर्म? क्या बहुत धर्म होते हैं दुनिया में कि उसमें कोई श्रेष्ठ और अश्रेष्ठ का भी सवाल उठे? धर्म तो एक है। कोई धर्म बुरा और कोई धर्म अच्छा, यह तो होता ही नहीं, तो सर्वश्रेष्ठ का कोई सवाल नहीं। राजा बोला, लेकिन मेरे पास तो जितने लोग आए उन्होंने कहा, हमारा धर्म श्रेष्ठ है।
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उस फकीर ने कहा, जरूर उन्होंने धर्म के नाम से, मैं श्रेष्ठ हूं, यही कहा होगा। उनका अहंकार बोला होगा। धर्म तो एक है, अहंकार अनेक हैं। राजा से उसने कहा कि जब भी कोई पंथ से बोलता है या किसी धर्म से बोलता है, तो समझ लेना कि वह धर्म के पक्ष में नहीं बोल रहा, अपने पक्ष में बोल रहा है। और जहां पक्ष है, जहां पंथ है, वहां धर्म नहीं होता। धर्म तो वहीं होता है जहां व्यक्ति निष्पक्ष होता है। पक्षपाती मन में धर्म नहीं हो सकता। राजा प्रभावित हुआ। उसने कहा, तो फिर तुम मुझे बताओ मैं क्या करूं?
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उस फकीर ने कहा कि आओ नदी के पार चलें, वहां मैं बताऊंगा। वे नदी के किनारे गए। उस फकीर ने कहा कि जो सर्वश्रेष्ठ नाव हो तुम्हारे राजधानी की वह बुलाओ, तो उसमें बैठ कर उस तरफ चलें। राजा ने कहा, यह बिलकुल ठीक। राजा जाए तो सर्वश्रेष्ठ नाव आनी चाहिए। बीस-पच्चीस जो अच्छी से अच्छी नावें थीं वे बुलाई गईं। सुबह वे गए थे, दोपहर इसी में हो गई, सब नावें इकट्ठी हुईं। अब वे घाट के किनारे भूखे बैठे हुए हैं। और वह फकीर भी अजीब था, एक-एक नाव में दोष निकालने लगा कि इसमें यह खराबी है, इसमें यह दाग लगा हुआ है, यह तो आपके बैठने योग्य नहीं है। इसमें मैं कैसे बैठ सकता हूं, यह तो बहुत छोटी है।
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राजा भी थक गया, सांझ हो गई, सूरज डूबने लगा। राजा ने कहा, क्या बकवास लगा रखी है! नाव कोई भी काम दे सकती है। और अगर नाव कोई भी पसंद नहीं पड़ती तो नदी भी कोई भारी नहीं, चलो हम तैर कर ही निकल चलें। छोटी सी नदी है, अभी कभी के उस तरफ पहुंच गए होते।
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फकीर जैसे इसकी प्रतीक्षा में ही था, उसने कहा, मैं इसी की प्रतीक्षा में था। तुम्हें जीवन में यह खयाल नहीं आया कि धर्मों की प्रतीक्षा क्यों कर रहे हो, तैर कर भी निकला जा सकता है। और सच तो यह है कि धर्म की कोई नाव नहीं होती। व्यक्तिगत रूप से ही तैरना पड़ता है। धर्म की कोई नाव नहीं होती।
……….OSHO 
समाधि कमल–(प्रवचन–15)

= पीर- मुरीद अष्टक(ग्रन्थ २४-५) =

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🙏 *श्री दादूदयालवे नमः ॥* 🙏
🌷 *#श्रीसुन्दर०ग्रंथावली* 🌷
रचियता ~ *स्वामी सुन्दरदासजी महाराज*
संपादक, संशोधक तथा अनुवादक ~ स्वामी द्वारिकादासशास्त्री
साभार ~ श्री दादूदयालु शोध संस्थान,
अध्यक्ष ~ गुरुवर्य महमंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमारामजी महाराज
https://www.facebook.com/DADUVANI
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*= पीर- मुरीद अष्टक(ग्रन्थ २४) =*
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*तब कहै पीर मुरीद सेती,*
*बन्दगी है येह ।*
*इस राह पहुँचै चुस्तदम करि,*
*नांव उसका लेह ॥*
*तूं नांव उसका लेइगा,*
*तब जाइगा उस ठौर ।*
*जहां अरस ऊपर आप बैठा,*
*दूसरा नहिं और ॥५॥*
तब गुरुदेव ने कहा - हे शिष्य ! भक्ति मार्ग को प्राप्त करने का उपाय यही है कि तू दृढनिश्चय होकर दिन-रात भगवान् में तल्लीन होकर उसका नाम(राममन्त्र) जप करना शुरू कर दे ।
जब तू इसका नाम निरन्तर जपने लगेगा तो एक दिन ऐसा आ जायगा कि तू वह(ज्ञान-प्राप्ति का) मार्ग प्राप्त कर लेगा जहाँ(तेरे हृदयाकाश में) एकमात्र ब्रह्म ही ब्रह्म है, दूसरा कोई नहीं । अर्थात् भक्तिमार्ग के सहारे तू ब्रह्म को सर्वव्यापक समझकर संसार के द्वन्द्वों से छुटकारा पा जायगा ॥५॥
(क्रमशः)

विरक्त् का अंग १५(१-४)

#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
*दादू माया बैरिण जीव की, जनि कोइ लावे प्रीति ।*
*माया देखे नरक कर, यह संतन की रीति ॥* 
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**श्री रज्जबवाणी** 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
साभार विद्युत् संस्करण ~ Mahant Ramgopal Das Tapasvi 
*विरक्त् का अंग १५* 
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इस अंग में विरक्त विषयक विचार दिखा रहे हैं ~ 
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त्यागी ताखे१ की दशा, तहां न माया घास ।
जन रज्जब तब जानिये, ब्रह्म अग्नि परकाश ॥१॥
विरक्त्त पुरुष तक्षक१ जाति के सर्प के समान होता है । तक्षक जाति के सर्प की बाँबी के पास लगभग एक बीधा भूमि में घास नहीं होता, वैसे ही विरक्त के पास माया नहीं रहती । ऐसा विरक्त्त हो तभी समझना चाहिये कि इसमें ब्रह्म ज्ञानाग्नि का प्रकाश हुआ है । 
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गृह दारा सुत वित्त सों, यहु मन भया उदास ।
जन रज्जब राम हिं रच्या, छूटया जगत निवास ॥२॥
विरक्त्त का यह चंचल मन भी घर, नारी, पुत्र, धनादि से उदास हो जाता है, उसका सांसारिक विषयों में रहना छूट जाता है और वह राम में ही अनुरक्त्त रहता है । 
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त्याग तेग सौं मारिये, रज्जब लंगर१ लोभ । 
मनसा वाचा कर्मना, तो तिहुं लोक में शोभ ॥३॥ 
ढीठ१ लोभ को वैराग्य रूप तलवार से मारना चाहिये, हम मन, वचन, कर्म से कहते हैं, लोभ को नष्ट करने से ही तीनों लोकों में शोभा होती है । 
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रज्जब रह गया राम में, तज रामति का द्वन्द्व । 
नभ नीर परसे नहीं, भया सीप का बूंद ॥४॥ 
स्वाति जल का बिन्दु सीप में जाकर मोती बन जाता है तब अन्य जल के समान न तो आकाश में जाता और न जल से मिलता, वैसे ही संसार में भ्रमण के हेतु काम, क्रोधादि द्वन्द्वों का त्याग से विरक्त्त का मन राम में ही स्थिर रह जाता है, पुन: सांसारिक विषयों में अनुरक्त्त नहीं होता ।
(क्रमशः)