गुरुवार, 31 जनवरी 2019

= सुन्दर पदावली(१५.राग सिंधूड़ो - ३/१) =

#daduji

॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥ 
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली* 
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी, 
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान) 
*= १५.राग सिंधूड़ो =*
(३/१)
*द्वै दल आइ जुडे धरणी पर बिच सिंधूडौ बाजै रे ।* 
*एक वोर कौं नृप बिबेक चढि एक मोह नृप गाजै रे ॥टेक॥*
*प्रथम काम रन मांहिं गल्यारौ को हम ऊपरि आवै रे ।*
*महादेव सरिषा मैं जीत्या नर की कौंन चलावै रे ॥१॥*
*आइ बिचार बोलियो बांणी मुष पर नीकैं डाट्यौ रे ।*
*ज्ञान षडग ले तुरत काम कौं हाथ पकडि सिर काट्यौ रे ॥२॥*
*क्रोध आइ बोल्यौ रन मांहीं हौं सबहिन कौ काला रे ।*
*देव दयंत मनुष पशु पंषी जरैं हमारी ज्वाला रे ॥३॥* 
एक आध्यात्मिक युद्ध का विवरण - रणभूमि में योद्धाओं के दो दल एकत्र हो गये । मध्य में युद्ध के बाजे बजने लगे । वहाँ एक पक्ष में विवेक था दूसरे पक्ष में मोह हुंकार भर रहा था ॥टेक॥ 
वहाँ सर्वप्रथम कामदेव रण में आकर यह गर्जना करने लगा - ‘हम पर कौन आक्रमण करने का साहस कर रहा है । अरे ! हमने महादेव के तुल्य वीर देवताओं को भी युद्ध में पराजित किया है - तब हमारे सामने किसी मनुष्य की तो गणना ही क्या है ! ॥१॥’ 
तब वहाँ विचार ने उस को धमकाते हुए सीधे डांट दिया और ज्ञान रूप तलवार से तत्काल ही उस(कामदेव) का सिर भी पृथक कर दिया ॥२॥(क) 
उसी समय क्रोध अपने भयंकर रूप में प्रकट होकर कहने लगा - “मैं सब का काल(मृत्यु) हूँ । इस लोक में जितने भी देव, दैत्य, मनुष्य, पशु, पक्षी आदि प्राणी हैं वे सभी मेरी ज्वाला से जल रहे हैं ॥३॥”
(क्रमशः)

= ९२ =

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*दादू सो साहब जनि विसरै, जिन घट दिया जीव ।*
*गर्भवास में राखिया, पालै पोषै पीव ॥* 
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साभार ~ Vinki Vikram Verma

फकीर हुआ एक सूफी बायजीद। यात्रा पर जा रहा था तीर्थ की, हज करने जा रहा था। सस्ते जमाने थे; एक पैसे में एक दिन का भोजन और एक दिन का खर्च पूरा हो जाता था। तो उसने एक पैसा जेब में रखा लिया और यात्रा पर निकलने को ही था उसके एक धनपति भक्त ने कहा कि यह तुम क्या कर रहे हो? एक पैसा लेकर हज करने जा रहे हो, कभी सुना? वह साथ में एक थैली ले आया था, जिसमें बहुत अशरफियां थीं। उसने कहा, ये साथ में रख लो। एक पैसे से कहीं हज हुई है ! इतनी लंबी यात्रा, आना—जाना, कम से कम छह महीने लगनेवाले हैं। 
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बायजीद ने कहा, रख लूंगा तुम्हारी थैली भी, लेकिन तुम मुझे पहले पक्का भरोसा दिला दो कि मैं एक दिन से ज्यादा जियूंगा? कल भी मैं रहूंगा। अगर तुम मुझे आश्वासन दे दो कि कल भी मैं रहूंगा, तुम्हारी थैली स्वीकार !
तो उस धनपति ने कहा, मैं कैसे आश्वासन दे सकता हूं कि कल आप रहेंगे? कल का किसको भरोसा है! तो बायजीद ने कहा, यह एक पैसा आज के लिए काफी है। कल का जब भरोसा ही नहीं तो कल का इंतजाम...।
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बायजीद की भीड़ में एक फकीर और बैठा हुआ था। बायजीद तब ज्ञान को उपलब्ध नहीं हुआ था, लेकिन फिर भी ज्ञान के करीब ही करीब रहा होगा, ठीक कगार पर रहा होगा; अभी छलांग नहीं लग गयी थी। तभी तो हज की यात्रा को जा रहा था। कहीं ज्ञानी तीर्थयात्रा को गए हैं ! मगर फिर भी समझ गहरी थी, तब तो धनपति के पैसे को कह दिया कि सम्हालकर रख लो, तुम्हारे काम पड़ेगा। मुझे तो कल का भरोसा कोई दिलाये तभी कल कि चिंता हो।
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एक फकीर हंसने लगा और भीड़ से उठ गया। बायजीद उसके पीछे दौड़ा और कहा कि तुम हंसे क्यों? उसने कहा, जब एक दिन का भरोसा है तो कल के भरोसे में क्या दिक्कत है? जब एक पैसा रख सकते हो, तो बात तो हो गई। फिर एक पैसा रखो कि करोड़ पैसा रखो, क्या फर्क पड़ता है? आज का भरोसा है? और जब एक पैसे पर भरोसा है तो परमात्मा पर कितना भरोसा है? है ही नहीं ! 

*बायजीद ने वह पैसा भी वहीं गिरा दिया। और कहते हैं, उस पैसे के गिरने के साथ बायजीद ज्ञान को उपलब्ध हुआ।* 
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एक क्षण का भरोसा नहीं, और इंतजाम कितना बड़ा ! इंतजाम करते—करते ही तुम समाप्त हो जाओगे। पैसा, धन तो पेट्रोल की भांति है; वह कोई मंजिल नहीं है। लेकिन कुछ लोग ऐसे हैं कि वे पेट्रोल इकट्ठा करते चले जाते हैं। उनके घर में पेट्रोल हो जाता है। खुद भी रहने की जगह नहीं रह जाती, वे बाहर हरते हैं। वे यात्रा की तैयारी कर रहे हैं; क्योंकि जब तैयारी पूरी हो जाए तो यात्रा पर जाएंगे ! इस संसार में कोई चीज कभी पूरी नहीं होती, इसलिए वह कभी यात्रा पर नहीं जा पाते। वे पेट्रोल इकट्ठा करते—करते मर जाते हैं।
🌹ओशो🌹
सुन भई साधो--(प्रवचन--09)

= ९१ =

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*दादू दूजे अंतर होत है, जनि आने मन मांहि ।*
*तहाँ ले मन को राखिये, जहँ कुछ दूजा नांहि ॥*
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साभार ~ Soni Manoj
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*परमात्मा चैतन्य का, शक्ति का अरूप विस्तार है* 🌿
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परमात्मा को कल्याणकर कहने का अर्थ बिलकुल दूसरा है । उसका अर्थ यह है कि उसका स्वभाव, इस अस्तित्व का मौलिक स्वभाव मंगलदायी है । मंगल करता नहीं वह, आप उसके निकट जाएं, मंगल होना शुरू हो जाता है । यह उसका कृत्य नहीं है, यह उसका स्वभाव है ।
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जैसे मैं बगीचे की तरफ जाऊं, तो जैसे-जैसे पास पहुंचता हूं, ठंडी हवाएं आनी शुरु हो जाती हैं । बगीचा कोई ठंडी हवाएं भेजता नहीं है । और ऐसा भी नहीं है कि जब कोई नहीं निकलता बगीचे के पास, तो बगीचा अपनी ठंडी हवाएं रोक लेता हो । न, बगीचे को इससे प्रयोजन ही नहीं है । यह बगीचे का स्वभाव है कि उसके आसपास ठंडी हवा होगी ही । जब आप पास पहुंचते हैं, हवाओं की ठंडक बढ़ने लगती है । और पास पहुंचते हैं तो फूलों की सुगंध आने लगती है । यह भेजा नहीं जा रहा है । यह बगीचे के होने में ही निहित है । इसका मतलब हुआ कि बगीचा चाहे भी तो इससे अन्यथा नहीं कर सकता है । गरम हवा भेजना भी चाहे तो बगीचे के पास कोई उपाय नहीं है । और दुर्गंध भेजना भी चाहे तो बगीचे में ऐसे कोई फूल नहीं खिलते हैं ।
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परमात्मा मंगलदायी है । इसका अर्थ है कि जैसे-जैसे हम उसके निकट जाते हैं, हमें मंगल का अनुभव होता है । खयाल रखना, यह हमारा अनुभव है । यह हमारा अनुभव है कि परमात्मा मंगलदायी है । परमात्मा को इसका कोई भी पता नहीं है । अगर पता भी हो, तो पता तभी होता है जब विपरीत मौजूद हो । अगर आपको पता चलता है कि फलां व्यक्ति को मैं प्रेम करता हूं तो उसका मतलब ही यह है कि आपके भीतर घृणा मौजूद है । नहीं तो पता नहीं चलेगा । पता कैसे चलेगा ? अगर आप कहते हैं, फलां व्यक्ति को मैंने क्षमा कर दिया, उसका मतलब ही यह है कि क्रोध मौजूद है । नहीं तो क्षमा का पता कैसे चलेगा ? विपरीत के कारण ही पता चलता है ।
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परमात्मा को पता नहीं चलता कि वह मंगलदायी है । अगर उसे पता चल जाए तो वह गैर-मंगल भी कर सकता है । इसलिए परमात्मा को हम व्यक्ति की भाषा में सोचें ही न । क्योंकि जिसको कुछ भी पता नहीं चलता वह व्यक्ति नहीं है, सिर्फ शक्ति है । पता चलने के जोर से ही व्यक्ति निर्मित होता है । मुझे पता चलता है कि मैंने प्रेम किया, पता चलता है कि मैंने क्रोध किया, पता चलता है कि मैंने क्षमा की, यह पता जिस केंद्र को चलता है वही व्यक्ति बनता है । जब कोई पता नहीं चलता --- परमात्मा को कुछ भी पता नहीं चलता, इसका यह मतलब नहीं है कि वह अज्ञानी है । इसका कुल मतलब इतना है कि विपरीत उसके भीतर नहीं है । इसलिए सब होता है, लेकिन पता नहीं चलता । वह एक चैतन्य का विस्तार है । व्यक्ति नहीं एक चैतन्य । चैतन्य का, शक्ति का अरूप विस्तार है ।
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यह हमारा अनुभव है कि उसके पास जाते हैं तो मंगल होने लगता है, उससे दूर जाते हैं तो अमंगल होने लगता है । यह जो अमंगल होता है, वह उसके कारण नहीं होता है, हमारे दूर जाने के कारण होता है । यह जो मंगल होता है, यह भी उसके कारण नहीं होता है, हमारे पास जाने के कारण होता है । तो हम इसे ऐसा अच्छा होगा कहना कि परमात्मा के पास जाने की जो प्रतीति है, उसका नाम मंगल है और परमात्मा से दूर जाने की जो प्रतीति है, उसका नाम अमंगल है । यह हमारी प्रतीति है । अगर हम परमात्मा में पूरी तरह छलांग लगा लें तो हमें भी मंगल का पता नहीं चलेगा ।
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तो जिस दिन मंगल का भी पता न चले, उस दिन जानना कि उससे एकता सध गयी । जब तक मंगल का पता चलता रहे, तब तक जानना कि पास जा रहे हैं । मंगल बढ़ता जा रहा है, आनंद बढ़ता जा रहा है, शांति बढ़ती जा रही है, लेकिन पास जा रहे हैं । जिस दिन इनका भी पता न चले, उस दिन समझना कि छलांग लग गयी । उसमें ही हो गये ।
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इसलिए बुद्ध जैसे आदमी को हम कहते हैं, परम शांत । कहना नहीं चाहिए । अशांत भी वह नहीं हैं, अब शांत भी न रहे । क्योंकि शांति का अनुभव अशांत व्यक्ति को ही चलता है । बीच-बीच में अशांति आती रहे तो उन दोनों के बीच में जो वक्त मिलता है, उसको हम शांति कहते हैं । दो अशांतियों के बीच में शांति का अनुभव होता है । अगर एक अशांति के बाद फिर अशांति आए ही नहीं, तो थोड़े ही दिनों में शांति का अनुभव भी खो जाता है । शांत होता है व्यक्ति, लेकिन अनुभव नहीं रह जाता, अनुभोक्ता नहीं रह जाता ।
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🍁 ओशो 🌵
कैवल्य उपनिषद
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= *परिचय भोले भाव का अंग ६०(५/९)* =

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卐 सत्यराम सा 卐
*दादू जे जे चित बसै, सोई सोई आवै चीति ।*
*बाहर भीतर देखिये, जाही सेती प्रीति ॥* 
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**श्री रज्जबवाणी**
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
**परिचय भोले भाव का अंग ६०**
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देखो ध्रुव नामा प्रहलाद, बाल समय पाई तिन दाद१ । 
भोले नाम लिये सब नाखी२, वेद भेद३ में नजर न राखी ॥५॥ 
देखो, ध्रुव, नामदेव और प्रहलाद ने बालकपन में ही प्रशंसा१ प्राप्त करली थी उन भोले भक्तों ने सब कुछ त्याग कर२ नाम चिन्तन ही किया था, वेद के रहस्य३ में अपनी रूचि नहीं रखी थी । 
परिचय भोले भाव का, परिचय१ करै सहाय । 
परिचय परस बिना दरस, परिचय रहै समाय ॥६॥ 
भोले भाव वाले भक्त का भगवान से परिचय हो जाता है तब भगवान प्रत्यक्ष१ होकर उसकी सहायता करते हैं, परिचय होने पर बिना स्पर्श के ही आत्मस्वरूप से दर्शन होते रहते हैं परिचय होने पर भक्त प्रभु में ही समा जाता है अलग नहीं रहता । 
कौंण गुणहुं सौं नाम संवारे१, किहिं विधि भई मिठाई । 
सो समझे बिन शक्ति घटी२, कछु जिन प्राणिहु ले खाई ॥७॥ 
कौंन से गुणों से इस मिठाई का अमुक नाम रखा१ गया है और किस रीति से यह बनाई गई है, सो सब बात समझे बिना भी जिस प्राणी ने खाई है, उसके लिये उसकी स्वादु शक्ति कुछ कम२ हो जाती है क्या ? अर्थात नहीं होती, वैसे ही दर्शन पद्धति से परब्रह्म के स्वरूप का निर्णय करे बिना भी भजन द्वारा ज्ञान होकर ब्रह्म का साक्षात्कार होने पर उसके आनन्द में कुछ कमी रहती है क्या ? अर्थात नहीं रहती । 
नाम भेद गुण कछू न जाने, भोले भाव सु लीन । 
तिन सौं बाबे बेर न लाई, जो माँज्ञा सो दीन ॥८॥ 
जिन भोले भक्तों ने प्रभु के नाम भेद वा गुण कुछ भी ना समझे केवल प्रेम से ही उसके चिन्तन में लीन रहे, उनको दर्शन देने में प्रभु ने देर नहीं लगाई और जो भी मांगा वही उन्हें दिया है, यह इतिहास पुराणों में तथा भक्तमालों में प्रसिद्ध है । 
पात्रों में पाणी जम्या, पात्रों के उनहार । 
तैसे रज्जब प्राणपति, भाव भजन वपु धार ॥९॥ 
जल पात्रों में शीत से जल जमता है तब पात्रों के अनुसार ही चौड़ा - लम्बा जमता है, वैसे ही प्राणपति प्रभु भोले भक्तों के भाव और भजन के अनुसार ही शरीर धारण करके उन्हें संतुष्ट करते हैं ।
इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित परिचय भोले भाव का अंग ६० समाप्त ॥ सा. १९३८॥ 
(क्रमशः)

= सुन्दरी का अँग(३०-२२/२४) =

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॥ दादूराम सत्यराम ॥
*श्री दादू अनुभव वाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*सुन्दरी का अँग*
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नदिया नीर उलँघ कर, दरिया पैली पार ।
दादू सुन्दरि सो भली, जाय मिले भरतार ॥२२॥ 

आशा - नदी के विषय - मनोरथ - जल को उल्लँघन करके तथा सँसार - समुद्र के पार जाकर, परमात्मा रूप अपने स्वामी को मिलती है, वही सँत - सुन्दरी श्रेष्ठ है ।

*सुन्दरी सुहाग* 
प्रेम लहर गह ले गई, अपने प्रीतम पास । 
आत्मा सुन्दरि पीव को, विलसे दादू दास ॥२३॥ 
२३ - २७ में सँत - सुन्दरी का सौभाग्य दिखा रहे हैं, प्रेम - समुद्र की अनन्यावस्था रूप लहरें हमारी आत्म - सुन्दरी की वृत्ति को विषय रूप तट से पकड़ कर अपने प्रियतम परमात्मा के पास ले गई है । अत: अब वह परमात्मा से निरन्तर साक्षात्कार करके परम आनन्द का उपभोग कर रही है । 

सुन्दरि को सांई मिल्या, पाया सेज सुहाग । 
पिव सौं खेले प्रेम रस, दादू मोटे भाग ॥२४॥ 
आत्मा - सुन्दरी को परमात्मा की प्राप्ति हुई । अब वह हृदय - शय्या पर प्रभु की उपस्थिति रूप सौभाग्य युक्त होकर अपने स्वामी परमात्मा से अरस - परस रूप खेल खेलती हुई प्रेम - रस का पान करती है । यह उसके महान् सौ भाग्य का ही फल है ।
(क्रमशः)

परिचय का अंग १२५/१२८

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🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य ।
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ Tapasvi Ram Gopal
(श्री दादूवाणी ~ परिचय का अंग)
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संतशिरोमणि महर्षि श्रीदादू दयाल जी महाराज कहते हैं कि ::
तरुवर शाखा मूल बिन, उत्पति परले नाँहि ।
रहिता रमता राम फल, दादू नैनहुँ माँहि ॥१२५॥
वह ब्रह्मवृक्ष उत्पत्ति-विनाश से रहित ही वर्णित हुआ है । तथा माया और उसके कार्य से भी रहित है । “जैसे वृक्ष के फूल पत्ते नष्ट होते हैं, उसी प्रकार प्राण, मन, बुद्धि, इन्द्रिय इनका ही विनाश होता है, आत्मा तो वृक्ष की तरह स्थित रहता क्योंकि वह नित्य है ।”
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प्राण तरुवर सुरति जड़, ब्रह्म भूमि ता माँहि ।
रस पीवे फूले-फले, दादू सूखे नाँहि ॥१२६॥
*ब्रह्म की और भी उपमा दी जा रही हैं -*
“परोपकार में सदा लगे रहने वाले सन्त ही वृक्षरूप हैं । उन सन्तरूपी वृक्षों की ब्रह्माकार वृत्ति ही मूल(जड़) है और ब्रह्म भूमि है । ब्रह्मभूमि में ब्रह्माकार वृत्ति से चिंतन रूप रस का पान करके प्रेमभक्ति रूप पुष्प और ज्ञानरूप फलों से संपन्न संत कभी काम-क्रोध आदि से निरस नहीं होते ।”
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ब्रह्म शून्य तहँ क्या रहै, आतम के अस्थान ।
काया अस्थली क्या बसै ? सद्गुरु कहैं सुजान ॥१२७ ॥
हे ज्ञानिन् ! हे सद्गुरो ! जीवन्मुक्त का क्या लक्षण है ? आत्मनिष्ठ और देहाध्यासी पुरुष के क्या लक्षण है ?
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काया के अस्थल रहैं, मन राजा पंच प्रधान ।
पच्चीस प्रकृति तीन गुण, आपा गर्व गुमान ॥१२८॥
लौकायतिक दार्शनिकों के मत में पृथ्वी आदि चार भूतों का समुदाय चेतन या स्थूल शरीर ही आत्मा है । इन के मत में शरीरातिरिक्त कोई आत्मा नहीं है; शरीरपोषण तथा शारीरिक सुखसाधन के पुरुषार्थ - ये दो ही पुरुषार्थ हैं । मोक्ष नहीं हैं, न लोकान्तर है, न जीव के अतिरिक कोई परमेश्वर है । उनके लक्षण बतला रहे हैं -
*काया के अस्थल रहे* अर्थात् देह को ही आत्मा मानने वालों के मत से इस काया नगर में मन का साम्राज्य है । जैसा मन कहता है वैसे ही ये करते हैं । ये बुद्धि से कर्तव्याकर्तव्य का भी विचार नहीं करते न धर्म-अधर्म का विचार करते हैं । शरीर का पालन ही इनके मत में मोक्ष है । पाँचों इन्द्रियाँ ही मन्त्री का कार्य करती हैं । अर्थात् राजा मन के अनुसार ही चलती हैं । 
पृथ्वी आदि पच्चीस प्रकृतियाँ ही इस कायानगर में रहने वाली प्रजा हैं । अस्थि, मेद, क्षुधा, रोध(रोकना), भय - ये पाँचों पृथ्वी की प्रकृति हैं । त्वक, मूत्र, तृषा, भर्म, मोह - ये पाँच जल की प्रकृति है । अग्नि की प्रकृति है माँस, रक्त, आलस्य, ऊर्ध्वगमन एवं क्रोध । नाड़ी, वीर्य, संगम, अतिनिर्गमन, तथा काम ये वायु की प्रकृति हैं । रोम, कफ, निद्रा, ऊर्ध्वगति तथा लोभ - ये पाँच आकाश की प्रकृति है । 
तथा सत्व, रज, तम - इन तीनों गुणों का अभिमान, विद्या, रूप, गुण का अभिमान; शारीरिक शक्ति का अभिमान - ये देहाध्यासी मानव के लक्षण हैं ।
(क्रमशः)

बुधवार, 30 जनवरी 2019

परिचय का अंग १२१/१२४

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श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य ।
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ Tapasvi Ram Gopal
(श्री दादूवाणी ~ परिचय का अंग)
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संतशिरोमणि महर्षि श्रीदादू दयाल जी महाराज कहते हैं कि ::
ऐसी एकै गाय है, दूझै बारह मास ।
सो सदा हमारे संग है, दादू आतम पास ॥१२१॥
बारहों मास उस दूध का दोहन होता रहता है । और वह सकल संसार की निर्माणकर्त्री ब्रह्मरूपी कामधेनु सबके पास ही रहती है । वह एक है । उस का दोहन श्रवण-मनन-निदिध्यासन द्वारा अखण्ड ब्रह्माकार वृत्ति ही है । वह सदा समीप ही रहती है । क्योंकि जीव-ब्रह्म का ऐक्य बताया गया है ।
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तरुवर शाखा मूल बिन, धरती पर नाहीं ।
अविचल अमर अनन्त फल, सो दादू खाहीं ॥१२२॥
अब महात्मा ब्रह्म का एक अद्भुत वृक्ष के रूप में वर्णन कर रहे हैं । सब की आधारभूत पृथ्वी भी इस ब्रह्मवृक्ष का आधार नहीं कही जा सकती है, क्योंकि यह समग्र जगत प्रपञ्च ब्रह्म में कल्पित है, अत: पृथ्वी भी उसमें कल्पित है । अत: अध्यस्त पृथ्वी ब्रह्म का आधार या अधिष्ठान नहीं हो सकती । शास्त्र का यह नियम है कि अध्यस्त जिसमें कल्पित है उसका वह अधिष्ठान नहीं हो सकता । जबकि ब्रह्म सब का अधिष्ठान है । अत: पृथ्वी कल्पित होने से ब्रह्म का अधिष्ठान नहीं बन सकती । इसी अभिप्राय से महाराज ने कहा है - *धरती पर नाहीं* ।
उस ब्रह्मवृक्ष का कोई मूल(कारण) नहीं है । और शाखा(कार्य) नहीं है । श्रुति भी कहती है - “ब्रह्म का कोई कारण नहीं,न उसका कोई कार्य है ।”
इस ब्रह्मवृक्ष के फल भी अविनाशी और अमर हैं । उन को मैं खाता हूँ, अर्थात् अनुभव करता हूँ ।
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तरुवर शाखा मूल बिन, धर अम्बर न्यारा ।
अविनाशी आनन्द फल, दादू का प्यारा ॥१२३॥
*घर अंबर न्यारा* - इसका भाव यह है कि वह ब्रह्म वृक्ष सर्वव्यापक होने पर भी पृथ्वी और आकाश में वह नहीं है । उसके साक्षात्कार से पैदा होने वाला आनन्द रूप फल भी अविनाशी है । वे फल मुझे अच्छे लगते हैं । यहाँ पृथ्वी और आकाश भूतमात्र का उपलक्षण हैं ।
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तरुवर शाखा मूल बिन, रज वीरज रहिता ।
अजर अमर अतीत फल, सो दादू गहिता ॥१२४॥
“समस्त भूतों में एक ब्रह्म है, परन्तु सम्पूर्ण भूत उसका स्पर्श भी नहीं कर सकते । अत: दर्शनरूपी फल से मैं कभी विमुख नहीं होता ।”
(क्रमशः)

= सुन्दर पदावली(१५.राग सिंधूड़ो - २/२) =

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॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥ 
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली* 
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी, 
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान) 
*= १५.राग सिंधूड़ो =*
(२/२) 
*पीसै दांत पिसण कै ऊपरि कै ऊपरि हाथ गहै हथियारा रे ।* 
*नेजा धारी निरषि फौज मैं मारै मन सिरदारै रे ॥३॥* 
*जहां छूटै तीर झड़ाझड़ि बींचै तहां स्याबतौ आवै रे ।* 
*सुन्दर लटकौ करै स्याम कौं तब तौ सूर कहावै रे ॥४॥* 
वह दांत कटकटाता हुआ, तीक्ष्णशस्त्र लेकर वैरी पर आक्रमण करता है । और हाथ में तलवार लेकर विरोधी सेनापति को एकान्तत: लक्ष्य बनाकर उसी पर टूट पड़ता है ॥३॥ 
उस युद्ध में दोनों पक्षों से निरंतर(=झड़ा झड़) तीर तलवार आदि शास्त्रों का प्रहार होने लगता है तो पीछे हट कर घायल न होने की बात किसी के मन में नहीं होती । महात्मा सुन्दरदासजी कहते हैं –युद्ध में जो वीरता के विलक्षण कृत्य दिखायेगा । वही ‘वीर’ कहलायगा । केवल मौखिक बातों से कुछ नहीं होना है ॥४॥ 
(क्रमशः)

= ९० =


🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*ज्यों रचिया त्यों होइगा, काहे को सिर लेह ।*
*साहिब ऊपरि राखिये, देख तमाशा येह ॥* 
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साभार ~ Soni Manoj

बुद्ध कहते हैं, 🌿
"न अंतरिक्ष में, न समुद्र के गर्भ में, न पर्वतों के विवर में प्रवेश कर ---- संसार में कोई स्थान नहीं है, जहां रहकर प्राणी पापकर्मों के फल से बच सके ।"
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न अंतरिक्ष में, न समुद्र के गर्भ में, न पर्वतों के विवर में प्रवेश कर --- संसार में कोई स्थान नहीं है, जहां घुसकर मृत्यु से मनुष्य बच सके । पाप का फल आएगा । पाप में आ ही गया है । तुम्हें थोड़ी देर लगेगी पहचानने में । फिर करना क्या है ?
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बुद्ध कहते हैं, पाप के फल से बचो मत । उसके, पाप के फल को निष्पक्ष भाव से भोग लो । यह बड़ा कीमती सूत्र है । तुमने कुछ किया, अब उसका दुख आया, इस दुख को तटस्थ भाव से भोग लो ! अब आनाकानी मत करो । अब बचने का उपाय मत खोजो । क्योंकि बच तुम न सकोगे । बचने की कोशिश में तुम और लंबा दोगे प्रक्रिया को । तुम इसे भोग लो जानकर कि मैंने किया था, अब फल आ गया । फसल बो दी थी, अब काटनी है; काट लो । लहूलुहान हों हाथ, पीड़ा हो, होने दो । 
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लेकिन तुम तटस्थ भाव से ---- इसे खयाल में रखना ---- तटस्थ भाव ! अगर तुमने इस फल के प्रति कोई भाव न बनाया, तुमने यह न कहा कि मैं नहीं भोगना चाहता, यह कैसे आ गया मेरे ऊपर, यह तो जबर्दस्ती है, अन्याय है --- क्योंकि ऐसी तुमने कोई भी प्रतिक्रिया की तो तुमने आगे के लिए फिर नया कर्म बो दिया । तुम कुछ मत कहो । तुम इतना ही कहो कि मैंने किया था, उसका फल मुझे मिल गया, निपटारा हुआ । सौभाग्यशाली हूं ! बात खतम हुई ।
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बुद्ध के ऊपर एक आदमी थूक गया । उन्होंने पोंछ लिया । दूसरे दिन क्षमा मांगने आया । बुद्ध ने कहा, तू फिक्र मत कर । मैं तो खुश हुआ था कि चलो निपटारा हुआ । किसी जन्म में तेरे ऊपर थूका था, राह देखता था कि तू जब तक न थूक जाए, छुटकारा नहीं है । तेरी प्रतीक्षा कर रहा था । तू आ गया, तेरी बड़ी कृपा ! बात खतम हो गयी । अब मुझे इस सिलसिले को आगे नहीं ले जाना है । अब तू यह बात ही मत उठा । हिसाब-किताब पूरा हो गया । तेरी बड़ी कृपा है ।
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जो भी आए, उसे शांत भाव से स्वीकार कर लो ।
उसे गुजर जाने दो । अब कोई नया संबंध मत बनाओ, कोई नयी प्रतिक्रिया मत करो, ताकि छुटकारा हो, ताकि तुम वापस बाहर निकल आओ । धीरे-धीरे ऐसे एक-एक कर्म से व्यक्ति बाहर आता जाता है । और एक ऐसी घड़ी आती है कि सब हिसाब पूरा हो जाता है । तुम पार उठ जाते हो, तुम्हें पंख लग जाते हैं । तुम उस परम दशा की तरफ उड़ने लगते हो । जब तक कर्मों का जाल होगा, तुम्हारे पंख बंधे रहेंगे जमीन से । तुम आकाश की तरफ यात्रा न कर सकोगे ।
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मृत्यु से भी बचने का कोई उपाय नहीं है, इसलिए बचने की चेष्टा छोड़ो । जिससे बचा न जा सके उससे बचने की कोशिश मत करो । उसे स्वीकार करो । स्वीकार बड़ी क्रांतिकारी घटना है बुद्ध ने इसके लिए खास शब्द उपयोग किया है --- तथाता । तथाता का अर्थ है : जो है, मैं उसे स्वीकार करता हूं । मेरी तरफ से कोई इनकार नहीं । मौत है, मौत सही । मेरी तरफ रत्तीभर भी इनकार नहीं कि ऐसा न हो, या अन्यथा होता । जैसा हो रहा है, वैसा ही होना था, वैसा ही होगा । मुझे स्वीकार है । मेरी तरफ से कोई विरोध नहीं, कोई प्रतिरोध नहीं । मेरी तरफ से कोई निर्णय नहीं । मेरी तरफ से कोई निंदा, प्रशंसा नहीं ।
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ऐसी शांत दशा में जो जीवन के सुख-दुखों को स्वीकार कर लेता है, जीवन-मृत्यु के पार हो जाता है । आवागमन उसे वापस नहीं खींच पाता । वह आकाश का हो जाता है ।
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इस परम वीतराग दशा को हमने लक्ष्य माना था । जीवन का लक्ष्य है, जीवन और मृत्यु के पार हो जाना । वही सुख सुख है, जो दुख और सुख दोनों के पार है । ऐसी दशा ही अमृत है, जहां न तो मृत्यु आती अब, और न जीवन आता ।
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भारत की इस खोज को अनूठी कहा जा सकता है । क्योंकि पश्चिम में, और मुल्कों में, और संस्कृतियों - सभ्यताओं ने हजार-हजार लक्ष्य खोजे हैं मनुष्य के जीवन के, लेकिन जीवन के पार हो जाने का लक्ष्य सिर्फ भारत का अनुदान है । और थोड़ा ध्यान करोगे इस पर, तो समझ में आएगा कि जीवन का जिसने उपयोग इस तरह कर लिया कि सीढ़ी बना ली और जीवन के भी पार हो गया । मृत्यु पर भी पैर रखा, जीवन पर भी पैर रखा, द्वंद्व के पार हो गया -------- निर्द्वन्द्व हो गया ।
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एक तरफ से लगेगा कि यह तो शून्य की दशा होगी -- है । और जब इसका अनुभव करोगे, तो पता चलेगा कि यही ब्रह्म की भी दशा है । शून्य और पूर्ण एक के ही नाम हैं । तुम्हारी तरफ से देखो, तो ब्रह्म शून्य जैसा मालूम होता है । बुद्धों की तरफ से देखो, तो शून्य ब्रह्म जैसा मालूम होता है । क्योंकि शून्य इस जगत में सबसे बड़ा सत्य है ।
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और इस शून्य की तरफ जाना हो, तो शांति को साधना । शांति धीरे-धीरे तुम्हारे भीतर शून्य को सघन करेगी । तुम्हारे भीतर अनंत आकाश उतर आएगा । तुम खोते जाओगे । सीमाएं विलीन होती जाएंगी । कोरे दर्पण रह जाओगे । उस कोरे दर्पण का नाम बुद्धत्व है । और उस बुद्धत्व को पा लेने का जो उपाय है, उसको एस धम्मो सनंतनो कहा है ।

🌲 ओशो 🌲 एस धम्मो सनंतनो, 
भाग ५ प्रवचन ४६ जीवन-मृत्यु से पार है अमृत
से संकलित प्रवचनांश ।।
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= ८९ =


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🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*आदि अनन्त सोई घर पाया,*
*अब मन अनत न जाई ।*
*दादू एक रंगै रंग लागा, तामें रह्या समाई ॥*
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साभार ~ Ramchander Gupta

🌰 मनुष्य की खोज क्या है? मनुष्य की खोज है: अपने घर की खोज। यहां परदेश है। यहां सब वीराना है। अपना यहां कुछ भी नहीं। और यहां से जाना है। और जो थोड़ा-बहुत अपना मान लोगे, वह भी मौत छीन लेती है। यहां घर तो कोई कभी बना नहीं पाया। यहां तो घर उजड़ने को ही बनते हैं। यहां तो घर बन भी नहीं पाते कि उजड़ जाते हैं। यहां हम ही नहीं टिक पाते, तो हमारे बनाए घर कैसे टिकेंगे? यहां की गई मेहनत तो अकारथ जाती है।

आदमी की खोज उस घर की खोज है, जो मिले तो सदा के लिए मिल जाए। आदमी की खोज उस घर की खोज है जो सच में घर हो, सराय न हो। यहां तो सब सरायें हैं, धर्मशालाएं हैं--बस रैनबसेरा है। सुबह हुई, चल पड़ना होगा। बहुत मोह मत लगा लेना। सराय से बहुत ममता बिठा लेना। यह छूट ही जाना है। यह छूटा ही हुआ है। तुमसे पहले बहुत लोग यहां ठहरे और गए; तुम भी उसी कतार में हो।

इसलिए चाहे यहां कितना ही धन हो, कितना ही पद हो, प्रतिष्ठा हो; फिर भी तृप्ति नहीं मिलती। तृप्ति यहां मिलती ही नहीं। तृप्ति का संसार से कोई संबंध ही नहीं है। अक्सर ऐसा होता है कि गरीब को तो थोड़ी आशा भी रहती है, अमीर की आशा भी टूट जाती है। गरीब को तो लगता है कि एक मकान होगा अपना, तो शांति होगी। थोड़ा धन-संपत्ति होगी; सुविधा होगी; फिर सुख और चैन से रहेंगे।

उसे यह पता ही नहीं है कि सुख-चैन यहां हो नहीं सकता। धर्मशाला में कैसा सुख-चैन? कब उठा लिए जाओगे...! आधी रात में पुकार लिए जाओगे! कब मौत का दूत द्वार पर खड़ा हो जाएगा और दस्तक देने लगेगा--कुछ भी तो नहीं कहा जा सकता! यहां चैन कैसे हो सकता है? बेचैनी यहां स्वाभाविक है।

जैसे ही यह खयाल बहुत स्पष्ट हो जाता है, कांटे की तरह चुभने लगता है प्राणों में कि यह हमारा घर नहीं--तब एक खोज शुरू होती है--असली घर की खोज।

👣पद घंघरू बांध,🌻🍁ओशो 🍁🌹साभार

= *परिचय भोले भाव का अंग ६०(१/४)* =

#daduji

卐 सत्यराम सा 卐
*संगि सदा हेत हरि लागो, अंगि और नहिं आवे ।*
*दादू दीन दयाल दमोदर, सार सुधा रस भावे ॥* 
===============
**श्री रज्जबवाणी**
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
**परिचय भोले भाव का अंग ६०**
इस अंग में भोले भक्तों के परिचय संबंधी विचार कर रहे हैं ~
भोले सौं भोले प्रभु, स्याणे सौं स्याणे । 
जन रज्जब साधों सिधों, इहि भांति वखाणे ॥१॥ 
भगवान भोले भक्तों के साथ भोले बन जाते हैं और चतुरों के साथ चतुर बन जाते हैं, सिद्ध संतों ने इस प्रकार ही कहा है । 
स्याणों१ हु सौं स्याणों प्रभु, भोलों सौं भोले । 
बालक बुधि२ बिन बाल हैं, अंतर पट खोले ॥२॥ 
भगवान चतुरों१ के साथ चतुर हो जाते हैं ओर भोलों के साथ भोले बन जाते हैं, बालक बुद्धि२ के बिना भी वे बालक के साथ बालक बन जाते हैं और भक्त के भीतर के अज्ञान रूप परदे को खोल देते हैं । 
स्याणे१ याणे२ होत हैं, बाप पूत की लार । 
बाणी बोलै तोतरी, उस बालक के प्यार ॥३॥ 
बुद्धिमान१ पिता भी पुत्र के साथ अनजान२ से बन जाते हैं और उस बालक के प्रेम से उसके तोतली वाणी बोलते हैं वैसे ही बाल भक्तों के लिये भगवान भी करते हैं । 
प्रचंड प्रीति बुधि बाल के, पितहिं नचावे नांच । 
जन रज्जब ज्यों जीव को, खेल खिलावै पांच ॥४॥ 
जैसे जीव को पाँचों ज्ञानेन्द्रिय नाँच नचाती हैं और बालक पुत्र पिता को नाँच नचाता है, वैसे ही बाल बुद्धि भक्त प्रचंड प्रीति से परमात्मा को नाँच नचाते हैं ।
(क्रमशः)

= सुन्दरी का अँग(३०-१९/२१) =

#daduji
॥ दादूराम सत्यराम ॥ 
*श्री दादू अनुभव वाणी* 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
*सुन्दरी का अँग* 
नैन बैन कर वारणै, तन मन पिंड पराण । 
दादू सुन्दरि बलि गई, तुम पर कंत सुजान ॥१९॥ 
मेरे हृदय को अच्छी प्रकार जानने वाले स्वामिन् ! मैं जीवात्मा - सुन्दरी अपने नेत्र, वचन, मन, प्राणादि सूक्ष्म शरीर और स्थूल शरीर आप पर निछावर करके आपकी बलिहारी जाती हूं । 
तन भी तेरा मन भी तेरा, तेरा पिंड पराण । 
सब कुछ तेरा तूँ है मेरा, यहु दादू का ज्ञान ॥२०॥ 
मेरे मन, प्राणादि सूक्ष्म शरीर तथा स्थूल शरीरादि सब आपके ही हैं और आप मेरे हैं, यही मेरा ज्ञान है ।
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सुन्दरि मोहै पीव को, बहुत भाँति भरतार ।
त्यों दादू रिझवे राम को, अनन्त कला करतार ॥२१॥
जैसे सुन्दरी अपने पति को नाना शृंगार और सेवादि से अपने में अनुरक्त करती है, वैसे ही विश्व - रचयिता अपने स्वामी राम को हम अनन्त साधना रूप कलाओं से रिझाते हैं । 
(क्रमशः)

मंगलवार, 29 जनवरी 2019

परिचय का अंग ११६/१२०


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श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य ।
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ Tapasvi Ram Gopal
(श्री दादूवाणी ~ परिचय का अंग)
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संतशिरोमणि महर्षि श्रीदादू दयाल जी महाराज कहते हैं कि ::
कामधेनु दुहि पीजिए, अकल अनूपम एक ।
दादू पीवे प्रेम सौं, निर्मल धार अनेक ॥११६॥
यह ब्रह्म षोडश कलाओं से रहित है । “यह ब्रह्म कलातीत है, उपमा रहित है” क्योंकि उसकी कोई उपमा नहीं दी जा सकती - ऐसा श्रुति कहती है । “सजातीय विजातीय भेद शून्य एक है”- ऐसा श्रुति-वाक्य है, अत: वह एक है । तथापि अज्ञानियों को समझाने के लिये कामधेनु से उसकी उपमा दी जा रही है । जैसे कामधेनु संकल्पमात्र से सभी प्रयोजन सिद्ध करने वाली है, वैसे ही ब्रह्म भी ध्यानपरायण साधक को सब कुछ देने वाला है । जैसे कामधेनु दुहने से दूध देती है, वैसे ही ब्रह्म भी ध्यान करने पर ब्रह्म दर्शन रूप दूध देता है । महाराज श्रीदादूदयाल जी कहते हैं कि मैं तो अनेक साधनों द्वारा ब्रह्मानन्दरूपी प्रेमरस का पान करता हूँ, हे साधक ! तुम भी ऐसा ही करो ।
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कामधेनु दुहि पीजिए, ताकूँ लखे न कोइ ।
दादू पीवै प्यास सौं, महारस मीठा सोइ ॥११७॥
ब्रह्म एक कामधेनु है । जिसका समाधि में दर्शन रूप महारस तथा मधुर दूध है । उसका का पान समाधि में ब्रह्माकार वृत्ति से करो । उस ब्रह्मरस को पीने के लिये प्यास की आवश्यकता है, क्योंकि प्यास के बिना उस मधुरतम रस को भी कोई नहीं पीता ।
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कामधेनु दुहि पीजिए, अलख रूप आनंद ।
दादू पीवै हेत सौं, सुषमन लागा बंद ॥११८॥
उस रस का पान जब समाधि में मन सहित प्राणों का निरोध होने पर, सुषुम्ना द्वारा सहस्त्रारचक्र में होता है ।
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कामधेनु दुहि पीजिए, अगम अगोचर जाय ।
दादू पीवै प्रीति सूं, तेज पुंज की गाय ॥११९॥
अत: ब्रह्म कामधेनु है । वह कामधेनु अलख, आनन्दरूप, आगमातीत, वाणी व मन की भी अविषय, स्वयंप्रकाश एवं तेजोमयी है । उसका अभेदबुद्धि से दर्शन ही दूध है ।
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कामधेनु करतार है, अमृत सरवै सोइ ।
दादू बछरा दूध कौं, पीवै तो सुख होइ ॥१२०॥
जिज्ञासु बछड़ा(वत्स) है । प्रेम से उसका दुग्धपान करने से साधक को सुख होता है ।
(क्रमशः)

= सुन्दर पदावली(१५.राग सिंधूड़ो - २/१) =

#daduji
॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥ 
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली* 
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी, 
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान) 
*= १५.राग सिंधूड़ो =*
(२/१) 
*सोई सूरबीर सावंत सिरोमनि रन मैं जाइ गलारै रे ।* 
*आप आपणा घर मैं बैठा गाल सबै कोई मारै रे ॥टेक॥* 
*नागौ लडै पहरि केसरियौ सत बादी सत भाषै रे ।* 
*श्याम भरोसै संक न कोई और वोट नहिं राषै रे ॥१॥* 
*ह्वै मरणीक आस तजि तनकी रोपि रहै रन मांहीं रे ।* 
*दोनौं प्रांणी जुडै जब सनमुष तब पाछा दे नांही रे ॥२॥*
कोई शूर वीर योद्धा ही युद्ध में खड़ा होकर छाती ठोककर कुछ कह सकता है । अन्यथा घर में बैठ कर तो सभी लोग दहाड़ते रहते हैं ॥टेक॥ 
युद्ध में सन्नद्ध होकर कोई वीर ही किसी की प्रतिद्वन्दिता, केसरिया वस्त्र पहन कर कर सकता है । वह अपने इष्टदेव के सहारे से खुलकर युद्ध करता है । उसमें कोई कमी नहीं रहने देता ॥१॥ 
वह अपना सिर हथेली पर रख कर रण में जूझता है । दोनों प्रतिद्वन्दियों में कोई पीछे हटने की बात नहीं सोचता ॥२॥ 
(क्रमशः)

= ८८ =


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*अंधे अंधा मिल चले, दादू बंध कतार ।*
*कूप पड़े हम देखतां, अंधे अंधा लार ॥*
==========================
साभार ~ Dharmesh Mistry

एक अंधी स्त्री न्यूयॉर्क के एक रास्ते पर रास्ता पार करने के लिए खड़ी थी। प्रतीक्षा कर रही थी कि कोई आ जाए और राह पार करवा दे। तभी किसी ने उसके कंधे पर हाथ रखा। और जिसने कंधे पर हाथ रखा उसने कहा, क्या हम दोनों साथ - साथ रास्ता पार कर सकते हैं? उस स्त्री ने कहा, मैं प्रतीक्षा ही कर रही थी। आओ।
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दोनों ने हाथ में हाथ डाला और पार हुए। जब उस तरफ पहुंच गए तो स्त्री ने कहा, बहुत-बहुत धन्यवाद कि आपने मुझे रास्ता पार करवाया। वह आदमी घबड़ाया। उसने कहा, क्या मतलब? धन्यवाद तो मुझे देना चाहिए। मैं अंधा हूं रास्ता तो तुमने मुझे पार करवाया। तब तो दोनों घबड़ा गए, पसीना आ गया। रास्ता तो पार हो गए थे, लेकिन तब पता चला, दोनों अंधे थे।
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अंधों को पता भी कैसे चले कि हम किसी अंधे के पीछे चल रहे हैं? कतारें लगी हैं। क्यू लगे हुए हैं। तुम अपने आगे वाले को पकड़े हो, आगे वाला अपने आगेवाले को पकड़े हुए है। सबसे आगे कोई महाअंधा महात्मा की तरह चल रहा है। चले जा रहे हैं। न तुम्हें पता है, न तुम्हारे आगेवाले को पता है।
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मुल्ला नसरुद्दीन नमाज पढ़ने गया था। होगा ईद का उत्सव या कोई धार्मिक त्यौहार। हजारों लोग नमाज पढ़ रहे थे। उसकी कमीज उसके पाजामा में उलझी थी। तो पीछे वाले आदमी को जरा अच्छा नहीं लगा तो उसने झटका देकर कमीज को ठीक कर दिया। उसने सोचा कि मामला कुछ है। उसने सामनेवाले आदमी को...। उसकी कमीज में झटका दिया। उस आदमी ने पूछा, क्या बात है? झटका क्यों देते हो? उसने कहा, भाई मेरे पीछेवाले से पूछो। मैं तो समझा कि रिवाज होगा। इस मस्जिद में पहले कभी आया नहीं।
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*हम कर रहे हैं एक-दूसरे का अनुकरण। रस तो पाया कहां है? रस से तो तुम्हारी पहचान कहां हुई है? रस मिले तो प्रभु मिले। रस पा लिया तो सब पा लिया ।*
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-ओशो
अष्‍टावक्र: महागीता (भाग--5) : प्रवचन--8

= ८७ =


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*दादू काल हमारा कर गहै, दिन दिन खैंचत जाइ ।*
*अजहुं जीव जागै नहीं, सोवत गई बिहाइ ॥* 
==========================
साभार ~ Dhaval Parmar

अल्बर्ट आइंस्टीन के संबंध में मैंने सुना है। भुलक्कड़ स्वभाव का आदमी था। अक्सर ऐसा हो जाता है, जो लोग जीवन की बड़ी गहन समस्याओं में उलझे होते हैं उन्हें छोटी-छोटी बातें भूल जाती हैं। जो आकाश चांदत्तारों में उलझते होते हैं उन्हें जमीन भूल जाती है। इतनी विराट समस्याएं जिनके सामने हों, उनके सामने कई दफे अड़चन हो जाती है।
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जैसे एक बार यह हुआ कि उसको लगा, अलबर्ट आइंस्टीन को, कि आ गई बीमारी जिसकी कि डाक्टर ने कहा था। डाक्टर ने उसको कहा था कि कभी न कभी डर है, तुम्हारी रीढ़ कमजोर है, तो यह हो सकता है कि बुढ़ापे में तुम्हें झुककर चलना पड़े, तुम कुबड़े हो जाओ। एक दिन उसे लगा, सुबह ही सुबह बाथरूम में से निकलने को ही था कि आ गया वह दिन। वहीं बैठ गया। घंटी बजाकर पत्नी को बुलाया, कहा डाक्टर को बुलाओ, लगता है मैं कुबड़ा हो गया। चलते ही नहीं बन रहा है मुझसे। सिर सीधा करते नहीं बन रहा है। रीढ़ झुक गई है।
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डाक्टर भागा गया। डाक्टर ने गौर से देखा और कहा कि कुछ नहीं है, आपने ऊपर का बटन नीचे लगा लिया है। अब उठना चाहते हो तो उठोगे कैसे? आकाश की बातों में उलझा हुआ आदमी अक्सर इधर-उधर के बटन हो जाएं कोई आश्चर्य की बात नहीं।
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एक मित्र के घर अल्बर्ट आइंस्टीन गया था मित्र ने निमंत्रण दिया था। फिर गपशप चली। खाना चला, फिर गपशप चली, मित्र घबड़ाने लगा, रात देर होने लगी, ग्यारह बज गए बारह बज गए। आइंस्टीन सिर खुजलाए, जम्हाई ले, घड़ी देखे, मगर जो बात कहनी चाहिए कि अब मैं चलूं वह कहे ही नहीं। एक बज गया, मित्र भी घबड़ा गया कि यह क्या रात भर बैठे ही रहना पड़ेगा ! अब अल्बर्ट आइंस्टीन जैसे आदमी से कह भी नहीं सकते कि अब आप जाइए, इतना बड़ा मेहमान ! और देख भी रहा है कि जम्हाई आ रही है अल्बर्ट आइंस्टीन को, आंखें झुकी जा रही हैं, घड़ी भी देखता है; मगर बात जो कहनी चाहिए वह नहीं कहता। आखिर मित्र ने कहा कि कुछ परोक्ष रूप से कहना चाहिए। तो उसने कहा कि मालूम होता है, आपको नींद आ रही है, जम्हाई रहे हैं, घड़ी देख रहे हैं, काफी नींद मालूम होती है आपको आ रही है।
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अल्बर्ट आइंस्टीन ने कहा कि आ तो रही है, मगर जब आप जाएं तो मैं सोऊं। मित्र ने कहा: आप कह क्या रहे हैं? यह मेरा घर है ! तो अल्बर्ट आइंस्टीन ने कहा। भले मानुष ! पहले से क्यों नहीं कहा? चार घंटे से सिर के भीतर एक ही बात भनक रही है कि यह कब कमबख्त उठे और कहे कि अब हम चले ! इतनी दफे घड़ी देख रहा हूं, फिर भी तुम्हें समझ में नहीं आ रहा। मैं यही सोच रहा कि बात क्या है ! जम्हाई भी लेता हूं, आंख भी बंद कर लेता हूं, सुनता भी नहीं तुम्हारी बात कि तुम क्या कह रहे हो। और यह भी देख रहा हूं कि तुम भी जम्हाई ले रहे हो, घड़ी तुम भी देखते, जाते क्यों नहीं, कहते क्यों नहीं कि अब जाना चाहिए।
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*आदमी करीब-करीब एक गहरे विस्मरण में जी रहा है, जहां उसे अपने घर की याद ही नहीं है; जहां उसे भूल ही गया कि मैं कौन हूं; जहां उसे भीतर जाने का मार्ग ही विस्मृत हो गया है। और इसलिए सारी अड़चन पैदा हो रही है। एक काम कर लो: भीतर उतरना सीख जाओ। और भीतर ज्योति जल ही रही है, जलानी नहीं है--बिन बाती बिन तेल ! वह दीया जल ही रहा है।*

एक राम सारै सब काम👣ओशो

= *ज्ञान परिचय का अंग ५९(२९/३२)* =

#daduji

卐 सत्यराम सा 卐
*सहज शून्य सब ठौर है, सब घट सबही माहिं ।*
*तहाँ निरंजन रम रह्या, कोई गुण व्यापै नाहीं ॥* 
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**श्री रज्जबवाणी**
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
**ज्ञान परिचय का अंग ५९**
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बुद्धि विचार की चालनी, त्रिगुण सर्व तुस छाने । 
आटा अन्त:करण भया शुचि, करी चालनी काने ॥२९॥ 
चालनी से तुष छानने पर आटा शुद्ध हो जाता है तब चालनी अलग रख देते हैं, वैसे ही बुद्धि द्वारा विचार करके अंत:करण से तीनों गुण निकाल देते हैं, तब अन्त:करण शुद्ध, स्थिर ओर भेद ज्ञान से रहित होनै पर विचार को एक ओर रख कर ज्ञानी अद्वैत -निष्ठा ही रहते हैं । 
अविगत अंब आतम फल लागै, नीच ऊंच अंतर भ्रम भागै । 
मुख भुज पेट पाँई गति एकै, पारस पिंड न भिन्न विवेकै ॥३०॥ 
आम्र वृक्ष के फल लगते हैं, वे छोटे-बड़े सभी आम कहलाते हैं, वैसे ही परमात्मा से आत्मा होते हैं उनमें नीच-ऊंच भेद का भ्रम विचार द्वारा भाग जाता है, पारस से स्पर्श होने पर लोहे के छोटे बड़े सभी खण्ड सुवर्ण बन जाते हैं, वैसे ही मुख से ब्राह्मण, भुज से क्षत्रिय, पेट से वैश्य और पैरों से शूद्र उत्पन्न होते हैं, उन सब के शरीरों की भिन्नता का विवेक परमात्मा के यहाँ नहीं रहता उसकी प्राप्ति का साधन करने पर उनसे परिचय होते ही सबको एक ही स्वरूप की प्राप्ति होती है । 
सब ठाहर समसर प्रभु, ज्यों मीश्री का गात । 
ता माँहिं दुविधा कहै, सो सब झूठी बात ॥३१॥ 
मिश्री के बने हुये शरीर में सर्वत्र मिठास समान होता है, वैसे ही विश्व के सब शरीर रूप स्थलों में परमात्मा समान हैं, उनके स्वरूप में जो किसी में अधिक, किसी में न्यून रहता रूप दुविधा का कथन करते हैं सो सब बातें मिथ्या हैं । 
स्रक सुगंध शीतल सब ठाहर, विपिन विभेदन काया कोय । 
तो रज्जब जो सदा एक रस, चतुर भाँति कैसे तन होय ॥३२॥ 
वन को चंदन बनाने वाल कोई चंदन होता है तब उसकी सुगंध तथा शीतलता सभी वृक्षों में समान रूप से आती है फिर जो सदा एक रस रहने वाला ब्रह्म है उससे चार प्रकार के शरीर कैसे हो सकते हैं ? उससे तो यह मानव एक प्रकार ही होता है फिर कर्मानुसार ब्रह्मणादि नाना नाम रख लिये जाते हैं फिर प्रभु से परिचय होने पर वह काल्पनिक भेद दूर होकर सभी एक ब्रह्मस्वरूप को ही प्राप्त होते हैं । 
इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित ज्ञान परिचय का अंग ५९ समाप्त ॥सा. १९२९॥ 
(क्रमशः)

= सुन्दरी का अँग(३०-१६/१८) =

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॥ दादूराम सत्यराम ॥
*श्री दादू अनुभव वाणी* 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
*सुन्दरी का अँग*

सखी सुहागिनि सब कहैं, प्रकट न खेले पीव । 
सेज सुहाग न पाइये, दुखिया मेरा जीव ॥१६॥ 
सँत - सखी ! मुझे सभी कहते हैं, इसे प्रभु प्राप्त हैं, किन्तु प्रकट रूप से तो परमात्मा मेरे साथ अरस - परस रूप खेल नहीं खेते । मेरी हृदय - शय्या पर निरन्तर विराजे रहें, ऐसा सुहाग - सुख मुझे नहीं प्राप्त हो रहा है । अत: मेरा मन बड़ा दु:खी है । 
प्रसंग ~ सांभर - सरोवर के मध्य की छतरी पर महाराज ध्यानस्थ था । उसी समय वहां एक सँत जा पहुंचे और ध्यान खुने पर "आप भगवत् प्राप्त सँत हैं", ऐसी बातों द्वारा महाराज की स्तुति करने लगे तब उन्हीं सँतजी को १३ से १६ तक की साखियां कही थीं ।
*अन्य लग्न व्यभिचार*
पुरुष पुरातन छाड़कर, चली आन के साथ । 
सो भी संग तैं बीछुट्या, खड़ी मरोड़े हाथ ॥१७॥ 
१७ में कहते हैं - व्यभिचार से दु:ख होता है, जो जीवात्मा - सुन्दरी परब्रह्म रूप पुराने पुरुष सनातन को छोड़, अन्य नूतन पति देव के साथ लगती है, तो वह पतिदेव विनाशी होने से उसके संग से जब बिछुड़ता है, तब "हाय ! अब क्या करूँ" कह कर खड़ी - खड़ी अपने हाथ मरोड़ती हुई पछताती है । अत: अविनाशी परमात्मा को ही सच्चा स्वामी मानें । 
*सुन्दरी - विलाप* 
सुन्दरि कबहूं कंत का, मुख सौं नाम न लेइ । 
अपने पिव के कारणैं, दादू तन मन देइ ॥१८॥ 
१८ - २२ में साधक सुन्दरी का विलाप दिखा रहे हैं, जैसे सुन्दरी अपने मुख से तो पति का नाम उच्चारण भी नहीं करती किन्तु पति के लिए अपने तन मन को निछावर कर देती है । वैसे ही उच्चकोटि के सँत उच्च - स्वर से तो हरि का नाम उच्चारण नहीं करते, किन्तु भीतर उसकी प्राप्ति के लिये निरँतर विलाप करते हुये अपने तन - मन को प्रभु पर निछावर कर देते हैं ।
(क्रमशः)

सोमवार, 28 जनवरी 2019

परिचय का अंग १११/११५


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श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य ।
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ Tapasvi Ram Gopal
(श्री दादूवाणी ~ परिचय का अंग)
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संतशिरोमणि महर्षि श्रीदादू दयाल जी महाराज कहते हैं कि ::
अमृत धारा देखिए, पारब्रह्म वर्षतं ।
तेज पुंज झिलमिल झरै, को साधू जन पीवंत ॥१११॥
समाध्यवस्था में परब्रह्म परमात्मा के दर्शन से आनन्द की धारा बरसने लगती है । उस स्थिति में ब्रह्म तेजोमय रूप से नक्षत्रों की झिलमिलाहट की तरह चमकता है । ऐसा समाधि सुख, किसी अतिदुर्लभ भाग्यशाली साधक को ही देखने को मिलता है ।
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रसही मैं रस बरषि है, धारा कोटि अनंत ।
तहँ मन निश्चल राखिये, दादू सदा वसंत ॥११२॥
जिस भक्त के हदय में प्रभु प्रेम की धारा प्रवाहित होने लगती है, उसी के चित्त में दर्शनानन्द का प्रवाह स्वच्छन्दतया प्रवाहित होने लगता है । हे साधक ! तुम भी अपने चित्त को परमात्मा में स्थिर करो । तुम्हारे चित्त में भी दर्शनानन्द स्फुरित होने लगेगा ।
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घन बादल बिन बरषि है, नीझर निर्मल धार ।
दादू भीजे आतमा, को साधू पीवण हार ॥११३॥
निर्विकल्प समाधि में मेघ के विना ही ब्रह्ममेघ से दर्शनरूपी वर्षा की धारा निरन्तर प्रवाहित होने लगती है । वहाँ साधक दर्शनरूपी स्नान में डूबकर परम शान्ति का अनुभव करता है ।
योगवासिष्ठ में :: “योग के ज्ञाता योगियों ने इस समाधि को ‘धर्ममेघ’ समाधि कहा है । और धर्ममेघ भी हजारों धर्मरूपी अमृतधाराओं को बरसाता है । निर्विकार होने पर मन की एक ब्रह्माकार वृत्ति बनती है, इस वृत्ति से सब का विस्मरण हो जाता है । अत: ज्ञानपक्ष में वृत्ति को सर्वथा भूल जाना ही समाधि है । ध्याता, ध्यान और ध्येय - इन सब को त्याग कर केवल ध्येयाकार वृत्ति ही समाधि है । इस में चित्त निर्वात दीपक की तरह सर्वथा स्थिर हो जाता है ।”
हठयोगदीपिका में लिखा है :: योगी पादतल से मस्तक पर्यन्त देह को चन्द्रमा से निकलने वाले अमृत का सेवन करे तो, उस का शरीर बली पराक्रमी बन जाता है । अर्थात् अमृत स्नान से शुद्ध हो जाता है ।
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ऐसा अचरज देखिया, बिन बादल बरषे मेह ।
तहँ चित चातक ह्वै रह्या, दादू अधिक सनेह ॥११४॥
निर्विकल्पक समाधि-दशा में महान् आश्चर्य यह दीखता है कि बिना मेघों के ही ब्रह्ममेघ से दर्शनवृष्टि प्रतिक्षण होती रहती है । फिर भी चातक पक्षी स्वाति नक्षत्र का जल पीने के लिये जैसे लालायित रहता है, वैसे ही मेरा मन भी ब्रह्म दर्शन हेतु पिपासाकुल रहता है । मेरी दर्शन की प्यास बढ़ती ही जाती है और उसी तरह स्नेह भी बढ़ता जाता है ।
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महा रस मीठा पीजिए, अविगत अलख अनंत ।
दादू निर्मल देखिए, सहजै सदा झरंत ॥ ११५॥
“वह ब्रह्म स्वरूप है । उस रस को प्राप्त कर साधक आनंदित होता है ।” इत्यादि श्रुतियों के अनुसार ब्रह्म ‘महारस’ सिद्व होता है । अतः यहाँ ‘महारस’ शब्द से ब्रह्म का व्यपदेश है । वह मधुर होने से आस्वाद योग्य है । और अनंत होने से इंद्रियातीत है । वासनारहित होने से निर्मल है । ‘वासना’ ही ‘मल’ कहलाता है । उस रस का समाधि में स्फुरण होता रहता है ।
लिखा है :: समाधि द्वारा सुंदर शुद्धान्त:करण वाले को तथा समाधि निष्ठ चित्त वाले को सुख प्राप्त होता है उसका वाणी द्वारा वर्णन नहीं हो सकता । किंतु आनंद स्वयं ही अपने अंतःकरण से ही जाना जा सकता है ।
श्रीमद्भगवद्गीता में लिखा है :: परमेश्वर की प्राप्ति के अतिरिक्त उससे अधिक दूसरा लाभ नहीं मानता । जिस अवस्था में योगी बहुत बड़े दु:ख से भी चलायमान नहीं होता ।
(क्रमशः)

= सुन्दर पदावली(१५.राग सिंधूड़ो - १/२) =

#daduji

॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥ 
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली* 
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी, 
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान) 
*= १५.राग सिंधूड़ो =*
(१/२) 
*अंग उघाडै उतरि अषाडै परदल पाडै सूरा रे ।* 
*रहै हजूरि राम कै आगै मुष परि बरषै नूरा रे ॥३॥* 
*काम धणीं कौ सबै संबार्यौ साहिब कै मन भायौ रे ।* 
*कछू एक जस गुरु दादू कौ सुन्दरदास सुनायौ रे ॥४॥* 
वे विशाल जनसभाओं में भी एकाकी ही जाते हैं और वहाँ श्रद्धालु जनता को ऐसा हृदयोद्बोधक उपदेश करते हैं कि उसका जनता के हृदय पर तत्काल प्रभाव पड़ता है । इसका एकमात्र कारण यही प्रतीत होता है कि वे निरंतर भगवान् का नामस्मरण करते हैं । नामस्मरणकर्ता भक्त के वचन ऐसे प्रभावोत्पादक हो ही जाते हैं ॥३॥ 
उनने अपने स्वामी(भगवान्) की आज्ञा का पालन पूर्णत: कर दिया है । वह कार्य उनके मालिक(परमेश्वर) को भी अनुकूल प्रतीत हुआ । 
हमने अपने गुरुदेव के इन कुछ ही कृत्यों को स्पष्ट कर जनता को सुनाया है - ऐसा श्रीसुन्दरदासजी महाराज कहते हैं ॥४॥ 
(क्रमशः)

= ८६ =

🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*साहिब का उनहार सब, सेवक मांही होइ ।*
*दादू सेवक साधु को, दूजा नांही कोइ ॥* 
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साभार ~ @Dr.ghanshyam garg यथार्थ ज्ञान (G+)

*गया तीर्थ की कथा* 

ब्रह्माजी जब सृष्टि की रचना कर रहे थे उस दौरान उनसे असुर कुल में गया नामक असुर की रचना हो गई । गया असुरों के संतान रूप में पैदा नहीं हुआ था इसलिए उसमें आसुरी प्रवृति नहीं थी । वह देवताओं का सम्मान और आराधना करता था । 
उसके मन में एक खटका था । वह सोचा करता था कि भले ही वह संत प्रवृति का है लेकिन असुर कुल में पैदा होने के कारण उसे कभी सम्मान नहीं मिलेगा । इसलिए क्यों न अच्छे कर्म से इतना पुण्य अर्जित किया जाए ताकि उसे स्वर्ग मिले । 
गयासुर ने कठोर तप से भगवान श्री विष्णुजी को प्रसन्न किया । भगवान ने वरदान मांगने को कहा तो गयासुर ने मांगा - आप मेरे शरीर में वास करें । जो मुझे देखे उसके सारे पाप नष्ट हो जाएं । वह जीव पुण्यात्मा हो जाए और उसे स्वर्ग में स्थान मिले । भगवान से वरदान पाकर गयासुर घूम-घूमकर लोगों के पाप दूर करने लगा । जो भी उसे देख लेता उसके पाप नष्ट हो जाते और स्वर्ग का अधिकारी हो जाता । 
इससे यमराज की व्यवस्था गड़बड़ा गई । कोई घोर पापी भी कभी गयासुर के दर्शन कर लेता तो उसके पाप नष्ट हो जाते । यमराज उसे नर्क भेजने की तैयारी करते तो वह गयासुर के दर्शन के प्रभाव से स्वर्ग मांगने लगता । यमराज को हिसाब रखने में संकट हो गया था । 
यमराज ने ब्रह्माजी से कहा कि अगर गयासुर को न रोका गया तो आपका वह विधान समाप्त हो जाएगा जिसमें आपने सभी को उसके कर्म के अनुसार फल भोगने की व्यवस्था दी है । पापी भी गयासुर के प्रभाव से स्वर्ग भोंगेगे । 
ब्रह्माजी​ ने उपाय निकाला । उन्होंने गयासुर से कहा कि तुम्हारा शरीर सबसे ज्यादा पवित्र है इसलिए तुम्हारी पीठ पर बैठकर मैं सभी देवताओं के साथ यज्ञ करुंगा । 
उसकी पीठ पर यज्ञ होगा यह सुनकर गया​ सहर्ष तैयार हो गया । ब्रह्माजी सभी देवताओं के साथ पत्थर से गया को दबाकर बैठ गए । इतने भार के बावजूद भी वह अचल नहीं हुआ । वह घूमने-फिरने में फिर भी समर्थ था । 
देवताओं को चिंता हुई । उन्होंने आपस में सलाह की कि इसे श्री विष्णु ने वरदान दिया है इसलिए अगर स्वयं श्री हरि भी देवताओं के साथ बैठ जाएं तो गयासुर अचल हो जाएगा । श्री हरि भी उसके शरीर पर आ बैठे । 
श्री विष्णु जी को भी सभी देवताओं के साथ अपने शरीर पर बैठा देखकर गयासुर ने कहा - आप सब और मेरे आराध्य श्री हरि की मर्यादा के लिए अब मैं अचल हो रहा हूं । घूम-घूमकर लोगों के पाप हरने का कार्य बंद कर दूंगा । 
लेकिन मुझे चूंकि श्री हरि का आशीर्वाद है इसलिए वह व्यर्थ नहीं जा सकता इसलिए श्री हरि आप मुझे पत्थर की शिला बना दें और यहीं स्थापित कर दें । 
श्री हरि उसकी इस भावना से बड़े खुश हुए । उन्होंने कहा - गया अगर तुम्हारी कोई और इच्छा हो तो मुझसे वरदान के रूप में मांग लो । 
गया ने कहा - "हे नारायण मेरी इच्छा है कि आप सभी देवताओं के साथ अप्रत्यक्ष रूप से इसी शिला पर विराजमान रहें और यह स्थान मृत्यु के बाद किए जाने वाले धार्मिक अनुष्ठानों के लिए तीर्थस्थल बन जाए ।" 
श्री विष्णु ने कहा - गया तुम धन्य हो । तुमने लोगों के जीवित अवस्था में भी कल्याण का वरदान मांगा और मृत्यु के बाद भी मृत आत्माओं के कल्याण के लिए वरदान मांग रहे हो । तुम्हारी इस कल्याणकारी भावना से हम सब बंध गए हैं । 
भगवान ने आशीर्वाद दिया कि जहां गया स्थापित हुआ वहां पितरों के श्राद्ध-तर्पण आदि करने से मृत आत्माओं को पीड़ा से मुक्ति मिलेगी । क्षेत्र का नाम गयासुर के अर्धभाग गया नाम से तीर्थ रूप में विख्यात होगा । मैं स्वयं यहां विराजमान रहूंगा । 
इस तीर्थ से समस्त मानव जाति का कल्याण होगा । साथ ही वहा भगवान *श्री विष्णुजी​* ने अपने पैर का निशान स्थापित किया जो आज भी वहा के मंदिर में दर्शनीय है । गया विधि के अनुसार श्राद्ध फल्गू नदी के तट पर विष्णु पद मंदिर में व अक्षयवट के नीचे किया जाता है । वह स्थान बिहार के गया में हुआ जहां श्राद्ध आदि करने से पितरों का कल्याण होता है । 
पिंडदान की शुरुआत कब और किसने की, यह बताना उतना ही कठिन है जितना कि भारतीय धर्म-संस्कृति के उद्भव की कोई तिथि निश्चित करना । परंतु स्थानीय पंडों का कहना है कि सर्व प्रथम सतयुग में ब्रह्माजी ने पिंडदान किया था । महाभारत के 'वन पर्व' में भीष्म पितामह और पांडवों की गया-यात्रा का उल्लेख मिलता है । श्रीराम ने महाराजा दशरथ का पिण्ड दान यहीं(गया) में किया था । गया के पंडों के पास साक्ष्यों से स्पष्ट है कि मौर्य और गुप्त राजाओं से लेकर कुमारिल भट्ट, चाणक्य, रामकृष्ण परमहंस व चैतन्य महाप्रभु जैसे महापुरुषों का भी गया में पिंडदान करने का प्रमाण मिलता है । गया में फल्गू नदी प्रायः सूखी रहती है । इस संदर्भ में एक कथा प्रचलित है । 
भगवान श्री राम अपनी पत्नी सीताजी के साथ पिता दशरथ का श्राद्ध करने गयाधाम पहुंचे । श्राद्ध कर्म के लिए आवश्यक सामग्री लाने वे चले गये । तब तक राजा दशरथ की आत्मा ने पिंड की मांग कर दी । फल्गू नदी तट पर अकेली बैठी सीताजी अत्यंत असमंजस में पड़ गई । माता सीताजी​ ने फल्गु नदी, गाय, वटवृक्ष और केतकी के फूल को साक्षी मानकर पिंडदान कर दिया । जब भगवान श्री राम आए तो उन्हें पूरी कहानी सुनाई, परंतु भगवान को विश्वास नहीं हुआ । 
तब जिन्हें साक्षी मानकर पिंडदान किया था, उन सबको सामने लाया गया । पंडा, फल्गु नदी, गाय और केतकी फूल ने झूठ बोल दिया परंतु अक्षयवट ने सत्यवादिता का परिचय देते हुए माता की लाज रख ली... इससे क्रोधित होकर सीताजी ने फल्गू नदी को श्राप दे दिया कि तुम सदा सूखी रहोगी जबकि गाय को मैला खाने का श्राप दिया केतकी के फूल को पितृ पूजन मे निषेध का । 
वटवृक्ष पर प्रसन्न होकर सीताजी ने उसे सदा दूसरों को छाया प्रदान करने व लंबी आयु का वरदान दिया । तब से ही फल्गू नदी हमेशा सूखी रहती हैं, जबकि वटवृक्ष अभी भी तीर्थ यात्रियों को छाया प्रदान करता है । आज भी फल्गू तट पर स्थित सीता कुंड में बालू का पिंड दान करने की क्रिया(परंपरा) संपन्न होती है । 
॥ जयश्रीकृष्ण ॥