शनिवार, 29 फ़रवरी 2020

*माया का अंग १०७*(१३/१६)* =

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*जीव गहिला जीव बावला, जीव दीवाना होइ ।*
*दादू अमृत छाड़ कर, विष पीवै सब कोइ ॥*
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ Mahant Ram Gopal Das Tapasvi
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*माया का अंग १०७*
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माया तरुवर पत्र घट१, इक उपजै इक जांहिं । 
रज्जब पूरण दशों दिशि, रीती कबहुं नाँहिं ॥१३॥
जैसे वृक्ष में पत्ता एक उत्पन्न होता है और एक गिर जाता है, वैसे ही इस माया रूप संसार में एक शरीर१ जन्मता है और एक मरता है किन्तु दशों दिशाओं में यह संसार-रूप माया मनुष्यादि से परिपूर्ण है, खाली कभी भी नहीं होती । 
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ज्यों सूरज दीसे समुद्र में, मीन मरे नहिं कोय । 
त्यों रज्जब माया मगन, हरि गुण लिप्त१ न होय ॥१४॥
जैसे सूर्य का प्रतिबिंब समुद्र में मच्छियों को दिखता है किन्तु उसके ताप से मच्छी मरती, वैसे ही जो माया में निमग्न है वह हरि-गुण-गान में अनुरक्त१ नहीं होता । 
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पड़दा परवत पलक का, उभय एक करि जानि । 
जन रज्जब जोख्यों१ इहै, हरि देखन की हानि ॥१५॥
पर्वत तथा पलक दोनों ही पड़दे एक जैसे जानो, दोनों से दृष्टि रुकती है, वैसे ही माया थोड़ी वा अधिक दोनों ही ब्रह्म के साक्षात्कार करने में हानि१कारक है । 
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ना मरदों भुगती नहीं, मरद गये करि त्याग । 
रज्जब रिधि१ क्वारी२ रही, पुरुष पाणि३ नहिं लाग ॥१६॥ 
नामर्द तो भोग न सके और मर्द त्यागकर विरक्त हो गये, पुरुष का हाथ३ न लगने से माया१ कुमारी२ ही रही ।
(क्रमशः)

= २०० =

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*श्री दादू अनुभव वाणी, द्वितीय भाग : शब्द*
*राग रामकली ८ (गायन समय प्रभात ३ से ६)*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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२०० - अत्यन्त निर्मल उपदेश । दादरा
चल रे मन ! जहां अमृत वनाँ, 
निर्मल नीके सँत जनाँ ॥टेक॥
निर्गुण नाँव फल अगम अपार, 
सँतन जीवन प्राण अधार ॥१॥
सीतल छाया सुखी सरीर, 
चरण सरोवर निर्मल नीर ॥२॥
सुफल सदा फल बारह मास, 
नाना वाणी धुनि प्रकाश ॥३॥
तहां बासे बसे अमर अनेक, 
तहँ चलि दादू इहै विवेक ॥४॥
२०० - २०१ में अत्यन्त निर्मल उपदेश कर रहे हैं - अरे मन ! जहां सत्संग रूप अमृत वन है, वहां ही चल, उस वन में परम निर्मल सँत - वृक्ष हैं । 
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उन वृक्षों में निर्गुण ब्रह्म का नाम - फल प्राप्त होता है, जिसका चिन्तन रूप भक्षण करने से सन्तों का जीवन - प्राणाधार, मन इन्द्रियों का अविषय अपार प्रभु प्राप्त होता है । 
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उस वन के सँत - वृक्षों की शान्ति छाया शीतल है, उससे शरीर सुखी होता है । भगवत् - चरण सरोवर है, उसका ध्यान - जल प्राणी को निर्मल करता है । 
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इस वन के नाम, ज्ञान आदि सभी फल सुन्दर हैं और यह वन बारह मास सदा ही फल देता है । इस वन में इष्ट - पूर्ति, नीति, सदाचार, भक्ति, योग और ज्ञानादिक गर्वित नाना वाणी रूप ध्वनि प्रकट होती रहती है । 
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सत्संग वन में निवास करके अनेक साधक अमर हो गये हैं । अत: वहां ही चलना चाहिये । इस सत्संग - वन में ही विवेक - ज्ञान प्राप्त होता है ।
(क्रमशः)

= १५४ =

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*मैं मेरे में हेरा,*
*मध्य मांहिं पीव नेरा ॥टेक॥*
*जहाँ अगम अनूप अवासा,*
*तहँ महापुरुष का वासा ।*
*तहँ जानेगा जन कोई,*
*हरि मांहि समाना सोई ॥१॥*
*अखंड ज्योति जहँ जागै,*
*तहँ राम नाम ल्यौ लागै ।*
*तहँ राम रहै भरपूरा,*
*हरि संग रहै नहिं दूरा ॥२॥*
*तिरवेणी तट तीरा,*
*तहँ अमर अमोलक हीरा ।*
*उस हीरे सौं मन लागा,*
*तब भरम गया भय भागा ॥३॥*
*दादू देख हरि पावा,*
*हरि सहजैं संग लखावा ।*
*पूरण परम निधाना,*
*निज निरखत हौं भगवाना ॥४॥*
*(श्री दादूवाणी ~ पद. ७८)*
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साभार ~ महन्त Ram Gopal तपस्वी
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बास बासंत तहां प्रगटया षेलं ।
द्वादस अंगुल गगन धरि मेलं ।
बदंत गोरष पूतां होइबा चिराई ।
न पडंत काया न जम धरि जाई ॥११६॥
जहां ब्रह्म के निवास की दिव्य सुगंध विद्यमान है वहां दिव्य ज्योति की लीला अनवरत चल रही है । योगी जन नासिका से बाहर वायु की गति बारह अंगुल तक मानते हैं, प्राण -संयम के द्वारा इसकी गति को न्यून कर भीतर ही समाहित कर ब्रह्मरंध्र गामी हो जाने पर गोरख कहते हैं कि योगी चिरायु हो जाता है, उसकी काया अमरता को प्राप्त होती है वहां यम(मृत्यु) का प्रवेश नहीं हो पाता है ।
#### श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ####
### श्री नारायणदासजी पुष्कर, अजमेर ###
^^^^^^^//सत्य राम सा//^^^^^^^

= १५३ =

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*दादू साचा साहिब सेविये, साची सेवा होइ ।*
*साचा दर्शन पाइये, साचा सेवक सोइ ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ साँच का अंग)*
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साभार ~ महन्त Ram Gopal तपस्वी
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*श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु,* *अतिथि*
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दामोदर ब्राह्मण कांचीपुरी में रहा करते थे । सन्तान नहीं थी । पति-पत्नी दो ही थे । भिक्षा से निर्वाह करते थे और आये हुए अतिथि का भी उसी से सत्कार करते थे । एक दिन भगवान् वृद्ध(बूढा) विप्र रूप में अतिथि हुये । उस रोज दामोदर को भिक्षा भी न मिली थी, दोनों भूखे थे । अतिथि की बड़ी चिन्ता हुई । पत्नी ने अपने सिर के केश काटकर डोरी बना, पति के हाथ बाजार में बिकवा के अन्न मँगाकर अतिथि को भोजन दिया था । इससे प्रसन्न हो भगवान् ने उन्हें उसी रात्रि में धनाढय बना दिया तथा स्त्री के केश भी पूर्ववत कर दिये थे ।
अतिथिन हित घर भक्त के, कुछ न अदेय सुजान ।
दामोदर तिय काट कच, अन्न दिया सुख भान ॥२०॥
#### श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ####
### श्री नारायणदासजी पुष्कर, अजमेर ###
^^^^^^^//सत्य राम सा//^^^^^^^

*सर्वधर्मसमन्वय*



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*दादू माता प्रेम का, रस में रह्या समाइ ।*
*अन्त न आवै जब लगै, तब लग पीवत जाइ ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ परिचय का अंग)*
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*साभार ~ श्रीरामकृष्ण-वचनामृत{श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली),
कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)}*
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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परिच्छेद ५
*बलराम के मकान पर श्रीरामकृष्ण तथा प्रेमानन्द में नृत्य*
(१)
रात के आठ-मौ बजे का समय होगा-होली के सात दिन बाद । राम, मनोमोहन, राखाल, नृत्यगोपाल आदि भक्तगण श्रीरामकृष्ण को घेरकर खड़े हैं । सभी लोग हरिनाम का संकीर्तन करते करते तन्मय हो गए हैं । कुछ भक्तों की भावावस्था हुई है । भावावस्था में नृत्यगोपाल का वक्षःस्थल लाल हो गया है ।
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सब के बैठने पर मास्टर ने श्रीरामकृष्ण को प्रणाम किया । श्रीरामकृष्ण ने देखा राखाल सोए हैं, भावमग्न, बाह्यज्ञान विहीन । वे उनकी छाती पर हाथ रखकर कह रहे हैं- ‘शान्त हो, शान्त हो ।’ राखाल की यह दूसरी बार भावावस्था थी । वे कलकत्ते में अपने पिता के साथ रहते हैं, बीच बीच में श्रीरामकृष्ण का दर्शन करने आ जाते हैं । इसके पूर्व उन्होंने श्यामपुकुर में विद्यासागर महाशय के स्कूल में कुछ दिन अध्ययन किया था ।
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श्रीरामकृष्ण ने मास्टर से दक्षिणेश्वर में कहा था, ‘मैं कलकत्ते में बलराम के घर जाऊँगा, तुम भी आना ।’ इसीलिये वे उनका दर्शन करने आए हैं । फाल्गुन कृष्णा सप्तमी, शनिवार, ११ मार्च १८८२ ई. । श्रीयुत बलराम श्रीरामकृष्ण को निमत्रण देकर लाए हैं ।
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अब भक्तगण बरामदे में बैठे प्रसाद पा रहे हैं । दासवत् बलराम खड़े हैं । देखने से समझा नहीं जाता कि वे इस मकान के मालिक हैं ।
मास्टर श्रीरामकृष्ण के पास कुछ दिनों से आने लगे हैं । उनका अभी तक भक्तों के साथ परिचय नहीं हुआ है। केवल दक्षिणेश्वर में नरेन्द्र के साथ परिचय हुआ था ।
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(२)
*सर्वधर्मसमन्वय*
कुछ दिनों बाद श्रीरामकृष्ण दक्षिणेश्वर में शिव-मन्दिर की सीढ़ी पर भावाविष्ट होकर बैठे हैं । दिन के चार-पाँच बजे का समय होगा । मास्टर भी पास ही बैठे हैं ।
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थोड़ी देर पहले श्रीरामकृष्ण, उनके कमरे में फर्श पर जो बिस्तर बिछाया गया है, उस पर विश्राम कर रहे थे । अभी उनकी सेवा के लिए सदैव उनके पास कोई नहीं रहता था । हृदय के चले जाने के बाद से उनको कष्ट हो रहा है । कलकत्ते से मास्टर के आने पर वे उनके साथ बात करते करते श्रीराधाकान्त के मन्दिर के सामनेवाले शिव-मन्दिर की सीढ़ी पर आकर बैठे । मन्दिर देखते ही वे एकाएक भावाविष्ट हो गए हैं ।
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वे जगन्माता के साथ बातचीत कर रहे हैं, “माँ, सभी कहते हैं, मेरी घड़ी ठीक चल रही है । ईसाई, हिन्दू, मुसलमान सभी कहते हैं मेरा धर्म ठीक है, परन्तु माँ, किसी की भी तो घड़ी ठीक नहीं चल रही है । तुम्हें ठीक-ठीक कौन समझ सकेगा, परन्तु व्याकुल होकर पुकारने पर, तुम्हारी कृपा होने पर सभी पथों से तुम्हारे पास पहुँचा जा सकता है । माँ, ईसाई लोग गिर्जाघरों में तुम्हें कैसे पुकारते हैं, एक बार दिखा देना । परन्तु माँ, भीतर जाने पर लोग क्या कहेंगे? यदि कुछ गड़बड़ हो जाय तो? फिर लोग कालीमन्दिर में यदि न जाने दें तो फिर गिर्जाघर के दरवाजे के पास से दिखा देना ।”
(क्रमशः)

निहकर्मी पतिब्रता कौ अंग ८०/८३

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श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य । 
साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ 
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ महन्त Ram Gopal तपस्वी 
(श्री दादूवाणी ~ ८. निहकर्मी पतिब्रता कौ अंग) 
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*॥पतिव्रत॥* 
*दादू दूजा कुछ नहीं, एक सत्य कर जान ।* 
*दादू दूजा क्या करै, जिन एक लिया पहचान ॥८०॥* 
तत्व ज्ञान ही वास्तविक ज्ञान है । इससे भिन्न जो ज्ञान है, वह मिथ्याज्ञान होने से अज्ञान ही है । इस विषय में वैदिक दृष्टान्त प्रमाणरूप से दिया जाता है । 
हे सौम्य ! एक मृत्पिण्ड को जान लेने से सब कुछ मिट्टी से बनने वाले मृन्मय पात्र जाने जाते हैं । जितना भी नामधेय है वह सब वाणी का विकार है । मिट्टी ही सत्य है । इसका भाव यह है कि जो यह मृत्पिण्ड है, यह परमार्थ से मिट्टी ही है । इस प्रकार मृदात्मरूप से जान लेने पर सब मृन्मय घट शराब उदञ्चन आदि मृण्मय जान लिये जाते हैं । क्योंकि मिट्टी रूप होने से मिट्टी के अलावा उनमें कोई विशेषता नहीं दीखती । क्योंकि सब नाम ध्येय वाणी का विकार है । अर्थात् वाणी ही घट शराब उदञ्चन आदि से विकार को प्राप्त हो रही है । वस्तुतः विकार नाम का कोई पदार्थ है नहीं । किन्तु नामध्येयमात्र मिथ्या है, केवल मिट्टी ही सत्य है । यह दृष्टान्त ब्रह्म की सत्यता में दिया जाता है । दार्ष्टांत भी ब्रह्म से भिन्न जितना भी कार्य है उसका अभाव ही ब्रह्म में प्रतीत होता है । अन्य श्रुतियों में भी ब्रह्म का एकत्व प्रतिपादन किया हुआ है । जैसे यह सब आत्मा ही है । वही सत्य है । जो सत्य है, वही आत्मा है । हे जीव तू ब्रह्मस्वरूप है । जो कुछ है वह आत्मा है । आत्मा ही सब कुछ है ब्रह्म ही सब कुछ है । जो नानात्व प्रतीत हो रहा है, वह मिथ्या है, इन सब श्रुतियों से आत्मा का एकत्व सत्यत्व प्रतिपादन किया गया है । इस प्रकार जिस जिज्ञासु ने भोग्य भोक्ता आदि सकल प्रपञ्च का ब्रह्म से अतिरिक्त मिथ्यात्व जान लिया, उसको द्वैत से क्या प्रयोजन है । 
*दादू कोई वांछै मुक्ति फल, कोइ अमरापुर वास ।* 
*कोई वांछै परमगति, दादू राम मिलन की प्यास ॥८१॥* 
कितने ही साधक भक्त सालोक्य सामीप्य सायुज्य सारुप्य नामक चार मुक्तियों को चाहते हैं । कितने ही स्वर्गीय सुख की कामना करते हैं, कितने ही परम गति को प्राप्त करके अपने को सुखी मानते हैं । किन्तु श्री दादूजी महाराज तो दर्शन की अभिलाषा के कारण दर्शन ही चाहते हैं, अन्य कुछ नहीं । भगवत्प्रिय भक्तों का यही लक्षण कहा है कि- 
“जिसने अपने मन और आत्मा को भगवान् में लगा रखा है वह भक्त ब्रह्मलोक प्राप्त होने पर भी उसको नहीं चाहता, न इन्द्र का साम्राज्य स्वर्ग को, न पृथ्वी पर सार्वभौम राज्य, न पाताल का राज्य, न योगजन्य ऋद्धि सिद्धियों को, न मोक्ष को चाहता है । किन्तु सदा दर्शन ही चाहता है । वह ही भगवान् का परमप्रिय भक्त होता है ।” 
*तुम हरि हिरदै हेत सौं, प्रगटहु परमानन्द ।* 
*दादू देखै नैन भर, तब केता होइ आनन्द ॥८२॥* 
मैं साधन विहीन हूं और आप भक्तवत्सल हैं । अतः हरे ! आप ही कृपा करके मेरे हृदय में रहते हुए भी बाहर प्रकट होकर दर्शन दीजिये । जिससे आपको बार-बार देखकर दर्शानन्द से तृप्त हो जाऊं । अहो ! जब आप प्रकट होकर दर्शन देंगे तब मुझे असीम आनन्द की प्राप्ति हो जायगी । भक्तिरसायन में लिखा है की- 
“हे कृष्ण जो महात्मा लोग आपके दर्शनों के लिये योग साधना करते हैं, उनको आपका प्रत्यक्ष दर्शन हो जाता है । यह वाणी सम्भव है, कुछ अर्थ रखती हो । लेकिन हम तो इस बात को बिलकुल मिथ्या मानती हैं, क्योंकि हमारा मन आपके संयोग में आसक्त हो रहा है, फिर भी आपके पवित्र दर्शन गोपियों को जो नहीं हो रहा है । अतः आप की वाणी बिलकुल मिथ्या है, क्योंकि योग की अपेक्षा संयोग का महत्व ज्यादा है ।” 
*प्रेम पियाला राम रस, हमको भावै येहि ।* 
*रिधि सिधि मांगैं मुक्ति फल, चाहैं तिनको देहि ॥८३॥* 
मैं तो प्रेम का प्यासा हूं, अतः हे भगवान् ! आप प्रेम से अपना निज रस(भक्ति रस) पिलाइये । मैं मुक्ति फल ऋद्धि सिद्धियों से प्राप्त होने वाला सुख भी नहीं चाहता हूँ । जो इनको चाहते हैं आप उनको दीजिये । मेरे को तो आप अपना प्रेम पिलाइये । क्योंकि जिसको जो प्रिय होता है, उसकी प्राप्ति से वह सुखी होता है । 
(क्रमशः)

शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2020

*माया का अंग १०७*(९/१२)* =

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*माया फाँसी हाथ ले, बैठी गोप छिपाहि ।*
*जे कोई धीजे प्राणियां, ताही के गल बाहि ॥*
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ Mahant Ram Gopal Das Tapasvi
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*माया का अंग १०७*
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धर१ धामन२ यहु पुरुष गति, सोवन३ सुत उनसार४ । 
रज्जब जातक५ जार के, भरमी भूलि भरतार ॥९॥
पृथ्वी१ तथा घर२ आदि पुरुष के समान हैं और सुवर्ण३ पुत्र के समान४ है, जीवात्मा रूप नारी उस जार पुत्र५ के मोह-वश भ्रम में पड़कर अपने स्वामी परब्रह्म को भूल गई है । 
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माया मारै मीच१ ह्वै, बिन बांछी२ ही आय । 
रज्जब सिध साधक डसे, सो टाली नहिं जाय ॥१०॥
माया बिना ईच्छा१ भी आती है और मृत्यु२ होकर मारती है । साधक तथा सिद्धों को भी सर्पणी के समान डसती है, वह किसी भी प्रकार टाली नहीं जाती । 
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जो माया मुनिवर गिलै१, सिध साधक से खाय । 
ता माया सौं हेत करि, रज्जब क्यों पतियाय२ ॥११॥
जो मुनियों में श्रेष्ठ हैं, उनको भी माया निगल१ जाती है, सिद्ध साधकों को भी खाती है, उस माया से प्रेम करके सुखी होने का विश्वास२ क्यों करता है ?
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एक गये नट नाचि करि, एक कछे१ अब आय । 
जन रज्जब इक आयसी, बाजी रची खुदाय ॥१२॥
जसे नाटय शाला में एक नट नाचकर जाता है, एक स्वांग१ बनाकर अब आया है और एक आगे आयेगा, वैसे ही ईश्वर रूप बाजीगर ने यह संसार-माया रूप बाजी रची है, इसमें एक जन्म कर मर रहा है एक जन्म रहा है और एक आगे जन्मेगा ।
(क्रमशः)

= १९९ =

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*श्री दादू अनुभव वाणी, द्वितीय भाग : शब्द*
*राग रामकली ८ (गायन समय प्रभात ३ से ६)*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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१९९ - सँत समागम प्रार्थना । दादरा
निरंजन नाम के रस माते, कोई पूरे प्राणी राते ॥टेक॥
सदा सनेही राम के, सोई जन साचे ।
तुम बिन और न जानहीं, रँग तेरे ही राचे ॥१॥
आन न भावै एक तूँ, सति साधु सोई ।
प्रेम पियासे पीव के, ऐसा जन कोई ॥२॥
तुमहीं जीवन उर रहे, आनन्द अनुरागी ।
प्रेम मगन पिव प्रीतड़ी, लै तुम सौं लागी ॥३॥
जे जन तेरे रंग रंगे, दूजा रंग नांहीं ।
जन्म सुफल कर लीजिये, दादू उन माँहीं ॥४॥
सँतों का समागम प्राप्त होने की प्रार्थना कर रहे हैं - जो कोई प्राणी पूर्ण रूप से निरंजन राम के नाम - चिन्तन रस में अनुरक्त होकर मस्त हैं और सदा राम - स्वरूप के प्रेमी हैं, वे ही जन सच्चे हैं 
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और हे प्रभो ! जो आपके बिना अन्य किसी को भी सत्य नहीं जानते, आपकी भक्ति रूप रँग में ही रत हैं 
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उनको अन्य कुछ भी प्रिय नहीं लगता, एक आप ही प्रिय लगते हैं, वे सच्चे साधु हैं । जिसके मन इन्द्रियादि एक मात्र प्रभु - प्रेम के ही प्यासे हों । ऐसा भक्त कोई विरला ही होता है । 
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उसके हृदय में आप ही जीवन रूप से रहते हैं । वह आपके स्वरूपानन्द का ही प्रेमी होता है । अपने प्रियतम आपके प्रेम में मग्न रहता है, उसकी वृत्ति आप से ही लगी रहती है । 
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इस प्रकार जो भक्त आपके भक्ति - रँग में रँगे हुये हैं, उनके हृदय पर दूसरा रँग नहीं चढ़ता । हमारा भी निवेदन है कि - उन सँतों के समागम में रहकर अपने जीवन को सफल करें ।
(क्रमशः)

= १५२ =

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*पर उपकारी संत जन, साहिब जी तेरे ।*
*जाती देखी आतमा, राम कहि टेरे ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ साधु का अंग)*
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साभार ~ महन्त Ram Gopal तपस्वी
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*श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु,* *परोपकार*
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एक ब्राह्मण की गायें चोर ले गये । ब्राह्मण ने राजद्वार पर आकर पुकार लगाई । अर्जुन ने उसे आश्वासन दिया और अपने शस्त्र लाने महल में गये, तब ज्ञात हुआ कि शस्त्रों के स्थान में युधिष्ठिर द्रौपदी के साथ एकान्त में है, वहां जाने से नियम भंग होगा । (पांचों पांडवों ने द्रौपदी के लिये एक नियम बना रखा था कि प्रत्येक भाई दो महिने बारह दिन द्रौपदी के पास रहे । एक के समय में दूसरा जायेगा तो उसे १२ वर्ष वनवास भोगना होगा) और वन जाना होगा । अन्त में परहित के लिए वनवास भोगना निश्चय कर महल में जाकर शस्त्र ले आये और ब्राह्मण की गायें छुड़ा दी, तथा वन को चले गये ।
सज्जन परहित के लिये, तजें सुखों की आस ।
अर्जुन ने परहित लिये, अपनाया बनवास ॥८॥
#### श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ####
### श्री नारायणदासजी पुष्कर, अजमेर ###
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= १५१ =

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*परमार्थ को राखिये, कीजे पर उपकार ।*
*दादू सेवक सो भला, निरंजन निराकार ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ साधु का अंग)*
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साभार ~ महन्त Ram Gopal तपस्वी
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*श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु,* *परोपकार*
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रावण की रानी मन्दोदरी पूर्व जन्म में गिलहरी नामक जन्तु थी । एक ऋषि आश्रम के वृक्ष पर रहा करती थी । एक दिन ऋषियों का समिष्टि भोजन था, वृक्ष पर से खीर के कटाह(कड़ाह) में एक काला सर्प गिर पड़ा । उसके गिरने का किसी को पता नही था, उपरोक्त गिलहरी ने देख लिया था । जब जीमने के लिये पंक्ति बैठी, तब गिलहरी ने यह सोचकर कि सर्प-विषयुक्त खीर को खाकर ऋषि लोग मर जायेंगे । 
उनको बचाने के लिये सबके देखते देखते खीर के कड़ाह में जा गिरी । ऋषियों ने कहा - "इसमें यह जन्तु गिर गया है अब इसे गिरा दो ।" नीचे गिराते ही उसमें काला सर्प निकला । तब योग्य ऋषियों ने ध्यान द्वारा देखकर गिलहरी का बड़ा उपकार माना और शुभाशीश दिया । उसी के प्रताप से वह दूसरे जन्म में मय दानव की पुत्री मन्दोदरी होकर रावण की पटरानी हुई थी ।
होती परोपकार से, उन्नति संशय नांहि ।
मंदोदरी गिलहरी से, गिर कटाह के मांहि॥११॥
#### श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ####
### श्री नारायणदासजी पुष्कर, अजमेर ###
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*निःसंग*

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*सुरति सदा साबति रहै, तिनके मोटे भाग ।*
*दादू पीवैं राम रस, रहैं निरंजन लाग ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ लै का अंग)*
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*साभार ~ श्रीरामकृष्ण-वचनामृत{श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)}*
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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(२)
त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं, 
त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ।
त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता, 
सनातनस्त्वं पुरुषो मतो में ॥ (गीता, ११।१८)
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अन्तरंग भक्तों के संग में । ‘मैं कौन हूँ’?
पाँच बजे हैं । भक्त लोग अपने अपने घर चले गए । सिर्फ मास्टर और नरेन्द्र रह गए । नरेन्द्र मुँह-हाथ धोने के लिए गए । मास्टर भी बगीचे में इधर-उधर घूमते रहे । थोड़ी देर बाद कोठी की बगल से ‘हँस तालाब’ की ओर आते हुए उन्होंने देखा कि तालाब की दक्षिण तरफवाली सीढ़ी के चबूतरे पर श्रीरामकृष्ण खड़े हैं और नरेन्द्र भी हाथ में गडुआ लिए खड़े हैं । श्रीरामकृष्ण कहते हैं, “देख, और जरा ज्यादा आया-जाया करना-तूने हाल ही में आना शुरू किया है न? पहली जान-पहचान के बाद सभी लोग कुछ ज्यादा आया करते हैं, जैसे नया पति । (नरेन्द्र और मास्टर हँसे ।) क्यों, आएगा नहीं?” नरेन्द्र ब्राह्मसमाजी लड़के हैं, हँसते हुए कहा, “हाँ, कोशिश करूँगा ।”
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फिर सभी कोठी की राह से श्रीरामकृष्ण के कमरे की ओर आने लगे । कोठी के पास श्रीरामकृष्ण ने मास्टर से कहा, “देखो, किसान बाजार से बैल खरीदते हैं । वे जानते हैं कि कौन सा बैल अच्छा है और कौन सा बुरा । वे पूँछ के नीचे हाथ लगाकर परखते हैं । कोई कोई बैल पूँछ पर हाथ लगाने से लेट जाते हैं । वे ऐसे बैल नहीं खरीदते । पर जो बैल पूँछ पर हाथ रखते ही बड़ी तेजी से कूद पड़ता है, उसी बैल को वे चुन लेते हैं । नरेन्द्र इसी बैल की जाति का है । भीतर खूब तेज है ।” यह कहकर श्रीरामकृष्ण मुस्कराने लगे । “फिर कोई कोई ऐसे होते हैं कि मानो उनमें जान ही नहीं है-न जोर है, न दृढ़ता ।”
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सन्ध्या हुई । श्रीरामकृष्ण ईश्वर-चिन्तन करने लगे । उन्होंने मास्टर से कहा, “तुम जाकर नरेन्द्र से बातचीत करो, और फिर मुझे बताना कि वह कैसा लड़का है ।”
आरती हो चुकी । मास्टर ने बड़ी देर में नरेन्द्र को चाँदनी के पश्चिम की तरफ पाया । आपस में बातचीत होने लगी । नरेन्द्र ने कहा कि मैं साधारण ब्राह्मसमाजी हूँ, कालेज में पढ़ता हूँ, इत्यादि ।
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रात हो गयी । अब मास्टर घर जाएँगे, पर जाने को जी नहीं चाहता; इसलिये नरेन्द्र से बिदा होकर वे फिर श्रीरामकृष्ण को ढूँढ़ने लगे । उनका गीत सुनकर मास्टर मुग्ध हो गए हैं । जी चाहता है कि फिर उनके श्रीमुख से गीत सुनें । ढूँढ़ते हुए देखा कि कालीमाता के मन्दिर के सामने जो नाट्यमण्डप है, उसी में श्रीरामकृष्ण अकेले टहल रहे हैं । मन्दिर में मूर्ति के दोनों तरफ दीपक जल रहे थे । विस्तृत नाट्यमण्डप में एक लालटेन जल रही थी । रोशनी धीमी थी । प्रकाश और अँधेरे का मिश्रण-सा दीख पड़ता था ।
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मास्टर श्रीरामकृष्ण का गीत सुनकर मुग्ध हो गए हैं, जैसे साँप मन्त्रमुग्ध हो जाता है । अब बड़े संकोच से उन्होंने श्रीरामकृष्णदेव से पूछा, “क्या आज फिर गाना होगा?” श्रीरामकृष्ण ने जरा सोचकर कहा, “नहीं, आज अब न होगा ।” यह कहते ही मानो उन्हें फिर याद आयी और उन्होंने कहा, “हाँ, एक काम करना । मैं कलकत्ते में बलराम के घर जाऊँगा, तुम भी आना, वहाँ गाना होगा ।”
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मास्टर- आपकी जैसी आज्ञा ।
श्रीरामकृष्ण- तुम जानते हो बलराम बसु को ?
मास्टर- जी नहीं ।
श्रीरामकृष्ण- बलराम बसु-बोसपाड़ा में उनका घर है ।
मास्टर- जी मैं पूछ लूँगा । 
श्रीरामकृष्ण(मास्टर के साथ टहलते हुए)- अच्छा, तुमसे के एक बात पूछता हूँ- मुझे तुम क्या समझते हो ?
मास्टर चुप रहे श्रीरामकृष्ण ने फिर से पूछ, “तुम्हें क्या मालुम होता है? मुझे कितने आने ज्ञान हुआ है ?”
मास्टर- ‘आने’ की बात तो मैं नहीं जानता पर ऐसा ज्ञान, या प्रेमभक्ति, या विश्वास, या वैराग्य, या उदार भाव मैंने और कहीं कभी नहीं देखा । श्रीरामकृष्ण हँसने लगे ।
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इस बातचीत के बाद मास्टर प्रणाम करके विदा हुए । फाटक तक जाकर फिर कुछ याद आयी, उल्टे पाँव लौटकर फिर श्रीरामकृष्णदेव के पास नाट्यमण्डप में हाजिर हुए । 
उस धीमी रोशनी में श्रीरामकृष्ण अकेले टहल रहे थे-निःसंग-जैसे सिंह वन में अकेला अपनी मौज में फिरता रहता है । आत्माराम, और किसी की अपेक्षा नहीं ।
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विस्मित होकर मास्टर उन महापुरुष को देखने लगे ।
श्रीरामकृष्ण(मास्टर से)- क्यों जी, फिर क्यों लौटे ?
मास्टर- जी, वे अमीर आदमी होंगे-शायद मुझे भीतर न आने दें-इसीलिये सोच रहा हूँ कि वहाँ न जाऊँगा, यहीं आकर आपसे मिलूँगा ।
श्रीरामकृष्ण- नहीं जी, तुम मेरा नाम लेना । कहना कि मैं उनके पास जाऊँगा, बस कोई भी तुम्हें मेरे पास ले आएगा ।
“जैसी आपकी आज्ञा”- कहकर मास्टर ने फिर प्रणाम किया और वहाँ से विदा हुए ।
(क्रमशः)

निहकर्मी पतिब्रता कौ अंग ७६/७९

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श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य । 
साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ 
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ महन्त Ram Gopal तपस्वी 
(श्री दादूवाणी ~ ८. निहकर्मी पतिब्रता कौ अंग) 
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*दादू टीका राम को, दूसर दीजे नांहि ।*
*ज्ञान ध्यान तप भेष पक्ष, सब आये उस मांहि ॥७६॥*
ज्ञान ध्यान तप सन्यास से जो फल मिलता है, वह सब भगवान् राम की उपासना से प्राप्त हो जाता है । राम शब्द से ब्रह्म का बोध समझना । नाम भेद से अर्थ में भेद नहीं हुआ करता है । जैसे घट कलश इनमें वर्णभेद होने पर भी कोई भेद नहीं है । पुराण में लिखा है कि-राम इन्द्र, कृष्ण, हरि, शम्भु, शिव, यह सब शब्द ब्रह्म का ही बोध कराते हैं । जैसे घट और कलश इन में जरा सा भी अर्थ में भेद नहीं है । ब्रह्म, शंकर, इन्द्र, आत्मा तथा चराचर जगत् इन सब के अवसान की सीमा विश्वेश आप ही हैं । क्योंकि सारे वेद वेदांग सारे जगत् का कारण आपको ही बतलाते हैं । अतः ब्रह्म की उपासना ही श्रेष्ठ उपासना है ।
*साधू राखै राम को, संसारी माया ।*
*संसारी पल्लव गहै, मूल साधू पाया ॥७७॥*
भक्त तथा संसारी पुरुषों में बहुत भेद है । भक्त तो भगवान् को भजते हुए अपने हृदय में भगवान् को धारण करते हैं । संसारी पुरुष कामनाओं से प्रेरित होकर नाना देवी-देवताओं की उपासना और माया का ही चिन्तन करते हैं इससे वे माया को धारण करने से जन्म मरण रूपी चक्र में पड़ते रहते हैं और भक्त संसार से मुक्त हो जाते हैं ।
*॥आन लगनि विभचार॥* 
*दादू जे कुछ कीजिये, अविगत बिन आराध ।*
*कहबा सुनबा देखबा, करबा सब अपराध ॥७८॥*
*सब चतुराई देखिए, जे कुछ कीजै आन ।* 
*दादू आपा सौंपि सब, पीव को लेहु पिछान ॥७९॥*
मनुष्य जो जो भी कर्म करता है, सुनता बोलता देखता है वह सब अपराध ही है, जो कुछ चतुराई है वह भी बन्धन का कारण होने से दुःख रूप ही है । अतः सब कुछ परमात्मा को समर्पण करके उसका भजन ही करना चाहिये । लिखा है कि वही कर्म अच्छा है जिससे भगवान् प्रसन्न हो । विद्या भी वही है जिससे भगवान् का ज्ञान प्राप्त हो । भागवत में लिखा है- 
जो भगवान् के पराक्रम की गाथाओं को कान से नहीं सुनता उसके कान सर्पों के रहने के लिये बिल के समान हैं । जिसकी जिव्हा भगवान् के गुणों को नहीं गाती तो वह मैंढक की जीभ की तरह व्यर्थ बकवाद करनी वाली है । जो मस्तक भगवान् के चरण कमलों में नमस्कार नहीं करता, वह उसके शरीर पर बोझा ही है । चाहे कितने ही भूषण धारण कर रखे हों । जो हाथ भगवान् की सेवा न करते हों तो वे चाहे कितनें सुवर्ण भूषणों से युक्त क्यों नहीं हों, परन्तु वे मुर्दे के हाथ की तरह होते हैं, नेत्रों से जिन्होंने भगवान् की मूर्ति के दर्शन नहीं किये, वह नेत्र मोर के चंदवे की तरह देखने मात्र के लिये ही है । जो पैरों से चल कर भगवान के मन्दिर में नहीं जाता तो उसके पैर, पेड की तरह ही है । जिस का हृदय भगवान् के नामों का उच्चारण करते हुए प्रफुल्लित नहीं होता । शरीर में रोमावली हर्षित नहीं होती नेत्रों में अश्रु धारा नहीं बहे तो वह हृदय पत्थर की तरह कठोर ही है । अतः परमात्मा को जानने में ही जन्म की सार्थकता है ।
(क्रमशः)

गुरुवार, 27 फ़रवरी 2020

*माया का अंग १०७*(५/८)* =

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*दादू माया कारण जग मरै, पीव के कारण कोइ ।*
*देखो ज्यों जग परजलै, निमष न न्यारा होइ ॥*
===================
*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ Mahant Ram Gopal Das Tapasvi
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*माया का अंग १०७*
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रज्जब माया मिलत दुख, बिछुरत विहरै प्राण ।
करवत रेती सांण के, आवण जाणे जाण ॥५॥
जैसे करवत, रैती और शाण के आने जाने पर वस्तु कटती है वैसे ही माया के आकर मिलने से भी दुख होता है और बिछुङते समय भी प्राणी के हृदय को विवीर्ण करती है, ऐसा ही जानो ।
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बणि अनार वित आये फाटै, नीर गये पर फाटे ताल ।
त्यों रज्जब संपत्ति विपत्ति,मन को करे विहाल ॥६॥
कपास तथा अनार फल रूप धन आने से फटते हैं और जल के सूखने पर तालाब फटता है, वैसे ही माया का आना रूप संपत्ति और जाना रूप विपत्ति दोनों ही मन को व्यथित करती है ।
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रज्जब ऋद्धि बाहिली रमत ही, जीव मांहिला जाय ।
तो मन माया मीन जल, नर देखो निरताय ॥७॥
बाहर की माया जाते ही भीतर का मन भी जाता है, तब हे नरों ! विचार करके देखो, जैसे जल बिना मच्छी नहीं रह सकती, वैसे ही माया बिना मन नहीं रह सकता ।
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रज्जब राचै हि ऋद्धि सौं, मिल हिं मानवी आय ।
विरचै सोई विभूति बिन, जब शक्ति सदन सौं जाय ॥८॥
माया होने से मनुष्य आकर मिलता है और प्रेम करता है । फिर जब माया घर से चली जाती है तब वही माया के बिना विरक्त हो जाता है अर्थात पूर्ववत प्रेम नहीं करता ।
(क्रमशः)

= १९८ =

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*श्री दादू अनुभव वाणी, द्वितीय भाग : शब्द*
*राग रामकली ८ (गायन समय प्रभात ३ से ६)*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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१९८ - साधु मिलाप मँगल । चौताल
आज हमारे राँमजी, साधु घर आये ।
मंगलाचार चहुँ दिशि भये, आनन्द बधाये ॥टेक॥
चौक पुराऊं मोतियाँ, घिस चन्दन लाऊं ।
पँच पदारथ पोइ के, यहु माल चढ़ाऊं ॥१॥
तन मन धन करूँ वारनैं, प्रदक्षिणा दीजे ।
शीश हमारा जीव ले, नौछावर कीजे ॥२॥
भाव भक्ति कर प्रीति सौं, प्रेम रस पीजे ।
सेवा वन्दन आरती, यहु लाहा लीजे ॥३॥
भाग हमारा हे सखी, सुख सागर पाया ।
दादू को दर्शन भया, मिले त्रिभुवन राया ॥४॥
सन्तों के दर्शन से होने वाले मँगल का परिचय दे रहे हैं - 
आज हमारे सन्तरूप रामजी घर पर पधारे हैं । इस कारण चतुष्टय अन्त:करण रूप चारों ही दिशाओं में तथा इन्द्रियादि में आनन्द की वृद्धि हुई है । 
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हम मोतियोँ से चौक पूरते हैं, चँदन घिसके लगाते हैं । अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष और प्रेम इन पाँचों पदार्थों वो पँच विषय - विरक्ति रूप पाँच पदार्थों की माला बनाकर सँतों के चढ़ाते हैं । 
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तन, मन, धन, निछावर करके प्रदक्षिणा देते हैं तथा हमारा शिर और जीव भी लीजिये, हम आप पर निछावर करते हैं । 
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हम भाव और प्रेमाभक्ति से प्रेम - रस का पान करते हुये सेवा, वन्दना और आरती करना रूप यह महान् लाभ ले रहे हैं । 
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हे सँत सखि ! हमारा महान् भाग्य था जिससे सुख - सागर सँत प्राप्त हुये हैं । हम को इन सँतों का दर्शन हुआ है तब से ऐसा ज्ञात होता है कि - मानो त्रिभुवन के राजा परब्रह्म ही मिल गये हैं । 
.
नरेना में पूर्वकाल के सँतों ने दर्शन दिया था, तब यह पद तथा साधु अँग की १२१ वीं साखी कही थी । प्रसंग कथा दृ - सु - सि - त - ११ - १७ में देखो।
(क्रमशः)

= १५० =

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*राम रसिक वांछै नहीं, परम पदारथ चार ।*
*अठसिधि नव निधि का करै, राता सिरजनहार ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ निष्काम पतिव्रता का अंग)*
====================
साभार ~ महन्त Ram Gopal तपस्वी
.
*श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु,* *साधना*
####################
एक साधु कुछ खाता नहीं था और सिद्ध नाम से प्रसिद्ध था, वह एक सत्संगी राजा के बाग में आकर ठहर गया । राजा को प्रतिदिन अपनी सिद्धि की बात सुनाता हुआ कहता था कि यह सिद्धि मैं तुम्हें बता दूंगा, सीख लो । राजा ने उसका व्यवहार जानने के लिये गुप्तचर नियुक्त कर दिये । एक दिन रात्रि के समय बाग के महल से एक सूअर निकला और बाहर मल खाकर के पुन: आ गया । गुप्तचरों ने राजा को सुना दिया । 
सिद्ध ने फिर राजा से कहा - तुम मुझ से सिद्धि सीख लो । राजा ने कहा - महाराज ! मल खाना भी कोई सिद्धि है क्या ? आप थोड़ी देर के लिये सुअर बन कर मल खाते हैं और सूअर तो सदा ही मल खाता है । इससे तो सुअर आपसे बड़ा सिद्ध हुआ । यह सुन कर सिद्ध लज्जित होकर नीचे देखने लगा कुछ भी नहीं बोल सका । इससे ज्ञात होता है कि प्रतिष्ठा के तुच्छ भोग हेतु कठिन साधन करना भूल है -
साधन मलीन करत जो, पूजा हित तिहिं लाज ।
मल खाना क्या सिद्धि है, बोल उठ नटराज ॥१५५॥
#### श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ####
### श्री नारायणदासजी पुष्कर, अजमेर ###
^^^^^^^//सत्य राम सा//^^^^^^^

= १४९ =

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*काहे रे बक मूल गँवावै,*
*राम के नाम भलें सचु पावै ॥टेक॥**वाद विवाद न कीजे लोई,*
*वाद विवाद न हरि रस होई ।*
*मैं मैं तेरी मांनै नाँहीं हीं,*
*मैं तैं मेट मिलै हरि मांहीं ॥१॥*
*हार जीत सौं हरि रस जाई,*
*समझि देख मेरे मन भाई !*
*मूल न छाड़ी दादू बौरे,*
*जनि भूलै तूँ बकबे औरे ॥२॥*
*(श्री दादूवाणी ~ पद. २७९)*
====================
साभार ~ महन्त Ram Gopal तपस्वी
.
*श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु,* *शान्ति*
####################
एक समय अकबर बादशाह के दरबार में गंगा यमुना की श्रेष्ठता के विषय में विवाद चला । किसी ने गंगा को और किसी ने यमुना को श्रेष्ठ सिद्ध करने का प्रयत्न किया किन्तु सन्तोष जनक निर्यण नहीं हो सका । तब जीव गोस्वामी जी को बुलवाया ।उनका प्रण था कि रात्रि में ब्रजभूमी के बिना वे नहीं रहते थे । एक पहर में ब्रज में पहुँचने का वचन देकर गोस्वामी जी को आगरा लाया गया । 
जीव गोस्वामीजी ने सभा में कहा - "इस अल्प कार्य के लिये मुझे क्यों बुलवाया, कोई भी पुराण देख लेते । पुराण इतिहासों मे गंगा को पूर्णब्रह्म का चरणामृत और यमुना जी को पूर्णब्रह्म की पटरानी लिखा है । अब आप ही विचार कर लें कि कौन बड़ी है ।" यह सुन कर सब श्रोतागण प्रसन्न हुये और विवाद मिट गया । इससे ज्ञात होता है कि शान्त पुरुष युक्ति से वाद विवाद को सहज ही मिटा देते है ।
शांत युक्ति से हरत हैं, विवाद को तत्काल ।
जीव गुसांई ने हरा, सुन श्रोता सुनिहाल ॥३६९॥
#### श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ####
### श्री नारायणदासजी पुष्कर, अजमेर ###
^^^^^^^//सत्य राम सा//^^^^^^^

*अद्भुत चरित्र*

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*ज्यों रसिया रस पीवतां, आपा भूलै और ।* 
*यों दादू रह गया एक रस, पीवत पीवत ठौर ॥* 
*(श्री दादूवाणी ~ परिचय का अंग)* 
================ 
*साभार ~ श्रीरामकृष्ण-वचनामृत{श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)}* 
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ 
*परिच्छेद ४* 
यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः । 
यस्मिन् स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते ॥ 
(गीता, ६।२२) 

*नरेन्द्र, भवनाथ आदि के संग आनन्द* 
उसके दूसरे दिन(६ मार्च) भी छुट्टी थी । दिन के तीन बजे मास्टर फिर आए । श्रीरामकृष्ण अपने कमरे में बैठे हैं । फर्श पर चटाई बिछी है । नरेन्द्र, भवनाथ तथा और भी दो एक लोग बैठे हैं । सभी अभी लड़के हैं, उम्र उन्नीस-बीस के लगभग होगी । प्रफुल्लमुख श्रीरामकृष्ण तखत पर बैठे हुए लड़कों से सानन्द वार्तालाप कर रहे हैं । 
मास्टर को कमरे में घुसते देख श्रीरामकृष्ण ने हँसते हुए कहा, “यह देखो, फिर आया ।” सब हँसने लगे । मास्टर ने भूमिष्ठ हो प्रणाम करके आसन ग्रहण किया । पहले वे खड़े खड़े हाथ जोड़कर प्रणाम करते थे-जैसा अंग्रेजी पढ़े-लिखे लोग करते हैं । पर आज उन्होंने भूमिष्ठ होकर प्रणाम करना सीखा । 
श्रीरामकृष्ण नरेन्द्रादि भक्तों से कहने लगे, “देखो, एक मोर को किसी ने चार बजे अफीम खिला दी । दूसरे दिन से वह अफीमची मोर ठीक चार बजे आ जाता था ! यह भी अपने समय पर आया है ।” सब लोग हँसने लगे ।
मास्टर सोचने लगे, ये ठीक तो कहते हैं । घर जाता हूँ, पर मन दिन-रात यहीं पड़ा रहता है । कब जाऊँ, कब उन्हें देखूँ इसी विचार में रहता हूँ । यहाँ मानो कोई खींच ले आता है ! इच्छा होने पर भी दूसरी जगह जा नहीं पाता, यहीं आना पड़ता है । इधर श्रीरामकृष्ण लड़कों से हँसी-मजाक करने लगे । मालुम होता था कि वे सब मानो एक ही उम्र के हैं । हँसी की लहरें उठने लगीं । मानो आनन्द की हाट लगी हो । 
मास्टर यह अद्भुत चरित्र देखते हुए सोचते हैं कि पिछले दिन क्या इन्हीं को समाधि और अपूर्व प्रेमानन्द में मग्न देखा था? क्या ये वे ही मनुष्य हैं, जो आज प्राकृत मनुष्य जैसा व्यवहार कर रहे हैं? क्या इन्हीं ने मुझे पहले दिन उपदेश देते हुए धिक्कारा था? इन्हीं ने मुझे ‘तुम ज्ञानी ही’ कहा था? इन्हीं ने साकार और निराकार दोनों सत्य हैं, कहा था? इन्हीं ने मुझे कहा था कि ईश्वर ही सत्य हैं और सब अनित्य? इन्हीं ने मुझे संसार में दासी की भाँति रहने का उपदेश दिया था? 
श्रीरामकृष्ण आनन्द कर रहे हैं और बीच बीच में मास्टर को देख रहे हैं । मास्टर को सविस्मय बैठे हुए देखकर उन्होंने रामलाल से कहा- “इसकी उम्र कुछ ज्यादा हो गयी है न, इसी से कुछ गम्भीर है । ये सब हँस रहे हैं; पर यह चुपचाप बैठा है ।” मास्टर की उम्र उस समय सत्ताईस साल की होगी । 
बात ही बात में परम भक्त हनुमान की बात चली । हनुमान का एक चित्र श्रीरामकृष्ण के कमरे की दिवार पर टँगा था । श्रीरामकृष्ण ने कहा, “देखो तो, हनुमान का भाव कैसा है ! धन, मान, शरीरसुख कुछ भी नहीं चाहते हैं केवल भगवान् को चाहते हैं । जब स्फटिक-स्तम्भ के भीतर से ब्रह्मास्त्र निकालकर भागे, तब मन्दोदरी नाना प्रकार के फल लेकर लोभ दिखाने लगी । उसने सोचा कि फल के लोभ से उतरकर शायद ये ब्रह्मास्त्र फेंक दें, पर हनुमान इस भुलावे में कब पड़ने लगे? उन्होंने कहा-मुझे फलों का अभाव नहीं है । मुझे जो फल मिला है, उससे मेरा जन्म सफल हो गया है । मेरे हृदय में मोक्षफल के वृक्ष श्रीरामचन्द्रजी हैं । श्रीराम-कल्पतरु के नीचे बैठा रहता हूँ; जब जिस फल की इच्छा होती है, वही फल खाता हूँ । फल के बारे में कहता हूँ कि तेरा फल मैं नहीं चाहता हूँ । तू मुझे फल न दिखा, मैं इसका प्रतिफल दे जाऊँगा ।” 
इसी भाव का एक गीत श्रीरामकृष्ण गा रहे हैं । फिर वही समाधि; देह निश्चल, नेत्र स्थिर । बैठे हैं, जैसी मूर्ति फोटोग्राफ में देखने को मिलती है । भक्तगण अभी इतना हँस रहे थे अब सब एक दृष्टि से श्रीरामकृष्ण की इस अद्भुत अवस्था का दर्शन करने लगे । मास्टर दूसरी बार यह समाधि-अवस्था देख रहे थे । 
बड़ी देर बाद अवस्था का परिवर्तन हो रहा है । देह शिथिल हो गयी, मुख सहास्य हो गया, इन्द्रियाँ फिर अपना अपना काम करने लगीं । नेत्रों से आनन्दाश्रु बहाते हुए ‘राम राम’ उच्चारण कर रहे हैं । मास्टर सोचने लगे, क्या ये ही महापुरुष लड़कों के साथ दिल्लगी कर रहे थे? तब तो यह जान पड़ता था कि मानो पाँच वर्ष के बालक हैं । 
श्रीरामकृष्ण प्रकृतिस्थ होकर फिर प्राकृत मनुष्यों जैसा व्यवहार कर रहे हैं । मास्टर और नरेन्द्र से कहने लगे कि तुम दोनों अंग्रेजी में बातचीत करो, मैं सुनूँगा । यह सुनकर मास्टर और नरेन्द्र हँस रहे हैं । दोनों परस्पर कुछ बातचीत करने लगे, पर बँगला में । 
श्रीरामकृष्ण के सामने मास्टर का तर्क करना सम्भव न था; क्योंकि तर्क का तो घर उन्होंने बन्द कर दिया है । अतएव मास्टर अब तर्क कैसे कर सकते हैं । श्रीरामकृष्ण ने फिर कहा, पर मास्टर के मुँह से अंग्रेजी तर्क न निकला ।
(क्रमशः)

निहकर्मी पतिब्रता कौ अंग ७२/७५

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श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य । 
साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ 
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ महन्त Ram Gopal तपस्वी 
(श्री दादूवाणी ~ ८. निहकर्मी पतिब्रता कौ अंग) 
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*सब आया उस एक में, डाल पान फल फूल ।* 
*दादू पीछे क्या रह्या, जब निज पकड़या मूल ॥७२॥* 
*खेत न निपजै बीज बिन, जल सींचे क्या होइ ।* 
*सब निष्फल दादू राम बिन, जानत है सब कोइ ॥७३॥* 
*दादू जब मुख मांहि मेलिये, तब सब ही तृप्ता होइ ।* 
*मुख बिन मेले आन दिश, तृप्ति न माने कोइ ॥७४॥* 
*जब देव निरंजन पूजिये, तब सब आया उस मांहि ।* 
*डाल पान फल फूल सब, दादू न्यारे नांहि ॥७५॥* 
इन पद्यों में श्री दादूजी महाराज ब्रह्म की उपासना को दृढ़ कर रहे हैं । केवल परिश्रम ही है और जैसे खेत में बीज बोये बिना जल का सींचना व्यर्थ है तथा मूढता को ही बोधित करता है अथवा जैसे शरीरस्थ प्राणों को मुख से भोजन दिये बिना शरीर के अंगों का भोजन से लेप करने से भोजन का दुरूपयोग ही होगा । तथा हंसी कराने वाली बात होगी । इसी प्रकार ब्रह्म की उपासना के बिना केवल देवताओं की उपासना स्वर्गादि तुच्छ फल को देने वाली बात होते हुए भी निष्फल मानी गई है । क्योंकि मनुष्य जन्म केवल भोगों के लिये ही नहीं है किन्तु कल्याण के लिये है । देवताओं की उपासना से कल्याण नहीं होता अतः सबको ब्रह्म की उपासना करनी चाहिये । उसकी उपासना से सारे देवताओं की उपासना हो जायगी । क्योंकि ब्रह्म सर्वरूप सर्व कारण है । कारण से कार्य भिन्न नहीं होता किन्तु कारण रूप ही होता है । उपनिषद् में कहा है कि एक के जान लेने से सब कुछ जाना जाता है, जैसे मिट्टी के पिण्डे को जान लेने से मृन्मय घट शराब आदि सब जाने जाते हैं । घट पट आदि नामधेय तो वाणी का विकार होने से मिथ्या है, मृत्तिका ही सत्य है । भागवत् में कहा है कि जैसे वृक्ष की जड़ में पानी देने पर डाली पत्ते पुष्प फल आदि का सिंचन अपने आप ही हो जाता है । प्राणों को भोजन देने से शरीर के अंगों में भोजन पहुँच जाता है । ऐसे ही ब्रह्म की उपासना से सब उपासना हो जाती है । गीता में कहा है कि- 
“हे अर्जुन ! मेरे सिवाय किंचित् मात्र भी दूसरी वस्तु नहीं है । यह सम्पूर्ण जगत् सूत्र में मणियों के सदृश मेरे में गुंथा हुआ है । 
यह सब जगत् मेरी अव्यक्त मूर्ति से व्याप्त है । सारे प्राणी मेरे में स्थित हैं परन्तु मैं उनमें नहीं हूं ।”
(क्रमशः)

बुधवार, 26 फ़रवरी 2020

*२६. पूर्व बंगाल की यात्रा*

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*जब द्रवो तब दीजिये, तुम पै मांगूं येहु ।*
*दिन प्रति दर्शन साधु का, प्रेम भक्ति दृढ़ देहु ॥*
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*२६. पूर्व बंगाल की यात्रा*
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विद्वत्वं च नृपत्वं च नैव तुल्यं कदाचन।
स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान् सर्वत्र पूज्यते॥[१]
([१] विद्वान और राजा की कोई परस्पर में समता करे तो राजा विद्वान की समता के योग्य कभी सिद्ध हो ही नहीं सकता। कारण कि राजा की तो अपने ही देश में मान-प्रतिष्ठा होती है, किन्तु विद्वान जहाँ भी जाता है वहीं उसकी पूजा-प्रतिष्ठा होती है। सु. र. भां. ४०/७)
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विधि के विधान को कोई ठीक-ठीक समझ नहीं सकता। जिसके पास प्रचुर परिणाम में भोज्य-पदार्थ हैं, उसे पाचनशक्ति नहीं। जिसकी पाचनशक्ति ठीक है, उसे यथेष्ठ भोज्य-पदार्थ नहीं मिलते। विद्वानों के पास धन का अभाव है, जिनमें विद्या-बुद्धि नहीं उनके पास आवश्यकता से अधिक अर्थ भरा पड़ा है। जहाँ धन है वहाँ सन्तान नहीं, जहाँ बहुत सन्तान है। वहाँ भोजन के लाले पड़े हुए हैं।
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इसी बात से तो खीजकर किसी कवि ने ब्रह्मा जी को बुरा-भला कहा है। वे कहते हैं-
❉गन्धः सुवर्णे फलमिक्षुदण्डे
❉नाकारि पुष्पं खलु चन्दनेषु।
❉विद्वान् धनाढ्यो न तु दीर्घजीवी
❉धातुःपुरा कोऽपि न बुद्धिदोऽभूत॥
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❉कवि की दृष्टि में ब्रह्मा जी ने सृष्टि रचने में बड़ी भारी भूल की है। देखिये सुवर्ण कितना सुन्दर है, उसमें यदि सुगन्ध होती तो फिर उसकी उत्तमता का कहना ही क्या था। ईख के डंडे में जब इतनी मिठास है, तब यदि उसके ऊपर कहीं फल लगता तो वह कितना स्वादिष्ट होता? ब्रह्मा जी उस पर फल लगाना ही भूल गये।
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❉चन्दन की लकड़ी में जब इतनी सुगन्ध है, तो उस पर कहीं फूल लगता होता तो उसके बराबर उत्तम फूल संसार में और कौन हो सकता? सो ब्रह्मा जी को उस पर फूल लगाने का ध्यान ही न रहा।
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❉विद्वान लोग बिना रूपये-पैसे के ही आकाश-पाताल एक कर देते हैं, यदि उनके पास कहीं धन होता तो इस सृष्टि की सभी विषमता को दूर कर देते, सो उन्हें दरिद्री ही बना दिया, साथ ही उनकी आयु भी थोड़ी बनायी।
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❉इन सब बातों को सोचकर कवि कहता है कि इसमें बेचारे ब्रह्मा जी का कुछ दोष नहीं है, मालूम पड़ता है, सृष्टि करते समय ब्रह्मा जी को कोई योग्य सलाह देने वाला चतुर मन्त्री नहीं मिला। इसीलिये जल्दी में ऐसी गड़बड़ी हो गयी। मन्त्री के अभाव में हुई हो अथवा उन्होंने जान-बुझकर की हो, यह गलती तो ब्रह्मा जी से जरूर ही हो गयी कि उन्होंने विद्वानों को निर्धन ही बनाया।
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विद्वानों को प्रायः धन के लिये सदा परमुखापेक्षी ही बनना पड़ता है। किसी ने तो यहाँ तक कह डाला है ‘अनाश्रया न शोभन्ते पण्डिता वनिता लताः’ अर्थात पण्डित, स्त्री और बेल बिना आश्रय के भले ही नहीं मालूम पड़ते। बेचारे पण्डितों को वनिता-लता के साथ समानता करके उनकी व्यथा को और भी बढ़ा दिया है। जिस समय की हम बातें कह रहे हैं, उस समय संस्कृत-विद्या की आज की भाँति दुर्गति नहीं थी।
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भारतवर्ष भर में संस्कृत-विद्या का प्रचार था। बिना संस्कृत पढे़ कोई भी मनुष्य सभ्य कहला ही नहीं सकता था। बंगाल में ब्राह्मण ही संस्कृत-विद्या के पण्डित नहीं थे, किन्तु कायस्थ, वैश्य तथा अन्य जाति के कुलीन पुरुष भी संस्कृत-विद्या के पूर्ण ज्ञाता थे।
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उस समय पण्डितों की दो ही वृत्तियाँ थीं, या तो वे पठन-पाठन करके अपना निर्वाह करें या किसी राजसभा का आश्रय लें। पण्डित सदा से ही दरिद्र होते चले आये पूर्व बंगाल की यात्रा है, इसका कारण एक कवि ने बहुत ही सुन्दर सुझाया है।
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उसने एक इतिहास बताते हुए कहा है कि ब्रह्मा जी के सुकृति(लक्ष्मी) और दुष्कृति(दरिद्रता) दो कन्याएँ थीं। सुकृति बड़ी थी, इसलिये विवाह के योग्य हो जाने पर ब्रह्मा जी ने उसे बिना ही सोचे-समझे मूर्ख को दे डाला। मूर्ख के यहाँ उसकी दुर्गति देखकर ब्रह्मा जी को बड़ा पश्चात्ताप हुआ। तभी से वे दूसरी पुत्री दुष्कृति के लिये अच्छा-सा वर खोज रहे हैं, जिसे भी विद्वान, कुलीन और सर्वगुणसम्पन्न देखते हैं उसे ही दरिद्रता को दे डालते हैं।
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निमाई पण्डित विद्वान थे, गुणवान थे, रूपवान और तेजवान भी थे, भला ऐसे योग्य वर को ब्रह्मा जी कैसे छोड़ सकते थे? उनके यहाँ भी दरिद्रता का साम्राज्य था, किन्तु वह निमाई पण्डित को तनिक व्यथा नहीं पहुँचा सकती। उनके सामने सदा हाथ बाँधे दूर ही खड़ी रहती थी। निमाई उसकी जरा भी परवा नहीं करते थे।
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उन दिनों योग्य और नामी पण्डित देश-विदेशों में अपने योग्य छात्रों के साथ भ्रमण करते थे, सद्गृहस्थ उनकी धन, वस्त्र और खाद्य-पदार्थों के द्वारा पूजा करते थे। आज की भाँति पण्डितों की उपेक्षा कोई भी नहीं करता था। निमाई की भी पूर्व बंगाल में भ्रमण करने की इच्छा हुई। उन्होंने अपनी माता की अनुमति से अपने कुछ योग्य छात्रों के साथपूर्व बंगाल की यात्रा की। उस समय लक्ष्मी देवी को अपने पितृगृह में रख गये थे।
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श्रीगंगा जी को पार करके निमाई पण्डित अपने शिष्यों के साथ पद्मा नदी के तट पर राढ़-देश में पहुँचे। बंगाल में भगवती भागीरथी की दो धाराएँ हो जाती हैं। गंगा जी की मूल शाखा पूर्व की ओर जाकर जो बंगाल के उपसागर में मिली है, उसका नाम तो पद्मावती है। दूसरी जो नवद्वीप होकर गंगा सागर में जाकर समुद्र से मिली है उसे भागीरथी गंगा कहते हैं। ब्रह्मपुत्र नदी के ओर दक्षिण-तट से लेकर पद्मा नदी पर्यन्त के देश को राढ़-देश कहते हैं। पहले ‘बंगाल’ इसे ही कहते थे।
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उत्तर-तट को गौड़ देश कहते थे और दक्षिण-तट को बंगाल या राढ़ के नाम से पुकारते थे। आज जिसे पूर्व बंगाल कहते हैं, यथा-
रत्नाकरं समारभ्य ब्रह्मपुत्रान्तगं शिवे।
बंगदेशो मया प्रोक्तः सर्वसिद्धिप्रदर्शकः॥
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गौड़-देश वालों से बंग-देश वालों का आचार-विचार भी कुछ-कुछ भिन्न था और अब भी है। निमाई पण्डित ने पद्मा के किनारे-किनारे पूर्व बंगाल के बहुत-से स्थानों में भ्रमण किया। जो भी लोग इनका आगमन सुनते वे ही यथाशक्ति भेंट लेकर इनके पास आते। वहाँ के विद्यार्थी कहते- ‘हम बहुत दिनों से आपकी प्रशंसा सुन रहे थे। आपकी लिखी हुई व्याकरण की टिप्पणी बड़ी ही सुन्दर है। हमें अपने पाठ में उससे बहुत सहायता मिलती है।’
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कोई कहते- ‘आपकी पद-धूलि से यह देश पावन बन गया, आपके प्रकाण्ड पाण्डित्य की हम प्रशंसा ही मात्र सुनते थे। आपके गुणों की कौन प्रशंसा कर सकता है?’ इस प्रकार लोग भाँति-भाँति से इनकी प्रशंसा और पूजा करने लगे। इनके साथियों को भय था कि पण्डित जी यहाँ भी नवद्वीप की भाँति चंचलता करेंगे तो सब गुड़ गोबर हो जायगा, किन्तु ये स्वयं देशकाल को समझकर बर्ताव करने वाले थे।

कई मास तक ये पूर्व बंगाल में भ्रमण करते रहे, किन्तु वहाँ इन्होंने एक दिन भी चंचलता नहीं की। एक योग्य गम्भीर पण्डित की भाँति ये सदा बने रहते थे। इनसे जो जिस विषय का प्रश्न पूछता उसे उसी के प्रश्न के अनुसार यथावत उत्तर देते। यहाँ इन्होंने वैष्णवों की आलोचना नहीं की, किन्तु उलटा भगवद्भक्ति का सर्वत्र प्रचार किया।
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इन्होंने लोगों के पूछने पर भगवन्नाम का माहात्म्य बताया, भक्ति की श्रेष्ठता सिद्ध की और कलियुग में भक्ति-मार्ग को ही सर्वश्रेष्ठ, सुलभ और सर्वोपयोगी बताया। किन्तु ये बातें इन्होंने एक विद्वान पण्डित की ही हैसियत से कही थीं, जैसे विद्वानों से जो भी प्रश्न करो उसी का शास्त्रानुसार उत्तर दे देंगे। भक्ति का असली स्त्रोत तो इनका अभी अव्यक्तरूप से छिपा ही हुआ था। उसे प्रवाहित होने में अभी देरी थी। फिर भी इनके पाण्डित्यपूर्ण उत्तरों से राढ़-देशवासी श्रद्धालु मनुष्यों को बहुत लाभ हुआ।
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वे भगवन्नाम और भक्ति के महत्त्व को समझ गये, उनके हृदय में भक्ति का एक नया अंकुर उत्पन्न हो गया, जिसे पीछे से गौरांग की आज्ञानुसार नित्यानन्द प्रभु ने प्रेम से सींचकर पुष्पित, पल्लवित, फलान्वित बनाया। इस प्रकार ये शास्त्रीय उपदेश करते हुए राढ़-देश के मुख्य-मुख्य स्थानों में घूमने लगे।
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शाम को अपने साथियों को लेकर ये पद्मों में स्नान करते और घण्टों एकान्त में जलविहार करते रहते। लोग बड़े सत्कार से इन्हें खाने-पीने की सामग्री देते। इनके साथी अपना भोजन स्वयं ही बनाते थे। इस प्रकार इनकी यात्रा के दिन आनन्द से कटने लगे।
(क्रमशः)

*२५. नवद्वीप में ईश्वरपुरी*

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*साधु सपीड़ा मन करै, सतगुरु शब्द सुनाइ ।*
*मीरां मेरा मिहर कर, अन्तर विरह उपाइ ॥*
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*२५. नवद्वीप में ईश्वरपुरी*
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श्री अद्वैताचार्य ने श्रीईश्वरपुरी जी की गुरुवत पूजा की और कुछ काल नवद्वीप में ही रहने का आग्रह किया। पुरी महाशय ने आचार्य की प्रार्थना स्वीकार कर ली और वहीं उनके पास रहकर श्रीकृष्ण कथा और सत्संग करने लगे।
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नवद्वीप में रहते हुए महामहिम श्रीईश्वरपुरी ने निमाई पण्डित का नाम तो सुना था, किन्तु साथ ही यह भी सुना था कि वे बड़े भारी चंचल हैं, वैष्णवों से खूब तर्क-वितर्क करते हैं। इसलिये पुरी महाशय ने भेंट नहीं की। एक दिन अकस्मात निमाई की ईश्वरपुरीजी से भेंट हो गयी। संन्यासी समझकर निमाई पण्डित ने पुरी महाशय को प्रणाम किया। परिचय पाकर उन्हें परम प्रसन्नता हुई।
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पुरी महाशय तो उनके रूप-लावण्य को देखकर मन्त्र मुग्ध की भाँति एकटक दृष्टि से उनकी ही ओर देखते रहे। उन्होंने सिर से पैर तक निमाई को देखा, फिर देखा और फिर देखा। इस प्रकार बार-बार उनके अद्भुत रूप-लावण्य और तेज को देखते, किन्तु उनकी तृप्ति ही नहीं होती थी। वे सोचने लगे ये तो कोई योगभ्रष्ट महापुरुष- से जान पड़ते हैं, इनके चेहरे पर कितना तेज है, हृदय की स्वच्छता, शुद्धता और प्राणिमात्र के प्रति ममता इनके चेहरे से प्रस्फुटित हो रही है। ये साधारण पुरुष कभी हो ही नहीं सकते। जरूर कोई प्रच्छन्न वेशधारी महापुरुष हैं।
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पुरी को एकटक अपनी ओर देखते देखकर हँसते हुए निमाई बोले- ‘पुरी महाशय ! अब इस प्रकार कहाँ तक देखियेगा। आज हमारे ही घर भिक्षा कीजियेगा, वहाँ दिन भर हमें देखते रहने का सुअवसर प्राप्त होगा।’ यह सुनकर पुरी महाशय कुछ लज्जित-से हुए और उन्होंने निमाई का निमन्त्रण बड़े प्रेम से स्वीकार कर लिया।
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भोजन तैयार होने के पूर्व निमाई अद्वैताचार्य के घर से पुरी को लिवा ले गये। शची माता ने स्वामी जी की बहुत ही अधिक अभ्यर्चना की और उन्हें श्रद्धा-भक्ति के साथ भोजन कराया। भोजन के अनन्तर कुछ काल तक दोनों महापुरुषों में कुछ सत्संग होता रहा, फिर दोनों ही अद्वैताचार्य के आश्रम में आये। अब तो निमाई पण्डित पुरी महाशय के समीप यदा-कदा आने लगे।
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उन दिनों पुरी महाशय ‘श्रीकृष्णलीलामृत’ नामक एक ग्रन्थ की रचना कर रहे थे। पुरी ने पण्डित समझकर इनसे उस ग्रन्थ के सुनने का आग्रह किया। गदाधर पण्डित के साथ सन्ध्या समय जाकर ये उस ग्रन्थ को रोज सुनने लगे। पुरी महाशय ने कहा- ‘आप पण्डित हैं, इस ग्रन्थ में जहाँ भी कहीं अशुद्धि हो, त्रुटि मालूम पड़े, वहीं आप बता दीजियेगा।’ इन्होंने नम्रता के साथ उत्तर दिया- ‘श्रीकृष्ण-कथा में भला क्या शुद्धि और क्या अशुद्धि।
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भक्त अपने भक्ति-भाव के आवेश में आकर जो भी कुछ लिखता है, वह परम शुद्ध ही होता है। जिस पद में भगवत-भक्ति है, जिस छन्द में श्रीकृष्ण-लीला का वर्णन है वह अशुद्ध होने पर भी शुद्ध है और जो काव्य श्रीकृष्ण-कथा से रहित है वह चाहे कितना भी ऊँचा काव्य क्यों न हो, उसकी भाषा चाहे कितनी बढि़या क्यों न हो, वह व्यर्थ ही है। भगवान तो भावग्राही हैं, वे घट-घट की बातें जातने हैं। बेचारी भाषा उनकी विरदावली का बखान कर ही क्या सकती है, उनकी प्रसन्नता में तो शुद्ध भावना ही मुख्य कारण है।
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यथा-
मूर्खो वदति विष्णाय धीरो वदति विष्णवे।
उभयोस्तु शुभं पुण्यं भावग्राही जनार्दनः॥
अर्थात मूर्ख कहता है ‘विष्णाय नमः’ [१] और विद्वान कहते हैं ‘विष्णवे नमः’ परिणाम में इन दोनों का फल समान ही है। क्योंकि भगवान जनार्दन तो भावग्राही हैं। उनसे यह बात छिपी नहीं रहती कि ‘विष्णाय’ कहने से भी उसका भाव मुझे नमस्कार करने का ही था।’
([१] यथार्थ में ‘विष्णु’ शब्द का चतुर्थी में ‘विष्णवे’ बनता है, मूर्ख ‘रामाय’ और ‘गणेशाय’ की तरह अनुमान से ‘विष्णाय’ लगाकर ही भगवान् को नमस्कार करते)
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निमाई पण्डित का ऐसा उत्तर सुनकर पुरी महाशय अत्यन्त प्रसन्न हुए। उन्होंने प्रसन्नता प्रकट करते हुए कहा- ‘यह उत्तर तो आपकी महत्ता का द्योतक है। इस कथन से आपने श्रीकृष्ण-लीला की महिमा का ही वर्णन किया है। आप धुरन्धर वैयाकरण हैं, इसलिये पद-पदान्त और क्रिया की शुद्धि-अशुद्धि पर आप ध्यान जरूर देते जायँ।’ यह कहकर वे अपने ग्रन्थ को इन्हें सुनाने लगे। ये बड़े मनोयोग के साथ नित्यप्रति आकर उस ग्रन्थ को सुनते और सुनकर प्रसन्नता प्रकट करते।

एक दिन ग्रन्थ सुनते-सुनते एक धातु के सम्बन्ध में इन्होंने कहा- ‘यह धातु ‘आत्मनेपदी’ नहीं है ‘परस्मैपदी’ है।’ पुरी उसे आत्मनेपदी ही समझे बैठे थे। इनकी बात से उन्हें शंका हो गयी। इनके चले जाने के पश्चात् पुरी रात भर उस धातु के ही सम्बन्ध में सोचते रहे। दूसरे दिन जब ये फिर पुस्तक सुनने आये तो इनसे पुरी ने कहा- ‘आप जिसे परस्मैपदी धातु बताते थे, वह तो आत्मनेपदी ही है।’ यह कहकर उन्होंने उस धातु को सिद्ध करके इन्हें बताया।
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सुनकर ये प्रसन्न हुए और कहने लगे- ‘आप ही का कथन ठीक है, मुझे भ्रम हो गया होगा।’ इस प्रकार इन्होंने पुरी के समस्त ग्रन्थ को श्रवण किया। उस ग्रन्थ के श्रवण करने से इन्हें बहुत ही सुख प्राप्त हुआ। इनकी श्रीकृष्णभक्ति धीरे-धीरे प्रस्फुटित-सी होने लगी। ईश्वरपुरी के प्रति भी इनका आन्तरिक अनुराग उत्पन्न हो गया। कुछ काल के अनन्तर पुरी महाशय नवद्वीप से गया की ओर चले गये और निमाई पूर्व की भाँति अपनी पाठशाला में पढ़ाने लगे।
(क्रमशः)