मंगलवार, 6 जनवरी 2026

ब्रह्मलीन होना ~

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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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१२ आचार्य नारायणदास जी ~
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कुछ भूमि प्राप्त ~ 
इन्हीं दिनों में खेतडी राज्य की ओर से दलेलपुरा ग्राम की दो कोटियों का पट्टा दादूद्वारे के नाम होकर नारायणा दादूधाम के आचार्य नारायणदासजी महाराज के पास आया । वि. सं. १९१२ में किशनगढ राज्य से भी भूमि का पट्टा आया । इस वर्ष आचार्य नारायणदासजी महाराज का चातुर्मास भंडारी सांवतरामजी के नियत हुआ था । वह चातुर्मास की मर्यादा के अनुसार अच्छी प्रकार संपन्न हुआ । 
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ब्रह्मलीन होना ~ 
उक्त प्रकार आचार्य नारायणदासजी महाराज ने लोक कल्याण के लिये भ्रमण में धर्मोपदेश देते हुये गद्दी पर ११ वर्ष ४ मास २३ दिन विराज कर कार्तिक कृष्णा १३ बुधवार वि. सं. १९१२ में ब्रह्मलीन हुये । कहा भी है -
सम्मत शत उन्नीस का, बारह कार्तिक मास ।
कृष्ण पक्ष तेरस दिना, गये राम के पास ॥
(दादू चरित्र चन्द्रिका)
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गुण गाथा
दोहा- दादूधाम आचार्य वर, हुये नरायणदास ।
रत्त रहे निज रुप में, त्याग जगत की आश ॥१॥
राजा रावल आदि ने, धरे चरण में शीश ।
नम्र रहे तो भी सदा, सुमिरत श्री जगदीश ॥२॥
निज समाज अरु अन्य को, दीन्हा ज्ञान प्रकाश ।  
सर्व प्रिय इससे रहे, महन्त नरायण दास ॥३॥
ग्राम भूमि दी नृपों ने, श्रद्धा करके आप ।  
तदपि राग से रहित रहे, मिटा द्वन्द्व की ताप ॥४॥
नारायण आचार्य में, रही संत जन प्रीति । 
क्योंकि सदा उनमें रही, समता पूरण नीति ॥५॥ 
सेवक श्रद्धा के रहे, पात्र नरायणदास ।  
इससे सेवक उन्हों के, आते थे बहु पास ॥६॥
नारायण के चित्त की, नारायण से प्रीति ।
‘नारायण’ अद्भुत रही, कही न जात वह रीति ॥७॥ 
नारायण आचार्य को, ‘नारायण’ नति नित्य ।  
क्योंकि असत को त्यागकर, प्राप्त किया था सत्य ॥८॥
नारायण आचार्य का, नारायण से नेह ।  
मिले इसीसे ब्रह्म में, त्याग अनात्मा देह ॥९॥ 
इति श्री दशम अध्याय समाप्त: १० 
(क्रमशः) 

*१५. मन कौ अंग ४९/५२*

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१५. मन कौ अंग ४९/५२*
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देह रूप मन ह्वै रह्यौ, कियौ देह अभिमान । 
सुन्दर समुझै आपकौं, आपु होइ भगवान ॥४९॥
जब हमारा यह मन स्व देह का निरन्तर चिन्तन करता है तो यह देहाभिमानी(देह ही सब कुछ है- इस मत का पोषक) हो जाता है । परन्तु जब यह स्व स्वरूप का यथार्थ समझ लेता है तो इसे भगवत्स्वरूप होने में कुछ भी विलम्ब नहीं लगता ॥४९॥
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जब मन देखै जगत कौं, जगत रूप ह्वै जाइ । 
सुन्दर देखै ब्रह्म कौं, तब मन ब्रह्म समाइ ॥५०॥
जब यह जगत(पति पत्नी, पुत्र आदि में) व्यामोह कर लेता है तो यह जगद्रूप हो जाता है, तथा जब यही मन उस निरञ्जन निराकार का निरन्तर चिन्तन करने लगता है तो यह तन्मय हो जाता है ॥५०॥
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मन ही कौ भ्रम जगत सब, रज्जु मांहिं ज्यौं साप । 
सुन्दर रूपौ सीप मैं, मृग तृष्णा मंहिं आप ॥५१॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - यह समस्त संसार मन का एकान्ततः भ्रममात्र(कल्पनासुष्टि) है; जैसे कि अन्धकार में रज्जु को भी सर्प समझ लिया जाता है । या शुक्ति(सीपी) में रजत का भ्रम हो जाता है । या मरुभूमि में, चमक के कारण मृगतृष्णा(जल का भ्रम) दिखायी देने लगती है । ऐसा ही भ्रम इस देहाभिमानी मन का समझना चाहिये ॥५१॥
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जगत बिझूका देखि करि, मन मृग मानै संक । 
सुन्दर कियौ बिचार जब, मिथ्या पुरुष करङ्क ॥५२॥
जैसे कोई किसान, मृगों से अपने खेत की रक्षा के लिये, मानव के आकार की कोई भयोत्पादक वस्तु(= बिझुका) खड़ी कर देता है तो उस से मृग डर उस खेत को हानि नहीं पहुँचाते; या अन्धकार में किसी स्थाणु(सूखे वृक्ष का ठूंठ) को देखकर उसे नरकङ्काल समझता हुआ कोई मनुष्य भय माने; वही भ्रमात्मक स्थिति संसार के विषय में हमारे मन की है ॥५२॥
(क्रमशः) 

विवेकानन्द व अवतारवाद

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🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*दादू गुप्त गुण परगट करै, परगट गुप्त समाइ ।*
*पलक मांहि भानै घड़ै, ताकी लखी न जाइ ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*(१०)श्रीरामकृष्ण, स्वामी विवेकानन्द व अवतारवाद*
दक्षिणेश्वर मन्दिर में भगवान श्रीरामकृष्ण बलराम आदि भक्तों के साथ बैठे हैं । १८८५ ई., ७ मार्च, दिन के ३-४ बजे का समय होगा ।
भक्तगण श्रीरामकृष्ण की चरणसेवा कर रहे हैं, - श्रीरामकृष्ण थोड़ा हँसकर भक्तों से कह रहे हैं - "इसका(अर्थात् चरणसेवा का) विशेष तात्पर्य है ।" फिर अपने हृदय पर हाथ रखकर कह रहे हैं, "इसके भीतर यदि कुछ है,(चरणसेवा करने पर) अज्ञान-अविद्या एकदम दूर हो जायगी ।"
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एकाएक श्रीरामकृष्ण गम्भीर हुए, मानो कुछ गुप्त बात कहेंगे । भक्तों से कह रहे हैं, "यहाँ पर बाहर का कोई नहीं है । तुम लोगों से एक गुप्त बात कहता हूँ । उस दिन देखा, मेरे भीतर से सच्चिदानन्द बाहर आकर प्रकट होकर बोले, 'मैं ही युग-युग में अवतार लेता हूँ ।' देखा, पूर्ण आविर्भाव; सत्त्वगुण का ऐश्वर्य है ।"
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भक्तगण ये सब बातें विस्मित होकर सुन रहे हैं; कोई कोई गीता में कहे हुए भगवान श्रीकृष्ण के महावाक्य की याद करा रहे हैं –
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्म संस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥
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दूसरे एक दिन, १ सितम्बर १८८५, जन्माष्टमी के दिन नरेन्द्र आदि भक्त आये हैं । श्री गिरीश घोष दो-एक मित्रों को साथ लेकर गाड़ी करके दक्षिणेश्वर में उपस्थित हुए । वे रोते रोते आ रहे हैं । श्रीरामकृष्ण स्नेह के साथ उनकी देह थपथपाने लगे । गिरीश सिर उठाकर हाथ जोड़कर कह रहे हैं, "आप ही पूर्ण ब्रह्म हैं । यदि ऐसा न हो तो सभी झूठा है । बड़ा खेद रहा कि आपकी सेवा न कर सका । वरदान दीजिये न भगवन्, कि एक वर्ष आपकी सेवाटहल करूँ ।"
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बार बार उन्हें ईश्वर कहकर स्तुति करने से श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं, "ऐसी बात नहीं कहनी चाहिए । भक्तवत् न च कृष्णवत्; तुम जो कुछ सोचते हो, सोच सकते हो । अपने गुरु भगवान तो हैं, तो भी ऐसी बात कहने से अपराध होता है ।"
गिरीश फिर श्रीरामकृष्ण की स्तुति कर रहे हैं, "भगवन्, मुझे पवित्रता दो, जिससे कभी रत्तीभर भी पाप-चिन्तन न हो ।"
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श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं - "तुम तो पवित्र हो, - तुम्हारी विश्वास-भक्ति जो है ।"
१ मार्च १८८५ ई. होली के दिन नरेन्द्र आदि भक्तगण आये हैं । उस दिन श्रीरामकृष्ण नरेन्द्र को संन्यास का उपदेश दे रहे हैं और कह रहे हैं, "भैया, कामिनी-कांचन न छोड़ने से नहीं होगा । ईश्वर ही एकमात्र सत्य है और सब अनित्य ।" कहते कहते वे भावपूर्ण हो उठे । वही दयापूर्ण सस्नेह दृष्टि ।
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भाव में उन्मत्त होकर गाना गाने लगे –
संगीत - (भावार्थ) - "बात करने में डरता हूँ", आदि ।
मानो श्रीरामकृष्ण को भय है कि कहीं नरेन्द्र किसी दूसरे का न हो जाय, कहीं ऐसा न हो कि मेरा न रहे - भय है, कहीं नरेन्द्र घर-गृहस्थी का न बन जाय । 'हम जो मन्त्र जानते हैं, वही तुम्हें दिया', अर्थात् जीवन का सर्वश्रेष्ठ आदर्श - सब कुछ त्यागकर ईश्वर के शरणागत बन जाना - यह मन्त्र तुझे दिया ।
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नरेन्द्र आँसूभरी आँखों से देख रहे हैं ।
श्रीरामकृष्ण नरेन्द्र से कह रहे हैं, "क्या गिरीश घोष ने जो कुछ कहा, वह तेरे साथ मिलता है ?"
नरेन्द्र - मैंने कुछ नहीं कहा, उन्होंने ही कहा कि उनका विश्वास है कि आप अवतार हैं । मैंने और कुछ भी नहीं कहा ।
श्रीरामकृष्ण - परन्तु उसमें कैसा गम्भीर विश्वास है ! देखा ?
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कुछ दिनों के बाद अवतार के विषय में नरेन्द्र के साथ श्रीरामकृष्ण का वार्तालाप हुआ । श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं, - "अच्छा, कोई-कोई जो मुझे ईश्वर का अवतार कहते हैं - तू क्या समझता है ?"
नरेन्द्र ने कहा, "दूसरों की राय सुनकर मैं कुछ भी नहीं कहूँगा; मैं स्वयं जब समझूँगा तब मेरा विश्वास होगा, तभी कहूँगा ।"
(क्रमशः)

सोमवार, 5 जनवरी 2026

वामाचार

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🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*जीवत लूटै जगत सब, मृतक लूटैं देव ।*
*दादू कहाँ पुकारिये, कर कर मूये सेव ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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(९)स्त्रियों को लेकर साधना(वामाचार) के सम्बन्ध में श्रीरामकृष्ण और स्वामीजी के उपदेश ~
स्वामी विवेकानन्द एक दिन दक्षिणेश्वर मन्दिर में श्रीरामकृष्णदेव का दर्शन करने गये थे । भवनाथ व बाबूराम आदि उपस्थित थे । २९ सितम्बर १८८४ । घोषपाड़ा तथा पंचनामी के सम्बन्ध में नरेन्द्र ने बात चलायी और पूछा, "स्त्रियों को लेकर वे लोग कैसी साधना करते हैं ?"
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श्रीरामकृष्णदेव ने कहा, "ये सब बातें तुझे सुननी न चाहिए । घोषपाड़ा, पंचनामी और भैरव-भैरवी ये लोग ठीक-ठीक साधना नहीं कर सकते, पतन होता है । ये सब पथ मैले हैं, अच्छे पथ नहीं हैं । शुद्ध पथ पर चलना ही ठीक है । वाराणसी में एक व्यक्ति मुझे भैरवी-चक्र में ले गया था । एक-एक भैरव, और एक-एक भैरवी । वे मुझे शराब पीने के लिए कहने लगे । मैंने कहा, 'माँ, मैं शराब छू नहीं सकता ।' 
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वे सब शराब पीने लगे । मैंने सोचा, अब शायद जप-ध्यान करेंगे । लेकिन नहीं, मदिरा पीकर नाचना शुरू कर दिया ।" नरेन्द्र से उन्होंने फिर कहा, "बात यह है, मेरा भाव है मातृ-भाव - सन्तानभाव । मातृभाव अत्यन्त विशुद्ध भाव है, इसमें कोई डर नहीं है । स्त्री-भाव, वीरभाव बहुत कठिन है, ठीक-ठीक रखा नहीं जा सकता, पतन होता है । तुम लोग अपने लोग हो, तुम लोगों से कहता हूँ – मैंने अन्त में यही समझा है - वे पूर्ण हैं, मैं उनका अंश हूँ । वे प्रभु हैं, मैं उनका दास हूँ । फिर कभी कभी सोचता हूँ, वह ही मैं, मैं ही वह । और भक्ति ही सार है ।"
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एक दूसरे दिन(९ सितम्बर १८८३ ई.) दक्षिणेश्वर में श्रीरामकृष्ण भक्तों से कह रहे हैं, "मेरा है सन्तान-भाव । अचलानन्द बीच-बीच में यहाँ पर आकर ठहरता था, खूब मदिरा पीता था । स्त्री लेकर साधन को मैं अच्छा नहीं कहता था, इसलिए उसने मुझसे कहा था, 'भला तुम वीर-भाव का साधन क्यों नहीं मानोगे ? तन्त्र में जो है । - शिवजी का लिखा नहीं मानोगे ? उन्होंने(शिवजी ने) सन्तान-भाव कहा है, फिर वीरभाव भी बताया है ।'
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"मैंने कहा, 'कौन जाने भाई, मुझे वह सब अच्छा नहीं लगता - मेरा सन्तान-भाव ही रहने दो ।'
"उस देश में भगी तेली को इस दल में देखा था - वही औरत लेकर साधन । फिर एक पुरुष के हुए बिना औरत का साधन-भजन न होगा । उस पुरुष को कहते हैं 'रागकृष्ण' । तीन बार पूछता है, 'कृष्ण तूने पा लिया ?' वह औरत भी तीन बार कहती है, 'मैने कृष्ण पा लिया ।' 
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एक दूसरे दिन २३ मार्च १८८४ ई. को श्रीरामकृष्ण राखाल, राम आदि भक्तों से कह रहे हैं - "वैष्णवचरण का वामाचारी मत था । मैं जब उधर श्यामबाजार में गया था तो उनसे कहा, 'मेरा मत ऐसा नहीं है ।' मेरा मातृभाव है । देखा कि लम्बी लम्बी बातें बनाता है और फिर साथ ही व्यभिचार भी करता है । वे लोग देवपूजा, मूर्तिपूजा, पसन्द नहीं करते । जीवित मनुष्य चाहते हैं । उनमें से कई राधातन्त्र का मत मानते हैं; पृथ्वीतत्त्व, अग्नितत्त्व, जलतत्त्व, वायुतत्त्व, आकाशतत्त्व -  विष्ठा, मूत्र, रज, वीर्य, ये ही सब तत्त्व, यह साधन बहुत मैला साधन है; जैसे पैखाने के रास्ते से मकान में प्रवेश करना ।"
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श्रीरामकृष्ण के उपदेशानुसार स्वामी विवेकानन्द ने भी वामाचार की खूब निन्दा की है । उन्होंने कहा है, "भारतवर्ष के प्रायः सभी स्थानों में विशेष रूप से बंगाल प्रान्त में, गुप्त रूप से अनेक व्यक्ति ऐसी साधना करते हैं । वे वामाचार तन्त्र का प्रमाण दिखाते हैं । उन सब तन्त्रों का त्याग कर लड़कों को उपनिषद, गीता आदि शास्त्र पढ़ने को देना चाहिए ।"
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स्वामी विवेकानन्द ने विलायत से लौटने के बाद शोभाबाजार के स्व. राधाकान्त देव के देव-मन्दिर में वेदान्त के सम्बन्ध में एक सारगर्भित भाषण दिया था, उसमें औरतों को लेकर साधना करने की निन्दा करके निम्नलिखित बातें कही थीं -
"...यह घृण्य वामाचार छोड़ो, जो देश का नाश कर रहा है । तुमने भारत के अन्यान्य भाग नहीं देखे । 
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जब में देखता हूँ कि हमारे समाज में कितना वामाचार फैला हुआ है, तब उन्नति का इसे बड़ा गर्व रहने पर भी मेरी नजरों में यह अत्यन्त गिरा हुआ मालूम होता है । इन वामाचार सम्प्रदायों ने मधुमक्खियों की तरह हमारे बंगाल के समाज को छा लिया है । वे ही, जो दिन को गरजते हुए आचार के सम्बन्ध में प्रचार करते हैं, रात को घोर पैशाचिक कृत्य करने से बाज नहीं आते, और अति भयानक ग्रन्थसमूह उनके कर्म के समर्थक हैं । 
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इन्हीं शास्त्रों की आज्ञा मानकर वे उन घोर दुष्कर्मों में हाथ देते हैं । तुम बंगालियों को यह विदित है । बंगालियों के शास्त्र वामाचार-तन्त्र हैं । ये ग्रन्थ ढेरों प्रकाशित होते हैं, जिन्हें लेकर तुम अपनी सन्तानों के मन को विषाक्त करते हो, किन्तु उन्हें श्रुतियों की शिक्षा नहीं देते । ऐ कलकत्तावासियों, क्या तुम्हें लज्जा नहीं आती कि अनुवादसहित वामाचार-तन्त्रों का यह बीभत्स संग्रह तुम्हारे बालकों और बालिकाओं के हाथ रखा जाय, उनका चित्त विषविह्वल हो और वे जन्म से यही धारणा लेकर पलें कि हिन्दुओं के शास्त्र ये वामाचार ग्रन्थ हैं ? 
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यदि तुम लज्जित हो तो अपने बच्चों से उन्हें अलग करो, और उन्हें यथार्थ शास्त्र - वेद, गीता, उपविषद् - पढ़ने दो । ..." 
-'भारत में विवेकानन्द' से उद्धृत
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काशीपुर बगीचे में श्रीरामकृष्ण जब (१८८६ ई.) बीमार थे, तो एक दिन नरेन्द्र को बुलाकर बोले, 'भैया, यहाँ पर कोई शराब न पीये । धर्म के नाम पर मदिरा पीना ठीक नहीं; मैंने देखा है, जहाँ ऐसा किया गया है, वहाँ भला नहीं हुआ ।'
(क्रमशः)

जयपुर नरेश की रसोई ~

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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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१२ आचार्य नारायणदास जी ~
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जयपुर नरेश की रसोई ~
वि. सं. १९०९ कार्तिक कृष्णा १ को जयपुर नरेश सवाई रामसिंहजी ने आचार्य नारायणदासजी महाराज को शिष्य मंडल के सहित भोजनार्थ निमंत्रण देकर जिमाने के लिये सत्कार पूर्वक अपने बादल महल में बुलाया और विधि सहित भोजन कराकर ११ स्वर्ण मुद्रा, दुशाला आदि भेंट दी और उदयपुरिया ग्राम भी आचार्यजी के समर्पण किया कहा भी है - 
जैपुर नरपति रामने, पधराये निज धाम । 
भक्ति भाव पद पूजके, भेंट चढायो ग्राम ॥
(दादू चरित्र चन्द्रिका) 
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उसका पट्टा वि. सं. १९१० फाल्गुण कृष्णा १२ को होकर नारायणा दादूद्वारे में आचार्य नारायणदासजी महाराज के पास आया । नारायणा ग्राम से दक्षिण की ओर चार मील पर पांच सौ बीघा का बीड हैं, उस का पट्टा भी दादूद्वारे के नाम कर दिया गया । उसका पट्टा वि. सं. १९०९ आश्‍विन शुक्ला १५ को दादूद्वारे को दिया गया । पास के एक कुये पर माली लोग साधुओं को कष्ट देते थे । जयपुर नरेश को यह ज्ञात होने पर १९ बीघा भूमि के साथ कुआ शम्भू वाले का पट्टा भी राज्य से मिला । 
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घाटडे के महन्त का सम्मान ~ 
वि. सं. १९०९ के नारायणा दादूद्वारे के मेले में आचार्य नारायणदासजी महाराज ने जमात के पंचों के आग्रह से घाटडा के महन्त हरिचरणजी की भेंट लेकर उनको छडी रखने का अधिकार दिया तथा जमातों के ११ अखाडों के महन्तों के समान ही घाटडे के महन्तों का सम्मान करना नियत किया ।
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पूर्वाचार्यों की चरण प्रतिष्ठा ~ 
आचार्य नारायणादासजी महाराज ने अपने पूर्वाचार्य दिलेरामजी महाराज तथा प्रेमदासजी महाराज के चरणों की प्रतिष्ठा कराकर पूजा बांटी थी । इसी वर्ष सभी जमातों के भेष का धर्म अखाडा बना था और सब जमातों को मिठाई बांटी गई थी । बांटने में कोई भी प्रकार की त्रुटी नहीं होनी जाहिये, इसका पूरा पूरा ध्यान रखने की कर्मचारियों को आज्ञा दी । 
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सांभर गमन ~ 
वि. सं. १९१० में आचार्य नारायणदासजी महाराज सांभर निजामत के ग्रामों में रामत करते हुये जब सांभर पहुँचे तब जयपुर तथा जोधपुर राज्य के हाकिम और नगर के भक्तों ने बाजे गाजे के साथ संकीर्तन करते हुये आचार्य नारायणदासजी महाराज की अगवानी की । आचार्यजी की मर्यादा के अनुसार प्रणामादि शिष्टाचार के पश्‍चात् संकीर्तन करते हुये नगर के मुख्य बाजार से नगर में लाये और श्री दादू मंदिर पर लाकर ठहराया । 
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फिर आचार्य जी के प्रसाद बांटने पर शोभा यात्रा समाप्त हो गई और जब तक आचार्य नारायणदासजी महाराज सांभर में विराजे तब तक सांभर के भक्तों ने महाराज की सेवा का पूर्ण रुप से ध्यान रखा तथा अति प्रेम से सत्संग किया । सांभर के भक्तों की सेवा की सेवा श्‍लाघनीय रही । आचार्यजी जब सांभर से पधारने लगे तब उनकी मर्यादा के समान सस्नेह उनको विदा किया । 
(क्रमशः)

*१५. मन कौ अंग ४५/४८*

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१५. मन कौ अंग ४५/४८*
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मन ही बडौ कपूत है, मन ही महा सपूत । 
सुन्दर जौ मन थिर रहै, तौ मन ही अबधूत ॥४५॥
हमारा यह मन कभी कुकृत्य करता हुआ 'कपूत'(कुपुत्र) प्रतीत होने लगता है तथा कभी सत्कृत्य करता हुआ 'सपूत'(सुपुत्र) प्रतीत होता है । यदि यह मन स्थिर(एकाग्र) होकर भगवद्भजन में निरन्तर लगा रहे तो इसे 'अवधूत'(ज्ञानी, सिद्ध पुरुष) भी कहा जा सकता है ॥४५॥
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मन ही यह बिस्तरि रह्यौ, मन ही रूप कुरूप । 
सुन्दर यहु मन जीव है, मन ही ब्रह्म स्वरूप ॥४६॥
श्रीसुन्दरदासजी महाराज कहते हैं - यह समस्त संसार हमारे मन का ही विस्तार है । इसी के कारण कभी हमें कोई वस्तु सुरूप(सुन्दर) दिखायी देती है, कभी कुरूप(असुन्दर) । यह मन अपने ही कृत्यों(कल्पनाओं) से कभी 'जीव'(संसार में मुग्ध) दिखायी देता है और कभी(संसार से विरक्ति दिखाता हुआ) यह 'ब्रह्म'(निरञ्जन, निराकार) रूप धारण कर लेता है ॥४६॥
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सुन्दर मन मन सब कहैं, मन जान्यौ नहिं जाइ । 
जौ या मन कौं जांणिये, तौ मन मनहिं समाइ ॥४७॥
इस मन को सभी लोग 'मन' कहते हैं; परन्तु इस मन की यथार्थता(वास्तविकता) कोई नहीं जान पाता । जो बुद्धिमान् इस मन की वास्तविकता को जान ले तो वह मन को उसमें ही लीन(एकाग्र) कर सकता है ॥४७॥
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मन कौ साधन एक है, निस दिन ब्रह्म बिचार । 
सुन्दर ब्रह्म बिचार तें, ब्रह्म होत नहिं बार ॥४८॥
इस मन को एकाग्र(स्थिर) करने का एकमात्र यही उपाय है कि साधक निरन्तर निरञ्जन निराकार प्रभु के ही चिन्तन में लगा रहे । इस निरञ्जन निराकार के चिन्तन से इस मन को निरञ्जन निराकार प्रभुमय होने में कोई विलम्ब नहीं लगता ॥४८॥
(क्रमशः)

रविवार, 4 जनवरी 2026

गीतोक्त कर्मयोग

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🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*काया की संगति तजै, बैठा हरि पद मांहि ।*
*दादू निर्भय ह्वै रहै, कोई गुण व्यापै नांहि ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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केवल लोक-शिक्षा के लिए ईश्वर ने उनसे ये सब कर्म करा लिये । अब साधु या संसारी सभी सीखेंगे कि यदि वे भी कुछ दिन एकान्त में गुरु के उपदेशानुसार साधना करके ईश्वर की भक्ति प्राप्त करे, तो वे भी स्वामीजी की तरह निष्काम कर्म कर सकेंगे; सचमुच में अनासक्त होकर दानादि सत्कर्म कर सकेंगे ।
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स्वामीजी के गुरुदेव श्रीरामकृष्ण कहा करते थे, "हाथ में तेल मलकर कटहल काटने से हाथ न चिपकेगा ।" अर्थात् एकान्त में साधना के बाद भक्ति प्राप्त करके, ईश्वर का निर्देश पाकर लोकशिक्षा के लिए यदि संसार के काम में हाथ डाला जाय, तो ईश्वर की कृपा से यथार्थ में निर्लिप्त भाव से काम किया जा सकता है ।
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स्वामी विवेकानन्द के जीवन को ध्यानपूर्वक देखने से 'एकान्त में साधना' तथा 'लोक-शिक्षा के लिए कर्म' किसे कहते हैं इसका पता लगा सकता है । स्वामी विवेकानन्द के ये सब कर्म लोक-शिक्षा के लिए थे ।
कर्मणैव हि संसिद्विमास्थिता जनकादयः ।
लोकसंग्रहमेवापि संपश्यन् कर्तुमर्हसि ॥
यह गीतोक्त कर्मयोग बहुत ही कठिन है । जनक आदि ने कर्म के द्वारा सिद्धि प्राप्त की थी ।
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श्रीरामकृष्णदेव कहा करते थे कि जनक ने अपने सांसारिक जीवन के पूर्व, जंगल में एकान्त में बैठकर बहुत कठोर तपस्या की थी । इसलिए साधुगण ज्ञान और भक्ति का पथ अवलम्बन करके, संसार का कोलाहल छोड़कर एकान्त में ईश्वर-साधन करते हैं । स्वामी विवेकानन्द की तरह उत्तम अधिकारी वीर-पुरुष इस कर्मयोग के अधिकारी हैं ।
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वे भगवान को अनुभव करते हैं, और साथ ही लोकशिक्षा के लिए, ईश्वर का आदेश पाकर संसार में कर्म करते हैं । इस प्रकार के महापुरुष संसार में कितने हैं ? ईश्वर के प्रेम में मतवाले, कामिनी-कांचन का दाग एक भी न लगा हो, परन्तु जीवसेवा के लिए व्यस्त होकर घूम रहे हैं, ऐसे आचार्य कितने देखने में आते हैं ?
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स्वामीजी ने लन्दन में १० नवम्बर १८९६ को वेदान्त के कर्मयोग की व्याख्या करते हुए गीता का विवरण देते हुए कहा था –
"... और यह आश्चर्य की बात है कि इस उपदेश का केन्द्र है संग्राम-स्थल । यहीं श्रीकृष्ण अर्जुन को इस दर्शन का उपदेश दे रहे हैं और गीता के प्रत्येक पृष्ठ पर यही मत उज्ज्वल रूप से प्रकाशित है - तीव्र कर्मण्यता, किन्तु उसी के बीच अनन्त शान्तभाव । इसी तत्त्व को कर्मरहस्य कहा गया है और इस अवस्था को पाना ही वेदान्त का लक्ष्य है ।..."
- 'व्यावहारिक जीवन में वेदान्त' से उद्धृत
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भाषण में स्वामीजी ने कर्म के बीच शान्त भाव की बात कही है । स्वामीजी रागद्वेष से मुक्त होकर कर्म कर सकते थे, यह केवल उनकी तपस्या के गुण तथा उनकी ईश्वरानुभूति के बल पर ही सम्भव था । सिद्धपुरुष अथवा श्रीकृष्ण की तरह अवतारीपुरुष हुए बिना यह स्थिरता तथा शान्ति प्राप्त नहीं होती ।
(क्रमशः)

जयपुर नरेश का आना ~

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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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१२ आचार्य नारायणदास जी ~
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जयपुर नरेश का आना ~ 
आश्‍विन कृष्णा १२ को जयपुर नरेश सवाई रामसिंहजी सवारी लगाकर नारायणा दादूधाम के आचार्य नारायणदासजी महाराज के पास पधारे, भेंट चढाकर प्रणाम की और सामने बैठ गये और आचार्यजी से घंटों तक शास्त्र चर्चा सत्संग करते रहे । पश्‍चात् प्रणाम करके राज भवन को चले गये । उक्त प्रकार राजा प्रजा की श्रद्धा आचार्यजी पर बढती ही जाती थी । प्रतिदिन भक्त लोग आते ही रहते थे ।  
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अन्य सरदारों का आना ~ 
एक दिन घूला के रावसाहब भी आये । आचार्य नारायणदासजी महाराज के दर्शन करके अति प्रसन्न हुये शिष्टाचार के अनुसार भेंट चढाकर प्रणाम की और सामने बैठकर बहुत देर तक सत्संग करते रहे । अपनी शंकायें निवृत हो जाने पर उनका मन अत्यन्त आनन्द में निमग्न हो गया और फिर तो वे बारंबार सत्संग के लिये आते ही रहते थे ।
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बगरु ठाकुर साहिब भी आचार्य नारायणदासजी महाराज के दर्शनार्थ आये और अति सत्कार के साथ अपनी मर्यादा के अनुसार भेंट चढाकर प्रणाम की और सामने बैठकर सत्संग करते रहे । बगरु ठाकुर साहिब के पूर्वज नारायणा दादूधाम पर पूर्ण श्रद्धा रखते आते थे । पूर्वजों के समान ही तत्कालीन ठाकुर साहब ने अपनी श्रद्धा का अच्छा परिचय दिया और प्रणाम कर चले गये किन्तु कभी- कभी फिर आते रहते थे ।
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राज माता की रसोई ~ 
श्रीमती राजमाता सीसोदणजी ने शिष्य मंडल के सहित आचार्य नारायणदासजी महाराज को रसोई दी । बहुत सुन्दर पदार्थ बनवाकर अति प्रीति से आचार्यजी और संतों को जिमाया और आचार्यजी की मर्यादा के अनुसार भेंट दी, तथा सब संतों का भी अच्छा सत्कार किया । 
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राजमाता जी की श्रद्धा भक्ति अति श्‍लाघनीय थी । उक्त प्रकार आचार्यजी और संतों को भोजन कराकर माताजी अति प्रसन्न हुई थी । आचार्यजी तथा संत मंडल का शुभाशीर्वाद प्राप्त करके राजमाताजी का हृदय आनन्द से भर गया था । चातुर्मास करके भी आचार्यजी भक्तों के आग्रह से जयपुर अधिक ठहरे थे ।
(क्रमशः) 

*१५. मन कौ अंग ४१/४४*

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१५. मन कौ अंग ४१/४४*
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साधत साधत दिन गये, करहिं और की और । 
सुन्दर एक बिचार बिन, मन नहिं आवै ठौर ॥४१॥
मनोनिग्रह का एकमात्र उपाय : साधना करते करते इतना समय व्यतीत हो गया । इस लम्बी अवधि में तुमने सफलता के विपरीत ही कार्य किया है । महाराज सुन्दरदासजी के मत में, विचार विवेक के अतिरिक्त अन्य किसी भी उपाय से किसी का मन स्थिर(निगृहीत) नहीं हो सकता ॥४९॥
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सुन्दर यह मन रंक ह्वै, कबहूं ह्वै मन राव । 
कबहूं टेढौ ह्वै चलै, कबहूं सूधे पाव ॥४२॥
यह मन, अपनी चञ्चलता के कारण, कभी अपने को दरिद्र मान लेता है और कभी राजा । कभी वृथाभिमान में उन्मत्त हो जाता है तो कभी अनायास ही अतिशय विनयशील(सूधे पाव) बन जाता है ॥४२॥
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सुन्दर कबहूं ह्वै जती, कबहूं कामी जोइ । 
मन कौ यहै सुभाव है, तातौ सियरौ होइ ॥४३॥
कभी यह ऐसा लगता है कि बहुत बड़ा यति(संन्यासी) हो या कभी ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे यह बहुत बड़ा कामभोगी हो । मन का ऐसा स्वभाव ही है कि कभी यह, विचारों से उद्वेलित हो कर, तप्त(उष्ण स्वभाव वाला) प्रतीत होता है, कभी शीतल(सियरौ) स्वभाव वाला ॥४३॥
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पाप पुन्य यह मैं कियौ, स्वर्ग नरक हूं जांउं । 
सुन्दर सब कछु मानि ले, ताही तें मन नांउं ॥४४॥ 
कभी यह समझने लगता है कि ये सब पाप-पुण्य करने वाला मैं ही हूँ, और कभी समझने लगता है कि इन पाप पुण्यों के कारण, मुझे ही नरक या स्वर्ग भोगना पड़ेगा । महाराज कहते हैं - यह सब कुछ मानता रहता है अतएव इसका नाम 'मन' है ॥४४॥
(क्रमशः)

शनिवार, 3 जनवरी 2026

*१५. मन कौ अंग ३७/४०*

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१५. मन कौ अंग ३७/४०*
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सुन्दर साधन करत है, मन जीतन कै काज । 
मन जीतै उन सबनि कौं, करै आपनौ राज ॥३७॥
ऐसे साधक अपने मन को जीतने(वश में करने) के लिये अनेक साधनाएँ(उपाय) करते हैं; परन्तु होता इसके विरुद्ध ही है कि मन इन को अपने अधीन कर उनसे अपना अभीष्ट कार्य पूर्ण कर उनको अपने वश में कर लेता है ॥३७॥
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साधन करहिं अनेक बिधि, देहिं देह कौं दण्ड । 
सुन्दर मन भाग्यौ फिरै, सप्त दीप नौ खण्ड ॥३८॥
यद्यपि वे साधक एतदर्थ साधना करते हुए अपने शरीर को नाना प्रकार के कष्ट(दण्ड) देते हैं; परन्तु उन का मन तब भी इतना चञ्चल है कि वह संसार के इस कोण से उस कोण तक(सात द्वीप, नौ खण्ड) दौड़ता ही रहता है ॥३८॥
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सुन्दर आसन मारि कै, साधि रहे मुख मौंन । 
तन कौ राखै पकरि कैं, मन पकरै कहि कौंन ॥३९॥
उनमें से इस मनोनिग्रह के लिये कोई जीवनपर्यन्त किसी एक विशेष आसन लगाकर कठोर तप करता है, या कोई जीवनपर्यन्त मौनव्रत धारण कर संसार से दूर रहने का अभिनय करता है; परन्तु उन से कोई पूछे कि आप में से कितने लोग अपने मन पर निग्रह कर पाये हैं ! ॥३९॥
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तन कौ साधन होत है, मन कौ साधन नांहिं । 
सुन्दर बाहर सब करैं, मन साधन मन मांहिं ॥४०॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - सचाई यह है कि इन कठोर उपायों से शरीर को भले ही निगृहीत किया जा सकता है, परन्तु मन को ऐसे किसी भी प्रकार से निगृहीत नहीं किया जा सकता; क्योंकि ये सभी बाह्य साधन स्थूल शरीर को निगृहीत करने में समर्थ ही हैं । सूक्ष्म मन के निग्रह हेतु ऐसे सूक्ष्म साधनों की आवश्यकता होती है जिनसे आन्तरिक साधना की जा सके ॥४०॥
(क्रमशः)

कर्मयोग और दरिद्रनारायण-सेवा

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🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*समर्थ शूरा साधु सो, मन मस्तक धरिया ।*
*दादू दर्शन देखतां, सब कारज सरिया ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*(८)कर्मयोग और दरिद्रनारायण-सेवा*
श्रीरामकृष्णदेव कहा करते थे, कर्म सभी को करना पड़ता है । ज्ञान, भक्ति और कर्म - ये तीन ईश्वर के पास पहुँचने के पथ हैं । गीता में है, - साधु-गृहस्थ पहले-पहल चित्तशुद्धि के लिए गुरु के उपदेशानुसार अनासक्त होकर कर्म करे । 'मैं करनेवाला हूँ' यह अज्ञान है, 'धन-जन, काम-काज मेरे हैं' - यह भी अज्ञान है ।
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गीता में है, अपने को अकर्ता मानकर, ईश्वर को फल सौंपकर काम करना चाहिए । गीता में यह भी है कि सिद्धि प्राप्त करने के बाद भी प्रत्यादिष्ट होकर कोई कोई, जैसे जनक आदि, कर्म करते हैं । गीता में जो कर्मयोग है, वह यही है । श्रीरामकृष्णदेव भी यही कहते थे । इसीलिए कर्मयोग बहुत कठिन है । बहुत दिन निर्जन में ईश्वर की साधना किये बिना, अनासक्त होकर कर्म नहीं किया जा सकता ।
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साधना की अवस्था में श्रीगुरु के उपदेश की सदा ही आवश्यकता है । उस समय कच्ची स्थिति रहती है इसलिए किस ओर से आसक्ति आ पड़ेगी, जाना नहीं जाता । मन में सोच रहा हूँ, 'मैं अनासक्त होकर, ईश्वर को फल समर्पण कर, जीवसेवा, दान आदि कर्म कर रहा हूँ ।' परन्तु वास्तव में, सम्भव है, मैं यश के लिए ही यह सब कर रहा हूँ, और खुद नहीं समझ पा रहा हूँ ।
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जो आदमी गृहस्थ है, जिसके घर, परिवार, आत्मीय, स्वजन और अपना कहने की चीजें हैं, उसे देखकर निष्काम कर्म, अनासक्ति और दूसरे के लिए स्वार्थ का त्याग, ये सब बातें सीखना बहुत कठिन है । परन्तु सर्वत्यागी, कामिनी-कांचन-त्यागी सिद्ध महापुरुष यदि निष्काम कर्म करके दिखायें तो लोग आसानी से उसे समझ सकते हैं और उनके चरण-चिन्हों का अनुसरण कर सकते हैं ।
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स्वामी विवेकानन्द कामिनी-कांचन त्यागी थे । उन्होंने एकान्त में श्रीगुरु के उपदेश से बहुत दिनों तक साधना करके सिद्धि प्राप्त की थी । वे वास्तव में कर्मयोग के अधिकारी थे । वे संन्यासी थे; वे चाहते तो ऋषियों की तरह अथवा अपने गुरुदेव श्रीरामकृष्णदेव की तरह केवल ज्ञान-भक्ति लेकर रह सकते थे । परन्तु उनका जीवन केवल त्याग का उदाहरण दिखाने के लिए नहीं हुआ था ।
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सांसारिक लोग जिन सब वस्तुओं को ग्रहण करते हैं, उनसे अनासक्त होकर किस प्रकार व्यवहार करना चाहिए, यह भी नारद, शुकदेव तथा जनक आदि की तरह स्वामीजी लोकसंग्रह के लिए दिखा गये हैं । वे धन-सम्पत्ति आदि को काक-विष्ठा की तरह समझते अवश्य थे और स्वयं उनका उपयोग नहीं करते थे, परन्तु फिर भी जीवसेवा के लिए उनका किस प्रकार व्यवहार करना चाहिए इसके बारे में उपदेश देकर वे स्वयं भी करके दिखा गये हैं ।
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उन्होंने विलायत व अमरीका के मित्रों से जो धन एकत्रित किया था, वह सारा धन जीवों के कल्याण के लिए व्यय किया । उन्होंने स्थान स्थान पर - जैसे कलकत्ते के पास बेलुड़ में, अलमोड़ा के पास मायावती में, काशीधाम में तथा मद्रास आदि स्थानों में - मठों की स्थापना की । अनेक स्थानों में - दिनाजपुर, वैद्यनाथ, किशनगढ़, दक्षिणेश्वर आदि स्थानों में - दुर्भिक्ष-पीड़ितों की सेवा की । दुर्भिक्ष के समय अनाथाश्रम बनाकर मातृ-पितृहीन अनाथ बालक-बालिकाओं की रक्षा की ।
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राजपुताना के अन्तर्गत किशनगढ़ नामक स्थान में अनाथाश्रम की स्थापना की । मुरशिदाबाद के निकट (भीवदा) सारगाछी गाँव में तो अभी तक उसी समय का अनाथश्रम चल रहा है । हरिद्वार के निकट कनखल में रोगपीड़ित साधुओं के लिए स्वामीजी ने सेवाश्रम की स्थापना की । प्लेग के समय रोगियों की विपुल धन व्यय करके सेवा करायी । वे दीन, दुःखी तया असहायों के लिए अकेले बैठकर रोते थे और मित्रों से कहते थे, "हाय ! इन लोगों को इतना कष्ट है कि इन्हें ईश्वर-चिन्तन का अवसर तक नहीं है !"
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गुरु से उपदिष्ट कर्मों और नित्य-कर्मों को छोड़, दूसरे कर्म तो बन्धन के कारण हैं । वे संन्यासी थे, उन्हें कर्म की क्या आवश्यकता ?
"... 'अपने अपने कर्मों का फल-भोग जगत् में निश्वित'
कहते हैं सब, 'कारण पर है सभी कार्य अवलम्बित;
फल अशुभ, अशुभ कर्मों के; शुभ कर्मों के हैं शुभ फल,
किसकी सामर्थ्य बदल दे, यह नियम अटल औ' अविचल ?
इस मृत्युलोक में जो भी करता है तनु को धारण,
बन्धन उसके अंगों का होता नैसर्गिक भूषण ।'
यह सच है, किन्तु परे जो गुण नाम-रूप से रहता,
वह नित्य मुक्त आत्मा है, स्वच्छन्द सदैव विचरता ।
'तत् त्वमसि' - वहीं तो तुम हो, यह ज्ञान करो ह्रदयांकित
फिर क्या चिन्ता संन्यासी, सानन्द करो उ‌द्घोषित –
'ॐ तत् सत् ॐ !'..."...... - 'कवितावली' से उद्धृत
(क्रमशः)

भैराणा में चरणस्थापना ~

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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१२ आचार्य नारायणदास जी ~
भैराणा में चरणस्थापना ~ 
वि. सं. १९०९ में आचार्य नारायणदासजी महाराज ने आचार्य दिलेरामजी महाराज चरणस्थापन रुप उत्सव कराया । इस उत्सव में अनेक महंत संत पधारे तथा संतों की भी संख्या अच्छी रही । अच्छा सत्संग कीर्तन हुआ । अच्छी रसोई हुई । उत्सव बहुत आनन्द के साथ संपन्न हुआ ।
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रामरत्न जी के चातुर्मास ~ 
वि. सं. १९०९ का चातुर्मास आचार्य नारायणदासजी महाराज का रामरत्नजी रतीरामजी जयपुर वालों ने मनाया था । उनके चातुर्मास करने आचार्य नारायणदासजी महाराज शिष्य मंडल के सहित आषाढ शुक्ला १३ को जयपुर पधारे थे । 
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राजाओं के राज्य के समय में नारायणा दादूधाम के आचार्य जब भी जयपुर पधारते थे तब राजा को सूचना देते थे और राजा की ओर से अगवानी को लवाजमा लेकर मंत्री व कोई सरदार आकर जयपुर नगर में प्रवेश कराते थे । अपनी उस प्रथा के अनुसार जयपुर नरेश को सूचना मिलने पर जयपुर राज्य की ओर से अगवानी के लिये नाजिम व पांच सरदार- हाथी, निशान, अर्वीबाजा आदि लेकर आये । 
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रामचन्द्र दारोगा, बेटा बलदेव, मथुरादास और रावल शिंवसिंहजी सामोद वालों ने जयपुर नरेश की ओर से अगवानी की भेंट दी । फिर आवश्यक प्रश्‍नोत्तर हो जाने पर आचार्य नारायणादासजी महाराज को हाथी पर बैठा कर आचार्य तथा संत मंडल का दर्शन जनता को कराते हुये मुख्य- मुख्य बाजारों से शोभा यात्रा को ले जाते हुये रामरत्न जी रतीराम जी के स्थान पर पहुँचा दिया । 
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यहाँ आचार्यजी ने सबको प्रसाद दिया और शोभा यात्रा समाप्त हो गई । रामरत्न जी के यहां सविधि चातुर्मास आरंभ हो गया । दादूवाणी का गंभीर प्रवचन सुनने के लिये नगर के माने हुये सज्जन लोग भी आते थे । रसोइयां भी देते थे । सामोद के रावल शिंवसिंहजी ने रसोइ दी, भेंट तथा दुशाला भी चढाया । 
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चोमूं ठाकुर लक्ष्मणसिंहजी तथा बोराज के ठाकुर शिवसिंहजी आचार्य नारायणदासजी के दर्शन करने आये और भेंट चढाकर दोनों ठाकुरों ने प्रणाम किया तथा आचार्यजी के सामने बैठकर सत्संग किया । इस चातुर्मास के समय जयपुर नगर के धनीमानी लोगों ने स्थान- स्थान पर आचार्य नारायणदासजी की पधरावनी कराई थी ।  
(क्रमशः) 

शुक्रवार, 2 जनवरी 2026

जमुनाबाई के चातुर्मास ~

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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१२ आचार्य नारायणदास जी ~
जमुनाबाई के चातुर्मास ~ 
माधोपुर की जमुनाबाई जी ने मनाया और बहुत अच्छी प्रकार चातुर्मास की व्यवस्था की । आचार्य नारायणदासजी महाराज शिष्य मंडल के सहित चातुर्मास के लिये पधारे । माधोपुर के भक्तगणों ने आचार्यजी की तथा संत मंडल की अगवानी विधि पूर्वक की और बाजे गाजे सहित संकीर्तन करते हुये लाकर नियत स्थान में ठहराया । 
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चातुर्मास का सत्संग आरंभ हो गया । चातुर्मास में जो २ कार्य होते हैं वे सब सदा की भांति होने लगे । आचार्य जी तथा संतों की सेवा का पूर्ण प्रबन्ध करा दिया गया था । संत सेवा के लिये जमुनाबाईजी उदारता से धन खर्च कर रही थी अत: संतों की सेवा में कमी आने का प्रसंग ही नहीं आता था । 
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सत्संग के कार्यक्रम प्रात: दादूवाणी प्रवचन, मध्यदिन में अन्य ग्रंथों के प्रवचन चलते थे । संकीर्तन, जागरण, नामध्वनि सभी कार्य सुचारु रुप से चल रहे थे । बडी शांति से चातुर्मास संपन्न हुआ । समाप्ति पर आचार्य जी को मर्यादानुसार भेंट अन्य कर्मचारियों को उनका दस्तूर, सब संतों को वस्त्र मर्यादानुसार देकर सस्नेह सबको विदा किया था । 
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रत्नदासजी के चातुर्मास ~ 
वि. सं. १९०८ का चातुर्मास रत्नदासजी पापडदा वालों ने मनाया था । आचार्य नारायणदासजी महाराज शिष्य मंडल के सहित रामत करते हुये समय पर पापडदा पधारे । रत्नदासजी ने विधि सहित सामेला(अगवानी) किया और लाकर स्थान पर ठहराया । चातुर्मास संबन्धी व्यवस्था सुचारु रुप से कर दी गई । चातुर्मास का कार्यक्रम यथा विधि आरंभ हो गया । 
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प्रात: समय पर दादूवाणी की कथा, कीर्तन मध्यदिन में कथा, कीर्तन, सायं आरती, अष्टक , नामध्वनि, एकादशी आदि को जागरण आदि सब सविधि होने लगे । अन्त के दिनों में आसपास के स्थानधारी संतों की तथा भक्तों की रसोइयां आने लगीं थीं । अच्छा जनसमुदाय बना रहता था । संत सेवा का अच्छा प्रबन्ध था । चातुर्मास समाप्ति पर आचार्यजी को मर्यादानुसार भेंट, संतों को वस्त्र देकर विदा किया था ।
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निवाई जमात में गमन ~ 
पापडदा का चातुर्मास करके आचार्य निवाई की जमात में पधारे । जमात में संतों का अच्छा समागम रहा । अच्छी रसोइयां हुई । सत्संग भी बहुत अच्छा हुआ । निवाई से विदा होकर रामत में मार्ग की धार्मिक जनता को निर्गुण भक्ति का उपदेश करते हुये शनै: शनै: नारायणा दादूधाम में पधार गये । 
(क्रमशः) 

*१५. मन कौ अंग ३३/३६*

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१५. मन कौ अंग ३३/३६*
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सुन्दर अरहट माल पुनि, चरखा बहुरि फिरात । 
धूंवा ज्यौं मन उठि चलै, कापै पकर्यौ जात ॥३३॥
महाराज श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - प्राणियों का मन लोक में उसी प्रकार घूमता रहता है जैसे अरहट या सूत कातने का चरखा चलता रहता है । आश्रयस्थान से निकलने के बाद इस को उसी प्रकार नियन्त्रित नहीं किया जा सकता, जैसे आकाश में पहुँचा हुआ अग्नि का धूंआ किसी की पकड़(नियन्त्रण) से बाहर हो जाता है ॥३३॥
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मन बसि करने कहत हैं, मन कै बसि ह्वै जांहि । 
सुन्दर उलटा पेच है, समझि नहीं घट मांहिं ॥३४॥
आज कल के पाषण्डी गुरु अपने शिष्यों को ऐसे मन पर निग्रह करने का उपदेश करते हैं; परन्तु स्वयं उसके वश में(अधीन) रहते हैं । यद्यपि देखने समझने में यह बात विपरीत सी लगती है; परन्तु यह उन(गुरुओं) का बुद्धिभ्रम(पेच) है; क्योंकि वे यथार्थ में ज्ञानी नहीं है ॥३४॥
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मन कौं मारत बैठि करि, मन मारै वै अंध । 
सुन्दर घोरे चढन को, घोरा बैठ्यौ कंध ॥३५॥
पाषण्डी शिष्य : ऐसे पाषण्डी गुरुओं द्वारा उपदिष्ट शिष्य अपने मन को नियन्त्रित करने हेतु आराधना आरम्भ करते हैं; परन्तु वे स्वयं उस मन के नियन्त्रण में हो जाते हैं । उन ने मन में कल्पना की घोड़े पर चढने की; परन्तु वह अनियन्त्रित घोड़ा उन पर ही चढ बैठता है ॥३५॥
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सुन्दर करत उपाइ बहु, मन नहिं आवै हाथ । 
कोई पीवै पवन कौं, कोई पीवै काथ ॥३६॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - ऐसे मिथ्योपदिष्ट शिष्य अपने मन को निगृहीत करने के अनेक उपाय करते हैं; परन्तु उन उपायों से उन का मन उनके अधीन नहीं हो पाता । उन में से कोई वायु पीकर ही अपने मन को वश में करना चाहता है, या कोई अन्य साधक, वैसा करने हेतु कुछ विशिष्ट औषधियों से बना क्वाथ(काढा) पीने लगता है ॥३६॥
(क्रमशः) 

कामिनीकांचन-त्याग – संन्यास

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🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*दादू यहु घट दीपक साध का,*
*ब्रह्म ज्योति प्रकाश ।*
*दादू पंखी संतजन, तहाँ परैं निज दास ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*(७)कामिनीकांचन-त्याग – संन्यास*
एक दिन श्रीरामकृष्ण और विजयकृष्ण गोस्वामी दक्षिणेश्वर के कालीमन्दिर में वार्तालाप कर रहे थे ।
श्रीरामकृष्ण - (विजय के प्रति) - कामिनी-कांचन का त्याग किये बिना लोक-शिक्षा नहीं दी जा सकती । देखो न, यही न कर सकने के कारण केशव सेन का अन्त में क्या हुआ ! तुम स्वयं ऐश्वर्य में, कामिनी-कांचन के भीतर रहकर यदि कहो 'संसार अनित्य है, ईश्वर ही नित्य है', तो कौन तुम्हारी बात सुनेगा ? तुम अपने पास तो गुड़ का घड़ा रखे हुए हो, और दूसरों से कह रहे हो - 'गुड़ न खाना !' इसीलिए सोच समझकर चैतन्यदेव ने संसार छोड़ा था । नहीं तो जीव का उद्धार नहीं होता ।
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विजय - जी हाँ, चैतन्यदेव ने कहा था, 'कफ हटाने के लिए पिप्पल-खण्ड*(*पिप्पल-खण्ड का मतलब है नवद्वीप में हरिनाम का प्रचार ।) तैयार किया, परन्तु परिणाम उल्टा हुआ, कफ बढ़ गया ।' नवद्वीप के अनेक लोग हँसी उड़ाने लगे और कहने लगे, 'निमाई पण्डित मजे में है जी, सुन्दर स्त्री, मान-सन्मान, धन की भी कमी नहीं है, बड़े मजे में है ।'
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श्रीरामकृष्ण - केशव यदि त्यागी होता, तो अनेक काम होते । बकरे के बदन पर घाव रहने से वह देव-सेवा के काम में नहीं आता, उसकी बलि नहीं दी जाती । त्यागी हुए बिना व्यक्ति लोक-शिक्षा का अधिकारी नहीं बनता । गृहस्थ होने पर कितने लोग उसकी बात सुनेंगे ?
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स्वामी विवेकानन्द कामिनी-कांचनत्यागी हैं, इसीलिए उनका ईश्वर के विषय में लोक-शिक्षा देने का अधिकार है । विवेकानन्दजी वेदान्त तथा अंग्रेजी भाषा व दर्शन आदि के अग्रगण्य पण्डित हैं; वे असाधारण भाषणपटु हैं; क्या उनका माहात्म्य इतना ही है ? इसका उत्तर श्रीरामकृष्ण ने दिया था । दक्षिणेश्वर के कालीमन्दिर में भक्तों को सम्बोधित कर श्रीरामकृष्णदेव ने १८८२ ई. में स्वामी विवेकानन्द के सम्बन्ध में कहा था –
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"इस लड़के को देख रहे हो, यहाँ पर एक तरह का है । उत्पाती लड़के जब बाप के पास बैठते हैं तो मानो भीगी बिल्ली बन जाते हैं । फिर चाँदनी में जब खेलते हैं, उस समय उनका रूप दूसरा ही होता है । ये लोग नित्यसिद्ध के स्तर के हैं । ये लोग कभी संसार में आबद्ध नहीं होते । थोड़ी उम्र में ही इन्हें चैतन्य होता है और भगवान की ओर चले जाते हैं । ये लोग लोक-शिक्षा के लिए संसार में आते हैं, इन्हें संसार की कोई भी चीज अच्छी नहीं लगती - ये कभी भी कामिनी-कांचन में आसक्त नहीं होते ।
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“वेद में 'होमा' पक्षी का उल्लेख है । आकाश में खूब ऊँचाई पर वह चिड़िया रहती है । वहीं आकाश में ही वह अण्डा देती है । अण्डा देते ही अण्डा नीचे गिरने लगता है । अण्डा गिरते गिरते फूट जाता है । तब बच्चा गिरने लगता है । गिरते गिरते उसकी आँखे खुल जाती हैं और पंख निकल आते हैं । आँखें खुलते ही वह देखता है कि वह गिर रहा है और जमीन पर गिरते ही उसकी देह चकनाचूर हो जायगी । तब वह पक्षी अपनी माँ की ओर देखता है, और ऊपर की ओर उड़ान लेता है और ऊपर उठ जाता है ।"
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विवेकानन्द वही 'होमा पक्षी' हैं - उनके जीवन का एकमात्र लक्ष्य है उड़कर माँ के पास ऊपर उठ जाना - देह के जमीन से टकराने के पहले ही अर्थात् संसार से सम्बन्ध होने से पहले ही, ईश्वरलाभ के पथ पर अग्रसर हो जाना ।
श्रीरामकृष्ण ने ईश्वरचन्द्र विद्यासागर से कहा था, - "पाण्डित्य ! केवल पाण्डित्य से ही क्या होगा ? गिद्ध भी काफी ऊँचा उड़ता है, परन्तु उसकी दृष्टि रहती है जमीन पर मुर्दों की ओर - कहाँ सड़ा मुर्दा पड़ा है । पण्डित अनेक श्लोक झाड़ सकते हैं, परन्तु मन कहाँ है ? यदि ईश्वर के चरणकमलों में हो, तो मैं उसे सम्मान देता हूँ, यदि कामिनी-कांचन की ओर हो, तो वह मुझे कूड़ा-कर्कट जैसा लगता है ।"
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स्वामी विवेकानन्द केवल पण्डित ही नहीं, वे साधु महापुरुष थे । केवल पाण्डित्य के लिए ही अंग्रेजों तथा अमरीकानिवासियों ने भृत्यों की तरह उनकी सेवा नहीं की थी । उन्होंने जान लिया था कि ये एक दूसरे ही प्रकार के व्यक्ति हैं । अन्य सब लोग सम्मान, धन, इन्द्रियसुख, पण्डिताई आदि लेकर रहते हैं पर इनका लक्ष्य है ईश्वरप्राप्ति ।
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'संन्यासी के गीत' में स्वामीजी ने कहा है कि संन्यासी कामिनी-कांचन का त्याग करेगा –
"... करते निवास जिस उर में मद काम लोभ औ' मत्सर,
उसमें न कभी हो सकता आलोकित सत्य-प्रभाकर;
भार्यत्व कामिनी में जो देखा करता कामुक बन,
वह पूर्ण नहीं हो सकता, उसका न छूटता बन्धन;
लोलुपता है जिस नर की स्वल्पातिस्वल्प भी धन में,
वह मुक्त नहीं हो सकता, रहता अपार बन्धन में;
जंजीर क्रोध की जिसको रखती है सदा जकड़कर,
वह पार नहीं कर सकता दुस्तर माया का सागर ।
इन सभी वासनाओं का अतएव त्याग तुम कर दो,
सानन्द वायुमण्डल को बस एक गूँज से भर दो –
'ॐ तत् सत् ॐ !’ ...” -'कवितावली' से उद्ध्रत
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अमरीका में उन्हें प्रलोभन कम नहीं मिला था । इधर विश्वव्यापी यश, उस पर सदा ही परम सुन्दरी उच्चवंशीय सुशिक्षित महिलाएँ उनसे वार्तालाप तथा उनकी सेवा-टहल किया करती थीं । स्वामीजी में इतनी मोहिनी शक्ति थी कि उनमें से कई उनसे विवाह करना चाहती थीं । एक अत्यन्त धनी व्यक्ति की लड़की ने तो एक दिन आकर उनसे यहाँ तक कह दिया, "स्वामी ! मेरा सब कुछ एवं स्वयं को भी मैं आपको सौंपती हूँ ।" स्वामीजी ने उसके उत्तर में कहा, 'भद्रे, मैं संन्यासी हूँ, मुझे विवाह नहीं करना है । सभी स्त्रियाँ मेरी माँ जैसी है ।'
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धन्य हो वीर ! तुम गुरुदेव के योग्य ही शिष्य हो ! तुम्हारी देह में वास्तव में पृथ्वी की मिट्टी नहीं लगी है, तुम्हारी देह में कामिनी-कांचन का दाग तक नहीं लगा है । तुम प्रलोभन के देश से दूर न भागकर, उसी में रहकर, श्री की नगरी में रहकर ईश्वर के पथ में अग्रसर हुए हो ! तुमने साधारण जीव की तरह दिन बिताना नहीं चाहा । तुम देवभाव का जीता-जागता उदाहरण छोड़कर इस मर्त्यलोक को छोड़ गये हो !
(क्रमशः)

गुरुवार, 1 जनवरी 2026

श्रीरामकृष्ण और पापवाद

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*जब मानसरोवर पाइये, तब छीलर को छिटकाइ ।*
*दादू हंसा हरि मिले, तब कागा गये बिलाइ ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*(६)श्रीरामकृष्ण और पापवाद*
स्वामीजी के गुरुदेव भगवान श्रीरामकृष्ण कहा करते थे, "ईश्वर का नाम लेने से तथा आन्तरिकता के साथ उनका चिन्तन करने से पाप भाग जाता है - जिस प्रकार रूई का पहाड़ आग लगते ही क्षण भर में जल जाता है, अथवा वृक्ष पर बैठे हुए पक्षी ताली बजाते ही उड़ जाते हैं ।" एक दिन केशवबाबू के साथ वार्तालाप हो रहा था –
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श्रीरामकृष्ण - (केशव के प्रति) - मन से ही बद्ध और मन से ही मुक्त है । मैं मुक्त पुरुष हूँ, - संसार में रहूँ या जंगल में - मुझे कैसा बन्धन ? मैं ईश्वर की सन्तान हूँ, राजाधिराज का पुत्र हूँ, मुझे भला कौन बाँधकर रखेगा ? यदि साँप काटे, तो 'विष नहीं है, विष नहीं है' ऐसा जोर देकर कहने से विष उतर जाता है । उसी प्रकार 'मैं बद्ध नहीं हूं.' 'मैं बद्ध नहीं हूँ,' 'मैं मुक्त हूँ' इस बात को जोर देकर कहते कहते वैसा ही बन जाता है - मुक्त ही हो जाता है ।
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"किसी ने ईसाइयों की एक पुस्तक(Bible) दी थी । मैंने उसे पढ़कर सुनाने के लिए कहा, उसमें केवल 'पाप' और 'पाप' था !
"तुम्हारे ब्राह्मसमाज में भी केवल 'पाप' और 'पाप' है ! जो बार बार कहता है 'मैं बद्ध हूँ' 'मैं बद्ध हैं' वह अन्त में बद्ध ही हो जाता है । जो दिन-रात 'मैं पापी हूँ' 'मैं पापी हूँ' ऐसा कहता रहता है वह वैसा ही बन जाता है !
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"ईश्वर के नाम पर ऐसा विश्वास होना चाहिए - 'क्या ! मैंने ईश्वर का नाम लिया, अब भी मेरा पाप रहेगा ? मेरा अब बन्धन क्या है, पाप क्या है ?' कृष्णकिशोर परम हिन्दू सदाचारी ब्राह्मण है । वह वृन्दावन गया था । एक दिन घूमते-घूमते उसे प्यास लगी । एक कुएँ के पास जाकर देखा - एक आदमी खड़ा है । उससे कहा, 'अरे, तू मुझे एक लोटा जल दे सकेगा ? तेरी क्या जात है ?' उसने कहा, 'पण्डितजी, मैं नीच जाति का हूँ - मोची हूँ ।' कृष्णकिशोर ने कहा, 'तू 'शिव' कह और जल खींच दे ।'
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"भगवान का नाम लेने से देह-मन शुद्ध हो जाते हैं । केवल 'पाप' और 'नरक' की ये सब बातें क्यों ? एक बार कहो कि मैंने जो कुछ अनुचित काम किया है वह अब और नहीं करूँगा । साथ ही ईश्वर के नाम पर विश्वास करो ।"
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स्वामीजी ने भी ईसाइयों के इस पापवाद के सम्बन्ध में कहा है, "पापी क्यों ? तुम लोग अमृत के अधिकारी हो(Sons of Immortal Bliss) ! तुम्हारे धर्माचार्य जो दिनरात नरकाग्नि की बातें बताया करते हैं, उसे मत सुनो !" –
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"... तो तुम तो ईश्वर की सन्तान हो, अमर आनन्द के अधिकारी हो, पवित्र और पूर्ण आत्मा हो । तुम इस मर्त्यभूमि पर देवता हो, तुम पापी ? मनुष्य को पापी कहना ही महा पाप है । विशुद्ध मानव आत्मा को तो यह मिथ्या कलंक लगाना है । उठो ! आओ ! ऐ सिंहो ! तुम भेड़ हो इस मिथ्या भ्रम को झटककर दूर फेंक दो । तुम तो जरा-मरण-रहित एवं नित्यानन्दस्वरूप आत्मा हो । तुम जड़ पदार्थ नहीं हो । तुम शरीर नहीं हो । जड़ पदार्थ तो तुम्हारा गुलाम है, तुम उसके गुलाम नहीं ।....” -'हिन्दू धर्म' से उद्ध्रत
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अमरीका में हार्टफोर्ड नामक स्थान पर स्वामीजी भाषण देने के लिए आमन्त्रित हुए थे । यहाँ के अमरीकन कॉनसल(Consul) पैटर्सन उस समय वहाँ पर उपस्थित थे तथा सभापति थे । स्वामीजी ने ईसाइयों के पापवाद के सम्बन्ध में कहा था – "... वह क्या लोगों को घुटने टेककर यह चिल्लाने की सलाह दे कि 'ओह, हम कितने पापी हैं !' नहीं, प्रत्युत आओ, हम उन्हें उनके दैवी स्वरूप का ख्याल करा दें । ...
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यदि कमरा अँधेरा हो तो क्या तुम अपनी छाती पीटते हुए यह चिल्लाते जाते हो कि 'कमरा अँधेरा है !' 'कमरा अँधेरा है ।' नहीं, उजाला करने का एक मात्र उपाय है रोशनी जलाना, और तब अँधेरा भाग जाता है । उसी प्रकार आत्मज्योति के दर्शन का एकमात्र उपाय है अन्दर में आध्यात्मिक ज्योति जलाना, और तब पाप और अपवित्रता-रूपी अन्धकार दूर भाग जायगा । अपने उच्चतर स्वरूप का चिन्तन करो, क्षुद्र स्वरूप का नहीं ।"
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फिर स्वामीजी ने एक कहानी*(*यह कहानी सांख्यदर्शन में है- आख्यायिका-प्रकरण) सुनायी, जो उन्होंने श्रीरामकृष्णदेव से सुनी थी -
"एक बाघिनी ने बकरों के एक झुण्ड पर आक्रमण किया । वह पूर्ण गर्भवती थी, इसलिए कूदते समय उसे बच्चा पैदा हो गया । बाघिनी वहीं मर गयी । बच्चा बकरों के साथ पलने लगा और उनके साथ घास खाने लगा तथा 'में' 'में' भी कहने लगा । कुछ दिनों बाद वह बच्चा बड़ा हुआ ।
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एक दिन उस बकरों के झुण्ड पर एक बाघ ने आक्रमण किया । वह बाघ यह देखकर हैरान रह गया कि एक बाघ घास खा रहा है तथा 'में' 'में' कर रहा है और उसे देखकर बकरों की तरह भाग रहा है । तब वह उसे पकड़कर जल के पास ले गया और कहा, 'देख, तू भी बाघ है, तू घास क्यों खा रहा है और 'में' 'में' क्यों कर रहा है ? - देख, मैं कैसा माँस खाता हूँ । ले तू भी खा । और जल में देख, तेरा चेहरा भी कैसा बिलकुल मेरे ही जैसा है ।' उस छोटे बाघ ने वह सब देखा, माँस का आस्वादन किया और अपना असली रूप पहचान गया ।"
(क्रमशः)