बुधवार, 18 फ़रवरी 2026

नाभा गमन ~

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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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१६ आचार्य दयारामजी ~ 
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नाभा गमन ~
पटियाला से विदा होकर आचार्य दयारामजी महाराज धार्मिक जनता को निज दर्शन और उपदेशों से हर्षित करते हुये नाभा के पास पहुँचे । तब अपनी मर्यादा के अनुसार नाभा नरेश हीरासिंहजी को अपने आने की सूचना दी । सूचना मिलने पर नाभा नरेश हीरासिंहजी ने अपनी परंपरा के अनुसार राजकीय लवाजमा तथा भक्त मंडल के साथ संकीर्तन करते हुये जाकर आचार्य दयारामजी की अगवानी की । 
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मर्यादानुसार भेंट चढाकर प्रणाम किया । फिर बाजे गाजे के साथ संकीर्तन करते हुये आचार्यजी को नगर के मुख्य बाजार से ले जाकर नियत स्थान पर ठहराया । सेवा का सुन्दर प्रबन्ध कर दिया । सत्संग होने लगा । धार्मिक जनता सत्संग से लाभ प्राप्त करने लगी । राजा व राज परिवार आदि के बडे - बडे सज्जन भी आचार्यजी के दर्शन करने तथा दादूवाणी का प्रवचन सुनने आते थे । 
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नाभा में अच्छा सत्संग चला । फिर आचार्य दयारामजी नाभा से पधारने लगे तब नाभा नरेश हीरासिंहजी ने ३२५) रु. भेंट आचार्यजी को दी । राजा बलवीरसिंहजी ने २००) रु. भेंट करके अति श्रद्धा भक्ति से उपदेश भी श्रवण किया । धार्मिक जनता ने श्रद्धानुसार संतों की सेवा की तथा भेंटें भी दीं तथा सब ने सस्नेह विदा किया । आचार्य दयारामजी महाराज शिष्य संत मंडल के सहित नाभा से विदा होकर भ्रमण करते हुये नारायणा दादूधाम में पधार गये ।  
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मुंगध़डा में चातुर्मास ~ 
वि. सं. १९५९ में आचार्य दयारामजी महाराज को चातुर्मास का निमंत्रण मुंगध़डा के मगनीरामजी ने दिया । आचार्यजी ने स्वीकार कर लिया । चातुर्मास का समय समीप आने पर शिष्य संत मंडल के सहित आचार्य दयारामजी महाराज का अति आदर से सामेला किया और स्थान पर लाकर ठहराया । सत्संग आरंभ हो गया । अच्छा सत्संग चला । समाप्ति पर मर्यादानुसार आचार्यजी को भेंट तथा शिष्य संत मंडल को यथायोग्य वस्त्र देकर सस्नेह विदा किया ।
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शेखावटी की रामत ~ 
मुंगध़डा से विदा होकर आचार्य दयारामजी महाराज ने शेखावटी की रामत की । इस रामत में शेखावटी के नगरों के धनी मानी साहूकारों ने, जागीरदार ठाकुरों ने, स्थानधारी साधुओं ने तथा धार्मिक साधारण जनता ने आचार्य दयारामजी महाराज का अच्छा सत्कार किया । 
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शिष्य संत मंडल के सहित आचार्यजी की सेवा भी बहुत अच्छी की, सत्संग भी स्थान-२ पर अच्छा हुआ । आचार्य दयारामजी महाराज शेखावटी में भक्तों को दादूवाणी के उपदेशों द्वारा शांति सुख प्रदान करके नारायणा दादूधाम में पधार गये ।   
(क्रमशः)

२०. अथ विपर्यय कौ अंग १/४

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२०. अथ विपर्यय कौ अंग १/४ 
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[विपर्यय = विपरीत(उलटा) । जो शब्द वाक्य(साषी एवं पद) लोकव्यवहार में सुनने में असंगत, असम्भव या बेढ़ंगा(अटपटा) प्रतीत हो; परन्तु अध्यात्म विचार से चिन्ता करने पर जिसका अर्थ उचित, यथार्थ एवं चमत्कारयुक्त लगे - ऐसे शब्द या वाक्य सन्तों की भाषा में विपर्यय कहलाते हैं । इनको ही वे उलटबाँसी भी कहते हैं । ऐसी उलटवाँसियाँ लिखने में कबीर, सन्त श्रीदादूदयाल, रज्जब जी, श्रीसुन्दरदासजी आदि सन्त सिद्धहस्त माने गये हैं ।
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श्रीसुन्दरदासजी को इस विपर्ययपद्धति से लिखना अतिशय मनोनुकूल था, अतः एव इन ने अपने सवैया ग्रन्थ में विपर्यय को अङ्ग नाम से एक दीर्घकाय प्रकरण लिखा है । उसी प्रकरण को उसी नाम से यहाँ क्रमशः पुनः संक्षिप्त(साषी) सूत्र रूप से लिख रहे हैं । अतः हम इन सभी साषियों का वाच्यार्थ स्पष्ट करते हुए अन्त में समानार्थक सवैया का संख्याबोधक अङ्ग भी दे रहे हैं । जिससे जिज्ञासु वहाँ इसका विस्तार देख सकें ।]
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सुन्दर कहत बिचारि करि, उलटी बात सुनाइ । 
नीचे कौ मूंडी करै, तब ऊंचे कौ पाइ ॥१॥
(श्रीसुन्दरदासजी इस अंग में विपरीत शब्दों के माध्यम से जिज्ञासु को हितोपदेश कर रहे हैं, जिन को जिज्ञासु विवेकपूर्वक यथार्थ में जान कर अपना हित सम्पादन कर सकेंगे । उन में प्रथम उपदेश है -)
कोई भी साधक, व्यवहार एवं साधक में नीचा शिर(नम्र हो) कर के ही उच्च(परम निर्वाण) पद प्राप्त कर पाता है ।
साषी में प्रयुक्त नीची मुंडी शब्द का यदि शीर्षासन अर्थ किया जाय तो जिज्ञासु के लिये योगशास्त्र का अभ्यास भी आवश्यक है । तभी उसे परम पद की प्राप्ति सुगम हो पायगी ॥१॥ (द्र० - सवैया : २२/छ० १ तथा परिशिष्ट में इसी छन्द की टीका ।)
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अन्धा तीनौं लोक कौं, सुंदर देखै नैंन । 
बहिरा अनहद नाद सुनि, अति गति पावै चैंन ॥२॥ 
जब कोई साधक साधना द्वारा अपनी बाह्य(लौकिक) दृष्टि(चक्षुरिन्द्रिय) पर नियन्त्रण कर लेता है तब उसकी अन्तर्दृष्टि(अध्यात्मदृष्टि) खुल जाती है । तभी वह साधक समस्त संसार(तीनों लोकों को) दिव्य(यथार्थ) दृष्टि से देख पाता है ।
इसी प्रकार, साधना करते हुए जब कोई साधक अपनी श्रवणेन्द्रिय से बाहर के सांसारिक प्रलाप सुनना रोक देता है, तब उस को ऐसा दिव्य अन्तर्नाद(अनहद नाद) सुनायी देने लगता है कि वह उसके प्रभाव से ब्रह्मानन्द सुख का अनुभव करने लगता है ॥२॥ (द्र० – सवैया : २२/छन्द सं० २)
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नकटा लेत सुगन्ध कौं, यह तौ उलटी रीति । 
सुन्दर नाचै पंगुला, गूंगा गावै गीति ॥३॥
कोई भी साधक साधना करते हुए लोक लाज का बन्धन तोड़कर(नकटा होकर) जब साधना की उच्च भूमिका में पहुँच जाता है तब वह ब्रह्मानन्द रूप कमल के पराग की सुगन्ध का अनुभव करने लगता है । (यद्यपि लौकिक दृष्टि से यह बात अयथार्थ लगती है कि कोई नासिकाविहीन पुरुष कमल की गन्ध ले सके ।)
इसी प्रकार, कोई साधक साधना द्वारा अपने मन को पंगुल(चञ्चलता रहित) बना दे तो वह इस स्थिति में पहुँच कर भगवद्भक्ति में उन्मत्त होकर अपने प्रभु के सम्मुख आत्मानन्द का अनुभव करता हुआ नृत्य करने लगता है ।
इसी प्रकार, कोई साधक साधना द्वारा अपनी वैखरी वाणी पर निग्रह कर(लौकिक दृष्टि से गूंगा होकर), परा पश्यन्ती वाणी के द्वारा ब्रह्मविचारमय सङ्गीत गाने लगता है, भगवद्भजन गाने लगता है ॥३॥ (द्र० – सवैया : २२/छ० २) ॥३॥
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कीडी कूंजर कौं गिलै, स्याल सिंह कौं खाइ । 
सुन्दर जल तैं माछली, दौरि अग्नि मैं जाइ ॥४॥
साधक के अध्यात्मविद्या में मग्न होने पर उसकी अतिसूक्ष्म चिन्तक शुद्ध ब्रह्मानन्दमय बुद्धि(कीरी = चींटी) उसके काम क्रोध आदि उन्मत्त विकारों(हाथियों) को निगल गयी । (अर्थात् साधक ने अपने अध्यात्म ज्ञान के बल से इन विकारों को नष्ट कर दिया ।)
आत्मस्वरूप को भूलकर सुप्त साधक(श्रुगाल = गीदड़) ने गुरुपदेश से प्राप्त साधनोपदेश के बल पर अपनी स्मृति को जाग्रत् कर संशय-विपर्यय रूप अध्यास(सिंह) को खा डाला । (नष्ट कर दिया) । (आत्मानुभव द्वारा उसको जगन्मिथ्यात्व स्पष्ट हो गया ।)
इसी प्रकार, पहले जीवरूपी मछली अज्ञानवश इस काया रूप जल में प्रसन्न थीं; परन्तु ब्रह्मज्ञान के उत्पन्न होते ही वह ज्ञानाग्नि में जा गिरी तब उसे यथार्थ सुख मिला । अर्थात् सत्यज्ञान के उदित होने के साथ ही अधोगतिमय संसार से मुक्त होकर उसे ऊर्ध्व गति(ब्रह्मानन्द) की प्राप्ति हो गयी ॥४॥ (द्र०- सवैया : २२/छ० ३)
(क्रमशः) 

*बाह्याचरण ॥ साषी लापचारी की ॥*

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू उज्जवल निर्मला,*
*हरि रंग राता होइ ।*
*काहे दादू पचि मरै, पानी सेती धोइ ॥ *
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*बाह्याचरण ॥ साषी लापचारी की ॥*
अडसठि पाणियाँ धोइये, अठसठि तीरथ न्हाइ ।
कहु बषनां मन मच्छ की, अजौं कौलांधि न जाइ ॥१
(इसका अर्थ “मन कौ अंग” की साषी क्रमांक १५ में देखें ।)
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पद
भाइ रे क्या न्हाया क्या धोया ।
तीरथाँ तीरथाँ भ्रमताँ भ्रमताँ, तिल भी मैल न खोया ॥टेक॥
करिकरि पाप प्रित्थमी सगली, पाणी माँहै न्हावै ।
माहिकी का माछर की नाँई, लार अपूठौ आवै ॥
गंगा नैं गोदावरि न्हाया, पुहकर तीराँ पैली ।
आँखि उघाड़ि देखै क्यूँ नांहीं, ऊजल हुई कि मैली ॥
जण जण कै गलि बांध्यौ दीसै, ठाकुर बटुवा माँहीं ।
इहिं न छोड़ि पुहकर वाला कै, तूँ चाल्यौ काँह कै ताँई ॥
क्युँहुँ ग्यान बिचार साध की संगति, सेवौ हरि अविनासी ।
बषनां पाप बड़ा ल्होडाँ कौ, राम भजन तें जासी ॥५४॥
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तीर्थ दर तीर्थ धूम-धूमकर खूब स्नान किया, फिर भी मैल = पापों का किञ्चित मात्र भी नाश न हुआ । अतः हे भाई ! जरा चित्त में विचार करके तो देख कि तूने तीर्थों में क्या तो धोया और वहाँ नहाने से तुझे क्या-क्या लाभ हुए । अथवा तीर्थ दर तीर्थ घूमते रहने पर यदि लेशमात्र भी पापों का नाश नहीं हुआ तो नहाने तथा धोने का क्या तात्पर्य ?
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वस्तुतः पृथिवी के समस्त मनुष्य अनेकों पाप करके तीर्थों के पानी में नहाते हैं किन्तु तीर्थों में नहाना ठीक वैसे ही व्यर्थ है जैसे भैंस के पानी में नहाने के उपरान्त भी उसके ऊपर भिनकने वाली मक्खियाँ एक भी न हटकर साथ की साथ वापिस आ जाती है; मनुष्य के तीर्थों में नहा लेने पर भी पाप मनुष्य के साथ ही वापिस आ जाते हैं क्योंकि तीर्थों में नहाने से पापों की निवृत्ति नहीं होती ।
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मनुष्य गंगा और गोदावरी में नहाता है । तीर्थराज पुष्कर के सरोवर में एक तीर से दूसरे तीर तक जाकर स्नान करते हैं किन्तु आँख उघाड़ि = स्वतंत्रतापूर्वक विचार करके नहीं देखते कि वास्तव में तीर्थों में स्नान करने से पापों की निवृत्ति होकर अंतःकरण शुद्ध हुआ अथवा मिला हुआ ।
वस्तुतः तीर्थस्थान के उपरान्त भी यदि मनुष्य अपनी दुष्प्रवृत्तियाँ नहीं छोड़ता तो वे पाप अत्यन्त भयंकर हो जाते हैं और बिना भगवन्नाम के अन्य उपायों से छूटते नहीं है ।
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जने-जने के गले में ही ठाकुर का बटवा = कोथली बंधी हुई रहती है अर्थात् जब ठाकुरजी स्वयं के पास ही उपलब्ध है तब गले के भगवान को छोड़कर = भूलकर पुष्कर स्थित ब्रह्मा = भगवान् का दर्शन करने जाने का क्या तात्पर्य ? तू किसलिये दर्शन करने जाता है । कुछ तो ज्ञान का विचार साधुओं की संगति में प्राप्त करके अविनाशी हरि की सेवा = भजन ध्यान करना चाहिये ? क्योंकि छोटे तथा बड़े सभी प्रकार के पाप तीर्थाटन, तीर्थ स्नान से न कटकर रामभजन से ही कटेंगे ॥५४॥
(क्रमशः)

*५. गुरु-शिष्य निदान निर्णय का अंग ~ १३/१६*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाण टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*५. गुरु-शिष्य निदान निर्णय का अंग ~ १३/१६*
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*लोह शिष्य पारस गुरु, मेले मेलनहार ।*
*सौंधे सौं मँहगे भये, अनवांछित व्यवहार ॥१३॥*
जैसे लोहे से पारस से कुछ भी नहीं चाहता किन्तु फिर भी स्पर्श होते ही पारस लोहे को सुवर्ण बना देता है और लोह सौंधे से मँहगा हो जाता है, वैसे ही मिलने वाले भगवान गुरु-शिष्य का मेल बिना ही इच्छा मिला देते हैं और गुरु के निस्पृह व्यवहार युक्त उपदेश से शिष्य महान् बन जाता है ।
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*महन्त मयंक उदीप१ तौं, देखे सब संसार ।*
*रज्जब रार्यों२ रस परै, उन हि न आँखों प्यार ॥१४॥*
चन्द्रमा का प्रकाश१ बढ़ते ही सब संसार उसे देखता है और उसके शीतल प्रकाश से आँखों२ को आनन्द प्राप्त होता है किन्तु चन्द्रमा का तो आँखों से प्रेम नहीं है, वैसे ही गुरु रूप महन्त की महिमा सब संसार देखता है जिज्ञासुओं को आनन्द प्राप्त होता है किन्तु गुरु का कोई स्वार्थ नहीं है ।
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*सद्गुरु सलिता ज्यों बहै, हित१ हरि सागर माँहिं ।*
*रज्जब समदी२ सेवका, सहज संग मिल जाँहिं ॥१५॥*
जैसे बड़ी नदी सागर से मिलकर भी मिलने के लिये बहती है और उसके संग मिलकर छोटे नाले भी समुद्र में पहुँच जाते हैं, वैसे ही सद्गुरु हरि में मिलकर भी मिलने के साधन उपदेशादि करते ही रहते हैं और ईश्वर की भक्ति करने वाले सेवक भी उनके संग से सहज ही ईश्वर से मिल जाते हैं ।
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*रज्जब काया काठ में, प्रकटी आज्ञा आग ।*
*मन शिष निकस्या धूम ज्यों, गया गगन गुरु लाग ॥१६॥*
१६-२६ में गुरु की विशेषता बता रहे हैं - काष्ठ में अग्नि प्रगट होता है तब धूआँ आकाश में जाकर लय हो जाती है, वैसे ही गुरु की उपदेश रूप आज्ञा से ज्ञान प्रगट होता है तब शिष्य का मन शरीराध्यास से निकल कर समाधि में जाता है और ब्रह्म में लय होता हैं ।
(क्रमशः)

मंगलवार, 17 फ़रवरी 2026

*५. गुरु-शिष्य निदान निर्णय का अंग ~ ९/१२*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाण टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*५. गुरु-शिष्य निदान निर्णय का अंग ~ ९/१२*
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*चंद उदय ज्यों चाह बिन, कमल खिले अपभाय ।*
*त्यों रज्जब गुरु शिष्य ह्वै, तो दोष न दीया जाय ॥९॥*
९-१५ तक स्वार्थ रहित गुरु का परिचय दे रहे हैं - चन्द्रोदय होने पर चन्द्रमा की बिना इच्छा ही अपने भाव से चन्द्रमुखी कमल खिलते हैं, वैसे ही सद्गुरु के दर्शन होने पर यदि कोई अपने भाव से शिष्य बनता है तो गुरु को स्वार्थी होने का दोष नहीं दिया जा सकता ।
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*चंदन करि बदले वनी, पारस पलटे लोह ।*
*त्यों रज्जब शिष काज कर, गुरु ज्ञाता निरमोह ॥१०॥*
जैसे चन्दन की सुगन्धि द्वारा वन बदलता है, पारस से लोह बदलता है, वैसे ही शिष्य को बदलने का काम करके भी ज्ञानी गुरु शिष्यों में मोह नहीं करते ।
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*सद्गुरु सूरज शशिहर संदल१, पुनि पेखे त्यों हमाय२ ।*
*रज्जब पंचहुँ प्राण पोषिये, स्वारथ रहित सुभाय३ ॥११॥*
सद्गुरु सूर्य चन्द्रमा, चन्दन१ और हुमा२ पक्षी इन पाँचो को ही देखिये प्राणियों का पोषण करके भी स्वभाव३ से ही स्वार्थ रहित रहते हैं ।
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*जिहिं छाया ह्वै छत्रपति, सो हित रहित हमाय ।*
*त्यों रज्जब गुरु शिष्य गति, दुहुँ में कौन कमाय ॥१२॥*
जिस हुमा पक्षी की छाया शिर पर पड़ने से मनुष्य राजा हो जाता है, वह पक्षी अपने स्वार्थ के लिये तो छाया नहीं पटकता, वैसे ही गुरु भी अपने स्वार्थ के लिए उपदेश नहीं देते । हुमा और गुरु इन दोनों में से कौन- सा क्या कमाता है ? कुछ नहीं, अत: स्वार्थ रहित हैं ।
(क्रमशः)

नाम चिन्तन ही परम सुख

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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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१६ आचार्य दयारामजी ~ 
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एक दिन पटियाला नरेश उपेन्द्रसहजी सत्संग समाप्ति के पश्‍चात् कुछ ठहरे रहे । सब श्रोताओं के चले जाने के पश्‍चात् राजा उपेन्द्रसिंहजी ने पूछा मनुष्य की क्या राशि है ? पास बैठे हुये साधु बोदूरामजी ने कहा- सिंह राशि है । बोदूरामजी का उक्त वचन सुनकर राजा उपेन्द्रसिंहजी ने उनसे कहा- मैं आपसे नहीं पूछ रहा हूँ, महाराज से पूछ रह हूं । 
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यह सुनकर आचार्य दयारामजी महाराज बोले- राजन् ! राशि जेवडी के विचार के लिये हमें दादूजी महाराज ने अवकाश ही नहीं दिया है । उसकी खोज के लिये हमारे को अवकाश होता तो अवश्य बता देते । हमें दादूजी महाराज ने जो कहा हैं, उसी कार्य में अवकाश नहीं मिल रहा है देखिये-  
‘‘दादू नीका नाम है, तीन लोक तत सार ।  
रात दिवस रटबों करी, रे मन यही विचार ॥’’
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अर्थात् दादूजी महाराज कहते हैं- हे सुख की इच्छा करने वाले मानव ! परमात्मा का नाम चिन्तन ही परम सुख का सुन्दर साधन है । अन्य अर्थादि साधन से परम सुख नहीं मिलता, दु:ख से मिश्रित अल्प सुख ही मिलता है । परमेश्‍वर का नाम तीनों लोकों के सार तत्त्व परब्रह्म को प्राप्त करने का श्रेष्ठ उपाय है । अत: अन्य सब उपायों को त्याग करके एक परब्रह्म के नाम का ही चिन्तन करो । 
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रे चपल मन मानव ! भली भाँति विचार करके  यह उक्त उपाय अर्थात् दिन रात नाम चिन्तन ही कर । राजन् ! उक्त प्रकार दादूजी महाराज हमें रात दिन नाम चिन्तन की आज्ञा देते हैं । रात दिन को छोडकर अन्य कौन सा समय है जिस में हम राशि जेवडी का विचार करें । इतना कहकर आचार्य दयारामजी मौन हो गये ।
फिर राजा उपेन्द्रसिंह ने भी नत- मस्तक  होकर मान लिया कि - आपका यह विचार अति उत्तम है । महात्माओं को तो भजन ही करना चाहिये । आगे मैं भी किसी संत से ऐसा प्रश्‍न नहीं करुंगा । फिर राजा प्रणाम करके राजभवन को चला गया । उक्त घटना से दयारामजी महाराज की बुद्धि का परिचय मिलता है । 
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कुछ समय तक पटियाला की जनता को अपने दर्शन तथा उपदेशों से आनन्दित करते हुये पटियाला में निवास किया । पटियाला से पधारने लगे तब पटियाला नरेश उपेन्द्रसिंहजी ने अति श्रद्धा भक्ति से आचार्य दयारामजी महाराज के ७००) रु. भेंट किये । पटियाला की भक्त जनता ने भी अपनी-अपनी श्रद्धा के अनुसार भेंटें दीं और राजा प्रजा ने सस्नेह आचार्य दयारामजी महाराज को विदा किया ।  
(क्रमशः) 

 

*१९. साधु कौ अंग ५७/६०*

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१९. साधु कौ अंग ५७/६०*
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सुन्दर कोऊ साधु की, निंदा करै लगार । 
जन्म जन्म दुख पाइ है, ता महिं फेर न सार ॥५७॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - यदि कोई दुष्ट आदमी 'सन्त' की निरन्तर निन्दा करता है तो वह उसके फलस्वरूप अनेक जन्मों तक दुःख पाता रहेगा । मेरी इस बात में तुम कुछ भी मिथ्या न समझना ॥५७॥
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सुन्दर कोऊ साधु की, निंदा करै कपूत । 
ताकौं ठौर कहूं नहीं, भ्रमत फिरै ज्यौं भूत ॥५८॥ 
यदि कोई कुपुत्र(कपूत) साधु की निन्दा करता है तो समझ लो कि ऐसे निकृष्ट आदमी को, खोजने पर भी, कोई शरणस्थल नहीं मिलेगा । वह इस संसार में, मरणपर्यन्त, भूत के समान इधर से उधर चक्कर लगाता ही रह जायगा ॥५८॥
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संतनि की निंदा कियें, भलौ होइ नहिं मूलि । 
सुन्दर बार लगै नहीं, तुरत परै मुख धूलि ॥५९॥
सन्तों की निन्दा करने वाले का कभी कुछ भी भला नहीं हो सकता । ऐसे सन्तों के निन्दक की समाज में अप्रतिष्ठा होने में कोई विलम्ब नहीं लगता । जिस के कारण उस को अन्त में लज्जित ही होना पड़ता है ॥५९॥
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संतनि की निंदा करै, ताकौ बुरौ हवाल । 
सुन्दर उहै मलेछ है, उहै बडौ चण्डाल ॥६०॥
इति साधु की अंग ॥१९॥
समाज में जो सन्तों की निन्दा करेगा, अन्त में उस की दुर्दशा ही होगी । समाज या तो उसे म्लेच्छ(= अनार्य = अनाड़ी) कहेगा या निकृष्ट(गया गुजरा) चाण्डाल(हीन समाज या वर्ग में जन्मा) कहेगा । अतः सन्त की निन्दा कभी नहीं करना चाहिये ॥६०॥
इति साधु का अंग सम्पन्न ॥१९॥ 
(क्रमशः) 

*भक्ति माहात्म्य ॥*

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*अंधे अंधा मिल चले, दादू बंध कतार ।*
*कूप पड़े हम देखतां, अंधे अंधा लार ॥*
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*भक्ति माहात्म्य ॥*
न्यारी रे न्यारी रे गोबिंदा की भगती, न्यारी रे ।
काँही काँही निर्मलै हिरदै धारी रे ॥टेक॥
माँहे मैलौ मंनि कालौ, ऊपराँ पाणी पखालै ।
सुचि असी हसती न्हबालै, तिती पाछै धूल रालै ॥
बिषै गावै बिषै सुनावै, बिषै की देसि दिखावै ।
बेद नैं साखी बुलावै, क्याँहनैं पिरथी भरमावै ॥
बकता जो बाकि सुणाई, सुरता कै हिरदै आई ।
तामैं जाण न दीन्हीं काई, मन मैं राखी सवाई ॥
आंधा की बाँह आँधै झाली, तिहि कै सँगि सब दुनिया चाली ।
ले डबोई बिषै माँहीं, नीसरतौ को दीसै नाँहीं ॥
तीनि गुण थैं निर्मल न्यारी, सो परमेस्वर नैं भगति पियारी ।
बषनां साधाँ विचारी, बेदो गति गीता पुकारी ॥५३॥ 
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गोविन्द की अनन्य, अहैतुकी भक्ति उस भक्ति से सर्वथा विलक्षण = न्यारी है, जिसको जगत् के भ्रमित लोग करते हैं । कोई-कोई निर्मल चित्त वाले भक्त ही इस विलक्षण भक्ति को धारण करते हैं । भ्रमित लोग जिस प्रकार की भक्ति करते हैं, उसका विवरण देते हुए कहते हैं, ऊपर से शरीर को जल से स्नान कराकर उज्जवल = मल रहित करते हैं किन्तु अंदर में, मन में काम-क्रोध-लोभ-मोह-मद-मात्सर्य, दुराचार भरे होने से मैला = मल सहित ही रहते हैं । 
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इनकी पवित्रता ठीक वैसी ही है जैसी हाथी की, जो खूब मल-मल कर नहलाने के उपरांत भी अपनी सूंड से अपने ऊपर मिट्टी डाल लेता है । ये लोग विषय = श्रृंगार रस का ही गायन करते हैं और उसी को दूसरों को गा गाकर सुनाते हैं तथा विषयों की ओर दृष्टि जाये, ऐसा ही मार्ग बताते हैं । अपनी बातों की पुष्टि में साक्षी के रूप में वेदों का उद्धरण देते हैं और विषयभोगों के लिये पूरी पृथिवी पर भ्रमते-फिरते हैं । 
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ऐसे भ्रमित वक्ता जिस विषय का कथन करते हैं, विषयी श्रोता उसी को यथातथ्य मानकर अपने हृदय में धारण कर लेते हैं । विषयी श्रोता उन कामुक और विषयभोगों से युक्त बातों को मन में सवागुनी संचित करके रखते हैं; उनमें से त्यागते तो एक बात को भी नहीं हैं । वस्तुतः इन लोगों की स्थिति ठीक वैसी ही होती है जैसी किसी अंधे ने अंधे की बाँह पकड़ ली हो और मार्ग दिखाने का उपक्रम कर रहा हो । 
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यथार्थ में इन अविवेकी उपदेशकों-मार्गदर्शकों के मार्गदर्शन में ही सारी दुनिया चल रही है । इन्होंने सारी दुनिया को विषय भोगों में डुबो दिया है । उनमें से कोई उन विषय भोगों रूपी समुद्र में से निकलता हुआ नहीं दिखाई देता । परमेश्वर को वह भक्ति प्रिय है जो तीनों गुणों से असम्पृक्त हुए निर्मल मन से की जाये । बषनां कहता है, साधु-संतों ने उसी भक्ति को अंगीकार किया है जिसका कथन वेदों में, गीता में किया गया है ॥५३॥    
(क्रमशः)

सोमवार, 16 फ़रवरी 2026

उतराधों के चातुर्मास ~

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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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१६ आचार्य दयारामजी ~ 
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उतराधों के चातुर्मास ~
आचार्य दयारामजी महाराज का प्रथम चातुर्मास वि. सं. १९५५ का संपूर्ण उतराधे साधु मंडल ने करवाया । वह चातुर्मास मर्यादा पूर्वक बहुत अच्छा हुआ था । उतराधों को पूजा का दस्तूर भी चातुर्मास के अन्त में ही दिया गया था । चातुर्मास करके  भ्रमण करते हुये नारायण दादूधाम पधारे ।
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छोटाराम जी के चातुर्मास ~  
वि. सं. १९५६ में आचार्य दयारामजी को चातुर्मास का निमंत्रण छोटारामजी ने दिया था । आचार्य दयारामजी महाराज ने अपने मंडल के सहित जाकर चातुर्मास किया था । चातुर्मास मर्यादा पूर्वक अच्छा हुआ था । चातुर्मास के पश्‍चात् शेखावटी की रामत में पधारते हुये आचार्य दयारामजी महाराज को शेखावटी की निजामत के नाजिम व सभी सामलात के अहलकारों ने आकर भेंट की थी ।
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उतराध की रामत ~ 
वि. सं. १९५७ में उतराध की । रामत की उतराधे स्थानधारी साधुओं व सेवकों ने सभी स्थानों में आपका अच्छा सम्मान किया व सेवा की । उतराध की रामत करते करते आचार्य दयारामजी महाराज पटियाला की ओर आगे बढे और पटियाला के पास जाकर परंपरा की मर्यादा के अनुसार पटियाला नरेश को अपने आने की सूचना दी । 
पटियाला प्रवेश ~
सूचना मिलने पर अपनी कुल परंपरा के अनुसार पटियाला नरेश उपेन्द्रसिंहजी राजकीय लवाजमा व भक्त मंडल के साथ संकीर्तन करते हुये आचार्य दयारामजी की अगवानी करने आये । 
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मर्यादा के अनुसार भेंट चढाकर प्रणामादि शिष्टाचार करके बाजे गाजे के साथ संकीर्तन करते हुये बडे ठाट बाट से नगर के मुख्य बाजार से होकर नियत स्थान पर ले जाकर ठहराया । सेवा का सुन्दर प्रबन्ध राजा उपेन्द्रसिंहजी ने करवा दिया । राजा भी सत्संग के लिये आता था और प्रजा भी अच्छा संख्यामें सत्संग करने आती थी । 
(क्रमशः) 

*१९. साधु कौ अंग ५३/५६ *

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१९. साधु कौ अंग ५३/५६ *
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संतनि ही कौ आसरौ, संतनि कौ आधार । 
सुन्दर और कछू नहीं, है सतसंगति सार ॥५३॥
श्रीसुन्दरदासजी साधक को समझा रहे हैं - यदि तूं भगवत्साक्षात्कार(भगवान् के दर्शन) चाहता है तो इसके लिये सत्सङ्गति को अपना आलम्बन(आश्रय या सहारा) बना ले । इस सत्सङ्गति के सम्मुख अन्य सभी शुभ कर्म महत्त्वहीन है । भगवत्प्राप्ति का यह(सत्सङ्गति) ही सर्वोत्तम उपाय है ॥५३॥
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पावक जारै नीर कौं, नीर बुझावै आगि । 
सुन्दर बैरी परस्पर, सज्जन छूटै भागि ॥५४॥
[अब कुछ उदाहरणों से कुसङ्गति की यथार्थता समझा रहे हैं -] अग्नि को यदि अवसर मिले तो वह जल को उष्ण कर शनैः शनैः उस को नष्ट कर देती है, या जल को अवसर मिले तो वह उस पर गिर कर उसको बुझा देता है । श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - सज्जनों को ऐसी दुष्ट सङ्गति से दूर ही रहना चाहिये ॥५४॥
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उलवा मारै काग कौं, काक सु हनै उलूक । 
सुन्दर बैरी परस्पर, सज्जन हंस कहूंक ॥५५॥
ऐसे ही अवसर (रात्रि) मिलने पर उल्लू कौआ को मार देता है या कौआ(दिन में) उल्लू को मार देता है; क्योंकि ये दोनों परस्पर वैरी हैं, अतः दुष्ट हैं । इन के विपरीत हंस को मानिये; क्योंकि वह सज्जन है, अतः उस का कोई वैरी नहीं है ॥५५॥
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सुन्दर कोऊ साधु की, निंदा करै सु नीच । 
चल्यौ अधोगति जाइ है, परै नरक कै बीच ॥५६॥
सन्त की निन्दा का कुफल : श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - जो पुरुष अकारण 'सन्त' की निन्दा करता है उसे हीन(निकृष्ट) पुरुष ही समझना चाहिये । वह मृत्यु के बाद किसी नीच योनि में जन्म लेगा या वह सीधा नरक में जा गिरेगा ॥५६॥
(क्रमशः)

थारै सु म्हारै म्हारै सु थारै

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*रोम रोम में रम रह्या, सो जीवन मेरा ।*
*जीव पीव न्यारा नहीं, सब संग बसेरा ॥*
*सुन्दर सो सहजैं रहै, घट अंतरजामी ।*
*दादू सोई देखि हौं, सारों संग स्वामी ॥*
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*ब्रह्मविचार ॥*
थारै सु म्हारै म्हारै सु थारै । तिहनैं कहौ कौंण जुहारै ॥टेक॥
ठाकुर कै ठकुराणी सेवग कै नारी । इहि लेखै दोन्यूँ घरवारी ॥
ठाकुर चाकर की कृतम काया । जोनी संकुटि दोन्यूँ आया ॥
एक कीड़ी एक कुंजर कीन्हा । कहा भयौ सकती जे दीन्हा ॥
चारि अवस्था अरु त्रिगुण व्याप्यौ । कबहूँ भूखौ कबहूँ धाप्यौ ॥
नहिं सो बिरध नहीं सो बालौ । बषनां कौ ठाकुर राम निरालौ ॥५२॥
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“बोध चाहि जाकों सुकृति, भजत राम निष्काम ।
सो मेरी है आतमा, काकूँ करूँ प्रनाम ॥
विचारसागर, मंगलाचरण दोहा ५ ॥
इस पद की प्रथम पंक्ति में इन्हीं भावों को व्यक्त करते हुए बषनांजी कहते हैं, जो सुखस्वरूप, नित्यस्वरूप, प्रकाशस्वरूप, विभु, नाम और रूप की आधार, तथा जिसे बुद्धि न जान सके किन्तु बुद्धि को जो जाने ऐसी नित्य-शुद्ध-बुद्ध आत्मा ही, हे परमात्मन् तेरे है और जो उक्त आत्मा तेरे है वही मेरे है; अब बता दोनों में कौन किसका वन्दन करे ।
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कहने का आशय है कि हम दोनों आत्मा की दृष्टि से एक हैं । फिर कौन किस को प्रणाम करे । इसके विपरीत ठाकुरजी के ठकुराणी तथा सेवक के सेवकनी पत्नी होती है । अर्थात् सगुणमार्ग में दोनों की सत्ता पृथक-पृथक हैं । इसीलिये ठाकुरजी तथा सेवक दोनों ही घरवारी = मायिक = मिथ्या हैं । ठाकुरजी तथा सेवक-दोनों ही का शरीर कृतम = प्रकृति की विकृति है; दोनों ही माता की योनि के माध्यम से इस संसार-सागर में आते हैं ।
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एक ठाकुरजी को हाथी सदृश बलशाली बनाया है तथा दूसरे जीव को चींटी के समान निर्बल बनाया है । किन्तु है दोनों ही एक । मात्र अंतर है तो शक्ति का ही है किन्तु शक्ति के आधिक्य से क्या तात्पर्य ? क्योंकि दोनों ही की चार अवस्थाएँ होती हैं और दोनों को ही त्रिगुण व्यापते हैं । त्रिगुण व्यापने के कारण दोनों को कभी भूख लगती है तो कभी दोनों ही तृप्त हो जाते हैं ।
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इन उक्त बातों से ध्यान में आता है कि ठाकुरजी तथा सेवकजी दोनों ही विकारी, मायिक हैं जबकि बषनां का ठाकुर रामजी ऊपर वर्णित ठाकुरजी से सर्वथा निराला है जो न कभी वृद्ध होता है, न कभी बालक ही होता है । वह सदैव एकरस = एक जैसा = अविकारी रहता है ।
“जो सुख नित्य प्रकास विभु, नाम रूप आधार ।
मति न लखै जिहिं मति लखै, सो मैं सुद्ध अपार ॥
विचारसागर मंगलाचरण प्रथम दोहा ॥५२॥
(क्रमशः)

*५. गुरु-शिष्य निदान निर्णय का अंग ~५/८*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*५. गुरु-शिष्य निदान निर्णय का अंग ~५/८*
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*रज्जब काचा सूत शिष, लिपट्या सद्गुरु हाथ ।*
*काल कसौटी देय दिव्य, जले न साँचे साथ ॥५॥*
पूर्वकाल में कच्चा सूत हथेली पर लिपेट के उस पर दिव्य(न्यायालय की सत्यासत्य परीक्षार्थ हाथ पर रक्खा जाने वाला लोह का गोला) रखते थे । तब सच्चे का हाथ नहीं जलता था और झूठे का हाथ जल जाता था । वैसे ही सच्चे सद्गुरु के संग रहने से शिष्य काल-दंड रूप परीक्षा से व्यथित नहीं होता ।
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*महापुरुष मुहुरे बँधे, तालिब काचे तार ।*
*रज्जब जल हि न युगल वे, अन्तक अग्नि मझार ॥६॥*
जैसे मोहरे(मोर पंखों से निकले हुये तामे के मणिये) में कच्चा तार बँधा हो तो, वह अग्नि में नहीं जलता वैसे ही महापुरुष सद्गुरु की शरण में जाने पर शिष्य कालाग्नि में नहीं जलता ।
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*कोयल अंडे काक गृह, सुत निपजे पर सेव ।*
*त्यों रज्जब शिष भव को, प्रति पाले गुरु देव ॥७॥*
७ में गुरु से ही शिष्य की रक्षा होती है यह कहते हैं - कोयल के अंडे काक के घर में रहते हैं और अपने अन्य काकों की सेवा से बड़े होते हैं किन्तु कोयल उनका भाव से ही पालन करती है और बड़े होने पर ले जाती है, वैसे ही शिष्य संसार में रहते हैं किन्तु गुरु उनका भाव से पालन करते हैं और वैराग्य होने पर ले जाते हैं । कोयल अपने अंडे काक से आलम में छोड़ आती है । काक उनको अपना जान कर पालते हैं कुछ बड़े होने पर कोयल उनके पास जाकर अपनी बोली सुनाती है और जब वे उड़ने लगते हैं तब काक के न होने के समय उन्हें साथ ले जाती है ।
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*गुरु संतोषी चन्द्र मय, शिष नक्षत्र निरीहाय१ ।*
*जन रज्जब तिहिं सभा को, देख दृष्टि बलि जाय ॥८॥*
८ में योग्य गुरु शिष्य धन्य हैं, यह कह रहे हैं - जैसे बिना ही इच्छा चन्द्रमा को नक्षत्र मंडल घेरे रहता है, वैसे ही संतोषी गुरु को विरक्त१ शिष्य घेरे रहते हैं, उनकी सभा का दर्शन करके दृष्टि उन पर बलिहारी जाती है ।
(क्रमशः)

१६ आचार्य दयारामजी ~

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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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अथ अध्याय १३ ~ 
१६ आचार्य दयारामजी ~ 
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आचार्य हरजीरामजी महाराज के ब्रह्मलीन होने पर वि. सं. १९५५ में वैशाख शुक्ला १२ मंगल को दादूपंथी समाज ने मिलकर दयाराम जी को आचार्य पद पर विराजमान किया । दयारामजी शरीर से सामलपुरा के खंडेलवाल ब्राह्मण थे । 
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दूसरे दिन ५२ धामों के पंचों को साथ लेकर गरीबदासोतों के महल में पधारे । गद्दी पर चौका बिछा कर आपको बैठाया गया तथा बोलतारामजी ने सामने खडे होकर ५१) रु. भेंट किये । आचार्य दयारामजी महाराज ने उनको शाल उढाई ।
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आचार्य दयारामजी के टीका ~ 
आचार्य दयारामजी के टीका का दस्तूर इस प्रकार आया था - जयपुर नरेश माधवसिंहजी ने १००) रु. १ घोडा और दुशाला । अलवर नरेश जयसिंहजी ने - विजय लक्ष्मी नामक हथिनी झूल सहित, दुशाला, मलमल पार्चाथान । उदयपुर महाराणा फतेहसिंहजी ने - दुशाला । जीन्द नरेश रणधीरसिंहजी ने १२५) रु. दुशाला । किशनगढ नरेश शार्दूलसिंहजी ने दुशाला । खेतडी नरेश अजीतसिंहजी ने- २५) रु. दुशाला । सीकर नरेश माधोसिंहजी ने १००) रु. दुशाला भेजा । 
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भजनादि व्यवहार ~ 
आचार्य दयारामजी महाराज का अधिक समय भजन में ही व्यतीत होता था । अर्धरात्रि के पश्‍चात् आप शय्या छोड कर छत पर भ्रमण करते हुए ४-५ घंटे नाम जपते रहते थे । दिन में भी गद्दी पर विराज कर उपनिषद् ग्रन्थों का मनन करते थे । संत महात्मा एवं सेवक - सती आपके तपोमय शरीर का दर्शन करके तथा आपके मुख से उपदेश सुनकर बहुत ही प्रसन्न होते थे और अपने को कृतकृत्य समझते थे । 
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भजन और तपस्या के प्रभाव से आपके शब्दों में ऐसी आर्कषण शक्ति थी कि कोई भी व्यक्ति दुर्भावना लिये हुये भी आपके सामने आता था, वह आपके २-४ शब्द सुनकर ही अपने असद् विचारों के लिये मन में लज्जित एवं विनीत होकर अनुकूल हो जाता था । आपका स्वभाव बहुत शांत था । आपके आशीर्वाद से अनेकों के क्लेश दूर हुये थे । आपकी शिक्षा न मानने वालों की हानि ही होती थी ।
(क्रमशः)

*१९. साधु कौ अंग ४९/५२*

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१९. साधु कौ अंग ४९/५२*
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संतनि की सेवा किये, हरि की सेवा होइ । 
तातें सुन्दर एक ही, मति करि जानै दोइ ॥४९॥
शास्त्रों में भी यहीं कहा है कि सन्तों की सेवा करने से वह भगवान् की सेवा ही मानी जाती है । अतः श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - वे दोनों(हरि एवं हरिभक्त) एक ही हैं, उन दोनों को दो(भिन्न भिन्न) समझने की भूल(प्रमाद) न करना ॥४९॥
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संतनि की सेवा किये, सुन्दर रीझै आप । 
जाकौ पुत्र लडाइये, अति सुख पावै बाप ॥५०॥ 
"सन्तों की सेवा से भगवान् प्रसन्न होते हैं' - इस बात को एक सरल उदाहरण देकर समझा रहे हैं – समाज में हम देखते हैं कि हम किसी के पुत्र से जब प्रेमव्यवहार करते हैं तो उसे देख कर उस का पिता भी अतिशय प्रसन्न होता है । (भक्त भी भगवान् के पुत्र तुल्य ही माने जाते हैं) ॥५०॥
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संतनि कौं कोउ दुःख दे, तब हरि करै सहाइ । 
सुन्दर रांभै बाछरा, सुनि करि दौरै गाइ ॥५१॥
यदि कोई दुष्ट सन्तों को कष्ट देता है तो भगवान् सन्तों के कष्ट को दूर करने के लिये तत्काल वहाँ पहुँचते हैं । जैसे कोई गौ अपने बछड़े की पुकार सुनकर तत्काल उसके पास पहुँच जाती है ॥५१॥
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अठसठ तीरथ जौ फिरै, कोटि यज्ञ ब्रत दांन । 
सुन्दर दरसन साधु कै, तुलै नहीं कछु आंन ॥५२॥
(अब भी श्रीसुन्दरदासजी एक अन्य उदाहरण द्वारा सन्त सेवा का महत्त्व स्थापित कर रहे हैं -) काशी, मथुरा, द्वारका, हरद्वार आदि अडसठ(६८) तीर्थों में जाकर स्नान करना, करोड़ों यज्ञ, दान, व्रत आदि करना - ये सब शुभ कर्म मिल कर भी सन्तदर्शन से तुलना(समानता) नहीं कर सकते ॥५२॥
(क्रमशः)

*ब्रह्म-विचार ॥*

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*कहा कहूँ कुछ वरणि न जाई,*
*अविगति अंतर ज्योति जगाई ।*
*दादू उनको मरम न जानै,*
*आप सुरंगे बैन बजाई ॥*
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*ब्रह्म-विचार ॥*
वारी रे अणघड़िया देवा । तेरी पूजा तेरी सेवा ॥टेक॥ 
वारी रे अणघड़िया देवा, मोहि भरोसा१ पड़िया । 
सब संसार सँवार्या तेरा, तूँ क्याँह सेती घड़िया ॥
आपै आप अलख्य निरंजन, सूरति मूरति सारा ।
कानौं सुन्या न आँख्यौं देख्या, तेरा घड़िनैंहारा ॥
दस औतार कहैं औतरिया, सो तौ राम न होई ।
उन्हौं कमाई अपणी पाई, करता औरे कोई ॥
काकौ पूत पीता को वाकौ, कहौ कौंण सौं लड़िया ।
कह बषनां एक राम कहंताँ, कोई झूठि न पड़िया ॥५१॥ 
(१ पाठांतर : ‘वरांसा’ (संशय) व मंगलदासजी की पुस्तक में । वि. सं. १७८० व १७८५की पुस्तकों में पाठ ‘भरोसा’ ही है ।) 
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हे अणघड़िया(जिसे किसी ने न बनाया हो, जिसका कारण कोई अन्य न होकर स्वयं ही हो) देव ! मैं तुझ पर न्यौछावर होता हूँ । मैं तेरी ही पूजा और तेरी ही सेवा करता हूँ । मुझे पूर्ण विश्वास हो गया है कि तू अणघड़िया देव ही है और इसीलिये मैं तेरे ऊपर न्यौछावर होता हूँ । 
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सारा संसार तेरे द्वारा ही निर्मित है अर्थात् तू ही समस्त ब्रह्माण्ड का अभिन्ननिमित्तोपादान कारण है किन्तु हे देव ! अज्ञ लोगों की शंका निवृत्यर्य मुझे यह तो बता दे कि तू किसके द्वारा बनाया गया है अर्थात् तेरा कर्त्ता कौन है 
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(दर्शनशास्त्र में अनवस्था नामक एक दोष का वर्णन उस समय आता है जब हम ब्रह्म की मीमांसा करते हैं । इसका तात्पर्य यह है कि एक कार्य का कोई कारण, उसका कोई दूसरा कारण, उसका कोई तीसरा कारण, इस प्रकार कारणों की श्रंखला चल पड़ती है और उसका अंत नहीं होता । कारण का कारण बताते-बताते अव्यवस्था फैल जाती है, किसी एक अवस्था का निर्धारण नहीं हो पाता, यही अनवस्था दोष है । अतः मीमांसाकारों ने परमात्मा का कोई कारण नहीं, यही निर्धारित किया है क्योंकि किसी न किसी स्थिति पर पहुँच कर तो अन्तिम कर्त्ता यही है, कहना पड़ता है ।) 
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हे परमात्मन् ! तू ही तेरा कारण और तू ही तेरा कार्य हैं (आपै-आप), अलख और माया से रहित निरंजन है । संसार के जर्रे-जर्रे में तेरी ही सूरत-मूरत निवास करती है । इसीलिये तेरे को बनाने वाले के बारे में न तो कानों से सुनने में ही आया है और न उसे किसी ने आजतक आँखों से देखा ही है । 
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कुछ लोग कहते हैं, तू दस बार इस पृथिवी पर अवतरित हुआ है किन्तु मेरी मान्यता के अनुसार तो तू अणघड़िया देव उन दस अवतारों के रूप में अवतरित हुआ ही नहीं । क्योंकि उन्होंने जो भो अतिमानवीय कार्य किये उनका फल उन्हें मिल गया तथा उनको बनाने वाला वे स्वयं न होकर कोई और ही है । 
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बताइये, अणघड़िया देव किसका पुत्र है तथा उसका पिता कौन है, साथ ही यह भी बताइये कि वह किस-किस से लड़ा । अर्थात् अणघड़िया देव का कोई पिता नहीं है तथा उसका कोई पुत्र भी नहीं है । वह शरीरधारी न होने से किसी से प्रत्यक्ष रूप में लड़ा भी नहीं है । बषनां कहता है नाना राम कहने के स्थान पर राम को एक अद्वितीय कहने पर कोई भी झूठे नहीं पड़ते, झूठ = भ्रम में नहीं पड़ते ॥५१॥
(क्रमशः) 

रविवार, 15 फ़रवरी 2026

* ५. गुरु-शिष्य निदान निर्णय का अंग ~१/४*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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* ५. गुरु-शिष्य निदान निर्णय का अंग ~१/४*
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गुरु-शिष्य निर्णय-अंग के अनन्तर गुरु-शिष्यपने में हेतु निर्णय का बिचार करने के लिये गुरु-शिष्य निदान निर्णय का अंग कह रहे हैं -
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*सतगुरु सोध रू कीजिये, साहिब सौं सांचा ।*
*रज्जब परसे पार ह्वै, सुन मनसा वाचा ॥१॥*
जो ईश्वर की आज्ञानुसार रह कर ईश्वर के आगे सच्चा रहता हो, ऐसी परीक्षा करके गुरु बनाना चाहिये, ऐसे गुरु का उपदेश श्रवण करके मन-वचन द्वारा उसके अनुसार व्यवहार करता है वह संसार से पार होकर परब्रह्म को प्राप्त होता है ।
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*सद्गुरु सोध रू कीजिये, साहिब सौ पूरा ।*
*रज्जब रहता राखिले, गुरु जीवन मूरा ॥२॥*
ईश्वर की आज्ञा मानने में जो ईश्वर के आगे पूरा हो ऐसी जाँच करके ही गुरु बनाना चाहिये । जो गुण विकारों से रहित होता है वही गुरु संसार प्रवाह में बहते हुये प्राणी को जीवन के मूल परब्रह्म में स्थिर रख सकता है ।
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*सत जत सुमिरण हिरदै साँच, सो सद्गुरु शिष ह्वै मन राच ।*
*रज्जब कहै परख गुरुदेव, सेवक हो कीजे ता सेव ॥३॥*
जो सत्य, संयम, ईश्वर स्मरणादि साधनों में हृदय से सच्चा हो वही सद्गुरु है, उसी का शिष्य होकर उसी में मन से प्रेम करो । हम तो यही कहते हैं कि - प्रथम परीक्षा करके ही गुरु बनाओ और सच्चे सद्गुरु के सेवक बन कर सेवा करो ।
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*सद्गुरु मृतक१ जहाज गति, शिष सब जीवित माँहिं ।*
*जन रज्जब जोख्यूँ२ गई, भव जल बूडैं नाँहिं ॥४॥*
४-६ में सच्चे सद्गुरु के शरण में हानि नहीं होती यह कहते हैं - सद्गुरु शुष्क काष्ठ१ से बने हुये जहाज के समान है और शिष्य उसमें बैठने वाले जीवित प्राणियों के समान हैं, जैसे जहाज में बैठने वाले जल में नहीं डूबते उनके डूबने का भय चला जाता है । वैसे ही जीवनमुक्त२ सद्गुरु की शरण में जाने से संसार दशा रूप जीवन वाले प्राणियों का संसार भय चला जाता है, वे संसार-सागर में नहीं डूबते ।
(क्रमशः)

शनिवार, 14 फ़रवरी 2026

ब्रह्मलीन होना ~

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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१५ आचार्य हरजीराम जी ~ 
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ब्रह्मलीन होना ~ 
उक्त  प्रकार आचार्य हरजीरामजी महाराज ६ वर्ष ४ मास २५ दिन गद्दी पर विराज कर वि. सं. १९५५ वैशाख शुक्ला १० रविवार को ब्रह्मलीन हुये थे । आप महान् संत थे । गद्दी पर विराजने से पूर्व भी आपने अपना जीवन ब्रह्म भजन में व्यतीत किया था और आचार्य पद प्राप्ति के पश्‍चात् भी आप ने ब्रह्म भजन, उपदेश आदि परमार्थ के कार्यों में ही मन रखा था । आप सर्व हितेषी महात्मा थे । आपने अपने अधार्मिक जनता को भी ईश्‍वर की ओर लगाया था ।
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गुण गाथा दोहा- 
हरि में हरजीराम का, चित रहा सब काल ।  
इस से शरणागतों को, करते रहे निहाल ॥१॥
हरजिरामजी के रहे, उन्नत सदा विचार । 
इस कारण उनका चला, सम्यक् सब व्यवहार ॥२॥
आचार्य हरजिराम की, बुद्धि ब्रह्म में लीन ।
रही इसी से वे हुये, परमार्थ सु प्रवीन ॥३॥ 
अपने जीवन काल में, ले दादू आधार ।  
हरजिराम करते रहे, दादूवाणि प्रचार ॥४॥
दादूवाणी का सदा, हिय में धरा विचार ।
इस से हरजीराम जी, संतत रहे उदार ॥५॥
हर रु राम की एकता, हरजिराम में देख ।
‘नारायण’ निश्‍चय हुआ, सब में एक अलेख ॥६॥
हर रु राम का भेद तो, है अबोध से जान । 
क्षय कर अबोध इक हुये, हरजीराम सुजान ॥७॥
ब्रह्म ज्ञान हो जाय तब, भेद रहे नहिं लेश । 
ज्ञानी हरजीराम ने, हता द्वैत का क्लेश ॥८॥ 
हरजिराम आचार्य की, निष्ठा और विचार । 
लख ‘नारायण’ करत है, वन्दन बारंबार ॥९॥
इति श्री द्वादश अध्याय समाप्त: १२ 
(क्रमशः)

*१९. साधु कौ अंग ४५/४८*

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१९. साधु कौ अंग ४५/४८*
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सुन्दर कृष्ण प्रगट कहै, मैं धारी यह देह । 
संतनि कै पीछै फिरौं, सुद्ध करन कौं येह ॥४५॥ 
भगवान् कृष्ण ने तो साक्षात् अपने श्रीमुख से कहा है कि मैंने अपने यह शरीर शुद्ध(निष्कलंक) करने के लिये ही यह अवतार लिया है ॥४५॥
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संतनि की महिमा कही, श्रीपति श्रीमुख गाइ । 
तातें सुन्दर छाडि सब, सन्त चरन चित लाइ ॥४६॥
इस प्रकार, जब लक्ष्मीपति भगवान् ने स्वयं श्रीमुख से सन्तों की चरणपूजा की महिमा बखान की है तो श्रीसुन्दरदासजी भी साधक को यही सत्परामर्श दे रहे हैं कि तूं भी समस्त सांसारिक प्रपन्च त्याग कर केवल सन्तों की सङ्गति में ही अपना ध्यान लगा ॥४६॥
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संतनि की सेवा किये, श्रीपति होहि प्रसन्न । 
सुन्दर भिन्न न जानिये, हरि अरु हरि के जन्न ॥४७॥
श्रीसुन्दरदासजी सत्सङ्गति का एक अन्य लाभ भी बता रहे हैं - इस सत्सङ्गति(सन्तों की सेवा) से देवाधिदेव(श्रीपति) भगवान् भी प्रसन्न होते हैं । अतः उन दोनों को अभिन्न जान कर तूं भी उन(सन्तों) के चरणों की सेवा कर ॥४७॥
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सुन्दर हरि जन एक हैं, भिन्न भाव कछु नांहि । 
संतनि माहें हरि बसै, संत बसै हरि मांहिं ॥४८॥
हरि एवं हरिभक्त - दोनों एक हैं, उन को भिन्न(पृथक) न समझ; क्योंकि सन्तों के हृदय में हरि का वास है और हरि के हृदय में सन्तों(भक्तों) का वास है ॥४८॥
(क्रमशः)

*उपदेश-चेतावनी ॥*

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*ब्रह्म सरीखा होइ कर, माया सौं खेलै ।*
*दादू दिन दिन देखतां, अपने गुण मेलै ॥*
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*उपदेश-चेतावनी ॥*
सीख गुराँ की मानौं रे, क्यूँही सीख बडाँ की मानौं ।
साधाँ त्यागि छिया करि छाडी, तिहि थैं दीजै कानौं ॥टेक॥
कर दीपक ले कूप पड़ीजै, एक बड़ौ हैरानौं ।
पैसि पतालि बुरौ जे कीजै, पाछैं होइ न छानौं ॥
कान खुजालै नीचौ न्हालै, पाड़ौसणि दे तानौं ।
थारा किया किरत कौ कागद, जम लिखि लीयौ पानौं ॥
बिषै बिकार माँहैं अपराधी, आठौं पहर दिवानौं ।
लजमारा लाजाँ काँइ मारै, परमेसुर कौ बानौं ॥
जाकी बिरति रु ब्रह्म कहावै, खोटौ देखि जमानौं ।
सिष साषाँ सुधौ बिषै कीनै मैं, बहि जासी गैबानौं ॥
जत अर सत दीयौं परमेसर, लिखि ल्यायौ परवानौं ।
बषनौं कहै भला ते दीसै, सुमिरण मैं सावधानौं ॥५०॥
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गुरुमहाराज के उपदेशों को मानौं = सुनकर आचरण में आचरित करो । जो आयुवृद्ध तथा ज्ञानवृद्ध हैं उनकी अनुभवयुक्त शिक्षा को कैसे भी करके मानो । (यहाँ क्यूँही = कैसे भी करके का आशय “भाव कुभाव अनख आलसहूँ । नाम जपत मंगल दिस दसहूँ ॥” से है । भाव-कुभाव ही आगे चलकर भाव = श्रद्धा-भक्ति में परिवर्तित हो जाते हैं । अतः प्रारम्भिक अवस्था में भगवद्मार्ग का जैसे भी हो, वैसे ही अनुसरण करना चाहिये । क्योंकि “नेहाभिक्रमनाशोस्ति प्रत्यवायो न विद्यते । स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥” गीता २/३९॥)
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साधु-सज्जन पुरुषों ने त्यागने योग्य छिया = माया, भ्रम को त्याग दिया है । अतः तुमको भी भ्रम-जंजालों का त्याग कर देना चाहिये (कानैं =एक ओर कर देना) । जिस व्यक्ति के हाथ में दीपक हो, फिर भी वह कूवे में पड़ जाये तो इससे बड़ा आश्चर्य और क्या होगा ? जिसके पास श्रोत्रिय-ब्रह्मनिष्ठ गुरु का उपदेश रूपी पूंजी उपलब्ध है । फिर भी वह विषय-भोगों में आसक्त हो जाये तो यह आश्चर्यचकित करने वाले तथ्य से कम नहीं है । पाताल = बिलकुल एकान्त में बुरा करने पर भी बुरा कृत्य छिपता नहीं है, कभी न कभी किसी न किसी निमित्त से उसका उद्घाटन हो ही जाता है ।
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जब उस बुरे कृत्य का उद्घाटन होता है और पाड़ौसन = परिचितों द्वारा उलाहना दिया जाता है तब कान खुजाने तथा नीचे की ओर देखने रूप शर्मिंदगी के अतिरिक्त और कुछ शेष बचता नहीं है । वस्तुतः बुरा आचरण करने वाला सोचता है, मैं नितान्त एकान्त में इस कार्य को कर रहा हूँ, मुझे कोई नहीं देख रहा है किन्तु सर्वज्ञ-परमात्मा सर्वत्र किये सर्व कार्यों को देखता हैं और मनुष्य द्वारा किये कृत्यों को अपनी बहियों में लिख लेता है ।
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परब्रह्म-परमात्मा की सत्ता से स्फूर्तमान जम = यमराज तेरे किये कृत्यों को अपनी बहियों के पन्नों में लिख लेता है । हे मनुष्य ! तू आठों-पहर विषयविकारों में डूबा हुआ अपराध दर अपराध करता जाता है; हे लजमार = जिन कृत्यों को करने में लज्जा आती है, ऐसे कृत्यों को करने वाले मनुष्य ! परमेश्वर द्वारा अहैतुकी कृपा करके प्रदान किये मनुष्य बानौं = शरीर को क्यों लज्जित करने में लगा हुआ है, क्यों लाजें मारता है ।
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“कबहुँक करि करुणा नर देही । देत ईस बिनु हेत सनेही ॥” मानस ॥ 
“लख चौरासी भुगतताँ, बीत जाइ जुग च्यारि ।
पीछै नरतन पाइगा, ताते राम सँभारि ॥ श्रीरामचरणवाणी ॥
बषनांजी आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहते हैं, देखो, कितना बुरा जमाना आ गया है कि जिसकी वृत्ति के कारण विरति = विरक्त और ब्रह्म कहा जाता है, वही साधु अपने शिष्य-प्रशिष्यों के सहित(सुधौ) विषय-भोगों में आसक्त है और गर्वता हुआ उन्हीं विषय-भोगों में बहा जाता है ।
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परमेश्वर द्वारा मनुष्य जन्म प्रदान करते समय जत = इन्द्रियनिग्रह तथा सत = सतस्वरूप परमेश्वर की भक्ति करने का परवानो = परवाना लिख कर दिया जाता है(यात्रा करते समय आगामी कार्यक्रम को लिखकर जिस कागज पर दिया जाता है वह परवाना कहलाता है) बषनांजी कहते हैं, वे ही भले मनुष्य प्रतीत होते हैं जो परवाने में लिखे समाचार रूपी भगवन्नाम स्मरण को करने में सावधान = होशियार हैं ? स्मरण-भजन करते हैं ॥५०॥
(क्रमशः)