सोमवार, 9 फ़रवरी 2026

राजगढ का चातुर्मास ~

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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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१५ आचार्य हरजीराम जी ~ 
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राजगढ का चातुर्मास ~ 
वि. सं. १९४९ में आचार्य हरजीरामजी महाराज को चातुर्मास का निमंत्रण राजगढ के संत बालमुकुन्दजी ने दिया । आचार्यजी ने स्वीकार किया । चातुर्मास का समय समीप आने पर आचार्य हरजीरामजी महाराज अपने शिष्य संत मंडल के सहित राजगढ पधारे । संत बालमुकुन्दजी ने बडे ठाट बाट से आचार्य हरजीरामजी महाराज की अगवानी की । 
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भेंट चढाकर प्रणाम सत्यराम आदि शिष्टाचार के पश्‍चात् बाजे गाजे से संकीर्तन करते हुये स्थान पर लाकर ठहराया । सेवा का प्रबन्ध सब अच्छी प्रकार करा दिया । चातुर्मास के कार्यक्रम सब विधि विधान से होने लगे । अच्छा चातुर्मास हुआ । समाप्ति पर मर्यादानुसार आचार्यजी को भेंट दी तथा शिष्य संत मंडल को यथायोग्य वस्त्रादि देकर सस्नेह विदा किया ।  
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देहली गमन ~राजगढ के चातुर्मास से विदा होकर आचार्य हरजीरामजी महाराज देहली के भक्तों के आग्रह से वि. सं. १९४९ कार्तिक शुक्ला अष्टमी को देहली पधारे । उस समय भारत की राजधानी देहली नगरी के भक्तों ने सरकार से विशेषाज्ञा प्राप्त करके आचार्य हरजीरामजी महाराज की शोभा यात्रा देहली के रेलवे स्टेशन से आचार्य हरजीरामजी महाराज को हाथी पर बैठाकर आरंभ की थी । 
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यह शोभा यात्रा बडे ठाट बाट से बाजे गाजे से संकीर्तन करते हुये आरंभ हुई । मार्ग में भवनों की अटारियों से आचार्यजी पर पुष्प वृष्टि होती जा रही थी । सडक पर भक्त लोग पुष्प मालायें और भेंट समर्पण करते जा रहे थे । आचार्यजी के कर्मचारी भेंट चढाने वालों को प्रसाद देते जा रहे थे । गायक संत लोग महात्माओं के पद गाते हुये साथ- साथ चल रहे थे । 
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भक्त मंडल की अनेक  मंडलियां आगे पीछे ईश्‍वर नामों का संकीर्तन करते हुये चल रही थीं । स्थान- स्थान पर दादूदयालु महाराज की जय ध्वनि होती थी । हाथी की सवारी में रुकावट डालने वाले तार आदि को म्युनिसिपल कमिश्‍नर की आज्ञा से हटा दिये गये थे । यह शोभा यात्रा निर्विध्न हो रही थी । 
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साथ में सरकारी पुलिस चल रही थी । कोई असुविधा होती तो उसे तत्काल मिटा देती थी । यह सुन्दर शोभा यात्रा स्टेशन से चलकर- फतहपुरी, चान्दनी चौक, घन्टाघर आदि प्रमुख बाजारों से होती हुई जहां आचार्यजी को ठहराने का स्थान नियत किया था वहां आ गई । आचार्यजी के दर्शनों से भक्त जनता को अति आनन्द का लाभ हुआ । प्रसाद बांटकर शोभा यात्रा समाप्त की । 
(क्रमशः)  

*१९. साधु कौ अंग २१/२४*

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१९. साधु कौ अंग २१/२४*
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जन सुन्दर सतसंग तें, पावै दुर्लभ योग । 
आतम परमातम मिले, दूरि होंहि सब रोग ॥२१॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - यह साधक ऐसा सत्सङ्ग कर दुर्लभ योगविद्या में पारङ्गत हो सकता है । इस विद्या से उपलब्ध राजयोग के सहारे आत्मा का परमात्मा से ऐक्य स्थापित कर सकता है तथा अपनी सभी शारीरिक व्याधियाँ नष्ट कर शरीर से भी नीरोग हो सकता है ॥२१॥
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जन सुन्दर सतसंग तें, उपजै अद्वय ज्ञान । 
मुक्ति होय संसय मिटै, पावै पद निर्बान ॥२२॥
इस सत्सङ्ग के प्रभाव से जब साधक को अद्वैत ज्ञान हो जाता है, उस को एक साथ तीन लाभ होते हैं - १. वह भवप्रपञ्च से मुक्त हो जाता है, २. उस का द्वैतविषयक भ्रम मिट जाता है, तथा ३. उस को निर्वाण प्राप्त हो जाता है ॥२२॥
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सुन्दर सब कछु मिलत है, समये समये आइ । 
दुर्लभ या संसार मैं, संत समागम थाइ ॥२३॥
सन्त का समागम दुर्लभ : इस सत्सङ्गी साधक के सभी सत्सकङ्कल्प क्रमशः शनैः शनैः पूर्ण होते चलते हैं; परन्तु सचाई यह है कि ऐसे साधक को सच्चा सन्त मिलना ही आज दुर्लभ है ! ॥२३॥
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मात पिता सबही मिलैं, भइया बंधु प्रसंग । 
सुन्दर सुत दारा मिलैं, दुर्लभ है सतसंग ॥२४॥
इस संसार में सब कुछ सुगमता से मिल सकता है - माता पिता भी, भाई एवं बन्धु बान्धव भी, पुत्र या पत्नी भी । परन्तु साधुजनों की सङ्गति पूर्व जन्म के किसी विशाल पुण्य के प्रताप से कोई सौभाग्यशाली साधक ही पा सकता है ॥२४॥
(क्रमशः) 

समाधि के सागर में निमग्न

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🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*मनसा के पकवान सौं, क्यों पेट भरावै ।*
*ज्यों कहिये त्यों कीजिये, तब ही बन आवै ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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मैं श्रीरामकृष्ण की उक्तियों को सुनकर लिख रहा था, उन्होंने कहा - "हाँ देखो, भंग-भंग रट लगाने से कुछ न होगा । भंग ले आओ, उसे घोंटो और पीओ ।" इसके बाद उन्होंने मुझसे कहा - "तुम्हें तो संसार में रहना है, अतएव ऐसा करो कि नशे का गुलाबी रंग रहा करे । काम-काज भी करते रहो और इधर जरा सुखी भी रहो । तुम लोग शुकदेव की तरह तो कुछ हो नहीं सकोगे कि नशा पीते ही पीते अन्त में अपने तन की खबर भी न रहे - जहाँ-तहाँ बेहोश पड़े रहो ।
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"संसार में रहोगे तो एक आम-मुखतारनामा लिख दो । उनकी जो इच्छा, करें । तुम बस बड़े आदमियों के घर की नौकरानी की तरह रहो । बाबू के लड़के-बच्चों का वह आदर तो खूब करती है, नहलाती-धुलाती है, खिलाती पिलाती है, मानो वह उसी का लड़का हो; परन्तु मन ही मन खूब समझती है कि यह मेरा नहीं है । वहाँ से उसकी नौकरी छूटी नहीं कि बस फिर कोई सम्बन्ध नहीं ।
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"जैसे कटहल काटते समय हाथ में तेल लगा लिया जाता है, उसी तरह(भक्तिरूपी) तेल लगा लेने से संसार में फिर न फँसोगे, लिप्त न होओगे ।"
अब तक जमीन पर बैठे हुए बातें हो रही थीं । अब उन्होंने खाट पर चढ़कर लेटे लेटे मुझसे कहा - "पंखा झलो ।" मैं पंखा झलने लगा । वे चुपचाप लेटे रहे । कुछ देर बाद कहा, "अजी, बड़ी गरमी है, पंखा जरा पानी में भिगा लो ।"
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मैंने कहा, "इधर शौक भी देखता हूँ कम नहीं है !" हँसकर उन्होंने कहा, "क्यों शौक नहीं रहेगा ? - शौक रहेगा क्यों नहीं ?" मैंने कहा - "अच्छा, तो रहे, रहे, खूब रहे ।" उस दिन पास बैठकर मुझे जो सुख मिला वह अकथनीय है ।
अन्तिम बार - जिस समय की बात तुमने तीसरे खण्ड में लिखी है*(*ता. २३ मई १८८५ देखिये ।) - मैं अपने स्कूल के हेडमास्टर को ले गया था, उनके बी. ए. पास करने के कुछ ही समय बाद । अभी थोड़े ही दिन हुए उनसे तुम्हारी मुलाकात हुई थी ।
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उन्हें देखते ही श्रीरामकृष्णदेव ने मुझसे कहा - "क्यों जी, तुम इन्हें कहाँ पा गये ? ये तो बड़े सुन्दर व्यक्ति हैं ।
"क्यों जी, तुम तो वकील हो । बड़ी तेज बुद्धि है । मुझे कुछ बुद्धि दे सकते हो ? तुम्हारे पिताजी अभी उस दिन यहाँ आये थे, आकर तीन दिन रह भी गये हैं ।"
मैंने पूछा - "उन्हें आपने कैसा देखा ?"
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उन्होंने कहा - "बहुत अच्छा आदमी है, परन्तु बीच बीच में बहुत ऊल-जलूल भी बकता है ।"
मैंने कहा - "अब की बार मुलाकात हो तो ऊल-जलूल बकना छुड़ा दीजियेगा ।"
वे इस पर जरा मुस्कराये । मैंने कहा- "मुझे कुछ बातें सुनाइये ।"
उन्होंने कहा - "हृदय को पहचानते हो ?"
मैंने कहा - "आपका भाँजा न ? मुझसे उनका परिचय नहीं है ।"
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श्रीरामकृष्ण - हृदय कहता था, 'मामा, तुम अपनी बातें सब एक साथ न कह डाला करो । हर बार उन्हीं उन्हीं बातों को क्यों कहते हो ?' इस पर मैं कहता था, 'तो तेरा क्या, बोल मेरा है, मैं लाख बार अपना एक ही बोल सुनाऊँगा ।'
मैंने हँसते हुए कहा, 'बेशक, आपने ठीक ही तो कहा है ।'
कुछ देर बाद बैठे ही बैठे ॐ ॐ कहकर वे गाने लगे - 'ऐ मन, तू रूप के समुद्र में डूब जा ।...'
दो-एक पद गाते ही गाते सचमुच वे डूब गये । - समाधि के सागर में निमग्न हो गये ।
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समाधि छूटी । वे टहलने लगे । जो धोती पहने हुए थे, उसे दोनों हाथों से समेटते समेटते बिलकुल कमर के ऊपर चढ़ा ले गये । एक तरफ से लटकती हुई धोती जमीन को बुहारती जा रही थी । मैं और मेरे मित्र, दोनों एक दूसरे को टोंच रहे थे और धीरे धीरे कह रहे थे, 'देखो, धोती सुन्दर ढंग से पहनी गयी है ।' कुछ देर बाद ही 'हत्तेरे की धोती' कहकर, उसे उन्होंने फेक दिया ।
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फिर दिगम्बर होकर टहलने लगे । उत्तर तरफ से न जाने किसका छाता और छड़ी हमारे सामने लाकर उन्होंने पूछा, 'क्या यह छाता और छड़ी तुम्हारी है ?' मैंने कहा, 'नहीं ।' साथ ही उन्होंने कहा, "मैं पहले ही समझ गया था कि यह छाता और छड़ी तुम्हारी नहीं है । मैं छाता और छड़ी देखकर ही आदमी को पहचान लेता हूँ । अभी जो एक आदमी आया था, ऊल-जलूल बहुत कुछ बक गया, ये चीजें निस्सन्देह उसी की हैं ।"
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कुछ देर बाद उसी हालत में चारपाई पर वायव्य की तरफ मुँह करके बैठे गये । बैठ ही बैठे उन्होंने पूछा, "क्यों जी, क्या तुम मुझे असभ्य समझ रहे हो ?"
मैंने कहा, "नहीं, आप बड़े सभ्य हैं । इस विषय का प्रश्न आप करते ही क्यों हैं ?"
श्रीरामकृष्ण - अजी, शिवनाथ आदि मुझे असभ्य समझते हैं । उनके आने पर धोती किसी न किसी तरह लपेटकर बैठना ही पड़ता है । क्या गिरीश घोष से तुम्हारी पहचान है ?
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मैं - कौन गिरीश घोष ? वही जो थियेटर करता है ?
श्रीरामकृष्ण – हाँ ।
मैं - कभी देखा तो नहीं, पर नाम सुना है ।
श्रीरामकृष्ण - वह अच्छा आदमी है ।
मैं - सुना है, वह शराब भी पीता है !
श्रीरामकृष्ण - पिये, पिये न, कितने दिन पियेगा ?
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फिर उन्होंने कहा, 'क्या तुम नरेन्द्र को पहचानते हो ?'
मैं - जी नहीं ।
श्रीरामकृष्ण - मेरी बड़ी इच्छा है कि उसके साथ तुम्हारी जान-पहचान हो जाय । वह बी. ए. पास कर चुका है, विवाह नहीं किया ।
मैं - जी, तो उनसे परिचय अवश्य करूँगा ।
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श्रीरामकृष्ण - आज राम दत्त के यहाँ कीर्तन होगा । वहाँ मुलाकात हो जायगी । शाम को वहाँ जाना ।
मैं - जी हाँ, जाऊँगा ।
श्रीरामकृष्ण - हाँ, जाना, जरूर जाना ।
मैं - आपका आदेश मिला और मैं न जाऊँ ! - अवश्य जाऊँगा ।
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फिर वे कमरे की तस्वीरें दिखाते रहे । पूछा - "क्या बुद्धदेव की तस्वीर बाजार में मिलती है ?"
मैं - सुना है कि मिलती है ।
श्रीरामकृष्ण - एक तस्वीर मेरे लिए ले आना ।
मैं - जी हाँ, अब की बार जब आऊँगा, साथ लेता आऊँगा ।
फिर दक्षिणेश्वर में उन श्रीचरणों के समीप बैठने का सौभाग्य मुझे कभी नहीं मिला ।
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उस दिन शाम को रामबाबू के यहाँ गया । नरेन्द्र को देखा । श्रीरामकृष्ण एक कमरे में तकिये के सहारे बैठे हुए थे, उनके दाहिनी ओर नरेन्द्र थे । मैं सामने था । उन्होंने नरेन्द्र से मेरे साथ बातचीत करने के लिए कहा ।
नरेन्द्र ने कहा, 'आज मेरे सिर में बड़ा दर्द हो रहा है । बोलने की इच्छा ही नहीं होती ।'
मैं - रहने दीजिये, किसी दूसरे दिन बातचीत होगी ।
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उसके बाद उनसे बातचीत हुई थी, अलमोड़े में, शायद १८९७ की मई या जून के महीने में ।
श्रीरामकृष्ण की इच्छा पूरी तो होने की ही थी, इसीलिए बारह साल बाद वह इच्छा पूरी हुई । अहा ! स्वामी विवेकानन्दजी के साथ अलमोड़े में वे उतने दिन कैसे आनन्द में कटे थे ! कभी उनके यहाँ, कभी मेरे यहाँ, और कभी निर्जन में पहाड़ की चोटी पर ! उसके बाद फिर उनसे मुलाकात नहीं हुई । श्रीरामकृष्ण की इच्छा-पूर्ति के लिए ही उस बार उनसे मुलाकात हुई थी ।
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श्रीरामकृष्ण के साथ भी सिर्फ चार-पाँच दिन की मुलाकात है, परन्तु उतने ही समय में ऐसा हो गया था कि उन्हें देखकर जी में आता था जैसे हम दोनों एक ही दर्जे के पढ़े हुए विद्यार्थी हों । उनके पास हो आने पर जब दिमाग ठिकाने आता था, तब जान पड़ता था कि बाप रे ! किसके सामने गये थे !
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उतने ही दिनों में जो कुछ मैंने देखा है - जो कुछ मुझे मिला है, उसी से जी मधुमय हो रहा है । उस दिव्यामृतवर्षा हास्य को यत्नपूर्वक मैंने हृदय में बन्द कर रखा है । अजी, वह आश्रयहीनों का आश्रय हैं । और उसी हास्य से बिखरे हुए अमृत-कणों के द्वारा अमरीका तक में संजीवनी का संचार हो रहा है और यही सोचकर 'ह्रष्यामि च मुहुर्मुहुः, ह्रष्यामि च पुनः पुनः' - मुझे रह-रहकर आनन्द हो रहा है ।
(समाप्त)

रविवार, 8 फ़रवरी 2026

१५ आचार्य हरजीराम जी ~

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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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१५ आचार्य हरजीराम जी ~ 
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आचार्य गुलाबदासजी महाराज के ब्रह्मलीन होने पर वि. सं. १९४८ में मार्ग शीर्ष शुक्ला १५ मंगलवार को सर्व समाज ने मिलकर हरजीरामजी महाराज को आचार्य गद्दी पर बैठाया । आपने २२०००) रु. पूजा दादूपंथ को दी थी । 
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आपके  टीके  की भेंट ~
आपके  टीके  के दस्तूर पर जयपुर नरेश ने- घोडा, दुशाला व १००) रु. भेंट भेजी । अलवर नरेश ने- एक हथिनी, पाग, मलमल, पार्चाथान, दुशाला आदि भेजे । जोधपुर नरेश जसवंतसिंहजी द्वितीय ने घोडा, दुशाला भेजे । जीन्द नरेश रणधीरसिंहजी ने एक - दुशाला ५००) रु. भेजे । पटियाला नरेश राजेन्द्रसिंहजी ने दुशाला- पाग आदि भेजे । 
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सीकर नरेश माधवसिंहजी ने- दुशाला और १००) रु. भेजे । किशनगढ नरेश शार्दूलसिंहजी ने- एक दुशाला भेजा । रतलाम नरेश रणजीतसिंहजी ने- दुशाला और १००) रु. भेजे । सूरजगढ के ठाकुर जीवणसिंहजी ने- १००) रु. भेजे । इत्यादिक  बडे छोटे नरेशों व रईसों की टीका रुप भेंट आई । समस्त दादूपंथी समाज ने मर्यादा के अनुसार भेंटें चढाई । उक्त प्रकार टीका की भेंट का संक्षिप्त परिचय है ।
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विशेषतायें ~  आचार्य हरजीरामजी महाराज बाल्यावस्था से ही अपना समय ब्रह्म भजन में ही व्यतीत करते थे । ब्रह्म भजन में ही उनका प्रेम था । अन्य के साथ तो वे कर्तव्य का ही पालन करते थे । अन्य व्यवहारिक कार्य से तो आप सदा उपराम ही रहते थे । आप परम विरक्त एकान्त सवी और मित भाषी थे । ऐसा ही उपदेश अपने पास रहने वाले शिष्यों तथा संतों को देते थे और कहते थे देखो, दादूजी महाराज भी कहते हैं- ‘‘दादू बहु बकवाद से, वायु भूत हो जाय ।’’ 
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आचार्य पद पर विराजने पर भी आपका व्यवहार पूर्ववत ही रहा था । पद प्राप्तिका अभिमान तो आपको लेश मात्र भी नहीं छू सका था । आचार्य पद पर आसीन होने पर आपका अधिक समय ब्रह्मभजन में ही व्यतीत होता था । परमहंसों के लक्षणों से आप संपन्न थे । आप के समकालीन संत आप में परमहंसों के लक्षण प्रत्यक्ष रुप में देखते थे । आप सब में सम रहते थे । 
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आसुर गुणों का प्रभाव आपके  हृदय पर कभी नहीं पडता था । दैवीगुण अवश्य आप में भासते थे । किन्तु वे भी तो अन्त: करण के ही थे । अपने आत्मा को तो वे सदा निर्गुण निर्लेप निर्विकार ही समझते थे तथा कहते थे । किसी वस्तु या व्यक्ति में आपकी आसक्ति लेशमात्र भी नहीं थी । वे सदा निर्द्वन्द्व ही रहते थे । उक्त प्रकार उनके समकालीन संत उनके विषय में कह गये हैं ।  
(क्रमशः) 

*१९. साधु कौ अंग १७/२०*

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१९. साधु कौ अंग १७/२०*
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सुन्दर आये संतजन, मुक्त करन कौं जीव । 
सब अज्ञान मिटाइ करि, करत जीव तें सीव ॥१७॥
महाराज श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - भगवान् ने इन सभी सन्तों को इस संसार में जीवों को भवबन्धन से मुक्त कराने के लिये ही भेजा है । ये इन पामर प्राणियों का समस्त अविद्यान्धकार मिटाकर साधारण जीव से शिव(परमात्मा) के रूप में परिवर्तित कर आनन्दमय जीवन बिताने योग्य बना देते हैं ॥१७॥
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जन सुन्दर सतसंग तें, पावै सब कौ भेद । 
वचन अनेक प्रकार के, प्रगट कहे जे बेद ॥१८॥
जब सत्सङ्ग करता हुआ वह जिज्ञासु गुरुमुख से श्रुत ज्ञानोपदेश द्वारा सब भेद(द्वैत) को छिन्न भिन्न कर अद्वैतावस्था में पहुँच जाता है तब वह भी वेद के समान यथार्थ वचन बोलने का अधिकारी बन जाता है । (ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति) ॥१८॥
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जन सुन्दर सतसंग तें, उपजै निर्गुन भक्ति । 
प्रीति लगै परब्रह्म सौं, सब तें होइ बिरक्ति ॥१९॥
जब साधक(भक्त जन) के हृदय में उस सत्सङ्ग के प्रभाव से निर्गुण(निरञ्जन निराकार) की भक्ति का उदय हो जाता है तो उसका शनैः शनैः निरञ्जन निराकार प्रभु में अनन्य प्रेम हो जाता है । तथा इसके फलस्वरूप, इस को संसार से परम वैराग्य हो जाता है ॥१९॥
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जन सुन्दर सतसंग तें, उपजै निर्मल बुद्धि । 
जांनै सकल बिबेक करि, जीव ब्रह्म की सुद्धि ॥२०॥
अब सत्सङ्ग के प्रभाव से इस साधक(भक्त) की निर्मल(स्वच्छ) बुद्धि में विवेक ज्ञान उद्भूत हो जाता है तो वह उस के माध्यम से जीव ब्रह्म का अभेद ज्ञान प्राप्त कर अद्वैत भाव की ओर बढ़ जाता है ॥२०॥
(क्रमशः) 

समाधिमग्न

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🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*सकल भुवन सब आत्मा, निर्विष कर हरि लेइ ।*
*पड़दा है सो दूर कर, कश्मल रहण न देइ ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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घण्टे-डेढ़-घण्टे बाद कीर्तन शुरू हुआ । उस समय मैंने जो कुछ देखा, वह शायद जन्म-जन्मान्तर में भी न भूलूँगा । सब के सब नाचने लगे । केशव को भी मैंने नाचते हुए देखा, बीच में थे श्रीरामकृष्ण, और बाकी सब लोग उन्हें घेरकर नाच रहे थे । नाचते ही नाचते बिलकुल स्थिर हो गये – समाधिमग्न । बड़ी देर तक उनकी यह अवस्था रही ।
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इस तरह देखते और सुनते हुए मैं समझा, ये यथार्थ ही परमहंस हैं । एक दिन और, शायद १८८३ ई. में, श्रीरामपुर के कुछ युवकों को मैं साथ लेकर गया था । उस दिन उन युवकों को देखकर परमहंसदेव ने कहा था, 'ये लोग क्यों आये हैं ?'
मैंने कहा, - 'आपको देखने के लिए ।'
श्रीरामकृष्ण - मुझे ये क्या देखेंगे ? ये सब लोग बिल्डिंग(इमारत) क्यों नहीं देखते जाकर ?
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मैं - ये लोग यह सब देखने नहीं आये । ये आपको देखने के लिए आये हैं ।
श्रीरामकृष्ण - तो शायद ये चकमक पत्थर हैं । आग भीतर है । हजार साल तक चाहे उसे पानी में डाल रखो, परन्तु घिसने के साथ ही उससे आग निकलेगी । ये लोग शायद उसी जाति के कोई जीव हैं ? हम लोगों को घिसने पर आग कहाँ निकलती है ?
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यह अन्त की बात सुनकर हम लोग हँसे । उसके बाद और भी कौन-कौनसी बातें हुई, मुझे याद नहीं । परन्तु जहाँ तक स्मरण है, शायद 'कामिनीकांचन-त्याग' और 'मैं की बू नहीं जाती' इन पर भी बातचीत हुई थी ।
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मैं एक दिन और गया, प्रणाम करके बैठा कि उन्होंने कहा - "वही जिसकी डाट खोलने पर जोर से 'फस्-फस्' करने लगता है, कुछ खट्टा कुछ मीठा होता है - एक वही ले आओगे?" मैंने पूछा – 'लेमोनेड ?' श्रीरामकृष्ण ने कहा- "ले आओ न ।" जहाँ तक मुझे याद है शायद मैं एक लेमोनेड ले आया । इस दिन शायद और कोई न था ।
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मैंने कई प्रश्न किये थे - "आपमें क्या जाति-भेद है ?"
श्रीरामकृष्ण - कहाँ है अब ? केशव सेन के यहाँ की तरकारी खायी । अच्छा, एक दिन की बात कहता हूँ । एक आदमी बर्फ ले आया, उसकी दाढ़ी खूब लम्बी थी, पहले तो खाने की इच्छा न जाने क्यों नहीं हुई, फिर कुछ देर बाद एक दूसरा आदमी उसी के पास से बर्फ ले आया तो मैं दाँतो से चबाकर सब बर्फ खा गया । यह समझो कि जाति-भेद आप ही छूट जाता है ।
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जैसे, नारियल और ताड़ के पेड़ जब बड़े होते हैं तब उनके बड़े बड़े डण्ठलदार पत्ते पेड़ से आप ही टूटकर गिर जाते हैं । इसी तरह जाति-भेद आप ही छूट जाता है । झटका मारकर न छुड़ाना, उन सालों की तरह !
मैंने पूछा - केशवबाबू कैसे आदमी हैं ?
श्रीरामकृष्ण - अजी, वह दैवी आदमी है ।
मैं - और त्रैलोक्यबाबू ?
श्रीरामकृष्ण - अच्छा आदमी है, बहुत सुन्दर गाता है ।
मैं - और शिवनाथबाबू ?
श्रीरामकृष्ण - आदमी अच्छा है, परन्तु तर्क जो करता है - ?
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मैं – हिन्दू और ब्राह्म में अन्तर क्या है ?
श्रीरामकृष्ण - अन्तर और क्या है ? यहाँ शहनाई बजती है । एक आदमी स्वर साधे रहता है, और दूसरा तरह तरह की रागिनियों की करामत दिखाता है । ब्राह्मसमाजवाले ब्रह्म का स्वर साधे हुए हैं और हिन्दू उसी स्वर के अन्दर तरह तरह की रागिनियों की करामत दिखाते हैं ।
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"पानी और बर्फ । निराकार और साकार । जो चीज पानी है, वही जमकर बर्फ बनती है । भक्ति की शीतलता से पानी बर्फ बन जाता है !
"वस्तु एक ही है, अनेक मनुष्य उसे अनेक नाम देते हैं । जैसे तालाब के चारों ओर चार घाट हो । इस घाट में जो लोग पानी भर रहे हैं, उनसे पूछो तो कहेंगे, जल है । उधर के घाट में जो लोग हैं वे पानी कहेंगे । तीसरे घाटवाले कहेंगे, वाटर और चौथे घाट के लोग कहेंगे, एकुआ । परन्तु पानी एक ही है ।"
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मेरे यह कहने पर कि बरीशाल में अचलानन्द अवधूत के साथ मेरी मुलाकात हुई थी, उन्होंने कहा - "वही कोतरंग का रामकुमार न ?" मैंने कहा, 'जी हाँ ।'
श्रीरामकृष्ण - उसे तुम क्या समझे ?
मैं - जी, वे बहुत अच्छे हैं ।
श्रीरामकृष्ण - अच्छा, वह अच्छा है या मैं ?
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मैं - आपकी तुलना उनके साथ ? वे पण्डित हैं, विद्वान् हैं, आप पण्डित और ज्ञानी थोड़े ही हैं ?
उत्तर सुनकर कुछ आश्चर्य में आकर वे चुप हो गये । एक मिनट बाद मैंने कहा, "हाँ, वे पण्डित हो सकते हैं, परन्तु आप बड़े मजेदार आदमी हैं । आपके पास मौज खूब है ।"
अब हँसकर उन्होंने कहा - "खूब कहा, अच्छा कहा ।"
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मुझसे उन्होंने पूछा - "क्या मेरी पंचवटी तुमने देखी है ?"
मैंने कहा, "जी हाँ ।" वहाँ वे क्या करते थे, यह भी कहा - अनेक तरह की साधनाओं की बातें । मैंने पूछा - "उन्हें किस तरह हम पायें ?"
श्रीरामकृष्ण - अजी, चुम्बक जिस तरह लोहे को खींचता है, उसी तरह वे हम लोगों को खींच ही रहे हैं । लोहे में कीच लगा रहने से चुम्बक से वह चिपक नहीं सकता । रोते रोते जब कीच धुल जाता है, तब लोहा आप ही चुम्बक के साथ जुड़ जाता है ।
(क्रमशः)

शनिवार, 7 फ़रवरी 2026

*३. श्री गुरुदेव का अंग ~१५३/१५६*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी* टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*३. श्री गुरुदेव का अंग ~१५३/१५६*
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*रज्जब नर तरु वित्त१ के, मिल रीते सु अयान ।*
*मंगलगोटा२ मुख्य फल, मर्कट मुग्ध न जान ॥१५३॥*
जैसे नारियल२ वृक्ष फल रूप धन१ वाला है तथा उसका फल मंगल द्रव्यों में भी मुख्य है किन्तु मूर्ख वानर उसके फल में रहने वाले खोपरे को नहीं जानता अत: उसके उपभोग से वंचित रह जाता है । वैसे ही सद्गुरु रूप नर ज्ञान-धन से युक्त हैं, वह धन साधन से मुख्य फल मंगल मय ब्रह्म की प्राप्ति का हेतु है, तो भी अज्ञानी प्राणी उनसे मिलकर भी ज्ञान-धन से वंचित ही रह जाता है ।
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*कामधेनु अरु कल्पतरुवर,
बिना कामना शुभग सरोवर ।*
*चाह बिना चिंतामणि क्या दे,
त्यों सेवक स्वामी कने१ क्या ले ॥१५४॥*
बिना इच्छा करे कामधेनु, कल्पवृक्ष, चिन्तामणि और सुन्दर सुधा-तालाब से कुछ भी प्राप्त नहीं होता । वैसे ही शिष्य रूप सेवक बिना प्रश्न किये गुरु-रूप स्वामी से१ क्या ले सकता है ?
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*एरंड बंस लागे नहीं, गुरु चन्दन की वास ।*
*रीते रहे गठीले पोले, रज्जब परिमल पास ॥१५५॥*
सुगंधयुक्त चन्दन के पास रहने पर भी एरण्ड और बाँस गाँठों वाले तथा पोले होने से चन्दन की सुगंध नहीं ग्रहण कर पाते । वैसे ही विवेक हीनता रूप पोल, देहाध्यासादि रूप गाँठे होने से गुरु के पास रहने पर भी साधक गुरु का ज्ञान धारण नहीं कर सकते ।
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*गुरु सिमटे१ गोविन्द भज, शिष सद्गुरु को सेय ।*
*रज्जब बिझुका२ खेत में, चरे न चरने देय ॥१५६॥*
१५६ में योग्य गुरु-शिष्य का परिचय दे रहे हैं - गुरु तो भगवदभजन करके भगवद में स्थित१ होते हैं और शिष्य सेवा करके व्यवस्थित होता है किन्तु जैसे खेत में मृगों को डराने वाला पुतला२ न तो खेत को खाता है और न खाने देता है वैसे ही जो गुरु गोविन्द को न भजता है और न क्रूर स्वभाव के कारण शिष्य को अपनी सेवा ही करने देता है तथा शिष्य भी न गुरु सेवा करता है और न बहिमूर्खता के कारण गुरु को भजन ही करने देता है, वे दोनों ही अयोग्य हैं ।
(क्रमशः) 

*१९. साधु कौ अंग १३/१६*

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१९. साधु कौ अंग १३/१६*
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संतनि कै यह बनिज है, सुन्दर ज्ञान बिचार । 
गाहक आवै लेन कौं, ताही के दातार ॥१३॥
सन्तों के पास तो नानाविध ज्ञानविचार संगृहीत हैं; परन्तु जैसे कोई व्यापारी किसी ग्राहक को उसकी मांगी हुई वस्तु ही देता है; उसी प्रकार सन्त भी जिज्ञासु का उत्तम, मध्यम या कनिष्ठ अधिकार देखकर तदनुसार ही उसको उपदेश करते हैं ॥१३॥
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संतनि कै सौ बस्तु हैं, कबहूं खूटै नांहिं । 
सुन्दर तिनकी हाट तें, गाहक ले ले जांहिं ॥१४॥
सन्तों के पास ज्ञानोपदेश का अक्षय भण्डार है, उसमें कभी कमी नहीं आती । हाँ, जिज्ञासु ग्राहक वहाँ जितना और जैसा ज्ञान चाहिये उसे ग्रहण कर आगे बढ जाता है ॥१४॥
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साह रमइया अति बडा, खोलै नहीं कपाट । 
सुन्दर बांन्यौटा किया, दीन्ही काया हाट ॥१५॥
भगवान् तो भक्ति के बड़े व्यापारी(थोक व्यापारी) हैं, वे साधारण भक्त के लिये अपना द्वार नहीं खोलते । श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं – उनने साधारण भक्तों के लिये सन्तों को अधिकृत कर दिया है । अतः वे सन्तजन सभी भक्तों को(पात्र कुपात्र का ध्यान रखते हुए) ज्ञानोपदेश करते हैं ॥१५॥
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अपना करि बैठाइया, कीया बहुत निहाल । 
जो चाहै सो आइ ल्यौ, सुन्दर कोठीवाल ॥१६॥
इस भक्तिक्षेत्र में कुछ बड़े अधिकारी सन्त हैं । उन्हें बड़े व्यापारी के रूप में कोठीवाल(आढतिया) कहा जा सकता है । वे किसी उत्तम जिज्ञासु को अधिकारी समझ कर उसे आत्मीय भाव से अपने पास ससम्मान बैठा कर उस के मुँहमाँगे भक्ति ज्ञान का उपदेश करते हैं ॥१६॥
(क्रमशः)

ब्रह्मलीन होना ~

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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१४ आचार्य गुलाबदासजी
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प्रभुदास जी के चातुर्मास ~
वि. सं. १९४७ में प्रभुदासजी लोरडी वालों ने आचार्य गुलाबदासजी महाराज को चातुर्मास का निमंत्रण दिया । आचार्यजी ने स्वीकार किया । फिर शिष्य संत मंडल के सहित आचार्य गुलाबदासजी महाराज लोरडी पधारे । प्रभुदासजी ने भक्त मंडल के सहित संकीर्तन करते हुये जाकर आचार्यजी का सामेला किया । भेंट चढाकर सत्यराम दंडवत की और संकीर्तन करते हुये ले जाकर स्थान पर ठहराया । 
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चातुर्मास आरंभ हो गया । चातुर्मास के कार्यक्रम सुचारु रुप से चलने लगे । अच्छा चातुर्मास हुआ । समाप्ति पर प्रभुदासजी ने आचार्यजी को मर्यादानुसार भेंट दी तथा शिष्य संत मंडल को यथायोग्य वस्त्रदि देकर सस्नेह विदा किया । लोरडी से विदा किया । लोरडी से विदा होकर आचार्य गुलाबदासजी महाराज शिष्य संत मंडल के साथ भ्रमण करते हुये नारायणा दादूधाम पधार गये ।
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ब्रह्मलीन होना ~ 
उक्त प्रकार आचार्य गुलाबदासजी महाराज १७ वर्ष २ मास १५ दिन गद्दी पर विराज कर वि. सं. १९४८ में मार्गशीर्ष शुक्ला १३ रविवार को ब्रह्मलीन हो गये । आपने- अपने समय में समाज का अच्छा संचालन किया था । समाज में सुख शांति का विस्तार हुआ था । अन्य समाज भी आप पर श्रद्धा रखते थे ।  
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गुण गाथा दोहा ~
प्रिय गुलाब सम सभी को, लगे गुलाबाचार्य ।
निज अधिकार समान ही, किये पंथ के कार्य ॥१॥
पूर्वाचार्यों की चले, चाल छोड अभिमान । 
अत: गुलाबदासजी पर, हुआ भले सम्मान ॥२॥
किया गुलाबाचार्य पर, कई नृपों ने भाव ।
निज नगरों में ले गये, पूजे कर उत्साव ॥३॥
कोमल प्रकृति गुलाब सम, हुये गुलाबाचार्य । 
इससे सब ही मानते, उन्हें अनार्य आर्य ॥४॥
स्वाभाविक  ही सर्व प्रिय, होत संत प्रख्यात । 
गुरु गुलाब ऐसे हि थे, संत सुनाते बात ॥५॥ 
‘नारायणा’ निर्णय भया, गुलाब थे सु महन्त ।
इससे महिमा गाय हैं, उनकी सुन्दर संत ॥६॥
(क्रमशः)

भक्तों के संग में श्रीरामकृष्ण

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🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*दादू मना मनी सब ले रहे, मनी न मेटी जाइ ।*
*मना मनी जब मिट गई, तब ही मिले खुदाइ ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*(घ) परिच्छेद १, भक्तों के संग में श्रीरामकृष्ण* 
*(एक पत्र), (श्री अश्विनी दत्त द्वारा श्री 'म' को लिखित)*
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प्रिय प्राणों के भाई श्री 'म', तुम्हारा भेजा हुआ श्रीरामकृष्ण वचनामृत, चतुर्थ खण्ड, शरद-पूर्णिमा के दिन मिला । आज द्वितीया को मैंने उसे पढ़कर समाप्त किया । तुम धन्य हो, इतना अमृत तुमने देश भर में सींचा !... खैर, बहुत दिन हुए, तुमने यह जानना चाहा था कि श्रीरामकृष्ण के साथ मेरी क्या बातचीत हुई थी । इसलिए तुम्हें उस सम्बन्ध में कुछ लिखने की चेष्टा कर रहा हूँ । 
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मुझे कुछ श्री 'म' की तरह भाग्य तो मिला नहीं कि उन श्रीचरणों के दर्शन का दिन, तारीख, मुहूर्त, और उनके श्रीमुख से निकली हुई सब बातें बिलकुल ठीक ठीक लिख रखता; जहाँ तक मुझे याद है, लिख रहा हूँ, सम्भव है एक दिन की बात को दूसरे दिन की कहकर लिख डालूँ । और बहुतसी बातें तो भूल ही गया हूँ ।
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शायद सन् १८८१ की पूजा की छुट्टियों के समय पहले-पहल मुझे उनके दर्शन हुए थे । उस दिन केशवबाबू के आने की बात थी । नाव से दक्षिणेश्वर पहुँच, घाट से चढ़कर मैंने एक आदमी से पूछा - "परमहंस कहाँ हैं ?" उस मनुष्य ने उत्तर की ओर के बरामदे में तकिये के सहारे बैठे हुए एक व्यक्ति की ओर इशारा करके बतलाया - "ये ही परमहंस हैं ।" 
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'परन्तु मैंने देखा, दोनों पैर ऊपर उठाये और उन्हें अपने हाथों से घेरकर बाँधे हुए अध-चित होकर वे तकिये का सहारा लिए बैठे हैं । मेरे मन में आया, इन्हें कभी बाबुओं की तरह तकिये के सहारे बैठने या लेटने की आदत नहीं है; सम्भव है, ये ही परमहंस हों । तकिये के बिलकुल पास ही उनके दाहिनी ओर एक बाबू बैठे थे । मैंने सुना, वे राजेन्द्र मित्र हैं । बंगाल सरकार के सहायक सेक्रेटरी रह चुके हैं । उनके दाहिनी ओर कुछ और सज्जन बैठे हुए थे । 
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परमहंसदेव ने कुछ देर बाद राजेन्द्रबाबू से कहा - 'जरा देखो तो सही, केशव आया है या नहीं ।' एक ने जरा बढ़कर देखा, लौटकर उसने कहा - "नहीं आये ।" थोड़ी देर में कुछ शब्द हुआ तब उन्होंने फिर कहा - 'देखो, जरा फिर तो देखो ।' इस बार भी एक ने देखकर कहा - 'नहीं आये ।' साथ ही परमहंसदेव ने हँसते हुए कहा - "पत्तों के झड़ने का शब्द हो रहा था, राधा सोचती थी - मेरे प्राणनाथ तो नहीं आ रहे हैं ! क्यों जी, क्या केशव की सदा की यही रीति है ? आते ही आते रुक जाता है ।" कुछ देर बाद, सन्ध्या हो ही रही थी कि दलबलसमेत केशव आ गये ।
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आते ही जब केशव ने भूमिष्ठ होकर उन्हें प्रणाम किया, तब उन्होंने भी ठीक वैसे ही भूमिष्ठ होकर प्रणाम किया और कुछ देर बाद सिर उठाया । उस समय वे समाधिमग्न थे - कह रहे थे –
"कलकत्ते भर के आदमी इकट्ठे कर लाये हैं । इसलिए कि मैं व्याख्यान दूँगा ! व्याख्यान-आख्यान मैं कुछ न दे सकूँगा । देना हो तो तुम दो । यह सब मुझसे न होगा ।“
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उसी अवस्था में दिव्य भाव से जरा मुस्कराकर कह रहे हैं -
"मैं बस भोजन-पान करूँगा और पड़ा रहूँगा । मैं भोजन करूँगा और सोऊँगा – बस । यह सब मैं न कर सकूँगा । करना हो तो तुम करो । मुझसे यह सब न होगा ।"
केशवबाबू देख रहे हैं और श्रीरामकृष्ण भाव से भरपूर हो रहे हैं । एक-एक बार भावावेश में 'अ: अः' कर रहे हैं ।
श्रीरामकृष्ण की उस अवस्था को देखकर मैं सोच रहा था 'यह ढोंग तो नहीं है ? ऐसा तो मैंने और कभी देखा ही नहीं ।' और मैं जैसा विश्वासी हूँ, यह तो तुम जानते ही हो !
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समाधि-भंग के पश्चात् केशवबाबू से उन्होंने कहा - "केशव, एक दिन मैं तुम्हारे यहाँ गया था, मैंने सुना, तुम कह रहे हो, 'भक्ति की नदी में गोता लगाकर हम लोग सच्चिदानन्द-सागर में जाकर गिरेंगे ।' तब मैंने ऊपर देखा, (जहाँ केशवबाबू और ब्राह्मसमाज की स्त्रियाँ बैठी थीं) और सोचा, तो फिर इनकी क्या दशा होगी ? तुम लोग गृहस्थ हो, एकदम किस तरह सच्चिदानन्द-सागर में जाकर गिरोगे ? तुम लोग तो उस नेवले की तरह हो जिसकी दुम में कंकड़ बाँध दिया गया हो; कुछ हुआ नहीं कि झट वह ताक पर जा बैठता है; परन्तु वहाँ रहे किस तरह ? 
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कंकड़ नीचे की ओर खींचता है और उसे कूदकर नीचे आना पड़ता है । तुम लोग इसी तरह कुछ काल के लिए जप-ध्यान कर सकते हो, परन्तु दारा और सुतरूपी कंकड़ जो पीछे लटका हुआ नीचे की ओर खींच रहा है, वह नीचे उतारकर ही छोड़ता है । तुम लोगों को तो चाहिए भक्ति की नदी में एक बार डुबकी लगाकर निकलो, फिर डुबकी लगाओ और फिर निकलो । इसी तरह करते रहो । एकदम तुम लोग कैसे डूब सकते हो ?"
केशवबाबू ने कहा - "क्या गृहस्थों के लिए यह बात असम्भव है ? महर्षि देवेन्द्रनाथ ठाकुर ?"
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परमहंसदेव ने दो-तीन बार 'देवेन्द्रनाथ ठाकुर, देवेन्द्र, देवेन्द्र' कहकर उन्हें लक्ष्य करके कई बार प्रणाम किया, फिर कहा –
"सुनो, एक के यहाँ देवी-पूजा के समय उत्सव मनाया जाता था, सूर्योदय के समय भी बलि चढ़ती थी और अस्त के समय भी । कई साल बाद फिर वह धूम न रह गयी । एक दूसरे ने पूछा - 'क्यों महाशय, आजकल आपके यहाँ वैसी बलि क्यों नहीं चढ़ायी जाती ?' उसने कहा, 'अजी, अब तो दाँत ही गिर गये !' देवेन्द्र भी अब ध्यान-धारणा करता है – करेगा ही ! परन्तु बड़ी शान का आदमी है - खूब मनुष्यता है उसमें ।
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"देखो, जितने दिन माया रहती है, उतने दिन आदमी कच्चे नारियल की तरह रहता है । नारियल जब तक कच्चा रहता है, तब तक यदि उसका गूदा निकालना चाहो तो गूदे के साथ खोपड़े का कुछ अंश छिलकर जरूर निकल आयगा । और जब माया निकल जाती है तब वह सूख जाता है, - नारियल का गोला खोपड़े से छूट जाता है, तब वह भीतर खड़खड़ाता रहता है, आत्मा अलग और शरीर अलग हो जाता है, फिर शरीर के साथ उसका कोई सम्बन्ध नहीं रह जाता ।
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"यह जो 'मैं' है, यह बड़ी बड़ी कठिनाईयाँ लाकर खड़ी कर देता है । क्या यह 'मैं' दूर होगा ही नहीं ? देखा कि उस टूटे हुए मकान पर पीपल का पेड़ पनप रहा है, उसे काट दो, फिर दूसरे दिन देखो, उसमें कोंपल निकल रही है, - यह 'मैं' भी इसी तरह का है । प्याज का कटोरा सात बार धोओ, परन्तु उसकी बू जाती ही नहीं !"
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न जाने क्या कहते हुए उन्होंने केशवबाबू से कहा - "क्यों केशव, तुम्हारे कलकत्ते में, सुना, बाबू लोग कहते हैं, 'ईश्वर नहीं है ।' क्या यह सच है ? बाबूसाहब जीने पर चढ़ रहे हैं, एक सीढ़ी पर पैर रखा नहीं कि 'इधर क्या हुआ' कहकर गिरे अचेत, फिर पड़ी डाक्टर की पुकार, जब तक डाक्टर आवे-आवे तब तक बन्दे कूच कर गये ! और ये ही लोग कहते हैं कि ईश्वर नहीं हैं !"
(क्रमशः)

शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2026

*३. श्री गुरुदेव का अंग ~१४९ /१५२*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी* टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*३. श्री गुरुदेव का अंग ~१४९ /१५२*
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*कल्प वृक्ष गुरु को कहा, जे कल्पे नहिं दास ।*
*जन रज्जब रुचि प्यास बिन, निश्चय जाय निराश ॥१४९ ॥*
कल्प वृक्ष के नीचे जाकर किसी वस्तु के प्राप्त करने की कल्पना न करे तो प्राणी अपनी अभिलाषा के बिना निराश होकर जाता है । वैसे ही रुचि के बिना गुरु के पास जाकर प्रश्न न करे तो गुरु का क्या दोष है । वह तो निश्चयपूर्वक निराश हो जायेगा ।
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*काम धेनु गुरु क्या करे, शिष निष्कामी होय ।*
*रज्जब मिला रीता रह्या, मंद भाग्य शिष जोय१ ॥१५० ॥*
कामना न करने वाले का कामधेनु क्या भला करेगी ? वह तो कामधेनु से मिलकर भी खाली रहेगा । वैसे ही देख१, गुरु मिलने पर भी शिष्य प्रश्न न करे तो, वह मन्द भाग्य ही है ।
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*रज्जब वर्ण अठारह भार विधि, सद्गुरु चन्दन माँहिं ।*
*शब्द वास भिद सो सबै, अरण्ड बाँस खल नाँहिं ॥१५१॥*
जैसे चन्दन की सुगन्ध से विद्ध होकर अठारह भार वनस्पति चन्दन बन जाती है अर्थात् अपनी गंध को छोड़ कर चन्दन की सुगन्ध से युक्त हो जाती है । किन्तु ऐरण्ड और बाँस नहीं बदलते । वैसे ही सद्गुरु के उपदेशमय शब्दों से चारों ही वर्ण के प्राणियों के हृदय बदल जाते हैं किन्तु दुष्टों के नहीं बदलते ।
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*बिन घटि माल रहट की भरमें, जल आवे कुछ नाँहीं ।*
*त्यूं रज्जब चेतन१ बिन चेला, रीता संगति माँही ॥१५२॥*
जब घटिकाओं के बिना अरहट्ट की माला घूमती है तब किचिंत मात्र भी जल नहीं निकलता । वैसे ही जिस शिष्य में सात्त्विकी बुद्धि१ न हो वह सत्संग में रहकर भी खाली ही रह जाता है ।
(क्रमशः)

गुरुवार, 5 फ़रवरी 2026

धनीराम जी के चातुर्मास ~

*#daduji*

*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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१४ आचार्य गुलाबदासजी
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धनीराम जी के चातुर्मास ~ 
वि. सं. १९४६ में धनीरामजी फिरोजपुर वालों ने आचार्य गुलाबदासजी महाराज को चातुर्मास का निमंत्रण दिया । आचार्य जी ने स्वीकार किया । चातुर्मास का समय समीप आने पर अपने शिष्य संत मंडल के सहित आचार्य गुलाबदासजी महाराज पधारे । धनीरामजी ने भक्त मंडल के साथ आकर आचार्य जी की अगवानी की । भेंट चढाकर सत्यराम दंडवत करके संकीर्तन करते हुये अति सत्कार से स्थान पर ले गये । 
.
चातुर्मास आरंभ हो गया । चातुर्मास के सभी कार्यक्रम बहुत अच्छे चले । समाप्ति पर धनीरामजी ने मर्यादानुसार आचार्य जी को भेंट दी तथा शिष्य संत मंडल को यथा योग्य वस्त्रादि दिये और सस्नेह विदा किया वहाँ से विदा होकर आचार्य गुलाबदासजी महाराज शिष्य संत मंडल के सहित भ्रमण करते हुये नारायणा दादूधाम पर पधार गये और यहां ही सत्संग भजन करते हुये आगत संत तथा सेवकों को उपदेश करते रहे । 
प्रभुदासजी के चातुर्मास ~ 
वि. सं. १९४७ में प्रभुदासजी लोरडी वालों ने आचार्य गुलाबदासजी महाराज को चातुर्मास का निमंत्रण दिया । आचार्य जी ने स्वीकार किया । फिर शिष्य संत मंडल के सहित आचार्य गुलाबदासजी महाराज लोरडी पधारे । प्रभुदास जी ने भक्त मंडल के सहित संकीर्तन करते हुये जाकर आचार्य जी का सामेला किया । भेंट चढाकर सत्यराम दंडवत की और संकीर्तन करते हुये ले जाकर स्थान पर ठहराया । 
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चातुर्मास आरंभ हो गया । चातुर्मास के कार्यक्रम सुचारु रुप से चलने लगे । अच्छा चातुर्मास हुआ । समाप्ति पर प्रभुदासजी ने आचार्यजी को मर्यादानुसार भेंट दी तथा शिष्य संत मंडल को यथायोग्य वस्त्रदि देकर सस्नेह विदा किया । लोरडी से विदा होकर आचार्य गुलाबदासजी महाराज शिष्य संत मंडल के साथ भ्रमण करते हुये नारायणा दादूधाम पधार गये ।
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धनीराम जी के चातुर्मास ~
वि. सं. १९४६ में धनीराम जी फिरोजपुर वालों ने आचार्य गुलाबदासजी महाराज को चातुर्मास का निमंत्रण दिया । आचार्यजी ने स्वीकार किया । चातुर्मास का समय आने पर अपने शिष्य संत मंडल के सहित आचार्य गुलाबदासजी महाराज पधारे । धनीरामजी ने भक्त मंडल के साथ आकर आचार्यजी की अगवानी की । भेंट चढाकर सत्यराम दंडवत करके संकीर्तन करते हुये अति सत्कार से स्थान पर ले गये । 
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चातुर्मास आरंभ हो गया । चातुर्मास के सभी कार्यक्रम बहुत अच्छे चले । समाप्ति पर धनीरामजी ने मर्यादानुसार आचार्यजी को भेंट दी तथा शिष्य संत मंडल को यथा योग्य वस्त्रादि दिये और सस्नेह विदा किया । वहां से विदा होकर आचार्य गुलाबदासजी महाराज शिष्य संत मंडल के सहित भ्रमण करते हुये नारायणा दादूधाम पर पधार गये और यहाँ ही सत्संग भजन करते हुये आगत संत तथा सेवकों को उपदेश करते रहे ।
(क्रमशः)

*१९. साधु कौ अंग ९/१२*

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१९. साधु कौ अंग ९/१२*
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संतनि हि तें पाइये, राम मिलन कौ घाट । 
सहजैं ही खुलि जात है, सुन्दर हृदय कपाट ॥९॥
प्रभु साक्षात्कार का मार्ग(= घाट, उपाय) केवल साधुओं के सङ्ग से ही प्राप्त होना सम्भव है । सत्सङ्गति का यही प्रभाव है कि इस के कारण साधक का अज्ञान(अविदधा) नष्ट होकर प्रभुसाक्षात्कार हेतु उसके ज्ञानकपाट स्वतः ही खुल जाते हैं ॥९॥
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संत मुक्ति के पौरिया, तिनसौं करिये प्यार । 
कुंची उनकै हाथ है, सुन्दर खोलहिं द्वार ॥१०॥ 
श्रीसुन्दरदासजी महाराज कहते हैं - सन्त जन मुक्तिद्वार(मोक्षद्वार) के पहरेदार हैं । तुम्हारे भवबन्धन से मुक्ति की चाबी(उपाय = ज्ञान) इन ही के पास है । इन की कृपा(अनुकम्पा) यदि तुम पर हो जायगी तो ये तत्काल ही तुम्हारे लिये उक्त मुक्तिद्वार खोलने में सर्वथा समर्थ हैं ॥१०॥
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सुन्दर साधु दयाल हैं, कहैं ज्ञान संमुझाइ । 
पात्र बिना नहिं ठाहरै, निकसि निकसि करि जाइ ॥११॥
साधुजन तो दयालु हृदय होते है । वे प्रत्येक जिज्ञासु को ज्ञान का ही उपदेश करते हैं, परन्तु उसको ग्रहण कर तद‌नुसार आचरण जिज्ञासु की पात्रता पर निर्भर है । जैसे पात्र में ही जल ठहरता है कुपात्र(फूटे पात्र) में नहीं; वैसे ही जिज्ञासु यदि पात्र(सद्‌गुणयुक्त) है तो वह ज्ञान ग्रहण करने का अधिकारी है और यदि कुपात्र(दुर्गुणमय) है वह सन्त से ज्ञानोपदेश प्राप्त करके भी उस का क्या लाभ पा सकेगा ! ॥११॥
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सुन्दर साधु सदा कहैं, भक्ति ज्ञान बैराग । 
जाकै निश्चय ऊपजै, ताकै पूरन भाग ॥१२॥
महाराज कहते हैं - सन्त जन तो सदा सब को ज्ञान, भक्ति एवं वैराग्य का ही उपदेश करते हैं; परन्तु श्रोताओं में जो भाग्यवान् होगा वही उस उपदेश पर आचरण कर भक्तिमार्ग पर आगे बढ़ सकेगा ॥१२॥
(क्रमशः)

*दुःखी जीव तथा नरेन्द्र का उपदेश*

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🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*दादू जीव न जानै राम को, राम जीव के पास ।*
*गुरु के शब्दों बाहिरा, तातैं फिरै उदास ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*दुःखी जीव तथा नरेन्द्र का उपदेश*
नरेन्द्र गा रहे हैं । गाते हुए रवीन्द्र को मानो उपदेश दे रहे हैं ।
गाने का भाव - "तुम मोह और कुमन्त्रणाएँ छोड़ उन्हें समझो, तुम्हारी सम्पूर्ण व्यथा इस तरह दूर हो जायेगी ।" नरेन्द्र फिर गा रहे हैं –
"पी ले अवधूत, हो मतवाला, प्याला प्रेम हरिरस का रे ।
बाल अवस्था खेलि गँवायो, तरुण भयो नारीबस का रे,
वृद्ध भयो कफ वायु ने घेरा, खाट पड़ो रह्यो शाम-सकारे ॥
नाभि-कमल में है कस्तूरी, कैसे भरम मिटै पशु का रे;
बिन सद्गुरु नर ऐसहि ढूँढै, जैसे मिरिग फिरै वन का रे ॥"
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कुछ देर बाद सब गुरुभाई काली तपस्वी के कमरे में आकर बैठे । गिरीश का बुद्धचरित्र और चैतन्यचरित्र, ये दो नयी पुस्तकें आयी हैं । नरेन्द्र, शशी, राखाल, प्रसन्न, मास्टर आदि बैठे हैं । नये मठ में जब से आना हुआ है, तब से शशी श्रीरामकृष्ण की पूजा और उन्हीं की सेवा में दिनरात लगे रहते हैं । उनकी सेवा देखकर दूसरों को आश्चर्य हो रहा है । श्रीरामकृष्ण की बीमारी के समय वे दिनरात जिस तरह उनकी सेवा किया करते थे, आज भी उसी तरह अनन्यचित्त होकर भक्तिपूर्वक उनकी सेवा किया करते हैं ।
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मठ के एक भाई बुद्धचरित्र और चैतन्यचरित्र पढ़ रहे हैं । स्वरसहित जरा व्यंग के भाव से चैतन्यचरित्र पढ़ रहे हैं । नरेन्द्र ने उनसे पुस्तक छीन ली और कहा - 'इस तरह कोई अच्छी चीज को भी मिट्टी में मिलाता है ?' नरेन्द्र स्वयं चैतन्यदेव के 'प्रेम-वितरण' की कथा पढ़ रहे हैं ।
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मठ के एक भाई - मैं कहता हूँ, कोई किसी को प्रेम दे नहीं सकता ।
नरेन्द्र - मुझे तो श्रीरामकृष्णदेव ने प्रेम दिया है ।
मठ के भाई - अच्छा, क्या सचमुच ही तुम्हें प्रेम दिया है ?
नरेन्द्र - तू क्या समझेगा ! तू (ईश्वर के) नौकरों के दर्जे का है । मेरे सब पैर दाबेंगे, - शरता मित्तर और देसो भी । (सब हँसते हैं) तू शायद यह सोच रहा है कि तूने सब कुछ समझ लिया ? (हास्य)
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मास्टर - (स्वगत) - श्रीरामकृष्ण ने मठ के सभी भाइयों के भीतर शक्ति का संचार किया है, केवल नरेन्द्र के भीतर ही नहीं । बिना इस शक्ति के क्या कभी कामिनी और कांचन का त्याग हो सकता है ?
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दूसरे दिन मंगल है, १० मई । आज महामाया की पूजनतिथि है । नरेन्द्र तथा मठ के सब भाई आज विशेष रूप से जगन्माता की पूजा कर रहे हैं । पूजा-घर के सामने त्रिकोण यन्त्र की रचना की गयी, होम होगा । नरेन्द्र गीता-पाठ कर रहे हैं ।
मणि गंगा-स्नान को गये । रवीन्द्र छत पर अकेले टहल रहे हैं । स्वरसमेत नरेन्द्र स्तवन पढ़ रहे हैं, रवीन्द्र वहीं से सुन रहे हैं -
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ॐ मनोबुद्ध्यहंकारचित्तानि नाहं, न च श्रोत्रजिव्हे न च घ्राणनेत्रे ।
न च व्योम भूमिर्न तेजो न वायुश्चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् ॥
न च प्राणसंज्ञो न वै पंचवायुर्न वा सप्तधातुर्न वा पंचकोशः ।
न वाक्पाणिपादं न चोपस्थपायुश्चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् ॥
न मे द्वेषरागौ न मे लोभमोहौ मदो नैव मे नैव मात्सर्यभावः ।
न धर्मो न चार्थो न कामो न मोक्षश्चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् ॥
न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दुःखं, न मन्त्रो न तीर्थो न वेदा न यज्ञाः ।
अहं भोजनं नैव भोज्यं न भोक्ता, चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् ॥
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रवीन्द्र गंगा-स्नान करके आ गये, धोती भीगी हुई है ।
नरेन्द्र - (मणि के प्रति, एकान्त में) - यह देखो, नहाकर आ गया, अब इसे संन्यास दे दिया जाय तो बहुत अच्छा हो !
(नरेन्द्र और मणि हँसते हैं)
प्रसन्न ने रवीन्द्र से भीगी धोती उतारने के लिए कहा, साथ ही उन्होंने एक गेरुआ वस्त्र भी दिया ।
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नरेन्द्र - (मणि से) - अब वह त्यागियों का वस्त्र पहनेगा ।
मणि - (हँसकर) - किस चीज का त्याग ?
नरेन्द्र - काम-कांचन का त्याग ।
गेरुआ वस्त्र पहनकर रवीन्द्र एकान्त में काली तपस्वी के कमरे में जाकर बैठे । जान पड़ता है कि कुछ ध्यान करेंगे ।
(क्रमशः)

*३. श्री गुरुदेव का अंग ~१४५/१४८*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी* टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*३. श्री गुरुदेव का अंग ~१४५/१४८*
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*शिष मांही शिष सुरति है, गुरु माँहीं गुरु बैन ।*
*रज्जब ये राजी नहीं, तब लग झूंठे फेन ॥१४५॥*
१४५ में यथार्थ गुरु-शिष्य का परिचय दे रहे हैं - शिष्य में जिज्ञासा युक्त वृत्ति ही शिष्य है और गुरु में ब्रह्म संबन्धी वचन ही गुरु है । जब तक ये उक्त गुरु शिष्य प्रसन्नता पूर्वक न मिलें तब तक प्रतीति मात्र बाहर के गुरु-शिष्यादि का अभिनय जल के फेन के समान मिथ्या ही है ।
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*गुरु प्रसिद्ध पारस मिले, शिष्य ही खोटा जोय ।*
*रज्जब पलटे लोह सब, कंकर का क्या होय ॥१४६॥* 
१४६ -१५५ में अयोग्य शिष्य का परिचय दे रहे हैं - पारस की यह बात प्रसिद्ध है कि वह सभी प्रकार के लोहे को सोना बना देता है किन्तु पारस से कंकर भी सोना हो सकता है क्या ? वैसे ही गुरु भी शिष्यों को संत बनाने में प्रसिद्ध हैं परन्तु जो शिष्य दोषों में पूर्ण हो और गुरु उपदेश से दोष न त्यागे वह कैसे संत बनेगा ? 
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*सद्गुरु चंदन बावना, परस्यूं पलटे काठ ।*
*रज्जब चेला चूक में, रह्या बाँस के ठाट ॥१४७॥*
बावने चंदन के स्पर्श से काष्ठ चंदन हो जाते हैं किन्तु बाँस अपने पोलादि दोषों के कारण नहीं हो पाता । वैसे ही सद्गुरु के उपदेश से शिष्यों के हृदय बदल जाते हैं यदि कोई का न बदले तो उस का प्रमाद ही न बदलने में कारण होता है गुरु का नहीं ।
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*सद्गुरु चिन्तामणि मिल्या, शिष में चिन्ता नाँहिं ।* 
*तो रज्जब कहु क्या मिले, जे माँगे नहिं माँहिं ॥१४८॥* 
चिन्तामणी हाथ आजाने पर भी मन में किसी वस्तु की इच्छा न करे तो क्या मिलेगा ? वैसे ही सद्गुरु मिल जाने पर भी शिष्य के मन में उनसे ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा न हो और न प्रश्न करे तो क्या मिलेगा ? 
(क्रमशः)

बुधवार, 4 फ़रवरी 2026

*१९. साधु कौ अंग ५/८*

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१९. साधु कौ अंग ५/८*
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जन सुन्दर सतसंग मैं, नीचहु होत उतंग । 
परै क्षुद्र जल गंग मैं, उहै होत पुनि गंग ॥५॥
जैसे किसी क्षुद्र नाले का जल गङ्गा में गिरते ही 'गङ्गाजल' कहलाने लगता है, तब उसे अपवित्र नाले का जल' कहने वाला कोई नहीं रह जाता । इसी प्रकार, सत्सङ्ग के प्रभाव से क्षुद्र वस्तु भी 'उत्तम'(सर्वोच्च या सर्वश्रेष्ठ) कही जाने लगती है ॥५॥
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सुन्दर या सतसंग मैं, शब्दन कौ औगाह । 
गोष्टि ज्ञान सदा चलै, जैसें नदी प्रवाह ॥६॥
महाराज कहते हैं - इस साधुओं की सङ्गति में निरन्तर प्रभुभक्तिमय शब्दों का अवगाहन(श्रवण एवं मनन) होता रहता है । इस सत्सङ्ग में आध्यात्मिक ज्ञानमय संवाद, नदीप्रवाह के समान, सतत प्रवाहित होता रहता है ॥६॥
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सुन्दर जौ हरि मिलन की, तौ करिये सतसंग । 
बिना परिश्रम पाइये, अविगति देव अभंग ॥७॥
श्रीसुन्दरदासजी जिज्ञासु को समझाते हैं कि यदि तुम्हें प्रभुमिलन की उत्कण्ठा है तो तुम सब कुछ साधन छोड़कर केवल सत्सङ्ग का सहारा पकड़ लो । इस से तुम्हें अनायास(किसी विशेष परिश्रम के बिना) ही उस निरञ्जन निराकार प्रभु के साक्षात्कार का सरल मार्ग मिल जायगा ॥७॥
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जो आवै सतसंग मैं, ताकौ कारय होइ । 
सुन्दर सहजै भ्रम मिटै, संसय रहै न कोइ ॥८॥
जो निरन्तर सत्सङ्ग करेगा उसे भक्ति साधना में सफलता मिलेगी ही(उस का कार्य सिद्ध होगा ही) । इस सत्सङ्ग का उस को सबसे उत्तम लाभ यह मिलेगा कि उस का सांसारिक द्वैत भ्रम तथा उस अनिवर्चनीय शक्ति का सत्ताविषयक भ्रम स्वतः ही सर्वथा नष्ट हो जायगा ॥८॥
(क्रमशः)