बुधवार, 31 दिसंबर 2025

ईश्वर साकार हैं या निराकार

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🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*ये दोनों ऐसी कहैं, कीजे कौन उपाइ ।*
*ना मैं एक, न दूसरा, दादू रहु ल्यौ लाइ ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*(५)ईश्वर साकार हैं या निराकार*
एक दिन स्वर्गीय केशवचन्द्र सेन शिष्यों को साथ लेकर दक्षिणेश्वर के काली-मन्दिर में श्रीरामकृष्णदेव का दर्शन करने गये । केशव के साथ निराकार के सम्बन्ध में अनेक बातें होती थीं । 
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श्रीरामकृष्णदेव उनसे कहा करते थे, "मैं प्रतिमा में मिट्टी या पत्थर की काली नहीं देखता, मैं तो उसमें चिन्मयी काली देखता हूँ । जो ब्रह्म हैं, वे ही काली हैं । वे जिस समय क्रियारहित हैं, उस समय ब्रह्म; जब सृष्टि-स्थिति-प्रलय करती हैं, उस समय काली, अर्थात् जो काल के साथ रमण करती हैं । काल अर्थात् ब्रह्म ।"
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उन दोनों में एक दिन निम्नलिखित वार्तालाप हो रहा था ~
श्रीरामकृष्ण - (केशव के प्रति) - किस प्रकार, जानते हो ! मानो सच्चिदानन्दरूपी समुद्र है, कहीं किनारा नहीं है । भक्तिरूपी हिम के कारण इस समुद्र में स्थान-स्थान पर जल बरफ के आकार में जम जाता है । अर्थात् भक्त के पास वे प्रत्यक्ष होकर कभी कभी साकार रूप में दर्शन देते हैं ।
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फिर ब्रह्मज्ञानरूपी सूर्य के उदय होने पर वह बरफ गल जाती है - अर्थात् 'ब्रह्म सत्य जगत् मिथ्या' इस विचार के बाद समाधि होने पर रूप आदि सब अदृश्य हो जाते हैं । उस समय वे क्या हैं, मुख से कहा नहीं जा सकता - मन, बुद्धि, अहं के द्वारा उन्हें पकड़ा नहीं जा सकता ।
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"जो व्यक्ति एक सत्य को जानता है, वह दूसरे को भी जान सकता है । जो निराकार को जान सकता है, वह साकार को भी जान सकता है । जब तुम उस मुहल्ले में गये ही नहीं तो कहाँ श्यामपुकुर है, और कहाँ तेलीपाड़ा, कैसे जानोगे ?"
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श्रीरामकृष्णदेव यह भी समझा रहे हैं कि सभी निराकार के अधिकारी नहीं हैं, इसीलिए साकार पूजा की विशेष आवश्यकता है । उन्होंने कहा, -"एक माँ के पाँच लड़के हैं । माँ ने कई प्रकार की तरकारियाँ बनायी हैं, जिसके पेट में जो सहन होता हो ।"
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इस देश में साकार पूजा होती है । ईसाई मिशनरीगण अमरीका व यूरोप में इस देश के निवासियों को असभ्य जाति कहकर वर्णन करते हैं । वे कहते हैं कि भारतीयगण मूर्ति की पूजा करते हैं, और उनकी बड़ी दयनीय स्थिति है ।
स्वामी विवेकानन्द ने इस साकार पूजा का अर्थ अमरीका में पहले-पहल समझाया । उन्होंने कहा कि भारतवर्ष में 'मूर्ति' की पूजा नहीं होती । -
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.... मैं पहले ही तुम्हें बता देना चाहता हूँ कि भारतवर्ष में अनेकेश्वरवाद नहीं है । प्रत्येक मन्दिर में यदि कोई खड़ा होकर सुने, तो वह यही पाएगा कि भक्तगण सर्वव्यापित्व से लेकर ईश्वर के सभी गुणों का आरोप उन मूर्तियों में करते हैं ।..." -'हिन्दू धर्म' से उद्ध्रत
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स्वामीजी मनोविज्ञान (Psychology) की सहायता से समझाने लगे कि ईश्वर का चिन्तन करने में साकार चिन्तन को छोड़ अन्य कुछ भी नहीं आ सकता । उन्होंने कहा –
"... ईश्वर यदि सर्वव्यापी हैं तो फिर ईसाई लोग गिरजाघर में क्यों उसकी आराधना के लिए जाते हैं ? क्यों वे क्रास को इतना पवित्र मानते हैं ? प्रार्थना के समय आकाश की ओर मुँह क्यों करते हैं ? कैथलिक ईसाइयों के गिरजाघरों में इतनी बहुतसी मूर्तियाँ क्यों रहा करती हैं ? और प्रोटेस्टेन्ट ईसाइयों के हृदय में प्रार्थना के समय इतनी बहुतसी भावमयी मूर्तियाँ क्यों रहा करती हैं ?
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मेरे भाइयों ! मन में किसी मूर्ति के बिना आये कुछ सोच सकना उतना ही असम्भव है, जितना कि श्वास लिए बिना जीवित रहना । ... सच पूछिये तो दुनिया के प्रायः सभी मनुष्य सर्वव्यापित्व का क्या अर्थ समझते हैं ? - कुछ नहीं ! ... क्या परमेश्वर का भी कोई क्षेत्रफल है ? अगर नहीं, तो जिस समय हम सर्वव्यापी शब्द का उच्चारण करते हैं, उस समय विस्तृत आकाश या विशाल भूमिखण्ड की कल्पना हम अपने मन में लाते हैं । इससे अधिक और कुछ नहीं ।..." -'हिन्दू धर्म' से उद्ध्रत
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स्वामीजी ने और भी कहा, "अधिकारियो की भिन्नता के अनुसार साकार पूजा और निराकार पूजा होती है । साकार पूजा कुसंस्कार नहीं है - मिथ्या नहीं है, वह एक निम्न श्रेणी का सत्य है ।" –
"... अगर कोई मनुष्य अपने ब्रह्मभाव को मूर्ति के सहारे अधिक सरलता से अनुभव कर सकता है, तो क्या उसे पाप कहना ठीक होगा ? और जब वह उस अवस्था से परे पहुँच गया है, तब भी उसके लिए मूर्तिपूजा को भ्रमात्मक कहना उचित नहीं है । हिन्दू की दृष्टि में मनुष्य असत्य से सत्य की ओर नहीं जा रहा है, वह तो सत्य से सत्य की ओर, निम्न श्रेणी के सत्य से उच्च श्रेणी के सत्य की ओर अग्रसर हो रहा है ।..." - 'हिन्दू धर्म' से उद्धृत
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स्वामीजी ने कहा, सभी के लिए एक नियम नहीं हो सकता । ईश्वर एक हैं, परन्तु वे भक्तों के पास अनेक रूपों में प्रकट हो रहे हैं । हिन्दू इस बात को समझते हैं । -
"... विभिन्नता में एकता यही प्रकृति की रचना है और हिन्दुओं ने इसे भलीभाँति पहचाना है । अन्य धर्मों में कुछ निर्दिष्ट मतवाद विधिबद्ध कर दिये गये हैं और सारे समाज को उन्हें मानना अनिवार्य कर दिया जाता है ।
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वे तो समाज के सामने केवल एक ही नाप की कमीज रख देते हैं, जो राम, श्याम, हरि सब के शरीर में जबरदस्ती ठीक होनी चाहिए । और यदि वह कमीज राम या श्याम के शरीर में ठीक नहीं बैठती, तो उसे नंगे बदन - बिना कमीज के ही रहना होगा । हिन्दुओं ने यह जान लिया है कि निरपेक्ष ब्रह्म-तत्त्व की उपलब्धि, धारणा या प्रकाश केवल सापेक्ष के सहारे से ही हो सकता है । ..." -'हिन्दू धर्म' से उद्ध्रत 
(क्रमशः)

*१५. मन कौ अंग २५/२८*

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१५. मन कौ अंग २५/२८*
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सुन्दर यह मन भ्रमर है, सूंघत रहै सुगंध । 
कंवल माहिं निकसै नहीं, काल न देखै अंध ॥२५॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं कि हमारा यह मन भ्रमर के समान गन्ध का भी इतना लोभी है कि वह सुगन्धमय कमल पुष्पों से दूर होना ही नहीं चाहता । इसे इस सुगन्ध में अति अनुराग से अपनी मृत्यु का भी भय नहीं लगता ॥२५॥
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सुन्दर यह मन मीन है, बंधै जिह्वा स्वाद । 
कंटक काल न सूझई, करत फिरै उदमाद ॥२६॥ 
महाराज श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - हम को हमारा यह मन मीन के समान जिव्हा का दास प्रतीत होता है; क्योंकि यह भी उसी के तुल्य, विविध खाद्य पदार्थों के रसों के आस्वाद में लुब्ध रहता है । वह इस रस-लोभ में ऐसा मोहान्ध हो गया है कि इसे उस रस के पीछे छिपा हुआ उस का मृत्युकण्टक भी नहीं दिखायी देता ॥२६॥
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सुन्दर मन गजराज ज्यौं, मत्त भयौ सुध नांहिं । 
काम अंध जानै नहीं, परै खाड के मांहिं ॥२७॥
कभी कभी हमारा मन उस मत्त हाथी के समान अपनी चेष्टाएँ करने लगता है । तथा यह इन में इतना उन्मत्त हो जाता है कि उसे अपना यथार्थ भी स्मरण नहीं रहता । यह कभी उसी उन्मत्त अवस्था में नारी के पीछे दौड़ता हुआ खड्डे(गर्त) में गिर कर अपने प्राण भी सङ्कट में डाल लेता है ॥२७॥
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सुन्दर यह मन करत है, बाजीगर कौ ख्याल । 
पंख परेवा पलक मैं, मुवो जिवावत ब्याल ॥२८॥
हमारा यह मन बाजीगर के समान नित्य नये खेल(=तमाशा) करता रहता है । कभी पंख लगाकर किसी पक्षी के समान आकाश में अनेक कौतुक दिखाता है तो कभी मृत सर्प को जीवित करने का अभिनय करता है ॥२८॥
(क्रमशः)

जोधपुर से टीका की भेंट ~

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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१२ आचार्य नारायणदास जी ~
जोधपुर से टीका की भेंट ~
आचार्य नारायणादासजी महाराज के गद्दी पर बैठने के समय किसी कारण से जोधपुर नरेश की ओर से टीका की भेंट नहीं आ सकी थी । वह वि. सं. १९०४ आश्‍विन शुक्ला ५ को आई । आचार्य नारायणादासजी महाराज ने उसे स्वीकार करके अपनी परंपरा के अनुसार नारायणा दादूधाम से प्रसाद व शुभाशीर्वाद भेज दिया । 
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सुखभजनजी के चातुर्मास ~
वि. सं. १९०४ का चातुर्मास आचार्य नारायणादासजी महाराज ने सुखभजनजी लोरडी वालों का माना था । इस चातुर्मास में चातुर्मास की मर्यादा के अनुसार दादूवाणी आदि का प्रवचन सत्संग भजन- कीर्तन जागरण आदि सभी कार्य नियम पूर्वक होते रहे थे । 
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संत- सेवा में किसी प्रकार की त्रृटि नहीं आने दी थी । समाप्ति पर आचार्य नारायणादासजी महाराज को मर्यादानुसार भेंट, भंडारी आदि कर्मचारियों को उनका दस्तूर तथा सब संतों को वस्त्र देकर प्रसन्न किया था । उक्त प्रकार अच्छा चातुर्मास कराकर आचार्यजी की तथा सब संतों की आशीर्वाद लेकर, सब को सस्नेह विदा किया था ।
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जमातरामगढ का चातुर्मास ~ 
वि. सं. १९०५ का चातुर्मास आचार्य नारायणदासजी महाराज ने शिष्य मंडल के सहित बडी जमात रामगढ में किया था । इस चातुर्मास में भी दादूवाणी का प्रवचन आदि सत्संग, जागरण, भजन- कीर्तन, नाम ध्वनि आदि बहुत अच्छी प्रकार होते रहे थे । रसोइयां बहुत हुई थीं । 
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आचार्यजी सहित सब प्रसन्न रहे थे । भजन ध्यानादि साधन में किसी भी प्रकार का विध्न नहीं आया था । चातुर्मास समाप्ति पर मर्यादानुसार आचार्यजी को भेंट, भंडारी आदि कर्मचारियों को उनका, दस्तूर, सब संतों को वस्त्रादि देकर संतुष्ट किया था तथा सत्कार पूर्वक रामगढ से विदा किया था ।
(क्रमशः) 

मंगलवार, 30 दिसंबर 2025

ईश्वर का दर्शन ही जीवन का उद्देश्य

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🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*लिपै छिपै नहिं सब करै, गुण नहिं व्यापे कोइ ।*
*दादू निश्‍चल एक रस, सहजैं सब कुछ होइ ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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ईश्वर का दर्शन ही जीवन का उद्देश्य है, और इस देश की यही एक विशेषता है । पहले यह और उसके बाद दूसरी बातें । पहले से ही राजनीति की बातें करने से न चलेगा, पहले एकचित्त होकर भगवान का ध्यान-चिन्तन करो, हृदय के बीच में उनके अनुपम रूप का दर्शन करो ।
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उन्हें प्राप्त करने के बाद तब स्वदेश का कल्याण कर सकोगे; क्योंकि उस समय तुम्हारा मन अनासक्त होगा । 'मेरा देश' कहकर सेवा नहीं - 'सर्वभूतों में ईश्वर हैं' यह कहकर उनकी सेवा कर सकोगे । उस समय स्वदेश-विदेश की भेद-बुद्धि नहीं रहेगी । उस समय ठीक समझा जा सकेगा कि जीव का कल्याण किससे होता है ।
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श्रीरामकृष्णदेव कहा करते थे, "जो लोग दाँव खेलते हैं, वे खेल की चाल ठीक ठीक समझ नहीं सकते । जो लोग खेल से अलग रहकर पास बैठे-बैठे खेल देखते रहते हैं, वे दूर से अच्छी चाल दे सकते हैं ।" कारण देखनेवाला खेल में आसक्त नहीं है ।
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एकान्त में बहुत दिनों तक साधना करके राग-द्वेष से मुक्त उदासीन अनासक्त जीवन्मुक्त महापुरुष ने जो कुछ उपलब्धि की है उसके सामने उन्हें और कुछ भी अच्छा नहीं लगता -
यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः ।
यस्मिन् स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते ॥ - गीता ।
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हिन्दुओं की राजनीत्ति, समाजनीति, ये सभी धर्मशास्त्र हैं । मनु, याज्ञवल्क्य, पराशर आदि महापुरुष इन सब धर्मशास्त्रों के प्रणेता हैं । उन्हें किसी भी चीज की आवश्यकता नहीं थी । फिर भी, भगवान का निर्देश पाकर, गृहस्थों के लिए, उन्होंने शास्त्रों की रचना की है । वे उदासीन रहकर दाँव-खेल की चाल बता दे रहे हैं, इसीलिए देश-काल-पात्र की दृष्टि से उनकी बातों में एक भी भूल होने की सम्भावना नहीं है ।
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स्वामी विवेकानन्द भी कर्मयोगी हैं । उन्होंने अनासक्त होकर परोपकार-व्रतरूपी, जीव-सेवारूपी कर्म किया है; इसीलिए कर्मियों के सम्बन्ध में उनका इतना मूल्य है । उन्होंने अनासक्त होकर इस देश का कल्याण किया है, जिस प्रकार प्राचीनकाल के महापुरुषगण जीव के मंगल के लिए सदैव प्रयत्नशील रहे हैं ।
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इस निष्काम धर्म के पालन के लिए हम भी उनके चरण-चिह्नों का अनुसरण कर सकें तो कितना अच्छा हो ! परन्तु यह बात है बहुत कठिन । पहले भगवान को प्राप्त करना होगा । इसके लिए स्वामी विवेकानन्दजी की तरह त्याग और तपस्या करनी होगी । तब यह अधिकार प्राप्त हो सकता है ।
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धन्य हो तुम त्यागी वीर महापुरुष ! तुमने वास्तव में गुरुदेव के चरण-चिह्नों का अनुसरण किया है । गुरुदेव का महामन्त्र - पहले ईश्वर-प्राप्ति, उसके बाद दूसरी बात - तुम्हीं ने साधित किया है । तुम्हीं ने समझा था, ईश्वर छोड़ने पर यह संसार यथार्थ में स्वप्न की तरह है, गोरख-धन्धा है ।
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इसीलिए सब कुछ छोड़कर तुमने पहले ईश्वर-प्राप्ति की साधना की थी । जब तुमने देखा, सर्व वस्तुओं के प्राण वे ही हैं, जब तुमने देखा उनके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है, तब फिर इस संसार में तुमने मन लगाया । तब हे महायोगिन् ! सर्वभूतों में स्थित उसी हरि की सेवा के लिए तुम फिर कर्मक्षेत्र में उत्तर आये ।
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उस समय सभी तुम्हारे गम्भीर असीम प्रेम के अधिकारी बने - हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, विदेशी, स्वदेशवासी, धनी, निर्धन, नर, नारी सभी को तुमने प्रेमालिंगन-दान किया है । तुमने नारद, जनक आदि की तरह लोक-शिक्षा के लिए कर्म किया है ।
(क्रमशः)

माधोपुरा चातुर्मास ~

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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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१२ आचार्य नारायणदास जी ~
माधोपुरा चातुर्मास ~ 
केवलदासजी चोहट्या माधोपुर वालों का चातुर्मास वि. सं. १९०१ का आचार्य प्रेमदास जी महाराज ने ही माना था और शेखावटी की रामत करके चातुर्मास में बैठने वाले थे किन्तु उनका स्वास्थ्य सिरोही(शेखावटी) में कुछ शिथिल हो गया था । इससे सिरोही से नारायणा दादूधाम को लौट गये और ज्येष्ठ शुक्ला १ शनिवार वि. सं. १९०१ को ब्रह्मलीन हो गये । 
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फिर केवलदासजी ने आचार्य नारायणदासजी को प्रार्थना की तब उन्होंने वि. सं. १९०२ का चातुर्मास केवलदास चोहट्या के माधोपुर में किया केवलदासजी अति श्रद्धा से संत मंडल के सहित आचार्यजी की सेवा करते थे । संतों का भी सत्संग भजन निर्विध्न चलता था । रसोइयां भी बहुत आती थी । आसपास के स्थानधारी संत तथा भक्त लोग रसोइयां लेकर आते थे । कुछ दिन ठहर कर सत्संग का आनन्द भी लेते थे । वैसे भी सत्संग और संत दर्शन के लिये आसपास के भक्त लोग आते ही रहते थे । उक्त प्रकार यह चातुर्मास अच्छा ही हुआ था । 
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चातुर्मास समाप्ति पर केवलदासजी ने आचार्यजी को मर्यादा अनुसार भेंट देकर आशीर्वाद प्राप्त किया था । संत मंडल को भी पूरा- पूरा वस्त्र देकर प्रसन्न किया था । चातुर्मास से विदा होकर रामत करते हुये नारायणा दादूधाम में पधार गये थे और कुछ समय तक वहां ही भजन करते रहे थे ।
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बीकानेर से टीका की भेंट ~ 
आचार्य नारायणादासजी महाराज के गद्दी पर विराजने के समय किसी कारण वश बीकानेर नरेश की ओर से टीका की भेंट नहीं आ सकी थी, सो वि. सं. १९०३ फाल्गुण शुक्ला ३ को बीकानेर नरेश ने- घोडा, दुशाला आदि जो परंपरा से भेजते आये थे सो टीका की भेंट भी भेजी । आचार्य नारायणादासजी महाराज ने उसे स्वीकार करके अपनी परंपरा के अनुसार बीकानेर नरेश के लिये नारायणा दादूधाम से प्रसाद व शुभाशीर्वाद भेजा ।  
(क्रमशः)  

*१५. मन कौ अंग २१/२४*

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१५. मन कौ अंग २१/२४*
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सुन्दर यहु मन स्वान है, भटकै घर घर द्वार । 
कहूंक पावै झुंठि कौं, कहूं परै वह मार ॥२१॥
श्रीसुन्दरदासजी का कहना है कि हमारा यह मन कुत्तों के समान आचरण करता हुआ घरों के द्वार द्वार पर फिरता रहता है । वहाँ वह कहीं जूंठी रोटी का एक टुकड़ा पा जाता है तो कहीं उसे लाठी की मार खाकर रोते हुए आगे भागना पड़ता है ॥२१॥
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सुन्दर यहु मन काग है, बुरौ भलौ सब खाइ । 
समुझायौ समुझै नहीं, दौरि करंक हि जाइ ॥२२॥
हमारे इस मन को कौआ भी कहा जा सकता है; क्योंकि कोए के समान यह भी इधर उधर घरों में जाकर गन्दी(सड़ी, गली) वस्तुएँ खाता रहता है । इतना ही नहीं, उसको कितना भी समझाया जाय वह अवसर मिलते ही करङ्क (अस्थि कङ्काल) जैसी अशुभ वस्तुओं की ओर दौड़ने में कोई विलम्ब नहीं करता ॥२२॥
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सुन्दर मन मृग रसिक है, नाद सुनै जब कांन । 
हलै चलै नहिं ठौर तैं, रहौ कि निकसौ प्रांन ॥२३॥
हमारा यह मन भी नादरसिक मृग के समान है । यह भी जब कहीं कर्णप्रिय नाद सुनता है तो यह वहीं अचल हो जाता है, भले ही तब इस नादश्रवण के लोभ में इसके प्राण हो क्यों न चले जाँय ! ॥२३॥
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सुंदर यह मन रूप कौ, देखत रहै लुभाइ । 
ज्यौं पतंग बसि नैंन कै, जोति देखि जरि जाइ ॥२४॥
हमारा यह मन पतङ्ग के समान रूप का लोभी भी है । जैसे पत्तङ्ग के नेत्रों में ज्योति का लोभ इतना समा जाता है कि वह उस के देखने के लोभ में अपने प्राण गवाँ बैठता है, वही स्थिति इस मन की भी है ॥२४॥
(क्रमशः)  

-'कर्मयोग' से उद्धृत

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🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*दादू चारै चित दिया, चिन्तामणि को भूल ।*
*जन्म अमोलक जात है, बैठे माँझी फूल ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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श्रीरामकृष्णदेव कहा करते थे, 'छुरे को चलाना सीखकर हाथ में छुरा लो ।' स्वामी विवेकानन्द ने दिखा दिया कि वास्तविक कर्मयोगी किसे कहते हैं । स्वामीजी जानते थे कि देश के दुःखियों की धन द्वारा सहायता करने से बढ़कर अनेक अन्य महान् कार्य हैं । ईश्वर का ज्ञान प्राप्त करा देना मुख्य कार्य है । उसके बाद विद्यादान, उसके बाद जीवनदान, उसके बाद अन्नवस्त्र-दान ।
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संसार दुःखपूर्ण है । इस दुःख को तुम कितने दिनों के लिए मिटाओगे ? श्रीरामकृष्णदेव ने कृष्णदास पाल*(*श्रीकृष्णदास पाल ने दक्षिणेश्वर में श्रीरामकृष्णदेव का दर्शन किया था ।) से पूछा था, "अच्छा, जीवन का उद्देश्य क्या है ?" कृष्णदास ने कहा था, "मेरी राय में दुनिया का उपकार करना, जगत् के दुःख को दूर करना ।"
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श्रीरामकृष्ण खेद के साथ बोले थे, "तुम्हारी ऐसी विधवा-पुत्र*(*विधवा-पुत्र जैसी बुद्धि अर्थात् हीन बुद्धि, क्योंकि ऐसे लड़के अनेक प्रकार के नीच उपाय से मनुष्य बनते हैं; दूसरों की खुशामद आदि करके ।) जैसी बुद्धि क्यों ? – जगत् के दुःखों का नाश तुम करोगे ? क्या जगत् इतना-सा ही है ? बरसात में गंगाजी में केकड़े होते हैं, जानते हो ? इसी प्रकार असंख्य जगत् हैं । इस विश्वजगत् के जो अधिपति हैं, वे सभी की खबर ले रहे हैं । उन्हें पहले जानना - यही जीवन का उद्देश्य है । उसके बाद चाहे जो करना ।"
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स्वामीजी ने भी एक स्थान में कहा है -
"... केवल आध्यात्मिक ज्ञान ही ऐसा है जो हमारे दुःखों को सदा के लिए नष्ट कर सकता है; अन्य किसी प्रकार के ज्ञान से तो हमारी आवश्यकताओं की पूर्ति केवल अल्प समय के लिए ही होती है । ... जो मनुष्य आध्यात्मिक ज्ञान देता है, वही मानव समाज का सब से बड़ा हितैषी है ।... अध्यात्मिक सहायता के बाद मानसिक सहायता का स्थान आता है । ज्ञान का दान देना, भोजन तथा वस्त्र के दान से कहीं श्रेष्ठ है । इसके बाद है जीवन-दान और चौथा है अन्न-दान । ..."
-'कर्मयोग' से उद्धृत
(क्रमशः)

सोमवार, 29 दिसंबर 2025

पटियाले पधारना ~

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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१२ आचार्य नारायणदास जी ~
पटियाले पधारना ~ 
नाभा से विदा होकर आचार्य नारायणदासी महाराज शिष्य मंडल के सहित लोक कल्याणार्थ विचरते हुये तथा स्थान- स्थान में निर्गुण भक्ति का उपदेश करते हुये पटियाला के पास पहुँचे तब पटियाला नरेश को अपने आने की सूचना दी । सूचना मिलने पर पटियाला नरेश कर्मसिंह जी स्वयं राजकीय लवाजमा लेकर भक्त जनता के साथ संकीर्तन करते हुये आचार्य नारायणदासजी महाराज की अगवानी करने आये । 
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अपनी मर्यादा के अनुसार भेंट चढा कर प्रणाम करके बैठ गये फिर आवश्यक प्रश्‍नोत्तर हो जाने के पश्‍चात् आचार्य जी को सवारी पर बैठाकर बाजा गाजा के साथ संकीर्तन करते हुये नगर की ओर चले । जनता को आचार्य जी का तथा संत मंडल का दर्शन कराने के लिये नगर के मुख्य- मुख्य भागों से निकलते हुये नियत स्थान पर ले जाकर ठहराया । 
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वहां सब प्रकार की सेवा का प्रबन्ध करके पटियाला नरेश कर्मसिंह जी ने पटियाला की धार्मिक जनता के हित के लिये कुछ दिन पटियाला में विराजने की प्रार्थना की । तब सर्व हितैषी आचार्य नारायणदासजी महाराज ने स्वीकार कर ली । फिर पटियाला में नियत समय पर प्रतिदिन सत्संग होने लगा । 
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प्रात: दादूवाणी की कथा, मध्य दिन में विद्वान् संतों द्वारा उपनिषद् आदि के प्रवचन होने लगे । सायंकाल आरती, अष्टक, गायक संतों द्वारा उच्चकोटि के संतों के पदों का गायन, नाम संकीर्तन आदि अपने- अपने समय पर होने लगे । पटियाला की धार्मिक जनता सप्रेम सत्संग में ठीक समय आती थी और स्नेह सहित श्रवण कर अपना बोध बढाती थी । बहुत- से श्रद्धालु प्रतिदिन के आचार्य जी तथा संतों दर्शन करने आते थे तथा यथा शक्ति संतों की सेवा भी करते थे । 
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उक्त प्रकार पटियाला की जनता ने आचार्य नारायणदास जी के दर्शन तथा सत्संग से अच्छा लाभ प्राप्त किया । जब आचार्य जी जाने लगे तब पटियाला नरेश कर्मसिंह जी ने तथा पटियाला नरेश कर्मसिंह जी ने तथा पटियाला की भक्त जनता ने संत मंडल के सहित आचार्य जी का भाव पूर्वक भेंट आदि से सत्कार किया और संत मंडल के सहित आचार्य नारायणदासजी महाराज को सस्नेह विदा किया ।
(क्रमशः)  


*१५. मन कौ अंग १७/२०*

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१५. मन कौ अंग १७/२०*
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सुन्दर यहु मन नीच है, करै नीच ही कर्म । 
इनि इन्द्रिनि कै बसि पर्यौ, गिनै न धर्म अधर्म ॥१७॥
हमारा मन अतिशय नीच वृत्ति वाला है; क्योंकि यह बहुत ही हीन कर्म करता है । यह इन इन्द्रियों के अधीन रहता हुआ निरन्तर हीन कर्म करते समय धर्म या अधर्म का कोई विचार नहीं करता ॥१७॥
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सुन्दर यहु मन भांड है, सदा भंडायौ देत । 
रूप धरै बहु भांति कै, राते पीरे सेत ॥१८॥
हमारा यह मन तो भांड(विदूषक) है । यह सदा हीन वृत्ति वाला अभिनय करता रहता है । यह विभिन्न प्रकार के अभिनय(रूप धारण) करता रहता है, कभी लाल, कभी पीले या कभी श्वेत ॥१८॥
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सुन्दर यहु मन डूम है, मांगत करै न संक । 
दीन भयौ जाचत फिरै, राजा होइ कि रङ्क ॥१९॥
हमारा यह मन डोम(चाण्डाल) के समान आचरण करता हुआ दिन भर गलियों में माँगता ही रहता है, ऐसा करने में इसे कोई लज्जा का भी अनुभव नहीं होता । यह तो प्रत्येक व्यक्ति से मांगते समय इतना भी ध्यान नहीं करता कि सामने वाला रंक(देने में असमर्थ) है या राजा(देने में समर्थ) ॥१९॥
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सुन्दर यहु मन रासिभौ, दौरि बिखै कौं जात । 
गदही कै पीछै फिरै, गदही मारै लात ॥२०॥
हमारा यह मन तो गदहे के समान आचरण करता है; क्योंकि यह विषयवासना में लिप्त रहता हुआ दिन रात गदहियों(कुरूप, या सुरूप नारियों) के पीछे दौड़ता रहता है । जबकि ये गदहियाँ उसे लात मारती(अपमानित करती) रहती है तो भी यह है कि उन से ऐसे अपमानित हो(लात खा) कर भी उन के पीछे ही लगा रहता है ॥२०॥
(क्रमशः) 

ईश्वर की उपासना

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🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*शब्द दूध घृत राम रस,*
*कोई साध बिलोवणहार ।*
*दादू अमृत काढ़ि ले, गुरुमुखि गहै विचार ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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स्वामीजी स्वदेश के लिए आँसू बहाते थे अवश्य, परन्तु साथ ही यह भी भूलते न थे कि इस अनित्य संसार में ईश्वर ही वस्तु है, शेष सभी अवस्तु । स्वामीजी विलायत से लौटने के बाद हिमालय के दर्शन के लिए अलमोड़ा पधारे थे । अलमोड़ा निवासी उन्हें साक्षात् नारायण मानकर उनकी पूजा करने लगे । स्वामीजी नगाधिराज देवतात्मा हिमालय पर्वत के अत्युच्च श्रृंगो को देखकर भावमग्न हो गये ।
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उन्होंने कहा, -"... मेरी अब यही इच्छा है कि में अपने जीवन के शेष दिन इसी गिरिराज में कहीं पर व्यतीत कर दूँ, जहाँ अनेकों ऋषि रह चुके हैं, जहाँ दर्शनशास्त्र का जन्म हुआ था... । यहाँ आते समय जैसे जैसे गिरिराज की एक चोटी के बाद दूसरी चोटी मेरी दृष्टि के सामने आती गयी वैसे वैसे मेरी कार्य करने की समस्त इच्छाएँ तथा भाव, जो मेरे मस्तिष्क में वर्षों से भरे हुए थे, धीरे धीरे शान्त-से होने लगे ... और मेरा मन एकदम उसी अनन्त भाव की ओर खिंच गया जिसकी शिक्षा हमें गिरिराज हिमालय सदैव से देते रहे हैं, जो इस स्थान की वायु तक में भरा हुआ है तथा जिसका निनाद मैं आज भी यहाँ के कलकल बहनेवाले झरनों में सुनता हूँ, और वह भाव है - त्याग ।
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“ 'सर्व वस्तु भयान्वितं भुवि नृणां वैराग्यमेवाभयम् ।'
"अर्थात् इस संसार में प्रत्येक वस्तु में भय भरा है, यह भय केवल वैराग्य से ही दूर हो सकता है, इसी से मनुष्य निर्भय हो सकता है । ...
"भविष्य में शक्तिशाली आत्माएँ इस गिरिराज की ओर आकर्षित होकर चली आयेंगी ।
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यह उस समय होगा जब कि भिन्न भिन्न सम्प्रदायों के आपस के झगड़े नष्ट हो जायेंगे, जब रूढ़ियों के सम्बन्ध का वैमनस्य नष्ट हो जायगा, जब हमारे और तुम्हारे धर्म सम्बन्धी झगड़े बिलकुल दूर हो जायेंगे तथा जब मनुष्यमात्र यह समझ लेगा कि केवल एक ही चिन्तन, धर्म है और वह है स्वयं में परमेश्वर की अनुभूति, और शेष जो कुछ है वह सब व्यर्थ है । यह जानकर कि यह संसार एक धोखे की टट्टी है, यहाँ सब कुछ मिथ्या है और यदि कुछ सत्य है तो वह है ईश्वर की उपासना - केवल ईश्वर की उपासना - तीव्र विरागी यहाँ आयेंगे ।..."
-'भारत में विवेकानन्द' से उद्धृत
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श्रीरामकृष्णदेव कहा करते थे, 'अद्वैत ज्ञान को आँचल में बाँधकर जो इच्छा हो, करो ।' स्वामी विवेकानन्द अद्वैत ज्ञान को आँचल में बाँधकर कर्म-क्षेत्र में उत्तर पड़े थे । संन्यासी को फिर घर, धन, परिवार, आत्मीय, स्वजन, स्वदेश, विदेश से क्या प्रयोजन ? याज्ञवल्क्य ने मैत्रेयी से कहा था, 'ईश्वर को न जानने पर इन सब धन-विद्याओं से क्या होगा ? हे मैत्रेयी, पहले उन्हें जानो, बाद में दूसरी बात ।'
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स्वामीजी ने दुनिया को यही सिखाया । उन्होंने कहा, हे पृथ्वी भर के निवासियों ! पहले विषय का त्याग कर निर्जन में भगवान की आराधना करो, उसके बाद जो चाहो, करो, किसी में दोष नहीं । चाहे स्वदेश की सेवा करो या परिवार का पालन करो, किसी से दोष न होगा; क्योंकि तुम उस समय समझोगे कि सर्वभूतों में वे ही विद्यमान हैं, उनको छोड़ और कुछ भी नहीं है - परिवार, स्वदेश उनसे अलग नहीं हैं ।
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भगवान के साक्षात्कार करने के बाद देखोगे, वे ही सर्वत्र विद्यमान हैं । वशिष्ठ ने श्रीरामचन्द्रजी से कहा था, 'राम, तुम संसार को छोड़ना चाहते हो, आओ, मेरे साथ विचार करो; यदि ईश्वर इस संसार से अलग हों तो इसे त्याग देना ।*(*योगवशिष्ठ) श्रीरामचन्द्र ने आत्मा का साक्षात्कार किया था; इसीलिए चुप रह गये ।
(क्रमशः)

रविवार, 28 दिसंबर 2025

*१५. मन कौ अंग १३/१६*

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१५. मन कौ अंग १३/१६*
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सुन्दर यहु मन चोरटा, नाखै ताला तोरि । 
तकै पराये द्रब्य कौं, कब ल्याऊं घर फोरि ॥१३॥
हमारा यह मन बहुत बड़ा चौर भी है, अतः यह मजबूत से मजबूत ताले को सरलता से तोड़ देता है । क्योंकि पराये धन के विषय में इसकी यही वृत्ति बनी रहती है कि कब इसका स्वामी यत् किञ्चित् भी असावधान हो तो मैं इस का धन, इस के घर में से, उठा लाऊँ ॥१३॥
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सुन्दर यहु मन जार है, तकै पराई नारि । 
अपनी टेक तजै नहीं, भावै गर्दन मारि ॥१४॥
हमारा यह मन इतना अधिक कामी(व्यभिचारी) है कि इस की कुदृष्टि परायी स्त्रियों पर इस सीमा तक लगी रहती है कि यह अपने प्राणों(हत्या) की भी परवाह न कर; उनके साथ समागम के लिये सदा सन्नद्ध रहता है ॥१४॥
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सुन्दर मन बटपार है, घालै पर की घात । 
हाथ परे छोडै नहीं, लूटि खोसि ले जात ॥१५॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - हमारा यह मन बहुत बड़ा लुटेरा(बटपार) है यह प्रति क्षण यही सोचता रहता है कि कब कोई असावधान या एकाकी असहाय मिले कि उस का सब धन लूट लाऊँ । यह निर्दय, अवसर पड़ने पर, उसके पास कांनी कौड़ी भी नहीं छोड़ता, अपितु सब कुछ लूट लेता है ॥१५॥
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सुन्दर मन गांठी कटौ, डारै गर मैं पासि । 
बुरौ करत डरपै नहीं, महा पाप की रासि ॥१६॥
हमारा मन इतना ढीठ और निडर गठकटा(जेबकतरा) है कि यह ऐसा करते समय अपने प्राणों की भी परवाह नहीं करता । यह इतना बड़ा पापी है कि इसे यह पाप करते समय, कुछ भी डर नहीं लगता ॥१६॥
(क्रमशः)  

उतराध की रामत ~

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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अथ अध्याय १०
१२ आचार्य नारायणदास जी ~
उतराध की रामत ~ 
आचार्य प्रेमदासजी के ब्रह्मलीन होने पर वि. सं. १९०१ ज्येष्ठ शुक्ला पंचमी को दादूपंथी समाज ने नारायणदासजी महाराज को गद्दी पर विराजमान किया । तब भी टीका का दस्तूर पूर्वाचार्यों के समान ही हुआ राजा, रईस, शिष्य मंडल, साधु समाज, सद्गृहस्थ आदि ने अपनी- अपनी मर्यादा के अनुसार टीका के समय भेंटें की । 
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फिर इसी वर्ष १९०१ में ही रामत की और स्थान- स्थान पर दादूवाणी के द्वारा ज्ञान भक्ति वैराग्यादि का उपदेश किया । इसी प्रकार उपदेश करते हुये उतराध में पधारे । उतराध मंडल के संतों ने तथा धार्मिक जनता ने आपका अच्छा स्वागत किया । आचार्य नारायणदासजी महाराज उतराध की धार्मिक जनता को अपने दर्शन और उपदेश से कृतार्थ करते हुये मार्ग शीर्ष शुक्ला ५ को जीन्द राज्य की राजधानी संगरुर पधारे । 
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वहां नगर में प्रवेश से पूर्व अपनी मर्यादा के अनुसार वहां के नरेश स्वरुपसिंह जी को अपने आने की सूचना दी । तब स्वरुपसिंह जी ने अपने राजकीय ठाट बाट से आचार्य नारायणदासजी महाराज की अगवानी की तथा अपनी मर्यादा के अनुसार भेंट की । फिर संगरुर में कुछ दिन जनता को सद्शिक्षा देते हुये ठहरे । जनता ने सत्संग में तथा संत में अच्छी प्रकार सप्रेम भाग लिया । 
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नाभा गमन ~ 
संगरुर से विदा होकर मार्ग की धार्मिक जनता को ज्ञान भक्ति आदि का उपदेश करते हुये आचार्य नारायणदासजी शिष्य मंडल के सहित नाभा पधारे । नगर में प्रवेश से पूर्व नाभा नरेश देवेन्द्रसिंहजी को अपने आने की सूचना दी । तब वे राजकीय ठाट बाट से आपकी अगवानी करने आये और भेंट चढाकर आचार्य नारायणदासजी का बहुत सम्मान किया । फिर नगर में लाये । 
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नाभा के भक्तों ने भी आपका अति सत्कार किया और नाभा में कुछ समय विराजने का सप्रेम आग्रह किया । तब नाभा के भक्तों के आग्रह से कुछ दिन शिष्य मंडल के सहित आचार्य नारायणादास जी महाराज नाभा में ठहरे । भक्त जनता ने दादूवाणी के निर्गुण भक्ति संबन्धी गंभीर प्रवचनों के सुनने में अच्छा भाग लिया और संत सेवा भी श्‍लाघनीय रुप से की । 
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नाभा के भक्तों का श्रद्धा भाव देखकर आचार्य जी के सहित सब संत मंडल को पूर्ण संतोष था । आचार्य जी ने भी अपने उपदेशों द्वारा नाभा की धार्मिक जनता को संतुष्ट किया । फिर विचरने का विचार किया तब नाभा की जनता ने संत मंडल के सहित आचार्य नारायणदासजी महाराज का हृदय से अति उपकार मानते हुये भेंट प्रणामादि शिष्टाचार से सत्कार करते हुये अपने प्रिय आचार्य को विदा किया ।  
(क्रमशः) 

वास्तविक स्वदेश-प्रेम

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🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*दादू जब प्राण पिछाणै आपको,*
*आत्म सब भाई ।*
*सिरजनहारा सबनि का, तासौं ल्यौ लाई ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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स्वामीजी की प्रधान शिष्या भगिनी निवेदिता(Miss Margaret Noble) कहती हैं कि स्वामीजी जिस समय शिकागो नगर में निवास करते थे, उस समय किसी भारतीय के साथ साक्षात्कार होने पर, वह चाहे किसी भी जाति का क्यों न हो - हिन्दू, मुसलमान या पारसी, उसका बहुत आदर-सत्कार करते थे ।
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वे स्वयं किसी सज्जन के घर पर अतिथि के रूप में निवास करते थे । वहीं पर अपने देश के लोगों को ले जाते थे । गृहस्वामी भी उन लोगों का काफी आदर-सत्कार करते थे और वे भलीभाँति जानते थे कि उन लोगों का आदर-सम्मान न करने पर स्वामीजी अवश्य ही उनका घर छोड़कर किसी दूसरी जगह चले जायेंगे ।
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अपने देश के लोगों की निर्धनता और उनका दुःख-निवारण, उनकी सत्शिक्षा तथा उनके धर्मपरायण होने के सम्बन्ध में स्वामीजी सदैव विचारशील रहते थे । परन्तु वे अपने देशवासियों के लिए जिस प्रकार दुःख का अनुभव करते थे, आफ्रिकानिवासी निग्रो के लिए भी उसी प्रकार दुःखी रहते थे ।
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भगिनी निवेदिता ने कहा है कि स्वामीजी जिस समय दक्षिणी संयुक्त राष्ट्रों में भ्रमण कर रहे थे, उस समय किसी किसी ने उन्हें आफ्रिकानिवासी(Coloured man) समझकर घर से लौटा दिया था; परन्तु जब उन्होंने सुना कि वे आफ्रिकानिवासी नहीं है, वे हिन्दू संन्यासी प्रसिद्ध स्वामी विवेकानन्द हैं, तब उन्होंने परम आदर के साथ उन्हें ले जाकर उनकी सेवा की ।
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उन्होंने कहा, "स्वामी, जब हमने आपसे पूछा, 'क्या आप आफ्रिका निवासी हैं ?' उस समय आप कुछ भी न कहकर चले क्यों गये थे ?" स्वामीजी बोले, "क्यों, आफ्रिका निवासी निग्रो क्या मेरे भाई नहीं हैं ?" निग्रो तथा स्वदेशवासियों की सेवा एक जैसी होनी चाहिए और चूँकि स्वदेशवासियों के बीच हमें रहना है इसलिए उनकी सेवा पहले ।
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इसी का नाम अनासक्त सेवा है । इसी का नाम कर्मयोग है । सभी लोग कर्म करते हैं, परन्तु कर्मयोग है बड़ा कठिन । सब छोड़कर बहुत दिनों तक एकान्त में ईश्वर का ध्यान-चिन्तन किये बिना स्वदेश का ऐसा उपकार नहीं किया जा सकता । 'मेरा देश' कहकर नहीं, क्योंकि तब तो माया में फँसना हुआ, पर 'ये लोग तुम्हारे(ईश्वर के) हैं' इसलिए इनकी सेवा करूँगा ।
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तुम्हारा निर्देश है, इसीलिए देश की सेवा करूँगा, तुम्हारा ही यह काम है - मैं तुम्हारा दास हूँ इसीलिए इस व्रत का पालन कर रहा हूँ, सफलता मिले या असफलता हो, यह तुम जानो, यह सब मेरे नाम के लिए नहीं, इससे तुम्हारी ही महिमा प्रकट होगी – इसीलिए ।
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वास्तविक स्वदेश-प्रेम(Ideal patriotism) इसे ही कहते हैं, इसीलिए लोक शिक्षा के उद्देश्य से स्वामीजी ने इतने कठिन व्रत का अवलम्बन किया था । जिनके घर-बार और परिवार हैं, कभी ईश्वर के लिए जो व्याकुल नहीं हुए, जो 'त्याग' शब्द को सुनकर मुस्कराते हैं, जिनका मन सदा कामिनी-कांचन और ऐहिक मान-सन्मान की ओर लगा रहता है, जो लोग 'ईश्वरदर्शन ही जीवन का उद्देश्य है' इस बात को सुनकर विस्मित हो उठते हैं, वे स्वदेश-प्रेम के इस महान् आदर्श को क्या जाने ? 
(क्रमशः)

शनिवार, 27 दिसंबर 2025

*१५. मन कौ अंग ९/१२*

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१५. मन कौ अंग ९/१२*
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सुन्दर मन कामी कुटिल, क्रोधी अधिक अपार । 
लोभी तृप्त न होत है, मोह लग्यौ सैंवार ॥९॥
हमारा यह मन इतना अधिक काम एवं क्रोध की वासनाओं से भरा हुआ है कि इस की दुष्टता का पार नहीं पाया जा सकता । साथ ही, यह इतना बड़ा लोभी भी है कि इसको विषयभोगों से तृप्ति ही नहीं होती; क्योंकि यह उन भोगों के तात्कालिक सुख पर अतिशय मुग्ध हो गया है । साथ ही इस को मोह रूप शैवाल(कङ्काल) भी लगा हुआ है ॥९॥
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सुन्दर यहु मन अधम है, करै अधम ही कृत्य । 
चल्यौ अधोगति जात है, ऐसी मन की बृत्य ॥१०॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - हमारा यह मन स्वयं अधम(नीच) है, अतः इसके कर्म ही नीच ही होते हैं । इस की वृत्ति(चेष्टा या व्यवहार) भी ऐसी है कि इसके कारण यह भी निरन्तर अधोगति को ही प्राप्त होता रहता है ॥१०॥
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सुन्दर मन कै रिंदगी, होइ जात सैतान । 
काम लहरि जागै जबहिं, अपनी गनै न आन ॥११॥
हमारा यह मन, राक्षसी वृत्ति के कारण, स्वयं भी राक्षस ही जाता है । अतः जब इसमें कामभावना जाग्रत् होती है तो यह उस समय उस स्त्री के साथ अपने या आत्मीय जनों के सम्बन्ध भी ध्यान में नहीं रखता ॥११॥
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ठग बिद्या मन कै घनी, दगाबाज मन होइ । 
सुन्दर छल केता करै, जानि सकै नहिं कोइ ॥१२॥
हमारा यह मन दूसरों को ठगने की बहुत कलाएँ जानता है; क्योंकि यह स्वयं धोखेबाज है । अतः यह दूसरों के साथ कब, कितना अधिक धोखा(छल) कर जायगा - यह अन्य कोई नहीं जान सकता ॥१२॥
(क्रमशः) 

ब्रह्मलीन होना ~

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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११ आचार्य प्रेमदासजी ~ 
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ब्रह्मलीन होना ~ 
वि. सं. १९०१ का चातुर्मास केवलरामजी चोहट्या माधोपुर शेखावाटी वालों का माना था और उसी प्रान्त की रामत करते हुये चातुर्मास में बैठना था किन्तु रामत करते हुये सिरोही(शेखावाटी) में पहुँचे तब आचार्य प्रेमदासजी महाराज का स्वास्थ्य कुछ शिथिल हो गया इससे वहां ब्राह्मण भोजन कराकर वहां से नारायणा दादूधाम को लौट आये । 
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फिर नारायणा दादूधाम में ही ३ वर्ष १ मास २० दिन गद्दी पर विराजकर ज्येष्ठ शुक्ला १ शनिवार वि. सं. १९०१ को ब्रह्मलीन हो गये । यही दौलतरामजी ने कहा है - 
गादी बैठा प्रेमजी, राज कर्यो वर्ष तीन ।
दादूरामहिं सुमिर के, हुआ ब्रह्म में लीन ॥१ ॥
उन्नीसै पुनि एक ही, ज्येष्ठ मास सुदि जोय ।
पडवा पुनि शनिवार ही, प्रेम राम सुदि होय ॥२ ॥
सुन्दरोय में लिखा है - “प्रेम अरचि अंग्रेज करि चरचा सुन पद बंद ।” इससे ज्ञात होता है अंग्रेजों ने भी प्रेमजी को माना था ।
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गुण गाथा ~ दोहा - 
प्रेम मूर्ति परमेश की, प्रेमदास महाराज ।
भजा निरंजन राम को, त्याग जगत के काज ॥१॥
परम प्रेम में मग्न हो, सब थल हरि का रुप ।
प्रेमदास लखते रहे, थे वे संत अनूप ॥२॥
संत जनों से प्रेम का, करते थे व्यवहार ।
प्रेमदास जी के हृदय, था नहिं भेद विचार ॥३॥
प्रेमदास आचार्य ने, गहा सभी से सार ।
इससे ही उन पर रहा, सब का भाव अपार ॥४॥
प्रेमदास आचार्य में, द्वन्द्व रहे नहिं लेश ।
इससे वे हरते रहे, मोह जनित सब क्लेश ॥५॥
प्रेमदास जी का रहा, श्रेष्ठ भ्रमण व्यवहार ।
दादूवाणी का किया, उनने भले प्रचार ॥६॥
प्रेमदास आचार्य के, गुण कथ ले को पार ।
इससे ‘नारायण’ करे, बन्दन बारंबार ॥७॥
प्रेमदास आचार्य के, कोउ न सम कहलाय ।
उनके सम तो वे हि थे, कह कवि चुप हो जाय ॥८॥
इति श्री नवम अध्याय समाप्त: ९ 
(क्रमशः) 

श्रीरामकृष्ण, नरेन्द्र, कर्मयोग और स्वदेश-प्रेम

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🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*दादू एकै आत्मा, साहिब है सब मांहि ।*
*साहिब के नाते मिले, भेष पंथ के नांहि ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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(४)श्रीरामकृष्ण, नरेन्द्र, कर्मयोग और स्वदेश-प्रेम
श्रीरामकृष्णदेव सदैव कहा करते थे, 'मैं और मेरा, यही अज्ञान है, 'तुम और तुम्हारा' यही ज्ञान है । एक दिन सुरेश मित्र के बगीचे में महोत्सव हो रहा था । रविवार, १५ जून, १८८४ ई. । श्रीरामकृष्णदेव तथा अनेक भक्त उपस्थित थे । ब्राह्मसमाज के कुछ भक्त भी आये थे ।
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श्रीरामकृष्णदेव ने प्रताप मजूमदार तथा अन्य भक्तों से कहा, "देखो, 'मैं और मेरा' - इसी का नाम अज्ञान है । 'काली-मन्दिर का निर्माण रासमणि ने किया है' - यही बात सब लोग कहते हैं । कोई नहीं कहता कि ईश्वर ने किया है । 'अमुक व्यक्ति ब्रह्मसमाज बना गये हैं' - यही लोग कहते है । यह कोई नहीं कहता कि ईश्वर की इच्छा से यह हुआ है । 'मैंने किया है' इसी का नाम अज्ञान है ।
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'हे ईश्वर मेरा कुछ भी नहीं है, यह मन्दिर मेरा नहीं है, यह कालीमन्दिर मेरा नहीं, समाज मेरा नहीं, सभी चीजें तुम्हारी हैं, स्त्री, पुत्र, परिवार – कुछ भी मेरा नहीं है, सब तुम्हारी चीजें हैं', - ये सब ज्ञानी की बातें हैं । " ‘मेरी चीज मेरी चीज' कहकर उन सब चीजों से प्यार करने का नाम है 'माया' ।
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सभी को प्यार करने का नाम है 'दया' । मैं केवल ब्राह्मसमाज के लोगों को प्यार करता हूँ, इसका नाम है माया । मैं केवल अपने देश के लोगों को प्यार करता हूँ, इसका नाम है माया । सभी देश के लोगों को प्यार करना, सभी धर्म के लोगों को प्यार करना - यह दया से होता है, भक्ति से होता है । माया से मनुष्य बद्ध हो जाता है, भगवान से विमुख हो जाता है । दया से ईश्वर-प्राप्ति होती है । शुकदेव, नारद - इन सब ने दया रखी थी ।"
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श्रीरामकृष्णदेव का कथन है - 'केवल स्वदेश के लोगो को प्यार करना – इसका नाम माया है । सभी देशों के लोगों से, सभी धर्म के लोगों से प्रेम रखना, यह हृदय में दया होने से होता है, भक्ति से होता है ।' तो फिर स्वामी विवेकानन्द स्वदेश के लिए उतने व्यस्त क्यों हुए थे ?
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स्वामीजी ने शिकागो-धर्ममहासभा में एक दिन कहा था, "... भारत में धर्म का अभाव नहीं है - वहाँ तो वैसे ही आवश्यकता से अधिक धर्म है, पर हाँ, हिन्दुस्थान के लाखों अकालपीड़ित लोग सूखे गले से 'अन्न-अन्न, रोटी-रोटी' चिल्ला रहे हैं । ... मैं अपने निर्धन स्वदेश निवासियों के लिए यहाँ पर धन की भिक्षा माँगने आया था, परन्तु आकर देखा बड़ा ही कठिन काम है, - ईसाइयों से उन लोगों के लिए, जो ईसाई नहीं हैं, धन एकत्रित करना टेढ़ी खीर है ।"
'शिकागो वक्तृता' से उधृत.....
(क्रमशः)

शुक्रवार, 26 दिसंबर 2025

*१५. मन कौ अंग १/४*

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१५. मन कौ अंग ५/८*
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घेरैं नैंकु न रहत है, ऐसौ मेरौ पूत ।
पकरें हाथ परै नहीं, सुन्दर मनुवा भूत ॥५॥
यह मन ऐसा ढीठ है कि इस पर आप कितना भी नियन्त्रण कीजिये, यह उससे निरुद्ध होने(रुकने) वाला नहीं है । इसको आप कितना भी बांधने का प्रयास कीजिये, यह आप के बन्धन के अधीन होने वाला नहीं है । अतः इस को आप एक प्रबल भूत के समान समझिये ॥५॥
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नीति अनीति न देखई, अति गत्ति मन कै बंक ।
सुन्दर गुरु की साधु की, नैंकु न मानै संक ॥६॥
यह किसी भी बात में उचित या अनुचित का विचार नहीं करता । न यह किसी अनुचित कार्य के पूर्ण करने में कोई असुविधा या अनौचित्य मानता है । श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं – यह उस को पूर्ण करते समय न गुरु के प्रतिकूल आदेश की परवाह करता है न सज्जनों का निषेध या विरोध ही उसको रोक पाता है ॥६॥
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सुन्दर क्यौं करि धीजिये, मन कौ बुरौ सुभाव ।
आइ बनै गुदरै नहीं, खेलै अपनौ दाव ॥७॥
इस मन के कुटिल स्वभाव पर कैसे विश्वास किया जाय ! यह प्रबल से प्रबल विरोध होने पर भी अपने आग्रह(जिद्द) से पीछे हटने को तय्यार नहीं होता । यह अवसर मिलते ही, अपना हठ पूर्ण कर ही लेता है ॥७॥
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सुन्दर या मन सारिखौ, अपराधी नहिं और ।
साख सगाई ना गिनै, लखै न ठौर कुठौर ॥८॥
महाराज कहते हैं - हमारे इस मन जैसा दुष्ट अपराधी अन्य कोई नहीं है । यह कोई भी(छोटा या बड़ा) अपराध करते समय, न अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा, न अपने कौटुम्बिक सम्बन्धों को ही महत्त्व देता है और न ऐसा करते समय उचित अनुचित स्थान(ठौर, कुठौर) पर ही ध्यान देता है ॥८॥
(क्रमशः)

उदयपुर(मेवाड) गमन ~

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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११ आचार्य प्रेमदासजी ~ 
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उदयपुर(मेवाड) गमन ~
वि. सं. १९०० में आचार्य प्रेमदासजी महाराज मेवाड में निर्गुण ब्रह्मभक्ति का प्रचार करते हुये अपने शिष्य मंडल के सहित उदयपुर पधारे । नगर में प्रवेश करने से पहले अपने आने की सूचना महाराणा को दी । सूचना मिलने पर महाराणा पूरे राजकीय लवाजमा के साथ आचार्य प्रेमदासजी की अगवानी करने आये और अपनी कुल परंपरा की मर्यादा के अनुसार भेंट चढाकर प्रणाम किया । 
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फिर आवश्यक प्रश्‍नोत्तर रुप शिष्टाचार के पश्‍चात् अति सत्कार पूर्वक बाजे गाजे के साथ संकीर्तन करते हुये नगर के मुख्य मुख्य भागों में जनता को आचार्यजी तथा संत मंडल का दर्शन कराते हुये एकान्त और सुन्दर स्थान में लाकर ठहराया । सेवा का पूरा - पूरा प्रबन्ध कर दिया । सत्संग प्रारंभ हुआ । 
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दादूवाणी के गंभीर उपदेशों से अति प्रभावित होकर अति रुचि से धार्मिक जनता प्रतिदिन सुनती थी । जितने दिन आचार्यजी उदयपुर में रहे उतने दिन महाराणा की ओर से सेवा का अच्छा प्रबन्ध रहा । फिर आचार्यजी उदयपुर से पधारने लगे तब महाराणा तथा जनता ने आचार्यजी सहित संत मंडल को अति सत्कार से विदा किया ।
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सोलारामजी के चातुर्मास ~
वि. सं. १९०० का चातुर्मास सोलारामजी पादूवालों ने नारायणा दादूधाम में ही कराया था । यह चातुर्मास भी सुन्दर ही हुआ था । आस - पास के संत तथा भक्त इस चातुर्मास में बहुत आते जाते रहते थे । 
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रसोइयां भी बाहर की बहुत आई थी । सत्संग के लिये भी बहुत लोग बाहर से आते जाते रहते थे, इस वर्ष नारायणा की जनता को भी सत्संग का विशेष लाभ रहा । सोलारामजी ने चातुर्मास की पद्धति के अनुसार ही यह चातुर्मास उदारता पूर्वक कराया था । 
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समाप्ति पर आचार्यजी को मर्यादा अनुसार ही भेंट दी और संत मंडल को यथोचित वस्त्र दिये तथा जो भी चातुर्मास में करने योग्य कार्य होते हैं वे सभी अच्छी प्रकार किये थे । अंत में आचार्यजी की तथा सब संतों की शुभाशीर्वाद लेकर तथा आचार्यजी को साष्टांग दंडवत व सत्यराम करके तथा सब संतों को सत्यराम करके सोलारामजी पादू ग्राम में अपने स्थान को चले गये ।
(क्रमशः)

'शिकागो वक्तृता' से उधृत

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🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*अपना अपना कर लिया, भंजन माँही बाहि ।*
*दादू एकै कूप जल, मन का भ्रम उठाहि ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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स्वामीजी ने एक दूसरे भाषण में विज्ञान-शास्त्र से प्रमाण देकर समझाने की चेष्टा की कि सभी धर्म सत्य हैं –
"... यदि कोई महाशय यह आशा करें कि यह एकता इन धर्मों में से किसी एक की विजय और बाकी अन्य सब के नाश से स्थापित होगी, तो उनसे मैं कहता हूँ कि 'भाई, तुम्हारी यह आशा असम्भव है ।' क्या मैं चाहता हूँ कि ईसाई लोग हिन्दू हो जायँ ? - कदापि नहीं; ईश्वर ऐसा न करे ! क्या मेरी यह इच्छा है कि हिन्दू या बौद्ध लोग ईसाई हो जायँ ? ईश्वर इस इच्छा से बचावे !
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बीज भूमि में बो दिया गया है और मिट्टी, वायु तथा जल उसके चारों ओर रख दिये गये हैं । तो क्या वह बीज मिट्टी हो जाता है अथवा वायु या जल बन जाता है ? नहीं, वह तो वृक्ष ही होता है । वह अपने नियम से ही बढ़ता है और वायु, जल तथा मिट्टी को आत्मसात् कर, इन उपादानों से शाखाप्रशाखाओं की वृद्धि कर एक बड़ा वृक्ष हो जाता है ।
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"यही अवस्था धर्म के सम्बन्ध में भी है । न तो ईसाई को हिन्दू या बौद्ध होना पड़ेगा, और न हिन्दू अथवा बौद्ध को ईसाई ही । पर हाँ, प्रत्येक मत के लिए यह आवश्यक है कि वह अन्य मतों को आत्मसात् करके पुष्टि लाभ करे, और साथ ही अपने वैशिष्ट्य की रक्षा करता हुआ अपनी प्रकृति के अनुसार वृद्धि को प्राप्त हो ।..."
-'शिकागो वक्तृता' से उधृत
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अमरीका में स्वामीजी ने ब्रूक्लीन एथिकल सोसाइटी (Brooklyn Ethical Society) के सामने हिन्दू धर्म के सम्बन्ध में एक भाषण दिया था । प्रोफेसर डॉ. लीवि जेन्स (Dr. Lewis Janes) ने सभापति का आसन ग्रहण किया था । वहाँ पर भी वही बात थी, - सर्वधर्मसमन्वय की ।
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स्वामीजी ने कहा, "... सत्य सदा सार्वभौमिक रहा है । यदि केवल मेरे ही हाथ में छः उँगलियाँ हों और तुम सब के हाथ में पाँच, तो तुम यह न सोचोगे कि मेरा हाथ प्रकृति का सच्चा अभिप्राय है, प्रत्युत यह समझोगे कि वह अस्वाभाविक और एक रोगविशेष है । उसी प्रकार धर्म के सम्बन्ध में भी है ।
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यदि केवल एक ही धर्म सत्य होवे और बाकी सब असत्य, तो तुम्हें यह कहने का अधिकार है कि वह एक धर्म कोई रोगविशेष है; यदि एक धर्म सत्य है तो अन्य सभी धर्म सत्य होंगे ही । अतएव हिन्दू धर्म तुम्हारा उतना ही है जितना कि मेरा ।..."
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स्वामीजी ने शिकागो-धर्ममहासभा के सम्मुख जिस दिन पहले-पहल भाषण दिया, उस भाषण को सुनकर लगभग छः हजार व्यक्तियों ने मुग्ध होकर अपना-अपना आसन छोड़कर मुक्त कण्ठ से उनकी अभ्यर्थना की थी ।*
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(*"When Vivekanand addressed the audience as "Sisters and Brothers of America,” there arose a peal of applause that lasted for several minutes" -Dr. Barrow's Report. "But eloquent as were many of the brief speeches, no one expressed so well the spirit of the Parliament of Religions and its limitations as the Hindu monk. He is an orator by divine right."
-New York Critique, 1893)
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उस भाषण में भी इसी समन्वय का सन्देश था । स्वामीजी ने कहा था –
"... मुझको ऐसे धर्म का अवलम्बी होने का गौरव है, जिसने संसार को न केवल 'सहिष्णुता' की शिक्षा दी, बल्कि 'सब धर्मों को मानने' का पाठ भी सिखाया । हम केवल 'सब के प्रति सहिष्णुता' में ही विश्वास नहीं करते, वरन् यह भी दृढ़ विश्वास करते हैं कि सब धर्म सत्य हैं । मैं अभिमानपूर्वक आप लोगों से निवेदन करता हूँ कि मैं ऐसे धर्म का अनुयायी हूँ, जिसकी पवित्र भाषा संस्कृत में अंग्रेजी Meyo Exclusion का कोई पर्यायवाची शब्द है ही नहीं ।..."
- "शिकागो वक्तृता" से उद्धृत
(क्रमशः)