मंगलवार, 18 अगस्त 2026

*४६. परमारथ कौ अंग २५/२८*

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*४६. परमारथ कौ अंग २५/२८*
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कहि जगजीवन रामंजी, दया धरम व्रिधि१२ होइ ।
सत संतोष लिया रहै, दुक्ख न व्यापै कोइ ॥२५॥
(१२. व्रिधि-वृद्धि)
संत जगजीवन जी कहते हैं कि स्मरण से दया धर्म की वृद्धि होती है । सत्य व संतोष धारण करनेवाले को कभी कोइ कष्ट नहीं व्यापता है ।
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कहि जगजीवन रांमजी, दया धरम तहां नांम ।
जहां नांम तहां निरंजन, निरख नूर सब ठांम ॥२६॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि हे प्रभु जिस स्थान पर दया है, धर्म है, वहाँ प्रभु नाम भी है । जहाँ प्रभु का नाम है वहां स्वयं निरंजन देव विराजते हैं उनके तेजोमय रुप को सब स्थानों पर देखा जा सकता है ।
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कहि जगजीवन धरम की, धजा निरंजन राइ ।
रांम करावै सौ करै, मन वांछित फल खाइ ॥२७॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि धर्म ध्वज निरंजन देव से ही है वे ही इसके राजा हैं जो प्रभु करवाते हैं वह ही होता हैं और ऐसा माननेवाले सदा मनोवांछित फल पाते हैं ।
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कहि जगजीवन धरम की, वाड़ि१ करी कर बाहि ।
करता पुरिष समीप करि, रोम करावै आइ ॥२८॥
(१. बाड़ि-बांध, रोक)
संत जगजीवन जी कहते हैं कि धर्म प्रवाह को प्रभु प्रमाद से बचाने के लिये बांध बना कर रोकते हैं फिर बहाते हैं, संयम से प्रसार करते हैं । उन परमात्मा की कृपा जब समीप होती है तो रोम जैसे लघु जन भी कर पाते हैं ।
(क्रमशः)

सघन खोल(कोकून)

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*साभार : Subhash Jain*
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*मारग को सूझे नहीं,*
*दह दिशि माया जाल।*
*काल पाश कसि बाँधियो,*
*मेरे कोइ न छुड़ावणहार॥*
*राम बिना छूटे नहीं,*
*कीजे बहुत उपाय।*
*कोटि किये सुलझे नहीं,*
*अधिक अलूझत जाय॥*
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एक हरे-भरे शहतूत के वृक्ष पर रेशम के एक छोटे से कीड़े ने जन्म लिया। कोमल पत्तियों को खाते-खाते जब उसका उदर भर गया, तो उसने अपने चारों ओर सुरक्षा और सुख का एक सुंदर संसार रचने का विचार किया।
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उसने अपने ही मुख से एक चमकीला, महीन और अत्यंत चिकना रेशमी धागा निकालना आरंभ किया। वह बड़े आनंद से अपने शरीर के चारों ओर उस सुंदर तार को लपेटने लगा। ज्यों-ज्यों धागा लिपटता गया, उसे वह स्पर्श अत्यंत कोमल, गर्म और सुरक्षित लगने लगा। वह मन ही मन मुदित होकर सोचने लगा— "अहा ! यह तो मेरा अपना राजमहल है। यहाँ न आँधी का डर है, न धूप का कष्ट और न ही किसी शिकारी पक्षी का भय। इस विलासपूर्ण सुख से बढ़कर संसार में और क्या हो सकता है ?"
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क्षणभंगुर सुख और सुरक्षा के इस मोह में पड़कर वह अभागा जीव अपने ही भीतर से धागा निकाल-निकाल कर जाल बुनता रहा। वह इतनी तन्मयता से अपने ही महल की दीवारों को मोटा और घना करता गया कि उसे भान ही नहीं रहा कि वह जिस रचना को अपना आश्रय समझ रहा है, वह धीरे-धीरे उसकी साँसों को अवरुद्ध करने वाला कारागार बनती जा रही है।
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अंततः वह रेशमी धागों के उस सघन खोल(कोकून) के भीतर पूरी तरह कैद हो गया। बाहर निकलने का न कोई मार्ग बचा और न ही पंख फैलाने का कोई स्थान।
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तभी वहाँ रेशम का एक व्यापारी आया। उसने उस खूबसूरत, भारी और चमकीले कोकून को वृक्ष से तोड़ा और रेशम का धागा प्राप्त करने के लिए उसे सीधे खौलते हुए गर्म जल के पात्र में डाल दिया। जिस रेशमी आवरण को उस कीट ने जीवन भर बड़े चाव और जतन से रचा था, उसी के भीतर तड़पकर उसके प्राण समाप्त हो गए।
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संसार का अज्ञानी मनुष्य भी इसी रेशम के कीड़े की भाँति है। वह अपने ही भीतर से कामना, मोह, वासना, परिग्रह और अहंकार के धागे निकालता है और अपने चारों ओर सांसारिक सुख-सुविधाओं का एक सघन जाल बुन लेता है। वह अपनी बनाई इस संकुचित परिधि को ही अपना वास्तविक जीवन और परम सुरक्षा मान बैठता है।
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किंतु वह यह भूल जाता है कि जिन भौतिक बंधनों को वह जीवन भर संवारता रहा, वही आसक्तियाँ अंततः काल और मृत्यु के समक्ष उसकी मुक्ति का सबसे बड़ा अवरोध बन जाती हैं। अपनी ही बनाई आसक्तियों के इस जाल को विवेक की धार से समय रहते काटकर ईश्वर के चरणों में समर्पित हो जाना ही इस भवसागर से पार पाने का सच्चा मार्ग है।

*२६. भजन प्रताप का अंग ~९/१२*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२६. भजन प्रताप का अंग ~९/१२*
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*तन मन आतम लोह को, मिल्या सु पारस नांउ ।*
*तिन तीन्यों कचंन किये, सत सुमिरन बलि जांउ ॥९॥*
तन, मन और बुद्धि रूप लोह को नाम रूप पारस मिला है । पारस स्पर्श से जैसे लोहा सोना बन जाता है वैसे ही चिन्तन ने तन, मन और बुद्धि इन तीनों को शुद्ध बना दिया है, अत: सत्य स्वरूप परमात्मा के नाम स्मरण की मैं बलिहारी जाता हूँ ।
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*नाम प्रताप पषान तिरे जल, तो प्राणि तिरे क्यों नाँहिं ।*
*रज्जब रार्यों१ देखिये, फहम२ करो मन माँहिं ॥१०॥*
नाम प्रताप से सेतु बाँधते समय पत्थर तिरे हैं, तो फिर प्राणी क्यों न तिरेंगे ? अपने मन में ज्ञान२ धारण करके ज्ञान नेत्रों१ से देखो तभी नाम का प्रताप भली प्रकार भासेगा ।
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*देवल१ फेर्या चक्र ज्यों, प्रतिमा पींडा माँहिं ।*
*भृत्य२ भाव भंजन गढ्या४, कुलाल३ सु चिन्हे नाँहिं ॥११॥*
भजन के प्रताप से नामदेव के लिये मंदिर१ को कुम्हार चक्र को फेरता है वैसे ही फेर दिया था और चक्र फेरने से उस पर धरा मिट्टी का पींडा फिरता है, वैसे ही मूर्ति भी फिर गई थी । इस प्रकार भक्त२-भाव रूप बरतन बनाया४ गया अर्थात भक्त की इच्छानुसार कार्य कर दिया गया, किन्तु मंदिर और मूर्ति ने तो फेरने वाले ईश्वर रूप कुम्हार३ को नहीं जाना, जिसने भजन किया था उन नामदेव ने ही जाना । विशेष-नामदेव की जूतियाँ कीर्तन करते समय कमर से खुलकर सभा में गिर पड़ी थीं, तब सबने बाहर निकाल दिया था, वे रुष्ट होकर मंदिर के पीछे जा बैठा थे, तब भगवान के द्वारा उक्त घटना घटित हुई थी ।
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*रज्जब मंदिर मूर्ति सुई सम, चुंबक चिन्तन नाम ।*
*अचल चले एके मिल्यूं, बधे कौन की माम१ ॥१२॥*
मंदिर और मूर्ति तो सुई के समान है, नाम चिन्तन चुंबक पत्थर के समान है, जैसे चुंबक से सुई हिलने लगती है, वैसे नामदेव के नाम चिन्तन से मिलकर अचल मंदिर और मूर्ति चंचल होकर फिर गये थे । इस घटना में किसकी शक्ति१ रूप महिमा अधिक मानी जायेगी ? नाम चिन्तन की ही मानी जायेगी ।
(क्रमशः)

सोमवार, 17 अगस्त 2026

*४६. परमारथ कौ अंग २१/२४*

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*४६. परमारथ कौ अंग २१/२४*
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धरम हनै अघ७ पाप८ अनंत दुख, धरम हनै सब व्याधि९ ।
कहि जगजीवन धरम करि, पंच तत्त सति साधि ॥२१॥     
(७. अघ-दुष्कर्म) {८. पाप-अधार्मिक कर्म(हिंसा, चौरी आदि)} (९. व्याधि-रोग)
संत जगजीवन जी कहते हैं कि धर्म की हानि से ही पाप है अनंत दुख व बिमारियां हैं धर्म करने से पांचो तत्व धरती, गगन वायु जल अग्नि सभी अनुकूल होते हैं ।
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सतधर्मेसु पुरुषेसु, आपदा विपदा गतं ।
कहि जगजीवन दया धरमं, हरि सरणं आतम रतं ॥२३॥ 
संत जगजीवन जी कहते हैं कि सत्य धर्म के निर्वहन से जीव की आपदायें व विपदाएं मिटती है । दया धर्म धारण करने से से आत्मा प्रभु शरण में लीन रहती है ।
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दया धरमं भगति मरमं, कोटि कर्म निकन्दनं१० ।
कहि जगजीवन रामं नांमं, साच साखि सकन्दनं११॥२४॥
(१०. निकन्दनं-नष्ट करने वाला)  (११ . सकन्दनं-हार्दिक कष्ट के साथ)
संत जगजीवन जी कहते हैं कि दया व धर्म ही भक्ति का सार हैं । जो करोड़ो कर्मों के संशय दूर करते हैं उनके दोष निवारण करते हैं ।  राम नाम तो सत्य की साक्षी है चाहे उसमें कितने ही हार्दिक कष्ट हों ।
(क्रमशः) 

कृपारामजी

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*इब सुख कारण फिर दुख पावै,*
*अजहुँ न चेतै क्यों डहकावै ।
*दादू कहै सीख सुन मेरी,*
*कहु करीम संभाल सवेरी ॥*
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१- कृपारामजी १०७ वर्ष तक धरातल पर रहे । आपकी समाधि की छत्री उक्त परम्परा के कुये व प्राचीन बाग़ में नारायणा ग्राम के दक्षिण पश्चिम की कौंण में ग्राम से बाहर धोबोलाव तलाब के रास्ते पर है । छत्री पर निम्न प्रशस्ति अंकित है । सवैया~ “छाप छपी धरणी धर पै, डरपै अरि देखत हा उठ भाजै । 
कोउ न धीर धरे सनमु खहि, जाय जहां कृपाराम जु गाजै ॥१॥ 
घने घमसान नहीं अवसान सु, आश तजी जहँ जाय विराजै । 
दादूदयाल के भेष प्रसिद्ध सु, ऐसा विरुद कृपाल का बाजै ॥२॥ 
दोहा~  वर्ष एक सौ सात लौं, रहे धरा पर आप । 
पीछे सुरपुर को गये, मेटि सकल सन्ताप ॥१॥ 
वि. सं. १८५७ कार्तिक वदी ७ शुक्रवार । उक्त सवैया इनकी विशेषता का द्योतक है ।
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तुलसीदासजी~  
६- तुलसीदासजी- ये अच्छे संगीतज्ञ थे । आपने बनारस में संगीत का अच्छा अभ्यास किया था । सुनते हैं जब वे स्वरानन्द में निमग्न होकर गाते थे तब चमत्कार देखने वाले लोग तुला में एक ओर रुपये भर देते और दूसरा पलड़ा खाली रखते थे । इनकी स्वरानन्द की पराकाष्ठा होने पर खाली पलड़ा और रुपयों से भरा पलड़ा दोनों बराबर हो जाते थे । यह इनका चमत्कार देखकर दर्शक मंत्र मुग्ध से हो जाते थे । ऐसा चमत्कार दिखाकर भी ये किसी से कुछ भी नहीं लेते थे । निरीह और साधनों में लीन रहने वाले ये महान् योगी संत थे ।
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दयारामजी~  
७- दयारामजी~ ये प्रारब्धी पुरुष थे । इनके पास अत्यधिक सम्पदा थी । ये व्यवहार कुशल तथा पुण्यात्मा संत थे । परोपकार करते ही रहते थे । इन्होंने कई ब्रह्मभोज किये थे और और विप्रों को अच्छी दक्षिणा दी थी । जब भी इच्छा होती तभी ग्राम को, आस पास की बस्तियों, जातियों को जिमा देते थे । अच्छे परोपकारी तथा भजनानन्दी संत हुये हैं । कैरिया का स्थान अब भी अच्छी स्थिति में है । ३- कृष्णदेवजी महराजकी शिष्य परम्परा का स्थान नारायणा दादूधाम की परम्परा इस प्रकार है~ १ सांवलरामजी २- नानकदास जी ३- सुखरामजी ४- शंभूरामजी ५- बालकरामजी वि. सं. १९०७ नारायणा स्थान की परंपरा यहां समाप्त । 
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हरजीरामजी = ४- स्थान गौड़जी का गुढ़ा की परंपरा-आचार्य कृष्णदेवजी महाराज के शिष्य १- भंडारी ब्रह्मदासजी २~ नारायणदासजी ३- हरजीरामजी । हरजीरामजी नारायणदास के शिष्य नारायणा में ही हुये थे । १- भंडारी ब्रह्मदासजी अच्छे महात्मा हुये हैं । इनकी समाधि चरण चौकी नारायणा में हरजीरामजी के महल के सामने एक कुटिया में है । उसमें वि. सं. १८५२ आषाढ़ सुदि १२ सोमवार अंकित है । यह समाधि चमत्कारी है । 
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कुछ समय पहले एक नारायणा का बनियां का लड़का समाधि वाली कुटिया में शौच जाने लगा था । तब बैठते ही उसके सामने श्वेत वस्त्रधारी एक महान् संत प्रकट हो गये । लड़का डर कर भाग गया और छः मास तक उसको ज्वर आता रहा । फिर ब्रह्मदासजी की मन्यत मानने और उनके चरणों की पूजा करने से ठीक हुआ था । ऐसे ही उनके अनेक चमत्कार वर्तमान में महल में रहनेवाले रामप्रसादजी स्वामी सुनाते हैं । उक्क्त समाधि स्थल में हरजीरामजी के चरण भी हैं, उसमें लिखा है ~
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"वर्ष एक नव सोमगुण, जन्म अष्टमी लीन । 
मिथ्या भव निधि जानकर, निजपद मिले प्रवीण ॥१॥
दादू के पथ अवतरे, सिद्ध दिगम्बर वीर । 
वर श्री हरजीरामजी, नृपकुल जानों धीर ॥२॥
शिष जूं दूलहराम तिन, परम भक्ति कर प्यार । 
चरण धरे गुरु के विमल, रचना रचो अपार ॥३॥"
(क्रमशः)

*२६. भजन प्रताप का अंग ~५/८*

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*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२६. भजन प्रताप का अंग ~५/८*
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*अति गति१ सूधा२ नाम था, सोइ लिया निज दास ।*
*रज्जब छाना३ क्यों रहे, वाणी सुयश सुवास ॥५॥*
मोक्ष१ का सरल२ मार्ग नाम चिंतन ही था, जो भी भगवन का निजी भक्त हुआ है, उसने वही नाम चिंतन रूप मार्ग अपनाया है, अत: वह छिपा३ हुआ कैसे रह सकता है ? उसकी वाणी रूप सुगंध उसके यश को सभी लोकों में फैला देती है ।
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*तन मन तिली१ सामान है, नाम निरंजन फूल ।*
*जन रज्जब सौंधा२ भये, मिल४ सौंधा के मूल३ ॥६॥*
तन मन तो तिलों१ के सामान हैं और निरंजन राम का नाम फूलों के सामान है, जैसे फूलों के संग से तिलों का तेल सुगन्धित२ होजाता है और सुगंध के मूल्य३ में मिलता४ है, वैसे ही निरंजन राम के नाम चिंतन से प्राणी के तन मन भक्त हो जाते हैं और भक्त के सामान सत्कार के पात्र होते हैं ।
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*अठार भार विधि आदमी, चन्दन चिन्तन नाम ।*
*रज्जब सकल सुगंध ह्वै, धन्य संतन विश्राम ॥७॥*
मनुष्य तो अठारह भार वनस्पति के समान है और नाम का चिन्तन चन्दन के समान है, जैसे चन्दन के संग से वनस्पति सुगंधयुक्त हो जाती है, वैसे ही नाम चिन्तन से मनुष्य भगवद् भक्ति से युक्त हो जाते हैं । संतों को विश्राम देने वाले राम नाम को धन्य है ।
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*मन इन्द्रिय पति आतमा, तरुवर नींम्ब स्वरूप ।*
*हरि चितवन चन्दन परसि, रज्जब पलटि अनूप ॥८॥*
मन इन्द्रियों के स्वामी जीवात्मा का स्वरूप नीम्ब वृक्ष के समान है, हरि चिन्तन चन्दन के समान है । जैसे चन्दन की सुगंध से नीम्ब बदल जाता है, वैसे ही नाम चिन्तन से जीवात्मा जीवात्व भाव बदलकर उपमारहित ब्रह्म-भाव को प्राप्त होता है ।
(क्रमशः)

रविवार, 16 अगस्त 2026

३१. अन्योन्य भेद कौ अंग ३७/३९

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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३१. अन्योन्य भेद कौ अंग ३७/३९
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बचन जाल उरझै सबै, सुरझावैं गुरु देव । 
नेति नेति करते रहैं, सुन्दर अलख अभेव ॥३७॥
इसी वाग्जाल में समस्त संसार आबद्ध है । अब तो कोई सद्‌गुरु ही अपने अमृतमय ज्ञानोपदेश के द्वारा इस भ्रमजाल को सुलझा सकते हैं । अन्यथा अन्य सभी तथाकथित गुरु उस अलक्ष्य एवं अभेद्य तत्त्व को 'नेति नेति' कह कर अपना पल्ला झाड़ चुके तथा अपने उत्तरदायित्व से मुक्त हो चुके हैं ! ॥३७॥
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एक अखंडित ब्रह्म है, दूसर नांही आंन । 
सुन्दर भ्रम रजनी मिटै, प्रगट होइ जब भांन ॥३८॥
उपसंहार : श्रीसुन्दरदासजी महाराज कहते हैं - हमारे मत में - एक अखण्ड ब्रह्म ही सर्वत्र व्याप्त है, अन्य कोई नहीं । अन्य भ्रमात्मक मतों के विषय में एक ही उदाहरण पर्याप्त होगा कि इस उपर्युक्त मत के विरोधी अन्य भ्रान्त मत उसी प्रकार विलीन हो जायेंगे जैसे सूर्य के उदित होने पर रात्रि का समस्त अन्धकार विलीन हो जाया करता है ॥३८॥
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कठिन बात है ज्ञान की, सुन्दर सुनी न जाइ । 
और कहौं नहिं ठाहरै, ज्ञानी हृदय समाइ ॥३९॥
इति अन्योन्यभेद कौ अंग ॥३१॥
हम लोक में सुनते आ रहे हैं कि सिंहनी का दूध सुवर्णपात्र के अतिरिक्त अन्य किसी पात्र में नहीं ठहरता; उसी प्रकार ब्रह्मज्ञान की साधना भी प्रत्येक साधक के वश की बात नहीं हैं । उसको प्राप्त करने का प्रयास करने वाले हजारों साधकों में कोई एक ज्ञानी ही सफल हो पाता है१ ॥३९॥ 
{१ तु० – श्रीमद्भगवद्गीता : मनुष्याणां सहस्त्रेषु कश्चिद् यतति सिद्धये ।
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः ॥ (७/३)} 
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इति अन्योन्यभेद का अंग सम्पन्न ॥३१॥
अंग समस्त ३१ । साखी संख्या १३५१ ॥
॥ इति श्रीस्वामी सुन्दरदास विरचित साषी ग्रन्थ सम्पन्न ॥

भेष भंडारी कृपारामजी

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*दादू जिस घट दीपक राम का,*
*तिस घट तिमिर न होइ ।*
*उस उजियारे ज्योति के, सब जग देखै सोइ ॥*
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भोजन की पंक्ति में आचार्यजी की चौकी के सामने पत्तल पर उनकी थाली, कटोरी व झारी(जलपात्र) लगती है । सामने पांतिया पर चौकी बिछा, बैठ कर वे प्रसाद पाते हैं । उनकी परम्परा अब तक चली आ रही है । फिर छत्रियों के महन्तों का स्थान नारायणा से पाखर चला गया । वहां के महन्त नारायणा मेले में आते हैं तब उनका उक्त प्रकार ही व्यवहार रहता है । अब छत्रियों के महन्तों का मुख्य स्थान पाखर में ही है । 
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उसकी परम्परा-आचार्य कृष्णदेवजी महाराज के शिष्य १-गंगारामजी छत्रियों के महन्त सं १८१० में बैठे और १८१६-१७ तक रहे । २- जोगीदासजी वि. सं .१८५७ । ३- जीवणदासजी सं. १८५९ । ४- उदयरामजी सं. १८९२ । ५- चरणदासजी । ६- देवदासजी । ७ - रघुनादसजी । ८ - मंगलदासजी । ९- मुरलीदासजी । १०- रामपालदासजी । ११- कनीरामजी वर्तमान हैं । इनके मुस्थान  १~नारायणा २~सावरदा ३~जयपुर में भी पाखर वालों का स्थान है । 
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कृपारामजी =२- भेष भंडारी कृपारामजी~कृपारामजी आचार्य कृष्णदेवजी महाराज के शिष्य तथा मुख्य भंडारी थे । जब जयपुर नरेश जयसिंह द्वितीय ने कृष्णदेवजी का बल से विवाह कराने की आज्ञा निकाली तब वे नारायणा छोड़कर जोधपुर राज्य पधार गये । कारण राजा ने गलते के महन्त का व्यवहार अच्छा न देख उसका विवाह करना चाहा तब उसने कहा~नारायणा के  आचार्य का विवाह करा दोगे तो मैं भी करा लूंगा । 
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कृष्णदेवजी विवाह नहीं कराना चाहते थे । इससे चले गये । फिर राजा ने आज्ञा निकाली कि नारायणा दादू धाम में आचार्य नहीं रहते हैं तब पीछे से गद्दी को संभालता है ओर जो महन्त के स्थान में कार्य करता है, उसका विवाह करा कर गलते के महन्त का विवाह करा दिया जाय । नारायणा दादूधाम की प्रथा है कि आचार्य नहीं रहने पर मुख्य भंडारी को ही आचार्य के समान माना जाता है । मुख्य भंडारी कृपारामजी थे । अतः कृपारामजी के विवाह की योजना बनी । 
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कृपारामजी ने राजा से कहा नारायणा गादी पर विरक्त ही सदा से बैठते आये हैं, मेरे गृहस्थ हो जाने पर समाज मुझे मानेगा नहीं, तब मेरा योग-क्षेम कैसे होगा ? राजा को गलता के महन्त का विवाह कराना था । इससे राजा ने कहा आपका योग-क्षेम सरकार करेगी । राजा ने योग-क्षेम के लिये कृपारामजी को जागीर दे दी और उनका विवाह करा दिया । कहा भी है ~ 
“कृपाराम भंडारी को, गोड़ सुता परनाय । 
जमी दिई जयसिंह ने, राखा उन पर भाय ॥” (दा.च.चन्द्रि) 
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संभव है कृपारामजी जाति से गौड़ ब्रह्मण ही होंगे । अतः उनकी जाति की कन्या से ही उनका विवाह करा दिया । फिर गलता के महन्त को भी विवाह कराना ही पड़ा । वह तो चाहता ही था । केवल ऊपर से ही ऐसा प्रपंच रचा था । फिर आचार्य चैनरामजी नारायणा आये तब कृपारामजी को हटाया नहीं, उनको भेष भंडारी की पदवी दे कर भंडारी ही बनाये रखा । 
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कृपारामजी ने नारायणा दादूधाम की राजकाज करना रूप अच्छी सेवा की थी । वे व्यवहार कुशल महानुभाव थे । नारायणा दादूधाम की महान् सेवा करने से ही समाज में उनकी अच्छी प्रतिष्ठा थी । वे कैरिया वाले भेष भंडारी कहलाते हैं । उनकी परम्परा इस प्रकार है~ १- कृपारामजी(स्व. सं. १८५७), २- वीरमदासजी, ३- निर्भयरामजी, ४- लालदासजी, ५- हरिदासजी, ६- तुलसीदासजी, ७- दयारामजी, ८- नन्दरामजी, ९- छोटूदासजी, १०- हरिनारायणजी, ११- रामदासजी वर्तमान हैं । 
(क्रमशः)

*२६. भजन प्रताप का अंग ~१/४*

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*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२६. भजन प्रताप का अंग ~१/४*
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*स्वर्ग रसातल शेष लग, जहां तहां सब ठाम ।*
*जन रज्जब वन्द हि सबै, जा हिरदै हरि नाम ॥१॥*
स्वर्ग, मृत्यु, रसातल में शेष जी के स्थान तक जहाँ तहाँ सब स्थानों के निवासियों में जिसके हृदय में हरि का नाम रहता है, उसे सभी प्रणाम करते हैं ।
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*जिहिं घट नौबत नाम की, सो प्रकटे संसार ।*
*जन रज्जब जगमग१ रह्या, सेये सिरजन हार ॥२॥*
जिसके अन्त:करण में नाम रूप नौबत बज रही है, अर्थात निरन्तर नाम चिन्तन होता रहता है, वह संसार में सर्वत्र प्रगट हो जाता है । जिसने सृजनहार परमात्मा की भक्ति की है वे जगत् में अपने सुयश प्रकाश से चमक१ रहे हैं ।
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*रज्जब सुकृत नाम की, नित नौबत जहँ बाज ।*
*सो सुनिये सब लोक में, ऊँची अगम अवाज ॥३॥*
नाम चिन्तन रूप शुभ कर्म की नौबत जहाँ भी नित्य बजती है, उसकी आवाज इतनी ऊँची है कि - वह सभी लोकों में सुनती है तथा मन इन्द्रियों के अविषय परमात्मा तक पहुँचती है, अर्थात हरि नाम का चिन्तन करने वाला छिप नहीं सकता ।
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*डाके सुमिरन सुकृत के, दिल सु दमामा साज ।*
*रज्जब छिप सु बजाईये, व्है सब लोक अवाज ॥४॥*
स्मरण रूप शुभ कर्म का डाका डालने के लिये अंतःकरण में सूक्ष्म उच्चारण स्वरुप नगाड़ा वाद्य छिप कर भी बजावे, तो भी उसकी आवाज सब लोकों में पहुँच जाती है, अर्थात भक्त को सभी लोकवासी जान जाते हैं ।
(क्रमशः)

*२५. नाम निरूप आदम अकलि का अंग ~१३/१७*

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*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२५. नाम निरूप आदम अकलि का अंग ~१३/१७*
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*आकाश अनंग आभै गहै, त्यों अविगत रस नाम ।*
*रज्जब आवे तहां तैं, अवनि सु आतम ठाम ॥१३॥*
आकाश निराकार है फिर भी बादलों को ग्रहण करता है, वैसे ही मन इन्द्रियों के अविषय परमात्मा निराकार हैं, तो भी नाम - चिन्तन रूप रस को ग्रहण करते हैं । जैसे आकाश में स्थित बादलों से जल पृथ्वी पर आता है, वैसे ही नाम - चिन्तन द्वारा आत्मा ब्रह्म स्वरूप-धाम में आता है ।
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*निकुल१ निनामा२ शून्य३ में, आभा४ रूपी नाम ।*
*जन रज्जब चित चातका, जल जीवन जिस ठाम ॥१४॥*
जैसे आकाश में बादल४ होते हैं, वैसे ही कुलरहित१ और नामरहित२ निर्विकार३ ब्रह्म में नाम है । जिस बादल में जीवन रूप जल होता है, उस बादल की ओर ही चातक पक्षी जाता है, वैसे ही जिस नाम में चित्त को रस आता है, उसी नाम रूप धाम की ओर चित्त जाता है ।
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*मही महादेव ते गये, नीर नाम आकाश ।*
*सो सहस गुण हो स्रवे१, समा२ किया फिर तास ॥१५॥*
पृथ्वी से जल आकाश को जाता है और हजार गुणा होकर बर्षता१ है तथा वही पुन: सुकाल२ कर देता है, वैसे ही महादेवजी आदि के द्वारा धरे हुये प्रभु के नाम ब्रह्म रूप आकाश में जाते हैं, अर्थात उनके स्वरूप का वर्णन करते हैं, फिर वे ही चिन्तन द्वारा हजार गुणा आनन्द देकर साधकों को आनन्दित करते हैं ।
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*जे कुछ उपज्या मांड में, नाम सभी के नांहि ।*
*रज्जब काढे ज्ञान सौं, जो लक्षण उन मांहि ॥१६॥*
ब्रह्माण्ड में जो कुछ भी उत्पन्न हुये हैं, उन सभी के पहले नाम न थे, फिर बुद्धिमानों ने अपने ज्ञान बल से जैसे लक्षण उनमें देखे, वैसे ही उनके नाम रख दिये वैसे ही परमात्मा के रक्खे गये हैं ।
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*नाम निनामे पर धर्या, ता पर नर का नेह ।*
*या पर और न सूझ ही, रज्जब देखैं येह ॥१७॥*
नामरहित परमात्मा का ज्ञानीजनों ने नाम रख दिया है, नाम के द्वारा ही मनुष्य का प्रेम प्रभु में होता है । प्रभु प्राप्ति का साधन इस नाम चिन्तन से श्रेष्ठ अन्य नहीं दिखता, हम तो इसे ही सर्वश्रेष्ठ रूप से देख रहे हैं ।
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इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित “२५. नाम निरूप आदम अकलि का अंग” समाप्त ॥
(क्रमशः)

शनिवार, 15 अगस्त 2026

३१. अन्योन्य भेद कौ अंग ३३/३६

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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३१. अन्योन्य भेद कौ अंग ३३/३६
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कूप अग्नि दोऊ बचहिं, तामैं फेर न कोइ । 
सुन्दर ज्ञान क्रिया बिना, मुक्त कदे नहिं होइ ॥३३॥
ज्ञान एवं क्रिया से मिश्रित साधना करने वाले साधक(पूर्व वर्णित उदाहरणों के) न कूए में गिरेंगे और न अग्नि से जलेंगे । इस में कोई सन्देह नहीं है । अतः महाराज श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - क्रिया सहित ज्ञान की साधना के विना ज्ञानी को मुक्ति कभी नहीं प्राप्त हो सकती ॥३३॥ 
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क्रिया भक्ति हरि भजन है, और क्रिया भ्रम जांन । 
ज्ञान ब्रह्म देखै सकल, सुन्दर पद निर्बान ॥३४॥ 
इस साधनाविधि का संक्षिप्त निरूपण : इस विशिष्ट साधनापद्धति में १. हरिभक्ति (निरञ्जन निराकार प्रभु का सतत स्मरण) ही 'क्रिया' कहलाती है । अन्य मिथ्यागुरुपदिष्ट क्रियाओं को भ्रमात्मक ही समझो । तथा २. 'उस प्रभु को सर्वव्यापक मान कर तदनुसार आचरण को ज्ञान समझना चाहिये । ऐसी साधना करने वाले साधक को ही निर्वाण (मोक्ष) पद प्राप्त हो सकता है ॥३४॥
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कर्ता कर्म न भोगता, पुद्गल जीव न कोई । 
सुन्दर यह भ्रम स्वप्न मैं, जागें एक न दोइ ॥३५॥ 
६. ज्ञानी का अन्य भेद : कोई ज्ञानी कहता है कि यहाँ न कोई कर्ता है, न कोई कर्म, न ही उसका कोई फलभोक्ता ही है । न कोई पुद्‌गल(शरीर) है, न कोई जीव । अतः यह सब दृश्यमान संसार उसी प्रकार भ्रममात्र है, जैसे स्वप्न भ्रममात्र होता है । उस स्वप्न से जगने पर न वहाँ एक दिखायी देता है, न दूसरा ॥३५॥
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भ्रम कर्त्ता भ्रम भोगता, भ्रम सु कर्म भ्रम काल । 
भ्रम पुद्गल भ्रम जीव है, सुन्दर सब भ्रम जाल ॥३६॥ 
वहाँ कर्ता, भोक्ता एवं कर्म - सब कुछ भ्रमात्मक प्रपञ्च है । इसी प्रकार पुद्‌गल(शरीर) एवं जीव भी भ्रममात्र है । अर्थात् सृष्टि में जो कुछ दिखायी दे रहा है वह सब भ्रम के अतिरिक्त कुछ नहीं है ॥३६॥
(क्रमशः)

कृष्णदेवजी की शिष्य परंपरा

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*दादू अंतरगति आपा नहीं, मुख सौं मैं तैं होइ ।*
*दादू दोष न दीजिये, यों मिल खेलैं दोइ ॥*
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रामनारायणजी महान् वैद्य हुये, साखून के स्थान में दीक्षित थे । राजा रामसिंहजी के समय में जयपुर आ गये थे । जयपुर में इनको राजवैद्य की पदवी प्राप्त हुई थी तथा जयपुर राज्य के एक गुढा कुमावतन ग्राम भी इनको प्राप्त हुआ था । मोजीरामजी साखून में जाकर बसे और अच्छी ख्याति प्राप्त की । साखून में एक पीढी ही रहे । पश्चात् बुधरामजी के समय में जयपुर पुराणी बस्ती में आ गये । वहां स्थान अब भी है ।
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रामनारायणजी ने महाराजा माधोसिंह का इलाज किया था । इसके फलस्वरूप में ही वि. सं. १९४७ में ग्राम गुढा कुमावतान तन कालख पट्टा जागीर माफी दिया था । आप राजकीय औषधखाना के मुखिया वैद्य थे । आप स्थान पर भी धमार्थ औषधालय चलाते थे, जो अब तक चल रहा है । अब भी रामनारायण औषधालय के नाम से १५००) रु. लगभग सरकारी सहायता मिलती है । आपको राज्य दरबार में ताजीमी कुर्सी मिलती थी ।
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अपने स्थान से दरबार व राजकीय औषधखाना जाने आने के लिये राज्य से एक भैल(बैलगाड़ी) का प्रबन्ध था । आप पूर्वाश्रम में ब्राह्मण थे । और ईसरदा के थे । इसमें माधोसिंहजी के पूर्व परिचितों में से थे । आपने वि. सं. १९६० ज्येष्ठ कृष्णा ८ को देह छोड़ा था । आप के स्थान में अब वैद्य भजनदासजी आयुर्वेद, व्याकरण, वेदान्तचार्य दादू महाविद्यालय जयपुर के स्नातक हैं । आपका स्थान जाट के कुए का रास्ता पुराणी बस्ती, चांदपोल बाजार में रामनारायण धर्मार्थ औषधालय जयपुर है । २- नारायणा ३- गुढा कुमावतान ( कालख ) आपके कृषि भूमि है ।
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६ कृष्णदेवजी की शिष्य परंपरा = गंगारामजी = १- क्षत्रियों के महन्त गंगारामजी~ आचार्य कृष्णदेवजी महाराज के ब्रह्मलीन होने पर मेड़ता में आचार्य गद्दी पर चैनरामजी महाराज को संपूर्ण भेष तथा मारवाड़ के राजाओं तथा प्रजा ने बैठाया था । किन्तु नारायणा में गंगारामजी के गुरु भाई कृपारामजी, नागेसंत तथा जयपुर नरेश ने गंगारामजी को गद्दी पर बैठाया था । फिर मतभेद समाप्त होने पर समाज ने आचार्य चैनरामजी से प्रार्थना की~आप अब नारायणा दादूधाम में पधारें ।
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चैनरामजी ने कहा~वहां गंगारामजी को गद्दी पर बैठाया गया, वे गद्दी से कैसे हटेंगे । समाज के मुख्य २ व्यक्तियों ने कहा~उनको हम गद्दी छोड़ने के लिये प्रार्थना करेंगे और वे अवश्य समाज की प्रार्थना से गद्दी त्याग देंगे । तब चैनरामजी महाराज ने कहा उनकी कुछ मर्यादा व प्रतिष्ठा भी रहनी चाहिये । इसके लिये मैं समाज से निवेदन करूंगा कि हमें आचार्यों की स्मारक छत्रियां बनानी हैं । उनका उनको महन्त बनाकर उनकी प्रतिष्ठा रखी जाय । इस पर वे प्रसन्नता से गद्दी त्याग दें तो मैं नारायणा अवश्य चलूंगा ।
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समाज के मुख्य २ महानुभाव नारायणा में आये और उनको चैनरामजी महाराज ने जैसा कहा था, वैसा ही उन्होंने गंगारामजी को कहा । गंगारामजी ने उक्त व्यवस्था होने की बात सुनकर सहर्ष गाद्दी त्याग दी । फिर महाराज चैनरामजी नारायणा पधारे और आचार्य जयतरामजी तथा अपने गुरुदेव कृष्णदेवजी की संयुक्त छत्री बनाई और उसकी प्रतिष्ठा करके गंगारामजी को छत्रियों के महन्त बना दिये । नारायणा में सर्वप्रथम उक्त छत्री ही बनी थी । इससे पूर्व के आचार्यों के चरणचिन्ह भैराणा में हैं, नारायणा में नहीं हैं ।
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जयतरामजी महाराज तथा कृष्णदेवजी महाराज के संयुक्त चरणचिन्ह जिस छतरी में हैं, उसके ठीक पश्चिम में जो स्थान है वही छत्रियों के महन्तों का स्थान है । उसी में गद्दी लगा कर गंगारामजी विराजते थे । छड़ी चंवर आदि महन्तों के चिन्ह उनको दिये गए थे । आचार्यजी के पास छत्रियों के महन्त आते हैं तब आचार्यजी को दंडवत करते हैं और आचार्यजी खड़े होकर उनसे मिलते हैं ।
(क्रमशः)

*२५. नाम निरूप आदम अकलि का अंग ~९/१२*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२५. नाम निरूप आदम अकलि का अंग ~९/१२*
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*सब ही नाम स्वभाव के, काढे अकलि विचार ।*
*जन रज्जब गुण गूंथ कर, जोड़े सहस हजार ॥९॥*
परमात्मा के सभी नाम स्वभाव, गुण तथा स्वरूपानुसार बुद्धि से विचार करके निकाले गये हैं और गुणों के द्वारा गूंथ करके तो बुद्धिमानों ने हजार हजार नाम जोड़कर सहस्त्र नाम स्तोत्रों की रचना की है ।
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*जेती हिकमत हुक्म में, ये सब तिसके नांउ ।*
*सब साहिब जिस नाम में, ताकि मैं बलि जांउ ॥१०॥*
जितनी ही विद्यायें उस प्रभु की आज्ञा में हैं, वे सभी उसके नाम हैं अर्थात गुण, कर्म और स्वभाव से बनने वाले नाम सब विद्या द्वारा ही बनते हैं, किन्तु प्रभु के जिस स्वरूपभूत निज नाम में सब कुछ आ जाता है, मैं उसी नाम की बलिहारी जाता हूँ ।
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*नाम निनामे१ के धरे, संतों शोध स्वभाय ।*
*रज्जब माने राम जी, सुमर्यां करी सहाय ॥११॥*
संतों ने परमात्मा के स्वभाव को विचार द्वारा खोजकर नाम-रहित१ के भी नाम रख दिये हैं रामजी ने भी उन्हें अपने नाम मानकर स्मरण करने वालों की सहायता की है ।
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*निराकार का नाम तन, अलिफ१ अलह औजूद२ ।*
*जन रज्जब यहु गहन गति, मालिक है मौजूद३ ॥१२॥*
निराकार परमात्मा का शरीर नाम ही है, फारसी का आदि अक्षर१ ही अल्लाह का शरीर२ है । परमात्मा नाम रूप से सब जगह विद्यमान३ है, किन्तु उनके स्वरूप को जानकर उनमें प्रवेश करना बड़ा कठिन है ।
(क्रमशः)

*२५. नाम निरूप आदम अकलि का अंग ~५/८*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२५. नाम निरूप आदम अकलि का अंग ~५/८*
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*आदम ने अचरज किया, नाम सु दीपक राग ।*
*तिमिर हंत सो उर धरहु, रज्जब जागहिं भाग ॥५॥*
मानव ने जो परमात्मा के जो नाम रक्खे हैं, वे दीपक राग के समान है, दीपक राग गाने से जैसे दीपक जग कर अंधेरा दूर होता है, वैसे ही नाम-स्मरण से हृदय का अज्ञान रूप अँधेरा दूर होता है, अत: नाम को सदा हृदय में रक्खो, तुम्हारा भाग्योदय होगा ।
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*सांकल आतम राम को, नाम रूप निज जान ।*
*देख अबन्धूं बन्धना, जन रज्जब हैरान ॥६॥*
आत्माराम को बाँधने के लिये एक मात्र निज नाम-स्मरण रूप जंजीर ही समर्थ है, नाम-स्मरण रूप जंजीर बन्धन रहित परमात्मा को भी बाँधने वाला है, यह देखकर हमें बड़ा आश्चर्य होता है ।
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*मन उनमन१ मूसल उभय, हाथा जोड़ी नांउ ।*
*बंध अबन्धूं बंदगी, हिकमत२ पर वलि जांउ ॥७॥*
मूसल से धान कुटते समय दोनों हाथ अपने आप मिल जाते हैं, वैसे ही नाम-स्मरण के द्वारा मन समाधि१ अवस्था में जाता है तब जीव और ब्रह्म दोनों मिल जाते हैं । स्मरण रूप भक्ति तत्त्वज्ञान द्वारा बन्धनयुक्त जीव और बन्धन रहित ब्रह्म दोनों को एक कर देती है, ज्ञानी मानव के उस तत्त्व-ज्ञान२ की हम बलिहारी जाते हैं ।
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*नाम सभी संतों धरे, गहि गहि गुण उनमान ।*
*यहु रज्जब इस ओर तें, सुमिरन का अस्थान ॥८॥*
परमात्मा के सभी नाम संतों के गुण, कर्म को ग्रहण करके तथा स्वरूप का अनुभान करके रक्खे हैं । इस साधक अवस्था की ओर से परब्रह्म के चिन्तन का मुख्य स्थान नाम ही है, अर्थात नाम का आश्रय लेकर के ही स्मरण किया जाता है ।
(क्रमशः)

*२५. नाम निरूप आदम अकलि का अंग ~१/४*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२५. नाम निरूप आदम अकलि का अंग ~१/४*
इस अंग में मानव ने अपनी बुद्धि से रूप रहित परमात्मा के जो नाम रखे हैं, उन नामों तथा मानव की बुद्धि विषयक विचार कर रहे हैं ।
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*नाम नाव आदम१ गढी, भर्या सु आदम भार ।*
*आदम खेवहिं अकलि सौं, आदम उतरहिं पार ॥१॥*
ज्ञानी मनुष्यों१ ने ही नाम रूपी नौका बनाई है और साधक मनुष्य रूप बोझा भरा है, गुरु रूप मनुष्य ही बुद्धि द्वारा उसे चलाते हैं, इस प्रकार ही साधक संसार -सिन्धु के पार उतरते हैं ।
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*धन्य धन्य आदम अकलि, अकल कल्या धर नांउ ।*
*रज्जब रीझ्या देखकर, बुद्धि बँधन बलि जांउ ॥२॥*
मनुष्य की बुद्धि को धन्य है जिसने कलारहित ब्रह्म का भी नाम रख करके उसे कलायुक्त-सा कर दिया है, बुद्धिमानों के इस कलायुक्त-सा कर दिया है, बुद्धिमानों के इस कला-बन्धन को देखकर मैं भी अति प्रसन्न हूँ और बलिहारी जाता हूँ ।
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*नाम नेह नर के बँध्या, निराकार निर्बन्ध ।*
*रज्जब धन्य आदम अकलि, अकलहिं बाह्या फंद ॥३॥*
नाम-स्मरण के कारण ही बन्धनरहित निराकार परमात्मा नर के स्नेह में बँधा है, मनुष्य की बुद्धि को धन्य है, जिसने कलारहित परमात्मा को कला रूप फँदे में डाल दिया ।
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*अकलि१ बड़ी दी आदम२ हिं, नाम निनाम३ हिं दीन्ह ।*
*अगह गह्या जिहिं बुद्धि सौं, अलग सलग४ कर लीन्ह ॥४॥*
सृष्टि कर्त्ता ने मनुष्य को विशाल बुद्धि दी है, जिसके बल से मानव ने नाम-रहित को भी नाम प्रदान किया है और मन इन्द्रियों के द्वारा जो नहीं ग्रहण किया जाता है, उस ब्रह्म को आत्म रूप से ग्रहण किया है, इस प्रकार जो जीव और ब्रह्म अलग भास रहे हैं, उन्हें एक कर लिया है ।
(क्रमशः)

शुक्रवार, 14 अगस्त 2026

३१. अन्योन्य भेद कौ अंग २९/३२

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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३१. अन्योन्य भेद कौ अंग २९/३२
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सुन्दर या अनुक्रम बिना, ज्ञान प्रगट नहिं होइ । 
बात कहें का होत है, भ्रम मति भूलै कोइ ॥२९॥ 
ज्ञानप्राप्ति की इस विधि के बिना जिज्ञासु साधक को आत्मज्ञान नहीं प्राप्त हो सकता । वैसे, इस ज्ञानप्राप्ति के लिये नाना उपदेशक दूसरे प्रकार की अन्य विधियाँ(बातें) बताते हैं; परन्तु उनकी ये बातें(उपदेश) भ्रममात्र हैं । इनसे आत्मज्ञान कथमपि नहीं प्राप्त हो सकता । अतः कोई जिज्ञासु साधक ऐसे भ्रान्त उपदेशों के भ्रम में न पड़े ॥२९॥ 
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क्रिया करत है बहुत विधि, ज्ञान दृष्टि जो नांहिं । 
अंध चल्यौ मग जात है, परै कूप के मांहिं ॥३०॥ 
ज्ञानविहीन साधक : अनेक भ्रान्त साधक मिथ्यागुरु के मिथ्या उपदेश के आश्रय से साधना(क्रिया) करने लगते हैं; परन्तु उन को बहुत श्रम करने पर भी ज्ञानदृष्टि उद्भुत नहीं हो पाती । ऐसे साधक की वही दशा होती है जैसे कोई अन्धा(नेत्रविहीन) पुरुष, मार्ग में चलते चलते, सामने आये कूप में जा गिरे ॥३०॥
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ज्ञान दृष्टि करि निपुनि है, क्रिया नहीं पग दौर । 
अग्नि लगै जब सदन मैं, पंगु जरै वहि ठौर ॥३१॥ 
क्रियाविहीन साधक : तथा जिस मिथ्या साधक को साधना द्वारा ज्ञानदृष्टि तो उद्भूत हो गयी, परन्तु उसकी क्रियाएँ तदनुकूल नहीं हैं तो उसकी भी वही दशा होगी जैसे कोई पुरुष, घर में अग्नि लग जाने का ज्ञान होने पर भी उससे बाहर निकलने की कोई क्रिया(प्रयास) न करे । अन्त में, वह वहीं जल कर मर जाता है ॥३१॥ 
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ज्ञान क्रिया दोऊ मिलहिं, तबही होइ उबार । 
यथा अंध के कंध पर, पंगु होइ असवार ॥३२॥ 
ज्ञान एवं क्रिया समन्वित साधना से ही मोक्षप्राप्ति : अतः आत्मज्ञान की साधना में वही साधक सफल माना जाता है, जिसकी साधना में ज्ञान एवं क्रिया दोनों सम्मिलित हों । जैसे कोई पंगु(क्रियाविहीन, परन्तु ज्ञानवान्) पुरुष अन्धे(ज्ञानरहित परन्तु क्रियावान्) पुरुष की पीठ पर चढ कर दुर्गम मार्ग पार कर लेता है । (क्रिया एवं ज्ञान का मिश्रण ही सफलता प्रदान करता है । ज्ञानं भारः क्रियां विना) ॥३२॥
(क्रमशः)

बुधरामजी =

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*दादू सोई सेवक राम का, जिसे न दूजी चिंत ।*
*दूजा को भावै नहीं, एक पियारा मिंत ॥*
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बुधरामजी = जयतरामजी महाराज की शिष्य परम्परा में भोजपुरा स्थान की परम्परा इस प्रकार है~ १- बुधरामजी, इनके शिष्य दयारामजी गुढा ग्राम में अपना साधन धाम बनाकर भजन करने लगे । दूसरे मयारामजी भोजपुरा में ही भजन करते रहे । उनके शिष्य १ - नानकरामजी उनके २ - महादेव देवदासजी उनके ३- रामधनदासजी ४- भोलारामजी ५- वक्षीरामजी ६- बालदासजी ७- हरिरामजी ८- शीतलदासजी वर्तमान हैं । यही भोजपुरा स्थान की परम्परा है ।
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इस परम्परा के आदि संत बुधरामजी परमविरक्त परोपकारी संत थे । वे वर्तमान भोजपुरा ग्राम से लगभग १॥मील उत्तर में खीरवा ग्राम के जंगल में एक पर्णकुटी में रहते थे । तथा निरन्तर निर्गुणराम का चिन्तन करते हुये पशु पक्षियों तथा पथिकों को जल पिलाना रूप परोपकार करते रहते थे । आपकी इस परोपकार वृत्ति से प्रभावित होकर एक श्रद्धालु जवानीराम जाट भक्त ने अपने खेत में से २४ बीघा भूमि बुधरामजी के भेंट कर दी और उस भूमि में एक पक्का कुआ तथा एक खेल भी बनवादी ।
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वहां रहकर बुधरामजी अपनी उक्त प्रकार की सेवा रूप परोपकार करने लगे । वह प्याऊ अब तक चलती आ रही है । बुधरामजी का अन्तिम समय निकट आने पर अपने सेवकों को आज्ञा दी कि मेरा शरीर जाने वाला है । प्राण पिण्ड का वियोग होने पर शव को घोड़े की पीठ पर बांध देना । वह घोड़ा जहाँ रुक जाय वहां ही संस्कार करके समाधि बना देना । सेवकों ने वैसा ही किया ।
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वर्तमान भोजपुरा ग्राम के स्थान के सम्मुख गोशाला में बुधरामजी की समाधि विद्यमान है । सेवक लोग अब भी समाधि को पूजते हैं । समाधि बनने के पश्चात् समाधि के पास कच्चा स्थान रूप दादूद्वारा बना । बुधरामजी के सेवक ब्राह्मण और जाटों के सैकड़ों परिवार थे । बाद मैं इस स्थान के सेवक राजपूत भी बहुत बन गये । सेवक लोग बच्चों के जडूला आदि संस्कार बुधरामजी की समाधि पर आकर ही करते हैं ।
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बुधरामजी के शिष्य मयारामजी भोजपुरा रहे और दूसरे शिष्य दयारामजी ग्राम में चले गये । उनकी परंपरा वहां चली । उनकी परंपरा में वर्तमान में भजनदासजी वैद्य पुराणी बस्ती जयपुर में हैं । मयारामजी की शिष्य परम्परा भोजपुरा में भोलारामजी संपत्तिशाली महापुरुष हुये । भोजपुरा में पक्का दादूद्वारा भोलारामजी ने ही बनाया था । भोलारामजी के समय वहां का आसपास का क्षेत्र खेती न होने के कारण अर्थ संकट में पड़ गया था, तब निकटस्थ जनता तथा जोबनेर, मंढ़ा, भैसलाना भादवा, रोझडी आदि के जागीरदार ठाकुरों कों भी भोलारामजी ने आर्थिक सहयोग दिया था । वे प्रारब्धी महापुरुष थे ।
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इन परंपरा में हरिरामजी भी परोपकारी, समाज सेवक साधु थे । आप नारायणा दादूधाम दादूद्वारे के भंडारी भी रहे थे । आप समाज के सभी अच्छे कार्यौं में सहयोग देते थे । हरिरामजी के शिष्य वैद्य शीतलदासजी वर्तमान हैं । नारायणा से गोविन्ददासजी के शिष्य मौजीरामजी साखून गये । उनके शिष्य बुधरामजी के समय में जयपुर पुरानी बस्ती का स्थान बसाया गया । उसमें रामनारायणजी, वल्लभदासजी, हरिरामजी, भजनदासजी वर्तमान गाड़ी वालों का मौहल्ला जाट के कुए का रास्ता, जयपुर पुराणी बस्ती के स्थान में रामनारायणजी महान् वैद्य हुये ।
(क्रमशः)

गुरुवार, 13 अगस्त 2026

३१. अन्योन्य भेद कौ अंग २५/२८

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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३१. अन्योन्य भेद कौ अंग २५/२८
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जीव भयौ अनुलोम तैं, ब्रह्म होइ प्रतिलोम ।
सुन्दर दारू जराइ कैं, अग्नि होइ निर्धोम ॥२५॥
रे जीवात्मा ! जैसे अग्नि काष्ठ को जला कर धूमरहित हो जाती है, वैसे ही जब तक तूं देह के संसर्ग में था, तब तक तूँ उसके अनुकूल(अनुलोम) था । अब तेरा देह से संसर्ग छूट जाने के कारण प्रतिकूल(प्रतिलोम) ब्रह्मरूप हो गया है । अब उस देह से तेरा कोई सम्बन्ध नहीं है, अतः तूं उसका ममत्व त्याग दे ॥२५॥
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गऊ देह कै मद्धि है, पय अरु उत्तम ज्ञान ।
सुन्दर घृत ज्यौं आतमा, ब्यापक एक समान ॥२६॥
४. गो-दुग्ध की उपमा से ज्ञानी की प्रशंसा : जैसे गौ के दूध में घृत सर्वत्र व्याप्त रहता है, उसी प्रकार ज्ञानी की देह में श्रेष्ठ आत्मा तथा उस का ज्ञान सर्वत्र व्यात है ॥२६॥
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चारि श्रवन जब नीरिये, बांट मनन अभ्यास ।
सुन्दर दुहिये धेनु कौं, सो कहिये निदिध्यास ॥२७॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - जैसे किसी गौ को, अधिक दूध की प्राप्ति के लिये पहले उसको उत्तम चारा(हरा घास) तथा बीट(खली, बिनौला, दाना) आदि खिलाया जाता है तब उससे दूध निकाला जाता; उसी प्रकार जिज्ञासु साधक को भी पहले गुरुपदेशश्रवण रूप चारा, तथा बांट(खाली, बिनौला आदि) रूप निराई(मनन) करने के बाद ही दूध निकालना रूप निदिध्यासन करना चाहिये ॥२७॥
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दुग्ध ज्ञान जब पाइये, जा मन निश्चै तात ।
सुन्दर दधि मथि अनुभवै, निकसै घृत साक्षात ॥२८॥
इस विधि से साधक को जब ज्ञानरूप दूध मिल जाता है, तब उसे 'जीव-ब्रह्म की एकता' का निश्चयात्मक ज्ञान हो पाता है । इस निश्चयात्मक ज्ञान के बाद जब वह साधक दूध रूप ज्ञान को दही के रूप में बार बार मथता है तब उसे घृतरूप ब्रह्म का साक्षात्कार होता है ॥२८॥
(क्रमशः)

जयतरामजी की शिष्य परम्परा

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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*जे नांही सो ऊपजै, है सो उपजै नांहि ।*
*अलख आदि अनादि है, उपजै माया मांहि ॥*
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जयतरामजी की शिष्य परम्परा =
५- जयतरामजी की शिष्य परम्परा~ १- रामचन्द्रदासजी, नारायणा मुख्य स्थान ।२ - रामदासजी, ३-गोविन्दरामजी । इनके एक शिष्य बुधरामजी-भोजपुरा में अपना साधन धाम बनाकर भजन करने लगे । दूसरे शिष्य मौजीरामजी के साखून, गुढ़ा, जयपुर स्थान बने । नारायणा में ४- भगवतदासजी ५-हरिनारायणदासजी ६- नन्दरामदासजी ७- बुधरामदासजी ८- खेमदासजी ९- गुमानदासजी १०- धनीरामजी वर्तमान में नारायणा दादूधाम में ही आपका स्थान अलग है ।
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१- रामचन्द्रदासजी आचार्य जयतरामजी महाराज के प्रमुख शिष्य तथा कृपा पात्र थे । अपने गुरुदेव के समान ही आप भी सिद्ध तथा भजनानन्दी महान् संत थे । आप दादूवाणी के विचार में संलग्न रहते थे । दादूवाणी के उपदेशानुसार निर्गुणराम के चिन्तन में ही निरन्तर लगे रहते थे । आपकी वृत्ति प्रायः अन्तर्मुख रहती थी ।
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३- गोविन्दरामजी~आप भजनानन्दी महात्मा थे । संत परम्परा के संरक्षक थे । आपके अनेक शिष्य थे किन्तु तीन मुख्य शिष्य थे १- भगवतदासजी, ये नारायणा में रहकर भजन करते थे । २- बुधरामजी, इन्होंने भोजपुरा में अपना साधन धाम बनाया था । ३- मौजीरामजी, इन्होंने प्रथम साखून में अपना साधन धाम बनाया और पश्चात जयपुर पुराणी बस्ती स्थान बनाया ।
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मुख्य स्थान नारायणा के उत्तराधिकारी भगवतदासजी रहे । ये अच्छे विद्वान भजनानन्दी संत स्वभाव वाले महात्मा थे । भगवतदासजी के शिष्य हरिनारायणदासजी हुये । इन्होंने स्थान का संवर्धन किया-मकान भी बनाये, कृषि योग्य भूमि भी स्थान के नीचे लगाईं । संपत्ति भी संचय की । दादूद्वारे में दो बड़े मकान बनाये । इनका पुराणा स्थान श्री भंडार के घी के कोठार के ऊपर था । इनकी परम्परा के साधु मेलों में घी तोलकर वितरण करते थे । इससे इनकी संज्ञा घिया हो गई थी ।
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हरिनारायणदासजी सिद्ध पुरुष थे । इनसे भूत प्रेतादि कांपते थे । इनकी समाधि वर्तमान धनीरामजी के आश्रम में है । पहले चबूतरा ही था किन्तु धनीरामजी ने उस पर अब छत्री बना दी है । इस परम्परा में ये प्रधान सिद्ध संत हुये हैं । इनकी समाधि भी चमत्कारी है । स्व. आचार्य प्रकाशदेवजी महाराज कहते थे कि मैं बचपन में जेब खर्च की कामना करके समाधि पर जाता था तब मुझे एक चांदी की चवन्नी मिलती थी । ऐसा अनेक बार हुआ था । इनकी परम्परा के अन्य संतों के चरण स्टेशन की ओर सांभर दूदू सड़क के पास है ।
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९ गुमानदासजी, हरिनारायणजी से गुमानदासजी तक सभी संत भजनानन्दी व सुगुणों से संपन्न हुये । किन्तु गुमानदासजी पन्थ के छोटे बच्चों दादूवाणी पढ़ाते थे । पंथ परंपरा की शिक्षा देते थे । आचार्यों के साथ भ्रमण भी करते थे । रामत कोठीगढ़ा(वस्त्रादि वस्तुओं की बैलगाड़ी) के अधिकारी भंडारी कहलाते थे । प्राचीन साम्प्रदायिक परम्परा के ज्ञाता थे । धार्मिक उत्सवों में अच्छा सहयोग देते थे ।
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१०~ धनीरामजी वर्तमान हैं । गुमानदासजी ने धनीरामजी को वि. स. १९७४ में अपना शिष्य बनाया था । उस समय धनीरामजी ५-६ वर्ष के थे । धनीरामजी ने प्रारंभिक शिक्षा के पश्चात् भ्रमण करते हुये अनेक स्थानों में अनेक संतों से आध्यात्मिक ग्रंथों का अध्ययन किया तथा चिरकाल तक वैराग्य पूर्वक भ्रमण करते रहे । अपने गुरु गुमानदासजी का देहान्त होने पर उनके उत्तराधिकारी बने फिर विशेषकर नारायणा में विराजने लगे । कलकत्ता के भक्त परिवार आदि आप पर अच्छी श्रद्धा रखते हैं । आपने नारायणा में अच्छा स्थान भी बनवा लिया है । आप आचार्य प्रकाशदेवजी महाराज के साथ रहकर कथा भी करते थे । उक्त परंपरा के मुख्य संत वर्तमान में धनीरामजी ही हैं ।
(क्रमशः)

*२४. नाम महिमा का अंग ~३३/३५*

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*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२४. नाम महिमा का अंग ~३३/३५*
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*काया काष्ठ में बंधी, देखो आज्ञा आगि१ ।*
*सो मुकती२ ह्वै रज्जबा, नाम अँगारे लागि ॥३३॥*
काष्ठ में अग्नि१ बँधा रहता है किन्तु अँगारा लगने पर काष्ठ जल कर वह अग्नि व्यापक अग्नि में लय हो जाता है, वैसे ही आत्मा को परमात्मा से मिलने की आज्ञा होने पर भी वह देहाध्यास के कारण शरीर में बद्ध है किन्तु निरंतर नाम-स्मरण होने से वह खुल२ जाती है, अर्थात नाम-स्मरण द्वारा ज्ञान होकर आत्मा परमात्मा में अभेद रूप से मिल जाता है ।
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*कर्म काष्ठ कहु क्या करे, जब प्रकटे पावक नांउ ।*
*अठारह भार अघ दहम१ ह्वै, बासदेव२ बलि जांउ ॥३४॥*
जैसे अठारह भार वनस्पति रूप काष्ठ अग्नि के आगे क्या जोर कर सकता है, वह तो भस्म ही हो जाता है वैसे ही नाम-स्मरण द्वारा ज्ञानाग्नि प्रकट होने पर कर्म क्या कर सकते हैं ? वे तो भस्म१ ही हो जाते हैं उस ज्ञानाग्नि२ की हम बलिहारी जाते हैं ।
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*प्रतिमा१ पूजा नाम धरि, नाम तिरे पाषान ।*
*सोई नाम नर उर बस्या, सीझे२ क्यों न सुजान ॥३५॥*
राम कृष्णादि नाम रखने पर ही मूर्ती१ की पूजा होती है, बिना नाम धरे तो कोई भी नहीं पूजता और नाम अंकित होने पर ही सेतु बाँधने के समय पत्थर जल पर तिरे थे । हे बुद्धिमान् ! राम-नाम मनुष्य के हृदय में निरंतर बसा रहे तो यह सिद्धावस्था२ मुक्ति को क्यों नहीं प्राप्त होगा ? अर्थात होगा ही ।
इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित “२४. नाम महिमा का अंग” समाप्त ॥
(क्रमशः)

*२४. नाम महिमा का अंग ~२९/३२*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२४. नाम महिमा का अंग ~२९/३२*
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*नाहर१ जरख सु मंत्र वश, अबला२ ह्वै असवार ।*
*तो नाम लेत नर नेह सौ, क्यों ना ह्वै करतार ॥२९॥*
बाध१ और जरख भी मंत्र के अधीन हो जाते हैं और उनपर डाकिनी नारी२ बैठकर घूमती है, तो फिर स्नेह पूर्वक ईश्वर का नाम जपने से ईश्वर क्यों न अनुकूल होंगे ?
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*जन जगपति के मध्य मन, द्वै दिशि जीव इक नांउ ।*
*रज्जब राखे नाम मन, तिनकी मैं बलि जांउ ॥३०॥*
भक्त और भगवान् दोनों के मन में एक नामरूप जीव है, अर्थात भक्त भी नाम के आश्रय जीवित रहता है और भगवान के अस्तित्त्व का भी बोध नाम से ही होता है, ऐसे नाम में जो निरंतर अपना मन रखते हैं, मैं उनकी बलिहारी जाता हूँ ।
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*नाम निरंजन जीव है, सो साधु मध्य श्वास ।*
*तो रज्जब हरि क्यों रहे, बिन आये उन पास ॥३१॥*
नाम ही निरंजन राम का जीव है और वह संत के प्रति श्वास के साथ रहता है, अर्थात निरंतर स्मरण रहता है, तो फिर उन संतों के पास आये बिना हरि कैसे रह सकते हैं ?
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*नाम नाज जीवन सबहुं, आदम१ की औलाद२ ।*
*और हु और अहार है, देखर४ दीज्यो दाद३ ॥३२॥*
आदि मानव१ की संतान२ मनुष्य जाति का, भगवान नाम स्मरण रूप नाज ही जीवन है, अर्थात नाम-स्मरण बिना मानव में आत्म-बल की वृद्धि नहीं होती । अन्य पशु, जाति आदि का आहार अन्य वस्तुएँ है, अत: नाम का स्मरण करके नाम-स्मरण द्वारा प्राप्त आत्म-बल को प्रत्यक्ष देखकर४ के साधक को स्मरण की प्रशंसा३ अवश्य करनी चाहिये ।
(क्रमशः)

*२४. नाम महिमा का अंग ~२५/२८*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२४. नाम महिमा का अंग ~२५/२८*
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*नमो नाम महिमा अंनत, बोध न वाणी माँहिं ।*
*रज्जब कहिये कौन विधि, अकल कह्या नहीं जाहि ॥२५॥*
नाम की महिमा अनन्त है, उसे कह सके ऐसा ज्ञान वाणी में तो है ही नहीं फिर किस प्रकार कही जा सकती है ? निज नाम कला विभाग से रहित है अत: उसका यश नहीं कहा जा सकता, हम तो नाम को नमस्कार ही करते हैं ।
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*रज्जब रंचक भजन की, महिमा कही न जाय ।*
*अर्ध नाम पशु१ उद्धरे, नर देखो निरताय२ ॥२६॥*
किंचित मात्र भजन की भी महिमा नहीं कही जा सकती, हे नरो ! विचार करके देखो तो सही आधे नाम के उच्चारण से भी गजराज१ का उद्धार२ हो गया ।
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*आदम१ ईदम२ औलिया३, गहिये अगह अलाह ।*
*सिफत४ नाम की क्या कहूँ, बन्ध अबन्धू बाह५ ॥२७॥*
नाम-समरण की महिमा४ मैं क्या कहूँ, नाम - स्मरण करके यह२ मनुष्य१ संत३ बन जाता है, न ग्रहण किया जाय उस ब्रह्म को आत्मा रूप से ग्रहण करता है, और संसार बन्धन में बँधे हुये प्राणियों को मुक्त कर के धन्य५वाद का पात्र होता है ।
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*सारंग१ सर्प शिशु स्वर सुनत, मगन होत मुर२ मान ।*
*त्यों जगदीश्वर जाप वश, जन रज्जब जिव जान ॥२८॥*
मृग१, सर्प और बच्चा ये तीनों२ वीणा आदि बाजों के स्वर को सुन कर प्रसन्न होते हुये बजाने वाले के अधीन हो जाते हैं, वैसे ही ईश्वर जीव द्वारा किये गये नाम जाप को जानकर प्रसन्न होते हैं और उसके अधीन हो जाते हैं, अर्थात उसकी इच्छानुसार व्यवहार करते हैं, यह यथार्थ ही मानना चाहिये ।
(क्रमशः)

*२४. नाम महिमा का अंग ~२१/२४*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२४. नाम महिमा का अंग ~२१/२४*
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*शशि सांई तारे सुजन, ध्रुव रूपी निज नाँउ ।*
*प्रदक्षिण देही शाम सौं, जन रज्जब वलि जाँउ ॥२१॥*
चन्द्रमा और तारे सांयकाल से ही ध्रुव के परिक्रमा देते हैं, वैसे ही परमात्मा और श्रेष्ठ भक्त निज नाम के प्रदक्षिणा देते हैं, अर्थात नाम के पास ही रहते हैं, ऐसे नाम की मैं दास बलिहारी जाता हूँ ।
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*साधू सांई शीश पर, नाम सदा शिर मौर ।*
*रज्जब रीझ्या देखकर, अकल१ कले२ जहिं ठौर ॥२२॥*
संत तथा परमात्मा के शिर पर नाम सदा मुकट के समान रहता है, अर्थात दोनों ही श्रेष्ठ है, जिस नाम चिन्तन के द्वारा कला-रहित१ परमात्मा भी कला२ धारण करते हैं, उस नाम रूप स्थान को देखकर मैं अति प्रसन्न हूँ ।
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*रज्जब सुमिरन की सिफत१, मो पै कही न जाय ।*
*जा के वश दोनों भये, कुदरत२ सहित खुदाय ॥२३॥*
जिसके वश में माया२ और माया का स्वामी ईश्वर दोनों है, उस नाम सुमिरण की महिमा१ मेरे से कैसे कही जा सकती है ?
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*नमो नाम सम कुछ नहीं, धरे१ अधर२ बिच और ।*
*जन रज्जब ता सौं बँधे, शिवरू शक्ति इक ठौर ॥२४॥*
मायिक१ संसार और परमात्मा२ के मध्य नाम के समान अन्य कुछ भी नहीं है, उस नाम के प्रताप से ब्रह्म और माया दोनों एक भक्तरूप स्थान से बँधे हैं, अर्थात दोनों ही नाम-स्मरण से अधीन हो जाते हैं, उस नाम को नमस्कार है ।
(क्रमशः)

*२४. नाम महिमा का अंग ~१७/२०*

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*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२४. नाम महिमा का अंग ~१७/२०*
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*नख शिख सूरत१ शुक्ल२ मध्य, मनसा वाचा मान ।*
*तैसे रज्जब नाम में, नाम धणी३ परवान४ ॥१७॥*
जैसे नख से शिखा पर्यन्त रूप१ को देखकर मन बलात काम२ में जाता है, वैसे ही मन वचन से नाम को ही यथार्थ३ रूप से नामी४ मानकर नाम में ही मन लगाना चाहिये ।
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*मूल डाल तरु बीज मधि, त्यों जन जगपति नाम ।*
*रज्जब रीझ्या देख कर, बडहु बडी निज ठाम ॥१८॥*
जैसे बीज में मूल, डाल आदि सभी वृक्ष रहता है, वैसे ही नाम में भक्त और भगवान दोनों ही रहते हैं, अर्थात नाम में भगवान् अर्थ रूप से व्यापक रूप से रहते हैं और भक्त का मन नाम में रहता है । इस नाम रूप स्थान को देखकर हम अति प्रसन्न हैं, हमारी नाम रूप जगह बड़े स्थानों से भी बड़ी है ।
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*रज्जब एकहि नाम मध्य, देखी दीरघ ठौर ।*
*संत अनन्त समाव हिं, अस्थल इसा न और ॥१९॥*
एक नाम ही अति विशाल जगह देखी है, जिसमे ज्ञानी योगी, भक्त, कर्मकाण्डी आदि अनन्त संत समाते हैं, अर्थात सभी नाम का चिन्तन करते हैं । नाम साधना के समान साधन रूप स्थान अन्य नहीं है ।
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*बडहुं बडा सांई सही, ताहि बडे सत साध ।*
*दोनों आये नाम में, रज्जब नाम अगाध ॥२०॥*
बड़े जो ब्रह्मादि है उनसे भी बड़ा परमात्मा है, परमात्मा से भी बड़े परमात्मा के प्यारे सच्चे संत हैं और परमात्मा की महिमा नाम में स्थित है, तभी तो नाम चिन्तन से प्रगट होती है, नाम की महिमा अगाध है ।
(क्रमशः)