शुक्रवार, 2 जनवरी 2026

जमुनाबाई के चातुर्मास ~

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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१२ आचार्य नारायणदास जी ~
जमुनाबाई के चातुर्मास ~ 
माधोपुर की जमुनाबाई जी ने मनाया और बहुत अच्छी प्रकार चातुर्मास की व्यवस्था की । आचार्य नारायणदासजी महाराज शिष्य मंडल के सहित चातुर्मास के लिये पधारे । माधोपुर के भक्तगणों ने आचार्यजी की तथा संत मंडल की अगवानी विधि पूर्वक की और बाजे गाजे सहित संकीर्तन करते हुये लाकर नियत स्थान में ठहराया । 
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चातुर्मास का सत्संग आरंभ हो गया । चातुर्मास में जो २ कार्य होते हैं वे सब सदा की भांति होने लगे । आचार्य जी तथा संतों की सेवा का पूर्ण प्रबन्ध करा दिया गया था । संत सेवा के लिये जमुनाबाईजी उदारता से धन खर्च कर रही थी अत: संतों की सेवा में कमी आने का प्रसंग ही नहीं आता था । 
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सत्संग के कार्यक्रम प्रात: दादूवाणी प्रवचन, मध्यदिन में अन्य ग्रंथों के प्रवचन चलते थे । संकीर्तन, जागरण, नामध्वनि सभी कार्य सुचारु रुप से चल रहे थे । बडी शांति से चातुर्मास संपन्न हुआ । समाप्ति पर आचार्य जी को मर्यादानुसार भेंट अन्य कर्मचारियों को उनका दस्तूर, सब संतों को वस्त्र मर्यादानुसार देकर सस्नेह सबको विदा किया था । 
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रत्नदासजी के चातुर्मास ~ 
वि. सं. १९०८ का चातुर्मास रत्नदासजी पापडदा वालों ने मनाया था । आचार्य नारायणदासजी महाराज शिष्य मंडल के सहित रामत करते हुये समय पर पापडदा पधारे । रत्नदासजी ने विधि सहित सामेला(अगवानी) किया और लाकर स्थान पर ठहराया । चातुर्मास संबन्धी व्यवस्था सुचारु रुप से कर दी गई । चातुर्मास का कार्यक्रम यथा विधि आरंभ हो गया । 
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प्रात: समय पर दादूवाणी की कथा, कीर्तन मध्यदिन में कथा, कीर्तन, सायं आरती, अष्टक , नामध्वनि, एकादशी आदि को जागरण आदि सब सविधि होने लगे । अन्त के दिनों में आसपास के स्थानधारी संतों की तथा भक्तों की रसोइयां आने लगीं थीं । अच्छा जनसमुदाय बना रहता था । संत सेवा का अच्छा प्रबन्ध था । चातुर्मास समाप्ति पर आचार्यजी को मर्यादानुसार भेंट, संतों को वस्त्र देकर विदा किया था ।
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निवाई जमात में गमन ~ 
पापडदा का चातुर्मास करके आचार्य निवाई की जमात में पधारे । जमात में संतों का अच्छा समागम रहा । अच्छी रसोइयां हुई । सत्संग भी बहुत अच्छा हुआ । निवाई से विदा होकर रामत में मार्ग की धार्मिक जनता को निर्गुण भक्ति का उपदेश करते हुये शनै: शनै: नारायणा दादूधाम में पधार गये । 
(क्रमशः) 

*१५. मन कौ अंग ३३/३६*

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१५. मन कौ अंग ३३/३६*
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सुन्दर अरहट माल पुनि, चरखा बहुरि फिरात । 
धूंवा ज्यौं मन उठि चलै, कापै पकर्यौ जात ॥३३॥
महाराज श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - प्राणियों का मन लोक में उसी प्रकार घूमता रहता है जैसे अरहट या सूत कातने का चरखा चलता रहता है । आश्रयस्थान से निकलने के बाद इस को उसी प्रकार नियन्त्रित नहीं किया जा सकता, जैसे आकाश में पहुँचा हुआ अग्नि का धूंआ किसी की पकड़(नियन्त्रण) से बाहर हो जाता है ॥३३॥
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मन बसि करने कहत हैं, मन कै बसि ह्वै जांहि । 
सुन्दर उलटा पेच है, समझि नहीं घट मांहिं ॥३४॥
आज कल के पाषण्डी गुरु अपने शिष्यों को ऐसे मन पर निग्रह करने का उपदेश करते हैं; परन्तु स्वयं उसके वश में(अधीन) रहते हैं । यद्यपि देखने समझने में यह बात विपरीत सी लगती है; परन्तु यह उन(गुरुओं) का बुद्धिभ्रम(पेच) है; क्योंकि वे यथार्थ में ज्ञानी नहीं है ॥३४॥
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मन कौं मारत बैठि करि, मन मारै वै अंध । 
सुन्दर घोरे चढन को, घोरा बैठ्यौ कंध ॥३५॥
पाषण्डी शिष्य : ऐसे पाषण्डी गुरुओं द्वारा उपदिष्ट शिष्य अपने मन को नियन्त्रित करने हेतु आराधना आरम्भ करते हैं; परन्तु वे स्वयं उस मन के नियन्त्रण में हो जाते हैं । उन ने मन में कल्पना की घोड़े पर चढने की; परन्तु वह अनियन्त्रित घोड़ा उन पर ही चढ बैठता है ॥३५॥
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सुन्दर करत उपाइ बहु, मन नहिं आवै हाथ । 
कोई पीवै पवन कौं, कोई पीवै काथ ॥३६॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - ऐसे मिथ्योपदिष्ट शिष्य अपने मन को निगृहीत करने के अनेक उपाय करते हैं; परन्तु उन उपायों से उन का मन उनके अधीन नहीं हो पाता । उन में से कोई वायु पीकर ही अपने मन को वश में करना चाहता है, या कोई अन्य साधक, वैसा करने हेतु कुछ विशिष्ट औषधियों से बना क्वाथ(काढा) पीने लगता है ॥३६॥
(क्रमशः) 

कामिनीकांचन-त्याग – संन्यास

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🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*दादू यहु घट दीपक साध का,*
*ब्रह्म ज्योति प्रकाश ।*
*दादू पंखी संतजन, तहाँ परैं निज दास ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*(७)कामिनीकांचन-त्याग – संन्यास*
एक दिन श्रीरामकृष्ण और विजयकृष्ण गोस्वामी दक्षिणेश्वर के कालीमन्दिर में वार्तालाप कर रहे थे ।
श्रीरामकृष्ण - (विजय के प्रति) - कामिनी-कांचन का त्याग किये बिना लोक-शिक्षा नहीं दी जा सकती । देखो न, यही न कर सकने के कारण केशव सेन का अन्त में क्या हुआ ! तुम स्वयं ऐश्वर्य में, कामिनी-कांचन के भीतर रहकर यदि कहो 'संसार अनित्य है, ईश्वर ही नित्य है', तो कौन तुम्हारी बात सुनेगा ? तुम अपने पास तो गुड़ का घड़ा रखे हुए हो, और दूसरों से कह रहे हो - 'गुड़ न खाना !' इसीलिए सोच समझकर चैतन्यदेव ने संसार छोड़ा था । नहीं तो जीव का उद्धार नहीं होता ।
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विजय - जी हाँ, चैतन्यदेव ने कहा था, 'कफ हटाने के लिए पिप्पल-खण्ड*(*पिप्पल-खण्ड का मतलब है नवद्वीप में हरिनाम का प्रचार ।) तैयार किया, परन्तु परिणाम उल्टा हुआ, कफ बढ़ गया ।' नवद्वीप के अनेक लोग हँसी उड़ाने लगे और कहने लगे, 'निमाई पण्डित मजे में है जी, सुन्दर स्त्री, मान-सन्मान, धन की भी कमी नहीं है, बड़े मजे में है ।'
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श्रीरामकृष्ण - केशव यदि त्यागी होता, तो अनेक काम होते । बकरे के बदन पर घाव रहने से वह देव-सेवा के काम में नहीं आता, उसकी बलि नहीं दी जाती । त्यागी हुए बिना व्यक्ति लोक-शिक्षा का अधिकारी नहीं बनता । गृहस्थ होने पर कितने लोग उसकी बात सुनेंगे ?
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स्वामी विवेकानन्द कामिनी-कांचनत्यागी हैं, इसीलिए उनका ईश्वर के विषय में लोक-शिक्षा देने का अधिकार है । विवेकानन्दजी वेदान्त तथा अंग्रेजी भाषा व दर्शन आदि के अग्रगण्य पण्डित हैं; वे असाधारण भाषणपटु हैं; क्या उनका माहात्म्य इतना ही है ? इसका उत्तर श्रीरामकृष्ण ने दिया था । दक्षिणेश्वर के कालीमन्दिर में भक्तों को सम्बोधित कर श्रीरामकृष्णदेव ने १८८२ ई. में स्वामी विवेकानन्द के सम्बन्ध में कहा था –
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"इस लड़के को देख रहे हो, यहाँ पर एक तरह का है । उत्पाती लड़के जब बाप के पास बैठते हैं तो मानो भीगी बिल्ली बन जाते हैं । फिर चाँदनी में जब खेलते हैं, उस समय उनका रूप दूसरा ही होता है । ये लोग नित्यसिद्ध के स्तर के हैं । ये लोग कभी संसार में आबद्ध नहीं होते । थोड़ी उम्र में ही इन्हें चैतन्य होता है और भगवान की ओर चले जाते हैं । ये लोग लोक-शिक्षा के लिए संसार में आते हैं, इन्हें संसार की कोई भी चीज अच्छी नहीं लगती - ये कभी भी कामिनी-कांचन में आसक्त नहीं होते ।
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“वेद में 'होमा' पक्षी का उल्लेख है । आकाश में खूब ऊँचाई पर वह चिड़िया रहती है । वहीं आकाश में ही वह अण्डा देती है । अण्डा देते ही अण्डा नीचे गिरने लगता है । अण्डा गिरते गिरते फूट जाता है । तब बच्चा गिरने लगता है । गिरते गिरते उसकी आँखे खुल जाती हैं और पंख निकल आते हैं । आँखें खुलते ही वह देखता है कि वह गिर रहा है और जमीन पर गिरते ही उसकी देह चकनाचूर हो जायगी । तब वह पक्षी अपनी माँ की ओर देखता है, और ऊपर की ओर उड़ान लेता है और ऊपर उठ जाता है ।"
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विवेकानन्द वही 'होमा पक्षी' हैं - उनके जीवन का एकमात्र लक्ष्य है उड़कर माँ के पास ऊपर उठ जाना - देह के जमीन से टकराने के पहले ही अर्थात् संसार से सम्बन्ध होने से पहले ही, ईश्वरलाभ के पथ पर अग्रसर हो जाना ।
श्रीरामकृष्ण ने ईश्वरचन्द्र विद्यासागर से कहा था, - "पाण्डित्य ! केवल पाण्डित्य से ही क्या होगा ? गिद्ध भी काफी ऊँचा उड़ता है, परन्तु उसकी दृष्टि रहती है जमीन पर मुर्दों की ओर - कहाँ सड़ा मुर्दा पड़ा है । पण्डित अनेक श्लोक झाड़ सकते हैं, परन्तु मन कहाँ है ? यदि ईश्वर के चरणकमलों में हो, तो मैं उसे सम्मान देता हूँ, यदि कामिनी-कांचन की ओर हो, तो वह मुझे कूड़ा-कर्कट जैसा लगता है ।"
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स्वामी विवेकानन्द केवल पण्डित ही नहीं, वे साधु महापुरुष थे । केवल पाण्डित्य के लिए ही अंग्रेजों तथा अमरीकानिवासियों ने भृत्यों की तरह उनकी सेवा नहीं की थी । उन्होंने जान लिया था कि ये एक दूसरे ही प्रकार के व्यक्ति हैं । अन्य सब लोग सम्मान, धन, इन्द्रियसुख, पण्डिताई आदि लेकर रहते हैं पर इनका लक्ष्य है ईश्वरप्राप्ति ।
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'संन्यासी के गीत' में स्वामीजी ने कहा है कि संन्यासी कामिनी-कांचन का त्याग करेगा –
"... करते निवास जिस उर में मद काम लोभ औ' मत्सर,
उसमें न कभी हो सकता आलोकित सत्य-प्रभाकर;
भार्यत्व कामिनी में जो देखा करता कामुक बन,
वह पूर्ण नहीं हो सकता, उसका न छूटता बन्धन;
लोलुपता है जिस नर की स्वल्पातिस्वल्प भी धन में,
वह मुक्त नहीं हो सकता, रहता अपार बन्धन में;
जंजीर क्रोध की जिसको रखती है सदा जकड़कर,
वह पार नहीं कर सकता दुस्तर माया का सागर ।
इन सभी वासनाओं का अतएव त्याग तुम कर दो,
सानन्द वायुमण्डल को बस एक गूँज से भर दो –
'ॐ तत् सत् ॐ !’ ...” -'कवितावली' से उद्ध्रत
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अमरीका में उन्हें प्रलोभन कम नहीं मिला था । इधर विश्वव्यापी यश, उस पर सदा ही परम सुन्दरी उच्चवंशीय सुशिक्षित महिलाएँ उनसे वार्तालाप तथा उनकी सेवा-टहल किया करती थीं । स्वामीजी में इतनी मोहिनी शक्ति थी कि उनमें से कई उनसे विवाह करना चाहती थीं । एक अत्यन्त धनी व्यक्ति की लड़की ने तो एक दिन आकर उनसे यहाँ तक कह दिया, "स्वामी ! मेरा सब कुछ एवं स्वयं को भी मैं आपको सौंपती हूँ ।" स्वामीजी ने उसके उत्तर में कहा, 'भद्रे, मैं संन्यासी हूँ, मुझे विवाह नहीं करना है । सभी स्त्रियाँ मेरी माँ जैसी है ।'
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धन्य हो वीर ! तुम गुरुदेव के योग्य ही शिष्य हो ! तुम्हारी देह में वास्तव में पृथ्वी की मिट्टी नहीं लगी है, तुम्हारी देह में कामिनी-कांचन का दाग तक नहीं लगा है । तुम प्रलोभन के देश से दूर न भागकर, उसी में रहकर, श्री की नगरी में रहकर ईश्वर के पथ में अग्रसर हुए हो ! तुमने साधारण जीव की तरह दिन बिताना नहीं चाहा । तुम देवभाव का जीता-जागता उदाहरण छोड़कर इस मर्त्यलोक को छोड़ गये हो !
(क्रमशः)

गुरुवार, 1 जनवरी 2026

श्रीरामकृष्ण और पापवाद

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🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*जब मानसरोवर पाइये, तब छीलर को छिटकाइ ।*
*दादू हंसा हरि मिले, तब कागा गये बिलाइ ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*(६)श्रीरामकृष्ण और पापवाद*
स्वामीजी के गुरुदेव भगवान श्रीरामकृष्ण कहा करते थे, "ईश्वर का नाम लेने से तथा आन्तरिकता के साथ उनका चिन्तन करने से पाप भाग जाता है - जिस प्रकार रूई का पहाड़ आग लगते ही क्षण भर में जल जाता है, अथवा वृक्ष पर बैठे हुए पक्षी ताली बजाते ही उड़ जाते हैं ।" एक दिन केशवबाबू के साथ वार्तालाप हो रहा था –
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श्रीरामकृष्ण - (केशव के प्रति) - मन से ही बद्ध और मन से ही मुक्त है । मैं मुक्त पुरुष हूँ, - संसार में रहूँ या जंगल में - मुझे कैसा बन्धन ? मैं ईश्वर की सन्तान हूँ, राजाधिराज का पुत्र हूँ, मुझे भला कौन बाँधकर रखेगा ? यदि साँप काटे, तो 'विष नहीं है, विष नहीं है' ऐसा जोर देकर कहने से विष उतर जाता है । उसी प्रकार 'मैं बद्ध नहीं हूं.' 'मैं बद्ध नहीं हूँ,' 'मैं मुक्त हूँ' इस बात को जोर देकर कहते कहते वैसा ही बन जाता है - मुक्त ही हो जाता है ।
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"किसी ने ईसाइयों की एक पुस्तक(Bible) दी थी । मैंने उसे पढ़कर सुनाने के लिए कहा, उसमें केवल 'पाप' और 'पाप' था !
"तुम्हारे ब्राह्मसमाज में भी केवल 'पाप' और 'पाप' है ! जो बार बार कहता है 'मैं बद्ध हूँ' 'मैं बद्ध हैं' वह अन्त में बद्ध ही हो जाता है । जो दिन-रात 'मैं पापी हूँ' 'मैं पापी हूँ' ऐसा कहता रहता है वह वैसा ही बन जाता है !
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"ईश्वर के नाम पर ऐसा विश्वास होना चाहिए - 'क्या ! मैंने ईश्वर का नाम लिया, अब भी मेरा पाप रहेगा ? मेरा अब बन्धन क्या है, पाप क्या है ?' कृष्णकिशोर परम हिन्दू सदाचारी ब्राह्मण है । वह वृन्दावन गया था । एक दिन घूमते-घूमते उसे प्यास लगी । एक कुएँ के पास जाकर देखा - एक आदमी खड़ा है । उससे कहा, 'अरे, तू मुझे एक लोटा जल दे सकेगा ? तेरी क्या जात है ?' उसने कहा, 'पण्डितजी, मैं नीच जाति का हूँ - मोची हूँ ।' कृष्णकिशोर ने कहा, 'तू 'शिव' कह और जल खींच दे ।'
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"भगवान का नाम लेने से देह-मन शुद्ध हो जाते हैं । केवल 'पाप' और 'नरक' की ये सब बातें क्यों ? एक बार कहो कि मैंने जो कुछ अनुचित काम किया है वह अब और नहीं करूँगा । साथ ही ईश्वर के नाम पर विश्वास करो ।"
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स्वामीजी ने भी ईसाइयों के इस पापवाद के सम्बन्ध में कहा है, "पापी क्यों ? तुम लोग अमृत के अधिकारी हो(Sons of Immortal Bliss) ! तुम्हारे धर्माचार्य जो दिनरात नरकाग्नि की बातें बताया करते हैं, उसे मत सुनो !" –
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"... तो तुम तो ईश्वर की सन्तान हो, अमर आनन्द के अधिकारी हो, पवित्र और पूर्ण आत्मा हो । तुम इस मर्त्यभूमि पर देवता हो, तुम पापी ? मनुष्य को पापी कहना ही महा पाप है । विशुद्ध मानव आत्मा को तो यह मिथ्या कलंक लगाना है । उठो ! आओ ! ऐ सिंहो ! तुम भेड़ हो इस मिथ्या भ्रम को झटककर दूर फेंक दो । तुम तो जरा-मरण-रहित एवं नित्यानन्दस्वरूप आत्मा हो । तुम जड़ पदार्थ नहीं हो । तुम शरीर नहीं हो । जड़ पदार्थ तो तुम्हारा गुलाम है, तुम उसके गुलाम नहीं ।....” -'हिन्दू धर्म' से उद्ध्रत
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अमरीका में हार्टफोर्ड नामक स्थान पर स्वामीजी भाषण देने के लिए आमन्त्रित हुए थे । यहाँ के अमरीकन कॉनसल(Consul) पैटर्सन उस समय वहाँ पर उपस्थित थे तथा सभापति थे । स्वामीजी ने ईसाइयों के पापवाद के सम्बन्ध में कहा था – "... वह क्या लोगों को घुटने टेककर यह चिल्लाने की सलाह दे कि 'ओह, हम कितने पापी हैं !' नहीं, प्रत्युत आओ, हम उन्हें उनके दैवी स्वरूप का ख्याल करा दें । ...
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यदि कमरा अँधेरा हो तो क्या तुम अपनी छाती पीटते हुए यह चिल्लाते जाते हो कि 'कमरा अँधेरा है !' 'कमरा अँधेरा है ।' नहीं, उजाला करने का एक मात्र उपाय है रोशनी जलाना, और तब अँधेरा भाग जाता है । उसी प्रकार आत्मज्योति के दर्शन का एकमात्र उपाय है अन्दर में आध्यात्मिक ज्योति जलाना, और तब पाप और अपवित्रता-रूपी अन्धकार दूर भाग जायगा । अपने उच्चतर स्वरूप का चिन्तन करो, क्षुद्र स्वरूप का नहीं ।"
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फिर स्वामीजी ने एक कहानी*(*यह कहानी सांख्यदर्शन में है- आख्यायिका-प्रकरण) सुनायी, जो उन्होंने श्रीरामकृष्णदेव से सुनी थी -
"एक बाघिनी ने बकरों के एक झुण्ड पर आक्रमण किया । वह पूर्ण गर्भवती थी, इसलिए कूदते समय उसे बच्चा पैदा हो गया । बाघिनी वहीं मर गयी । बच्चा बकरों के साथ पलने लगा और उनके साथ घास खाने लगा तथा 'में' 'में' भी कहने लगा । कुछ दिनों बाद वह बच्चा बड़ा हुआ ।
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एक दिन उस बकरों के झुण्ड पर एक बाघ ने आक्रमण किया । वह बाघ यह देखकर हैरान रह गया कि एक बाघ घास खा रहा है तथा 'में' 'में' कर रहा है और उसे देखकर बकरों की तरह भाग रहा है । तब वह उसे पकड़कर जल के पास ले गया और कहा, 'देख, तू भी बाघ है, तू घास क्यों खा रहा है और 'में' 'में' क्यों कर रहा है ? - देख, मैं कैसा माँस खाता हूँ । ले तू भी खा । और जल में देख, तेरा चेहरा भी कैसा बिलकुल मेरे ही जैसा है ।' उस छोटे बाघ ने वह सब देखा, माँस का आस्वादन किया और अपना असली रूप पहचान गया ।"
(क्रमशः)

*१५. मन कौ अंग २९/३२*

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१५. मन कौ अंग २९/३२*
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ज्यौं बाजीगर करत है, कागद मैं हथफेर । 
सुन्दर ऐसैं जानिये, मन मैं धरन सुमेर ॥२९॥
हमारा मन भी कभी कभी बाजीगर के समान ही ऐसा हस्तकौशल(हथफेरी) दिखाता रहता है । वह अपनी कल्पना में कभी पृथ्वी को सुमेरु(पर्वत) एवं कभी पर्वत को पृथ्वी बनाता रहता है ॥२९॥
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सुन्दर यह मन भूत है, निस दिन बकतें जाइ । 
चिन्ह करै रोवै हंसै, खातें नहीं अघाइ ॥३०॥
हमारा यह मन कभी किसी भूत प्रेत के समान निरर्थक प्रलाप(अप्रासङ्गिकः बातें) भी करने लगता है । वह कभी कभी अकारण ही रोने या हँसने लगता है । कभी कोई पदार्थ इतना खाने(भोगने) लगता है कि उससे इस की तृप्ति(सन्तोष) ही प्रतीत नहीं होती ! ॥३०॥
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सुन्दर यह मन चपल अति, ज्यौं पीपर कौं पांन । 
बार बार चलिबौ करै, हाथी कौ सौ कांन ॥३१॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - प्राणियों का मन इतना चञ्चल होता है कि इस की तुलना पीपल वृक्ष के पत्ते से या हाथी के कान से ही की जा सकती है । अर्थात् यह भी पीपल के पत्ते के समान अपनी चञ्चलता दिखाता हुआ निरन्तर इधर उधर की सांसारिक बातों में चलायमान ही रहता है ॥३१॥
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सुन्दर यह मन यौं फिरै, पांनी कौ सौ घेर । 
बायु बघूरा पुनि ध्वजा, यथा चक्र कौ फेर ॥३२॥
प्राणियों का मन जल में पड़ी हुई भँवरी(जलावर्त) या वात्याचक्र(तूफान) के समान निरन्तर इधर उधर उसी प्रकार चक्कर लगाता रहता है, जैसे गाड़ी का चक्का निरन्तर घूमा करता है ॥३२॥
(क्रमशः)

जयपुर राज्य की रसोई

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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१२ आचार्य नारायणदास जी ~
जयपुर राज्य की रसोई ~  
नारायणा दादूधाम में फाल्गुण शुक्ला में होने वाले मेले के समय में एक दिन की रसोई जयपुर राज्य की ओर से होती थी । उसका सब प्रबन्ध जयपुर राज्य के कर्मचारी ही करते थे । जयपुर राज्य के उस समय रसोई के ७५०) रु. लगते थे । किन्तु आगे चलकर ७५०) रु. नारायणा दादूधाम के आचार्य जी के पास मेले से पहले ही भेज देते थे । 
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उसका प्रबन्ध साधु ही करते थे । फिर वे रु. जयपुर राज्य से आने बन्द हो गये । तब आचार्य नारायणदासजी महाराज ने ता. २२ अक्टूबर सन् १८४९ को जयपुर नरेश स्मरण कराया कि - नारायणा दादूधाम के मेले के अवसर पर साधुओं के भोजन के लिये जो आपके राज्य से ७५०) रु. वार्षिक आते थे वे बन्द हैं, नहीं आ रहे हैं । 
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तब जयपुर नरेश ने उसी वर्ष अपने मंत्री को पूछा कि जो नारायणा दादूधाम दादूद्वारे के मेले के समय साधुओं के एक दिन के भेाजन के लिये ७५०) रु. सदा जयपुर राज्य से जाते थे, वे बन्द क्यों कर दिये हैं ? वे पुन: पूर्ववत मेले से पहले भेज देने चाहिये । 
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यह रसोई हमारे पूर्वज नरेशों द्वारा जब से मेला भरना आरंभ हुआ है तब से ही दी जा रही है । अत: यह बन्द नहीं होनी चाहिये । राजा की आज्ञा होने पर उसी वर्ष मेले से पहले ही ७५०) रु. नारायणा दादूधाम में पहुँचा दिये और प्रति वर्ष मेले से पहले ही पहुँचाने लगे । जब तक प्रजातंत्र नहीं हुआ था, तब तक वे ७५०) रु. ठीक समय पर आते रहते थे । 
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प्रजातंत्र होने पर बन्द हो गये मेले पर अन्य रसोइयां मेले के समय राजस्थान तथा अन्य प्रान्तों के बडे छोटे नरेशो की तथा सेठों की रसोइयां भी आती थीं । किन्तु जयपुर राज्य की रसोई के समान प्रति वर्ष नियम पूर्वक नहीं आती थी । जब जिनकी इच्छा होती थी तब वे भेज देते थे तथा स्वयं मेले में आकर संत दर्शन करते थे और रसोई भी देते थे । आगे चलकर स्थानधारी साधुओं की भी रसोइयां होना आरंभ हो गया था, सो अब तक होती ही रहती हैं ।
(क्रमशः)  

बुधवार, 31 दिसंबर 2025

ईश्वर साकार हैं या निराकार

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🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*ये दोनों ऐसी कहैं, कीजे कौन उपाइ ।*
*ना मैं एक, न दूसरा, दादू रहु ल्यौ लाइ ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*(५)ईश्वर साकार हैं या निराकार*
एक दिन स्वर्गीय केशवचन्द्र सेन शिष्यों को साथ लेकर दक्षिणेश्वर के काली-मन्दिर में श्रीरामकृष्णदेव का दर्शन करने गये । केशव के साथ निराकार के सम्बन्ध में अनेक बातें होती थीं । 
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श्रीरामकृष्णदेव उनसे कहा करते थे, "मैं प्रतिमा में मिट्टी या पत्थर की काली नहीं देखता, मैं तो उसमें चिन्मयी काली देखता हूँ । जो ब्रह्म हैं, वे ही काली हैं । वे जिस समय क्रियारहित हैं, उस समय ब्रह्म; जब सृष्टि-स्थिति-प्रलय करती हैं, उस समय काली, अर्थात् जो काल के साथ रमण करती हैं । काल अर्थात् ब्रह्म ।"
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उन दोनों में एक दिन निम्नलिखित वार्तालाप हो रहा था ~
श्रीरामकृष्ण - (केशव के प्रति) - किस प्रकार, जानते हो ! मानो सच्चिदानन्दरूपी समुद्र है, कहीं किनारा नहीं है । भक्तिरूपी हिम के कारण इस समुद्र में स्थान-स्थान पर जल बरफ के आकार में जम जाता है । अर्थात् भक्त के पास वे प्रत्यक्ष होकर कभी कभी साकार रूप में दर्शन देते हैं ।
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फिर ब्रह्मज्ञानरूपी सूर्य के उदय होने पर वह बरफ गल जाती है - अर्थात् 'ब्रह्म सत्य जगत् मिथ्या' इस विचार के बाद समाधि होने पर रूप आदि सब अदृश्य हो जाते हैं । उस समय वे क्या हैं, मुख से कहा नहीं जा सकता - मन, बुद्धि, अहं के द्वारा उन्हें पकड़ा नहीं जा सकता ।
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"जो व्यक्ति एक सत्य को जानता है, वह दूसरे को भी जान सकता है । जो निराकार को जान सकता है, वह साकार को भी जान सकता है । जब तुम उस मुहल्ले में गये ही नहीं तो कहाँ श्यामपुकुर है, और कहाँ तेलीपाड़ा, कैसे जानोगे ?"
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श्रीरामकृष्णदेव यह भी समझा रहे हैं कि सभी निराकार के अधिकारी नहीं हैं, इसीलिए साकार पूजा की विशेष आवश्यकता है । उन्होंने कहा, -"एक माँ के पाँच लड़के हैं । माँ ने कई प्रकार की तरकारियाँ बनायी हैं, जिसके पेट में जो सहन होता हो ।"
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इस देश में साकार पूजा होती है । ईसाई मिशनरीगण अमरीका व यूरोप में इस देश के निवासियों को असभ्य जाति कहकर वर्णन करते हैं । वे कहते हैं कि भारतीयगण मूर्ति की पूजा करते हैं, और उनकी बड़ी दयनीय स्थिति है ।
स्वामी विवेकानन्द ने इस साकार पूजा का अर्थ अमरीका में पहले-पहल समझाया । उन्होंने कहा कि भारतवर्ष में 'मूर्ति' की पूजा नहीं होती । -
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.... मैं पहले ही तुम्हें बता देना चाहता हूँ कि भारतवर्ष में अनेकेश्वरवाद नहीं है । प्रत्येक मन्दिर में यदि कोई खड़ा होकर सुने, तो वह यही पाएगा कि भक्तगण सर्वव्यापित्व से लेकर ईश्वर के सभी गुणों का आरोप उन मूर्तियों में करते हैं ।..." -'हिन्दू धर्म' से उद्ध्रत
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स्वामीजी मनोविज्ञान (Psychology) की सहायता से समझाने लगे कि ईश्वर का चिन्तन करने में साकार चिन्तन को छोड़ अन्य कुछ भी नहीं आ सकता । उन्होंने कहा –
"... ईश्वर यदि सर्वव्यापी हैं तो फिर ईसाई लोग गिरजाघर में क्यों उसकी आराधना के लिए जाते हैं ? क्यों वे क्रास को इतना पवित्र मानते हैं ? प्रार्थना के समय आकाश की ओर मुँह क्यों करते हैं ? कैथलिक ईसाइयों के गिरजाघरों में इतनी बहुतसी मूर्तियाँ क्यों रहा करती हैं ? और प्रोटेस्टेन्ट ईसाइयों के हृदय में प्रार्थना के समय इतनी बहुतसी भावमयी मूर्तियाँ क्यों रहा करती हैं ?
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मेरे भाइयों ! मन में किसी मूर्ति के बिना आये कुछ सोच सकना उतना ही असम्भव है, जितना कि श्वास लिए बिना जीवित रहना । ... सच पूछिये तो दुनिया के प्रायः सभी मनुष्य सर्वव्यापित्व का क्या अर्थ समझते हैं ? - कुछ नहीं ! ... क्या परमेश्वर का भी कोई क्षेत्रफल है ? अगर नहीं, तो जिस समय हम सर्वव्यापी शब्द का उच्चारण करते हैं, उस समय विस्तृत आकाश या विशाल भूमिखण्ड की कल्पना हम अपने मन में लाते हैं । इससे अधिक और कुछ नहीं ।..." -'हिन्दू धर्म' से उद्ध्रत
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स्वामीजी ने और भी कहा, "अधिकारियो की भिन्नता के अनुसार साकार पूजा और निराकार पूजा होती है । साकार पूजा कुसंस्कार नहीं है - मिथ्या नहीं है, वह एक निम्न श्रेणी का सत्य है ।" –
"... अगर कोई मनुष्य अपने ब्रह्मभाव को मूर्ति के सहारे अधिक सरलता से अनुभव कर सकता है, तो क्या उसे पाप कहना ठीक होगा ? और जब वह उस अवस्था से परे पहुँच गया है, तब भी उसके लिए मूर्तिपूजा को भ्रमात्मक कहना उचित नहीं है । हिन्दू की दृष्टि में मनुष्य असत्य से सत्य की ओर नहीं जा रहा है, वह तो सत्य से सत्य की ओर, निम्न श्रेणी के सत्य से उच्च श्रेणी के सत्य की ओर अग्रसर हो रहा है ।..." - 'हिन्दू धर्म' से उद्धृत
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स्वामीजी ने कहा, सभी के लिए एक नियम नहीं हो सकता । ईश्वर एक हैं, परन्तु वे भक्तों के पास अनेक रूपों में प्रकट हो रहे हैं । हिन्दू इस बात को समझते हैं । -
"... विभिन्नता में एकता यही प्रकृति की रचना है और हिन्दुओं ने इसे भलीभाँति पहचाना है । अन्य धर्मों में कुछ निर्दिष्ट मतवाद विधिबद्ध कर दिये गये हैं और सारे समाज को उन्हें मानना अनिवार्य कर दिया जाता है ।
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वे तो समाज के सामने केवल एक ही नाप की कमीज रख देते हैं, जो राम, श्याम, हरि सब के शरीर में जबरदस्ती ठीक होनी चाहिए । और यदि वह कमीज राम या श्याम के शरीर में ठीक नहीं बैठती, तो उसे नंगे बदन - बिना कमीज के ही रहना होगा । हिन्दुओं ने यह जान लिया है कि निरपेक्ष ब्रह्म-तत्त्व की उपलब्धि, धारणा या प्रकाश केवल सापेक्ष के सहारे से ही हो सकता है । ..." -'हिन्दू धर्म' से उद्ध्रत 
(क्रमशः)

*१५. मन कौ अंग २५/२८*

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१५. मन कौ अंग २५/२८*
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सुन्दर यह मन भ्रमर है, सूंघत रहै सुगंध । 
कंवल माहिं निकसै नहीं, काल न देखै अंध ॥२५॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं कि हमारा यह मन भ्रमर के समान गन्ध का भी इतना लोभी है कि वह सुगन्धमय कमल पुष्पों से दूर होना ही नहीं चाहता । इसे इस सुगन्ध में अति अनुराग से अपनी मृत्यु का भी भय नहीं लगता ॥२५॥
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सुन्दर यह मन मीन है, बंधै जिह्वा स्वाद । 
कंटक काल न सूझई, करत फिरै उदमाद ॥२६॥ 
महाराज श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - हम को हमारा यह मन मीन के समान जिव्हा का दास प्रतीत होता है; क्योंकि यह भी उसी के तुल्य, विविध खाद्य पदार्थों के रसों के आस्वाद में लुब्ध रहता है । वह इस रस-लोभ में ऐसा मोहान्ध हो गया है कि इसे उस रस के पीछे छिपा हुआ उस का मृत्युकण्टक भी नहीं दिखायी देता ॥२६॥
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सुन्दर मन गजराज ज्यौं, मत्त भयौ सुध नांहिं । 
काम अंध जानै नहीं, परै खाड के मांहिं ॥२७॥
कभी कभी हमारा मन उस मत्त हाथी के समान अपनी चेष्टाएँ करने लगता है । तथा यह इन में इतना उन्मत्त हो जाता है कि उसे अपना यथार्थ भी स्मरण नहीं रहता । यह कभी उसी उन्मत्त अवस्था में नारी के पीछे दौड़ता हुआ खड्डे(गर्त) में गिर कर अपने प्राण भी सङ्कट में डाल लेता है ॥२७॥
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सुन्दर यह मन करत है, बाजीगर कौ ख्याल । 
पंख परेवा पलक मैं, मुवो जिवावत ब्याल ॥२८॥
हमारा यह मन बाजीगर के समान नित्य नये खेल(=तमाशा) करता रहता है । कभी पंख लगाकर किसी पक्षी के समान आकाश में अनेक कौतुक दिखाता है तो कभी मृत सर्प को जीवित करने का अभिनय करता है ॥२८॥
(क्रमशः)

जोधपुर से टीका की भेंट ~

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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१२ आचार्य नारायणदास जी ~
जोधपुर से टीका की भेंट ~
आचार्य नारायणादासजी महाराज के गद्दी पर बैठने के समय किसी कारण से जोधपुर नरेश की ओर से टीका की भेंट नहीं आ सकी थी । वह वि. सं. १९०४ आश्‍विन शुक्ला ५ को आई । आचार्य नारायणादासजी महाराज ने उसे स्वीकार करके अपनी परंपरा के अनुसार नारायणा दादूधाम से प्रसाद व शुभाशीर्वाद भेज दिया । 
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सुखभजनजी के चातुर्मास ~
वि. सं. १९०४ का चातुर्मास आचार्य नारायणादासजी महाराज ने सुखभजनजी लोरडी वालों का माना था । इस चातुर्मास में चातुर्मास की मर्यादा के अनुसार दादूवाणी आदि का प्रवचन सत्संग भजन- कीर्तन जागरण आदि सभी कार्य नियम पूर्वक होते रहे थे । 
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संत- सेवा में किसी प्रकार की त्रृटि नहीं आने दी थी । समाप्ति पर आचार्य नारायणादासजी महाराज को मर्यादानुसार भेंट, भंडारी आदि कर्मचारियों को उनका दस्तूर तथा सब संतों को वस्त्र देकर प्रसन्न किया था । उक्त प्रकार अच्छा चातुर्मास कराकर आचार्यजी की तथा सब संतों की आशीर्वाद लेकर, सब को सस्नेह विदा किया था ।
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जमातरामगढ का चातुर्मास ~ 
वि. सं. १९०५ का चातुर्मास आचार्य नारायणदासजी महाराज ने शिष्य मंडल के सहित बडी जमात रामगढ में किया था । इस चातुर्मास में भी दादूवाणी का प्रवचन आदि सत्संग, जागरण, भजन- कीर्तन, नाम ध्वनि आदि बहुत अच्छी प्रकार होते रहे थे । रसोइयां बहुत हुई थीं । 
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आचार्यजी सहित सब प्रसन्न रहे थे । भजन ध्यानादि साधन में किसी भी प्रकार का विध्न नहीं आया था । चातुर्मास समाप्ति पर मर्यादानुसार आचार्यजी को भेंट, भंडारी आदि कर्मचारियों को उनका, दस्तूर, सब संतों को वस्त्रादि देकर संतुष्ट किया था तथा सत्कार पूर्वक रामगढ से विदा किया था ।
(क्रमशः) 

मंगलवार, 30 दिसंबर 2025

ईश्वर का दर्शन ही जीवन का उद्देश्य

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🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*लिपै छिपै नहिं सब करै, गुण नहिं व्यापे कोइ ।*
*दादू निश्‍चल एक रस, सहजैं सब कुछ होइ ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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ईश्वर का दर्शन ही जीवन का उद्देश्य है, और इस देश की यही एक विशेषता है । पहले यह और उसके बाद दूसरी बातें । पहले से ही राजनीति की बातें करने से न चलेगा, पहले एकचित्त होकर भगवान का ध्यान-चिन्तन करो, हृदय के बीच में उनके अनुपम रूप का दर्शन करो ।
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उन्हें प्राप्त करने के बाद तब स्वदेश का कल्याण कर सकोगे; क्योंकि उस समय तुम्हारा मन अनासक्त होगा । 'मेरा देश' कहकर सेवा नहीं - 'सर्वभूतों में ईश्वर हैं' यह कहकर उनकी सेवा कर सकोगे । उस समय स्वदेश-विदेश की भेद-बुद्धि नहीं रहेगी । उस समय ठीक समझा जा सकेगा कि जीव का कल्याण किससे होता है ।
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श्रीरामकृष्णदेव कहा करते थे, "जो लोग दाँव खेलते हैं, वे खेल की चाल ठीक ठीक समझ नहीं सकते । जो लोग खेल से अलग रहकर पास बैठे-बैठे खेल देखते रहते हैं, वे दूर से अच्छी चाल दे सकते हैं ।" कारण देखनेवाला खेल में आसक्त नहीं है ।
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एकान्त में बहुत दिनों तक साधना करके राग-द्वेष से मुक्त उदासीन अनासक्त जीवन्मुक्त महापुरुष ने जो कुछ उपलब्धि की है उसके सामने उन्हें और कुछ भी अच्छा नहीं लगता -
यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः ।
यस्मिन् स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते ॥ - गीता ।
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हिन्दुओं की राजनीत्ति, समाजनीति, ये सभी धर्मशास्त्र हैं । मनु, याज्ञवल्क्य, पराशर आदि महापुरुष इन सब धर्मशास्त्रों के प्रणेता हैं । उन्हें किसी भी चीज की आवश्यकता नहीं थी । फिर भी, भगवान का निर्देश पाकर, गृहस्थों के लिए, उन्होंने शास्त्रों की रचना की है । वे उदासीन रहकर दाँव-खेल की चाल बता दे रहे हैं, इसीलिए देश-काल-पात्र की दृष्टि से उनकी बातों में एक भी भूल होने की सम्भावना नहीं है ।
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स्वामी विवेकानन्द भी कर्मयोगी हैं । उन्होंने अनासक्त होकर परोपकार-व्रतरूपी, जीव-सेवारूपी कर्म किया है; इसीलिए कर्मियों के सम्बन्ध में उनका इतना मूल्य है । उन्होंने अनासक्त होकर इस देश का कल्याण किया है, जिस प्रकार प्राचीनकाल के महापुरुषगण जीव के मंगल के लिए सदैव प्रयत्नशील रहे हैं ।
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इस निष्काम धर्म के पालन के लिए हम भी उनके चरण-चिह्नों का अनुसरण कर सकें तो कितना अच्छा हो ! परन्तु यह बात है बहुत कठिन । पहले भगवान को प्राप्त करना होगा । इसके लिए स्वामी विवेकानन्दजी की तरह त्याग और तपस्या करनी होगी । तब यह अधिकार प्राप्त हो सकता है ।
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धन्य हो तुम त्यागी वीर महापुरुष ! तुमने वास्तव में गुरुदेव के चरण-चिह्नों का अनुसरण किया है । गुरुदेव का महामन्त्र - पहले ईश्वर-प्राप्ति, उसके बाद दूसरी बात - तुम्हीं ने साधित किया है । तुम्हीं ने समझा था, ईश्वर छोड़ने पर यह संसार यथार्थ में स्वप्न की तरह है, गोरख-धन्धा है ।
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इसीलिए सब कुछ छोड़कर तुमने पहले ईश्वर-प्राप्ति की साधना की थी । जब तुमने देखा, सर्व वस्तुओं के प्राण वे ही हैं, जब तुमने देखा उनके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है, तब फिर इस संसार में तुमने मन लगाया । तब हे महायोगिन् ! सर्वभूतों में स्थित उसी हरि की सेवा के लिए तुम फिर कर्मक्षेत्र में उत्तर आये ।
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उस समय सभी तुम्हारे गम्भीर असीम प्रेम के अधिकारी बने - हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, विदेशी, स्वदेशवासी, धनी, निर्धन, नर, नारी सभी को तुमने प्रेमालिंगन-दान किया है । तुमने नारद, जनक आदि की तरह लोक-शिक्षा के लिए कर्म किया है ।
(क्रमशः)

माधोपुरा चातुर्मास ~

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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१२ आचार्य नारायणदास जी ~
माधोपुरा चातुर्मास ~ 
केवलदासजी चोहट्या माधोपुर वालों का चातुर्मास वि. सं. १९०१ का आचार्य प्रेमदास जी महाराज ने ही माना था और शेखावटी की रामत करके चातुर्मास में बैठने वाले थे किन्तु उनका स्वास्थ्य सिरोही(शेखावटी) में कुछ शिथिल हो गया था । इससे सिरोही से नारायणा दादूधाम को लौट गये और ज्येष्ठ शुक्ला १ शनिवार वि. सं. १९०१ को ब्रह्मलीन हो गये । 
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फिर केवलदासजी ने आचार्य नारायणदासजी को प्रार्थना की तब उन्होंने वि. सं. १९०२ का चातुर्मास केवलदास चोहट्या के माधोपुर में किया केवलदासजी अति श्रद्धा से संत मंडल के सहित आचार्यजी की सेवा करते थे । संतों का भी सत्संग भजन निर्विध्न चलता था । रसोइयां भी बहुत आती थी । आसपास के स्थानधारी संत तथा भक्त लोग रसोइयां लेकर आते थे । कुछ दिन ठहर कर सत्संग का आनन्द भी लेते थे । वैसे भी सत्संग और संत दर्शन के लिये आसपास के भक्त लोग आते ही रहते थे । उक्त प्रकार यह चातुर्मास अच्छा ही हुआ था । 
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चातुर्मास समाप्ति पर केवलदासजी ने आचार्यजी को मर्यादा अनुसार भेंट देकर आशीर्वाद प्राप्त किया था । संत मंडल को भी पूरा- पूरा वस्त्र देकर प्रसन्न किया था । चातुर्मास से विदा होकर रामत करते हुये नारायणा दादूधाम में पधार गये थे और कुछ समय तक वहां ही भजन करते रहे थे ।
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बीकानेर से टीका की भेंट ~ 
आचार्य नारायणादासजी महाराज के गद्दी पर विराजने के समय किसी कारण वश बीकानेर नरेश की ओर से टीका की भेंट नहीं आ सकी थी, सो वि. सं. १९०३ फाल्गुण शुक्ला ३ को बीकानेर नरेश ने- घोडा, दुशाला आदि जो परंपरा से भेजते आये थे सो टीका की भेंट भी भेजी । आचार्य नारायणादासजी महाराज ने उसे स्वीकार करके अपनी परंपरा के अनुसार बीकानेर नरेश के लिये नारायणा दादूधाम से प्रसाद व शुभाशीर्वाद भेजा ।  
(क्रमशः)  

*१५. मन कौ अंग २१/२४*

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१५. मन कौ अंग २१/२४*
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सुन्दर यहु मन स्वान है, भटकै घर घर द्वार । 
कहूंक पावै झुंठि कौं, कहूं परै वह मार ॥२१॥
श्रीसुन्दरदासजी का कहना है कि हमारा यह मन कुत्तों के समान आचरण करता हुआ घरों के द्वार द्वार पर फिरता रहता है । वहाँ वह कहीं जूंठी रोटी का एक टुकड़ा पा जाता है तो कहीं उसे लाठी की मार खाकर रोते हुए आगे भागना पड़ता है ॥२१॥
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सुन्दर यहु मन काग है, बुरौ भलौ सब खाइ । 
समुझायौ समुझै नहीं, दौरि करंक हि जाइ ॥२२॥
हमारे इस मन को कौआ भी कहा जा सकता है; क्योंकि कोए के समान यह भी इधर उधर घरों में जाकर गन्दी(सड़ी, गली) वस्तुएँ खाता रहता है । इतना ही नहीं, उसको कितना भी समझाया जाय वह अवसर मिलते ही करङ्क (अस्थि कङ्काल) जैसी अशुभ वस्तुओं की ओर दौड़ने में कोई विलम्ब नहीं करता ॥२२॥
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सुन्दर मन मृग रसिक है, नाद सुनै जब कांन । 
हलै चलै नहिं ठौर तैं, रहौ कि निकसौ प्रांन ॥२३॥
हमारा यह मन भी नादरसिक मृग के समान है । यह भी जब कहीं कर्णप्रिय नाद सुनता है तो यह वहीं अचल हो जाता है, भले ही तब इस नादश्रवण के लोभ में इसके प्राण हो क्यों न चले जाँय ! ॥२३॥
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सुंदर यह मन रूप कौ, देखत रहै लुभाइ । 
ज्यौं पतंग बसि नैंन कै, जोति देखि जरि जाइ ॥२४॥
हमारा यह मन पतङ्ग के समान रूप का लोभी भी है । जैसे पत्तङ्ग के नेत्रों में ज्योति का लोभ इतना समा जाता है कि वह उस के देखने के लोभ में अपने प्राण गवाँ बैठता है, वही स्थिति इस मन की भी है ॥२४॥
(क्रमशः)  

-'कर्मयोग' से उद्धृत

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🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*दादू चारै चित दिया, चिन्तामणि को भूल ।*
*जन्म अमोलक जात है, बैठे माँझी फूल ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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श्रीरामकृष्णदेव कहा करते थे, 'छुरे को चलाना सीखकर हाथ में छुरा लो ।' स्वामी विवेकानन्द ने दिखा दिया कि वास्तविक कर्मयोगी किसे कहते हैं । स्वामीजी जानते थे कि देश के दुःखियों की धन द्वारा सहायता करने से बढ़कर अनेक अन्य महान् कार्य हैं । ईश्वर का ज्ञान प्राप्त करा देना मुख्य कार्य है । उसके बाद विद्यादान, उसके बाद जीवनदान, उसके बाद अन्नवस्त्र-दान ।
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संसार दुःखपूर्ण है । इस दुःख को तुम कितने दिनों के लिए मिटाओगे ? श्रीरामकृष्णदेव ने कृष्णदास पाल*(*श्रीकृष्णदास पाल ने दक्षिणेश्वर में श्रीरामकृष्णदेव का दर्शन किया था ।) से पूछा था, "अच्छा, जीवन का उद्देश्य क्या है ?" कृष्णदास ने कहा था, "मेरी राय में दुनिया का उपकार करना, जगत् के दुःख को दूर करना ।"
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श्रीरामकृष्ण खेद के साथ बोले थे, "तुम्हारी ऐसी विधवा-पुत्र*(*विधवा-पुत्र जैसी बुद्धि अर्थात् हीन बुद्धि, क्योंकि ऐसे लड़के अनेक प्रकार के नीच उपाय से मनुष्य बनते हैं; दूसरों की खुशामद आदि करके ।) जैसी बुद्धि क्यों ? – जगत् के दुःखों का नाश तुम करोगे ? क्या जगत् इतना-सा ही है ? बरसात में गंगाजी में केकड़े होते हैं, जानते हो ? इसी प्रकार असंख्य जगत् हैं । इस विश्वजगत् के जो अधिपति हैं, वे सभी की खबर ले रहे हैं । उन्हें पहले जानना - यही जीवन का उद्देश्य है । उसके बाद चाहे जो करना ।"
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स्वामीजी ने भी एक स्थान में कहा है -
"... केवल आध्यात्मिक ज्ञान ही ऐसा है जो हमारे दुःखों को सदा के लिए नष्ट कर सकता है; अन्य किसी प्रकार के ज्ञान से तो हमारी आवश्यकताओं की पूर्ति केवल अल्प समय के लिए ही होती है । ... जो मनुष्य आध्यात्मिक ज्ञान देता है, वही मानव समाज का सब से बड़ा हितैषी है ।... अध्यात्मिक सहायता के बाद मानसिक सहायता का स्थान आता है । ज्ञान का दान देना, भोजन तथा वस्त्र के दान से कहीं श्रेष्ठ है । इसके बाद है जीवन-दान और चौथा है अन्न-दान । ..."
-'कर्मयोग' से उद्धृत
(क्रमशः)

सोमवार, 29 दिसंबर 2025

पटियाले पधारना ~

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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१२ आचार्य नारायणदास जी ~
पटियाले पधारना ~ 
नाभा से विदा होकर आचार्य नारायणदासी महाराज शिष्य मंडल के सहित लोक कल्याणार्थ विचरते हुये तथा स्थान- स्थान में निर्गुण भक्ति का उपदेश करते हुये पटियाला के पास पहुँचे तब पटियाला नरेश को अपने आने की सूचना दी । सूचना मिलने पर पटियाला नरेश कर्मसिंह जी स्वयं राजकीय लवाजमा लेकर भक्त जनता के साथ संकीर्तन करते हुये आचार्य नारायणदासजी महाराज की अगवानी करने आये । 
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अपनी मर्यादा के अनुसार भेंट चढा कर प्रणाम करके बैठ गये फिर आवश्यक प्रश्‍नोत्तर हो जाने के पश्‍चात् आचार्य जी को सवारी पर बैठाकर बाजा गाजा के साथ संकीर्तन करते हुये नगर की ओर चले । जनता को आचार्य जी का तथा संत मंडल का दर्शन कराने के लिये नगर के मुख्य- मुख्य भागों से निकलते हुये नियत स्थान पर ले जाकर ठहराया । 
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वहां सब प्रकार की सेवा का प्रबन्ध करके पटियाला नरेश कर्मसिंह जी ने पटियाला की धार्मिक जनता के हित के लिये कुछ दिन पटियाला में विराजने की प्रार्थना की । तब सर्व हितैषी आचार्य नारायणदासजी महाराज ने स्वीकार कर ली । फिर पटियाला में नियत समय पर प्रतिदिन सत्संग होने लगा । 
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प्रात: दादूवाणी की कथा, मध्य दिन में विद्वान् संतों द्वारा उपनिषद् आदि के प्रवचन होने लगे । सायंकाल आरती, अष्टक, गायक संतों द्वारा उच्चकोटि के संतों के पदों का गायन, नाम संकीर्तन आदि अपने- अपने समय पर होने लगे । पटियाला की धार्मिक जनता सप्रेम सत्संग में ठीक समय आती थी और स्नेह सहित श्रवण कर अपना बोध बढाती थी । बहुत- से श्रद्धालु प्रतिदिन के आचार्य जी तथा संतों दर्शन करने आते थे तथा यथा शक्ति संतों की सेवा भी करते थे । 
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उक्त प्रकार पटियाला की जनता ने आचार्य नारायणदास जी के दर्शन तथा सत्संग से अच्छा लाभ प्राप्त किया । जब आचार्य जी जाने लगे तब पटियाला नरेश कर्मसिंह जी ने तथा पटियाला नरेश कर्मसिंह जी ने तथा पटियाला की भक्त जनता ने संत मंडल के सहित आचार्य जी का भाव पूर्वक भेंट आदि से सत्कार किया और संत मंडल के सहित आचार्य नारायणदासजी महाराज को सस्नेह विदा किया ।
(क्रमशः)  


*१५. मन कौ अंग १७/२०*

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१५. मन कौ अंग १७/२०*
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सुन्दर यहु मन नीच है, करै नीच ही कर्म । 
इनि इन्द्रिनि कै बसि पर्यौ, गिनै न धर्म अधर्म ॥१७॥
हमारा मन अतिशय नीच वृत्ति वाला है; क्योंकि यह बहुत ही हीन कर्म करता है । यह इन इन्द्रियों के अधीन रहता हुआ निरन्तर हीन कर्म करते समय धर्म या अधर्म का कोई विचार नहीं करता ॥१७॥
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सुन्दर यहु मन भांड है, सदा भंडायौ देत । 
रूप धरै बहु भांति कै, राते पीरे सेत ॥१८॥
हमारा यह मन तो भांड(विदूषक) है । यह सदा हीन वृत्ति वाला अभिनय करता रहता है । यह विभिन्न प्रकार के अभिनय(रूप धारण) करता रहता है, कभी लाल, कभी पीले या कभी श्वेत ॥१८॥
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सुन्दर यहु मन डूम है, मांगत करै न संक । 
दीन भयौ जाचत फिरै, राजा होइ कि रङ्क ॥१९॥
हमारा यह मन डोम(चाण्डाल) के समान आचरण करता हुआ दिन भर गलियों में माँगता ही रहता है, ऐसा करने में इसे कोई लज्जा का भी अनुभव नहीं होता । यह तो प्रत्येक व्यक्ति से मांगते समय इतना भी ध्यान नहीं करता कि सामने वाला रंक(देने में असमर्थ) है या राजा(देने में समर्थ) ॥१९॥
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सुन्दर यहु मन रासिभौ, दौरि बिखै कौं जात । 
गदही कै पीछै फिरै, गदही मारै लात ॥२०॥
हमारा यह मन तो गदहे के समान आचरण करता है; क्योंकि यह विषयवासना में लिप्त रहता हुआ दिन रात गदहियों(कुरूप, या सुरूप नारियों) के पीछे दौड़ता रहता है । जबकि ये गदहियाँ उसे लात मारती(अपमानित करती) रहती है तो भी यह है कि उन से ऐसे अपमानित हो(लात खा) कर भी उन के पीछे ही लगा रहता है ॥२०॥
(क्रमशः) 

ईश्वर की उपासना

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🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*शब्द दूध घृत राम रस,*
*कोई साध बिलोवणहार ।*
*दादू अमृत काढ़ि ले, गुरुमुखि गहै विचार ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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स्वामीजी स्वदेश के लिए आँसू बहाते थे अवश्य, परन्तु साथ ही यह भी भूलते न थे कि इस अनित्य संसार में ईश्वर ही वस्तु है, शेष सभी अवस्तु । स्वामीजी विलायत से लौटने के बाद हिमालय के दर्शन के लिए अलमोड़ा पधारे थे । अलमोड़ा निवासी उन्हें साक्षात् नारायण मानकर उनकी पूजा करने लगे । स्वामीजी नगाधिराज देवतात्मा हिमालय पर्वत के अत्युच्च श्रृंगो को देखकर भावमग्न हो गये ।
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उन्होंने कहा, -"... मेरी अब यही इच्छा है कि में अपने जीवन के शेष दिन इसी गिरिराज में कहीं पर व्यतीत कर दूँ, जहाँ अनेकों ऋषि रह चुके हैं, जहाँ दर्शनशास्त्र का जन्म हुआ था... । यहाँ आते समय जैसे जैसे गिरिराज की एक चोटी के बाद दूसरी चोटी मेरी दृष्टि के सामने आती गयी वैसे वैसे मेरी कार्य करने की समस्त इच्छाएँ तथा भाव, जो मेरे मस्तिष्क में वर्षों से भरे हुए थे, धीरे धीरे शान्त-से होने लगे ... और मेरा मन एकदम उसी अनन्त भाव की ओर खिंच गया जिसकी शिक्षा हमें गिरिराज हिमालय सदैव से देते रहे हैं, जो इस स्थान की वायु तक में भरा हुआ है तथा जिसका निनाद मैं आज भी यहाँ के कलकल बहनेवाले झरनों में सुनता हूँ, और वह भाव है - त्याग ।
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“ 'सर्व वस्तु भयान्वितं भुवि नृणां वैराग्यमेवाभयम् ।'
"अर्थात् इस संसार में प्रत्येक वस्तु में भय भरा है, यह भय केवल वैराग्य से ही दूर हो सकता है, इसी से मनुष्य निर्भय हो सकता है । ...
"भविष्य में शक्तिशाली आत्माएँ इस गिरिराज की ओर आकर्षित होकर चली आयेंगी ।
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यह उस समय होगा जब कि भिन्न भिन्न सम्प्रदायों के आपस के झगड़े नष्ट हो जायेंगे, जब रूढ़ियों के सम्बन्ध का वैमनस्य नष्ट हो जायगा, जब हमारे और तुम्हारे धर्म सम्बन्धी झगड़े बिलकुल दूर हो जायेंगे तथा जब मनुष्यमात्र यह समझ लेगा कि केवल एक ही चिन्तन, धर्म है और वह है स्वयं में परमेश्वर की अनुभूति, और शेष जो कुछ है वह सब व्यर्थ है । यह जानकर कि यह संसार एक धोखे की टट्टी है, यहाँ सब कुछ मिथ्या है और यदि कुछ सत्य है तो वह है ईश्वर की उपासना - केवल ईश्वर की उपासना - तीव्र विरागी यहाँ आयेंगे ।..."
-'भारत में विवेकानन्द' से उद्धृत
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श्रीरामकृष्णदेव कहा करते थे, 'अद्वैत ज्ञान को आँचल में बाँधकर जो इच्छा हो, करो ।' स्वामी विवेकानन्द अद्वैत ज्ञान को आँचल में बाँधकर कर्म-क्षेत्र में उत्तर पड़े थे । संन्यासी को फिर घर, धन, परिवार, आत्मीय, स्वजन, स्वदेश, विदेश से क्या प्रयोजन ? याज्ञवल्क्य ने मैत्रेयी से कहा था, 'ईश्वर को न जानने पर इन सब धन-विद्याओं से क्या होगा ? हे मैत्रेयी, पहले उन्हें जानो, बाद में दूसरी बात ।'
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स्वामीजी ने दुनिया को यही सिखाया । उन्होंने कहा, हे पृथ्वी भर के निवासियों ! पहले विषय का त्याग कर निर्जन में भगवान की आराधना करो, उसके बाद जो चाहो, करो, किसी में दोष नहीं । चाहे स्वदेश की सेवा करो या परिवार का पालन करो, किसी से दोष न होगा; क्योंकि तुम उस समय समझोगे कि सर्वभूतों में वे ही विद्यमान हैं, उनको छोड़ और कुछ भी नहीं है - परिवार, स्वदेश उनसे अलग नहीं हैं ।
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भगवान के साक्षात्कार करने के बाद देखोगे, वे ही सर्वत्र विद्यमान हैं । वशिष्ठ ने श्रीरामचन्द्रजी से कहा था, 'राम, तुम संसार को छोड़ना चाहते हो, आओ, मेरे साथ विचार करो; यदि ईश्वर इस संसार से अलग हों तो इसे त्याग देना ।*(*योगवशिष्ठ) श्रीरामचन्द्र ने आत्मा का साक्षात्कार किया था; इसीलिए चुप रह गये ।
(क्रमशः)

रविवार, 28 दिसंबर 2025

*१५. मन कौ अंग १३/१६*

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१५. मन कौ अंग १३/१६*
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सुन्दर यहु मन चोरटा, नाखै ताला तोरि । 
तकै पराये द्रब्य कौं, कब ल्याऊं घर फोरि ॥१३॥
हमारा यह मन बहुत बड़ा चौर भी है, अतः यह मजबूत से मजबूत ताले को सरलता से तोड़ देता है । क्योंकि पराये धन के विषय में इसकी यही वृत्ति बनी रहती है कि कब इसका स्वामी यत् किञ्चित् भी असावधान हो तो मैं इस का धन, इस के घर में से, उठा लाऊँ ॥१३॥
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सुन्दर यहु मन जार है, तकै पराई नारि । 
अपनी टेक तजै नहीं, भावै गर्दन मारि ॥१४॥
हमारा यह मन इतना अधिक कामी(व्यभिचारी) है कि इस की कुदृष्टि परायी स्त्रियों पर इस सीमा तक लगी रहती है कि यह अपने प्राणों(हत्या) की भी परवाह न कर; उनके साथ समागम के लिये सदा सन्नद्ध रहता है ॥१४॥
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सुन्दर मन बटपार है, घालै पर की घात । 
हाथ परे छोडै नहीं, लूटि खोसि ले जात ॥१५॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - हमारा यह मन बहुत बड़ा लुटेरा(बटपार) है यह प्रति क्षण यही सोचता रहता है कि कब कोई असावधान या एकाकी असहाय मिले कि उस का सब धन लूट लाऊँ । यह निर्दय, अवसर पड़ने पर, उसके पास कांनी कौड़ी भी नहीं छोड़ता, अपितु सब कुछ लूट लेता है ॥१५॥
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सुन्दर मन गांठी कटौ, डारै गर मैं पासि । 
बुरौ करत डरपै नहीं, महा पाप की रासि ॥१६॥
हमारा मन इतना ढीठ और निडर गठकटा(जेबकतरा) है कि यह ऐसा करते समय अपने प्राणों की भी परवाह नहीं करता । यह इतना बड़ा पापी है कि इसे यह पाप करते समय, कुछ भी डर नहीं लगता ॥१६॥
(क्रमशः)