शुक्रवार, 16 जनवरी 2026

पहला श्रीरामकृष्ण मठ

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🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*तिस घरि जाना वे, जहाँ वे अकल स्वरूप,*
*सोइ इब ध्याइये रे, सब देवन का भूप ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*(ग)परिच्छेद १, श्रीरामकृष्ण की महासमाधि के पश्चात्*
*(१)पहला श्रीरामकृष्ण मठ*
रविवार, १५ अगस्त १८८६ ई. को श्रीरामकृष्ण, भक्तों को दुःख के असीम समुद्र में बहाकर स्वधाम को चले गये । अविवाहित और विवाहित भक्तगण श्रीरामकृष्ण की सेवा करते समय आपस में जिस स्नेह-सूत्र में बँध गये थे, वह कभी छिन्न होने का न था । एकाएक कर्णधार को न देखकर आरोहियों को भय हो गया है । वे एक दूसरे का मुँह ताक रहे हैं ।
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इस समय उनकी ऐसी अवस्था है कि बिना एक दूसरे को देखे उन्हें चैन नहीं - मानो उनके प्राण निकल रहे हो । दूसरों से वार्तालाप करने को जी नहीं चाहता । सब के सब सोचते हैं - 'क्या अब उनके दर्शन न होंगे ? वे तो कह गये हैं कि व्याकुल होकर पुकारने पर, हृदय की पुकार सुनकर ईश्वर अवश्य दर्शन देंगे ! वे कह गये हैं - आन्तरिकता होने पर ईश्वर अवश्य सुनेंगे ।'
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जब वे लोग एकान्त में रहते हैं, तब उसी आनन्दमयी मूर्ति की याद आती है । रास्ता चलते हुए भी उन्हीं की स्मृति बनी रहती है; अकेले रोते फिरते हैं । श्रीरामकृष्ण ने शायद इसीलिए मास्टर से कहा था, 'तुम लोग रास्ते में रोते फिरोगे । इसीलिए मुझे शरीर-त्याग करते हुए कष्ट हो रहा है ।'
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कोई सोचते हैं, 'वे तो चले गये और मैं अभी भी बचा हुआ हूँ ! इस अनित्य संसार में अब भी रहने की इच्छा ! मैं अगर चाहूँ तो शरीर का त्याग कर सकता हूँ, परन्तु करता कहाँ हूँ !' किशोर भक्तों ने काशीपुर के बगीचे में रहकर दिनरात उनकी सेवा की थी । उनकी महासमाधि के पश्चात्, इच्छा न होते हुए भी, लगभग सब के सब अपने अपने घर चले गये ।
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उनमें से किसी ने भी अभी संन्यासी का बाहरी चिह्न(गेरुआ वस्त्र आदि) धारण नहीं किया है । वे लोग श्रीरामकृष्ण के तिरोभाव के बाद कुछ दिनों तक दत्त, घोष, चक्रवर्ती, गांगुली आदि उपाधियों द्वारा लोगों को अपना परिचय देते रहे; परन्तु उन्हें श्रीरामकृष्ण हृदय से त्यागी कर गये थे ।
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लाटू, तारक और बूढ़े गोपाल के लिए कोई स्थान न था जहाँ वे वापस जाते । उनसे सुरेन्द्र ने कहा, "भाइयों, तुम लोग अब कहाँ जाओगे ? आओ, एक मकान लिया जाय । वहाँ तुम लोग श्रीरामकृष्ण की गद्दी लेकर रहोगे तो हम लोग भी कभी-कभी हृदय की दाह मिटाने के लिए वहाँ आ जाया करेंगे, अन्यथा संसार में इस तरह दिन-रात कैसे रहा जायगा ? तुम लोग वहीं जाकर रहो ।
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मैं काशीपुर के बगीचे में श्रीरामकृष्ण की सेवा के लिए जो कुछ दिया करता था, वह अभी भी दूँगा । इस समय उतने से ही रहने और भोजन आदि का खर्च चलाया जायगा ।" पहले-पहले दो-एक महीने तक सुरेन्द्र तीस रुपये महीना देते गये । क्रमशः मठ में दूसरे दूसरे भाई ज्यो ज्यों आकर रहने लगे, त्यों त्यों पचास-साठ रुपये का माहवार खर्च हो गया - सुरेन्द्र देते भी गये ।
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अन्त में सौ रुपये तक का खर्च हो गया । वराहनगर में जो मकान लिया गया था, उसका किराया और टैक्स दोनों मिलाकर ग्यारह रुपये पड़ते थे । रसोइये को छः रुपये महीना और बाकी खर्च भोजन आदि का था । बूढ़े गोपाल, लाटू और तारक के घर था ही नहीं । छोटे गोपाल काशीपुर के बगीचे से श्रीरामकृष्ण की गद्दी और कुल सामान लेकर उसी किराये के मकान में चले आये ।
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काशीपुर में जो रसोइया था, उसे यहाँ भी लगाया गया । शरद रात को आकर रहते थे । तारक वृन्दावन गये हुये थे, कुछ दिनों में वे भी आ गये । नरेन्द्र, शरद, शशी, बाबूराम, निरंजन, काली ये लोग पहले-पहल घर से कभी कभी आया करते थे । राखाल, लाटू, योगीन और काली ठीक उसी समय वृन्दावन गये हुये थे । काली एक महीने के अन्दर, राखाल कई महीने के बाद और योगीन पूरे साल भर बाद लौटे ।
(क्रमशः)

*१६. चाणक को अंग १३/१६*

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१६. चाणक को अंग १३/१६*
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एक लेत हैं ठौर ही, सुन्दर बैठि अहार । 
दाख छुहारी राइता, भोजन बिबिध प्रकार ॥१३॥
कोई साधक एक स्थान पर बैठने का अभिनय करते हुए वहीं सदा भोजन करने का नियम कर लेते हैं । वे वहाँ बैठे ही बैठे नित्य नये प्रकार का भोजन ग्रहण करते हुए दाख, छुहारा मिला हुआ रायता(दही से बना खट्टा, मीठा भोज्य पदार्थ) खाते पीते रहते हैं ॥१३॥
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कोउक आचारी भये, पाक करै मुख मूंदि । 
सुन्दर या हुन्नर बिना, खाइ सकै नहिं खूंदि ॥१४॥
कुछ साधक ऐसे आचारवान् बन जाते हैं कि वे मुख मूंद(पट्टी बांध) कर भोजन बनाते हैं; क्योंकि वे इस अभिनय के बिना नित्य नये नये ताजा भोज्य पदार्थ नहीं पा सकते ॥१४॥
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कोउक माया देत है, तेरै भरै भंडार । 
सुन्दर आप कलाप करि, निठि निठि जुरै अहार ॥१५॥
कोई साधक अपने धनी शिष्यों को यही आशीर्वाद देते रहते हैं कि तुम्हारे भण्डार धन से भरे रहें; जब कि वे स्वयं प्रतिदिन उनका सविनय आदर करते हुए उनसे कुछ न कुछ मांगते रहते हैं ॥१५॥
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कोउक दूध रु पूत दे, कर पर मेल्हि बिभूति । 
सुन्दर ये पाषंड किय, क्यौं ही परै न सूति ॥१६॥ 
कोई पाषण्डी साधु अपने शिष्यों को "दूधों नहाओ, पूतों फलो" का आशीर्वाद देते हुए उन को विभूति(भस्म) का प्रसाद देते हैं । इतना पाषण्ड करने पर भी उन में से कुछ का जीवननिर्वाह सफलतापूर्वक नहीं हो पाता ॥१६॥
(क्रमशः)

बीकानेर से टीका की भेंट ~

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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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बीकानेर से टीका की भेंट ~ 
वि. सं. १९१८ में ही बीकानेर नरेश की ओर से- घोडा, चान्दी की छडी, दुशाला आदि टीका का दस्तूर तथा नरेश की ओर से आचार्य जी के नाम सम्मान सूचक पत्र आया । आचार्यजी ने भेंट स्वीकार करके नारायणा दादूधाम दादूद्वारे का प्रसाद बीकानेर नरेश को भेज दिया ।
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विसनदासजी के चातुर्मास ~ 
वि. सं. १९१९ में विसनदासजी उदयपुर जमात वालों का चातुर्मास निश्‍चित हुआ । विसनदासजी ने नारायणा दादूधाम के मेले में महाराज उदयरामजी का चातुर्मास मनाकर सब जमातों के महन्त संतों को भी चातुर्मास का निमंत्रण प्रेम सहित दिया और अपने स्थान में जाकर चातुर्मास के लिये बहुत अच्छी तैयारी की । 
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आचार्य उदयरामजी महाराज का सामेला आषाढ शुक्ला नौमी का निश्‍चय किया गया । आचार्य जी तथा सब महन्त संतों को या सूचना दी गई । अन्य महन्त संतों के पत्रों में यह भी प्रार्थना लिखी गई कि आप लोग आषाढ शुक्ला ७-८ को ही उदयपुर जमात में पधारने की कृपा करें जिससे आचार्य जी का सामेला हम सब मिलकर कर सकें । 
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प्रार्थनानुसार महन्त संत नियत समय पर पधार गये । महन्तों के सामेले करके उनको नियत स्थानों पर ठहराया गया । इधर आचार्यजी भी आ गये । उनको उदयपुर नगर से परे ही ठहराया गया । आषाढ शुक्ला ९ मी को प्रात: ही उदयपुर जमात ने तथा आगत महन्त संतों ने आचार्य जी के सामेला की तैयारी की, हाथी को सजाया गया, निशान, नौबत, नगाडे ऊंटों पर जंबूरे रखे गये । 
शस्त्र कला में निगुण नागे जिनको खंडेत कहा जाता था । वे हनुमान जी के समान कच्छा पहनकर अपने अपने प्रदर्शन के शस्त्र लेकर तैयार हो गये । अन्य नागे संतों ने अपने अपने कंधों में तलवारें लटकाईं । एक हाथ में श्‍वेत चंदन की बनी हुई सुमिरनिये और दूसरे हाथ में भाले उठाये । विरक्त संतों ने एक हाथ में कमंडल और दूसरे हाथ में दंड लिये । गायक संतों ने अपने वाद्य लिये । इस प्रकार सबने तैयारी कर ली तब इस यूथ को क्रमबद्ध बनाया गया । 
(क्रमशः)

बुधवार, 14 जनवरी 2026

*ॐ नमो भगवते रामकृष्णाय*

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🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*शरण तुम्हारी केशवा, मैं अनन्त सुख पाया ।*
*भाग बड़े तूँ भेटिया, हौं चरणौं आया ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*ॐ नमो भगवते रामकृष्णाय*
(१)
आचण्डालाप्रतिहतरयो यस्य प्रेमप्रवाहः 
लोकातीतोऽप्यहह न जहौ लोककल्याणमार्गम् ।
त्रैलोक्येऽप्यप्रतिममहिमा जानकीप्राणबन्धः 
भक्त्या ज्ञानं वृतवरवपुः सीतया यो हि रामः ॥
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(२)
स्तब्धीकृत्य प्रलयकलितम्वाहवोत्थं महान्तम् 
हित्वा रात्रिं प्रकृतिसहजामन्धतामिस्रमिश्राम् ॥ 
गीतं शान्तं मधुरमपि यः सिंहनादं जगर्ज । 
सोऽयं जातः प्रथितपुरुषो रामकृष्णस्त्विदानीम् ॥
और एक स्तोत्र बेलुर मठ में तथा वाराणसी, मद्रास, ढाका आदि सभी मठों में आरती के समय गाया जाता है ।
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इस स्तोत्र में स्वामीजी कह रहे हैं - "हे दीनबन्धो, तुम सगुण हो, फिर त्रिगुणों के परे हो, रातदिन तुम्हारे चरणकमलों की आराधना नहीं कर रहा हूँ इसीलिए मैं तुम्हारी शरण में आया हूँ । मैं मुख से आराधना कर रहा हूँ, ज्ञान का अनुशीलन कर रहा हूँ, परन्तु कुछ भी धारणा करने में असमर्थ हूँ इसीलिए तुम्हारी शरण में आया हूँ । 
तुम्हारे चरणकमलों का चिन्तन करने से मृत्यु पर विजय प्राप्त होती है, इसीलिए मैं तुम्हारी शरण में आया हूँ । हे दीनबन्धो, तुम ही जगत् की एकमात्र प्राप्त करने योग्य वस्तु हो, मैं तुम्हारी शरण में आया हूँ । 'त्वमेव शरणं मम दीनबन्धो !' "
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ॐ ह्री ऋतं त्वमचलो गुणजित् गुणेड्यः 
नक्तन्दिवं सकरुणं तव पादपद्मम् । 
मोहंकषं बहुकृतं न भजे यतोऽहम् 
तस्मात्त्वमेव शरणं मम दीनबन्धो ॥१॥
भक्तिर्भगश्च भजनं भवभेदकारि 
गच्छन्त्यलं सुविपुलं गमनाय तत्त्वम् । 
वक्त्रोद्धृतन्तु हृदि मे न च भाति किंचित् 
तस्मात्त्वमेव शरणं मम दीनबन्धो ॥२॥
तेजस्तरन्ति तरसा त्वयि तृप्तृष्णाः 
रागे कृते ऋतपथे त्वयि रामकृष्णे । 
मर्त्यामृतं तव पदं मरणोर्मिनाशम् 
तस्मात्त्वमेव शरणं मम दीनबन्धो ॥३॥ 
कृत्यं करोति कलुषं कुहकान्तकारि 
ष्णान्तं शिवं सुविमलं तव नाम नाथ । 
यस्मादहं त्वशरणो जगदेकगम्य
तस्मात्त्वमेव शरणं मम दीनबन्धो ॥४॥
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स्वामीजी ने आरती के बाद श्रीरामकृष्ण-प्रणाम सिखाया है । उसमें श्री रामकृष्णदेव को अवतारों में श्रेष्ठ कहा गया है ।
"स्थापकाय च धर्मस्य सर्वधर्मस्वरूपिणे । 
अवतारवरिष्ठाय रामकृष्णाय ते नमः ॥
(क्रमशः) 

*१६. चाणक को अंग ९/१२*

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१६. चाणक को अंग ९/१२*
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बैठ्यौ आसन मारि करि, पकरि रह्यौ मुख मौंन । 
सुन्दर सैन बतावतें, सिद्ध भयौ कहि कौंन ॥९॥
केवल सिद्धासन लगाकर बैठने से, अथवा मौन व्रत रखने से या हाथ या आंख आदि के सङ्केत द्वारा बात करने से कोई आज तक सिद्ध हुआ है कि तूं ही हो जायगा ! ॥९॥
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कोउ करै पय पान कौं, कौंन सिद्धि कहि बीर । 
सुन्दर बालक बाछरा, ये नित पीवहिं खीर ॥१०॥
कोई, समस्त जीवनपर्यन्त, केवल दुग्धाहार करता रहे तो क्या उसे सिद्धि मिल जायगी ! अरे भाई ! तब तो ये दुधमुंहे शिशु या गौ के बछड़े सभी सिद्ध कहलाने लगेंगे; क्योंकि ये भी नित्य केवल दूध ही पीते हैं ॥१०॥
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कोऊ होत अलौनिया, खांहि अलौंनौ नाज । 
सुन्दर करहिं प्रपंच बहु, मान बढावण काज ॥११॥
कोई तथाकथित साधक लवण(नमक) का त्याग कर जीवनपर्यन्त अलोना(लवणरहित) अन्न खाते हैं, परन्तु स्वसम्मानवृद्धयर्थ अन्य समस्त जगत्प्रपञ्च करते रहते हैं ॥११॥
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धोवन पीवै बावरे, फांसू बिहरन जांहिं । 
सुन्दर रहै मलीन अति, समंझ नहीं घट मांहिं ॥१२॥
कुछ अन्य मूर्ख साधक चावल का धोवन पी कर शरीर - निर्वाह करते हैं, तथा कुछ साधक काँटों पर सोते हैं, कोई जीवनपर्यन्त स्नान न करते हुए अतिशय मलिन रहते हैं; क्योंकि ऐसे साधकों ने किसी सच्चे गुरु से साधना का उपदेश ग्रहण किया हो नहीं ॥१२॥
(क्रमशः) 

राजगढ का स्थान ~

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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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राजगढ का स्थान ~ 
अलवर राज्य के राजगढ नगर में नारायणा के आचार्यों का स्थान तो आचार्य निर्भयरामजी महाराज के समय से ही था किन्तु छोटा था । आचार्य उदयरामजी महाराज ने उसको विशाल बना दिया । कारण जब आचार्य जी राजगढ जाते थे तब वह पहले वाला छोटा स्थान कम पडता था । 
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शिष्य संत मंडल आचार्यों के साथ बहुत रहता था । अलवर नरेशों की श्रद्धा भक्ति के कारण आचार्य राजगढ में बहुत आते जाते थे । अत: उदयरामजी महाराज ने स्थान संबन्धी कमी को पूर्ण कर दिया । वह स्थान अद्यापि अच्छी स्थिति से विद्यमान है ।  
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खेमदासजी के चातुर्मास ~ 
वि. सं. १९१७ में खेमदासजी अलवर वालों ने आचार्य उदयरामजी महाराज का चातुर्मास मनाया था और नारायणा दादूधाम दादूद्वारे में ही बैठा चातुर्मास करवाया था । यह चातुर्मास भी अच्छा रहा । किसी भी प्रकार की असुविधा नहीं रही । साधन सामग्री तो स्थान में सब थी ही । 
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सब संतों को भी अपनी- अपनी कुटिया की सुविधा थी ही । आने जाने के कष्ट से बचे थे । भोजन के समय बारह मास के समान पंक्ति में जाना होता ही था । सत्संग आरती में भी सदा की भांति ही जाना होता था । विशेष कार्य एक जागरण था सो जागरण होता तब जागरण में चले जाते थे । शेष समय में अपने- अपने आसन पर भजन करते थे । 
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चातुर्मास का सब प्रकार से प्रबन्ध दादूद्वारे के कर्मचारी ही करते थे । खेमदासजी ने तो केवल जो खर्च हुआ वह और आचार्यजी की भेंट तथा संतों के वस्त्रों के रुपये लगे सो दे दिये थे । उक्त प्रकार यह बैठा चातुर्मास आनन्द पूर्वक संपन्न हुआ था । 
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जयसिंह पुरा चातुर्मास ~ 
वि. सं. १९१८ में जयसिंह पुरा का चातुर्मास निश्‍चित हुआ था । इससे आचार्य उदयरामजी महाराज शिष्य संत मंडल के सहित चातुर्मास करने के लिये समय पर जयसिंह पुरा पधारे । वहां पर मर्यादानुसार आचार्य जी की अगवानी करके नियत स्थान पर ले जाकर ठहराया । 
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चातुर्मास का कार्यक्रम सत्संग आदि आरंभ हो गया । चातुर्मास के सब कार्यक्रम विधि विधान से होते रहे । चातुर्मास समाप्त होने पर आचार्य जी को मर्यादानुसार भेंट दी तथा सब संतों को यथोचित वस्त्रादि देकर सस्नेह सबको विदा किया ।
(क्रमशः)

*३. श्री गुरुदेव का अंग ~५७/६०*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*३. श्री गुरुदेव का अंग ~५७/६०*
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*रज्जब बपु बनराय विधि, मधि मन मधु सम सान ।*
*बलिहारी गुरु मक्षिका, यहु छानी१ गति२ छान३ ॥५७॥*
जिस प्रकार वन पंक्ति के पुष्पों में शहद छिपा रहता है, वैसे ही शरीराध्यास में मन रहता है । जैसे शहद को मधु मक्षिका निकाल लाती है वैसे ही गुरु मन को निकाल लाते हैं, यह जो मन की छिपी१ हुई स्थिति२ है उससे भी मन को गुरु निकाल३ लाते हैं, अत: मैं गुरुदेव की बलिहारी जाता हूँ ।
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*माया पानी दूध मन, मिले सुमुहकम१ बंधि२ ।*
*जन रज्जब बलि हंस गुरु, सोधि लहीसो संधि ॥५८॥*
जैसे जल और दूध दृढ़१ संबंध२ से मिले रहते हैं तो भी उनको हंस अलग कर देता है । वैसे ही माया और मन दृढ़ संबंध से मिले रहते हैं, तो भी माया और मन की राग रूपी संधि को खोज के गुरु अपने उपदेश के द्वारा माया को मिथ्या बता कर मन को माया से अलग कर देते हैं, अत: मैं गुरुदेव की बलहारी होता हूँ ।
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*अर्क अंभ को नाश कर, स्वाद रंगतैं काढ़ ।*
*रज्जब रचना हंस की, क्षीर नीर पर बाढ़ ॥५९॥*
सूर्य जल को नष्ट करके ही स्वाद तथा रंग से अलग करते हैं, किन्तु हंस बिना नष्ट किये ही दूध से जल को अलग कर देते हैं । अतः अलग करने की क्रिया रूप रचना हंस की ही श्रेष्ठ मानी जायगी वैसे ही काल शरीर को नष्ट करके धनादि से अलग करता है किन्तु गुरु शरीर के रहते ही उपदेश के द्वारा, धनादि से अलग कर देते हैं, अतः गुरु का कार्य श्रेष्ठ है।
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*संसार सार१ में विभूति वह्नि, मनसा अग्नि मिलाप ।*
*शीत रूप ह्वै सद्गुरु काढे, मिश्रित मुक्त सुताप ॥६०॥*
जैसे लोहे१ में प्रथम अग्नि होता है किन्तु बाहर का अग्नि मिलता है तब वह तपता है, फिर बाहर का अग्नि शांत होने पर लोहा शीतल हो जाता है, वैसे ही संसार में ऐश्वर्य रूप अग्नि तो प्रथम ही है किन्तु मन से उत्पन्न चिन्तादि रूप अग्नि उनसे मिलता है तब सांसारिक प्राणी संतप्त होते हैं, फिर सद्गुरु अपने उपदेश से चिन्तादि रूप को उनके मन से निकाल लेते हैं तब पुन: सांसारिक प्राणी उस संताप से मुक्त हो जाते हैं ।
(क्रमशः)

मंगलवार, 13 जनवरी 2026

श्रीरामकृष्ण-आरती

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🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*दादू वाणी प्रेम की, कमल विकासै होहि ।*
*साधु शब्द माता कहैं, तिन शब्दों मोह्या मोहि ॥२२॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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स्वामीजी ने और भी कहा है, -
"... फिर से कालचक्र घूमकर आ रहा है, एक बार फिर भारत से वही शक्तिप्रवाह निःसृत हो रहा है, जो शीघ्र ही समस्त जगत् को प्लावित कर देगा । एक वाणी मुखरित हुई है, जिसकी प्रतिध्वनि चारों ओर व्याप्त हो रही है एवं जो प्रतिदिन अधिकाधिक शक्ति संग्रह कर रही है, और यह वाणी इसके पहले की सभी वाणियों की अपेक्षा अधिक शक्तिशाली है, क्योंकि यह अपने पूर्ववर्ती उन सभी वाणियों का समष्टिस्वरूप है । 
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जो वाणी एक समय कलकल-निनादिनी सरस्वती के तीर पर ऋषियों के अन्तस्तल में प्रस्फुटित हुई थी, जिस वाणी ने रजतशुभ्रहिमाच्छादित गिरिराज हिमालय के शिखर-शिखर पर प्रतिध्वनित हो कृष्ण, बुद्ध और चैतन्यदेव में से होते हुए समतल प्रदेशों में अवरोहण कर समस्त देश को प्लावित कर दिया था, वही वाणी एक बार पुनः मुखरित हुई है । एक बार फिर से द्वार खुल गये हैं । आइये, हम सब आलोक-राज्य में प्रवेश करें - द्वार एक बार पुनः उन्मुक्त हो गये हैं । ..." -'हमारा भारत' से उद्धृत
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इसी प्रकार स्वामी विवेकानन्द ने भारतवर्ष के अनेक स्थानों में अवतार-पुरुष श्रीरामकृष्ण के आगमन की वार्ता घोषित की । जहाँ जहाँ मठ स्थापित हुए हैं, वहाँ उनकी प्रतिदिन सेवा-पूजा आदि हो रही है । आरती के समय सभी स्थानों में स्वामीजी द्वारा रचित स्तव वाद्य तथा स्वर-संयोग के साथ गाया जाता है । 
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इस स्तव में स्वामीजी ने भगवान् श्रीरामकृष्ण को सगुण निर्गुण निरंजन जगदीश्वर कहकर सम्बोधित किया है - और कहा है, "हे भवसागर के पार उतारनेवाले ! तुम नररूप धारण करके हमारे भवबन्धन को छिन्न करने के लिए योग के सहायक बनकर आये हो । तुम्हारी कृपा से मेरी समाधि हो रही है । तुमने कामिनी-कांचन छुड़वाया है । हे भक्तो को शरणदेनेवाले, अपने चरण-कमलों में मुझे प्रेम दो । तुम्हारे चरणकमल मेरी परम सम्पद् हैं । उसे प्राप्त करने पर भवसागर गोष्पद जैसा लगता है ।"
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स्वामीजी-रचित श्रीरामकृष्ण-आरती ।
(मिश्र-चौताल)
खण्डन भव-बन्धन, जग-वन्दन, वन्दि तोमाय । 
निरंजन, नररूपधर, निर्गुण, गुणमय  
मोचन-अघदूषण, जगभूषण, चिद्घनकाय । 
ज्ञानांजन-विमल-नयन, वीक्षणे मोह जाय ॥
भास्वर भाव-सागर, चिर-उन्मद प्रेम-पाथार । 
भक्तार्जन-युगलचरण, तारण भव-पार ॥ 
जृम्भित-युग-ईश्वर, जगदीश्वर, योगसहाय । 
निरोधन, समाहित मन, निरखि तव कृपाय ॥
भंजन-दुःखगंजन, करुणाघन, कर्म-कठोर । 
प्राणार्पण-जगत-तारण, कृन्तन-कलिडोर ॥
वंचन-कामकांचन, अतिनिन्दित-इन्द्रिय-राग । 
त्यागीश्वर, हे नरवर, देह पदे अनुराग ॥
निर्भय, गतसंशय, दृढ़निश्चयमानसवान् । 
निष्कारण-भकत-शरण त्यजि जातिकुलमान ॥  
सम्पद तव श्रीपद, भव गोष्पद-वारि यथाय ।
प्रेमार्पण, समदर्शन, जगजन-दुख जाय ॥
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*जो राम, जो कृष्ण, इस समय वही रामकृष्ण*
काशीपुर बगीचे में स्वामीजी ने यह महावाक्य भगवान श्रीरामकृष्ण के श्रीमुख से सुना था । इस महावाक्य का स्मरण कर स्वामीजी ने विलायत से कलकते में लौटने के बाद बेलुड़ मठ में एक स्तोत्र की रचना की थी । 
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स्तोत्र में उन्होंने कहा है - जो आचण्डाल दीन-दरिद्रों के मित्र, जानकीवल्लभ, ज्ञान-भक्ति के अवतार श्रीरामचन्द्र हुए, जिन्होंने फिर श्रीकृष्ण के रूप में कुरुक्षेत्र में गीतारूपी गम्भीर मधुर सिंहनाद किया था, वे ही इस समय विख्यात पुरुष श्रीरामकृष्ण के रूप में अवतीर्ण हुए हैं ।
(क्रमशः)

*१६. चाणक को अंग ५/८*

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१६. चाणक को अंग ५/८*
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सीत काल जल मैं रहै, करै कामना मूढ । 
सुन्दर कष्ट करै इतौ, ज्ञान न समझै गूढ ॥५॥
इसी प्रकार, तूं शीत ऋतु में ठण्ढे जल में बैठ कर अपनी अन्य कामनापूर्ति की आशा लगाने लगता है । तूं अपने शरीर को इतना कष्ट क्यों देता है ! क्या तुझे अभी तक गुरूपदिष्ट ज्ञान का गूढ रहस्य ज्ञात नहीं हुआ ! ॥५॥
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उष्ण काल चहुं वौर तैं, दीनी अग्नि जराइ । 
सुन्दर सिर परि रवि तपै, कौंन लगी यह वाइ ॥६॥
इसी प्रकार, ग्रीष्म ऋतु में अपने चारों ओर प्रचण्ड अग्नि जला कर ऊपर से सर्य की प्रखर धूप सहता है । यह तुझे कौन उन्माद(पागलपन) सवार हुआ है ! ॥६॥
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बन बन फिरत उदास ह्वै, कंद मूल फल खात । 
सुन्दर हरि कै नाम बिन, सबै थोथरी बात ॥७॥
कभी तूं वन में फिरता हुआ खट्टे या कड़ुवे कन्द, मूल या फल खाकर अपना जीवन बिताता है । अरे भाई ! हरिनामस्मरण के बिना ये सब उपरिवर्णित, उपाय थोथे(निःसार) ही माने जाते हैं ॥७॥
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कूकस कूटहिं कन बिना, हाथ चढै कछु नांहिं । 
सुन्दर ज्ञान हृदै नहीं, फिरि फिरि गोते खांहिं ॥८॥
कण(अन्न) रहित केवल कूकस(तुष = धान के ऊपर का छिलका) कूटने से तुम्हारा कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होगा । यदि तुम्हारा हृदय गुरु द्वारा उपदिष्ट ज्ञान में नहीं लगा है तो तुम्हारा संसार में यह निरर्थक आना जाना इसी प्रकार लगा रहेगा ! ॥८॥
(क्रमशः)

बैड का चातुर्मास ~

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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बैड का चातुर्मास ~ 
रामगढ से विदा होकर शेखावटी के संत और भक्त आग्रह पूर्वक जहां- जहां ले जाते थे वहां- वहां जाकर भक्तों को ज्ञानामृत से तृप्त करते थे । इस प्रकार शेखावटी की रामत करते हुये भगवानदासजी बैड वालों के चातुर्मास करने चातुर्मास बैठने के समय पर बैड पधार गये । 
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भगवानदासजी ने शिष्य मंडल के सहित आचार्य उदयरामजी महाराज की अगवानी बाजे गाजे और भक्त मंडल के साथ संकीर्तन करते हुये जाकर की । दंडवत सत्यराम कर भेंट चढाकर आचार्य जी को सत्कार पूर्वक संकीर्तन करते हुये स्थान पर लाकर ठहराया । चातुर्मास आरंभ हो गया । दादूवाणी का प्रवचन आदि सत्संग चातुर्मास की मर्यादानुसार चलने लगा । इस चातुर्मास में निवाई, चान्दसीन आदि जमातों के संत महात्मा भी बहुत आये थे । 
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संत समागम इस चातुर्मास में बहुत अच्छा रहा था । सत्संग का कार्यक्रम भी सुन्दर रहा । अधिक समुदाय होने से आरती की शोभा भी निराली ही रहती थी । गायक संत अधिक होने से जागरण भी बहुत अच्छे होते थे । रसोइयां भी अच्छी होती रही थीं । चातुर्मास समाप्ति पर आचार्य जी को मर्यादानुसार भेंटें, संतों को यथोचित वस्त्र देकर सस्नेह विदा किया था ।  
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भैराणे चरण स्थापन ~ 
आचार्य उदयरामजी महाराज ने अपने गुरुदेव नारायणदासजी महाराज का भैराणे में चरण स्थापन उत्सव किया । इस उत्सव में अनेक महान, संत पधारे अच्छा संत समागम हुआ । विधि के सहित चरण चिन्हों को स्थापन की । यह उत्सव बहुत ही सुन्दर हुआ । 
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उत्सव के कार्य तथा रसोई, जागरण आदि सभी ही श्‍लाघनीय हुये । पर्वत में जहां तहां सत्यराम, दादूराम की ध्वनि होती रही । उस समय संत समुदाय द्वारा वह स्थल बहुत सुन्दर भास रहा था । चैनरामजी महाराज की बारहदरी पर महल उदयरामजी महाराज ने बनाया था, जिसमें आचार्य अब रहते हैं । 
(क्रमशः)

*३. श्री गुरुदेव का अंग ~५३/५६*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*३. श्री गुरुदेव का अंग ~५३/५६*
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*जन रज्जब गुरु की दया, सु दृष्टि प्राप्त सु होय ।*
*प्रगट रू गुप्त पिछानिये, जिस हि न देखे कोय ॥५३॥*
गुरदेव की दया से सुन्दर ज्ञान की दृष्टि प्राप्त होती है, जिसके बल से साधक प्रगट रूप से भासने वाले मायिक संसार को मिथ्यारूप से पहचानता है, और जिसे कोई भी अज्ञानी नहीं देख सकता, उस गुप्त रूप से रहने वाले परमात्मा को सत्य तथा अपना निज स्वरूप समझ कर पहचानता है ।
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*मरजीवे की मेत्री हि, मोती आवे हाथ ।*
*त्यों रज्जब गुरु की दया, मिले सु अविगत नाथ ॥५४॥*
मरजीवा से मित्रता होने पर निश्चय ही मोती मिलता है । वैसे ही गुरु की दया होने पर मन इन्द्रियों के अविषय परमात्मा मिलते हैं ।
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*गुरु गोविन्द हि सेव तों१, सब अंग२ हुँ शिष पूर३ ।*
*जन रज्जब ऊंणति४ उठै, दुख दारिद्र सु दूर ॥५५॥*
गुरु - गोविन्द की सेवा करने से१ शिष्य संपूर्ण लक्षणों२ से पूर्ण३ हो जाता है, उसकी सब प्रकार की कमी४ उसके हृदय से उठ जाती है । जन्मादिक दुख नष्ट हो जाते हैं और आशा रूप द्ररिद्रता भी सम्यक प्रकार दूर हो जाती है ।
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*सद्गुरु शून्य१ समान है, शिष आभे२ तिन माँहिं ।*
*अकलि३ अंभ४ तिन में अमित, रज्जब टोटा नाँहिं ॥५६॥*
सद्गुरु आकाश१ के समान हैं, और गुरु आज्ञा में रहने वाले शिष्य बादल२ के समान हैं । नभ स्थित बादल में जैसे अपार जल४ होता है, वैसे ही गुरु आज्ञा में रहने वाले शिष्यों में अपार ज्ञान३ होता है, कुछ भी कमी नहीं रहती है ।
(क्रमशः)

सोमवार, 12 जनवरी 2026

सेठों के रामगढ गमन ~

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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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सेठों के रामगढ गमन ~ 
चिडावा से विदा होकर आचार्य उदयरामजी महाराज शिष्य- संत मंडल के सहित मार्ग की धार्मिक जनता को भगवद् भक्ति का उपदेश करते हुये सेठों के रामगढ के समीप आये तब अपने आने की सूचना पोद्दार भक्तों को दी । सूचना मिलने पर पोद्दार भक्त बाजे गाजे के साथ संकीर्तन करते हुये आचार्य उदयरामजी महाराज की अगवानी करने आये । 
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सत्यराम दंडवत आदि शिष्टाचार होने के पश्‍चात् शिष्य- संत मंडल के सहित आचार्यजी को लेकर संकीर्तन करते हुये नगर के मुख्य बाजार में होते हुये नियत स्थान पर ले जाकर ठहराया । प्रसाद बांटकर शोभा यात्रा समाप्त की । आचार्यजी की तथा सब संतों की सेवा का प्रबन्ध उचित रीति से कर दिया गया । दादूवाणी का प्रबन्ध रुप सत्संग प्रति दिन नियत समय पर होने लगा ।
पोद्दार जाति छोटे सुन्दरदास के भक्त बांसल गोती रायचन्दजी के १३ पुत्रों से ही बनी है । वे पुत्र सुन्दरदासजी के वर से ही प्राप्त हुये थे । इसका पूरा- पूरा परिचय छोटे सुन्दरदासजी के विवरण में दिया जायगा । अत: यह जाति परंपरा से ही दादूजी की भक्त रही है । इससे दादूवाणी से पोद्दार भक्त भली प्रकार परिचित थे ही और दादूवाणी पर उनकी श्रद्धा भी अपार थी । 
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इस कारण दादूवाणी का प्रवचन श्रवण से उनको अद्भुत आनन्द होता था । वे अपने परिवारों के सहित नित्य दादूवाणी का प्रवचन सुनने आते थे । वैसे वे दादूवाणी का पाठ तो अपने घरों में प्रति दिन ही करते थे किन्तु पूर्ण अनुभवी आचार्य उदयरामजी महाराज के मुख से सुनते थे तब हृदय में बोध भानु का उदय होकर उनके सब संशय नष्ट हो जाते थे । 
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आचार्य उदयरामजी महाराज अपने अनुभव और युक्ति दृष्टांतों से वाणी के गंभीर विषयों को भी बहुत ही रोचक बना देते थे जिससे सर्व साधारण भी समझ लेता था । समझ में आने पर प्रवचन प्रिय लगता ही है । रामगढ में पोद्दार भक्त आचार्य जी को संत मंडल के सहित भोजन कराने अपने अपने घरों पर सत्कार पूर्वक ले जाते थे । 
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आचार्य जी की मर्यादा अनुसार भोजन कराकर आचार्यजी की भेंट देते थे और संतों का भी यथोचित सत्कार करके मर्यादा पूर्वक आसन पर पहुंचाते थे । आचार्यजी जब तक रामगढ में रहे तब तक पोद्दार भक्त सत्संग और संत सेवा अति प्रसन्नता से करते रहे थे । फिर जब आचार्यजी रामगढ से पधारने लगे तब मर्यादा पूर्वक भेंट आदि से सत्कार करके संत मंडल के सहित आचार्यजी को सस्नेह विदा किया ।
(क्रमशः)  

*१६. चाणक को अंग १/४*

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१६. अथ चाणक१ को अंग {१ चाणक = कशा(कोरड़ा), ताजणा(चाबुक), चपेटा(थप्पड़) ।} १/४*
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छूट्यौ चाहत जगत सौं, महा अज्ञ मति मंद ।
जोई करै उपाइ कछु, सुन्दर सोई फंद ॥१॥
श्रीसुन्दरदासजी का उपदेश - अरे मूर्ख ! बुद्धि के हीन ! तूं इस संसार से मुक्ति(छुटकारा) तो चाहता है; परन्तु इसके लिये तूं जो भी उपाय करता है वह तेरे लिये इस संसार में फंसने का एक नया जाल ही बन जाता है ॥१॥
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योग करै जप तप करै, यज्ञ करै दे दांन । 
तीरथ ब्रत यम नेम तैं, सुन्दर ह्वै अभिमांन२ ॥२॥ 
(२ तुल० - सवैया ग्रन्थ, चाणक को अङ्ग, छ० ३)
कभी तूं इस मुक्ति के लिये कोई योगसाधना करता है, कभी कोई जप तप करने लगता है, कभी कोई यज्ञ या दान करने लगता है । कभी कोई तीर्थयात्रा या कोई विशेष व्रत करने लगता है, या किसी विशेष यम(निग्रह) या नियम(प्रतिज्ञापालन) के पालन में लग जाता है । परन्तु इन क्रियाओं के साथ ही तूँ इन का अभिमान करना आरम्भ कर देता है कि मैं ऐसा लोकोत्तर कर्म कर रहा हूँ ! ॥२॥
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सुन्दर ऊंचे पग किये, मन की अहं न जाइ । 
कठिन तपस्या करत है, अधो सीस लटकाइ ॥३॥
महाराज श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - रे मूर्ख ! क्या केवल ऊँचे पैर(शीर्षासन) करने से तेरे मन का यह अहङ्कार मिट पायगा कि तूँ अपना शिर नीचे की ओर कर कठोर तपस्या कर रहा है ! ॥३॥
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मेघ सहै सब सीस पर, बरिखा रितु चौमास । 
सुन्दर तन कौ कष्ट अति, मन मैं औरै आस ॥४॥
तूं समस्त वर्षा ऋतु में चार मास पर्यन्त जल बरसाते हुए मेघों के नीचे खड़ा होता है, परन्तु इस के प्रतिफल की प्राप्ति हेतु अपने मन में कोई अन्य आशा लिये बैठा रहता है ॥४॥
(क्रमशः) 

श्रीरामकृष्णदेव की बात

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🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*जब मैं साँचे की सुधि पाई ।*
*तब तैं अंग और नहीं आवै,*
*देखत हूँ सुखदाई ॥*
*ता दिन तैं तन ताप न व्यापै,*
*सुख दुख संग न जाऊँ ।*
*पावन पीव परस पद लीन्हा,*
*आनंद भर गुन गाऊँ ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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अब स्वामीजी श्रीरामकृष्णदेव की बात कह रहे हैं, -
"... एक (शंकराचार्य) का था अद्भुत मस्तिष्क, और दूसरे(चैतन्य) का था विशाल हृदय । अब एक ऐसे अद्भुत पुरुष के जन्म लेने का समय आ गया था, जिनमें ऐसा ही हृदय और मस्तिष्क दोनों एक साथ विराजमान हों, जो शंकर के अद्भुत मस्तिष्क एवं चैतन्य के अद्भुत, विशाल, अनन्त हृदय के एक ही साथ अधिकारी हों....
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जो देखें कि सब सम्प्रदाय एक ही आत्मा, एक ही ईश्वर की शक्ति से चालित हो रहे हैं और प्रत्येक प्राणी में वही ईश्वर विद्यमान है, जिनका हृदय भारत में अथवा भारत के बाहर दरिद्र, दुर्बल, पतित सब के लिए पानीपानी हो जाय, लेकिन साथ ही जिनकी विशाल बुद्धि ऐसे महान् तत्त्वों को पैदा करे, जिनसे भारत में अथवा भारत के सब विरोधी सम्प्रदायों में समन्वय साधित हो और इस अद्भुत समन्वय द्वारा एक ऐसे सार्वभौमिक धर्म को प्रकट करे, जिससे हृदय और मस्तिष्क दोनों की बराबर उन्नति होती रहे ।
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एक ऐसे ही पुरुष ने जन्म ग्रहण किया और मैंने वर्षों तक उनके चरण तले बैठकर शिक्षा-लाभ का सौभाग्य प्राप्त किया । ऐसे एक पुरुष के जन्म लेने का समय आ गया था, इसकी आवश्यकता पड़ी थी, और वे आविर्भूत हुए । सब से अधिक आश्चर्य की बात यह थी कि उनका समग्र जीवन एक ऐसे शहर के पास व्यतीत हुआ जो पाश्चात्य भावों से उन्मत्त हो रहा था, भारत के सब शहरों की अपेक्षा जो विदेशी भावों से अधिक भरा हुआ था ।
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उनमें पोथियों की विद्या कुछ भी न थी, ऐसे महाप्रतिभासम्पन्न होते हुए भी वे अपना नाम तक नहीं लिख सकते थे, किन्तु हमारे विश्वविद्यालय के बड़े बड़े उपाधिधारियों ने उन्हें देखकर एक महाप्रतिभाशाली व्यक्ति मान लिया था । वे एक अद्भुत महापुरुष थे ।
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यह तो एक बड़ी लम्बी कहानी है, आज रात को आपके निकट उनके विषय में कुछ भी कहने का समय नहीं है । इसलिए मुझे भारतीय सब महापुरुषों के पूर्णप्रकाश-स्वरूप युगाचार्य भगवान श्रीरामकृष्ण का उल्लेख भर करके आज समाप्त करना होगा । उनके उपदेश आजकल हमारे लिए विशेष कल्याणकारी हैं । उनके भीतर जो ऐश्वरिक शक्ति थी, उस पर विशेष ध्यान दीजिये ।
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वे एक दरिद्र ब्राह्मण के लड़के थे । उनका जन्म बंगाल के सुदूर, अज्ञात, अपरिचित किसी एक गाँव में हुआ था । आज यूरोप, अमरीका के सहस्रों व्यक्ति वास्तव में उनकी पूजा कर रहे हैं, भविष्य में और सहस्त्रों मनुष्य उनकी पूजा करेंगे । ईश्वर की लीला कौन समझ सकता है ! हे भाइयों, आप यदि इसमें विधाता का हाथ नहीं देखते तो आप अन्धे हैं, सचमुच जन्मान्ध हैं ।
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यदि समय मिला, यदि आप लोगों से आलोचना करने का और कभी अवकाश मिला तो आपसे इनके सम्बन्ध में विस्तारपूर्वक कहूँगा; इस समय केवल इतना ही कहना चाहता हूँ कि यदि मैंने जीवन भर में एक भी सत्य वाक्य कहा है तो वह उन्हीं का वाक्य है; पर यदि मैंने ऐसे वाक्य कहे हैं जो असत्य, भम्रपूर्ण अथवा मानवजाति के लिए हितकारी न हों, तो वे सब मेरे ही वाक्य हैं, उनके लिए पूरा उत्तरदायी मैं ही हूँ ।"
-'भारतीय व्याख्यान' से उद्धृत
(क्रमशः)

रविवार, 11 जनवरी 2026

रामदासजी के चातुर्मास ~

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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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रामदासजी के चातुर्मास ~  
वि. सं. १९१५ में रामदासजी नटाटा ने आचार्य उदयरामजी महाराज का शिष्य संत मंडल के सहित चातुर्मास मनाया । शिष्य संत मंडल के सहित आचार्यजी नियत समय पर पधारे । रामदासजी ने मर्यादा पूर्वक आचार्यजी की अगवानी की और बाजे गाजे के साथ संकीर्तन करते हुये ले जाकर नियत स्थान पर ठहराया । 
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चातुर्मास का कार्यक्रम आरंभ हो गया । कथा के समय कथा, भोजन के समय भोजन, आरती, नामध्वनि आदि सब कार्य नियत समय पर होते थे । एकादशी आदि पुण्य तिथियों को जागरण आदि सब यथावत होते थे । स्थानधारी संत तथा भक्त जन भी रसोइयां लेकर आते रहते थे । 
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यह चातुर्मास अच्छा हुआ । चातुर्मास समाप्ति के समय रामदासजी ने मर्यादानुसार आचार्यजी को भेंट और शिष्य संत मंडल को वस्त्रादि देकर तथा भंडारी आदि कर्मचारियों का यथोचित सत्कार के किया था ।
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शेखावटी की रामत ~ 
वि. सं. १९१६ में शेखावटी के सेठों के आग्रह से चिडावा, रामगढ आदि शहरों में रामत करने पधारे । चिडावा पहुँचे तब चिडावा के भक्तों ने अति श्रद्धा भाव से बाजे गाजे के साथ संकीर्तन करते हुये आचार्यजी की अगवानी की और संकीर्तन करते हुये नगर के मध्य से लाकर नियत स्थान पर ठहराया । 
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संत सेवा का अच्छी प्रकार प्रबन्ध कर दिया । सत्संग होने लगा । दादूवाणी के गंभीर प्रवचन भक्त लोग बडी श्रद्धा से सुनने लगे । रसोइयां भी अति प्रेम से देने लगे । सेठ लोग आचार्यजी को शिष्य मंडल के सहित भोजन कराने मर्यादापूर्वक अपने घरों पर ले जाते थे । 
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मर्यादापूर्वक पहले आज्ञा की भेंट फिर भोजन करने के पश्‍चात् आचार्यजी को मर्यादानुसार भेंट देकर तथा संतों का यथोचित सत्कार करके मर्यादा से स्थान पर पहुंचाते थे । उक्त प्रकार चिडावा के भक्तों ने सत्संग तथा संत- सेवा दोनों ही कार्य अति श्रद्धा भक्ति से किये थे । जब आचार्यजी चिडावा से जाने लगे तब सस्नेह मर्यादा पूर्वक भेंटादि कर विदा किया था ।
(क्रमशः)  

*१५. मन कौ अंग ६८/७०*

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१५. मन कौ अंग ६८/७०*

इंद्री अरु रवि शशि कला, घात मिलावै कोइ । 
सुन्दर तोलै जुगति सौं, तब मन पूरा होइ ॥६८॥
५ इन्द्रिय, १२ सूर्य, १ चन्द्र, १६ कला, ६ रस, रक्त आदि धातु - ये सब मिल कर ४० होते हैं । यदि इन सब के बल को मिलाकर देखा जाय तो हमारा मन इन सब के समग्र बल के समान ही तुल्यबलशाली है ॥६८॥
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चौपई
पांच सात नौ तेरह कहिये, साढे तीन अढाई लहिये । 
सब कौं जोर एक मन होई, मन के गायें सत्य नहिं कोई ॥६९॥
५, ७, ९, १३ इन सङ्ख्याओं के साथ(३ २/१) एवं(२ २/१) की सङ्ख्या मिला दी जायँ तो सब मिल कर ४०(चालीस) की सङ्ख्या हो जाती है । यह सङ्कलन ही एक मन कहलाता है । इस मन के अनुसार चलने से हम वस्तुतत्त्व को अधिगत नहीं कर सकते ॥६९॥
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ज्ञान कर्म इन्द्री दश जानहुं, मन ग्यारह का प्रेरक मानहुं । 
ग्यारह में जब एक मिटावै, सुन्दर तबहिं एकही पावै ॥७०॥
इति मन को अंग ॥१५॥
पाँच ज्ञानेन्द्रिय एवं पाँच कर्मेन्द्रिय मिला कर इन्द्रियों की सङ्ख्या दश (१०) जाननी चाहिये । इनमें मन भी मिला दिया जाय तो ये इन्द्रियाँ ११ (ग्यारह) हो जाती है । इन में ग्यारहवाँ मन इन दश इन्द्रियों का प्रेरक है ।
महात्मा श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - यदि इस(११ सङ्ख्या) में से एक ग्यारहवाँ मन हटा दिया जाय(निगृहीत कर लिया जाय तो एक ब्रह्म ही दिखायी देगा । (साधक को उसी एक ब्रह्म का साक्षात्कार होगा।) ॥७०॥ 
इति मन का अङ्ग सम्पन्न ॥१५॥
(क्रमशः) 

क्या श्रीरामकृष्ण अवतार हैं

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🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*प्रेम भक्ति दिन दिन बधै, सोई ज्ञान विचार ।*
*दादू आतम शोध कर, मथ कर काढ़या सार ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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"... ज्ञानयोग अवश्य ही अति श्रेष्ठ मार्ग है । उच्च तत्त्वज्ञान इसका प्राण है, और आश्चर्य की बात तो यह है कि प्रत्येक मनुष्य यह सोचता है कि वह ज्ञानयोग के आदर्शानुसार चलने में समर्थ है । परन्तु वास्तव में ज्ञानयोग-साधना बड़ी कठिन है । ज्ञानयोग के पथ पर चलने में हमारे गड्ढे में गिर जाने की बड़ी आशंका रहती है ।
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कहा जा सकता है कि इस संसार में दो प्रकार के मनुष्य होते हैं । एक तो आसुरी प्रकृतिवाले जिनकी दृष्टि में अपने शरीर का पालन-पोषण ही सर्वस्व है और दूसरे दैवी प्रकृतिवाले, जिनकी यह धारणा रहती है कि शरीर किसी एक विशेष उद्देश्य की पूर्ति के लिए केवल एक साधन तथा आत्मोन्नति के लिए एक यन्त्रविशेष है ।
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शैतान भी अपनी कार्यसिद्धि के लिए झट से शास्त्रों को उद्धृत कर देता है, और इस प्रकार प्रतीत होता है कि बुरे मनुष्य के कृत्यों के लिए भी शास्त्र उसी प्रकार साक्षी है जैसे कि एक सत्पुरुष के शुभ कार्य के लिए । ज्ञानयोग में यही एक बड़े डर की बात है । परन्तु भक्तियोग स्वाभाविक तथा मधुर है । भक्त उतनी ऊँची उड़ान नहीं उड़ता जितनी कि एक ज्ञानयोगी, और इसीलिए उसके उतने बड़े खड्डों में गिरने की आशंका भी नहीं रहती ।..." 
 -'भक्तियोग' से उद्धृत
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क्या श्रीरामकृष्ण अवतार हैं ? स्वामीजी का विश्वास
भारत के महापुरुषों(The Sages of India) के सम्बन्ध में स्वामीजी ने जो भाषण दिया था, उसमें अवतार-पुरुषों की अनेक बातें कही हैं । श्रीरामचन्द्र, श्रीकृष्ण, बुद्धदेव, रामानुज, शंकराचार्य, चैतन्यदेव आदि सभी की बातें कही । भगवान श्रीकृष्ण के इस कथन का उद्धरण देकर समझाने लगे, 'जब धर्म की ग्लानि होकर अधर्म का अभ्युत्थान होता है, तो साधुओं के परित्राण के लिए, पापाचार को विनष्ट करने के लिए मैं युग युग में अवतीर्ण होता हूँ ।'
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उन्होंने फिर कहा, 'गीता में श्रीकृष्ण ने धर्मसमन्वय किया है', -
"... हम गीता में भिन्न भिन्न सम्प्रदायों के विरोध के कोलाहल की दूर से आती हुई आवाज सुन पाते हैं, और देखते हैं कि समन्वय के वे अद्भुत प्रचारक भगवान श्रीकृष्ण बीच में पड़कर विरोध को हटा रहे हैं ।....” 
 -'भारतीय व्याख्यान' से उद्‌धृत
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"श्रीकृष्ण ने फिर कहा है, - स्त्री, वैश्य, शूद्र सभी परम गति को प्राप्त करेंगे, ब्राह्मण क्षत्रियों की तो बात ही क्या है !
"बुद्धदेव दरिद्र के देव हैं । सर्वभूतस्थमात्मानम् - भगवान सर्वभूतों में हैं - यह उन्होंने प्रत्यक्ष दिखा दिया ।
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बुद्धदेव के शिष्यगण आत्मा, जीवात्मा आदि नहीं मानते हैं - इसीलिए शंकराचार्य ने फिर से वैदिक धर्म का उपदेश दिया । वे वेदान्त का अद्वैत मत, रामानुज का विशिष्टाद्वैत मत समझाने लगे । उसके बाद चैतन्यदेव प्रेमभक्ति सिखाने के लिए अवतीर्ण हुए । शंकर और रामानुज ने जाति का विचार किया था, परन्तु चैतन्यदेव ने ऐसा न किया । चैतन्यदेव ने कहा, 'भक्त की फिर जाति क्या ?' "
(क्रमशः)

*३. श्री गुरुदेव का अंग ~ ४५/४८*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*३. श्री गुरुदेव का अंग ~ ४५/४८*
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*मात पिता का दान ले, दिया सबन का भंग ।*
*जन रज्जब जीव में जट्या, युग युग गुरु दत्त संग ॥४५॥*
४५ में गुरु उपदेश दान की अपारता बता रहे हैं - माता पितादि सब संसारियों का दिया हुआ धन तो लेने के पीछे कोई दिन नष्ट हो जाता है किन्तु गुरु का दिया हुआ उपदेश जीव में संस्कार रूप से जटित प्रति युग में ही रहता है ।
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*गुरु तरूवर अँग डाल बहु, पत्र बैन फल राम ।*
*रज्जब छाया में सुखी, चाख्यूं सरे सु काम ॥४६॥*
४६ में गुरु की विशेषता कह रहे हैं - गुरूदेव विशाल वृक्ष हैं, उन में जो गुरुपने के बहुत से लक्षण हैं वे ही डालें हैं उनके वचन ही पत्ते हैं, और राम ही फल है गुरु-वृक्ष की सत्संग रूप छाया में जो बैठते हैं वे सुखी रहते हैं और जो राम रूप फल का साक्षात्कार रूप आस्वादन करते हैं, उनका मुक्ति रूप कार्य सिध्द होता है ।
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*रज्जब नर नारी युगल, चकवा चकवी जोड़ ।*
*सद्गुरु बैन बिच रैन में, किया दुहूँ घर फोड़ ॥४७॥*
४७ में गुरु वचन की विशेषता बता रहे हैं - नर और नारी दोनों चकवा चकवी की जोड़ी के सामान हैं, श्रेष्ठ गुरु के वचन ही रात्रि है । रात्रि में जैसे चकवा चकवी अलग हो जाते हैं वैसे ही गुरु वचन हृदय में आने से नर नारी का मिलन नहीं होता । गुरु वचन नर और नारी दोनों के ही राग रूप घर को तोड़ कर उन्हें विरक्त करता है ।
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*गोविन्द गिरा सूरज किरण, गुरु दर्पण अति तेज ।*
*जन रज्जब सुरता वनी, लगे तिहाईत हेज ॥४८॥*
४८-४९ में गुरु की महिमा कह रहे हैं - भगवद्-वाणी वेद सूर्यकिरण के समान है गुरु दर्पण के समान हैं, जैसे सूर्य किरण का तेज आतशी शीशा में अधिक हो जाता है, वैसे ही गुरु में जा कर भगवद्-वाणी वेद का ज्ञान बल बढ़ जाता है । आतशी शीशा से अग्नि निकल कर जैसे बन को जलाता है, वैसे ही गुरु से ज्ञानाग्नि निकल कर तीसरे श्रवण करने के प्रेम युक्त साधक-भूमि की वृत्ति-वनी में प्रकट होकर उसके अग्यानादि वृक्षों को भस्म करता है ।
(क्रमशः)

शनिवार, 10 जनवरी 2026

ज्ञानयोग व स्वामी विवेकानन्द

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🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*खंड खंड कर ब्रह्म को, पख पख लीया बाँट ।*
*दादू पूरण ब्रह्म तज, बँधे भरम की गाँठ ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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फिर अमरिकनों से कह रहे हैं - "... अपनी महान् वाणी से ईसा ने जगत् में घोषणा की, 'दुनिया के लोगों, इस बात को भलीभांति जान लो कि स्वर्ग का राज्य तुम्हारे अभ्यन्तर में अवस्थित है ।' - 'मैं और मेरे पिता अभिन्न हैं ।' - साहस कर खड़े हो जाओ और घोषणा करो कि मैं केवल ईश्वर-तनय ही नहीं हूँ, पर अपने हृदय में मुझे यह भी प्रतीति हो रही है कि मैं और मेरे पिता एक और अभिन्न हैं । नाजरथवासी ईसा मसीह ने यही कहा ।...
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“.... इसलिए हमें केवल नाजरथवासी ईसा में ही ईश्वर का दर्शन न कर विश्व के उन सभी महान् आचार्यों व पैगम्बरों में भी उसका दर्शन करना चाहिए, जो ईसा के पहले जन्म ले चुके थे, जो ईसा के पश्चात् आविर्भूत हुए हैं और जो भविष्य में अवतार ग्रहण करेंगे । हमारा सम्मान और हमारी पूजा सीमाबद्ध न हों ।
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ये सब महापुरुष उसी एक अनन्त ईश्वर की विभिन्न अभिव्यक्ति हैं । वे सब शुद्ध और स्वार्थगन्ध-शून्य हैं, सभी ने इस दुर्बल मानवजाति के उद्धार के लिए प्राणपण से प्रयत्न किया है, इसी के लिए अपना जीवन निछावर कर दिया है । वे हमारे और हमारी आनेवाली सन्तान के सब पापों को ग्रहण कर उनका प्रायश्चित्त कर गये हैं ।..." - 'महापुरुषों की जीवनगाथाएँ' से उद्धृत
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स्वामीजी वेदान्त की चर्चा करने के लिए कहा करते थे, परन्तु साथ ही उस चर्चा में जो विपत्ति है, वह भी बता देते थे । श्रीरामकृष्ण जिस दिन ठनठनिया में श्री शशधर पण्डित के साथ वार्तालाप कर रहे थे, उस दिन नरेन्द्र आदि अनेक भक्त वहाँ पर उपस्थित थे, १८८४ ईसवी ।
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ज्ञानयोग व स्वामी विवेकानन्द
श्रीरामकृष्ण ने कहा है, 'ज्ञानयोग इस युग में बहुत कठिन है । जीव का एक तो अन्न में प्राण है, उस पर आयु कम है । फिर देह-बुद्धि किसी भी तरह नहीं जाती । इधर देह-बुद्धि न जाने से ब्रह्मज्ञान नहीं होता । ज्ञानी कहते हैं, 'मैं वही ब्रह्म हूँ ।' मैं शरीर नहीं हूँ, मैं भूख-प्यास, रोग-शोक, जन्म-मृत्यु, सुख-दुःख इन सभी से परे हूँ ।
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यदि रोग-शोक सुख-दुःख इन सब का बोध रहे तो तुम ज्ञानी क्योंकर होगे ? इधर काँटे से हाथ चुभ रहा है, खून की धारा बह रही है, बहुत दर्द हो रहा है, परन्तु कहता है, 'कहाँ, हाथ तो नहीं कटा ! मेरा क्या हुआ ?'
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"इसलिए इस युग के लिए भक्तियोग है । इसके द्वारा दूसरे पथों की तुलना में आसानी से ईश्वर के पास जाया जाता है । ज्ञानयोग या कर्मयोग तथा दूसरे पथों से भी ईश्वर के पास जाया जा सकता है, परन्तु ये सब कठिन पथ है ।" श्रीरामकृष्ण ने और भी कहा है, "कर्मियों का जितना कर्म बाकी है, उतना निष्काम भावना से करें ।
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निष्काम कर्म द्वारा चित्तशुद्धि होने पर भक्ति आयेगी । भक्ति द्वारा भगवान की प्राप्ति होती है ।" स्वामीजी ने भी कहा, "देह-बुद्धि रहते 'सोऽहम्' नहीं होता - अर्थात् सभी वासनाएँ मिट जाने पर, सर्वत्याग होने पर तब कहीं समाधि होती है । समाधि होने पर तब ब्रह्मज्ञान होता है । भक्तियोग सरल व मधुर (natural and sweet) है ।"
(क्रमशः)