गुरुवार, 22 जनवरी 2026

*३. श्री गुरुदेव का अंग ~८९/९२*

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🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी  टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*३. श्री गुरुदेव का अंग ~८९/९२*
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*गुरु चंदन चन्दन किये, वृक्ष अठारह भार ।*
*डाल पान फल फूल का, रज्जब नहीं विचार ॥८९॥*
ढाई मन का एक भार होता है । प्रत्येक वनस्पति का एक एक पत्ता लेने से अठारह भार होते हैं, इसीलिये वृक्षों को अठारह भार कहते हैं । चंदन अठारह भार वृक्षों के डाल, पत्ते, फूल, फलादि सभी अंगो को अपनी सुगंधि से युक्त करता है । वैसे ही गुरु शिष्यों की जाति आदि का विचार न करके उनके तन मन इन्द्रियादि सभी अंगो को सुधारते हैं । 
*गुरु पारस पल में परसि, शिष कंचन कर लीन ।* 
*सो रज्जब महँगे सदा, कुल कालिमा सु छीन ॥९०॥* 
जैसे लोहा पारस से स्पर्श होता है, तब उसके कालापन आदि संपूर्ण दोष नष्ट होकर वह क्षणभर में सोना बन जाता है और महँगा बिकता है, वैसे ही शिष्य गुरु के ज्ञान को धारण करता है, तब उसके मल आदि सम्पूर्ण दोष नष्ट हो जाते हैं और वह ब्रह्म का साक्षात्कार करके सदा के लिये महान बन जाता है ।
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*रज्जब निपजहिं इन्द्र गुरु, अदभू१ आदम ऐन२ ।*
*पहुप पत्र फल पूजिये, सुर नर पावहिं चैन ॥९१॥*
जैसे इन्द्र से वृक्ष१ उत्पनन होते हैं, फिर उनके पुष्प, पत्र, फलादि से सुर नरादि की पूजा होती है, तब सुर और नरादि को आनन्द प्राप्त होता है । वैसे ही गुरु उपदेश मानव ठीक२ ठीक सुधर जाते हैं, तब उनके कर्म, भक्ति, ज्ञानादि से सभी सुर नरादि आनन्दित होते हैं ।
*तिल तालिब७ गुल१ पीर२ मिल, सुहबत३ सौंधा४ होय ।* 
*जन रज्जब गुंजस५ बिना, कुजंद६ बास न कोय ॥९२॥*
जैसे तिल - तेल और पुष्पों१ के संग३ से तेल में सुगन्ध४ हो जाती है । बिना संग५ तिल६ तेल में सुगन्ध नहीं आती । वैसे ही जिज्ञासु७ को सिद्ध२ गुरु का सत्संग मिलता है तब ही उसमें ज्ञान आता है, बिना सत्संग नहीं आता । 
(क्रमशः)

बुधवार, 21 जनवरी 2026

दयालपुरा का चातुर्मास ~

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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उतराध(हरियाणा) की रामत ~ 
हांसी से विदा होकर आचार्य उदयरामजी महाराज उतराध की रामत करने पधारे । जहां- जहां स्थानधारी साधुओं तथा सेवकों का आग्रह था वहां-वहां पधार कर अपने दर्शन सत्संग से उनको आनन्दित किया । इस रामत में बालक निश्‍चलदासजी को देखकर आचार्य उदयरामजी ने कह दिया था कि - यह महान् विद्वान् होगा ।
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कहा भी है - 
संतों को हो जात है, होनहार का ज्ञान ।
उदयराम ने कराया, निश्‍चल का सम्मान ॥३१७ ॥द्द. त. ११ 
उतराध की रामत करके फिर नारायणा दादूधाम की ओर चले । मार्ग के निज सेवकों तथा धार्मिक जनता को निर्गुण ब्रह्म भक्ति का उपदेश करते हुये शनै: शनै नारायणा दादूधाम दादूद्वारे में पधार गये और यहां भजन उपदेश करने लगे ।  
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दयालपुरा का चातुर्मास ~ 
वि. सं. १९२२ के चातुर्मास का निमंत्रण आचार्य उदयरामजी महाराज को चम्पादासजी दयालपुरा वालों ने दिया । चातुर्मास का समय समीप आने पर आचार्य उदयरामजी महाराज ने शिष्य संत मंडल के सहित नारायणा दादूधाम से चातुर्मास करने के लिये दयालपुरा को प्रस्थान किया । मार्ग के स्थानधारी साधुओं तथा सेवकों को अपने दर्शन सत्संग से आनन्दित करते हुये समय पर दयालपुरा पहुंच गये । 
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चम्पादास जी ने विधि विधान से आचार्य जी का सामेला किया और ले जाकर नियत स्थान पर ठहराया । चातुर्मास आरंभ हो गया । चातुर्मास के कार्यक्रम नियम पूर्वक प्रतिदिन होने लगे । प्रात: दादूवाणी की कथा, पद गायन, संकीर्तन, फिर भोजन की पंक्ति । मध्य दिन का सत्संग, पदगायन, नाम कीर्तन, सायं आरती ‘दादूराम’ मंत्र की ध्वनि । 
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जागरण के दिन जागरण होता था । आस- पास के स्थानधारी साधुओं की रसोइंया भी आती थीं । चातुर्मास समाप्ति के दिन तो आसपास के साधुओं व सेवकों का मेला सा हो गया था । समाप्ति के दिन दादूवाणी जी की आरती उतारी गई । आचार्य जी को मर्यादानुसार भेंट दी । संतों को वस्त्र दिये । आज भोजन के समय पंक्ति भी विशाल लगी थी । 
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श्‍वेत हंसों की सी पंक्ति विराज रही थी । बीच-बीच में कषाय वस्त्र धारी विरक्त दिखाई दे रहे थे और वैसे ही विशाल जटाधारी तपस्वी संतों के भी बीच-बीच में दर्शन हो रहे थे । दर्शकों के हृदय के आनन्द को बढाती हुई संत पंक्ति निर्गुण ब्रह्म के भोग लगाकर आचार्य जी के आज्ञा देने पर निरंजन राम को स्मरण करते हुये जीमने लगी । 
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भोजन पूरा हो जाने पर वृद्ध(ब्रह्म) भगवान की, दादूजी की, अन्य श्रेष्ठ संतों और नारायणा दादूधाम के आचार्यों की जय बोलकर पंक्ति उठ गई । उक्त प्रकार आज का संतों का मेला अच्छा रहा । दूसरे दिन आये हुये अपने प्रिय अतिथियों को सप्रेम विदा कर दिया । आचार्यजी को भी विधि विधान से विदा करके आशीर्वाद प्राप्त किया ।आचार्यजी दयालपुरा से विदा होकर शनै: शनै: मार्ग की धार्मिक जनता को अपने दर्शन सत्संग से सुख प्रदान करते हुये नारायणा दादूधाम में पधार गये ।
(क्रमशः)  

*१७. बचन बिबेक को अंग ५/८*

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१७. बचन बिबेक को अंग ५/८*
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सुन्दर सुनतें होइ सुख, तब ही मुख तें बोल । 
आक बाक बकि और की, बृथा न छाती छोल ॥५॥
अतः बुद्धिमान् पुरुष को ऐसे वचन बोलने चाहियें जो सुनने वाले को सुखप्रद एवं शान्तिप्रद हों । उसे सदा ध्यान रखना चाहिये कि सुनने वाले के हृदय को उसके निरर्गल एवं निरर्थक वचनों से कोई व्यर्थ आघात(हार्दिक कष्ट = छाती छोल) न हो ॥५॥
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सुन्दर वाही वचन है, जा महिं कछू बिबेक । 
ना तरु झेरा मैं पर्यौ, बोलत मानौ भेक ॥६॥
सभ्य समाज में बैठ कर बुद्धिमान् पुरुष का ऐसा ही वचन उचित माना जाता है जो विवेकपूर्ण, हितकर, सुखप्रद एवं शान्तिप्रद हो; अन्यथा उस का वह सब कुछ बोला हुआ वैसा ही समझा जायगा जैसे कोई जल से भरे गड्ढे(झेरा) पर बैठा हुआ मैंढक बोल रहा हो ॥६॥
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सुन्दर वाही बोलिवौ, जा बोलै में ढंग । 
नातरु पशु बोलत सदा, कौंन स्वाद रस रंग ॥७॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - ज्ञानवान् पुरुष को सभ्य रीति एवं नीति से युक्त वचन ही बोलना चाहिये; अन्यथा उस का बोला हुआ वचन पशुओं के तुल्य ही समझा जायगा । क्या घोड़ों का हिनहिनाना, भैसों का अरड़ाना या ऊंटों का बलबलाना किसी को प्रिय लगता है ! ॥७॥
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घूघू कउवा रासिभा, ये जब बोलहिं आइ । 
सुन्दर तिनकौ बोलिबौ, काहू कौं न सुहाइ ॥८॥
उल्लू(घूघू), कौआ या गधा जब कभी हमारे समीप आकर बोलते हैं तो क्या उनकी वह शब्दध्वनि हमको कर्णप्रिय लगती है । वह किसी को भी प्रिय नहीं लगती ! ॥८॥
(क्रमशः)  

*नरेन्द्र की उच्च अवस्था*

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🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*दादू मैं क्या जानूँ क्या कहूँ,*
*उस बलिये की बात ।*
*क्या जानूँ क्यों ही रहै, मो पै लख्या न जात ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*नरेन्द्र की उच्च अवस्था*
"एक दिन कमरे के दरवाजे बन्द करके उन्होंने देवेन्द्रबाबू और गिरीशबाबू से मेरे सम्बन्ध में कहा था, 'उसके घर का पता अगर उसे बता दिया जायगा, तो फिर वह देह नहीं रख सकता ।"
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मास्टर - हाँ, यह तो हमने सुना है । हम लोगों से भी यह बात उन्होंने कई बार कही है । काशीपुर में रहते हुए एक बार तुम्हारी वही अवस्था हुई थी, क्यों ?
नरेन्द्र - उस अवस्था में मुझे ऐसा जान पड़ा कि मेरे शरीर है ही नहीं; केवल मुँह देख रहा हूँ । श्रीरामकृष्ण ऊपर के कमरे में थे । मुझे नीचे यह अवस्था हुई । उस अवस्था के होते ही में रोने लगा - यह मुझे क्या हो गया ? बूढ़े गोपाल ने ऊपर आकर उनसे कहा, 'नरेन्द्र रो रहा है ।'
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"जब उनसे मेरी मुलाकात हुई तब उन्होंने कहा, 'अब तेरी समझ में आया । पर कुंजी मेरे पास रहेगी ।' मैंने कहा, 'मुझे यह क्या हुआ ?'
"दूसरे भक्तों की ओर देखकर उन्होंने कहा, 'जब वह अपने को जान लेगा, तब देह नहीं रखेगा । मैंने उसे भुला रखा है ।' एक दिन उन्होंने कहा था, 'तू अगर चाहे तो हृदय में तुझे कृष्ण दिखायी दें ।' मैंने कहा, 'मैं कृष्ण-विष्ण नहीं मानता ।'
(नरेन्द्र और मास्टर हँसते हैं)
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"एक अनुभव मुझे और हुआ है । किसी किसी स्थान पर वस्तु या मनुष्य को देखने पर ऐसा जान पड़ता है जैसे पहले मैंने उन्हें कभी देखा हो, पहचाने हुए-से दीख पड़ते हैं । अमहर्स्ट स्ट्रीट में जब मैं शरद के घर गया, शरद से मैंने कहा, उस घर का सर्वांश जैसे मैं पहचानता हूँ, ऐसा भाव पैदा हो रहा है । घर के भीतर के रास्ते, कमरे, जैसे बहुत दिनों के पहचाने हुए हैं ।
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"मैं अपनी इच्छानुसार काम करता था, वे कुछ कहते न थे । मैं साधारण ब्राह्मसमाज का मेम्बर बना था, आप जानते हैं न ?"
मास्टर - हाँ, मैं जानता हूँ ।
नरेन्द्र - वे जानते थे कि वहाँ स्त्रियाँ भी जाया करती हैं । स्त्रियों को सामने रखकर ध्यान हो नहीं सकता । इसलिए इस प्रथा की वे निन्दा किया करते थे । परन्तु मुझे वे कुछ न कहते थे । एक दिन सिर्फ इतना ही कहा कि राखाल से ये सब बातें न कहना कि तु मेम्बर बन गया है, नहीं तो फिर उसे भी जाने की इच्छा होगी ।
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मास्टर - तुम्हारा मन ज्यादा जोरदार है, इसीलिए उन्होंने तुम्हें मना नहीं किया ।
नरेन्द्र - बड़े दुःख और कष्टों के झेलने के बाद यह अवस्था हुई है । मास्टर महाशय, आपको दुःख-कष्ट नहीं मिला - मैं मानता हूँ कि बिना दुःख-कष्ट के हुए कोई ईश्वर को आत्मसमर्पण नहीं करता –
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"अच्छा, अमुक व्यक्ति कितना नम्र और निरहंकार है ! उसमें कितनी विनय है ! क्या आप मुझे बता सकते हैं कि मुझमें किस तरह विनय आये ?"
मास्टर - उन्होंने तुम्हारे अहंकार के सम्बन्ध में बतलाया था कि यह किसका अहंकार है ।
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नरेन्द्र - इसका क्या अर्थ है ?
मास्टर - राधिका से एक सखी कह रही थी, 'तुझे अहंकार हो गया है, इसीलिए तूने कृष्ण का अपमान किया है ।' इसका उत्तर एक दूसरी सखी ने दिया । उसने कहा, 'हाँ, राधिका को अहंकार तो हुआ है परन्तु यह अहंकार है किसका ?' - अर्थात्, श्रीकृष्ण मेरे पति हैं - यह अहंकार है, - इस 'अहं' भाव को श्रीकृष्ण ने ही उसमें रखा है । श्रीरामकृष्ण के कहने का अर्थ यह है कि ईश्वर ने ही तुम्हारे भीतर यह अहंकार भर रखा है, अपना बहुतसा कार्य करायेंगे, इसलिए ।
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नरेन्द्र - परन्तु मेरा 'अहं' पुकारकर कहता है कि मुझे कोई क्लेश नहीं है ।
मास्टर - (सहास्य) - हाँ, तुम्हारी इच्छा की बात है ।
(दोनों हँसते हैं)
अब दूसरे दूसरे भक्तों की बात होने लगी - विजय गोस्वामी आदि की ।
नरेन्द्र - विजय गोस्वामी की बात पर उन्होंने कहा था, 'यह दरवाजा ठेल रहा है ।’
मास्टर - अर्थात् अभी तक घर के भीतर घुस नहीं सके ।
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"परन्तु श्यामपुकुरवाले घर में विजय गोस्वामी ने श्रीरामकृष्ण से कहा था, 'मैंने आपको ढाके में इसी तरह देखा था, इसी शरीर में ।' उस समय तुम भी वहाँ थे ।
नरेन्द्र - देवेन्द्रबाबू, रामबाबू ये लोग भी संसार छोड़ेंगे । बड़ी चेष्टा कर रहे हैं । रामबाबू ने छिपे तौर पर कहा है, दो साल बाद संसार छोड़ेंगे ।
मास्टर - दो साल बाद ? शायद लड़के-बच्चों का बन्दोबस्त हो जाने पर ?
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नरेन्द्र - और यह भी है कि घर भाड़े से उठा देंगे और एक छोटासा मकान खरीद लेंगे । उनकी लड़की के विवाह की व्यवस्था अन्य सम्बन्धी कर लेंगे ।
मास्टर - नित्यगोपाल की अच्छी अवस्था है - क्यों ?
नरेन्द्र- क्या अवस्था है ?
मास्टर - कितना भाव होता है ! - ईश्वर का नाम लेते ही आँसू बह चलते हैं - रोमांच होने लगता है !
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नरेन्द्र - क्या भाव होने से ही बड़ा आदमी हो गया ?
"काली, शरद, शशी, सारदा - ये सब नित्यगोपाल से बहुत बड़े आदमी हैं । इनमें कितना त्याग है ! नित्यगोपाल उनको (श्रीरामकृष्ण को) मानता कहाँ है ?"
मास्टर - उन्होंने कहा भी है कि वह यहाँ का आदमी नहीं है । परन्तु श्रीरामकृष्ण पर भक्ति तो वह खूब करता था, मैंने अपनी आँखों से देखा है ।
नरेन्द्र - क्या देखा है आपने ?
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मास्टर - जब मैं पहले-पहल दक्षिणेश्वर जाने लगा था, तब श्रीरामकृष्ण के कमरे से भक्तों का दरबार जाने पर, एक दिन बाहर आकर मैंने देखा - नित्यगोपाल घुटने टेककर बगीचे की लाल सुरखीवाली राह पर श्रीरामकृष्ण के सामने हाथ जोड़े हुए था, श्रीरामकृष्ण खड़े थे । चाँदनी बड़ी साफ थी । श्रीरामकृष्ण के कमरे के ठीक उत्तर तरफ जो बरामदा है उसी के उत्तर ओर लाल सुरखीवाला रास्ता है । उस समय वहाँ और कोई न था । जान पड़ा, नित्यगोपाल शरणागत हुआ है, और श्रीरामकृष्ण उसे आश्वासन दे रहे हैं ।
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नरेन्द्र - मैंने नहीं देखा ।
मास्टर - और बीच बीच में श्रीरामकृष्ण कहते थे, उसकी परमहंस अवस्था है । परन्तु यह भी मुझे खूब याद है, श्रीरामकृष्ण ने उसे स्त्री भक्तों के पास जाने की मनाही की थी । बहुत बार उसे सावधान कर दिया था ।
नरेन्द्र - और उन्होंने मुझसे कहा था, 'उसकी अगर परमहंस अवस्था है तो धन के पीछे क्यों भटकता है ?' और उन्होंने यह भी कहा था, 'वह यहाँ का आदमी नहीं है । जो हमारे अपने आदमी हैं, वे यहाँ सदा आते रहेंगे। ।
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"इसीलिए तो वे बाबू पर नाराज होते थे । इसलिए कि वह सदा नित्यगोपाल के साथ रहता था, और उनके पास ज्यादा आता न था ।
“मुझसे उन्होंने कहा था, 'नित्यगोपाल सिद्ध है - वह एकाएक सिद्ध हो गया है - आवश्यक तैयारी के बिना । वह यहाँ का आदमी नहीं है; अगर अपना होता तो उसे देखने के लिए मैं कुछ भी तो रोता, परन्तु उसके लिए में नहीं रोया ।'
"कोई-कोई उसे नित्यानन्द कहकर प्रचार कर रहे हैं । परन्तु उन्होंने (श्रीरामकृष्ण ने) कितनी ही बार कहा है, 'मैं ही अद्वैत, चैतन्य और नित्यानन्द हूँ । एक ही आधार में मैं उन तीनों का समष्टि-रूप हूँ ।"
(क्रमशः)

*३. श्री गुरुदेव का अंग ~८५/८८*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी* टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*३. श्री गुरुदेव का अंग ~८५/८८*
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*रज्जब स्वर्ग नसेनी१ सद्गुरु, सावधान शिष जाँहिं ।*
*शून्य माँहिं चैतन्य है, ता में सहज समाहि ॥८५॥*
सद्गुरु का ज्ञान ईश्वर१ के पास पहुँचने की सीढी है, किन्तु जो सावधान शिष्य होते हैं वे ही उस पर चढ़कर अर्थात उसे धारण करके ईश्वर के पास जाते हैं और विकार - शून्य निर्विकल्प समाधि में स्थिर जो चेतन स्वरूप है, उसका साक्षात्कार करके अनायास उसी में समा जाते हैं ।
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*गुरु अगस्त१ गगन२ हि रहै, शिष समुद्र धर३ बास ।*
*रजब ऊंचहु के मिल्यूं, सहज गये आकाश ॥८६॥*
जैसे सूर्य१ आकाश में रहता है और समुद्र पृथ्वी३ पर रहता है, किन्तु सूर्य की गर्मी से समुद्र - जल आकाश में चढ़ जाता है । वैसे ही गुरु की वृत्ति ब्रह्म२ में रहती है और शिष्य की वृत्ति माया३ में अर्थात मायिक शरीरादि में रहती है, किन्तु श्रेष्ठ गुरुदेव के सत्संग से वह सहज ही ब्रह्म में चली जाती है, अर्थात ब्रह्माकार ही रहने लगती है ।
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*सद्गुरु सूरज ले चढे, शिष सत सलिल सुभाइ ।*
*जन रज्जब नर नीर ज्यों, नीचा आपै जाइ ॥८७॥*
यह सत्य है कि स्वभाव से जल और नर की गति अपने आप नीचे की ओर ही होता है, किन्तु सूर्य की किरणों से जल आकाश को जाता है और गुरु की कृपा से नर परब्रह्म को प्राप्त होता है ।
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*रज्जब ताँबे लोह सौ, बहुत भांति के नंग१ ।*
*महापुरुष पारस मिले, कुल कंचन के अंग२ ॥८८॥*
ताँबे और लोहे से बनी हुई बहुत प्रकार की वस्तुएँ१ हों और वे पारस से स्पर्श हो जाएँ, तो सब सुवर्ण हो जाती हैं । वैसे ही नाना प्रकार के स्वभाव वाले प्राणी महापुरुष गुरुदेव से जा मिलते हैं, तब संपूर्ण रूप से ब्रह्म के ही स्वरूप२ हो जाते हैं ।
(क्रमशः)

मंगलवार, 20 जनवरी 2026

वराहनगर मठ

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🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*तिल तिल हौं तो तारी वाटड़ी जोऊँ ।*
*एने रे आँसूड़े वाहला, मुखड़ो धोऊँ ॥२॥*
*ताहरी दया करि घर आवे रे वाहला ।*
*दादू तो ताहरो छे रे, मा कर टाला ॥३॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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परिच्छेद २, वराहनगर मठ
(१)नरेन्द्रादि भक्तों की साधना । नरेन्द्र की पूर्वकथा
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आज शुक्रवार है, २५ मार्च, १८८७ ई.। मास्टर मठ के भाइयों को देखने के लिए आये हैं । साथ देवेन्द्र भी हैं । मास्टर प्रायः आया करते हैं और कभी कभी रह भी जाते हैं । गत शनिवार को वे आये थे, शनि, रवि और सोम, तीन दिन रहे थे । मठ के भाइयों में, खासकर नरेन्द्र में, इस समय तीव्र वैराग्य है ।
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इसीलिए मास्टर उत्सुकतापूर्वक उन्हें देखने के लिए आते हैं । रात हो गयी है । आज रात को मास्टर मठ में ही रहेंगे ।
सन्ध्या हो जाने पर शशी ने ईश्वर के मधुर नाम का उच्चारण करते हुए ठाकुरघर में दीपक जलाया और धूप-धूना सुलगाने लगे । धूपदान लेकर कमरे में जितने चित्र हैं, सब के पास गये और प्रणाम किया ।
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फिर आरती होने लगी । आरती वे ही कर रहे हैं । मठ के सब भाई, मास्टर तथा देवेन्द्र, सब लोग हाथ जोड़कर आरती देख रहे हैं, साथ ही साथ आरती गा रहे है - "जय शिव ओंकार, भज शिव ओंकार ! ब्रह्मा विष्णु सदाशिव ! हर हर हर महादेव !"
नरेन्द्र और मास्टर बातचीत कर रहे हैं । नरेन्द्र श्रीरामकृष्ण के पास जाने के समय की बहुतसी बातें कह रहे हैं । नरेन्द्र की उम्र इस समय २४ साल २ महीने की होगी ।
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नरेन्द्र - पहले-पहल जब मैं गया, तब एक दिन भावावेश में उन्होंने कहा, 'तू आया है !'
"मैंने सोचा, यह कैसा आश्चर्य है ! ये मानो मुझे बहुत दिनों से पहचानते हैं । फिर उन्होंने कहा, 'क्या तू कोई ज्योति देखता है ?'
"मैंने कहा, 'जी हाँ । सोने से पहले, दोनों भौहों के बीच की जगह के ठीक सामने एक ज्योति घूमती रहती है ।' "
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मास्टर - क्या अब भी देखते हो ?
नरेन्द्र - पहले बहुत देखा करता था । यदु मल्लिक के भोजनागार में मुझे छूकर न जाने उन्होंने मन ही मन क्या कहा, मैं अचेत हो गया था । उसी नशे में मैं एक महीने तक रहा था ।
"मेरे विवाह की बात सुनकर माँ काली के पैर पकड़कर वे रोये थे । रोते हुए कहा था, 'माँ, वह सब फेर दे - माँ, नरेन्द्र कहीं डूब न जाय !'
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"जब पिताजी का देहान्त हो गया, और माँ और भाइयों को भोजन तक की कठिनाई हो गयी तब मैं एक दिन अन्नदा गुहा के साथ उनके पास गया था ।
"उन्होंने अन्नदा गुहा से कहा, 'नरेन्द्र के पिताजी का देहान्त हो गया है, घरवालों को बड़ा कष्ट हो रहा है, इस समय अगर इष्टमित्र उसकी सहायता करें तो बड़ा अच्छा हो ।'
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"अन्नदा गुहा के चले जाने पर मैं उनसे कुछ रुष्टता से कहने लगा, 'क्यों आपने उनसे ये बातें कही ?' यह सुनकर वे रोने लगे थे । कहा, 'अरे ! तेरे लिए मैं द्वार-द्वार भीख भी माँग सकता हूँ !'
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"उन्होंने प्यार करके हम लोगों को वशीभूत कर लिया था । आप क्या कहते हैं ?"
मास्टर - इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है । उनके स्नेह का कोई कारण नहीं था ।
नरेन्द्र - मुझसे एक दिन अकेले में उन्होंने एक बात कही । उस समय और कोई न था । यह बात आप और किसी से न कहियेगा ।
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मास्टर – नहीं । हाँ, क्या कहा था ?
नरेन्द्र - उन्होंने कहा, 'सिद्धियों के प्रयोग करने का अधिकार मैंने तो छोड़ दिया है, परन्तु तेरे भीतर से उनका प्रयोग करूँगा - क्यों, तेरा क्या कहना है ?' मैंने कहा, 'नहीं, ऐसा तो न होगा ।'
"उनकी बात मैं उड़ा देता था । आपने उनसे सुना होगा । वे ईश्वर के रूपों के दर्शन करते थे, इस बात पर मैंने कहा था, 'यह सब मन की भूल है ।'
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"उन्होंने कहा, 'अरे मैं कोठी पर चढ़कर जोर जोर से पुकारकर कहा करता था - अरे, कहाँ है कौन भक्त, चले आओ, तुम्हें न देखकर मेरे प्राण निकल रहे हैं । माँ ने कहा था, - 'अब भक्त आयेंगे,' अब देख, सब बातें मिल रही हैं ।'
"तब मैं और क्या कहता, चुप हो रहा ।
(क्रमशः)

*१७. बचन बिबेक को अंग १/४*

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१७. अथ बचन बिबेक को अंग १/४*
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सुंदर तबही बोलिये, समझि हिये मैं पैठि । 
कहिये बात बिबेक की, नहिंतर चुप ह्वै बैठि ॥१॥
विवेकपूर्ण वचन : श्रीसुन्दरदासजी महाराज कहते हैं - वक्ता को कोई भी बात मुख से बोलने से पूर्व उस पर अपने हृदय में विचार कर लेना चाहिये । यदि वह बात विवेकपूर्ण(हितकारी) हो तो उसे बोलना चाहिये, अन्यथा चुप रहना चाहिये ॥१॥
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सुन्दर मौंन गहे रहै, जानि सकै नहिं कोइ । 
बिन बोलै गुरुवा कहैं, बोलै हरवा होइ ॥२॥
ऐसा पुरुष जब तक मौन रहेगा तब तक अन्य लोग कुछ भी न जान सकेंगे कि वह क्या कहना चाहता है । जब तक वह नहीं बोलेगा तभी तक सामने वाले के सम्मुख उसकी गम्भीरता(गुरुता) बनी रहेगी; बोल देने पर, यदि वह उसकी बोली हुई बात अविवेकपूर्ण हुई तो उसमें हल्कापन आ जायगा अर्थात् उसकी वह बात महत्त्वहीन हो जायगी ॥२॥
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सुन्दर मौंन गहे रहै, तब लगि भारी तोल । 
मुख बोलैं तें होत है, सब काहू कौ मोल ॥३॥ 
बुद्धिमान् पुरुष जब तक मौन रहता है तब तक समाज में उस की प्रतिष्ठा(गम्भीरता) बनी रहती है । मुख से कुछ बोलने के साथ ही समाज उसकी बुद्धिमत्ता, विद्वत्ता या महत्त्व परख लेता है ॥३॥
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सुन्दर यौं ही बकि उठै, बोलै नहीं बिचारि । 
सबही कौं लागै बुरौ, देत ढीम सौ डारि ॥४॥
यदि कोई पुरुष समाज में बैठ कर असम्बद्ध, निरर्थक या अविवेकपूर्ण वचन बोलता है, विचारपूर्वक नहीं बोलता है तो ऐसा पुरुष वहाँ उपस्थित सभी लोगों की दृष्टि में अपना महत्त्व(गरिमा) खो देता है । उस समय वहाँ बैठे हुए लोगों को उसके बोले हुए वे वचन ऐसे ही लगते हैं जैसे कोई किसी पर ढेला(= ढीम) फेंक रहा हो ॥४॥
(क्रमशः) 

वि. सं. १९२० का चातुर्मास ~

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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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वि. सं. १९२० का चातुर्मास ~ 
उक्त दोनों संतों ने संत मंडल सहित आचार्यजी का मर्यादानुसार सामेला किया और उचित स्थान पर ठहराया । चातुर्मास की मर्यादा के अनुसार चातुर्मास में होने वाले सत्संगादि बहुत अच्छी पद्धति से होते रहे । चातुर्मास समाप्ति पर आचार्यजी को उचित भेंट देकर तथा सब संतों को वस्त्र देकर चातुर्मास समाप्त किया । फिर आनन्द के साथ संत मंडल के सहित आचार्यजी को विदा किया ।  
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ऊधोदासजी की सेवा ~ 
वि. सं. १९२० में सदरपूरा के महन्त ऊधोदासजी ने नारायणा दादूधाम दादूद्वारे के सदाव्रत विभाग को ५१ बीघा भूमि भेंट की जिस की आय सदाव्रत में ही खर्च की जाय, अन्य कार्यों में नहीं । महन्त ऊधोदासजी के कथनानुसार ही उसकी आय सदाव्रत में भूखे लोगों को अन्न देने में ही उपयोग करने की व्यवस्था कर दी गई । 
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सीकर नरेश का आना ~ 
वि. सं. १९२० के फाल्गुण कृष्णा ९ मी को सीकर के राव राजा भैंरुसिंहजी नारायणा दादूधाम की यात्रा करने तथा आचार्य उदयरामजी महाराज का दर्शन व प्रवचन सुनने के लिये आये । स्थान की ओर से उनका स्वागत किया गया । वे प्रथम श्रीदादू मंदिर का दर्शन करने मंदिर में गये । फिर उनको खेजडा का दर्शन कराया । छत्रियों पर गये । 
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आचार्यजी का दर्शन करके मर्यादानुसार भेंट चढाई तथा सत्संग किया । अन्य भी जो भजनानन्दी, विरक्त, योगी, ज्ञानी संत उस समय दादूधाम में थे उन सब का ही नरेश ने दर्शन सत्संग किया । जितनी उनकी इच्छा थी उतने वे ठहर कर आचार्यजी से मिले । मंदिर में प्रणाम करके फिर सीकर राव राजा भैंरुसिंहजी अपनी इच्छानुसार चले गये । 
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हांसी चातुर्मास ~ 
वि. सं. १९२१ में चैनरामजी हांसी वालों ने आचार्य उदयरामजी का शिष्य मंडल के सहित हांसी में अपने स्थान पर चातुर्मास मनाया था । इससे आचार्य उदयरामजी महाराज अपने शिष्य मंडल के सहित हांसी में चातुर्मास करने के लिये नारायणा दादूधाम से चलकर मार्ग के भक्तों को अपने दर्शन, सत्संग से कृतार्थ करते हुये हांसी पहुँचे । 
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तब चैनरामजी ने भक्त मंडल के सहित बाजे गाजे से संकीर्तन करते हुये आकर आचार्य उदयरामजी महाराज की अगवानी की और मर्यादानुसार भेंट चढाकर सत्यराम बोलते हुये दंडवत प्रणाम शिष्टाचार हो जाने पर आचार्यजी को लेकर संकीर्तन करते हुये नियत स्थान पर पहुँचे । 
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हांसी नगर में आचार्यजी के आने की बात शीघ्र ही फैल गई । भक्त लोग दर्शन करने आने लगे । आज के दिन दर्शनार्थियों का बहुत आना जाना रहा । महात्मा चैनरामजी के भक्तों ने आचार्य जी की तथा सभी की सेवा की व्यवस्था सुचारु रुप से कर दी । चातुर्मास आरंभ के दिन चातुर्मास के संबन्धी कार्यक्रम विधि विधान से सब आरंभ हो गये । 
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प्रात: दादूवाणी की कथा, मध्य दिन में गीता आदि पर विद्वान् संतों के प्रवचन, संकीर्तन, गायक संतों के पद गायन, आरती, नाम ध्वनि अपने- अपने समय पर सब होने लगे । जागरण के दिन जागरण होने लगे । हांसी की भाग्य शालिनी जनता उक्त सभी कार्यक्रमों में सप्रेम भाग लेती थी । 
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भक्त लोग संत सेवा भी श्‍लाघनीय रुप में करते थे । उक्त प्रकार हांसी चातुर्मास बहुत अच्छा हुआ । चातुर्मास समाप्ति पर महात्मा चैनरामजी ने तथा हांसी के भक्तों ने मर्यादानुसार आचार्यजी को भेंट, संतों को वस्त्र देकर सस्नेह विदा किया ।
(क्रमशः)  

बूडसू गमन ~

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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बूडसू गमन ~ 
कुचामण से विदा होकर आचार्यजी अपने मंडल के सहित बूडसू के ठाकुर के आग्रह से बूडसू पधारे । बूडसू ठाकुर साहब ने आचार्य उदयराम जी महाराज का विधि सहित अतिथि सत्कार किया और आपसे गुरुमंत्र व उपदेश ग्रहण किया । अच्छी सेवा की । 
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बूडसू की जनता ने आचार्य उदयरामजी महाराज से दादूवाणी का प्रवचन श्रवण करके अति आनन्द प्राप्त किया । उक्त प्रकार बूडसू ठाकुर साहब तथा वहां की जनता को उपदेश देकर वहां से मर्यादा पूर्वक विदा हुये और मार्ग के लोगों को अपने दर्शन तथा उपदेशों से कृतार्थ करते हुये नारायणा दादूधाम में पधार गये ।
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रामत व चातुर्मास ~ 
वि. सं. १९२० में जयपुरवाटी की रामत की । इस रामत में स्थानधारी साधुओं के तथा भक्त जनों के आग्रह से अनेक ग्रामों में पधारे । भाटों वाले ग्राम में आपके रथ में खराबी आ गई । वहां के खाती को बुलाया किन्तु उसका पुत्र मर गया था अत: शोक से व्यथित होने से नहीं आया । 
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आपने ध्यान द्वारा उसके दुख को जान लिया और उसको ४ पुत्र होने का वर दिया फिर उसने रथ ठीक कर दिया । कहा भी है - 
संत दुखी को देखकर, द्रवित होत तत्काल ।
उदयराम ने कर दिया, चवसुत देय निहाल ॥३१२॥द्द. त. ११  
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दादूवाणी का प्रवचन श्रवण कराते हुये तथा सेवकों को गुरु मंत्र का उपदेश देते हुये शनै: शनै: राजगढ पधारे । कुछ दिन राजगढ के भक्तों को तथा आसपास के जो भक्त लोग दर्शनार्थ आते थे उन सबको उपदेश देते रहे । फिर वहां से रामत करते हुये चातुर्मास करने के लिये संत ब्रताबरदासजी मानदासजी के स्थान पर पधारे ।
(क्रमशः)  

सोमवार, 19 जनवरी 2026

*१६. चाणक को अंग २३/२५*

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१६. चाणक को अंग २३/२५*
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केस लुचाइ न ह्वै जती, कान फराइ न जोग । 
सुंदर सिद्धि कहा भई, बादि हंसाये लोग ॥२३॥
क्या कोई केवल शिर के बाल नोचते रहने से 'यति' कहला सकता है । या केवल कान फड़ाने से 'योगी' कहला सकता है ! इतने से कार्य से कोई सिद्धि प्राप्त नहीं होती; अपितु समाज उसका परिहास एवं अपमान हो करता है ॥२३॥
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सुंदर गये टटांबरी, बहुरि दिगम्बर होइ । 
पुनि बाघम्बर वोढि कै, बाघ भयौ घर खोइ ॥२४॥
आरम्भ में कोई पाषण्डी टाट(बोरी) ओढकर लोकदिखावे के लिये साधना का ढोंग करता था, पुनः लोक में अपनी प्रतिष्ठा बढाने हेतु यह दिगम्ब (नग्न) रहने लगा । अन्त में उसने अपने सम्मान में वृद्धि हेतु बाघम्बर पहन कर अपना भयोत्पादक रूप बना लिया । महाराज सुन्दरदासजी कहते हैं - ऐसा पाषण्ड कर के उसने अपना साधारण गृहस्थ जीवन भी नष्ट कर लिया ॥२४॥
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रक्त पीत स्वेतांबरी, काथ रंगै पुनि जैंन । 
सुंदर देखै भेख सब, कहूं न देख्या चैंन ॥२५॥ 
इति चाणक को अंग ॥१६॥
ऐसे पाषण्डी लोग समय समय पर लाल, पीले, श्वेत या कषाय वस्त्र पहन कर साधु वेष धारण कर पाषण्ड करते हैं, या कभी जैन बन जाते हैं । महाराज सुन्दरदासजी कहते हैं - हम ने ऐसे साधु बहुत से देखे हैं; परन्तु उनमें से किसी का भी जीवन हम को सुखमय नहीं दिखायी दिया ॥२५॥
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इति चाणक का अङ्ग सम्पन्न ॥१६॥
(क्रमशः) 

गेरुआ वस्त्र

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🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*परम गुरु सो प्राण हमारा,*
*सब सुख देवै सारा ।*
*दादू खेलै अनन्त अपारा,*
*अपारा सारा हमारा ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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शाम हो गयी । श्रीठाकुरघर में धूना देकर शशी दूसरे कमरों में भी धूना ले गये । हरएक देव-देवी के चित्र के पास प्रणाम करके बड़ी भक्ति के साथ उनका नाम ले रहे हैं । "श्रीश्रीगुरुदेवाय नमः । श्रीश्रीकालिकायै नमः । श्रीश्रीजगन्नाथ-सुभद्रा -बलरामेभ्यो नमः । श्रीश्रीषड्‌भुजाय नमः । श्रीश्रीराधावल्लभाय नमः । श्रीनित्यानन्दाय, श्रीअद्वैताय, श्रीभक्तेभ्यो नमः। श्रीगोपालाय, श्रीश्रीयशोदायै नमः। श्रीरामाय, श्रीलक्ष्मणाय, श्रीविश्वामित्राय नमः ।"
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मठ के बिल्ववृक्ष के नीचे पूजा का आयोजन हो रहा है । रात के नौ बजे का समय होगा । अभी पहली पूजा होगी, साढ़े ग्यारह बजे दूसरी। चारों पहर चार पूजाएँ होंगी। नरेन्द्र, राखाल, शरद, काली, सीतीं के गोपाल आदि मठ के सब भाई बेल के नीचे उपस्थित हो गये । भूपति और मास्टर भी आये हुए हैं । मठ के भाइयों में से एक व्यक्ति पूजा कर रहा है ।
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काली गीता-पाठ कर रहे हैं - सैन्यदर्शन, - सांख्ययोग, - कर्मयोग । पाठ के साथ ही बीच बीच में नरेन्द्र के साथ विचार चल रहा है ।
काली - मैं ही सब कुछ हूँ । सृष्टि, स्थिति और प्रलय मैं कर रहा हूँ ।
नरेन्द्र - मैं सृष्टि कहाँ कर रहा हूँ ? एक दूसरी ही शक्ति मुझसे करा रही है । ये अनेक प्रकार के कार्य - यहाँ तक कि चिन्ता भी वही करा रही है ।
मास्टर - (स्वगत) - श्रीरामकृष्ण कहते थे, 'जब तक कोई यह सोचता है कि मैं ध्यान कर रहा हूँ, तब तक वह आदिशक्ति के ही राज्य में है । शक्ति को मानना ही होगा ।'
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काली चुपचाप थोड़ी देर तक चिन्तन करते रहे । फिर कहने लगे, "जिन कार्यों की तुम चर्चा कर रहे हो, वे सब मिथ्या हैं और इतना ही नहीं, स्वयं 'चिन्तन' तक मिथ्या है । मुझे तो इन चीजों के विचार मात्र पर हँसी आती है ।"
नरेन्द्र - 'सोऽहम्' के कहने पर जिस 'मैं' का ज्ञान होता है, वह यह 'मैं' नहीं है । मन, देह, यह सब छोड़ देने पर जो कुछ रहता है, वही वह 'मैं' है ।
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गीता-पाठ हो जाने पर काली शान्ति-पाठ कर रहे हैं - 'ॐ शान्तिः ! शान्तिः ! शान्तिः !'
अब नरेन्द्र आदि सब भक्त खड़े होकर नृत्य-गीत करते हुए बिल्ववृक्ष की बार बार परिक्रमा करने लगे । बीच बीच में एक स्वर से 'शिव गुरु ! शिव गुरु !' इस मन्त्र का उच्चारण कर रहे हैं ।
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कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी, रात्रि गम्भीर हो रही है । चारों ओर अन्धकार छाया हुआ है, जीव-जन्तु सब मौन हैं । गेरुआ वस्त्र पहने हुए इन आकौमारविरागी भक्तों के कण्ठ से उच्चारित 'शिव गुरु ! शिव गुरु !' की महामन्त्रध्वनि मेघ की तरह गम्भीर रव से अनन्त आकाश में गूँजकर अखण्ड सच्चिदानन्द में लीन होने लगी । पूजा समाप्त हो गयी । उषा की लाली फैलने ही वाली है । नरेन्द्र आदि भक्तों ने इस ब्राह्म मुहूर्त में गंगास्नान किया ।
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सबेरा हो गया । स्नान करके भक्तगण मठ में श्रीठाकुरमन्दिर में जाकर श्रीरामकृष्ण को प्रणाम करके 'दानवों के कमरे' में आकर एकत्र होने लगे । नरेन्द्र ने सुन्दर नया गेरुआ वस्त्र धारण किया है । वस्त्र के सौन्दर्य के साथ उनके श्रीमुख और देह से तपस्यासम्भूत अपूर्व स्वर्गीय पवित्र ज्योति एक हो रही है । वदनमण्डल तेजपूर्ण और साथ ही प्रेमरंजित हो रहा है ।
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मानो अखण्ड सच्चिदानन्द सागर के एक स्फुट अंश ने ज्ञान और भक्ति की शिक्षा देने के लिए शरीर-धारण किया हो - अवतार-लीला की सहायता के लिए । जो देख रहा है, वह फिर आँखें नहीं फेर सकता । नरेन्द्र की आयु ठीक चौबीस वर्ष की है । ठीक इसी आयु में श्रीचैतन्य ने संसार छोड़ा था ।
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भक्तों के व्रत के पारण के लिए श्रीयुत बलराम ने कल ही फल और मिष्टान्न आदि भेज दिये थे । राखाल आदि दो-एक भक्तों के साथ नरेन्द्र कमरे में खड़े हुए कुछ जलपान कर रहे हैं । दो-एक फल खाते ही आनन्दपूर्वक कह रहे हैं - "धन्य हो बलराम - तुम धन्य हो !" (सब हँसते हैं)
अब नरेन्द्र बालक की तरह हँसी कर रहे हैं । रसगुल्ला मुख में डालकर बिलकुल निःस्पन्द हो गये । नेत्र निर्निमेष हैं । एक भक्त नरेन्द्र की अवस्था देखकर हँसी में उन्हें पकड़ने चले कि कहीं वे गिर न जायँ ।
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कुछ देर बाद - तब भी रसगुल्ले को मुख में ही रखे हुए - नरेन्द्र पलकें खोलकर कह रहे हैं - "मेरी – अवस्था - अच्छी - है - !"
(सब लोग ठहाका मारकर हँसने लगे)
सब लोगों को अब मिठाई दी गयी । मास्टर यह आनन्द की हाट देख रहे हैं । भक्तगण हर्षपूर्वक जयध्वनि कर रहे हैं –
"जय श्रीगुरुमहाराज ! जय श्रीगुरुमहाराज !"
(क्रमशः)

३. श्री गुरुदेव का अंग ~७७/८०

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी* टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*३. श्री गुरुदेव का अंग ~७७/८०*
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*सद्गुरु काढे सकल सौं, तन मन पर लेजाय ।*
*जन रज्जब राखे तहाँ, जहाँ निरंजन राय ॥७७॥*
सद्गुरु अपने उपदेश द्वारा धन, धाम और स्वजनादि सबके राग से निकालकर, तनाध्यास तथा मन के मनोरथों से भी परे जहाँ विश्व के अधिष्ठान निरंजन राम का साक्षात्कार होता है, उस निर्विकल्प समाधि में ले जाकर अपने आत्म - स्वरूप ब्रह्म में स्थित करते हैं । 
*तन मन शक्ति समुद्र गति, निर्मल नाम जहाज ।* 
*बादबान१ बुधि थंभ चढ़, गुरु सारे शिष काज ॥७८॥*
अध्यासरूप शरीर की शक्ति और चंचलतादि रूप मन की शक्ति का स्वरूप समुद्र के समान दुस्तर है, किन्तु गुरुदेव, निरंजन राम के निर्मल नाम का जहाज बनाकर तथा बुद्धिरूप स्तम्भ पर ज्ञानरूप वस्त्र१ चढाकर संसार से पार जाना रूप कार्य शिष्य का सिद्ध कर देते हैं ।
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*गुरु दीरध गोविन्द सौं, सारे शिष्य सुकाज ।*
*ज्यौं रज्जब मक्का बड़ा, परि पहुँचे बैठि जहाज ॥७९॥*
जैसे बड़ा तो मक्का तीर्थ ही है, किन्तु वहाँ जहाज पर बैठ कर पहुँचा जाता है । वैसे ही बड़े तो गोविन्द ही हैं, किन्तु गुरु उपदेश बिना गोविन्द की प्राप्ति कठिन है । गुरु शिष्य के मुक्ति रूप कार्य को सिद्ध करते हैं, अत: शिष्य की दृष्टि से गुरु गोविन्द से भी बड़े माने जाते हैं ।
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*सांई शून्य समीर१ सम, वायु वदन गुरु ठाट२ ।*
*गाल खाल के मारतौं, रज्जब निपजे घाट३ ॥८०॥*
ईश्वर आकाश के वायु१ के समान हैं, गुरु की बनावट२ मुख के वायु के समान है । आकाश के वायु से कोई शब्द नहीं बनता, किन्तु मुख के वायु की चोट गाल आदि चर्म स्थानों में लगती है, तब शब्दरूप शरीर३ बनता है और उन गुरु-मुख से निकले हुये शब्दों से शिष्यों को उद्धार होता है । अत: प्राणियों के उद्धार करने वाले गुरु ही हैं । 
(क्रमशः)

रविवार, 18 जनवरी 2026

*(२)नरेन्द्रादि भक्तों का शिवरात्रि व्रत*

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🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*दादू बूड रह्या रे बापुरे, माया गृह के कूप ।*
*मोह्या कनक अरु कामिनी,*
*नाना विधि के रूप ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*(२)नरेन्द्रादि भक्तों का शिवरात्रि व्रत*
आज सोमवार है, २१ फरवरी १८८७ । नरेन्द्र और राखाल आदि ने आज शिवरात्रि का उपवास किया है । आज से दो दिन बाद श्रीरामकृष्ण की जन्मतिथि-पूजा होगी । नरेन्द्र और राखाल आदि भक्तों में इस समय तीव्र वैराग्य है । एक दिन राखाल के पिता राखाल को घर ले जाने के लिए आये थे ।
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राखाल ने कहा, "आप लोग कष्ट करके क्यों आते हैं ? मैं यहाँ बहुत अच्छी तरह हूँ । अब आशीर्वाद दीजिये कि आप लोग मुझे भूल जायँ और मैं भी आप लोगों को भूल जाऊँ ।" इस समय सब लोगों में तीव्र वैराग्य है । सारा समय साधन भजन में ही जाता है । सब का एक ही उद्देश्य है कि किस तरह ईश्वर के दर्शन हों ।
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नरेन्द्र आदि भक्तगण कभी जप और ध्यान करते हैं, कभी शास्त्रपाठ । नरेन्द्र कहते हैं "गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने जिस निष्काम कर्म का उल्लेख किया है, वह पूजा, जप, ध्यान - यही सब है, सांसारिक कर्म नहीं ।"
आज सबेरे नरेन्द्र कलकत्ता गये हुए हैं । घर के मुकदमे की पैरवी करनी पड़ती है । अदालत में गवाह पेश करने पड़ते हैं ।
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मास्टर सबेरे नौ बजे के लगभग मठ में आये । कमरे में प्रवेश करने पर उन्हें देखकर श्रीयुत तारक मारे आनन्द के शिव के सम्बन्ध में रचित एक गाना गाने लगे - "ता थैया ता थैया नाचे भोला ।"
उनके साथ राखाल भी गाने लगे और गाते हुए दोनों नाचने लगे ।
यह गाना नरेन्द्र को लिखे अभी कुछ ही समय हुआ है ।
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मठ के सब भाइयों ने व्रत किया है । कमरे में इस समय नरेन्द्र, राखाल, निरंजन, शरद, शशी, काली, बाबूराम, तारक, हरीश, सींती के गोपाल, सारदा और मास्टर हैं । योगीन और लाटू वृन्दावन में हैं । उन लोगों ने अभी मठ नहीं देखा ।
आगामी शनिवार को शरद, काली, निरंजन और सारदा पुरी जानेवाले हैं - श्रीजगन्नाथजी के दर्शन करने के लिए ।
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श्रीयुत शशी दिनरात श्रीरामकृष्ण की सेवा में रहते हैं ।
पूजा हो गयी । शरद तानपूरा लेकर गा रहे हैं - "शंकर शिव बम् बम् भोला, कैलासपति महाराज राज ।"
नरेन्द्र कलकत्ते से अभी ही लौटे हैं । अभी उन्होंने स्नान भी नहीं किया । काली नरेन्द्र से मुकदमे की बातें पूछने लगे ।
नरेन्द्र - (विरक्तिपूर्वक) - इन सब बातों से तुम्हें क्या काम ?
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नरेन्द्र मास्टर आदि से बातें कर रहे हैं । नरेन्द्र कह रहे हैं - "कामिनी और कांचन का त्याग जब तक न होगा, तब तक कुछ न होगा । कामिनी नरकस्य द्वारम् । जितने आदमी हैं, सब स्त्रियों के वश में हैं । शिव और कृष्ण की बात और है । शक्ति को शिव ने दासी बनाकर रखा था । श्रीकृष्ण ने संसार-धर्म का पालन तो किया था, परन्तु वे कैसे निर्लिप्त थे ! उन्होंने वृन्दावन कैसे एकदम छोड़ दिया !"
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राखाल - और द्वारका का भी उन्होंने कैसा त्याग किया !
गंगा-स्नान करके नरेन्द्र मठ लौटे । हाथ में भीगी धोती है और अँगौछा । सारदा ने आकर नरेन्द्र को साष्टांग प्रणाम किया । उन्होंने भी शिवरात्रि के उपलक्ष्य में उपवास किया है । अब वे गंगा-स्नान के लिए जानेवाले हैं । नरेन्द्र ने पूजा-घर में जाकर श्रीरामकृष्ण को प्रणाम किया और फिर आसन लगाकर कुछ समय तक ध्यान करते रहे ।
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भवनाथ की बातें हो रही हैं । भवनाथ ने विवाह किया है । इसलिए उन्हें नौकरी करनी पड़ती है ।
नरेन्द्र कह रहे हैं, 'वे तो सब संसारी कीट हैं ।'
दिन ढलने लगा । शिवरात्रि की पूजा के लिए व्यवस्था हो रही है । बेल की लकड़ी और बिल्वदल इकट्ठे किये गये । पूजा के बाद होम होगा ।
(क्रमशः)

*१६. चाणक को अंग २०/२२*

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१६. चाणक को अंग २०/२२*
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मेल्है पाव उठाइ कै, बक ज्यौं मांडै ध्यान ।
बैठौ गटकै माछली, सुन्दर कैसौ ज्ञान ॥२०॥
कोई पाषण्डी साधु(लोगों को) अहिंसा धर्म पालन की दृढता दिखाने के लिये मार्ग में चलते समय अपने पैर भूमि पर इतना धीरे रखता है कि कोई चींटी आदि सुक्ष्म जन्तु भी पैर के नीचे आकर न मर जाय; और ध्यान समाधि का बगुले के समान दिखावा करता है । जब कि वह यथार्थ जीवन में परहिंसा हेतु निरन्तर तत्पर रहता है । श्रीसुन्दरदासजी पूछते हैं कि यह उस पाषण्डी का कैसा ध्यान है । उस पर कोई कैसे विश्वास करे ! ॥२०॥
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सुंदर जीव दया करै, न्यौता मानै नाहिं । 
माया छुवै न हाथ सौं, परकाला ले जाहिं ॥२१॥
कोई कोई पाषण्डी साधु किसी का भी निमन्त्रण इसलिये स्वीकार नहीं करते कि उस के कारण किस मत्स्य मृग आदि की हिंसा न हो । परन्तु ऐसे पाषण्डी अपने वास्तविक जीवन में ऐसे हिंसक या चौर होते हैं कि अवसर मिलने पर वे कहीं फटा पुराना चिथड़ा(वस्त्र) भी नहीं छोड़‌ते ॥२१॥
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भेख बनावै बहुत बिधि, जटा बधावैं सीस । 
माला पहिरै तिलक दे, सुंदर तजै न रीस ॥२२॥
अनेक पाषण्डी साधु अपने सिर पर बड़ी बड़ी जटा बढा लेते हैं, गले में लम्बी माला तथा मस्तक पर तिलक लगा लेते हैं; परन्तु वे दूसरों के प्रति क्रोध तथा ईर्ष्या नहीं त्याग सकते ॥२२॥
(क्रमशः) 

कुचामण गमन ~

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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आचार्यजी के स्थान पर सेवा की व्यवस्था पहले से ही अच्छी प्रकार कर दी गई थी । सेवक भी पास में रखने की व्यवस्था कर दी थी जिससे किसी संत को कोई आवश्यकता होती तो सेवक को सूचित कर देते थे । वह उसको पूरा कर देता था । उस दिन संपूर्ण जमात को रसोई बिसनदास जी ने ही दी । सायंकाल सबकी एक पंक्ति हुई थी । 
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उक्त प्रकार आज का दिन बहुत ही आनन्द के साथ व्यतीत हुआ । इस चातुर्मास में अनेक विद्वान संत पधारे थे । इस चातुर्मास का कार्यक्रम अन्य चातुर्मासों से विशेष तथा विलक्षण ही रहा था । भजन सत्संग दिन रात चौबीसों घंटे ही चलता रहता था । चित्त सत्संग में ही रमा रहता था । प्रात: दादूवाणी की कथा होती थी, उसके पश्‍चात् उपनिषद्, गीता, भागवत्, अध्यात्म रामायण आदि उच्चकोटि के अध्यात्म ग्रंथों के प्रवचन बारी-बारी से विद्वान संत करते रहते थे । एक के पश्‍चात् एक बैठकर श्रवण कराते थे । 
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प्रवचन बन्द होता तो नाम संकीर्तन व पदगायन गायक संतों द्वारा होता ही रहता था । आरती, अष्टक आदि स्तोत्र गायन होते ही रहते थे । रात्रि में जागरण होते ही रहते थे । उक्त प्रकार दिन रात चौबीसों घंटों ही भजन सत्संग चलता ही रहता था । साधु समुदाय अधिक होने से उक्त कार्यों में कुछ भी कठिनाई ज्ञात नहीं होती थी । बारी- बारी से संत लोग करते रहते थे और सुनने वाले संत तथा अन्य श्रोतागण सुनते रहते थे । 
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उक्त प्रकार इस चातुर्मास में भजन, संकीर्तन, प्रवचन, जागरण आदि की अन्य चातुर्मासों से बहुत ही अधिकता रही थी । इसके समान कोई चातुर्मास हुआ हो तो वह भी विलक्षण ही माना जा सकता है । किन्तु ऐसा अन्य चातुर्मास होना ज्ञात नहीं हो सका है । 
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चातुर्मास समाप्ति पर आचार्य जी को भेंट, महन्तों को भेंट तथा अन्य संतों की वस्त्रों की सेवा करके अति स्नेह से सबको विदा किया था । इस चातुर्मास में बिशनदासजी ने उस सस्ते जमाने में अति श्रद्धा भक्ति से चौसठ हजार रुपये खर्च करके अपनी उदारता का अच्छा परिचय दिया था ।
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कुचामण गमन ~ 
बिशनदासजी के चातुर्मास से विदा होकर मारवाड की रामत की । रामत के ग्रामों के स्थानधारी संत तथा भक्तों ने मंडल के सहित आचार्य उदयराम जी महाराज की अच्छी सेवा की । आचार्य जी भी सबको हितकर उपदेश देते हुये जनता को ईश्‍वर भक्ति में लगाने का प्रयत्न निरंतर करते रहते थे । 
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उक्त प्रकार भ्रमण करते हुये कुचामण नगर के पास आये तब कुचामण के सरदार शेरसिंहजी आचार्य जी को मंडल के सहित सत्कार पूर्वक कुचामण ले गये और सेवा तथा सत्संग भी श्रद्धा से किया । कुचामण की जनता ने भी मंडल सहित आचार्यजी की सेवा की तथा अति श्रद्धा से सत्संग भी किया । 
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दादूवाणी के प्रवचनों का कुचामण की धार्मिक जनता पर अच्छा प्रभाव पडा, कारण आचार्य उदयरामजी महाराज की समझाने की शैली भी अद्भुत थी । वे गंभीर से गंभीर विषय को अनायास ही अपनी युक्तियों से सर्व साधारण मानवों को भी समझा देते थे । कुछ दिन कुचामण की जनता को उपदेश देकर आचार्यजी वहां से जाने लगे तब मर्यादानुसार आचार्यजी को भेंट देकर सत्कार पूर्वक विदा किया ।  
(क्रमशः) 

*३. श्री गुरुदेव का अंग ~७३/७६*

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*३. श्री गुरुदेव का अंग ~७३/७६*
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षट् दर्शन सलित हुँ पड्यूं, आतम लोढी होय ।
सु गुरु राज मूरति गढे, सो वन्दे सब कोय ॥७३॥
जैसे नदियों में पत्थर पड़ जाता है, तब टक्करें खा खा कर लोढ़ी बन जाता है, किन्तु राज के हाथ में जाने से वह उसकी सुन्दर मूर्ति बना देता है, फिर उस मूर्ति को सब नमस्कार करते हैं । वैसे ही जोगी, जगम, सेवड़े, बौद्ध, सन्यासी, और शेख । इन ६ प्रकार के भेषधारियो में जाने से जीवात्मा घर, कुलादि से रहित तो हो जाता है । किन्तु गुरु की शरण जाने से गुरु उपदेश द्वारा उसे ब्रह्म ज्ञानी संत बना देते हैं, फिर उसे सभी वन्दना करते हैं ।
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देही१ दरिया माँहिं, गुरुदेव बसाई द्वारिका ।
और हुँ होय सु नाँहिं, ना कोई उन सारिखा ॥७४॥
जैसे श्रीकृष्ण ने समुद्र में द्वारिकापुरी बसाई थी । वैसे ही गुरुदेव ने जीवात्मा१ रूप समुद्र में ज्ञान-रूप द्वारिका बसाई है । यह कार्य अन्य से अच्छी प्रकार नहीं हो सकता । कारण - गुरु के समान इस कार्य में निपुण अन्य कोई भी नहीं है ।
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बाहर बैठे बहिमुर्ख, गुरुमुख भीतर जाय ।
रज्जब रीता क्यों पड़े, खोल खजाना खाय ॥७५॥
गुरु उपदेश से विमुख प्राणी ही तीर्थ व्रतादि बाह्य साधनो में स्थित हैं, किंतु गुरु उपदेश रूप आज्ञा में चलने वाले साधक अन्तमुर्ख वृत्ति द्वारा भीतर जाते हैं और अज्ञान कपाट को खोलकर ज्ञान-निधि के ब्रह्मानन्द पदार्थ का आस्वादन करते हैं । कहिये ऐसे साधको का अन्त:करण ब्रह्मानन्द से वंचित कैसे रह सकता है ?
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गुरु मुख बासा पिंड में, मन मुख ह्वै ब्रह्मंड ।
रज्जब भीतर भय नहीं, बाहर खंड हु खंड ॥७६॥
गुरु उपदेश रूप आज्ञा में रहने वाले साधकों की वृत्ति का निवास शरीर के भीतर अन्त:करण में रहता है और मनोनुकूल चलने वालों की वृत्ति ब्रह्मांड के विभिन्न पदार्थों पर जाती है । अन्तर्वृत्ति वालों को तो अद्धैतनिष्ठ होने से कोई प्रकार का भय नहीं होता, किन्तु बहिर्वृत्ति वालो की वृत्ति के पदार्थ भेद से नाना खंड होते रहते हैं, और भेद भय का कारण है, यह भी प्रसिद्ध है ।
(क्रमशः)

*३. श्री गुरुदेव का अंग ~६९/७२*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*३. श्री गुरुदेव का अंग ~६९/७२*
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*रज्जब नीचे को ऊंचा करे, भगवत् भांडा फोड़ि ।*
*सो मध्यम उत्तम किये, सद्गुरु इहिं सु खोड़ि ॥६९॥*
ईश्वर यदि नीचे जीव को ऊंचा बनाते हैं, तो शरीर छूटने पर कर्मानुसार मनुष्य को देव बना देते हैं, किन्तु सद्गुरु तो वर्तमान शरीर में ही ज्ञानोपदेश द्वारा मध्यम प्राणी को भी उत्तम बना देते हैं ।
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*हुमा बावने पारस सद्गुरु, कृत करतहि अधिकार ।*
*जगदीश ईश ह्वै जन्म दूसरे, इन सौं अब की बार ॥७०॥*
१. हुमा नामक एक पक्षी होता है, जो केवल सूखी हड्डियाँ खाकर निर्वाह करता है, किसी को भी नहीं सताता । उसकी छाया जिस पर पड़ जाती है, वह दरिद्री होने पर भी वर्तमान जन्म में ही बादशाह बन जाता है ।
२. बावने चन्दन की सुगंधि से वन - वृक्ष चन्दन बन जाते हैं ।
३. पारस के स्पर्श से लोहा सुवर्ण बन जाता है ।
४. सद्गुरु के ज्ञानोपदेश से जीव वर्तमान शरीर में ही संत बन जाता है । हुमा, बावन, चन्दन, पारस और सद्गुरु को ईश्वर ने ही यह वर्तमान में परिवर्तन करना रूप कार्य का अधिकार दिया है ।
अत: इनसे ही यह कार्य होता है । ईश्वर किसी को राजा बनाते हैं या स्वर्ग में भेजते हैं, ते वर्तमान शरीर को छोड़ने पर ही बनते, भेजते हैं कारण - जिस प्रारब्ध कर्म से शरीर बना है उसे भोगने के पश्चात् ही वर्तमान शरीर में किये कर्म का फल नृपति शरीर दूसरे जन्म में ही मिलता है । हुमा की छाया का फल, पारस के स्पर्श का फल, चन्दन की सुगन्धि का फल भविष्य काल की अपेक्षा नहीं रखता, वैसे ही गुरुदेव के ज्ञानोपदेश का फल दूसरे जन्म की अपेक्षा नहीं रखता है । यही गुरुदेव की महिमा है ।
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*गुरु भृंगी के कृत्य१ को, कृत्य न पूजै२ कोय ।*
*रज्जब रचना राम की, ये ही पलटे दोय ॥७१॥*
गुरु और भृंगी के कार्य१ की समता२ किसी का भी कार्य नहीं कर सकता । राम साधारण मानव और कीट की रचना करते हैं, किन्तु गुरु साधारण मानव को अपने उपदेश द्वारा संत बना कर ब्रह्म से मिला देते हैं और भृंग कीट को भृंग बना देता है । ये दो ही राम की रचना को बदलते हैं, अन्य कोई भी नहीं बदल सकता ।
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*रज्जब प्राण पषाण जड़, गुरु गराब१ किये देव ।*
*पेखो पिंड पलटे प्रथम, सृष्टि सु लागी सेव ॥७२॥*
देखो, जो पषाण खण्ड प्रथम पैरों की ठोकरे खाता है, राज१ उसकी देव - मुर्ति बना देता है, फिर सब उसकी पूजा करते हैं । वैसे ही प्राणी प्रथम अज्ञानी होता है, फिर गुरु उपदेश द्वारा उसे संत बना देते हैं और सब संसार उसकी सेवा करता है ।
(क्रमशः)

शनिवार, 17 जनवरी 2026

*३. श्री गुरुदेव का अंग ~६५/६८*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*३. श्री गुरुदेव का अंग ~६५/६८*
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*त्रिगुण रहित कूँची गुरु, ताला त्रिगुण शरीर ।*
*जन रज्जब जिव तो खुले, जे योग्य मिले गुरु पीर ॥६५॥*
कर्मजन्य त्रिगुणात्मा शरीर ही ताला है, उसमें जीव बन्ध हो रहा है । यदि भाग्यवश कोई गुरुपने की योग्यता से युक्त सिद्ध गुरु मिल जावे और कृपा करके अपना त्रिगुण रहित ज्ञान रूप कूँची लगाकर उक्त ताले को खोल दे तो जीवमुक्त हो जाता है ।
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*सदगुरु रहित सकल सौं, सब गुण रहिता बैन ।*
*रज्जब मानी साखि सो, उस वाइक१ में चैन ॥६६॥*
सदगुरु संपूर्ण विकारों से रहित होते हैं, उनके वचन भी त्रिगुण वा संपूर्ण दोष रूप गुणों से रहित होते हैं हमने भी उसी साक्षी को माना है, जो उन गुरुदेव ने कही है । उस अपने स्वरूप को बताने१ वाले गुरुदेव के वचनों में रहने से ही ब्रह्मानन्द प्राप्त होता है ।
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*गोपि१ गांठ गात मुर२, खोलें गुरु समरथ्थ ।*
*रज्जब इन बिन और का, तहाँ न पहुँचे हथ्थ ॥६७॥*
तीन१ गुणों की लगी हुई ग्रंथि शरीर में गुप्त२ रूप से स्थित है, जो समर्थ गुरु होते हैं वे ही उसे खोल पाते हैं । इन समर्थ गुरुओं के बिना अन्य का ज्ञान रूप हाथ उस ग्रन्थि के पास नहीं पहुँचता ।
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*रज्जब बँध्या ब्रह्म का, गुरुदेव छुडावे ।*
*औरों को यहु गम१ नहीं, कोइ बीच न आवे ॥६८॥*
कर्मानुसार ईश्वर द्वारा शरीर में बाँधे हुये जीव को, गुरु ही ज्ञानोपदेश से मुक्त करते हैं । अन्यों को यह विचार१ शक्ति प्राप्त नहीं होती अतः गुरुपने के लक्षणों रहित कोइ भी प्राणी साधकों के बीच गुरु रूप में नहीं आना चाहिए ।
(क्रमशः)