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🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*तिस घरि जाना वे, जहाँ वे अकल स्वरूप,*
*सोइ इब ध्याइये रे, सब देवन का भूप ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*(ग)परिच्छेद १, श्रीरामकृष्ण की महासमाधि के पश्चात्*
*(१)पहला श्रीरामकृष्ण मठ*
रविवार, १५ अगस्त १८८६ ई. को श्रीरामकृष्ण, भक्तों को दुःख के असीम समुद्र में बहाकर स्वधाम को चले गये । अविवाहित और विवाहित भक्तगण श्रीरामकृष्ण की सेवा करते समय आपस में जिस स्नेह-सूत्र में बँध गये थे, वह कभी छिन्न होने का न था । एकाएक कर्णधार को न देखकर आरोहियों को भय हो गया है । वे एक दूसरे का मुँह ताक रहे हैं ।
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इस समय उनकी ऐसी अवस्था है कि बिना एक दूसरे को देखे उन्हें चैन नहीं - मानो उनके प्राण निकल रहे हो । दूसरों से वार्तालाप करने को जी नहीं चाहता । सब के सब सोचते हैं - 'क्या अब उनके दर्शन न होंगे ? वे तो कह गये हैं कि व्याकुल होकर पुकारने पर, हृदय की पुकार सुनकर ईश्वर अवश्य दर्शन देंगे ! वे कह गये हैं - आन्तरिकता होने पर ईश्वर अवश्य सुनेंगे ।'
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जब वे लोग एकान्त में रहते हैं, तब उसी आनन्दमयी मूर्ति की याद आती है । रास्ता चलते हुए भी उन्हीं की स्मृति बनी रहती है; अकेले रोते फिरते हैं । श्रीरामकृष्ण ने शायद इसीलिए मास्टर से कहा था, 'तुम लोग रास्ते में रोते फिरोगे । इसीलिए मुझे शरीर-त्याग करते हुए कष्ट हो रहा है ।'
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कोई सोचते हैं, 'वे तो चले गये और मैं अभी भी बचा हुआ हूँ ! इस अनित्य संसार में अब भी रहने की इच्छा ! मैं अगर चाहूँ तो शरीर का त्याग कर सकता हूँ, परन्तु करता कहाँ हूँ !' किशोर भक्तों ने काशीपुर के बगीचे में रहकर दिनरात उनकी सेवा की थी । उनकी महासमाधि के पश्चात्, इच्छा न होते हुए भी, लगभग सब के सब अपने अपने घर चले गये ।
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उनमें से किसी ने भी अभी संन्यासी का बाहरी चिह्न(गेरुआ वस्त्र आदि) धारण नहीं किया है । वे लोग श्रीरामकृष्ण के तिरोभाव के बाद कुछ दिनों तक दत्त, घोष, चक्रवर्ती, गांगुली आदि उपाधियों द्वारा लोगों को अपना परिचय देते रहे; परन्तु उन्हें श्रीरामकृष्ण हृदय से त्यागी कर गये थे ।
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लाटू, तारक और बूढ़े गोपाल के लिए कोई स्थान न था जहाँ वे वापस जाते । उनसे सुरेन्द्र ने कहा, "भाइयों, तुम लोग अब कहाँ जाओगे ? आओ, एक मकान लिया जाय । वहाँ तुम लोग श्रीरामकृष्ण की गद्दी लेकर रहोगे तो हम लोग भी कभी-कभी हृदय की दाह मिटाने के लिए वहाँ आ जाया करेंगे, अन्यथा संसार में इस तरह दिन-रात कैसे रहा जायगा ? तुम लोग वहीं जाकर रहो ।
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मैं काशीपुर के बगीचे में श्रीरामकृष्ण की सेवा के लिए जो कुछ दिया करता था, वह अभी भी दूँगा । इस समय उतने से ही रहने और भोजन आदि का खर्च चलाया जायगा ।" पहले-पहले दो-एक महीने तक सुरेन्द्र तीस रुपये महीना देते गये । क्रमशः मठ में दूसरे दूसरे भाई ज्यो ज्यों आकर रहने लगे, त्यों त्यों पचास-साठ रुपये का माहवार खर्च हो गया - सुरेन्द्र देते भी गये ।
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अन्त में सौ रुपये तक का खर्च हो गया । वराहनगर में जो मकान लिया गया था, उसका किराया और टैक्स दोनों मिलाकर ग्यारह रुपये पड़ते थे । रसोइये को छः रुपये महीना और बाकी खर्च भोजन आदि का था । बूढ़े गोपाल, लाटू और तारक के घर था ही नहीं । छोटे गोपाल काशीपुर के बगीचे से श्रीरामकृष्ण की गद्दी और कुल सामान लेकर उसी किराये के मकान में चले आये ।
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काशीपुर में जो रसोइया था, उसे यहाँ भी लगाया गया । शरद रात को आकर रहते थे । तारक वृन्दावन गये हुये थे, कुछ दिनों में वे भी आ गये । नरेन्द्र, शरद, शशी, बाबूराम, निरंजन, काली ये लोग पहले-पहल घर से कभी कभी आया करते थे । राखाल, लाटू, योगीन और काली ठीक उसी समय वृन्दावन गये हुये थे । काली एक महीने के अन्दर, राखाल कई महीने के बाद और योगीन पूरे साल भर बाद लौटे ।
(क्रमशः)







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