शनिवार, 24 जनवरी 2026

*१७. बचन बिबेक को अंग १७/१९*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
.
*१७. बचन बिबेक को अंग १७/१९*
.
सुन्दर घर ताजी बंधे, तुरकिन की घुरसाल । 
ताके आगै आइ के, टटुवा फेरै बाल ॥१७॥
तो यह उस की ऐसी ही मूर्खता कहलायगी जैसे किसी रईस के सम्मुख, जिसकी अश्वशाला में सैकड़ों तुर्की घोड़े बंधे हो, जा कर कोई मूर्ख अपना ऐश्वर्य प्रदर्शित करने हेतु कोई दुर्बल टट्टू(घोड़ा) इधर उधर घुमाने लगे ॥१७॥
.
सुन्दर जाकै बाफता, षासा मलमल ढेर । 
ताकै आगै चौसई, आनि धरै बहुतेर ॥१८॥
या किसी ऐसे धनपति के सम्मुख जाकर, जिस के घर में ऊनी, रेशमी एवं मलमल के हजारों गज वस्त्र रखे हुए हों, कोई मुर्ख पुरुष चौसी(मोटे सूत) का कपड़ा पहन कर अपने ऐश्वर्य का प्रदर्शन करने लगे ॥१८॥ (२)
.
सुन्दर पंचामृत भखै, नितप्रति सहज सुभाइ । 
ताकै आगै राबरी, काहे कौ ले जाइ ॥१९॥
या कोई ऐसा धनपति, जो प्रतिदिन अपने घर में खीर, पूड़ी, हलवा, लड्डू, पेड़ा, बर्फी आदि मिठाइयाँ ही खाता है; उसके सम्मुख कोई मूर्ख पुरुष खाने के लिये जौ की राबड़ी१ लाकर रख दे ॥१९॥ (३) 
(१ उत्तर पश्चिम भारत में राबड़ी निर्धन लोगों का भोज्य पदार्थ है । जो छाछ में जौ का आटा नमक के साथ घोल कर अग्नि पर पका लिया जाता है ।)
(क्रमशः)  

जीन्द नरेश के यहां चातुर्मास ~

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
.
जीन्द नरेश के यहां चातुर्मास ~ 
वि. सं. १९२८ में आचार्य उदयराम जी महाराज का चातुर्मास जीन्द नरेश रंगवीरसिंह जी ने निमंत्रण देकर मनाया । आचार्य जी ने स्वीकार किया । समय पर शिष्य संत मंडल के सहित आचार्य जी ने नारायणा दादूधाम से जीन्द प्रदेश के लिये प्रस्थान किया और शनै: शनै: मार्ग की धार्मिक जनता को अपने दर्शन सत्संग से आनन्दित करते हुये जीन्द राज्य की राजधानी संगरुर के पास पहुँच गये । 
.
तब अपने आने की सूचना राजा रंगवीर सिंह जी को दी । सूचना मिलने पर वे राजकीय ठाट बाट से भक्त मंडल के सहित संकीर्तन करते हुये आचार्य जी अगवानी करने आये । मर्यादा पूर्वक भेंट चढाकर सत्यराम बोलते हुये प्रणाम किया । 
.
सामने बैठकर आवश्यक प्रश्‍नोत्तर हो जाने के पश्‍चात् आचार्य जी को अति सत्कार से सवारी पर बैठाकर संकीर्तन करते हुये साथ लेकर नगर के मुख्य बाजार से जनता को आचार्य जी तथा संत मंडल का दर्शन कराते हुये नियत स्थान पर ले जाकर ठहराया और प्रसाद बांटकर शोभा यात्रा समाप्त की । 
.
राजा ने संत सेवा का सब प्रबन्ध अच्छी प्रकार करा दिया और सेवकों को भी कह दिया कि सेवा का पूरा-पूरा ध्यान रखना । नगर में चातुर्मास सत्संग की सूचना दे दी गई । सत्संग आरंभ हो गया । चातुर्मास के सभी कार्यक्रम यथावत होने लगे । 
.
संगरुर की जनता दादूवाणी से भली प्रकार परिचित थी । कारण- नारायणा दादूधाम के पूर्वाचार्य भी वहां आ चुके थे । उनसे पहले भी वहां की जनता ने दादूवाणी के प्रवचन सुने थे । दादूवाणी की कथा पर स्वाभाविक प्रेम था । इस से कथा श्रवण के लिये जनता बहुत आती थी । 
.
राजा तथा परिवार के लोग भी सत्संग में भाग लेते थे । संत तथा सेवक सभी दादूवाणी के प्रवचन से आनन्दित होते थे । मध्यदिन में उपनिषद् आदि के प्रवचन विद्वान् संत करते थे । सत्संग बहुत अच्छा चल रहा था । 
.
आरती, अष्टक, पदगायन, संकीर्तन, जागरण आदि सर्व कार्यक्रमों में जनता भाग लेती थी । उक्त प्रकार चातुर्मास का क्रम अच्छा चला । समाप्ति पर आचार्य जी को मर्यादानुसार भेंट तथा संतों को वस्त्र देकर सस्नेह विदा किया । 
(क्रमशः)  

इतनी व्याकुलता कहाँ

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
.
*एका एकी राम सों, कै साधु का संग ।*
*दादू अनत न जाइये, और काल का अंग ॥*
.
साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
==================
मास्टर - इस समय तुम मानो एक वैद्य हो । सब भार तुम्हीं पर है । मठ के भाइयों को तुम मनुष्य बनाओगे ।
नरेन्द्र - हम लोग जो साधन-भजन कर रहे हैं, यह उन्हीं की आज्ञा से । परन्तु आश्चर्य है, रामबाबू साधना की बात पर हम लोगों को ताना मारते हैं । वे कहते हैं, 'जब उनके प्रत्यक्ष दर्शन कर लिए तब साधना कैसी ?'
.
मास्टर - जिसका जैसा विश्वास, वह वैसा ही करे ।
नरेन्द्र - हम लोगों को तो उन्होंने साधना करने की आज्ञा दी है ।
नरेन्द्र श्रीरामकृष्ण के प्यार की बातें करने लगे ।
नरेन्द्र - मेरे लिए माँ काली से उन्होंने न जाने कितनी बातें कही । जब मुझे खाने को नहीं मिल रहा था, पिताजी का देहान्त हो गया था - घरवाले बड़े कष्ट में थे, तब मेरे लिए माँ काली से उन्होंने रुपयों की प्रार्थना की थी ।
.
मास्टर - यह मुझे मालूम है ।
नरेन्द्र - रुपये नहीं मिले । उन्होंने कहा, 'माँ ने कहा है, मोटा कपड़ा और रूखा-सूखा भोजन मिल सकता है - रोटी-दाल मिल सकती है ।'
"मुझे इतना प्यार तो करते थे, परन्तु जब कोई अपवित्र भाव मुझमें आता था तब उसे वे तुरन्त ताड़ जाते थे । जब मैं अन्नदा के साथ घूमता था - कभी कभी बुरे आदमियों के साथ पड़ जाता था - और तब यदि उनके पास मैं आता था तो मेरे हाथ का वे कुछ न खाते थे ।
.
मुझे स्मरण है, एक बार उनका हाथ कुछ उठा था, परन्तु फिर आगे न बढ़ा । उनकी बीमारी के समय एक दिन ऐसा होने पर उनका हाथ मुँह तक गया और फिर रुक गया । उन्होंने कहा, 'अब भी तेरा समय नहीं आया ।'
"कभी-कभी मुझे बड़ा अविश्वास होता है । रामबाबू के यहाँ मुझे जान पड़ा कि कहीं कुछ नहीं है । मानो ईश्वर-फीश्वर कहीं कुछ नहीं ।"
.
मास्टर - वे कहते थे कि कभी कभी उन्हें भी ऐसा ही होता था ।
दोनों चुप हैं । मास्टर कहने लगे - "तुम लोग धन्य हो ! दिन-रात उनके चिन्तन में रहते हो ।" नरेन्द्र ने कहा - "कहाँ ? हममें इतनी व्याकुलता कहाँ कि ईश्वरदर्शन न होने के दुःख से शरीर-त्याग कर सकें ?"
रात हो गयी है । निरंजन को पुरीधाम से लौटे कुछ ही समय हुआ है । उन्हें देखकर मठ के भाई और मास्टर प्रसन्न हो रहे हैं । वे पुरीयात्रा का हाल कहने लगे ।
.
निरंजन की उम्र इस समय २५-२६ साल की होगी । सन्ध्या-आरती के हो जानेपर कोई ध्यान करने लगे । निरंजन के लौटने पर बहुतसे भाई बड़े घर में आकर बैठे । सत्प्रसंग होने लगा । रात के नौ बजे के बाद शशी ने श्रीरामकृष्ण को भोगार्पण करके उन्हें शयन कराया ।
मठ के भाई निरंजन को साथ लेकर भोजन करने बैठे । उस दिन भोजन में रोटियाँ थीं, एक तरकारी, जरासा गुड़ और श्रीरामकृष्ण के नैवेद्य की थोड़ीसी खीर ।
(क्रमशः)

*३. श्री गुरुदेव का अंग ~९७/१००*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी* टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
.
*३. श्री गुरुदेव का अंग ~९७/१००*
.
*गुरु मुख मारग ना गहे, मन मुख मारग चाल्या जाय ।*
*रज्जब नर निवहै नहीं, बातैं कहो बनाय ॥९७॥*
गुरु मुख से सुने हुये ब्रह्म प्राप्ति के मार्ग में चलता नहीं और अपने मन की इच्छानुसार बिषयों की और ही चला जा रहा है, वह नर नाना विचित्र ढंग बना-बना कर बातें तो चाहे कहता रहे, किन्तु ब्रह्म प्राप्ति के मार्ग में उसका निर्वाह नहीं हो सकता ।
.
*मन मुख मानुष भूत पशु, गुरु मुख ज्ञाता देव ।*
*रज्जब पाया प्राणने, पंच खानि का भेव ॥९८॥*
मन की इच्छा के अनुसार चलने वाले मनुष्य पशु और भूत तुल्य होते हैं, गुरु आज्ञानसार चलने वाले ज्ञानी और देव तुल्य होते हैं । जिस प्राणी ने उक्त बात अच्छी प्रकार जानली उसने जेरज, अंडज, स्वेदज, उदभिज्ज और नादज इन पांचों खानियों का रहस्य अच्छी प्रकार जान लिया है ।
.
*उडग१ इन्दु दामिनि दुणंद२, पावक दीप असंखि ।*
*रज्जब राम न सूझई, बिन गुरु ज्ञान सु अंखि ॥९९॥*
तारा१, चन्द्रमा, बिजली, सूर्य२, अग्नि, दीपक, ये सभी असंख्य होवें तो भी निरंजन राम तो गुरु ज्ञान रूप नेत्रों के बिना नहीं दिखते ।
.
*दीपक रूपी धरणि ह्वे, सूरजमय आकाश ।*
*जन रज्जब गुरु ज्ञान बिन, हरदै नहीं उजास ॥१००॥*
सम्पूर्ण पृथ्वी दीपक रूप हो जाय और सब आकाश सूर्य रूप हो जाय, तो भी गुरु के ज्ञान बिना प्राणी के हृदय में तो प्रकाश नहीं होता ।
(क्रमशः)

दादूवाणी के प्रवचन

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
.
कोटा नरेश ने संत सेवा का बहुत अच्छा प्रबन्ध कर दिया । किसी भी संत को कोई आवश्यकता हो तो वह शीघ्र पूरी की जाय ऐसा आदेश जो सेवा के लिये नियत किया गया था उस मंत्री को दे दिया । किन्तु इन संतों को कुछ भी आवश्यकता नहीं होती थी । पंक्ति में भोजन पाते थे । 
.
बारं बार खाना इनका नहीं होता था । जल का प्रबन्ध बिना कहे ही रहता था । भोजन में इनके सात्विक वस्तुयें ही काम में आती थीं । नगर में साधुओं के अकेले जाने पर आचार्य जी का प्रतिबन्ध था । जो भी आवश्यकता हो, वह आचार्य जी को कही जाय । ऐसी ही इनके संत मंडल की प्रथा थी ।
.
फिर चातुर्मास का कार्यक्रम आरंभ हो गया । राजा प्रजा सत्संग में भाग लेने लगे । श्री दादूवाणी का प्रवचन अति मधुर होने से सबको ही प्रिय लगता था । धार्मिक जनता की नित्य नूतन रुचि बढती ही जा रही थी । दादूवाणी के प्रवचन जिज्ञासुओं के हृदयों को विकसित कर रहे थे । विचारशील व्यक्तियों के आनन्द की वृद्धि हो रही थी । 
.
संतों को तो दादूवाणी का प्रवचन परम प्रिय लगता ही था । कारण दादूवाणी में राजकथा, देवकथा, भोजनकथा, शरीरकथा से रहित परम तत्त्वरुप परब्रह्म का स्वरुप व उसकी प्राप्ति के साधना का ही वर्णन है । अत: संतों की ब्रह्माकार वृति को स्थिर करने में जो सहायक विषय हैं, उन्हीं का वर्णन दादूवाणी में होने से वह संतों को अत्यन्त प्रिय लगती है ।
.
उदयरामजी महाराज जैसे अनुभवी वक्ताओं के द्वारा जब दादूवाणी का प्रवचन श्रवण करने को प्राप्त हो तब तो सभी प्रकार के श्रोताओं के लिये महा आनन्द का प्रदाता सिद्ध होता ही है । अत: सत्संग की दृष्टि से कोटा का यह चातुर्मास बहुत ही अच्छा हो रहा था । संत सेवा भी बहुत अच्छी हो रही थी । 
.
हजारों मानवों के हृदय पट पर परब्रह्म भक्ति का रंग इस चातुर्मास में लगा । निर्गुण भक्ति का अच्छा प्रचार हुआ । भाग्य शालिनी जनता के मुख से हर समय ईश्‍वर नाम सुनाई देते थे । कोटा नरेश छत्रशाल सिंह का यह उद्योग जनता में भगवद् भक्ति का संस्कार जमाने में सफल रहा । 
.
चातुर्मास समाप्ति पर कोटा नरेश व वहां की धार्मिक जनता ने अपने प्रिय आचार्य उदयराम जी महाराज को मर्यादानुसार भेंट दी और संतों को वस्त्रादि देकर उचित सेवा की तथा सस्नेह विदा किया । वहां से विदा होकर आचार्य उदयराम जी महाराज मार्ग के सेवकों तथा अपने समाज के साधुओं का आतिथ्य स्वीकार करते हुये तथा यथार्थ उपदेश देते हुये नारायणा दादूधाम में पधारे ।
(क्रमशः)  

*१७. बचन बिबेक को अंग १३/१६*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
.
*१७. बचन बिबेक को अंग १३/१६*
.
सुन्दर सुवचन कै सुनै, उपजै अति आनंद । 
कुवचन काननि मैं परै, सुनत होत दुख द्वंद ॥१३॥
इस प्रकार श्रीसुन्दरदासजी इस विषय का उपसंहार करते हुए कहते हैं – सुवचन के श्रवणमात्र से श्रोता के हृदय में अतिशय आनन्द उमड़ने लगता है; परन्तु किसी कुवचन का श्रोता के कानों से संपर्क होते ही उस का मन दुःखद्वन्द्वों से भर जाता है ॥१३॥
.
सुन्दर वचन सु त्रिविध हैं, एक वचन है फूल ।
एक वचन है असम से, एक वचन है सूल ॥१४॥
त्रिविध वचन : श्रीसुन्दरदासजी के अनुसार समाज में तीन प्रकार के वचन बोले जाते हैं - १. जो बचन बोले जाने पर फूल के समान प्रतीत हो; २. जो बोले जाने पर श्रोता को पत्थर के समान ज्ञात हो; ३. एक वचन वह भी होता है जो बोले जाने पर श्रोता को सुनते ही उसके हृदय में शूल के समान आघात पहुँचाये ॥१४॥
.
सुन्दर वचन सु त्रिबिध हैं, उत्तम मध्य कनिष्ट । 
एक कटुक इक चरपरै, एक वचन अति मिष्ट ॥१५॥
समाज में बोले हुए वचनों का यह त्रिविध विभाजन भी है - १. उत्तम वचन, २. मध्यम वचन, एवं ३. कनिष्ठ वचन । उन में १. सुनने में बहुत मधुर होता है; २. सुनने में चटपटा(तीखे स्वाद वाला) तथा ३. वह वचन सुनने में कर्णकटु होता है ॥१५॥
.
सुन्दर जान प्रवीण अति, ताकै आगै आइ । 
मूरख वचन उचारि कैं, बांणी कहै सुनाइ ॥१६॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - किसी प्रमुख पण्डित के सम्मुख आकर कोई मूर्ख अपने अनर्गल निरर्थक बचन बोलने लगे ॥१६॥
(क्रमशः) 

*नरेन्द्र के प्रति लोक-शिक्षा का आदेश*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
.
*साचे को साचा कहै, झूठे को झूठा ।*
*दादू दुविधा को नहीं, ज्यों था त्यों दीठा ॥*
.
साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
==================
*नरेन्द्र के प्रति लोक-शिक्षा का आदेश*
नरेन्द्र - परन्तु यह बात किसी दूसरे से न कहियेगा ।
"काशीपुर में उन्होंने मेरे भीतर शक्ति का संचार किया ।"
मास्टर - जिस समय तुम काशीपुर में पेड़ के नीचे धूनी जलाकर बैठते थे, क्यों ?
नरेन्द्र – हाँ । काली से मैंने कहा, 'जरा मेरा हाथ पकड़ तो सही ।' काली ने कहा 'न जाने तुम्हारी देह छूते ही कैसा एक धक्का मुझे लगा ।'
"यह बात हम लोगों में किसी से आप न कहेंगे - प्रतिज्ञा कीजिये ।"
.
मास्टर - तुम्हारे भीतर शक्ति-संचार करने का उनका खास मतलब है । तुम्हारे द्वारा उनके बहुतसे कार्य होंगे । एक दिन एक कागज में लिखकर उन्होंने कहा था, 'नरेन्द्र शिक्षा देगा ।'
नरेन्द्र - परन्तु मैंने कहा था, 'यह सब मुझसे न होगा ।'
"इस पर उन्होंने कहा, 'तेरे हाड करेंगे ।' शरद का भार उन्होंने मुझे सौंपा है । वह व्याकुल है । उसकी कुण्डलिनी जाग्रत हो गयी है ।"
.
मास्टर - इस समय चाहिए कि सड़े पत्ते न जमने पायें । श्रीरामकृष्ण कहते थे, शायद तुम्हें याद हो, कि तालाब में मछलियों के बिल रहते हैं, वहाँ मछलियाँ आकर विश्राम करती हैं । जिस बिल में सड़े पत्ते आकर जम जाते हैं, उसमें फिर मछली नहीं आती ।
नरेन्द्र - मुझे नारायण कहते थे ।
मास्टर - तुम्हें नारायण कहते थे, यह मैं जानता हूँ ।
.
नरेन्द्र जब वे बीमार थे, तब शौच का पानी मुझसे नहीं लेते थे ।
"काशीपुर में उन्होंने कहा था, 'अब कुंजी मेरे हाथों में है । वह अपने को जान लेगा तो छोड़ देगा ।' "
मास्टर - जिस दिन तुम्हारी निर्विकल्प समाधि की अवस्था हुई थी – क्यों ?
नरेन्द्र – हाँ । उस समय मुझे जान पड़ा था कि मेरे शरीर नहीं है, केवल मुँह भर है । घर में मैं कानून पढ़ रहा था, परीक्षा देने के लिए । तब एकाएक याद आया कि यह मैं क्या कर रहा हूँ !
.
मास्टर - जब श्रीरामकृष्ण काशीपुर में थे ?
नरेन्द्र – हाँ । पागल की तरह मैं घर से निकल आया । उन्होंने पूछा, तू क्या चाहता है ?' मैंने कहा, 'मैं समाधिमग्न होकर रहूँगा ।' उन्होंने कहा, 'तेरी बुद्धि तो बड़ी हीन है । समाधि के पार जा, समाधि तो तुच्छ चीज है ।'
.
मास्टर - हाँ, वे कहते थे, ज्ञान के बाद विज्ञान है । छत पर चढ़कर सीढ़ियों से फिर आना-जाना ।
नरेन्द्र - काली ज्ञान-ज्ञान चिल्लाता है । मैं उसे डॉटता हूँ । ज्ञान क्या इतना सहज है ? पहले भक्ति तो पके ।
"उन्होंने (श्रीरामकृष्ण ने) तारकबाबू से दक्षिणेश्वर में कहा था, 'भाव और भक्ति को ही इति न समझ लेना ।' "
.
मास्टर - तुम्हारे सम्बन्ध में उन्होंने और क्या क्या कहा था, बताओ तो ।
नरेन्द्र - मेरी बात पर वे इतना विश्वास करते थे कि जब मैंने कहा, 'आप रूप आदि जो कुछ देखते हैं, यह सब मन की भूल है,' तब माँ (जगन्माता काली) के पास जाकर उन्होंने पूछा है, 'माँ, नरेन्द्र इस तरह कह रहा है, तो क्या यह सब भूल है ?' फिर उन्होंने मुझसे कहा, 'माँ ने कहा है, यह सब सत्य है ।'
.
"वे कहते थे, शायद आपको याद हो, 'तेरा गाना सुनने पर (छाती पर हाथ रखकर) इसके भीतर जो है, वे साँप की तरह फन खोलकर स्थिर भाव से सुनते रहते हैं ।'
"परन्तु मास्टर महाशय, उन्होंने इतना तो कहा, परन्तु मेरा बतलाइये क्या हुआ ?"
मास्टर - इस समय तुम शिव बने हुए हो, पैसे लेने का अधिकार तो है ही नहीं । श्रीरामकृष्ण की कहानी याद है न ?
.
नरेन्द्र - कौनसी कहानी ? जरा कहिये ।
मास्टर - कोई बहुरूपिया शिव बना था । जिनके यहाँ वह गया था, वे एक रुपया देने लगे । उसने रुपया नहीं लिया, घर लौटकर हाथ-पैर धोकर उसने बाबू के यहाँ आकर रुपया माँगा । बाबू के घरवालों ने कहा, 'उस समय तुमने रुपया क्यों नहीं लिया ?' उसने कहा, 'तब तो मैं शिव बना था - संन्यासी था - रुपया कैसे छूता ?'
यह बात सुनकर नरेन्द्र खूब हँसे ।
(क्रमशः)

शुक्रवार, 23 जनवरी 2026

*३. श्री गुरुदेव का अंग ~९३/९६*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी* टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
.
*३. श्री गुरुदेव का अंग ~९३/९६*
.
*देही दरिया नाम सु नाव, बुधि बादबदान१ विचार सुवाव२ ।*
*रज्जब किया गुरु सब साज, इहिं विधि उतरै पार जहाज ॥९३॥*
जीवात्मा ही दरिया है, उसमें देहाध्यादि जल है, ईश्वर का नाम नौका है, बुद्धि ही जहाज स्तम्भ का कपड़ा१ है, विचार ही वायु२ है । इस प्रकार गुरुदेव ने सब साज सजाया है, उक्त जहाज से तथा उक्त विधि से प्राणी संसार - सागर से पार उतरता है ।
.
*मन समुद्र के बुदबुदे, मनहुँ मनोरथ माँहिं ।*
*रज्जब गुरु अगस्त१ बिन, कहो गगन क्यों जाँहिं ॥९४॥*
समुद्र के बुदबुदे सूर्य१ किरण बिना आकाश को नहीं जाते अर्थात सूर्य किरण से जल सूखता है, तब बुदबुदे नष्ट होते हैं, वैसे ही मन के मनोरथ गुरु उपदेश बिना ब्रह्म में लय नहीं होते ।
.
*प्राण कीट गुरु भृंग बिन, ब्रह्म कमल क्यों जाय ।*
*जन रज्जब या युक्तिबिन, विष्टा रहे समाय ॥९५॥*
जैसे कीट भृंग बिना कमल पर नहीं जा सकता, भृंग की भृंग बनाने की युक्ति बिना विष्टा में ही पड़ा रहता है । वैसे ही गुरु की उपदेश रूप युक्ति बिना जीव ब्रह्म को प्राप्त ही होता, विषयों में ही फँसा रहता है ।
.
*रज्जब सद्गुरु बाहिरा, स्वातिन ह्वै शिष आश ।*
*ज्यों पक्षी पंखौं बिना, कैसे जाय अकाश ॥९६॥*
जैसे चातक पक्षी को स्वाति बिन्दु की इच्छा नहीं हो और न पंख हो, तो वह आकाश में कैसे जा सकता है । वैसे ही जो शिष्य गुरु आज्ञा बिना बाहर गमन करता है और न ब्रह्म प्राप्ति की आशा ही रखता है, तब कैसे ब्रह्म को प्राप्त कर सकता है ?
(क्रमशः)

गुरुवार, 22 जनवरी 2026

*(२)नरेन्द्र की पूर्वकथा*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
.
*एक कहूँ तो दोइ हैं, दोइ कहूँ तो एक ।*
*यों दादू हैरान है, ज्यों है त्यों ही देख ॥*
.
साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
==================
*(२)नरेन्द्र की पूर्वकथा*
मठ में काली तपस्वी के कमरे में दो भक्त बैठे हैं । उनमें एक त्यागी है, एक गृही । दोनों २४-२५ साल की उम्र के हैं । दोनों में बातचीत हो रही है, इसी समय मास्टर भी आ गये । वे मठ में तीन दिन रहेंगे । आज 'गुड फ्रायडे' है, ८ अप्रैल १८८७, शुक्रवार । इस समय दिन के आठ बजे होंगे ।
.
मास्टर ने आते ही ठाकुर-घर में जाकर श्रीरामकृष्ण के चित्र को प्रणाम किया । फिर नरेन्द्र और राखाल आदि भक्तों से मिलकर उसी कमरे में आकर बैठे, और उन दोनों भक्तों से प्रीति-सम्भाषण के अनन्तर उनकी बातचीत सुनने लगे । गृही भक्त की इच्छा संसार त्याग करने की है । मठ के भाई उन्हें समझा रहे हैं कि वे संसार न छोड़े ।
.
त्यागी भक्त - कर्म जो कुछ हैं, कर डालो । करने से फिर सब समाप्त हो जायेंगे ।
"एक ने सुना था कि उसे नरक जाना होगा । उसने एक मित्र से पूछा कि नरक कैसा है । मित्र एक मिट्टी का ढेला लेकर नरक का नक्शा खींचने लगा । नरक का नक्शा उसने खींचा नहीं कि वह आदमी तुरन्त उस पर लोटने लगा, और बोला, 'चलो, मेरा नरक का भोग हो गया ।' "
.
गृही भक्त - मुझे संसार अच्छा नहीं लगता । अहा ! तुम लोगों की कैसी सुन्दर अवस्था है !
त्यागी भक्त - तू इतना बकता क्यों है ? अगर निकलना है तो निकल आ; नहीं तो मजे से एक बार भोग कर ले ।
नौ बजने के बाद शशी ने श्रीठाकुरघर में पूजा की ।
.
ग्यारह का समय हुआ । मठ के भाई क्रमशः गंगा-स्नान करके आ गये । स्नान के पश्चात् दूसरा शुद्ध वस्त्र धारण कर, हरएक संन्यासी श्रीठाकुरघर में श्रीरामकृष्ण के चित्र को प्रणाम करके ध्यान करने लगा ।
.
भोग के पश्चात् मठ के भाइयों ने प्रसाद पाया । साथ में मास्टर ने भी प्रसाद पाया ।
सन्ध्या हो गयी । धूनी देने के पश्चात् आरती हुई । 'दानवों के कमरे' में राखाल, शशी, बूढ़े गोपाल और हरीश बैठे हुए हैं । मास्टर भी हैं । राखाल श्रीरामकृष्ण का भोग सावधानी से रखने के लिए कह रहे हैं ।
.
राखाल - (शशी आदि से) - एक दिन मैंने उनके जलपान करने से पहले कुछ खा लिया था । उन्होंने मेरी ओर देखकर कहा - 'तेरी ओर मुझसे देखा नहीं जाता । क्यों तूने ऐसा काम किया ?' - मैं रोने लगा ।
बूढ़े गोपाल - मैंने काशीपुर में उनके भोजन पर जोर से साँस छोड़ी थी, तब उन्होंने कहा, 'यह भोजन रहने दो ।'
.
बरामदे में मास्टर नरेन्द्र के साथ टहल रहे हैं । दोनों में तरह तरह की बातचीत हो रही है । नरेन्द्र ने कहा, 'मैं तो कुछ भी न मानता था ।'
मास्टर – क्या ? ईश्वर के रूप ?
नरेन्द्र - वे जो कुछ कहते थे, पहले-पहल मैं बहुतसी बातें न मानता था । एक दिन उन्होंने कहा था, 'तो फिर तू आता क्यों है ।'
"मैने कहा, 'आपको देखने लिए, आपकी बातें सुनने के लिए नहीं ।' "
मास्टर - उन्होंने क्या कहा था ?
नरेन्द्र - वे बहुत प्रसन्न हुए थे ।
.
दूसरे दिन शनिवार था, ९ अप्रैल १८७७ । श्रीरामकृष्ण के भोग के पश्चात् मठ के भाइयों ने भोजन किया, फिर वे जरा विश्राम करने लगे । नरेन्द्र और मास्टर, मठ से सटा हुआ पश्चिम ओर जो बगीचा है, वहीं एक पेड़ के नीचे एकान्त में बैठे हुए बातचीत कर रहे हैं । नरेन्द्र श्रीरामकृष्ण के सम्बन्ध में अपने अनुभव बता रहे हैं । नरेन्द्र की आयु २४ वर्ष की है और मास्टर की ३२ वर्ष की ।
.
मास्टर - पहले-पहल जिस दिन उनसे तुम्हारी मुलाकात हुई थी, वह दिन तुम्हें अच्छी तरह याद है ?
नरेन्द्र - मुलाकात दक्षिणेश्वर के कालीमन्दिर में हुई थी, उन्हीं के कमरे में । उस दिन मैंने दो गाने गाये थे ।
गाना - (भावार्थ) - ऐ मन, अपने स्थान में लौट चलो । संसार में विदेशी की तरह अकारण क्यों घूम रहे हो ? ...
गाना - (भावार्थ) - क्या मेरे दिन व्यर्थ ही बीत जायेंगे ? हे नाथ, मैं दिन-रात आशा-पथ पर आँख गड़ाये हुए हूँ ।...
.
मास्टर - गाना सुनकर उन्होंने क्या कहा ?
नरेन्द्र - उन्हें भावावेश हो गया था । रामबाबू आदि और और लोगों से उन्होंने पूछा, 'यह लड़का कौन है ? अहा, कितना सुन्दर गाता है' मुझसे उन्होंने फिर आने के लिए कहा ।
मास्टर - फिर कहाँ मुलाकात हुई ?
.
नरेन्द्र - फिर राजमोहन के यहाँ मुलाकात हुई थी । इसके बाद दक्षिणेश्वर में; उस समय मुझे देखकर भावावेश में मेरी स्तुति करने लगे थे । स्तुति करते हुए कहने लगे, 'नारायण ! तुम मेरे लिए शरीर धारण करके आये हो ।'
"परन्तु ये बातें किसी से कहियेगा नहीं ।"
मास्टर - और उन्होंने क्या कहा ?
.
नरेंद्र - उन्होंने कहा, "तुम मेरे लिए ही शरीर धारण करके आये हो । मैंने माँ से कहा था, 'माँ, काम-कांचन का त्याग करनेवाले शुद्धात्मा भक्तों के बिना संसार में कैसे रहूँगा !' " उन्होंने फिर मुझसे कहा, "तूने रात को मुझे आकर उठाया, और कहा, 'मैं आ गया ।" परन्तु मैं यह सब कुछ नहीं जानता था, मैं तो कलकत्ते के मकान में खूब खर्राटे ले रहा था ।
मास्टर - अर्थात्, तुम एक ही समय Present(हाजिर) भी हो और Absent(गैरहाजिर) भी हो, जैसे ईश्वर साकार भी हैं और निराकार भी ।
(क्रमशः)

*१७. बचन बिबेक को अंग ९/१२*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
.
*१७. बचन बिबेक को अंग ९/१२*
.
सारो सूवा कोकिला, बोलत बचन रसाल ।
सुन्दर सब कोउ कान दे, बृद्ध तरुन अरु बाल ॥९॥
इसके विपरीत, कोयल, मैना, तोता आदि पक्षी जब किसी के आसपास आकर मधुर एवं कणप्रिय बोली में बोलते हैं तो वह सभी को मनोहर लगती है । फिर भले ही कोई वृद्ध हो, युवा हो, या बच्चा हो सभी उस कोयल की ध्वनि को सुनने के लिये उत्कण्ठित रहते हैं ॥९॥
.
सुन्दर कुवचन वचन मैं, राति दिवस को फेर ।
सुवचन सदा प्रकासमय, कुवचन सदा अंधेर ॥१०॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - सुवचन एवं कुवचन में उतना ही अन्तर(भेद) है जितना दिन एवं रात्रि में होता है । सद्ववचन सदा प्रकाशयुक्त होता है तथा कुवचन अन्धकारयुक्त । अर्थात् किसी के द्वारा बोला हुआ सद्वचन सुनते ही ऐसा प्रतीत होता है मानो दिन में सूर्य का प्रकाश फैल गया हो; परन्तु किसी के द्वारा बोला हुआ कुवचन सुनते ही, किसी भले आदमी को, ऐसा प्रतीत होने लगता है मानो उसके सामने अमावस्या की रात्रि का अन्धकार छा गया हो ॥१०॥
.
सुन्दर सुवचन सुनत ही, सीतल ह्वै सब अंग ।
कुवचन कानन मैं परै, सुनत होत मन भंग ॥११॥
इन दोनों वचनों में एक अन्य भेद भी है । दूसरे द्वारा बोला गया सुवचन सुनते ही, सुनने वाले के हृदय एवं समस्त शरीर में शीतलता की लहर दौड़ने लगती है; परन्तु कुवचन सुनते ही, सुनने वाले का मन उद्वेलित(व्यग्र) हो उठता है कि इस का प्रतीकार करूँ ! ॥११॥
.
सुन्दर सुवचन तक्र तें, राखै दूध जमाइ ।
कुवचन कांजी परत ही, तुरत फाटि करि जाइ ॥१२॥
इसी बात को महाराज दो उदाहरणों द्वारा समझा रहे हैं - १. सुवचन रूप तक्र(मट्ठा) का कुछ अंश यदि दूध में डाल दिया जाय तो वह दूध कुछ ही समय में जमकर अमर रस वाला दही बन जाता है । २. परन्तु उसी दूध में कांजी(राई एवं जीरा से बना अम्ल पेय) डाल दी जाय तो वह फट कर सभी के लिये निरर्थक(न पीने योग्य) हो जाता है ॥१२॥
(क्रमशः)

कोटडा चातुर्मास ~

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
.
कोटडा चातुर्मास ~ 
वि. सं. १९२४ में दयालबगस जी कोटडा वालों ने आचार्य उदयरामजी का चातुर्मास मनाया । आचार्य उदयरामजी महाराज ने चातुर्मास का समय समीप आने पर अपने शिष्य संत मंडल के सहित नारायणा दादूधाम से कोटडा के लिये प्रस्थान किया । मार्ग के स्थानधारी साधुओं तथा सेवकों का आतिथ्य स्वीकार करते हुये तथा उनको हितोपदेश देते हुये समय पर कोटडा पधारे । 
.
दयालबगस जी ने आपका मर्यादा पूर्वक सामेला किया और उचित स्थान में ठहराया । सेवा का सुचारु रुप से प्रबन्ध कर दिया गया । चातुर्मास आरंभ के दिन से चातुर्मास के कार्यक्रम नियत रुप से ठीक समय पर होते थे । यह चातुर्मास भी दयालपुरा के चातुर्मास के समान ही हुआ । समाप्ति पर मर्यादा पूर्वक भेंट आचार्यजी को और अन्य संतों को वस्त्रादि देकर सस्नेह सबको विदा किया । कोटडा से विदा होकर आचार्य उदयरामजी महाराज शिष्य संत मंडल के सहित भ्रमण करते हुये नारायणा दादूधाम में पधार गये ।  
.
कोटा चातुर्मास ~ 
वि. सं. १९२७ में कोटा नरेश छत्रशालसिंह जी ने आचार्य उदयरामजी महाराज को चातुर्मास का निमंत्रण दिया । आचार्यजी ने स्वीकार कर लिया । चातुर्मास का समय समीप आने पर आचार्य उदयराम जी महाराज अपने शिष्य संत मंडल के सहित नारायणा दादूधाम से कोटा के लिये प्रस्थान किया और मार्ग के स्थानधारी साधुओं के तथा सेवकों के आतिथ्य को ग्रहण करते हुये समय पर कोटा पहुँचे । 
.
अपने आने की सूचना कोटा नरेश को दी । सूचना मिलने पर कोटा नरेश छत्रशाल सिंह जी राजकीय लवाजमा तथा भक्त मंडल के साथ आचार्य जी की अगवानी करने गये । पास जाकर मर्यादानुसार भेंट चढा के सत्यराम बोलते हुये प्रणाम की । 
.
फिर आवश्यक प्रश्‍नोत्तर हो जाने पर आचार्य जी को हाथी पर विराजमान कराके बाजे बजाते हुये तथा भक्त मंडल के साथ संकीर्तन करते हुये नगर के मुख्य बाजार से जनता को आचार्य जी तथा संत मंडल का दर्शन कराते हुये नियत स्थान पर ले जाकर ठहराया । प्रसाद बांट कर शोभा यात्रा समाप्त की ।
(क्रमशः) 

*३. श्री गुरुदेव का अंग ~८९/९२*

🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏
🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी  टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
.
*३. श्री गुरुदेव का अंग ~८९/९२*
.
*गुरु चंदन चन्दन किये, वृक्ष अठारह भार ।*
*डाल पान फल फूल का, रज्जब नहीं विचार ॥८९॥*
ढाई मन का एक भार होता है । प्रत्येक वनस्पति का एक एक पत्ता लेने से अठारह भार होते हैं, इसीलिये वृक्षों को अठारह भार कहते हैं । चंदन अठारह भार वृक्षों के डाल, पत्ते, फूल, फलादि सभी अंगो को अपनी सुगंधि से युक्त करता है । वैसे ही गुरु शिष्यों की जाति आदि का विचार न करके उनके तन मन इन्द्रियादि सभी अंगो को सुधारते हैं । 
*गुरु पारस पल में परसि, शिष कंचन कर लीन ।* 
*सो रज्जब महँगे सदा, कुल कालिमा सु छीन ॥९०॥* 
जैसे लोहा पारस से स्पर्श होता है, तब उसके कालापन आदि संपूर्ण दोष नष्ट होकर वह क्षणभर में सोना बन जाता है और महँगा बिकता है, वैसे ही शिष्य गुरु के ज्ञान को धारण करता है, तब उसके मल आदि सम्पूर्ण दोष नष्ट हो जाते हैं और वह ब्रह्म का साक्षात्कार करके सदा के लिये महान बन जाता है ।
.
*रज्जब निपजहिं इन्द्र गुरु, अदभू१ आदम ऐन२ ।*
*पहुप पत्र फल पूजिये, सुर नर पावहिं चैन ॥९१॥*
जैसे इन्द्र से वृक्ष१ उत्पनन होते हैं, फिर उनके पुष्प, पत्र, फलादि से सुर नरादि की पूजा होती है, तब सुर और नरादि को आनन्द प्राप्त होता है । वैसे ही गुरु उपदेश मानव ठीक२ ठीक सुधर जाते हैं, तब उनके कर्म, भक्ति, ज्ञानादि से सभी सुर नरादि आनन्दित होते हैं ।
*तिल तालिब७ गुल१ पीर२ मिल, सुहबत३ सौंधा४ होय ।* 
*जन रज्जब गुंजस५ बिना, कुजंद६ बास न कोय ॥९२॥*
जैसे तिल - तेल और पुष्पों१ के संग३ से तेल में सुगन्ध४ हो जाती है । बिना संग५ तिल६ तेल में सुगन्ध नहीं आती । वैसे ही जिज्ञासु७ को सिद्ध२ गुरु का सत्संग मिलता है तब ही उसमें ज्ञान आता है, बिना सत्संग नहीं आता । 
(क्रमशः)

बुधवार, 21 जनवरी 2026

दयालपुरा का चातुर्मास ~

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
.
उतराध(हरियाणा) की रामत ~ 
हांसी से विदा होकर आचार्य उदयरामजी महाराज उतराध की रामत करने पधारे । जहां- जहां स्थानधारी साधुओं तथा सेवकों का आग्रह था वहां-वहां पधार कर अपने दर्शन सत्संग से उनको आनन्दित किया । इस रामत में बालक निश्‍चलदासजी को देखकर आचार्य उदयरामजी ने कह दिया था कि - यह महान् विद्वान् होगा ।
.
कहा भी है - 
संतों को हो जात है, होनहार का ज्ञान ।
उदयराम ने कराया, निश्‍चल का सम्मान ॥३१७ ॥द्द. त. ११ 
उतराध की रामत करके फिर नारायणा दादूधाम की ओर चले । मार्ग के निज सेवकों तथा धार्मिक जनता को निर्गुण ब्रह्म भक्ति का उपदेश करते हुये शनै: शनै नारायणा दादूधाम दादूद्वारे में पधार गये और यहां भजन उपदेश करने लगे ।  
.
दयालपुरा का चातुर्मास ~ 
वि. सं. १९२२ के चातुर्मास का निमंत्रण आचार्य उदयरामजी महाराज को चम्पादासजी दयालपुरा वालों ने दिया । चातुर्मास का समय समीप आने पर आचार्य उदयरामजी महाराज ने शिष्य संत मंडल के सहित नारायणा दादूधाम से चातुर्मास करने के लिये दयालपुरा को प्रस्थान किया । मार्ग के स्थानधारी साधुओं तथा सेवकों को अपने दर्शन सत्संग से आनन्दित करते हुये समय पर दयालपुरा पहुंच गये । 
.
चम्पादास जी ने विधि विधान से आचार्य जी का सामेला किया और ले जाकर नियत स्थान पर ठहराया । चातुर्मास आरंभ हो गया । चातुर्मास के कार्यक्रम नियम पूर्वक प्रतिदिन होने लगे । प्रात: दादूवाणी की कथा, पद गायन, संकीर्तन, फिर भोजन की पंक्ति । मध्य दिन का सत्संग, पदगायन, नाम कीर्तन, सायं आरती ‘दादूराम’ मंत्र की ध्वनि । 
.
जागरण के दिन जागरण होता था । आस- पास के स्थानधारी साधुओं की रसोइंया भी आती थीं । चातुर्मास समाप्ति के दिन तो आसपास के साधुओं व सेवकों का मेला सा हो गया था । समाप्ति के दिन दादूवाणी जी की आरती उतारी गई । आचार्य जी को मर्यादानुसार भेंट दी । संतों को वस्त्र दिये । आज भोजन के समय पंक्ति भी विशाल लगी थी । 
.
श्‍वेत हंसों की सी पंक्ति विराज रही थी । बीच-बीच में कषाय वस्त्र धारी विरक्त दिखाई दे रहे थे और वैसे ही विशाल जटाधारी तपस्वी संतों के भी बीच-बीच में दर्शन हो रहे थे । दर्शकों के हृदय के आनन्द को बढाती हुई संत पंक्ति निर्गुण ब्रह्म के भोग लगाकर आचार्य जी के आज्ञा देने पर निरंजन राम को स्मरण करते हुये जीमने लगी । 
.
भोजन पूरा हो जाने पर वृद्ध(ब्रह्म) भगवान की, दादूजी की, अन्य श्रेष्ठ संतों और नारायणा दादूधाम के आचार्यों की जय बोलकर पंक्ति उठ गई । उक्त प्रकार आज का संतों का मेला अच्छा रहा । दूसरे दिन आये हुये अपने प्रिय अतिथियों को सप्रेम विदा कर दिया । आचार्यजी को भी विधि विधान से विदा करके आशीर्वाद प्राप्त किया ।आचार्यजी दयालपुरा से विदा होकर शनै: शनै: मार्ग की धार्मिक जनता को अपने दर्शन सत्संग से सुख प्रदान करते हुये नारायणा दादूधाम में पधार गये ।
(क्रमशः)  

*१७. बचन बिबेक को अंग ५/८*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
.
*१७. बचन बिबेक को अंग ५/८*
.
सुन्दर सुनतें होइ सुख, तब ही मुख तें बोल । 
आक बाक बकि और की, बृथा न छाती छोल ॥५॥
अतः बुद्धिमान् पुरुष को ऐसे वचन बोलने चाहियें जो सुनने वाले को सुखप्रद एवं शान्तिप्रद हों । उसे सदा ध्यान रखना चाहिये कि सुनने वाले के हृदय को उसके निरर्गल एवं निरर्थक वचनों से कोई व्यर्थ आघात(हार्दिक कष्ट = छाती छोल) न हो ॥५॥
.
सुन्दर वाही वचन है, जा महिं कछू बिबेक । 
ना तरु झेरा मैं पर्यौ, बोलत मानौ भेक ॥६॥
सभ्य समाज में बैठ कर बुद्धिमान् पुरुष का ऐसा ही वचन उचित माना जाता है जो विवेकपूर्ण, हितकर, सुखप्रद एवं शान्तिप्रद हो; अन्यथा उस का वह सब कुछ बोला हुआ वैसा ही समझा जायगा जैसे कोई जल से भरे गड्ढे(झेरा) पर बैठा हुआ मैंढक बोल रहा हो ॥६॥
.
सुन्दर वाही बोलिवौ, जा बोलै में ढंग । 
नातरु पशु बोलत सदा, कौंन स्वाद रस रंग ॥७॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - ज्ञानवान् पुरुष को सभ्य रीति एवं नीति से युक्त वचन ही बोलना चाहिये; अन्यथा उस का बोला हुआ वचन पशुओं के तुल्य ही समझा जायगा । क्या घोड़ों का हिनहिनाना, भैसों का अरड़ाना या ऊंटों का बलबलाना किसी को प्रिय लगता है ! ॥७॥
.
घूघू कउवा रासिभा, ये जब बोलहिं आइ । 
सुन्दर तिनकौ बोलिबौ, काहू कौं न सुहाइ ॥८॥
उल्लू(घूघू), कौआ या गधा जब कभी हमारे समीप आकर बोलते हैं तो क्या उनकी वह शब्दध्वनि हमको कर्णप्रिय लगती है । वह किसी को भी प्रिय नहीं लगती ! ॥८॥
(क्रमशः)  

*नरेन्द्र की उच्च अवस्था*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
.
*दादू मैं क्या जानूँ क्या कहूँ,*
*उस बलिये की बात ।*
*क्या जानूँ क्यों ही रहै, मो पै लख्या न जात ॥*
.
साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
==================
*नरेन्द्र की उच्च अवस्था*
"एक दिन कमरे के दरवाजे बन्द करके उन्होंने देवेन्द्रबाबू और गिरीशबाबू से मेरे सम्बन्ध में कहा था, 'उसके घर का पता अगर उसे बता दिया जायगा, तो फिर वह देह नहीं रख सकता ।"
.
मास्टर - हाँ, यह तो हमने सुना है । हम लोगों से भी यह बात उन्होंने कई बार कही है । काशीपुर में रहते हुए एक बार तुम्हारी वही अवस्था हुई थी, क्यों ?
नरेन्द्र - उस अवस्था में मुझे ऐसा जान पड़ा कि मेरे शरीर है ही नहीं; केवल मुँह देख रहा हूँ । श्रीरामकृष्ण ऊपर के कमरे में थे । मुझे नीचे यह अवस्था हुई । उस अवस्था के होते ही में रोने लगा - यह मुझे क्या हो गया ? बूढ़े गोपाल ने ऊपर आकर उनसे कहा, 'नरेन्द्र रो रहा है ।'
.
"जब उनसे मेरी मुलाकात हुई तब उन्होंने कहा, 'अब तेरी समझ में आया । पर कुंजी मेरे पास रहेगी ।' मैंने कहा, 'मुझे यह क्या हुआ ?'
"दूसरे भक्तों की ओर देखकर उन्होंने कहा, 'जब वह अपने को जान लेगा, तब देह नहीं रखेगा । मैंने उसे भुला रखा है ।' एक दिन उन्होंने कहा था, 'तू अगर चाहे तो हृदय में तुझे कृष्ण दिखायी दें ।' मैंने कहा, 'मैं कृष्ण-विष्ण नहीं मानता ।'
(नरेन्द्र और मास्टर हँसते हैं)
.
"एक अनुभव मुझे और हुआ है । किसी किसी स्थान पर वस्तु या मनुष्य को देखने पर ऐसा जान पड़ता है जैसे पहले मैंने उन्हें कभी देखा हो, पहचाने हुए-से दीख पड़ते हैं । अमहर्स्ट स्ट्रीट में जब मैं शरद के घर गया, शरद से मैंने कहा, उस घर का सर्वांश जैसे मैं पहचानता हूँ, ऐसा भाव पैदा हो रहा है । घर के भीतर के रास्ते, कमरे, जैसे बहुत दिनों के पहचाने हुए हैं ।
.
"मैं अपनी इच्छानुसार काम करता था, वे कुछ कहते न थे । मैं साधारण ब्राह्मसमाज का मेम्बर बना था, आप जानते हैं न ?"
मास्टर - हाँ, मैं जानता हूँ ।
नरेन्द्र - वे जानते थे कि वहाँ स्त्रियाँ भी जाया करती हैं । स्त्रियों को सामने रखकर ध्यान हो नहीं सकता । इसलिए इस प्रथा की वे निन्दा किया करते थे । परन्तु मुझे वे कुछ न कहते थे । एक दिन सिर्फ इतना ही कहा कि राखाल से ये सब बातें न कहना कि तु मेम्बर बन गया है, नहीं तो फिर उसे भी जाने की इच्छा होगी ।
.
मास्टर - तुम्हारा मन ज्यादा जोरदार है, इसीलिए उन्होंने तुम्हें मना नहीं किया ।
नरेन्द्र - बड़े दुःख और कष्टों के झेलने के बाद यह अवस्था हुई है । मास्टर महाशय, आपको दुःख-कष्ट नहीं मिला - मैं मानता हूँ कि बिना दुःख-कष्ट के हुए कोई ईश्वर को आत्मसमर्पण नहीं करता –
.
"अच्छा, अमुक व्यक्ति कितना नम्र और निरहंकार है ! उसमें कितनी विनय है ! क्या आप मुझे बता सकते हैं कि मुझमें किस तरह विनय आये ?"
मास्टर - उन्होंने तुम्हारे अहंकार के सम्बन्ध में बतलाया था कि यह किसका अहंकार है ।
.
नरेन्द्र - इसका क्या अर्थ है ?
मास्टर - राधिका से एक सखी कह रही थी, 'तुझे अहंकार हो गया है, इसीलिए तूने कृष्ण का अपमान किया है ।' इसका उत्तर एक दूसरी सखी ने दिया । उसने कहा, 'हाँ, राधिका को अहंकार तो हुआ है परन्तु यह अहंकार है किसका ?' - अर्थात्, श्रीकृष्ण मेरे पति हैं - यह अहंकार है, - इस 'अहं' भाव को श्रीकृष्ण ने ही उसमें रखा है । श्रीरामकृष्ण के कहने का अर्थ यह है कि ईश्वर ने ही तुम्हारे भीतर यह अहंकार भर रखा है, अपना बहुतसा कार्य करायेंगे, इसलिए ।
.
नरेन्द्र - परन्तु मेरा 'अहं' पुकारकर कहता है कि मुझे कोई क्लेश नहीं है ।
मास्टर - (सहास्य) - हाँ, तुम्हारी इच्छा की बात है ।
(दोनों हँसते हैं)
अब दूसरे दूसरे भक्तों की बात होने लगी - विजय गोस्वामी आदि की ।
नरेन्द्र - विजय गोस्वामी की बात पर उन्होंने कहा था, 'यह दरवाजा ठेल रहा है ।’
मास्टर - अर्थात् अभी तक घर के भीतर घुस नहीं सके ।
.
"परन्तु श्यामपुकुरवाले घर में विजय गोस्वामी ने श्रीरामकृष्ण से कहा था, 'मैंने आपको ढाके में इसी तरह देखा था, इसी शरीर में ।' उस समय तुम भी वहाँ थे ।
नरेन्द्र - देवेन्द्रबाबू, रामबाबू ये लोग भी संसार छोड़ेंगे । बड़ी चेष्टा कर रहे हैं । रामबाबू ने छिपे तौर पर कहा है, दो साल बाद संसार छोड़ेंगे ।
मास्टर - दो साल बाद ? शायद लड़के-बच्चों का बन्दोबस्त हो जाने पर ?
.
नरेन्द्र - और यह भी है कि घर भाड़े से उठा देंगे और एक छोटासा मकान खरीद लेंगे । उनकी लड़की के विवाह की व्यवस्था अन्य सम्बन्धी कर लेंगे ।
मास्टर - नित्यगोपाल की अच्छी अवस्था है - क्यों ?
नरेन्द्र- क्या अवस्था है ?
मास्टर - कितना भाव होता है ! - ईश्वर का नाम लेते ही आँसू बह चलते हैं - रोमांच होने लगता है !
.
नरेन्द्र - क्या भाव होने से ही बड़ा आदमी हो गया ?
"काली, शरद, शशी, सारदा - ये सब नित्यगोपाल से बहुत बड़े आदमी हैं । इनमें कितना त्याग है ! नित्यगोपाल उनको (श्रीरामकृष्ण को) मानता कहाँ है ?"
मास्टर - उन्होंने कहा भी है कि वह यहाँ का आदमी नहीं है । परन्तु श्रीरामकृष्ण पर भक्ति तो वह खूब करता था, मैंने अपनी आँखों से देखा है ।
नरेन्द्र - क्या देखा है आपने ?
.
मास्टर - जब मैं पहले-पहल दक्षिणेश्वर जाने लगा था, तब श्रीरामकृष्ण के कमरे से भक्तों का दरबार जाने पर, एक दिन बाहर आकर मैंने देखा - नित्यगोपाल घुटने टेककर बगीचे की लाल सुरखीवाली राह पर श्रीरामकृष्ण के सामने हाथ जोड़े हुए था, श्रीरामकृष्ण खड़े थे । चाँदनी बड़ी साफ थी । श्रीरामकृष्ण के कमरे के ठीक उत्तर तरफ जो बरामदा है उसी के उत्तर ओर लाल सुरखीवाला रास्ता है । उस समय वहाँ और कोई न था । जान पड़ा, नित्यगोपाल शरणागत हुआ है, और श्रीरामकृष्ण उसे आश्वासन दे रहे हैं ।
.
नरेन्द्र - मैंने नहीं देखा ।
मास्टर - और बीच बीच में श्रीरामकृष्ण कहते थे, उसकी परमहंस अवस्था है । परन्तु यह भी मुझे खूब याद है, श्रीरामकृष्ण ने उसे स्त्री भक्तों के पास जाने की मनाही की थी । बहुत बार उसे सावधान कर दिया था ।
नरेन्द्र - और उन्होंने मुझसे कहा था, 'उसकी अगर परमहंस अवस्था है तो धन के पीछे क्यों भटकता है ?' और उन्होंने यह भी कहा था, 'वह यहाँ का आदमी नहीं है । जो हमारे अपने आदमी हैं, वे यहाँ सदा आते रहेंगे। ।
.
"इसीलिए तो वे बाबू पर नाराज होते थे । इसलिए कि वह सदा नित्यगोपाल के साथ रहता था, और उनके पास ज्यादा आता न था ।
“मुझसे उन्होंने कहा था, 'नित्यगोपाल सिद्ध है - वह एकाएक सिद्ध हो गया है - आवश्यक तैयारी के बिना । वह यहाँ का आदमी नहीं है; अगर अपना होता तो उसे देखने के लिए मैं कुछ भी तो रोता, परन्तु उसके लिए में नहीं रोया ।'
"कोई-कोई उसे नित्यानन्द कहकर प्रचार कर रहे हैं । परन्तु उन्होंने (श्रीरामकृष्ण ने) कितनी ही बार कहा है, 'मैं ही अद्वैत, चैतन्य और नित्यानन्द हूँ । एक ही आधार में मैं उन तीनों का समष्टि-रूप हूँ ।"
(क्रमशः)

*३. श्री गुरुदेव का अंग ~८५/८८*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी* टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
.
*३. श्री गुरुदेव का अंग ~८५/८८*
.
*रज्जब स्वर्ग नसेनी१ सद्गुरु, सावधान शिष जाँहिं ।*
*शून्य माँहिं चैतन्य है, ता में सहज समाहि ॥८५॥*
सद्गुरु का ज्ञान ईश्वर१ के पास पहुँचने की सीढी है, किन्तु जो सावधान शिष्य होते हैं वे ही उस पर चढ़कर अर्थात उसे धारण करके ईश्वर के पास जाते हैं और विकार - शून्य निर्विकल्प समाधि में स्थिर जो चेतन स्वरूप है, उसका साक्षात्कार करके अनायास उसी में समा जाते हैं ।
.
*गुरु अगस्त१ गगन२ हि रहै, शिष समुद्र धर३ बास ।*
*रजब ऊंचहु के मिल्यूं, सहज गये आकाश ॥८६॥*
जैसे सूर्य१ आकाश में रहता है और समुद्र पृथ्वी३ पर रहता है, किन्तु सूर्य की गर्मी से समुद्र - जल आकाश में चढ़ जाता है । वैसे ही गुरु की वृत्ति ब्रह्म२ में रहती है और शिष्य की वृत्ति माया३ में अर्थात मायिक शरीरादि में रहती है, किन्तु श्रेष्ठ गुरुदेव के सत्संग से वह सहज ही ब्रह्म में चली जाती है, अर्थात ब्रह्माकार ही रहने लगती है ।
.
*सद्गुरु सूरज ले चढे, शिष सत सलिल सुभाइ ।*
*जन रज्जब नर नीर ज्यों, नीचा आपै जाइ ॥८७॥*
यह सत्य है कि स्वभाव से जल और नर की गति अपने आप नीचे की ओर ही होता है, किन्तु सूर्य की किरणों से जल आकाश को जाता है और गुरु की कृपा से नर परब्रह्म को प्राप्त होता है ।
.
*रज्जब ताँबे लोह सौ, बहुत भांति के नंग१ ।*
*महापुरुष पारस मिले, कुल कंचन के अंग२ ॥८८॥*
ताँबे और लोहे से बनी हुई बहुत प्रकार की वस्तुएँ१ हों और वे पारस से स्पर्श हो जाएँ, तो सब सुवर्ण हो जाती हैं । वैसे ही नाना प्रकार के स्वभाव वाले प्राणी महापुरुष गुरुदेव से जा मिलते हैं, तब संपूर्ण रूप से ब्रह्म के ही स्वरूप२ हो जाते हैं ।
(क्रमशः)

मंगलवार, 20 जनवरी 2026

वराहनगर मठ

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
.
*तिल तिल हौं तो तारी वाटड़ी जोऊँ ।*
*एने रे आँसूड़े वाहला, मुखड़ो धोऊँ ॥२॥*
*ताहरी दया करि घर आवे रे वाहला ।*
*दादू तो ताहरो छे रे, मा कर टाला ॥३॥*
.
साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
==================
परिच्छेद २, वराहनगर मठ
(१)नरेन्द्रादि भक्तों की साधना । नरेन्द्र की पूर्वकथा
.
आज शुक्रवार है, २५ मार्च, १८८७ ई.। मास्टर मठ के भाइयों को देखने के लिए आये हैं । साथ देवेन्द्र भी हैं । मास्टर प्रायः आया करते हैं और कभी कभी रह भी जाते हैं । गत शनिवार को वे आये थे, शनि, रवि और सोम, तीन दिन रहे थे । मठ के भाइयों में, खासकर नरेन्द्र में, इस समय तीव्र वैराग्य है ।
.
इसीलिए मास्टर उत्सुकतापूर्वक उन्हें देखने के लिए आते हैं । रात हो गयी है । आज रात को मास्टर मठ में ही रहेंगे ।
सन्ध्या हो जाने पर शशी ने ईश्वर के मधुर नाम का उच्चारण करते हुए ठाकुरघर में दीपक जलाया और धूप-धूना सुलगाने लगे । धूपदान लेकर कमरे में जितने चित्र हैं, सब के पास गये और प्रणाम किया ।
.
फिर आरती होने लगी । आरती वे ही कर रहे हैं । मठ के सब भाई, मास्टर तथा देवेन्द्र, सब लोग हाथ जोड़कर आरती देख रहे हैं, साथ ही साथ आरती गा रहे है - "जय शिव ओंकार, भज शिव ओंकार ! ब्रह्मा विष्णु सदाशिव ! हर हर हर महादेव !"
नरेन्द्र और मास्टर बातचीत कर रहे हैं । नरेन्द्र श्रीरामकृष्ण के पास जाने के समय की बहुतसी बातें कह रहे हैं । नरेन्द्र की उम्र इस समय २४ साल २ महीने की होगी ।
.
नरेन्द्र - पहले-पहल जब मैं गया, तब एक दिन भावावेश में उन्होंने कहा, 'तू आया है !'
"मैंने सोचा, यह कैसा आश्चर्य है ! ये मानो मुझे बहुत दिनों से पहचानते हैं । फिर उन्होंने कहा, 'क्या तू कोई ज्योति देखता है ?'
"मैंने कहा, 'जी हाँ । सोने से पहले, दोनों भौहों के बीच की जगह के ठीक सामने एक ज्योति घूमती रहती है ।' "
.
मास्टर - क्या अब भी देखते हो ?
नरेन्द्र - पहले बहुत देखा करता था । यदु मल्लिक के भोजनागार में मुझे छूकर न जाने उन्होंने मन ही मन क्या कहा, मैं अचेत हो गया था । उसी नशे में मैं एक महीने तक रहा था ।
"मेरे विवाह की बात सुनकर माँ काली के पैर पकड़कर वे रोये थे । रोते हुए कहा था, 'माँ, वह सब फेर दे - माँ, नरेन्द्र कहीं डूब न जाय !'
.
"जब पिताजी का देहान्त हो गया, और माँ और भाइयों को भोजन तक की कठिनाई हो गयी तब मैं एक दिन अन्नदा गुहा के साथ उनके पास गया था ।
"उन्होंने अन्नदा गुहा से कहा, 'नरेन्द्र के पिताजी का देहान्त हो गया है, घरवालों को बड़ा कष्ट हो रहा है, इस समय अगर इष्टमित्र उसकी सहायता करें तो बड़ा अच्छा हो ।'
.
"अन्नदा गुहा के चले जाने पर मैं उनसे कुछ रुष्टता से कहने लगा, 'क्यों आपने उनसे ये बातें कही ?' यह सुनकर वे रोने लगे थे । कहा, 'अरे ! तेरे लिए मैं द्वार-द्वार भीख भी माँग सकता हूँ !'
.
"उन्होंने प्यार करके हम लोगों को वशीभूत कर लिया था । आप क्या कहते हैं ?"
मास्टर - इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है । उनके स्नेह का कोई कारण नहीं था ।
नरेन्द्र - मुझसे एक दिन अकेले में उन्होंने एक बात कही । उस समय और कोई न था । यह बात आप और किसी से न कहियेगा ।
.
मास्टर – नहीं । हाँ, क्या कहा था ?
नरेन्द्र - उन्होंने कहा, 'सिद्धियों के प्रयोग करने का अधिकार मैंने तो छोड़ दिया है, परन्तु तेरे भीतर से उनका प्रयोग करूँगा - क्यों, तेरा क्या कहना है ?' मैंने कहा, 'नहीं, ऐसा तो न होगा ।'
"उनकी बात मैं उड़ा देता था । आपने उनसे सुना होगा । वे ईश्वर के रूपों के दर्शन करते थे, इस बात पर मैंने कहा था, 'यह सब मन की भूल है ।'
.
"उन्होंने कहा, 'अरे मैं कोठी पर चढ़कर जोर जोर से पुकारकर कहा करता था - अरे, कहाँ है कौन भक्त, चले आओ, तुम्हें न देखकर मेरे प्राण निकल रहे हैं । माँ ने कहा था, - 'अब भक्त आयेंगे,' अब देख, सब बातें मिल रही हैं ।'
"तब मैं और क्या कहता, चुप हो रहा ।
(क्रमशः)

*१७. बचन बिबेक को अंग १/४*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
.
*१७. अथ बचन बिबेक को अंग १/४*
.
सुंदर तबही बोलिये, समझि हिये मैं पैठि । 
कहिये बात बिबेक की, नहिंतर चुप ह्वै बैठि ॥१॥
विवेकपूर्ण वचन : श्रीसुन्दरदासजी महाराज कहते हैं - वक्ता को कोई भी बात मुख से बोलने से पूर्व उस पर अपने हृदय में विचार कर लेना चाहिये । यदि वह बात विवेकपूर्ण(हितकारी) हो तो उसे बोलना चाहिये, अन्यथा चुप रहना चाहिये ॥१॥
.
सुन्दर मौंन गहे रहै, जानि सकै नहिं कोइ । 
बिन बोलै गुरुवा कहैं, बोलै हरवा होइ ॥२॥
ऐसा पुरुष जब तक मौन रहेगा तब तक अन्य लोग कुछ भी न जान सकेंगे कि वह क्या कहना चाहता है । जब तक वह नहीं बोलेगा तभी तक सामने वाले के सम्मुख उसकी गम्भीरता(गुरुता) बनी रहेगी; बोल देने पर, यदि वह उसकी बोली हुई बात अविवेकपूर्ण हुई तो उसमें हल्कापन आ जायगा अर्थात् उसकी वह बात महत्त्वहीन हो जायगी ॥२॥
.
सुन्दर मौंन गहे रहै, तब लगि भारी तोल । 
मुख बोलैं तें होत है, सब काहू कौ मोल ॥३॥ 
बुद्धिमान् पुरुष जब तक मौन रहता है तब तक समाज में उस की प्रतिष्ठा(गम्भीरता) बनी रहती है । मुख से कुछ बोलने के साथ ही समाज उसकी बुद्धिमत्ता, विद्वत्ता या महत्त्व परख लेता है ॥३॥
.
सुन्दर यौं ही बकि उठै, बोलै नहीं बिचारि । 
सबही कौं लागै बुरौ, देत ढीम सौ डारि ॥४॥
यदि कोई पुरुष समाज में बैठ कर असम्बद्ध, निरर्थक या अविवेकपूर्ण वचन बोलता है, विचारपूर्वक नहीं बोलता है तो ऐसा पुरुष वहाँ उपस्थित सभी लोगों की दृष्टि में अपना महत्त्व(गरिमा) खो देता है । उस समय वहाँ बैठे हुए लोगों को उसके बोले हुए वे वचन ऐसे ही लगते हैं जैसे कोई किसी पर ढेला(= ढीम) फेंक रहा हो ॥४॥
(क्रमशः) 

वि. सं. १९२० का चातुर्मास ~

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
.
वि. सं. १९२० का चातुर्मास ~ 
उक्त दोनों संतों ने संत मंडल सहित आचार्यजी का मर्यादानुसार सामेला किया और उचित स्थान पर ठहराया । चातुर्मास की मर्यादा के अनुसार चातुर्मास में होने वाले सत्संगादि बहुत अच्छी पद्धति से होते रहे । चातुर्मास समाप्ति पर आचार्यजी को उचित भेंट देकर तथा सब संतों को वस्त्र देकर चातुर्मास समाप्त किया । फिर आनन्द के साथ संत मंडल के सहित आचार्यजी को विदा किया ।  
.
ऊधोदासजी की सेवा ~ 
वि. सं. १९२० में सदरपूरा के महन्त ऊधोदासजी ने नारायणा दादूधाम दादूद्वारे के सदाव्रत विभाग को ५१ बीघा भूमि भेंट की जिस की आय सदाव्रत में ही खर्च की जाय, अन्य कार्यों में नहीं । महन्त ऊधोदासजी के कथनानुसार ही उसकी आय सदाव्रत में भूखे लोगों को अन्न देने में ही उपयोग करने की व्यवस्था कर दी गई । 
.
सीकर नरेश का आना ~ 
वि. सं. १९२० के फाल्गुण कृष्णा ९ मी को सीकर के राव राजा भैंरुसिंहजी नारायणा दादूधाम की यात्रा करने तथा आचार्य उदयरामजी महाराज का दर्शन व प्रवचन सुनने के लिये आये । स्थान की ओर से उनका स्वागत किया गया । वे प्रथम श्रीदादू मंदिर का दर्शन करने मंदिर में गये । फिर उनको खेजडा का दर्शन कराया । छत्रियों पर गये । 
.
आचार्यजी का दर्शन करके मर्यादानुसार भेंट चढाई तथा सत्संग किया । अन्य भी जो भजनानन्दी, विरक्त, योगी, ज्ञानी संत उस समय दादूधाम में थे उन सब का ही नरेश ने दर्शन सत्संग किया । जितनी उनकी इच्छा थी उतने वे ठहर कर आचार्यजी से मिले । मंदिर में प्रणाम करके फिर सीकर राव राजा भैंरुसिंहजी अपनी इच्छानुसार चले गये । 
.
हांसी चातुर्मास ~ 
वि. सं. १९२१ में चैनरामजी हांसी वालों ने आचार्य उदयरामजी का शिष्य मंडल के सहित हांसी में अपने स्थान पर चातुर्मास मनाया था । इससे आचार्य उदयरामजी महाराज अपने शिष्य मंडल के सहित हांसी में चातुर्मास करने के लिये नारायणा दादूधाम से चलकर मार्ग के भक्तों को अपने दर्शन, सत्संग से कृतार्थ करते हुये हांसी पहुँचे । 
.
तब चैनरामजी ने भक्त मंडल के सहित बाजे गाजे से संकीर्तन करते हुये आकर आचार्य उदयरामजी महाराज की अगवानी की और मर्यादानुसार भेंट चढाकर सत्यराम बोलते हुये दंडवत प्रणाम शिष्टाचार हो जाने पर आचार्यजी को लेकर संकीर्तन करते हुये नियत स्थान पर पहुँचे । 
.
हांसी नगर में आचार्यजी के आने की बात शीघ्र ही फैल गई । भक्त लोग दर्शन करने आने लगे । आज के दिन दर्शनार्थियों का बहुत आना जाना रहा । महात्मा चैनरामजी के भक्तों ने आचार्य जी की तथा सभी की सेवा की व्यवस्था सुचारु रुप से कर दी । चातुर्मास आरंभ के दिन चातुर्मास के संबन्धी कार्यक्रम विधि विधान से सब आरंभ हो गये । 
.
प्रात: दादूवाणी की कथा, मध्य दिन में गीता आदि पर विद्वान् संतों के प्रवचन, संकीर्तन, गायक संतों के पद गायन, आरती, नाम ध्वनि अपने- अपने समय पर सब होने लगे । जागरण के दिन जागरण होने लगे । हांसी की भाग्य शालिनी जनता उक्त सभी कार्यक्रमों में सप्रेम भाग लेती थी । 
.
भक्त लोग संत सेवा भी श्‍लाघनीय रुप में करते थे । उक्त प्रकार हांसी चातुर्मास बहुत अच्छा हुआ । चातुर्मास समाप्ति पर महात्मा चैनरामजी ने तथा हांसी के भक्तों ने मर्यादानुसार आचार्यजी को भेंट, संतों को वस्त्र देकर सस्नेह विदा किया ।
(क्रमशः)