रविवार, 11 जनवरी 2026

रामदासजी के चातुर्मास ~

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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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रामदासजी के चातुर्मास ~  
वि. सं. १९१५ में रामदासजी नटाटा ने आचार्य उदयरामजी महाराज का शिष्य संत मंडल के सहित चातुर्मास मनाया । शिष्य संत मंडल के सहित आचार्यजी नियत समय पर पधारे । रामदासजी ने मर्यादा पूर्वक आचार्यजी की अगवानी की और बाजे गाजे के साथ संकीर्तन करते हुये ले जाकर नियत स्थान पर ठहराया । 
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चातुर्मास का कार्यक्रम आरंभ हो गया । कथा के समय कथा, भोजन के समय भोजन, आरती, नामध्वनि आदि सब कार्य नियत समय पर होते थे । एकादशी आदि पुण्य तिथियों को जागरण आदि सब यथावत होते थे । स्थानधारी संत तथा भक्त जन भी रसोइयां लेकर आते रहते थे । 
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यह चातुर्मास अच्छा हुआ । चातुर्मास समाप्ति के समय रामदासजी ने मर्यादानुसार आचार्यजी को भेंट और शिष्य संत मंडल को वस्त्रादि देकर तथा भंडारी आदि कर्मचारियों का यथोचित सत्कार के किया था ।
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शेखावटी की रामत ~ 
वि. सं. १९१६ में शेखावटी के सेठों के आग्रह से चिडावा, रामगढ आदि शहरों में रामत करने पधारे । चिडावा पहुँचे तब चिडावा के भक्तों ने अति श्रद्धा भाव से बाजे गाजे के साथ संकीर्तन करते हुये आचार्यजी की अगवानी की और संकीर्तन करते हुये नगर के मध्य से लाकर नियत स्थान पर ठहराया । 
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संत सेवा का अच्छी प्रकार प्रबन्ध कर दिया । सत्संग होने लगा । दादूवाणी के गंभीर प्रवचन भक्त लोग बडी श्रद्धा से सुनने लगे । रसोइयां भी अति प्रेम से देने लगे । सेठ लोग आचार्यजी को शिष्य मंडल के सहित भोजन कराने मर्यादापूर्वक अपने घरों पर ले जाते थे । 
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मर्यादापूर्वक पहले आज्ञा की भेंट फिर भोजन करने के पश्‍चात् आचार्यजी को मर्यादानुसार भेंट देकर तथा संतों का यथोचित सत्कार करके मर्यादा से स्थान पर पहुंचाते थे । उक्त प्रकार चिडावा के भक्तों ने सत्संग तथा संत- सेवा दोनों ही कार्य अति श्रद्धा भक्ति से किये थे । जब आचार्यजी चिडावा से जाने लगे तब सस्नेह मर्यादा पूर्वक भेंटादि कर विदा किया था ।
(क्रमशः)  

*१५. मन कौ अंग ६८/७०*

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१५. मन कौ अंग ६८/७०*

इंद्री अरु रवि शशि कला, घात मिलावै कोइ । 
सुन्दर तोलै जुगति सौं, तब मन पूरा होइ ॥६८॥
५ इन्द्रिय, १२ सूर्य, १ चन्द्र, १६ कला, ६ रस, रक्त आदि धातु - ये सब मिल कर ४० होते हैं । यदि इन सब के बल को मिलाकर देखा जाय तो हमारा मन इन सब के समग्र बल के समान ही तुल्यबलशाली है ॥६८॥
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चौपई
पांच सात नौ तेरह कहिये, साढे तीन अढाई लहिये । 
सब कौं जोर एक मन होई, मन के गायें सत्य नहिं कोई ॥६९॥
५, ७, ९, १३ इन सङ्ख्याओं के साथ(३ २/१) एवं(२ २/१) की सङ्ख्या मिला दी जायँ तो सब मिल कर ४०(चालीस) की सङ्ख्या हो जाती है । यह सङ्कलन ही एक मन कहलाता है । इस मन के अनुसार चलने से हम वस्तुतत्त्व को अधिगत नहीं कर सकते ॥६९॥
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ज्ञान कर्म इन्द्री दश जानहुं, मन ग्यारह का प्रेरक मानहुं । 
ग्यारह में जब एक मिटावै, सुन्दर तबहिं एकही पावै ॥७०॥
इति मन को अंग ॥१५॥
पाँच ज्ञानेन्द्रिय एवं पाँच कर्मेन्द्रिय मिला कर इन्द्रियों की सङ्ख्या दश (१०) जाननी चाहिये । इनमें मन भी मिला दिया जाय तो ये इन्द्रियाँ ११ (ग्यारह) हो जाती है । इन में ग्यारहवाँ मन इन दश इन्द्रियों का प्रेरक है ।
महात्मा श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - यदि इस(११ सङ्ख्या) में से एक ग्यारहवाँ मन हटा दिया जाय(निगृहीत कर लिया जाय तो एक ब्रह्म ही दिखायी देगा । (साधक को उसी एक ब्रह्म का साक्षात्कार होगा।) ॥७०॥ 
इति मन का अङ्ग सम्पन्न ॥१५॥
(क्रमशः) 

क्या श्रीरामकृष्ण अवतार हैं

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🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*प्रेम भक्ति दिन दिन बधै, सोई ज्ञान विचार ।*
*दादू आतम शोध कर, मथ कर काढ़या सार ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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"... ज्ञानयोग अवश्य ही अति श्रेष्ठ मार्ग है । उच्च तत्त्वज्ञान इसका प्राण है, और आश्चर्य की बात तो यह है कि प्रत्येक मनुष्य यह सोचता है कि वह ज्ञानयोग के आदर्शानुसार चलने में समर्थ है । परन्तु वास्तव में ज्ञानयोग-साधना बड़ी कठिन है । ज्ञानयोग के पथ पर चलने में हमारे गड्ढे में गिर जाने की बड़ी आशंका रहती है ।
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कहा जा सकता है कि इस संसार में दो प्रकार के मनुष्य होते हैं । एक तो आसुरी प्रकृतिवाले जिनकी दृष्टि में अपने शरीर का पालन-पोषण ही सर्वस्व है और दूसरे दैवी प्रकृतिवाले, जिनकी यह धारणा रहती है कि शरीर किसी एक विशेष उद्देश्य की पूर्ति के लिए केवल एक साधन तथा आत्मोन्नति के लिए एक यन्त्रविशेष है ।
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शैतान भी अपनी कार्यसिद्धि के लिए झट से शास्त्रों को उद्धृत कर देता है, और इस प्रकार प्रतीत होता है कि बुरे मनुष्य के कृत्यों के लिए भी शास्त्र उसी प्रकार साक्षी है जैसे कि एक सत्पुरुष के शुभ कार्य के लिए । ज्ञानयोग में यही एक बड़े डर की बात है । परन्तु भक्तियोग स्वाभाविक तथा मधुर है । भक्त उतनी ऊँची उड़ान नहीं उड़ता जितनी कि एक ज्ञानयोगी, और इसीलिए उसके उतने बड़े खड्डों में गिरने की आशंका भी नहीं रहती ।..." 
 -'भक्तियोग' से उद्धृत
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क्या श्रीरामकृष्ण अवतार हैं ? स्वामीजी का विश्वास
भारत के महापुरुषों(The Sages of India) के सम्बन्ध में स्वामीजी ने जो भाषण दिया था, उसमें अवतार-पुरुषों की अनेक बातें कही हैं । श्रीरामचन्द्र, श्रीकृष्ण, बुद्धदेव, रामानुज, शंकराचार्य, चैतन्यदेव आदि सभी की बातें कही । भगवान श्रीकृष्ण के इस कथन का उद्धरण देकर समझाने लगे, 'जब धर्म की ग्लानि होकर अधर्म का अभ्युत्थान होता है, तो साधुओं के परित्राण के लिए, पापाचार को विनष्ट करने के लिए मैं युग युग में अवतीर्ण होता हूँ ।'
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उन्होंने फिर कहा, 'गीता में श्रीकृष्ण ने धर्मसमन्वय किया है', -
"... हम गीता में भिन्न भिन्न सम्प्रदायों के विरोध के कोलाहल की दूर से आती हुई आवाज सुन पाते हैं, और देखते हैं कि समन्वय के वे अद्भुत प्रचारक भगवान श्रीकृष्ण बीच में पड़कर विरोध को हटा रहे हैं ।....” 
 -'भारतीय व्याख्यान' से उद्‌धृत
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"श्रीकृष्ण ने फिर कहा है, - स्त्री, वैश्य, शूद्र सभी परम गति को प्राप्त करेंगे, ब्राह्मण क्षत्रियों की तो बात ही क्या है !
"बुद्धदेव दरिद्र के देव हैं । सर्वभूतस्थमात्मानम् - भगवान सर्वभूतों में हैं - यह उन्होंने प्रत्यक्ष दिखा दिया ।
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बुद्धदेव के शिष्यगण आत्मा, जीवात्मा आदि नहीं मानते हैं - इसीलिए शंकराचार्य ने फिर से वैदिक धर्म का उपदेश दिया । वे वेदान्त का अद्वैत मत, रामानुज का विशिष्टाद्वैत मत समझाने लगे । उसके बाद चैतन्यदेव प्रेमभक्ति सिखाने के लिए अवतीर्ण हुए । शंकर और रामानुज ने जाति का विचार किया था, परन्तु चैतन्यदेव ने ऐसा न किया । चैतन्यदेव ने कहा, 'भक्त की फिर जाति क्या ?' "
(क्रमशः)

*३. श्री गुरुदेव का अंग ~ ४५/४८*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*३. श्री गुरुदेव का अंग ~ ४५/४८*
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*मात पिता का दान ले, दिया सबन का भंग ।*
*जन रज्जब जीव में जट्या, युग युग गुरु दत्त संग ॥४५॥*
४५ में गुरु उपदेश दान की अपारता बता रहे हैं - माता पितादि सब संसारियों का दिया हुआ धन तो लेने के पीछे कोई दिन नष्ट हो जाता है किन्तु गुरु का दिया हुआ उपदेश जीव में संस्कार रूप से जटित प्रति युग में ही रहता है ।
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*गुरु तरूवर अँग डाल बहु, पत्र बैन फल राम ।*
*रज्जब छाया में सुखी, चाख्यूं सरे सु काम ॥४६॥*
४६ में गुरु की विशेषता कह रहे हैं - गुरूदेव विशाल वृक्ष हैं, उन में जो गुरुपने के बहुत से लक्षण हैं वे ही डालें हैं उनके वचन ही पत्ते हैं, और राम ही फल है गुरु-वृक्ष की सत्संग रूप छाया में जो बैठते हैं वे सुखी रहते हैं और जो राम रूप फल का साक्षात्कार रूप आस्वादन करते हैं, उनका मुक्ति रूप कार्य सिध्द होता है ।
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*रज्जब नर नारी युगल, चकवा चकवी जोड़ ।*
*सद्गुरु बैन बिच रैन में, किया दुहूँ घर फोड़ ॥४७॥*
४७ में गुरु वचन की विशेषता बता रहे हैं - नर और नारी दोनों चकवा चकवी की जोड़ी के सामान हैं, श्रेष्ठ गुरु के वचन ही रात्रि है । रात्रि में जैसे चकवा चकवी अलग हो जाते हैं वैसे ही गुरु वचन हृदय में आने से नर नारी का मिलन नहीं होता । गुरु वचन नर और नारी दोनों के ही राग रूप घर को तोड़ कर उन्हें विरक्त करता है ।
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*गोविन्द गिरा सूरज किरण, गुरु दर्पण अति तेज ।*
*जन रज्जब सुरता वनी, लगे तिहाईत हेज ॥४८॥*
४८-४९ में गुरु की महिमा कह रहे हैं - भगवद्-वाणी वेद सूर्यकिरण के समान है गुरु दर्पण के समान हैं, जैसे सूर्य किरण का तेज आतशी शीशा में अधिक हो जाता है, वैसे ही गुरु में जा कर भगवद्-वाणी वेद का ज्ञान बल बढ़ जाता है । आतशी शीशा से अग्नि निकल कर जैसे बन को जलाता है, वैसे ही गुरु से ज्ञानाग्नि निकल कर तीसरे श्रवण करने के प्रेम युक्त साधक-भूमि की वृत्ति-वनी में प्रकट होकर उसके अग्यानादि वृक्षों को भस्म करता है ।
(क्रमशः)

शनिवार, 10 जनवरी 2026

ज्ञानयोग व स्वामी विवेकानन्द

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🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*खंड खंड कर ब्रह्म को, पख पख लीया बाँट ।*
*दादू पूरण ब्रह्म तज, बँधे भरम की गाँठ ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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फिर अमरिकनों से कह रहे हैं - "... अपनी महान् वाणी से ईसा ने जगत् में घोषणा की, 'दुनिया के लोगों, इस बात को भलीभांति जान लो कि स्वर्ग का राज्य तुम्हारे अभ्यन्तर में अवस्थित है ।' - 'मैं और मेरे पिता अभिन्न हैं ।' - साहस कर खड़े हो जाओ और घोषणा करो कि मैं केवल ईश्वर-तनय ही नहीं हूँ, पर अपने हृदय में मुझे यह भी प्रतीति हो रही है कि मैं और मेरे पिता एक और अभिन्न हैं । नाजरथवासी ईसा मसीह ने यही कहा ।...
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“.... इसलिए हमें केवल नाजरथवासी ईसा में ही ईश्वर का दर्शन न कर विश्व के उन सभी महान् आचार्यों व पैगम्बरों में भी उसका दर्शन करना चाहिए, जो ईसा के पहले जन्म ले चुके थे, जो ईसा के पश्चात् आविर्भूत हुए हैं और जो भविष्य में अवतार ग्रहण करेंगे । हमारा सम्मान और हमारी पूजा सीमाबद्ध न हों ।
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ये सब महापुरुष उसी एक अनन्त ईश्वर की विभिन्न अभिव्यक्ति हैं । वे सब शुद्ध और स्वार्थगन्ध-शून्य हैं, सभी ने इस दुर्बल मानवजाति के उद्धार के लिए प्राणपण से प्रयत्न किया है, इसी के लिए अपना जीवन निछावर कर दिया है । वे हमारे और हमारी आनेवाली सन्तान के सब पापों को ग्रहण कर उनका प्रायश्चित्त कर गये हैं ।..." - 'महापुरुषों की जीवनगाथाएँ' से उद्धृत
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स्वामीजी वेदान्त की चर्चा करने के लिए कहा करते थे, परन्तु साथ ही उस चर्चा में जो विपत्ति है, वह भी बता देते थे । श्रीरामकृष्ण जिस दिन ठनठनिया में श्री शशधर पण्डित के साथ वार्तालाप कर रहे थे, उस दिन नरेन्द्र आदि अनेक भक्त वहाँ पर उपस्थित थे, १८८४ ईसवी ।
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ज्ञानयोग व स्वामी विवेकानन्द
श्रीरामकृष्ण ने कहा है, 'ज्ञानयोग इस युग में बहुत कठिन है । जीव का एक तो अन्न में प्राण है, उस पर आयु कम है । फिर देह-बुद्धि किसी भी तरह नहीं जाती । इधर देह-बुद्धि न जाने से ब्रह्मज्ञान नहीं होता । ज्ञानी कहते हैं, 'मैं वही ब्रह्म हूँ ।' मैं शरीर नहीं हूँ, मैं भूख-प्यास, रोग-शोक, जन्म-मृत्यु, सुख-दुःख इन सभी से परे हूँ ।
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यदि रोग-शोक सुख-दुःख इन सब का बोध रहे तो तुम ज्ञानी क्योंकर होगे ? इधर काँटे से हाथ चुभ रहा है, खून की धारा बह रही है, बहुत दर्द हो रहा है, परन्तु कहता है, 'कहाँ, हाथ तो नहीं कटा ! मेरा क्या हुआ ?'
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"इसलिए इस युग के लिए भक्तियोग है । इसके द्वारा दूसरे पथों की तुलना में आसानी से ईश्वर के पास जाया जाता है । ज्ञानयोग या कर्मयोग तथा दूसरे पथों से भी ईश्वर के पास जाया जा सकता है, परन्तु ये सब कठिन पथ है ।" श्रीरामकृष्ण ने और भी कहा है, "कर्मियों का जितना कर्म बाकी है, उतना निष्काम भावना से करें ।
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निष्काम कर्म द्वारा चित्तशुद्धि होने पर भक्ति आयेगी । भक्ति द्वारा भगवान की प्राप्ति होती है ।" स्वामीजी ने भी कहा, "देह-बुद्धि रहते 'सोऽहम्' नहीं होता - अर्थात् सभी वासनाएँ मिट जाने पर, सर्वत्याग होने पर तब कहीं समाधि होती है । समाधि होने पर तब ब्रह्मज्ञान होता है । भक्तियोग सरल व मधुर (natural and sweet) है ।"
(क्रमशः)

नाभा गमन ~

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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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नाभा गमन ~
पटियाला से विदा होकर आचार्य उदयरामजी महाराज संत मंडल के सहित धार्मिक जनता को ब्रह्मभक्ति का उपदेश करते हुये नाभा पधारे । नाभा नरेश भरपूरसिंहजी को जब आप के पधारने की सूचना मिली तब उन्होंने आचार्य उदयरामजी महाराज का शिष्य संत मंडल के साथ अच्छा स्वागत किया तथा यथोचित सेवा करते हुये सत्संग भी किया । 
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नाभा की धार्मिक जनता ने भी आपका अच्छा आदर किया और ज्ञान भक्ति वैराग्यादि से परिपूर्ण दादूवाणी के प्रवचन आप से सुनने में बहुत रुचि दिखाई । आपके सरस भाषणों को सुनते हुये भक्त लोग तृप्त होते ही नहीं थे । सत्संग का समय समाप्त होने पर भी उनकी इच्छा रहती थी थोडा और भी सुनायें तो बहुत अच्छा हो । 
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उक्त प्रकार नाभा के भक्तों की बुद्धि वृति को ब्रह्म विचार में प्रवृत करके वहां से चलने का विचार किया तब नाभा के भक्तों ने मर्यादा पूर्वक भेंटादि देकर स्नेह के साथ विदा किया । 
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कोटकपूरा गमन ~
नाभा से विदा होकर आचार्य उदयरामजी महाराज शिष्य संत मंडल के सहित शनै: शनै: कोटकपूरा पधारे । वहां के राजा वजीरसिंहजी को आपके आने की सूचना मिली तब उन्होंने भी आचार्य उदयरामजी महाराज का उनकी मर्यादा के अनुसार अच्छा स्वागत किया । 
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अच्छे एकांत स्थान पर ठहराकर सेवा की सुन्दर व्यवस्था कर दी और सत्संग करके मर्यादानुसार भेंट भी दी । कोटकपूरा की धार्मिक जनता को भी आपका मधुर प्रवचन बहुत प्रिय लगा । इससे जनता ने आपसे प्रार्थना की कि कुछ दिन हम लोगों के कल्याणार्थ आप यहां ठहरकर हमको दादूवाणी का प्रवचन सुनाइये ।
आचार्यजी ने जनता की प्रार्थना स्वीकार करली । दादूवाणी का प्रवचन होने लगा । जनता अति श्रद्धाभाव से नियम पूर्वक सुनने लगी । रसोई आदि संत सेवा भी अच्छी प्रकार जनता करने लगी । जनता की प्रवचन में रुचि नित्य नूतन बढती ही जाती थी । वहां का सत्संग श्‍लाघनीय ही रहा । 
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जब आचार्य उदयरामजी वहां से विचरने लगे तब भक्त लोगों ने आपको पूर्वक भेंटादि देकर सस्नेह विदा किया । फिर आप लोक - कल्याणार्थ देश में भ्रमण के साथ साथ जनता को हितोपदेश देते हुये शनै: शनै: नारायणा दादूधाम में पधार गये और दादूधाम-दादूद्वारे ही ठहर गये ।
(क्रमशः) 

*१५. मन कौ अंग ६५/६७*

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१५. मन कौ अंग ६५/६७*
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पंच सीस करि येकठे, धरै तराजू आइ । 
आठ बार जो तोलिये, तब मन पकर्या जाइ ॥६५॥
जैसे किसी वस्तु को एक मण तोलने के लिये यदि तराजू के एक पलड़े पर पांच सेर(एक धड़ी) का बाट रखा जाय और दूसरे पलड़े पर उस वस्तु का एक एक सीमित अंश आठ(८) वार रखा जाय तभी वह वस्तु एक मण मानी जाती है; इसी प्रकार कोई साधक पूर्वापेक्षया कुछ प्रबल साधना द्वारा मन पर निग्रह का प्रयास करें तो कुछ कम समय में उसे निगृहीत करने में समर्थ हो सकता है ॥६५॥
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धरै एक धड पालडै, तोलै बरियां चारि । 
थोरे में बसि होइ मन, पंडित लेहु बिचारि ॥६६॥
इसी प्रकार जैसे किसी वस्तु को चार बार में एक मण तोलने के लिये तराजू के एक पलड़े पर १० सेर(१ धड़) का बाट रख कर दूसरे पलड़े पर उस वस्तु को चार अंश में चार बार रखा जाता है; वैसे ही कोई साधक पूर्व की अपेक्षा अधिक प्रबल साधना द्वारा अपने मन को निग्रह का प्रयास करे तो वह पूर्व से भी कम समय में उसे निगृहीत करने में समर्थ हो सकता है - ऐसा समझना चाहिये ॥६६॥
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एक सेर कुंजर हणै, अति गति तामहिं जोर । 
सेर गहे चालीस जिनि, मन तें बली न ओर ॥६७॥
हम देखते हैं कि जङ्गल में अकेला प्रबल पराक्रमी एक सेर(शेर) बड़े से बड़े मदोन्मत्त हाथियों को मार गिराता है, तो हमारे इस मन(मण) के पास तो चालीस सेर हैं, इस के बल के सामने उस एक सेर(शेर) के बल की क्या तुलना हो सकती है ॥६७॥
(क्रमशः) 

*३. श्री गुरुदेव का अंग ~ ४१/४४*

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 *साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*३. श्री गुरुदेव का अंग ~ ४१/४४*
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*सद्गुरु के शब्दों सुन्यो, बहुत होय उपकार ।*
*जन रज्जब जगपति मिले, छूटे सकल विकार ॥४१॥*
शास्त्र तथा संतों से सुनते आ रहे हैं कि - सद्गुरु शब्दों द्वारा महान उपकार होता है । संपूर्ण विकार हटकर परमेश्वर का साक्षात्कार होता है ।
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सुख दाता दुख भंजता, जन रज्जब गुरु साध ।
शब्द माँहिं सांई मिलैं, दीरघ दत्त१ अगाघ ॥४२॥
संसार में गुरु और संत ही दु:ख नष्ट करके सुख देने वाले हैं उनके शब्दों में कथित ज्ञान में स्थित होने से परब्रह्म प्राप्त होते हैं । अत: उनका शब्द प्रदान करना ही महान् और अगाध दान१ है ।
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*जेते जीव सुकृत करैं, इहि सारे संसार ।*
*तेते रज्जब ज्ञान सुन, साधुन के उपकार ॥४३॥*
इस संपूर्ण संसार में जितने भी प्राणी पुण्य कर्म करते हैं, वे सभी संतों का ज्ञानोपदेश सुन कर के ही करते हैं । अत: संसार में जो कुछ भी अच्छापन है वह सब संतों का ही उपकार है ।

*कबीर नामदेव कह गये, परम पुण्य उपकार ।*
*जन रज्जब जीव उद्धरै, शब्दों इहिं संसार ॥४४॥*
कबीर, नामदेवादि संत गुरु शब्दों से होने वाले उपकार और परम पुण्य को कह गये हैं, इस संसार में गुरु-शब्दों द्वारा ही जीवों का उद्धार होता है ।
(क्रमशः) 

शुक्रवार, 9 जनवरी 2026

*अवतार के लक्षण । ईसा मसीह*

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🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*करणी कठिन होत नहिं मोपै,*
*क्यों कर ये दिन भरते ।*
*लालच लाग परत पावक में,*
*आपहि आपै जरते ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*अवतार के लक्षण । ईसा मसीह*
अवतार-पुरुष क्या कहने के लिए आते हैं ? श्रीरामकृष्ण ने नरेन्द्र से कहा था, "भैया, कामिनी-कांचन का त्याग किये बिना न होगा । ईश्वर ही वस्तु है, बाकी सभी अवस्तु हैं ।" स्वामीजी ने भी अमरीकनों से कहा –
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“...... हम अपने आलोच्य महापुरुष, जीवन के इस दिव्य-संदेशवाहक(ईसा) के जीवन का मूलमन्त्र यही पाते हैं कि 'यह जीवन कुछ नहीं है, इससे भी उच्च कुछ और है'..... । उन्हें इस नश्वर जगत् व उसके क्षणभंगुर ऐश्वर्य में विश्वास नहीं था ।... ईसा स्वयं त्यागी व वैराग्यवान् थे, इसलिए उनकी शिक्षा भी यही है कि वैराग्य या त्याग ही मुक्ति का एकमेव मार्ग है, इसके अतिरिक्त मुक्ति का और कोई पथ नहीं है ।
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यदि हममें इस मार्ग पर अग्रसर होने की क्षमता नहीं है, तो हमें मुख में तृण धारण कर विनीत भाव से अपनी यह दुर्बलता स्वीकार कर लेनी चाहिए कि हममें अब भी 'मैं' और 'मेरे' के प्रति ममत्व है, हममें धन और ऐश्वर्य के प्रति आसक्ति है । हमें धिक्कार है कि हम यह सब स्वीकार न कर, मानवता के उन महान् आचार्य का अन्य रूप से वर्णन कर उन्हें निम्न स्तर पर खींच लाने की चेष्टा करते हैं ।
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उन्हें पारिवारिक बन्धन नहीं जकड़ सके । क्या आप सोचते हैं कि ईसा के मन में कोई सांसारिक भाव था ? क्या आप सोचते हैं कि यह ज्ञानज्योतिस्वरूप अमानवी मानव, यह प्रत्यक्ष ईश्वर पृथ्वी पर पशुओं का समधर्मी बनने के लिए अवतीर्ण हुआ ? किन्तु फिर भी लोग उनके उपदेशों का अपनी इच्छानुसार अर्थ लगाकर प्रचार करते हैं ।
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उन्हें देह-ज्ञान नहीं था, उनमें स्त्री-पुरुष भेदबुद्धि नहीं थी - वे अपने को लिंगोपाधिरहित आत्मास्वरूप जानते थे । वे जानते थे कि वे शुद्ध आत्मास्वरूप हैं - देह में अवस्थित हो मानवजाति के कल्याण के लिए देह का परिचालन मात्र कर रहे हैं । देह के साथ उनका केवल इतना ही सम्पर्क था । आत्मा लिंगविहीन है । विदेह आत्मा का देह व पाशवभाव से कोई सम्बन्ध नहीं होता ।
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अवश्यमेव त्याग व वैराग्य का यह आदर्श साधारण जनों की पहुँच के बाहर है । कोई हर्ज नहीं, हमें अपना आदर्श विस्मृत नहीं कर देना चाहिए - उनकी प्राप्ति के लिए सतत यत्नशील रहना चाहिए । हमें यह स्वीकार कर लेना चाहिए कि त्याग हमारे जीवन का आदर्श है, किन्तु अभी तक हम उस तक पहुँचने में असमर्थ हैं ।..." 
(क्रमशः)

*१५. मन कौ अंग ६१/६४*

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१५. मन कौ अंग ६१/६४*
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आधे पग हैं तीन सै, और अधिक पुनि बीस । 
तिनहूं तें आधे करै, षट सत अरु चालीस ॥६१॥
इस से भी आगे गणना करें तो उस मण में आधा पाव ३२० हो जायेंगें, तथा उस आधा पाव को भी विभक्त किया जाय तो उस मण में ६४० छटाँक(एक आना) हो जाते हैं ॥६१॥
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डेढ हजार रु एक सौ, इतने होंहिं अंगुष्ठ । 
चौसठि सै अंगुली करै, मन तैं कौंन सपुष्ट ॥६२॥
इस से भी आगे गणना करें तो(उस छटाँक को भी अङ्गुष्ठ माप में विभक्त कर दिया जाय तो) उसमें १६ सौ छदाम हो जायेंगे । तथा उस को भी अङ्गुली माप से विभक्त कर दिया जाय तो एक मण में ६४ सौ अङ्गुली का भार माना जायगा । यही स्थिति हमारे मन की भी मान ली जाय तो इस मन से अधिक पुष्ट कौन हो सकता है ॥६२॥
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नख की गिनती कौ गिनै, तन कै रोम अनंत । 
ऐसे मन कौं बसि करै, सुन्दर सौ बलिवंत ॥६३॥
नखों के माध्यम से मन की गणनां दुष्कर है । तथा शरीर के रोगों के माध्यम से उसकी गणना करना तो और अधिक असम्भव प्रतीत होता है; क्योंकि शरीर में अनन्त रोम हैं; अतः उनकी गणना करने का कौन साहस करे ! हम तो इतना ही कहते हैं कि जो साधक ऐसे मन का निग्रह कर सके उस को ही बलवान(समर्थ) साधक मानना चाहिये ॥६३॥
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एक पालडे सीस धरि, तोलै ताके साथ । 
बर चालीस क तौलिये, तब मन आवै हाथ ॥६४॥
जैसे किसी वस्तु को एक मण तोलने के लिये तराजू के एक पलड़े पर एक सेर का बाट रख कर दूसरे पलड़े पर उस वस्तु के कुछ भाग को चालीस(४०) बार रखते हुए तोला जाय तभी वह एक मण भार की मानी जाती है; वैसे कोई साधक जब साधना द्वारा अपने मन का बार बार निग्रह करे तभी उस का निगृहीत होना सम्भव है ॥६४॥
(क्रमशः) 

संगरुर का चातुर्मास ~

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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संगरुर का चातुर्मास ~ 
वि. सं. १९१३ में जीन्द राज्य की राजधानी संगरुर में शिष्य मंडल के सहित पधारे । उस समय आचार्य उदयरामजी महाराज के स्वागत के लिए वहां के राजा स्वरुपसिंह जी स्वयं ही राजकीय लवामजा लेकर आये । भेंट चढाकर प्रणाम की, और आवश्यक प्रश्‍नोत्तर के पश्‍चात् बाजे गाजे से भक्त मंडल के साथ संकीर्तन करते हुये नगर में लाये और एकांत स्थान में ठहराया । 
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संत सेवा का प्रबन्ध उत्तम रीति से करा दिया गया । सत्संग होने लगा । आचार्य उदयरामजी महाराज का प्रवचन तो अति रोचक होता ही था । अत: आप के दादूवाणी के प्रवचन में राजा तथा प्रजागण बहुत ही आते थे । सत्संग बहुत सुन्दर होता था । चातुर्मास की मर्यादा के अनुसार ही सब कार्यक्रम होते थे । 
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चातुर्मास की समाप्ति पर राजा स्वरुपसिंहजी ने चातुर्मास की भेंट में एक हाथी की कीमत तथा एक हजार रुपये भेंट चढाये । प्रजागण ने भी अपनी- अपनी श्रद्धा के अनुसार भेंटें चढाई । फिर राजा प्रजा के द्वारा आदर पूर्वक संगरुर से विदा होकर शिष्य मंडल के साथ उत्तराध की रामत करने पधारे । स्थान स्थान पर सत्संग द्वारा धार्मिक जनता को निर्गुणराम की भक्ति में लगाते हुये तथा उत्तराधे संतों के स्थानों में ठहरते हुये पटियाला की ओर चले ।
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पटियाला गमन ~ 
पटियाला पहुँचने पर पटियाला नरेश भी विधि विधान से शिष्य मंडल के सहित आचार्य उदयरामजी महाराज का अच्छी प्रकार स्वागत करके नगर में लाये । अच्छे एकान्त स्थान में ठहराया । शिष्य मंडल के सहित आचार्यजी को बहुत प्रेम से रसोई दी । आचार्यजी को जिमाकर मर्यादानुसार भेंट दी । 
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संत मंडल का भी उचित रुप से सत्कार किया और सत्संग किया । इच्छानुसार शास्त्र चर्चा सुनी । अपनी शंकाओं के समाधान आचार्यजी के द्वारा हो जाने से राजा को अति प्रसन्नता हुई । पटियाला के स्थानधारी उत्तराधे संतों ने भी रसोई दी व मर्यादानुसार भेंट दी । संत मंडल का भी सत्कार किया । 
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आचार्य उदयरामजी महाराज जब तक पटियाला में विराजे तब तक धार्मिक जनता ने आपका प्रवचन बहुत ही रुचि से सुना । श्रद्धा भक्ति से भक्त लोग रसोइयां देते रहे । मर्यादानुसार आचार्यजी को भेंट, संतों की सेवा भी यथा योग्य वस्त्रादि से करते रहे । इस समय पटियाला में अच्छा सत्संग चला ।
(क्रमशः)  

३. श्री गुरुदेव का अंग ~ ३७/४०

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साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal Das
श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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३. श्री गुरुदेव का अंग ~ ३७/४०
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गुरु सु दिखावे शब्द में, रमता१ रामति२ और ।
देखन को दर्पण इहै, जन रज्जब निज ठौर ॥३७॥
३६-४४ में गुरु शब्दों की विशेषता बता रहे हैं - रमने१ वाले राम को और उसकी रमन२ भूमि मायिक संसार को सद्गुरु अपने शब्दों में भलि भाँति भिन्न भिन्न दिखा देते हैं, अर्थात राम सत्य है और माया तथा मायिक कार्य मिथ्या है, यह बता देते हैं । वैसे ही ब्रह्म रूप निज धाम को देखने के लिये भी इस संसार में सद्गुरु शब्द ही दर्पण है ।
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सद्गुरु वाइक बीज है, प्राण पुहमि१ में बोय ।
रज्जब राखे जतन कर, मन वाँछित फल होय ॥३८॥
साधन - वृक्ष का बीज सद्गुरु वचन ही है, उसको साधक प्राणी निज अन्त:करण रूप पृथ्वी१ में बोये और विचार जल से सींचना तथा कुविचार -पशुओं से बचाना रूप यत्न से रक्खे तो, मन की इच्छानुसार उससे फल प्राप्त होगा ।
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जो प्राणी रुचि से गहै, उर अंतर गुरु बैन ।
जन रज्जब युग युग सुखी, सदा सु पावे चैन ॥३९॥
जो प्राणी गुरु वचनों को प्रेम पूर्वक हृदय में धारण करता है वह अपने जीवन काल में सदा सम्यक् प्रकार सुख ही पाता है और ब्रह्म को प्राप्त करके प्रति युग में सुखी रहता है ।
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सद्गुरु शब्द अनन्त दत१, युग युग काटे कर्म ।
जन रज्जब उस पुण्य पर, और न दीसे धर्म ॥४०॥
सद्गुरु का शब्द प्रदान करना अनन्त दान१ है, अनन्त युगों के कर्म को नष्ट कर डालता है, सद्गुरु शब्द जन्य ज्ञान से होने वाले पुण्य से अधिक अन्य कोई भी धर्म नहीं दिखता ।
(क्रमशः)

गुरुवार, 8 जनवरी 2026

'ईशदूत ईसा'

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🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*दादू इस संसार में, ये द्वै रत्न अमोल ।*
*इक सांई अरु संतजन, इनका मोल न तोल ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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स्वामीजी १८९९ ईसवी में दूसरी बार अमरीका गये थे । उस समय १९०० ईसवी में उन्होंने कैलिफोर्निया(California) प्रान्त में लास इंजिलस(Los Angeles) नामक नगर में 'ईशदूत ईसा'(Christ the Messenger) विषय पर एक भाषण दिया था । इस भाषण में उन्होंने फिर से अवतार-तत्त्व को भलीभांति समझाने की चेष्टा की थी ।
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स्वामीजी ने कहा –"... इसी महापुरुष(ईसा मसीह) ने कहा है, 'किसी भी व्यक्ति ने ईश्वर-पुत्र के माध्यम बिना ईश्वर का साक्षात्कार नहीं किया है ।' और यह कथन अक्षरशः सत्य है । ईश्वर-तनय के अतिरिक्त हम ईश्वर को और कहाँ देखेंगे ? यह सच है कि मुझमें और तुममें, हममें से निर्धन से भी निर्धन और हीन से भी हीन व्यक्ति में भी परमेश्वर विद्यमान है, उनका प्रतिबिम्ब मौजूद है ।
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प्रकाश की गति सर्वत्र है, उसका स्पन्दन सर्वव्यापी है, किन्तु हमें उसे देखने के लिए दीप जलाने की आवश्यकता होती है । जगत् का सर्वव्यापी ईश भी तब तक दृष्टिगोचर नहीं होता, जब तक ये महान् शक्तिशाली दीपक, ये ईशदूत, ये उसके सन्देशवाहक और अवतार, ये नर-नारायण उसे अपने में प्रतिबिम्बित नहीं करते ।...
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ईश्वर के इन सब महान् ज्ञानज्योतिसम्पन्न अग्रदूतों में से आप किसी एक की ही जीवन-कथा लीजिये और ईश्वर की जो उच्चतम भावना आपने हृदय में धारण की है, उससे चरित्र की तुलना कीजिये । आपको प्रतीत होगा कि इन जीवित और जाज्वल्यमान आदर्श महापुरुषों के चरित्र की अपेक्षा आपकी भावनाओं का ईश्वर अनेकांश में हीन है, ईश्वर के अवतार का चरित्र आपके कल्पित ईश्वर की अपेक्षा कहीं अधिक उच्च है ।
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आदर्श के विग्रह-स्वरूप इन महापुरुषों ने ईश्वर की साक्षात् उपलब्धि कर, अपने महान् जीवन का जो आदर्श, जो दृष्टान्त हमारे सम्मुख रखा है, ईश्वरत्व की उससे उच्च भावना धारण करना असम्भव है । इसलिए यदि कोई इनकी ईश्वर के समान अर्चना करने लगे. तो इसमें क्या अनौचित्य है ?
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इन नरनारायणों के चरणाम्बुजों में लुण्ठित हो यदि कोई उनकी भूमि पर अवतीर्ण ईश्वर के समान पूजा करने लगे तो क्या पाप है ? यदि उनका जीवन हमारे ईश्वरत्व के उच्चतम आदर्श से भी उच्च है तो उनकी पूजा करने में क्या दोष ? दोष की बात तो दूर रही, ईश्वरोपासना की केवल यही एक विधि सम्भव है ।..."
-'महापुरुषों की जीवनगाथाएँ' से उद्धृत
(क्रमशः)

आचार्य उदयरामजी के टीका की भेंट ~

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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आचार्य उदयरामजी के टीका की भेंट ~ 
आचार्य उदयरामजी महाराज के गद्दी पर विराजने के उपलक्ष में टीका की मुख्य- मुख्य भेंटें इस प्रकार आई थीं- जयपुर राज्य से- घोडा और दुशाला, अलवर राज्य से- हाथी, दुशाला,पाग, पार्चाथान आये । कोटा नरेश की ओर से दुशाला, दुपट्टा, मोहर । जीन्द नरेश की ओर से दुशाला, पाग आदि भेंटें आई । 
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संपूर्ण दादूपंथी साधु समाज से अपनी- अपनी मर्यादा के अनुसार भेंटें आई । गृहस्थ धनी सज्जनों की ओर से भी टीके के दस्तूर की भेंटें आई । उक्त प्रकार भेंट का दस्तूर संपन्न हुआ ।  
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उदयरामजी की विषेशता ~ आचार्य उदयरामजी महाराज भजनानन्दी महात्मा होते हुये भी जनरंजन करने में बहुत ही प्रवीण थे । ऐसी सुन्दर पद्धति से उपदेश करते थे जिससे अल्प बुद्धिवाले मानव भी गंभीर से गंभीर विषय को अनायस ही समझ जाते थे । विद्वता के साथ- साथ आपका अनुभव भी विचित्र था । 
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श्रीदादू वाणी का प्रवचन तो आप परंपरा से सुनते ही आ रहे थे इससे दादूवाणी के समझाने में तो आप परम कुशल थे । दादूवाणी का प्रवचन आपका बहुत ही अनुभव पूर्ण होता था । निगुर्ण परब्रह्म का स्वरुप सर्व साधारण को समझाना और उसकी निर्गुण भक्ति में अधिकारी मानवों को लगाना तो आपका मुख्य काम ही था ।  
(क्रमशः) 

*१५. मन कौ अंग ५७/६०*

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१५. मन कौ अंग ५७/६०*
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इत उत कहूं न चलि सकै, थकित भया तिहिं ठौर । 
सुन्दर जैसैं नाद बसि, मन मृग बिसर्या और ॥५७॥ 
जैसे वीणा के नाद में मुग्ध कोई मृग अचल(स्थिर) होकर नाद श्रवण करता है कहीं इधर उधर नहीं जाता; वैसे ही प्रभुचरणों का अनुरागी मन भी तब किसी अन्य सांसारिक वासना में लिप्त होने की स्थिति में नहीं रहता ॥५७॥
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(मन शब्द को श्लेष)
धड तौ जाकै चारि हैं, द्वै द्वै सिर है बीस । 
ऐसी बडी बलाइ मन, सिर करि ले चालीस ॥५८॥ 
[अब यहाँ महाकवि श्लेषालङ्कार से मन की स्थिति का वर्णन कर रहे हैं -] 
(आगे की साषियों में 'धड़१', 'सिर२', 'द्वै सिर३', 'अध सिर४', 'पाव५', 'मन६' तथा 'सेर७' शब्द दो अर्थ वाले हैं । यथाप्रसङ्ग इन शब्दों के माध्यम से श्रीसुन्दरदासजी महाराज मन की अनन्तता का वर्णन कर रहे हैं-)
(धड़१ – १. शरीर में ग्रीवा से नीचे का भाग; २. वस्तु के तोल का पाँच सेर या दश सेर का माप । ग्रन्थकार के समय, सम्भवतः यह शब्द 'दश सेर' के अर्थ प्रयुक्त होता था । आज कल इस के स्थान पर 'धड़ी'(पांच सेर) शब्द का भी प्रयोग होता है ।)
(सिर२ – १. शिर = शरीर का ग्रीवा तक ऊपरी भाग, २. सेर = वस्तु के तोल का एक माप, जो १६ टांक के बराबर माना जाता है ।)
(द्वै सिर३ – १. दो शिर; २. दुसेरा या दुसेरी, जो दो सेर माप के बराबर माना जाता है ।)
(अध सिर४ = १. अर्ध शिर{शरीर में ग्रीवा तक आधा भाग}; २. आधा सेर [एक सेर का आधा भाग = ८ छटांक])
(पाव५ = १. पैर(चरण या पाद); २. किसी वस्तु के तोल में प्रयुक्त होने वाला एक माप {एक सेर का चतुर्थ भाग = चार छटांक})
(मन६ = १. मानव शरीर में ११ वीं इन्द्रिय; २. किसी वस्तु के तोल में प्रयुक्त होने वाला एक माप{-४० सेर} । इसे राजस्थानी भाषा में 'मण' भी कहते हैं ।) 
(सेर७ = १. सिंह{जङ्गल का हिंसक पशु}; २. किसी वस्तु के तोल का एक माप{= १६ छटांक})
जैसे एक मण(वस्तुमापक बाट) में चार धड(१० सेर) तथा २० दुसेरा होते हैं तो वह ४० सेर(शिर) का हो जाता है वैसे ही यह हमारा मन भी किसी भूत प्रेत के समान इतना सामर्थ्य वाला है कि यह जब चाहे तब अपने चालीस रूप बना कर अपनी इच्छा से बाह्य संसार में विचरण करने हेतु निकल जाता है ॥५८॥
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सिर तैं द्वै अध सिर करै, सिर सिर चहुं चहुं पाव । 
ऐसैं सिर चालीस हैं, मन कहिये क छलाव ॥५९॥
उस वस्तुमापक तोल मण के प्रत्येक सेर में दो अधसेर होते हैं । तथा प्रत्येक सेर में चार अंश करें तो वे 'चार पाव' कहलाते हैं । इस प्रकार जब हमारे इस मन के भी चालीस सिर हैं तो इसे(मनुष्य का) मन कहें कि कोई छलावा(श्मशान में जब तब दिखायी देने वाली चमक; भूत प्रेत) ! ॥५९॥
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सिर जाकै चालीस हैं, असी अरध सिर जाहि । 
पांव एक सौ साठि हैं, क्यौं करि पकरै ताहि ॥६०॥
जैसे उस माप(मण) में चालीस सेर(सिर) होते हैं और अस्सी आधा सेर, तथा १६० पाव(सेर का चतुर्थ अंश) होते हैं; वैसा ही हमारा यह मन भी है । अतः ऐसे बलवान् को निगृहीत करने की सामर्थ्य किसमें है ! ॥६०॥
(क्रमशः)

*३. श्री गुरुदेव का अंग ~ ३३/३६*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*३. श्री गुरुदेव का अंग ~ ३३/३६*
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*ब्रह्मांड पिंड की एक गति, पावे खोजी प्रान ।*
*उभय ठौर सब अंश हैं, समझावे गुरु ज्ञान ॥३३॥*
ब्रह्माड और पिंड का स्वरूप एक जैसा ही है किन्तु उसे विचारशील प्राणी ही समझ पाता है । दोनों ही स्थानों के सभी भाग समान हैं इस बात को भली भाँती गुरु देव का ज्ञान ही समझा पाता है ।
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*विविध भाँति बूटी व्यथा, वैद्य सु जाने भेव ।*
*त्यों आशंका अनन्त विधि, समझावें गुरु देव ॥३४॥*
नाना प्रकार की बुटीयें और रोग होते हैं, बूटियों के गुण - रहस्य और आकारों को तथा रोगों की विभिन्नता, निदान, उपद्रवादि के रहस्य को सम्यक् प्रकार से वैद्य ही जान पाता है, वैसे ही नाना प्रकार की शंकाओं के समाधान कर के गुरुदेव ही प्राणियों को अध्यात्म विषय समझाते हैं ।
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*रज्जब अग्नि अनन्त हैं, एक आतमा माँहि ।*
*सद्गुरु शीतल सर्व विधि, बहु वह्नि बुझ जाँहि ॥३५॥*
एक ही अन्त:करण में क्रोधाग्नि, कामाग्नि आदि बहुत प्रकार की अग्नियें हैं किन्तु सद्गुरु का अन्त:करण उक्त सभी अग्नियों से रहित होने से सद्गुरु सर्वथा शीतल हैं अत: उनके उपदेशानुसार साधन करने से उक्त सभी अग्नियें शांत हो जाती हैं ।
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*सद्गुरु बिन संदेह को, रज्जब भाने कौन ।*
*सकल लोक फिर देखिया, निरखे तीनों भौन ॥३६॥*
संपूर्ण लोकों में घूमकर देखा है तथा तीनों भुवनों को विचार द्वारा भी देखा है, उनमें साधक के ब्रह्म-आत्म विषयक संशय को नष्ट कर सके ऐसा सद्गुरु बिना कोई भी नहीं है ।
(क्रमशः)

बुधवार, 7 जनवरी 2026

१३ आचार्य उदयरामजी

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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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अथ अध्याय ११~१३ आचार्य उदयरामजी 
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श्रीमानुदयरामाख्य: सिद्धेशो लोक पूजित: ।  
संजातो भूत ले भूत्यै, जनानां धर्म सम्बिदो ॥१॥
आचार्य नारायणदासजी महाराज के ब्रह्मलीन होने के पश्‍चात् वि. सं. १९१२ कार्तिक कृष्णा ३ शुक्रवार को समाज ने उदयरामजी महाराज को आचार्य गद्दी पर विराजमान कराने का विचार किया । तब उस समय के भंडारी लच्छीराम जी ने कहा - गद्दी पर बैठने का मेरा अधिकार है, मैं बडा शिष्य व भंडारी हूँ । ऐसा कहकर कुछ युवक साधुओं की सहायता से स्वयं आचार्य गद्दी पर बैठना चाहते थे । आचार्य पद प्राप्ति के लिये उन्होंने और अनेक उपाय किये थे ।
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किन्तु आचार्य नारायणदासजी महाराज का संकेत उदयरामजी के भजन साधन, ब्रह्मचर्य, तप, साधुता, विचार शीलता, मिलन सारिता, शील स्वभाव, वाक्पटुता आदि सुन्दर गुणों को देखकर उदयरामजी को ही गद्दी के योग्य समझा था और आचार्य नारायणदासजी महाराज ने अपने अन्तिम समय में सब पंचायत के सामने अपने मस्तक की कपाली टोपी अपने हाथ से उतार कर उदयरामजी के शिर पर रखदी थी । 
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इससे उदयरामजी को ही योग्य अधिकारी समझकर दादूपंथी समाज ने आचार्य गद्दी पर बैठाया था । इससे रुष्ट होकर भंडारी लच्छीरामजी दादूद्वारा छोडकर अन्यत्र चले गये थे और आचार्य उदयरामजी को हटाकर स्वयं आचार्य बनने के प्रयत्न में लगे हुये थे । 
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एक दिन आचार्य उदयरामजी महाराज शौच क्रिया के लिये अकेले ही जंगल में गये थे । वहां भंडारी लच्छीराम जी के समर्थकों ने उन पर आक्रमण करके क्षति पहुँचाने की चेष्टा की, किन्तु सफल नहीं हो सके । कारण- एक तो आचार्य उदयरामजी महाराज तप तेज से संपन्न थे, दूसरे शारीरिक बल भी उनमें बहुत था । अत: अकेले आचार्य उदयरामजी महाराज ने ही उन सब को भगा दिया । 
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किन्तु जब स्थानीय साधु-महात्माओं को यह ज्ञात हुआ तब दुखित हुये और उस दिन ही आचार्य जी की शौच क्रिया के लिये महल के पास ही शौचालय बनवा दिया गया । अंत में भंडारी लच्छीरामजी और उनके समर्थकों के सब षड्यंत्र विफल हो गये । तब उन सबको समाज के आगे नत मस्तक होना ही पडा । 
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इधर आचार्य उदयरामजी महाराज अपने प्रतिपक्षी भंडारी लच्छीरामजी तथा उनके समर्थको को कुछ भी नहीं कहते थे । उनके सभी आघातों को सहन कर लेते थे । यही उनकी विशेषता थी । इसी से अन्त में विरोधियों को उनके सामने झुकना ही पडा था । 
(क्रमशः) 

*१५. मन कौ अंग ५३/५६*

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१५. मन कौ अंग ५३/५६*
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तबही लौं मन कहत है, जब लग है अज्ञांन । 
सुन्दर भागै तिमर सब, उदै होइ जब भांन ॥५३॥
हमारा यह मन तभी तक इस भ्रमात्मक स्थिति में रहता है जब तक उस पर अविद्या(अज्ञान) का आवरण पड़ा हुआ है । परन्तु उस का यह अज्ञानान्धकार तभी नष्ट हो जाता है जब उस में गुरूपदिष्ट ज्ञानरूप सूर्य का उदय हो जाय ॥५३॥
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सुन्दर परम सुगन्ध सौं, लपटि रह्यौ निश भोर । 
पुण्डरीक परमातमा, चंचरीक मन मोर ॥५४॥
भगवदानुरागी मन : गुरूपदिष्ट ज्ञान के प्राप्त होते ही हमारा यह मन निरञ्जन निराकार प्रभु के चरणकमलों का उसी प्रकार दास बन जाता है जैसे कोई भ्रमर सुगन्ध के लोभ में कमल पुष्प के चारों ओर मण्डराता रहता है ॥५४॥
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सुन्दर निकसै कौंन बिधि, होइ रह्या लै लीन । 
परमानन्द समुद्र मैं, मग्न भया मन मीन ॥५५॥
जब साधक का मन उस निरञ्जन निराकार के परम आनन्दमय ध्यान में मग्न(समाधिस्थ) हो जाता है तो उसे वहाँ से वियुक्त करने का किस में साहस है । क्या महासमुद्र के जल में अतिशय स्नेहिल किसी मछली को जीवित अवस्था में कोई उस जल से वियुक्त कर पाया है ! ॥५५॥
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दृष्टि न फेरै नैंकहूं, नैंन लगै गोबिन्द ।
सुन्दर गति ऐसी भई, मन चकोर ज्यौं चन्द ॥५६॥ 
जैसे चकोर पक्षी चन्द्रमा को एक क्षण के लिये भी अपनी दृष्टि से दूर नहीं करना चाहता; वैसी ही स्थिति प्रभुचरणों में अनुरक्त साधक के मन की भी समझनी चाहिये ॥५६॥
(क्रमशः)

ईश्वर ही अवतार

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🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*दादू निराकार मन सुरति सौं, प्रेम प्रीति सौं सेव ।*
*जे पूजे आकार को, तो साधु प्रत्यक्ष देव ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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काशीपुर बगीचे में श्रीरामकृष्ण जिस समय कैन्सर रोग की यन्त्रणा से बैचेन हो रहे हैं, भात का तरल माँड़ तक गले के नीचे नहीं उतर रहा है, उस समय एक दिन नरेन्द्र श्रीरामकृष्ण के पास बैठकर सोच रहे हैं, 'इस यन्त्रणा में यदि कहें कि मैं ईश्वर का अवतार हूँ तो विश्वास होगा ।' उसी समय श्रीरामकृष्ण कहने लगे, "जो राम, जो कृष्ण, इस समय वे ही रामकृष्ण के रूप में भक्तों के लिए अवतीर्ण हुए हैं ।" नरेन्द्र यह बात सुनकर दंग रह गये ।
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श्रीरामकृष्ण के स्वधाम में सिधार जाने के बाद नरेन्द्र ने संन्यासी होकर बहुत साधन-भजन तथा तपस्या की । उस समय उनके हृदय में अवतार के सम्बन्ध में श्रीरामकृष्ण के सभी महावाक्य मानो और भी स्पष्ट हो उठे । वे स्वदेश और विदेशो में इस तत्त्व को और भी स्पष्ट रूप से समझाने लगे ।
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स्वामीजी जब अमरीका में थे, उस समय नारदीय भक्तिसूत्र आदि ग्रन्थों के अवलम्बन से उन्होंने भक्तियोग नामक ग्रन्थ अंग्रेजी में लिखा । उसमें भी वे कह रहे हैं कि अवतारगण छूकर लोगों में चैतन्य उत्पन्न करते हैं । जो लोग दुराचारी हैं, वे भी उनके स्पर्श से सदाचारी बन जाते हैं । 'अपि चेत् सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्, साधुरेव स मन्तव्यः सम्यक् व्यवसितो हि सः ।' ईश्वर ही अवतार के रूप में हमारे पास आते हैं । यदि हम ईश्वर-दर्शन करना चाहें तो अवतारी पुरुषों में ही उनका दर्शन करना होगा । उनका पूजन किये बिना हम रह नहीं सकते ।
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“... साधारण गुरुओं से श्रेष्ठ एक और श्रेणी के गुरु होते हैं, जो इस संसार में ईश्वर के अवतार होते हैं । केवल स्पर्श से ही वे आध्यात्मिकता प्रदान कर सकते हैं, यहाँ तक कि इच्छा मात्र से ही । उनकी इच्छा से महान् दुराचारी तथा पतित व्यक्ति भी क्षण भर में ही साधु हो जाता है ।
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वे गुरुओं के भी गुरु हैं तथा मनुष्य रूप में भगवान के अवतार हैं । उनके माध्यम बिना हम ईश्वर-दर्शन नहीं कर सकते । उनकी उपासना किये बिना हम रह ही नहीं सकते और वास्तव में केवल वे ही ऐसे हैं जिनकी हमें उपासना करनी चाहिए । ... जब तक हमारा यह मनुष्य शरीर है तब तक हमें ईश्वर की उपासना मनुष्य के रूप में और मनुष्य के सदृश ही करनी पड़ती है ।
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तुम चाहे जितनी बातें करो, चाहे जितना यत्न करो, परन्तु भगवान को मनुष्य-रूप के अतिरिक्त तुम किसी अन्य रूप में सोच ही नहीं सकते । ईश्वर तथा संसार की सारी वस्तुओं पर चाहे तुम सुन्दर तर्कयुक्त भाषण दे सकते हो, चाहे बड़े युक्तिवादी बन सकते हो और मन को समझा सकते हो कि इन सारे ईश्वरावतारों की कथा भ्रमात्मक है । पर थोड़ी देर के लिए सहज बुद्धि से सोचो । हमें इस विचित्र विचारबुद्धि से क्या प्राप्त होता है ?
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- शून्य, कुछ नहीं, केवल शब्दाडम्बर । भविष्य में जब कभी तुम किसी मनुष्य को अवतार-पूजा के विरुद्ध एक बड़ा तर्कपूर्ण भाषण देते हुए सुनो तो उससे यह प्रश्न करो कि उसकी ईश्वर सम्बधी धारणा क्या है । 
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सर्वशक्तिशाली, सर्वव्यापी तथा इस प्रकार के अन्य शब्दों का अर्थ वह केवल अक्षरों के जानने की अपेक्षा और क्या समझता है ? वास्तव में वह कुछ नहीं समझता । वह उनका कोई ऐसा अर्थ नहीं लगा सकता जो उसकी स्वयं की मानवी प्रकृति से प्रभावित न हो । इस सम्बन्ध में वह बिलकुल उसी सामान्य मनुष्य के सदृश है, जिसने एक पुस्तक भी नहीं पढ़ी ।”
- 'भक्तियोग' से उद्धृत
(क्रमशः)

*३. श्री गुरुदेव का अंग ~ २९/३२*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*३. श्री गुरुदेव का अंग ~ २९/३२*
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*सद्गुरु की सुन सीख को, उपज्या यही विचार ।*
*रज्जब रचे सु राम सों, विरचे इहिं संसार ॥२९॥*
सद्गुरु के ज्ञानोपदेश को श्रवण करके साधकों के हृदय में राम सत्य है और संसार असत्य है, यही विचार उत्पन्न हुआ । इसी कारण वे संसार से विरक्त होकर राम में ही अनुरक्त हुये अत: बडभागी हैं ।
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*मन समुद्र गुरु कमठ ह्वै, किया जु महणारंभ१ ।*
*रज्जब बीते बहुत युग, अचल न आतम अंभ२ ॥३०॥*
३० - ३६ में गुरु की विशेषता बता रहे हैं - मन रूप समुद्र को गुरु रूप कच्छप ने ज्ञान-रत्न निकालने के लिये मथना१ आरंभ किया बहुत युग बीत गये हैं, किन्तु अभी भी जीवात्मा रूप जल२ स्वस्वरूप स्थिति रूप निश्चलता को प्राप्त नहीं हुआ है फिर भी ज्ञान रत्न निकाले बिना गुरु छोड़ते नहीं । इसमें समुद्र मंथन समय का रूपक दिया है ।
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*गुरु बिन गम३ नहिं पाइये, पिंड प्राण१ पर वेश२ ।*
*रज्जब गुरु गोविन्द बिन, कौन दिखावे देश ॥३१॥*
स्थूल शरीर और सूक्ष्म शरीर१ से परे अपने निज स्वरूप-घर२ को प्राप्त करने का विचार३ गुरु बिना नहीं मिलता । गोविन्द की कृपा और गुरु के ज्ञान बिना स्वस्वरूप-देश को कौन दिखा सकता है ?
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*गुरु बिन गम१ नहिं पाइये, समझ न उपजे आय ।*
*रज्जब पंथी पंथ बिन. कौन दिसावर२ जाय ॥३२॥*
गुरु बिना परमेश्वर के ध्यान१ करने की युक्ति नहीं मिलती और हृदय में ब्रह्म-ज्ञान भी उत्पन्न नहीं हो सकता । जैसे पथिक पंथ बिना किसी भी विदेश२ को नहीं जा सकता, वैसे ही साधक ब्रह्म ज्ञान बिना संसार दशा रूप देश से ब्रह्म-स्थिति रूप प्रदेश में नहीं जा सकता ।
(क्रमशः)

मंगलवार, 6 जनवरी 2026

ब्रह्मलीन होना ~

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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१२ आचार्य नारायणदास जी ~
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कुछ भूमि प्राप्त ~ 
इन्हीं दिनों में खेतडी राज्य की ओर से दलेलपुरा ग्राम की दो कोटियों का पट्टा दादूद्वारे के नाम होकर नारायणा दादूधाम के आचार्य नारायणदासजी महाराज के पास आया । वि. सं. १९१२ में किशनगढ राज्य से भी भूमि का पट्टा आया । इस वर्ष आचार्य नारायणदासजी महाराज का चातुर्मास भंडारी सांवतरामजी के नियत हुआ था । वह चातुर्मास की मर्यादा के अनुसार अच्छी प्रकार संपन्न हुआ । 
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ब्रह्मलीन होना ~ 
उक्त प्रकार आचार्य नारायणदासजी महाराज ने लोक कल्याण के लिये भ्रमण में धर्मोपदेश देते हुये गद्दी पर ११ वर्ष ४ मास २३ दिन विराज कर कार्तिक कृष्णा १३ बुधवार वि. सं. १९१२ में ब्रह्मलीन हुये । कहा भी है -
सम्मत शत उन्नीस का, बारह कार्तिक मास ।
कृष्ण पक्ष तेरस दिना, गये राम के पास ॥
(दादू चरित्र चन्द्रिका)
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गुण गाथा
दोहा- दादूधाम आचार्य वर, हुये नरायणदास ।
रत्त रहे निज रुप में, त्याग जगत की आश ॥१॥
राजा रावल आदि ने, धरे चरण में शीश ।
नम्र रहे तो भी सदा, सुमिरत श्री जगदीश ॥२॥
निज समाज अरु अन्य को, दीन्हा ज्ञान प्रकाश ।  
सर्व प्रिय इससे रहे, महन्त नरायण दास ॥३॥
ग्राम भूमि दी नृपों ने, श्रद्धा करके आप ।  
तदपि राग से रहित रहे, मिटा द्वन्द्व की ताप ॥४॥
नारायण आचार्य में, रही संत जन प्रीति । 
क्योंकि सदा उनमें रही, समता पूरण नीति ॥५॥ 
सेवक श्रद्धा के रहे, पात्र नरायणदास ।  
इससे सेवक उन्हों के, आते थे बहु पास ॥६॥
नारायण के चित्त की, नारायण से प्रीति ।
‘नारायण’ अद्भुत रही, कही न जात वह रीति ॥७॥ 
नारायण आचार्य को, ‘नारायण’ नति नित्य ।  
क्योंकि असत को त्यागकर, प्राप्त किया था सत्य ॥८॥
नारायण आचार्य का, नारायण से नेह ।  
मिले इसीसे ब्रह्म में, त्याग अनात्मा देह ॥९॥ 
इति श्री दशम अध्याय समाप्त: १० 
(क्रमशः)