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🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*दादू जिस घट दीपक राम का,*
*तिस घट तिमिर न होइ ।*
*उस उजियारे ज्योति के, सब जग देखै सोइ ॥*
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भोजन की पंक्ति में आचार्यजी की चौकी के सामने पत्तल पर उनकी थाली, कटोरी व झारी(जलपात्र) लगती है । सामने पांतिया पर चौकी बिछा, बैठ कर वे प्रसाद पाते हैं । उनकी परम्परा अब तक चली आ रही है । फिर छत्रियों के महन्तों का स्थान नारायणा से पाखर चला गया । वहां के महन्त नारायणा मेले में आते हैं तब उनका उक्त प्रकार ही व्यवहार रहता है । अब छत्रियों के महन्तों का मुख्य स्थान पाखर में ही है ।
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उसकी परम्परा-आचार्य कृष्णदेवजी महाराज के शिष्य १-गंगारामजी छत्रियों के महन्त सं १८१० में बैठे और १८१६-१७ तक रहे । २- जोगीदासजी वि. सं .१८५७ । ३- जीवणदासजी सं. १८५९ । ४- उदयरामजी सं. १८९२ । ५- चरणदासजी । ६- देवदासजी । ७ - रघुनादसजी । ८ - मंगलदासजी । ९- मुरलीदासजी । १०- रामपालदासजी । ११- कनीरामजी वर्तमान हैं । इनके मुस्थान १~नारायणा २~सावरदा ३~जयपुर में भी पाखर वालों का स्थान है ।
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कृपारामजी =२- भेष भंडारी कृपारामजी~कृपारामजी आचार्य कृष्णदेवजी महाराज के शिष्य तथा मुख्य भंडारी थे । जब जयपुर नरेश जयसिंह द्वितीय ने कृष्णदेवजी का बल से विवाह कराने की आज्ञा निकाली तब वे नारायणा छोड़कर जोधपुर राज्य पधार गये । कारण राजा ने गलते के महन्त का व्यवहार अच्छा न देख उसका विवाह करना चाहा तब उसने कहा~नारायणा के आचार्य का विवाह करा दोगे तो मैं भी करा लूंगा ।
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कृष्णदेवजी विवाह नहीं कराना चाहते थे । इससे चले गये । फिर राजा ने आज्ञा निकाली कि नारायणा दादू धाम में आचार्य नहीं रहते हैं तब पीछे से गद्दी को संभालता है ओर जो महन्त के स्थान में कार्य करता है, उसका विवाह करा कर गलते के महन्त का विवाह करा दिया जाय । नारायणा दादूधाम की प्रथा है कि आचार्य नहीं रहने पर मुख्य भंडारी को ही आचार्य के समान माना जाता है । मुख्य भंडारी कृपारामजी थे । अतः कृपारामजी के विवाह की योजना बनी ।
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कृपारामजी ने राजा से कहा नारायणा गादी पर विरक्त ही सदा से बैठते आये हैं, मेरे गृहस्थ हो जाने पर समाज मुझे मानेगा नहीं, तब मेरा योग-क्षेम कैसे होगा ? राजा को गलता के महन्त का विवाह कराना था । इससे राजा ने कहा आपका योग-क्षेम सरकार करेगी । राजा ने योग-क्षेम के लिये कृपारामजी को जागीर दे दी और उनका विवाह करा दिया । कहा भी है ~
“कृपाराम भंडारी को, गोड़ सुता परनाय ।
जमी दिई जयसिंह ने, राखा उन पर भाय ॥” (दा.च.चन्द्रि)
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संभव है कृपारामजी जाति से गौड़ ब्रह्मण ही होंगे । अतः उनकी जाति की कन्या से ही उनका विवाह करा दिया । फिर गलता के महन्त को भी विवाह कराना ही पड़ा । वह तो चाहता ही था । केवल ऊपर से ही ऐसा प्रपंच रचा था । फिर आचार्य चैनरामजी नारायणा आये तब कृपारामजी को हटाया नहीं, उनको भेष भंडारी की पदवी दे कर भंडारी ही बनाये रखा ।
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कृपारामजी ने नारायणा दादूधाम की राजकाज करना रूप अच्छी सेवा की थी । वे व्यवहार कुशल महानुभाव थे । नारायणा दादूधाम की महान् सेवा करने से ही समाज में उनकी अच्छी प्रतिष्ठा थी । वे कैरिया वाले भेष भंडारी कहलाते हैं । उनकी परम्परा इस प्रकार है~ १- कृपारामजी(स्व. सं. १८५७), २- वीरमदासजी, ३- निर्भयरामजी, ४- लालदासजी, ५- हरिदासजी, ६- तुलसीदासजी, ७- दयारामजी, ८- नन्दरामजी, ९- छोटूदासजी, १०- हरिनारायणजी, ११- रामदासजी वर्तमान हैं ।
(क्रमशः)