🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
.
*मनसा के पकवान सौं, क्यों पेट भरावै ।*
*ज्यों कहिये त्यों कीजिये, तब ही बन आवै ॥*
.
साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
==================
मैं श्रीरामकृष्ण की उक्तियों को सुनकर लिख रहा था, उन्होंने कहा - "हाँ देखो, भंग-भंग रट लगाने से कुछ न होगा । भंग ले आओ, उसे घोंटो और पीओ ।" इसके बाद उन्होंने मुझसे कहा - "तुम्हें तो संसार में रहना है, अतएव ऐसा करो कि नशे का गुलाबी रंग रहा करे । काम-काज भी करते रहो और इधर जरा सुखी भी रहो । तुम लोग शुकदेव की तरह तो कुछ हो नहीं सकोगे कि नशा पीते ही पीते अन्त में अपने तन की खबर भी न रहे - जहाँ-तहाँ बेहोश पड़े रहो ।
.
"संसार में रहोगे तो एक आम-मुखतारनामा लिख दो । उनकी जो इच्छा, करें । तुम बस बड़े आदमियों के घर की नौकरानी की तरह रहो । बाबू के लड़के-बच्चों का वह आदर तो खूब करती है, नहलाती-धुलाती है, खिलाती पिलाती है, मानो वह उसी का लड़का हो; परन्तु मन ही मन खूब समझती है कि यह मेरा नहीं है । वहाँ से उसकी नौकरी छूटी नहीं कि बस फिर कोई सम्बन्ध नहीं ।
.
"जैसे कटहल काटते समय हाथ में तेल लगा लिया जाता है, उसी तरह(भक्तिरूपी) तेल लगा लेने से संसार में फिर न फँसोगे, लिप्त न होओगे ।"
अब तक जमीन पर बैठे हुए बातें हो रही थीं । अब उन्होंने खाट पर चढ़कर लेटे लेटे मुझसे कहा - "पंखा झलो ।" मैं पंखा झलने लगा । वे चुपचाप लेटे रहे । कुछ देर बाद कहा, "अजी, बड़ी गरमी है, पंखा जरा पानी में भिगा लो ।"
.
मैंने कहा, "इधर शौक भी देखता हूँ कम नहीं है !" हँसकर उन्होंने कहा, "क्यों शौक नहीं रहेगा ? - शौक रहेगा क्यों नहीं ?" मैंने कहा - "अच्छा, तो रहे, रहे, खूब रहे ।" उस दिन पास बैठकर मुझे जो सुख मिला वह अकथनीय है ।
अन्तिम बार - जिस समय की बात तुमने तीसरे खण्ड में लिखी है*(*ता. २३ मई १८८५ देखिये ।) - मैं अपने स्कूल के हेडमास्टर को ले गया था, उनके बी. ए. पास करने के कुछ ही समय बाद । अभी थोड़े ही दिन हुए उनसे तुम्हारी मुलाकात हुई थी ।
.
उन्हें देखते ही श्रीरामकृष्णदेव ने मुझसे कहा - "क्यों जी, तुम इन्हें कहाँ पा गये ? ये तो बड़े सुन्दर व्यक्ति हैं ।
"क्यों जी, तुम तो वकील हो । बड़ी तेज बुद्धि है । मुझे कुछ बुद्धि दे सकते हो ? तुम्हारे पिताजी अभी उस दिन यहाँ आये थे, आकर तीन दिन रह भी गये हैं ।"
मैंने पूछा - "उन्हें आपने कैसा देखा ?"
.
उन्होंने कहा - "बहुत अच्छा आदमी है, परन्तु बीच बीच में बहुत ऊल-जलूल भी बकता है ।"
मैंने कहा - "अब की बार मुलाकात हो तो ऊल-जलूल बकना छुड़ा दीजियेगा ।"
वे इस पर जरा मुस्कराये । मैंने कहा- "मुझे कुछ बातें सुनाइये ।"
उन्होंने कहा - "हृदय को पहचानते हो ?"
मैंने कहा - "आपका भाँजा न ? मुझसे उनका परिचय नहीं है ।"
.
श्रीरामकृष्ण - हृदय कहता था, 'मामा, तुम अपनी बातें सब एक साथ न कह डाला करो । हर बार उन्हीं उन्हीं बातों को क्यों कहते हो ?' इस पर मैं कहता था, 'तो तेरा क्या, बोल मेरा है, मैं लाख बार अपना एक ही बोल सुनाऊँगा ।'
मैंने हँसते हुए कहा, 'बेशक, आपने ठीक ही तो कहा है ।'
कुछ देर बाद बैठे ही बैठे ॐ ॐ कहकर वे गाने लगे - 'ऐ मन, तू रूप के समुद्र में डूब जा ।...'
दो-एक पद गाते ही गाते सचमुच वे डूब गये । - समाधि के सागर में निमग्न हो गये ।
.
समाधि छूटी । वे टहलने लगे । जो धोती पहने हुए थे, उसे दोनों हाथों से समेटते समेटते बिलकुल कमर के ऊपर चढ़ा ले गये । एक तरफ से लटकती हुई धोती जमीन को बुहारती जा रही थी । मैं और मेरे मित्र, दोनों एक दूसरे को टोंच रहे थे और धीरे धीरे कह रहे थे, 'देखो, धोती सुन्दर ढंग से पहनी गयी है ।' कुछ देर बाद ही 'हत्तेरे की धोती' कहकर, उसे उन्होंने फेक दिया ।
.
फिर दिगम्बर होकर टहलने लगे । उत्तर तरफ से न जाने किसका छाता और छड़ी हमारे सामने लाकर उन्होंने पूछा, 'क्या यह छाता और छड़ी तुम्हारी है ?' मैंने कहा, 'नहीं ।' साथ ही उन्होंने कहा, "मैं पहले ही समझ गया था कि यह छाता और छड़ी तुम्हारी नहीं है । मैं छाता और छड़ी देखकर ही आदमी को पहचान लेता हूँ । अभी जो एक आदमी आया था, ऊल-जलूल बहुत कुछ बक गया, ये चीजें निस्सन्देह उसी की हैं ।"
.
कुछ देर बाद उसी हालत में चारपाई पर वायव्य की तरफ मुँह करके बैठे गये । बैठ ही बैठे उन्होंने पूछा, "क्यों जी, क्या तुम मुझे असभ्य समझ रहे हो ?"
मैंने कहा, "नहीं, आप बड़े सभ्य हैं । इस विषय का प्रश्न आप करते ही क्यों हैं ?"
श्रीरामकृष्ण - अजी, शिवनाथ आदि मुझे असभ्य समझते हैं । उनके आने पर धोती किसी न किसी तरह लपेटकर बैठना ही पड़ता है । क्या गिरीश घोष से तुम्हारी पहचान है ?
.
मैं - कौन गिरीश घोष ? वही जो थियेटर करता है ?
श्रीरामकृष्ण – हाँ ।
मैं - कभी देखा तो नहीं, पर नाम सुना है ।
श्रीरामकृष्ण - वह अच्छा आदमी है ।
मैं - सुना है, वह शराब भी पीता है !
श्रीरामकृष्ण - पिये, पिये न, कितने दिन पियेगा ?
.
फिर उन्होंने कहा, 'क्या तुम नरेन्द्र को पहचानते हो ?'
मैं - जी नहीं ।
श्रीरामकृष्ण - मेरी बड़ी इच्छा है कि उसके साथ तुम्हारी जान-पहचान हो जाय । वह बी. ए. पास कर चुका है, विवाह नहीं किया ।
मैं - जी, तो उनसे परिचय अवश्य करूँगा ।
.
श्रीरामकृष्ण - आज राम दत्त के यहाँ कीर्तन होगा । वहाँ मुलाकात हो जायगी । शाम को वहाँ जाना ।
मैं - जी हाँ, जाऊँगा ।
श्रीरामकृष्ण - हाँ, जाना, जरूर जाना ।
मैं - आपका आदेश मिला और मैं न जाऊँ ! - अवश्य जाऊँगा ।
.
फिर वे कमरे की तस्वीरें दिखाते रहे । पूछा - "क्या बुद्धदेव की तस्वीर बाजार में मिलती है ?"
मैं - सुना है कि मिलती है ।
श्रीरामकृष्ण - एक तस्वीर मेरे लिए ले आना ।
मैं - जी हाँ, अब की बार जब आऊँगा, साथ लेता आऊँगा ।
फिर दक्षिणेश्वर में उन श्रीचरणों के समीप बैठने का सौभाग्य मुझे कभी नहीं मिला ।
.
उस दिन शाम को रामबाबू के यहाँ गया । नरेन्द्र को देखा । श्रीरामकृष्ण एक कमरे में तकिये के सहारे बैठे हुए थे, उनके दाहिनी ओर नरेन्द्र थे । मैं सामने था । उन्होंने नरेन्द्र से मेरे साथ बातचीत करने के लिए कहा ।
नरेन्द्र ने कहा, 'आज मेरे सिर में बड़ा दर्द हो रहा है । बोलने की इच्छा ही नहीं होती ।'
मैं - रहने दीजिये, किसी दूसरे दिन बातचीत होगी ।
.
उसके बाद उनसे बातचीत हुई थी, अलमोड़े में, शायद १८९७ की मई या जून के महीने में ।
श्रीरामकृष्ण की इच्छा पूरी तो होने की ही थी, इसीलिए बारह साल बाद वह इच्छा पूरी हुई । अहा ! स्वामी विवेकानन्दजी के साथ अलमोड़े में वे उतने दिन कैसे आनन्द में कटे थे ! कभी उनके यहाँ, कभी मेरे यहाँ, और कभी निर्जन में पहाड़ की चोटी पर ! उसके बाद फिर उनसे मुलाकात नहीं हुई । श्रीरामकृष्ण की इच्छा-पूर्ति के लिए ही उस बार उनसे मुलाकात हुई थी ।
.
श्रीरामकृष्ण के साथ भी सिर्फ चार-पाँच दिन की मुलाकात है, परन्तु उतने ही समय में ऐसा हो गया था कि उन्हें देखकर जी में आता था जैसे हम दोनों एक ही दर्जे के पढ़े हुए विद्यार्थी हों । उनके पास हो आने पर जब दिमाग ठिकाने आता था, तब जान पड़ता था कि बाप रे ! किसके सामने गये थे !
.
उतने ही दिनों में जो कुछ मैंने देखा है - जो कुछ मुझे मिला है, उसी से जी मधुमय हो रहा है । उस दिव्यामृतवर्षा हास्य को यत्नपूर्वक मैंने हृदय में बन्द कर रखा है । अजी, वह आश्रयहीनों का आश्रय हैं । और उसी हास्य से बिखरे हुए अमृत-कणों के द्वारा अमरीका तक में संजीवनी का संचार हो रहा है और यही सोचकर 'ह्रष्यामि च मुहुर्मुहुः, ह्रष्यामि च पुनः पुनः' - मुझे रह-रहकर आनन्द हो रहा है ।
(समाप्त)