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🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*दादू यहु घट दीपक साध का,*
*ब्रह्म ज्योति प्रकाश ।*
*दादू पंखी संतजन, तहाँ परैं निज दास ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*(७)कामिनीकांचन-त्याग – संन्यास*
एक दिन श्रीरामकृष्ण और विजयकृष्ण गोस्वामी दक्षिणेश्वर के कालीमन्दिर में वार्तालाप कर रहे थे ।
श्रीरामकृष्ण - (विजय के प्रति) - कामिनी-कांचन का त्याग किये बिना लोक-शिक्षा नहीं दी जा सकती । देखो न, यही न कर सकने के कारण केशव सेन का अन्त में क्या हुआ ! तुम स्वयं ऐश्वर्य में, कामिनी-कांचन के भीतर रहकर यदि कहो 'संसार अनित्य है, ईश्वर ही नित्य है', तो कौन तुम्हारी बात सुनेगा ? तुम अपने पास तो गुड़ का घड़ा रखे हुए हो, और दूसरों से कह रहे हो - 'गुड़ न खाना !' इसीलिए सोच समझकर चैतन्यदेव ने संसार छोड़ा था । नहीं तो जीव का उद्धार नहीं होता ।
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विजय - जी हाँ, चैतन्यदेव ने कहा था, 'कफ हटाने के लिए पिप्पल-खण्ड*(*पिप्पल-खण्ड का मतलब है नवद्वीप में हरिनाम का प्रचार ।) तैयार किया, परन्तु परिणाम उल्टा हुआ, कफ बढ़ गया ।' नवद्वीप के अनेक लोग हँसी उड़ाने लगे और कहने लगे, 'निमाई पण्डित मजे में है जी, सुन्दर स्त्री, मान-सन्मान, धन की भी कमी नहीं है, बड़े मजे में है ।'
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श्रीरामकृष्ण - केशव यदि त्यागी होता, तो अनेक काम होते । बकरे के बदन पर घाव रहने से वह देव-सेवा के काम में नहीं आता, उसकी बलि नहीं दी जाती । त्यागी हुए बिना व्यक्ति लोक-शिक्षा का अधिकारी नहीं बनता । गृहस्थ होने पर कितने लोग उसकी बात सुनेंगे ?
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स्वामी विवेकानन्द कामिनी-कांचनत्यागी हैं, इसीलिए उनका ईश्वर के विषय में लोक-शिक्षा देने का अधिकार है । विवेकानन्दजी वेदान्त तथा अंग्रेजी भाषा व दर्शन आदि के अग्रगण्य पण्डित हैं; वे असाधारण भाषणपटु हैं; क्या उनका माहात्म्य इतना ही है ? इसका उत्तर श्रीरामकृष्ण ने दिया था । दक्षिणेश्वर के कालीमन्दिर में भक्तों को सम्बोधित कर श्रीरामकृष्णदेव ने १८८२ ई. में स्वामी विवेकानन्द के सम्बन्ध में कहा था –
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"इस लड़के को देख रहे हो, यहाँ पर एक तरह का है । उत्पाती लड़के जब बाप के पास बैठते हैं तो मानो भीगी बिल्ली बन जाते हैं । फिर चाँदनी में जब खेलते हैं, उस समय उनका रूप दूसरा ही होता है । ये लोग नित्यसिद्ध के स्तर के हैं । ये लोग कभी संसार में आबद्ध नहीं होते । थोड़ी उम्र में ही इन्हें चैतन्य होता है और भगवान की ओर चले जाते हैं । ये लोग लोक-शिक्षा के लिए संसार में आते हैं, इन्हें संसार की कोई भी चीज अच्छी नहीं लगती - ये कभी भी कामिनी-कांचन में आसक्त नहीं होते ।
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“वेद में 'होमा' पक्षी का उल्लेख है । आकाश में खूब ऊँचाई पर वह चिड़िया रहती है । वहीं आकाश में ही वह अण्डा देती है । अण्डा देते ही अण्डा नीचे गिरने लगता है । अण्डा गिरते गिरते फूट जाता है । तब बच्चा गिरने लगता है । गिरते गिरते उसकी आँखे खुल जाती हैं और पंख निकल आते हैं । आँखें खुलते ही वह देखता है कि वह गिर रहा है और जमीन पर गिरते ही उसकी देह चकनाचूर हो जायगी । तब वह पक्षी अपनी माँ की ओर देखता है, और ऊपर की ओर उड़ान लेता है और ऊपर उठ जाता है ।"
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विवेकानन्द वही 'होमा पक्षी' हैं - उनके जीवन का एकमात्र लक्ष्य है उड़कर माँ के पास ऊपर उठ जाना - देह के जमीन से टकराने के पहले ही अर्थात् संसार से सम्बन्ध होने से पहले ही, ईश्वरलाभ के पथ पर अग्रसर हो जाना ।
श्रीरामकृष्ण ने ईश्वरचन्द्र विद्यासागर से कहा था, - "पाण्डित्य ! केवल पाण्डित्य से ही क्या होगा ? गिद्ध भी काफी ऊँचा उड़ता है, परन्तु उसकी दृष्टि रहती है जमीन पर मुर्दों की ओर - कहाँ सड़ा मुर्दा पड़ा है । पण्डित अनेक श्लोक झाड़ सकते हैं, परन्तु मन कहाँ है ? यदि ईश्वर के चरणकमलों में हो, तो मैं उसे सम्मान देता हूँ, यदि कामिनी-कांचन की ओर हो, तो वह मुझे कूड़ा-कर्कट जैसा लगता है ।"
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स्वामी विवेकानन्द केवल पण्डित ही नहीं, वे साधु महापुरुष थे । केवल पाण्डित्य के लिए ही अंग्रेजों तथा अमरीकानिवासियों ने भृत्यों की तरह उनकी सेवा नहीं की थी । उन्होंने जान लिया था कि ये एक दूसरे ही प्रकार के व्यक्ति हैं । अन्य सब लोग सम्मान, धन, इन्द्रियसुख, पण्डिताई आदि लेकर रहते हैं पर इनका लक्ष्य है ईश्वरप्राप्ति ।
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'संन्यासी के गीत' में स्वामीजी ने कहा है कि संन्यासी कामिनी-कांचन का त्याग करेगा –
"... करते निवास जिस उर में मद काम लोभ औ' मत्सर,
उसमें न कभी हो सकता आलोकित सत्य-प्रभाकर;
भार्यत्व कामिनी में जो देखा करता कामुक बन,
वह पूर्ण नहीं हो सकता, उसका न छूटता बन्धन;
लोलुपता है जिस नर की स्वल्पातिस्वल्प भी धन में,
वह मुक्त नहीं हो सकता, रहता अपार बन्धन में;
जंजीर क्रोध की जिसको रखती है सदा जकड़कर,
वह पार नहीं कर सकता दुस्तर माया का सागर ।
इन सभी वासनाओं का अतएव त्याग तुम कर दो,
सानन्द वायुमण्डल को बस एक गूँज से भर दो –
'ॐ तत् सत् ॐ !’ ...” -'कवितावली' से उद्ध्रत
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अमरीका में उन्हें प्रलोभन कम नहीं मिला था । इधर विश्वव्यापी यश, उस पर सदा ही परम सुन्दरी उच्चवंशीय सुशिक्षित महिलाएँ उनसे वार्तालाप तथा उनकी सेवा-टहल किया करती थीं । स्वामीजी में इतनी मोहिनी शक्ति थी कि उनमें से कई उनसे विवाह करना चाहती थीं । एक अत्यन्त धनी व्यक्ति की लड़की ने तो एक दिन आकर उनसे यहाँ तक कह दिया, "स्वामी ! मेरा सब कुछ एवं स्वयं को भी मैं आपको सौंपती हूँ ।" स्वामीजी ने उसके उत्तर में कहा, 'भद्रे, मैं संन्यासी हूँ, मुझे विवाह नहीं करना है । सभी स्त्रियाँ मेरी माँ जैसी है ।'
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धन्य हो वीर ! तुम गुरुदेव के योग्य ही शिष्य हो ! तुम्हारी देह में वास्तव में पृथ्वी की मिट्टी नहीं लगी है, तुम्हारी देह में कामिनी-कांचन का दाग तक नहीं लगा है । तुम प्रलोभन के देश से दूर न भागकर, उसी में रहकर, श्री की नगरी में रहकर ईश्वर के पथ में अग्रसर हुए हो ! तुमने साधारण जीव की तरह दिन बिताना नहीं चाहा । तुम देवभाव का जीता-जागता उदाहरण छोड़कर इस मर्त्यलोक को छोड़ गये हो !
(क्रमशः)