शुक्रवार, 9 जनवरी 2026

३. श्री गुरुदेव का अंग ~ ३७/४०

🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏
🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷
साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal Das
श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
.
३. श्री गुरुदेव का अंग ~ ३७/४०
.
गुरु सु दिखावे शब्द में, रमता१ रामति२ और ।
देखन को दर्पण इहै, जन रज्जब निज ठौर ॥३७॥
३६-४४ में गुरु शब्दों की विशेषता बता रहे हैं - रमने१ वाले राम को और उसकी रमन२ भूमि मायिक संसार को सद्गुरु अपने शब्दों में भलि भाँति भिन्न भिन्न दिखा देते हैं, अर्थात राम सत्य है और माया तथा मायिक कार्य मिथ्या है, यह बता देते हैं । वैसे ही ब्रह्म रूप निज धाम को देखने के लिये भी इस संसार में सद्गुरु शब्द ही दर्पण है ।
.
सद्गुरु वाइक बीज है, प्राण पुहमि१ में बोय ।
रज्जब राखे जतन कर, मन वाँछित फल होय ॥३८॥
साधन - वृक्ष का बीज सद्गुरु वचन ही है, उसको साधक प्राणी निज अन्त:करण रूप पृथ्वी१ में बोये और विचार जल से सींचना तथा कुविचार -पशुओं से बचाना रूप यत्न से रक्खे तो, मन की इच्छानुसार उससे फल प्राप्त होगा ।
.
जो प्राणी रुचि से गहै, उर अंतर गुरु बैन ।
जन रज्जब युग युग सुखी, सदा सु पावे चैन ॥३९॥
जो प्राणी गुरु वचनों को प्रेम पूर्वक हृदय में धारण करता है वह अपने जीवन काल में सदा सम्यक् प्रकार सुख ही पाता है और ब्रह्म को प्राप्त करके प्रति युग में सुखी रहता है ।
.
सद्गुरु शब्द अनन्त दत१, युग युग काटे कर्म ।
जन रज्जब उस पुण्य पर, और न दीसे धर्म ॥४०॥
सद्गुरु का शब्द प्रदान करना अनन्त दान१ है, अनन्त युगों के कर्म को नष्ट कर डालता है, सद्गुरु शब्द जन्य ज्ञान से होने वाले पुण्य से अधिक अन्य कोई भी धर्म नहीं दिखता ।
(क्रमशः)

गुरुवार, 8 जनवरी 2026

'ईशदूत ईसा'

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
.
*दादू इस संसार में, ये द्वै रत्न अमोल ।*
*इक सांई अरु संतजन, इनका मोल न तोल ॥*
.
साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
==================
स्वामीजी १८९९ ईसवी में दूसरी बार अमरीका गये थे । उस समय १९०० ईसवी में उन्होंने कैलिफोर्निया(California) प्रान्त में लास इंजिलस(Los Angeles) नामक नगर में 'ईशदूत ईसा'(Christ the Messenger) विषय पर एक भाषण दिया था । इस भाषण में उन्होंने फिर से अवतार-तत्त्व को भलीभांति समझाने की चेष्टा की थी ।
.
स्वामीजी ने कहा –"... इसी महापुरुष(ईसा मसीह) ने कहा है, 'किसी भी व्यक्ति ने ईश्वर-पुत्र के माध्यम बिना ईश्वर का साक्षात्कार नहीं किया है ।' और यह कथन अक्षरशः सत्य है । ईश्वर-तनय के अतिरिक्त हम ईश्वर को और कहाँ देखेंगे ? यह सच है कि मुझमें और तुममें, हममें से निर्धन से भी निर्धन और हीन से भी हीन व्यक्ति में भी परमेश्वर विद्यमान है, उनका प्रतिबिम्ब मौजूद है ।
.
प्रकाश की गति सर्वत्र है, उसका स्पन्दन सर्वव्यापी है, किन्तु हमें उसे देखने के लिए दीप जलाने की आवश्यकता होती है । जगत् का सर्वव्यापी ईश भी तब तक दृष्टिगोचर नहीं होता, जब तक ये महान् शक्तिशाली दीपक, ये ईशदूत, ये उसके सन्देशवाहक और अवतार, ये नर-नारायण उसे अपने में प्रतिबिम्बित नहीं करते ।...
.
ईश्वर के इन सब महान् ज्ञानज्योतिसम्पन्न अग्रदूतों में से आप किसी एक की ही जीवन-कथा लीजिये और ईश्वर की जो उच्चतम भावना आपने हृदय में धारण की है, उससे चरित्र की तुलना कीजिये । आपको प्रतीत होगा कि इन जीवित और जाज्वल्यमान आदर्श महापुरुषों के चरित्र की अपेक्षा आपकी भावनाओं का ईश्वर अनेकांश में हीन है, ईश्वर के अवतार का चरित्र आपके कल्पित ईश्वर की अपेक्षा कहीं अधिक उच्च है ।
.
आदर्श के विग्रह-स्वरूप इन महापुरुषों ने ईश्वर की साक्षात् उपलब्धि कर, अपने महान् जीवन का जो आदर्श, जो दृष्टान्त हमारे सम्मुख रखा है, ईश्वरत्व की उससे उच्च भावना धारण करना असम्भव है । इसलिए यदि कोई इनकी ईश्वर के समान अर्चना करने लगे. तो इसमें क्या अनौचित्य है ?
.
इन नरनारायणों के चरणाम्बुजों में लुण्ठित हो यदि कोई उनकी भूमि पर अवतीर्ण ईश्वर के समान पूजा करने लगे तो क्या पाप है ? यदि उनका जीवन हमारे ईश्वरत्व के उच्चतम आदर्श से भी उच्च है तो उनकी पूजा करने में क्या दोष ? दोष की बात तो दूर रही, ईश्वरोपासना की केवल यही एक विधि सम्भव है ।..."
-'महापुरुषों की जीवनगाथाएँ' से उद्धृत
(क्रमशः)

आचार्य उदयरामजी के टीका की भेंट ~

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
.
आचार्य उदयरामजी के टीका की भेंट ~ 
आचार्य उदयरामजी महाराज के गद्दी पर विराजने के उपलक्ष में टीका की मुख्य- मुख्य भेंटें इस प्रकार आई थीं- जयपुर राज्य से- घोडा और दुशाला, अलवर राज्य से- हाथी, दुशाला,पाग, पार्चाथान आये । कोटा नरेश की ओर से दुशाला, दुपट्टा, मोहर । जीन्द नरेश की ओर से दुशाला, पाग आदि भेंटें आई । 
.
संपूर्ण दादूपंथी साधु समाज से अपनी- अपनी मर्यादा के अनुसार भेंटें आई । गृहस्थ धनी सज्जनों की ओर से भी टीके के दस्तूर की भेंटें आई । उक्त प्रकार भेंट का दस्तूर संपन्न हुआ ।  
.
उदयरामजी की विषेशता ~ आचार्य उदयरामजी महाराज भजनानन्दी महात्मा होते हुये भी जनरंजन करने में बहुत ही प्रवीण थे । ऐसी सुन्दर पद्धति से उपदेश करते थे जिससे अल्प बुद्धिवाले मानव भी गंभीर से गंभीर विषय को अनायस ही समझ जाते थे । विद्वता के साथ- साथ आपका अनुभव भी विचित्र था । 
.
श्रीदादू वाणी का प्रवचन तो आप परंपरा से सुनते ही आ रहे थे इससे दादूवाणी के समझाने में तो आप परम कुशल थे । दादूवाणी का प्रवचन आपका बहुत ही अनुभव पूर्ण होता था । निगुर्ण परब्रह्म का स्वरुप सर्व साधारण को समझाना और उसकी निर्गुण भक्ति में अधिकारी मानवों को लगाना तो आपका मुख्य काम ही था ।  
(क्रमशः) 

*१५. मन कौ अंग ५७/६०*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
.
*१५. मन कौ अंग ५७/६०*
.
इत उत कहूं न चलि सकै, थकित भया तिहिं ठौर । 
सुन्दर जैसैं नाद बसि, मन मृग बिसर्या और ॥५७॥ 
जैसे वीणा के नाद में मुग्ध कोई मृग अचल(स्थिर) होकर नाद श्रवण करता है कहीं इधर उधर नहीं जाता; वैसे ही प्रभुचरणों का अनुरागी मन भी तब किसी अन्य सांसारिक वासना में लिप्त होने की स्थिति में नहीं रहता ॥५७॥
.
(मन शब्द को श्लेष)
धड तौ जाकै चारि हैं, द्वै द्वै सिर है बीस । 
ऐसी बडी बलाइ मन, सिर करि ले चालीस ॥५८॥ 
[अब यहाँ महाकवि श्लेषालङ्कार से मन की स्थिति का वर्णन कर रहे हैं -] 
(आगे की साषियों में 'धड़१', 'सिर२', 'द्वै सिर३', 'अध सिर४', 'पाव५', 'मन६' तथा 'सेर७' शब्द दो अर्थ वाले हैं । यथाप्रसङ्ग इन शब्दों के माध्यम से श्रीसुन्दरदासजी महाराज मन की अनन्तता का वर्णन कर रहे हैं-)
(धड़१ – १. शरीर में ग्रीवा से नीचे का भाग; २. वस्तु के तोल का पाँच सेर या दश सेर का माप । ग्रन्थकार के समय, सम्भवतः यह शब्द 'दश सेर' के अर्थ प्रयुक्त होता था । आज कल इस के स्थान पर 'धड़ी'(पांच सेर) शब्द का भी प्रयोग होता है ।)
(सिर२ – १. शिर = शरीर का ग्रीवा तक ऊपरी भाग, २. सेर = वस्तु के तोल का एक माप, जो १६ टांक के बराबर माना जाता है ।)
(द्वै सिर३ – १. दो शिर; २. दुसेरा या दुसेरी, जो दो सेर माप के बराबर माना जाता है ।)
(अध सिर४ = १. अर्ध शिर{शरीर में ग्रीवा तक आधा भाग}; २. आधा सेर [एक सेर का आधा भाग = ८ छटांक])
(पाव५ = १. पैर(चरण या पाद); २. किसी वस्तु के तोल में प्रयुक्त होने वाला एक माप {एक सेर का चतुर्थ भाग = चार छटांक})
(मन६ = १. मानव शरीर में ११ वीं इन्द्रिय; २. किसी वस्तु के तोल में प्रयुक्त होने वाला एक माप{-४० सेर} । इसे राजस्थानी भाषा में 'मण' भी कहते हैं ।) 
(सेर७ = १. सिंह{जङ्गल का हिंसक पशु}; २. किसी वस्तु के तोल का एक माप{= १६ छटांक})
जैसे एक मण(वस्तुमापक बाट) में चार धड(१० सेर) तथा २० दुसेरा होते हैं तो वह ४० सेर(शिर) का हो जाता है वैसे ही यह हमारा मन भी किसी भूत प्रेत के समान इतना सामर्थ्य वाला है कि यह जब चाहे तब अपने चालीस रूप बना कर अपनी इच्छा से बाह्य संसार में विचरण करने हेतु निकल जाता है ॥५८॥
.
सिर तैं द्वै अध सिर करै, सिर सिर चहुं चहुं पाव । 
ऐसैं सिर चालीस हैं, मन कहिये क छलाव ॥५९॥
उस वस्तुमापक तोल मण के प्रत्येक सेर में दो अधसेर होते हैं । तथा प्रत्येक सेर में चार अंश करें तो वे 'चार पाव' कहलाते हैं । इस प्रकार जब हमारे इस मन के भी चालीस सिर हैं तो इसे(मनुष्य का) मन कहें कि कोई छलावा(श्मशान में जब तब दिखायी देने वाली चमक; भूत प्रेत) ! ॥५९॥
.
सिर जाकै चालीस हैं, असी अरध सिर जाहि । 
पांव एक सौ साठि हैं, क्यौं करि पकरै ताहि ॥६०॥
जैसे उस माप(मण) में चालीस सेर(सिर) होते हैं और अस्सी आधा सेर, तथा १६० पाव(सेर का चतुर्थ अंश) होते हैं; वैसा ही हमारा यह मन भी है । अतः ऐसे बलवान् को निगृहीत करने की सामर्थ्य किसमें है ! ॥६०॥
(क्रमशः)

*३. श्री गुरुदेव का अंग ~ ३३/३६*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
.
*३. श्री गुरुदेव का अंग ~ ३३/३६*
.
*ब्रह्मांड पिंड की एक गति, पावे खोजी प्रान ।*
*उभय ठौर सब अंश हैं, समझावे गुरु ज्ञान ॥३३॥*
ब्रह्माड और पिंड का स्वरूप एक जैसा ही है किन्तु उसे विचारशील प्राणी ही समझ पाता है । दोनों ही स्थानों के सभी भाग समान हैं इस बात को भली भाँती गुरु देव का ज्ञान ही समझा पाता है ।
.
*विविध भाँति बूटी व्यथा, वैद्य सु जाने भेव ।*
*त्यों आशंका अनन्त विधि, समझावें गुरु देव ॥३४॥*
नाना प्रकार की बुटीयें और रोग होते हैं, बूटियों के गुण - रहस्य और आकारों को तथा रोगों की विभिन्नता, निदान, उपद्रवादि के रहस्य को सम्यक् प्रकार से वैद्य ही जान पाता है, वैसे ही नाना प्रकार की शंकाओं के समाधान कर के गुरुदेव ही प्राणियों को अध्यात्म विषय समझाते हैं ।
.
*रज्जब अग्नि अनन्त हैं, एक आतमा माँहि ।*
*सद्गुरु शीतल सर्व विधि, बहु वह्नि बुझ जाँहि ॥३५॥*
एक ही अन्त:करण में क्रोधाग्नि, कामाग्नि आदि बहुत प्रकार की अग्नियें हैं किन्तु सद्गुरु का अन्त:करण उक्त सभी अग्नियों से रहित होने से सद्गुरु सर्वथा शीतल हैं अत: उनके उपदेशानुसार साधन करने से उक्त सभी अग्नियें शांत हो जाती हैं ।
.
*सद्गुरु बिन संदेह को, रज्जब भाने कौन ।*
*सकल लोक फिर देखिया, निरखे तीनों भौन ॥३६॥*
संपूर्ण लोकों में घूमकर देखा है तथा तीनों भुवनों को विचार द्वारा भी देखा है, उनमें साधक के ब्रह्म-आत्म विषयक संशय को नष्ट कर सके ऐसा सद्गुरु बिना कोई भी नहीं है ।
(क्रमशः)

बुधवार, 7 जनवरी 2026

१३ आचार्य उदयरामजी

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
.
अथ अध्याय ११~१३ आचार्य उदयरामजी 
.
श्रीमानुदयरामाख्य: सिद्धेशो लोक पूजित: ।  
संजातो भूत ले भूत्यै, जनानां धर्म सम्बिदो ॥१॥
आचार्य नारायणदासजी महाराज के ब्रह्मलीन होने के पश्‍चात् वि. सं. १९१२ कार्तिक कृष्णा ३ शुक्रवार को समाज ने उदयरामजी महाराज को आचार्य गद्दी पर विराजमान कराने का विचार किया । तब उस समय के भंडारी लच्छीराम जी ने कहा - गद्दी पर बैठने का मेरा अधिकार है, मैं बडा शिष्य व भंडारी हूँ । ऐसा कहकर कुछ युवक साधुओं की सहायता से स्वयं आचार्य गद्दी पर बैठना चाहते थे । आचार्य पद प्राप्ति के लिये उन्होंने और अनेक उपाय किये थे ।
.
किन्तु आचार्य नारायणदासजी महाराज का संकेत उदयरामजी के भजन साधन, ब्रह्मचर्य, तप, साधुता, विचार शीलता, मिलन सारिता, शील स्वभाव, वाक्पटुता आदि सुन्दर गुणों को देखकर उदयरामजी को ही गद्दी के योग्य समझा था और आचार्य नारायणदासजी महाराज ने अपने अन्तिम समय में सब पंचायत के सामने अपने मस्तक की कपाली टोपी अपने हाथ से उतार कर उदयरामजी के शिर पर रखदी थी । 
.
इससे उदयरामजी को ही योग्य अधिकारी समझकर दादूपंथी समाज ने आचार्य गद्दी पर बैठाया था । इससे रुष्ट होकर भंडारी लच्छीरामजी दादूद्वारा छोडकर अन्यत्र चले गये थे और आचार्य उदयरामजी को हटाकर स्वयं आचार्य बनने के प्रयत्न में लगे हुये थे । 
.
एक दिन आचार्य उदयरामजी महाराज शौच क्रिया के लिये अकेले ही जंगल में गये थे । वहां भंडारी लच्छीराम जी के समर्थकों ने उन पर आक्रमण करके क्षति पहुँचाने की चेष्टा की, किन्तु सफल नहीं हो सके । कारण- एक तो आचार्य उदयरामजी महाराज तप तेज से संपन्न थे, दूसरे शारीरिक बल भी उनमें बहुत था । अत: अकेले आचार्य उदयरामजी महाराज ने ही उन सब को भगा दिया । 
.
किन्तु जब स्थानीय साधु-महात्माओं को यह ज्ञात हुआ तब दुखित हुये और उस दिन ही आचार्य जी की शौच क्रिया के लिये महल के पास ही शौचालय बनवा दिया गया । अंत में भंडारी लच्छीरामजी और उनके समर्थकों के सब षड्यंत्र विफल हो गये । तब उन सबको समाज के आगे नत मस्तक होना ही पडा । 
.
इधर आचार्य उदयरामजी महाराज अपने प्रतिपक्षी भंडारी लच्छीरामजी तथा उनके समर्थको को कुछ भी नहीं कहते थे । उनके सभी आघातों को सहन कर लेते थे । यही उनकी विशेषता थी । इसी से अन्त में विरोधियों को उनके सामने झुकना ही पडा था । 
(क्रमशः) 

*१५. मन कौ अंग ५३/५६*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
.
*१५. मन कौ अंग ५३/५६*
.
तबही लौं मन कहत है, जब लग है अज्ञांन । 
सुन्दर भागै तिमर सब, उदै होइ जब भांन ॥५३॥
हमारा यह मन तभी तक इस भ्रमात्मक स्थिति में रहता है जब तक उस पर अविद्या(अज्ञान) का आवरण पड़ा हुआ है । परन्तु उस का यह अज्ञानान्धकार तभी नष्ट हो जाता है जब उस में गुरूपदिष्ट ज्ञानरूप सूर्य का उदय हो जाय ॥५३॥
.
सुन्दर परम सुगन्ध सौं, लपटि रह्यौ निश भोर । 
पुण्डरीक परमातमा, चंचरीक मन मोर ॥५४॥
भगवदानुरागी मन : गुरूपदिष्ट ज्ञान के प्राप्त होते ही हमारा यह मन निरञ्जन निराकार प्रभु के चरणकमलों का उसी प्रकार दास बन जाता है जैसे कोई भ्रमर सुगन्ध के लोभ में कमल पुष्प के चारों ओर मण्डराता रहता है ॥५४॥
.
सुन्दर निकसै कौंन बिधि, होइ रह्या लै लीन । 
परमानन्द समुद्र मैं, मग्न भया मन मीन ॥५५॥
जब साधक का मन उस निरञ्जन निराकार के परम आनन्दमय ध्यान में मग्न(समाधिस्थ) हो जाता है तो उसे वहाँ से वियुक्त करने का किस में साहस है । क्या महासमुद्र के जल में अतिशय स्नेहिल किसी मछली को जीवित अवस्था में कोई उस जल से वियुक्त कर पाया है ! ॥५५॥
.
दृष्टि न फेरै नैंकहूं, नैंन लगै गोबिन्द ।
सुन्दर गति ऐसी भई, मन चकोर ज्यौं चन्द ॥५६॥ 
जैसे चकोर पक्षी चन्द्रमा को एक क्षण के लिये भी अपनी दृष्टि से दूर नहीं करना चाहता; वैसी ही स्थिति प्रभुचरणों में अनुरक्त साधक के मन की भी समझनी चाहिये ॥५६॥
(क्रमशः)

ईश्वर ही अवतार

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
.
*दादू निराकार मन सुरति सौं, प्रेम प्रीति सौं सेव ।*
*जे पूजे आकार को, तो साधु प्रत्यक्ष देव ॥*
.
साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
==================
काशीपुर बगीचे में श्रीरामकृष्ण जिस समय कैन्सर रोग की यन्त्रणा से बैचेन हो रहे हैं, भात का तरल माँड़ तक गले के नीचे नहीं उतर रहा है, उस समय एक दिन नरेन्द्र श्रीरामकृष्ण के पास बैठकर सोच रहे हैं, 'इस यन्त्रणा में यदि कहें कि मैं ईश्वर का अवतार हूँ तो विश्वास होगा ।' उसी समय श्रीरामकृष्ण कहने लगे, "जो राम, जो कृष्ण, इस समय वे ही रामकृष्ण के रूप में भक्तों के लिए अवतीर्ण हुए हैं ।" नरेन्द्र यह बात सुनकर दंग रह गये ।
.
श्रीरामकृष्ण के स्वधाम में सिधार जाने के बाद नरेन्द्र ने संन्यासी होकर बहुत साधन-भजन तथा तपस्या की । उस समय उनके हृदय में अवतार के सम्बन्ध में श्रीरामकृष्ण के सभी महावाक्य मानो और भी स्पष्ट हो उठे । वे स्वदेश और विदेशो में इस तत्त्व को और भी स्पष्ट रूप से समझाने लगे ।
.
स्वामीजी जब अमरीका में थे, उस समय नारदीय भक्तिसूत्र आदि ग्रन्थों के अवलम्बन से उन्होंने भक्तियोग नामक ग्रन्थ अंग्रेजी में लिखा । उसमें भी वे कह रहे हैं कि अवतारगण छूकर लोगों में चैतन्य उत्पन्न करते हैं । जो लोग दुराचारी हैं, वे भी उनके स्पर्श से सदाचारी बन जाते हैं । 'अपि चेत् सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्, साधुरेव स मन्तव्यः सम्यक् व्यवसितो हि सः ।' ईश्वर ही अवतार के रूप में हमारे पास आते हैं । यदि हम ईश्वर-दर्शन करना चाहें तो अवतारी पुरुषों में ही उनका दर्शन करना होगा । उनका पूजन किये बिना हम रह नहीं सकते ।
.
“... साधारण गुरुओं से श्रेष्ठ एक और श्रेणी के गुरु होते हैं, जो इस संसार में ईश्वर के अवतार होते हैं । केवल स्पर्श से ही वे आध्यात्मिकता प्रदान कर सकते हैं, यहाँ तक कि इच्छा मात्र से ही । उनकी इच्छा से महान् दुराचारी तथा पतित व्यक्ति भी क्षण भर में ही साधु हो जाता है ।
.
वे गुरुओं के भी गुरु हैं तथा मनुष्य रूप में भगवान के अवतार हैं । उनके माध्यम बिना हम ईश्वर-दर्शन नहीं कर सकते । उनकी उपासना किये बिना हम रह ही नहीं सकते और वास्तव में केवल वे ही ऐसे हैं जिनकी हमें उपासना करनी चाहिए । ... जब तक हमारा यह मनुष्य शरीर है तब तक हमें ईश्वर की उपासना मनुष्य के रूप में और मनुष्य के सदृश ही करनी पड़ती है ।
.
तुम चाहे जितनी बातें करो, चाहे जितना यत्न करो, परन्तु भगवान को मनुष्य-रूप के अतिरिक्त तुम किसी अन्य रूप में सोच ही नहीं सकते । ईश्वर तथा संसार की सारी वस्तुओं पर चाहे तुम सुन्दर तर्कयुक्त भाषण दे सकते हो, चाहे बड़े युक्तिवादी बन सकते हो और मन को समझा सकते हो कि इन सारे ईश्वरावतारों की कथा भ्रमात्मक है । पर थोड़ी देर के लिए सहज बुद्धि से सोचो । हमें इस विचित्र विचारबुद्धि से क्या प्राप्त होता है ?
.
- शून्य, कुछ नहीं, केवल शब्दाडम्बर । भविष्य में जब कभी तुम किसी मनुष्य को अवतार-पूजा के विरुद्ध एक बड़ा तर्कपूर्ण भाषण देते हुए सुनो तो उससे यह प्रश्न करो कि उसकी ईश्वर सम्बधी धारणा क्या है । 
.
सर्वशक्तिशाली, सर्वव्यापी तथा इस प्रकार के अन्य शब्दों का अर्थ वह केवल अक्षरों के जानने की अपेक्षा और क्या समझता है ? वास्तव में वह कुछ नहीं समझता । वह उनका कोई ऐसा अर्थ नहीं लगा सकता जो उसकी स्वयं की मानवी प्रकृति से प्रभावित न हो । इस सम्बन्ध में वह बिलकुल उसी सामान्य मनुष्य के सदृश है, जिसने एक पुस्तक भी नहीं पढ़ी ।”
- 'भक्तियोग' से उद्धृत
(क्रमशः)

*३. श्री गुरुदेव का अंग ~ २९/३२*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
.
*३. श्री गुरुदेव का अंग ~ २९/३२*
.
*सद्गुरु की सुन सीख को, उपज्या यही विचार ।*
*रज्जब रचे सु राम सों, विरचे इहिं संसार ॥२९॥*
सद्गुरु के ज्ञानोपदेश को श्रवण करके साधकों के हृदय में राम सत्य है और संसार असत्य है, यही विचार उत्पन्न हुआ । इसी कारण वे संसार से विरक्त होकर राम में ही अनुरक्त हुये अत: बडभागी हैं ।
.
*मन समुद्र गुरु कमठ ह्वै, किया जु महणारंभ१ ।*
*रज्जब बीते बहुत युग, अचल न आतम अंभ२ ॥३०॥*
३० - ३६ में गुरु की विशेषता बता रहे हैं - मन रूप समुद्र को गुरु रूप कच्छप ने ज्ञान-रत्न निकालने के लिये मथना१ आरंभ किया बहुत युग बीत गये हैं, किन्तु अभी भी जीवात्मा रूप जल२ स्वस्वरूप स्थिति रूप निश्चलता को प्राप्त नहीं हुआ है फिर भी ज्ञान रत्न निकाले बिना गुरु छोड़ते नहीं । इसमें समुद्र मंथन समय का रूपक दिया है ।
.
*गुरु बिन गम३ नहिं पाइये, पिंड प्राण१ पर वेश२ ।*
*रज्जब गुरु गोविन्द बिन, कौन दिखावे देश ॥३१॥*
स्थूल शरीर और सूक्ष्म शरीर१ से परे अपने निज स्वरूप-घर२ को प्राप्त करने का विचार३ गुरु बिना नहीं मिलता । गोविन्द की कृपा और गुरु के ज्ञान बिना स्वस्वरूप-देश को कौन दिखा सकता है ?
.
*गुरु बिन गम१ नहिं पाइये, समझ न उपजे आय ।*
*रज्जब पंथी पंथ बिन. कौन दिसावर२ जाय ॥३२॥*
गुरु बिना परमेश्वर के ध्यान१ करने की युक्ति नहीं मिलती और हृदय में ब्रह्म-ज्ञान भी उत्पन्न नहीं हो सकता । जैसे पथिक पंथ बिना किसी भी विदेश२ को नहीं जा सकता, वैसे ही साधक ब्रह्म ज्ञान बिना संसार दशा रूप देश से ब्रह्म-स्थिति रूप प्रदेश में नहीं जा सकता ।
(क्रमशः)

मंगलवार, 6 जनवरी 2026

ब्रह्मलीन होना ~

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
.
१२ आचार्य नारायणदास जी ~
.
कुछ भूमि प्राप्त ~ 
इन्हीं दिनों में खेतडी राज्य की ओर से दलेलपुरा ग्राम की दो कोटियों का पट्टा दादूद्वारे के नाम होकर नारायणा दादूधाम के आचार्य नारायणदासजी महाराज के पास आया । वि. सं. १९१२ में किशनगढ राज्य से भी भूमि का पट्टा आया । इस वर्ष आचार्य नारायणदासजी महाराज का चातुर्मास भंडारी सांवतरामजी के नियत हुआ था । वह चातुर्मास की मर्यादा के अनुसार अच्छी प्रकार संपन्न हुआ । 
.
ब्रह्मलीन होना ~ 
उक्त प्रकार आचार्य नारायणदासजी महाराज ने लोक कल्याण के लिये भ्रमण में धर्मोपदेश देते हुये गद्दी पर ११ वर्ष ४ मास २३ दिन विराज कर कार्तिक कृष्णा १३ बुधवार वि. सं. १९१२ में ब्रह्मलीन हुये । कहा भी है -
सम्मत शत उन्नीस का, बारह कार्तिक मास ।
कृष्ण पक्ष तेरस दिना, गये राम के पास ॥
(दादू चरित्र चन्द्रिका)
.
गुण गाथा
दोहा- दादूधाम आचार्य वर, हुये नरायणदास ।
रत्त रहे निज रुप में, त्याग जगत की आश ॥१॥
राजा रावल आदि ने, धरे चरण में शीश ।
नम्र रहे तो भी सदा, सुमिरत श्री जगदीश ॥२॥
निज समाज अरु अन्य को, दीन्हा ज्ञान प्रकाश ।  
सर्व प्रिय इससे रहे, महन्त नरायण दास ॥३॥
ग्राम भूमि दी नृपों ने, श्रद्धा करके आप ।  
तदपि राग से रहित रहे, मिटा द्वन्द्व की ताप ॥४॥
नारायण आचार्य में, रही संत जन प्रीति । 
क्योंकि सदा उनमें रही, समता पूरण नीति ॥५॥ 
सेवक श्रद्धा के रहे, पात्र नरायणदास ।  
इससे सेवक उन्हों के, आते थे बहु पास ॥६॥
नारायण के चित्त की, नारायण से प्रीति ।
‘नारायण’ अद्भुत रही, कही न जात वह रीति ॥७॥ 
नारायण आचार्य को, ‘नारायण’ नति नित्य ।  
क्योंकि असत को त्यागकर, प्राप्त किया था सत्य ॥८॥
नारायण आचार्य का, नारायण से नेह ।  
मिले इसीसे ब्रह्म में, त्याग अनात्मा देह ॥९॥ 
इति श्री दशम अध्याय समाप्त: १० 
(क्रमशः) 

*१५. मन कौ अंग ४९/५२*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
.
*१५. मन कौ अंग ४९/५२*
.
देह रूप मन ह्वै रह्यौ, कियौ देह अभिमान । 
सुन्दर समुझै आपकौं, आपु होइ भगवान ॥४९॥
जब हमारा यह मन स्व देह का निरन्तर चिन्तन करता है तो यह देहाभिमानी(देह ही सब कुछ है- इस मत का पोषक) हो जाता है । परन्तु जब यह स्व स्वरूप का यथार्थ समझ लेता है तो इसे भगवत्स्वरूप होने में कुछ भी विलम्ब नहीं लगता ॥४९॥
.
जब मन देखै जगत कौं, जगत रूप ह्वै जाइ । 
सुन्दर देखै ब्रह्म कौं, तब मन ब्रह्म समाइ ॥५०॥
जब यह जगत(पति पत्नी, पुत्र आदि में) व्यामोह कर लेता है तो यह जगद्रूप हो जाता है, तथा जब यही मन उस निरञ्जन निराकार का निरन्तर चिन्तन करने लगता है तो यह तन्मय हो जाता है ॥५०॥
.
मन ही कौ भ्रम जगत सब, रज्जु मांहिं ज्यौं साप । 
सुन्दर रूपौ सीप मैं, मृग तृष्णा मंहिं आप ॥५१॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - यह समस्त संसार मन का एकान्ततः भ्रममात्र(कल्पनासुष्टि) है; जैसे कि अन्धकार में रज्जु को भी सर्प समझ लिया जाता है । या शुक्ति(सीपी) में रजत का भ्रम हो जाता है । या मरुभूमि में, चमक के कारण मृगतृष्णा(जल का भ्रम) दिखायी देने लगती है । ऐसा ही भ्रम इस देहाभिमानी मन का समझना चाहिये ॥५१॥
.
जगत बिझूका देखि करि, मन मृग मानै संक । 
सुन्दर कियौ बिचार जब, मिथ्या पुरुष करङ्क ॥५२॥
जैसे कोई किसान, मृगों से अपने खेत की रक्षा के लिये, मानव के आकार की कोई भयोत्पादक वस्तु(= बिझुका) खड़ी कर देता है तो उस से मृग डर उस खेत को हानि नहीं पहुँचाते; या अन्धकार में किसी स्थाणु(सूखे वृक्ष का ठूंठ) को देखकर उसे नरकङ्काल समझता हुआ कोई मनुष्य भय माने; वही भ्रमात्मक स्थिति संसार के विषय में हमारे मन की है ॥५२॥
(क्रमशः) 

विवेकानन्द व अवतारवाद

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
.
*दादू गुप्त गुण परगट करै, परगट गुप्त समाइ ।*
*पलक मांहि भानै घड़ै, ताकी लखी न जाइ ॥*
.
साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
==================
*(१०)श्रीरामकृष्ण, स्वामी विवेकानन्द व अवतारवाद*
दक्षिणेश्वर मन्दिर में भगवान श्रीरामकृष्ण बलराम आदि भक्तों के साथ बैठे हैं । १८८५ ई., ७ मार्च, दिन के ३-४ बजे का समय होगा ।
भक्तगण श्रीरामकृष्ण की चरणसेवा कर रहे हैं, - श्रीरामकृष्ण थोड़ा हँसकर भक्तों से कह रहे हैं - "इसका(अर्थात् चरणसेवा का) विशेष तात्पर्य है ।" फिर अपने हृदय पर हाथ रखकर कह रहे हैं, "इसके भीतर यदि कुछ है,(चरणसेवा करने पर) अज्ञान-अविद्या एकदम दूर हो जायगी ।"
.
एकाएक श्रीरामकृष्ण गम्भीर हुए, मानो कुछ गुप्त बात कहेंगे । भक्तों से कह रहे हैं, "यहाँ पर बाहर का कोई नहीं है । तुम लोगों से एक गुप्त बात कहता हूँ । उस दिन देखा, मेरे भीतर से सच्चिदानन्द बाहर आकर प्रकट होकर बोले, 'मैं ही युग-युग में अवतार लेता हूँ ।' देखा, पूर्ण आविर्भाव; सत्त्वगुण का ऐश्वर्य है ।"
.
भक्तगण ये सब बातें विस्मित होकर सुन रहे हैं; कोई कोई गीता में कहे हुए भगवान श्रीकृष्ण के महावाक्य की याद करा रहे हैं –
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्म संस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥
.
दूसरे एक दिन, १ सितम्बर १८८५, जन्माष्टमी के दिन नरेन्द्र आदि भक्त आये हैं । श्री गिरीश घोष दो-एक मित्रों को साथ लेकर गाड़ी करके दक्षिणेश्वर में उपस्थित हुए । वे रोते रोते आ रहे हैं । श्रीरामकृष्ण स्नेह के साथ उनकी देह थपथपाने लगे । गिरीश सिर उठाकर हाथ जोड़कर कह रहे हैं, "आप ही पूर्ण ब्रह्म हैं । यदि ऐसा न हो तो सभी झूठा है । बड़ा खेद रहा कि आपकी सेवा न कर सका । वरदान दीजिये न भगवन्, कि एक वर्ष आपकी सेवाटहल करूँ ।"
.
बार बार उन्हें ईश्वर कहकर स्तुति करने से श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं, "ऐसी बात नहीं कहनी चाहिए । भक्तवत् न च कृष्णवत्; तुम जो कुछ सोचते हो, सोच सकते हो । अपने गुरु भगवान तो हैं, तो भी ऐसी बात कहने से अपराध होता है ।"
गिरीश फिर श्रीरामकृष्ण की स्तुति कर रहे हैं, "भगवन्, मुझे पवित्रता दो, जिससे कभी रत्तीभर भी पाप-चिन्तन न हो ।"
.
श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं - "तुम तो पवित्र हो, - तुम्हारी विश्वास-भक्ति जो है ।"
१ मार्च १८८५ ई. होली के दिन नरेन्द्र आदि भक्तगण आये हैं । उस दिन श्रीरामकृष्ण नरेन्द्र को संन्यास का उपदेश दे रहे हैं और कह रहे हैं, "भैया, कामिनी-कांचन न छोड़ने से नहीं होगा । ईश्वर ही एकमात्र सत्य है और सब अनित्य ।" कहते कहते वे भावपूर्ण हो उठे । वही दयापूर्ण सस्नेह दृष्टि ।
.
भाव में उन्मत्त होकर गाना गाने लगे –
संगीत - (भावार्थ) - "बात करने में डरता हूँ", आदि ।
मानो श्रीरामकृष्ण को भय है कि कहीं नरेन्द्र किसी दूसरे का न हो जाय, कहीं ऐसा न हो कि मेरा न रहे - भय है, कहीं नरेन्द्र घर-गृहस्थी का न बन जाय । 'हम जो मन्त्र जानते हैं, वही तुम्हें दिया', अर्थात् जीवन का सर्वश्रेष्ठ आदर्श - सब कुछ त्यागकर ईश्वर के शरणागत बन जाना - यह मन्त्र तुझे दिया ।
.
नरेन्द्र आँसूभरी आँखों से देख रहे हैं ।
श्रीरामकृष्ण नरेन्द्र से कह रहे हैं, "क्या गिरीश घोष ने जो कुछ कहा, वह तेरे साथ मिलता है ?"
नरेन्द्र - मैंने कुछ नहीं कहा, उन्होंने ही कहा कि उनका विश्वास है कि आप अवतार हैं । मैंने और कुछ भी नहीं कहा ।
श्रीरामकृष्ण - परन्तु उसमें कैसा गम्भीर विश्वास है ! देखा ?
.
कुछ दिनों के बाद अवतार के विषय में नरेन्द्र के साथ श्रीरामकृष्ण का वार्तालाप हुआ । श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं, - "अच्छा, कोई-कोई जो मुझे ईश्वर का अवतार कहते हैं - तू क्या समझता है ?"
नरेन्द्र ने कहा, "दूसरों की राय सुनकर मैं कुछ भी नहीं कहूँगा; मैं स्वयं जब समझूँगा तब मेरा विश्वास होगा, तभी कहूँगा ।"
(क्रमशः)

*३. श्री गुरुदेव का अंग ~ २५/२८*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
.
*३. श्री गुरुदेव का अंग ~ २५/२८*
.
*गुरु दादू का हाथ शिर, हृदय त्रिभुवन नाथ ।*
*रज्जब डरिये कौन सौं, मिल्या सहायक साथ ॥२५॥*
मेरे शिर पर गुरुदेव दादूजी का हस्त है, और हृदय में त्रिलोक के स्वामी परमात्मा हैं, गुरु दादूजी की कृपा से सदा साथ रहने वाले परमात्मा सहायक मिल गये हैं, अब किससे डर सकता हूँ ?
.
*गुरु दादू की गति गहै, ता शिर मोटे भाग ।*
*जन रज्जब युग युग सुखी, पावे परम सुहाग ॥२६॥*
२६ - २९ में दादूजी की साधन पद्धति ग्रहण करने वाले को बड़भागी बता रहे हैं - यदि कोई गुरुदेव दादू जी की साधु रूप चाल को ग्रहण करता है तो, जानना चाहिये उसके शिर पर सौभाग्य के अंक अंकित है, वह परब्रह्म प्राप्ति रूप सौभाग्य को प्राप्त करके प्रति युग सुखी रहेगा ।
.
*शब्द सुरति गुरु शिष्य है, मिले श्रवण सु स्थान ।*
*भाव भेंट परि दया दत, रज्जब दे ले जान ॥२७॥*
शब्द ही गुरु हैं और वृत्ति ही शिष्य है । शब्द वक्ता के मुख से आता है और वृत्ति अन्त:करण से आती है, दोनों का मिलन श्रवण रूप सुन्दर स्थान पर होता है, वृत्ति -शिष्य भाव रूप भेंट देता है तब शब्द गुरु से दया पूर्वक ज्ञान रूप दान लेता है । शब्द और वृत्ति ही यथार्थ गुरु शिष्य हैं यह बात सत्य जानो ।
.
*सर्वस्व दे सर्वस्व लिया, शिष सद्गुरु कने१ आय ।*
*रज्जब महद मिलाप की, महिमा कही न जाय ॥२८॥*
शिष्य सद्गुरु के पास१ जाकर अपना तन, मन, धनादि सब कुछ गुरु के समर्पण करता है तब भक्ति, योग, ज्ञानदिक जो भी गुरु के पास होता है, वह सब कुछ प्राप्त करता है । इस गुरु और शिष्य के महान मिलन की महिमा इतनी महान है कि मुख से तो कही नहीं जा सकती ।
(क्रमशः) 

सोमवार, 5 जनवरी 2026

वामाचार

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
.
*जीवत लूटै जगत सब, मृतक लूटैं देव ।*
*दादू कहाँ पुकारिये, कर कर मूये सेव ॥*
.
साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
==================
(९)स्त्रियों को लेकर साधना(वामाचार) के सम्बन्ध में श्रीरामकृष्ण और स्वामीजी के उपदेश ~
स्वामी विवेकानन्द एक दिन दक्षिणेश्वर मन्दिर में श्रीरामकृष्णदेव का दर्शन करने गये थे । भवनाथ व बाबूराम आदि उपस्थित थे । २९ सितम्बर १८८४ । घोषपाड़ा तथा पंचनामी के सम्बन्ध में नरेन्द्र ने बात चलायी और पूछा, "स्त्रियों को लेकर वे लोग कैसी साधना करते हैं ?"
.
श्रीरामकृष्णदेव ने कहा, "ये सब बातें तुझे सुननी न चाहिए । घोषपाड़ा, पंचनामी और भैरव-भैरवी ये लोग ठीक-ठीक साधना नहीं कर सकते, पतन होता है । ये सब पथ मैले हैं, अच्छे पथ नहीं हैं । शुद्ध पथ पर चलना ही ठीक है । वाराणसी में एक व्यक्ति मुझे भैरवी-चक्र में ले गया था । एक-एक भैरव, और एक-एक भैरवी । वे मुझे शराब पीने के लिए कहने लगे । मैंने कहा, 'माँ, मैं शराब छू नहीं सकता ।' 
.
वे सब शराब पीने लगे । मैंने सोचा, अब शायद जप-ध्यान करेंगे । लेकिन नहीं, मदिरा पीकर नाचना शुरू कर दिया ।" नरेन्द्र से उन्होंने फिर कहा, "बात यह है, मेरा भाव है मातृ-भाव - सन्तानभाव । मातृभाव अत्यन्त विशुद्ध भाव है, इसमें कोई डर नहीं है । स्त्री-भाव, वीरभाव बहुत कठिन है, ठीक-ठीक रखा नहीं जा सकता, पतन होता है । तुम लोग अपने लोग हो, तुम लोगों से कहता हूँ – मैंने अन्त में यही समझा है - वे पूर्ण हैं, मैं उनका अंश हूँ । वे प्रभु हैं, मैं उनका दास हूँ । फिर कभी कभी सोचता हूँ, वह ही मैं, मैं ही वह । और भक्ति ही सार है ।"
.
एक दूसरे दिन(९ सितम्बर १८८३ ई.) दक्षिणेश्वर में श्रीरामकृष्ण भक्तों से कह रहे हैं, "मेरा है सन्तान-भाव । अचलानन्द बीच-बीच में यहाँ पर आकर ठहरता था, खूब मदिरा पीता था । स्त्री लेकर साधन को मैं अच्छा नहीं कहता था, इसलिए उसने मुझसे कहा था, 'भला तुम वीर-भाव का साधन क्यों नहीं मानोगे ? तन्त्र में जो है । - शिवजी का लिखा नहीं मानोगे ? उन्होंने(शिवजी ने) सन्तान-भाव कहा है, फिर वीरभाव भी बताया है ।'
.
"मैंने कहा, 'कौन जाने भाई, मुझे वह सब अच्छा नहीं लगता - मेरा सन्तान-भाव ही रहने दो ।'
"उस देश में भगी तेली को इस दल में देखा था - वही औरत लेकर साधन । फिर एक पुरुष के हुए बिना औरत का साधन-भजन न होगा । उस पुरुष को कहते हैं 'रागकृष्ण' । तीन बार पूछता है, 'कृष्ण तूने पा लिया ?' वह औरत भी तीन बार कहती है, 'मैने कृष्ण पा लिया ।' 
.
एक दूसरे दिन २३ मार्च १८८४ ई. को श्रीरामकृष्ण राखाल, राम आदि भक्तों से कह रहे हैं - "वैष्णवचरण का वामाचारी मत था । मैं जब उधर श्यामबाजार में गया था तो उनसे कहा, 'मेरा मत ऐसा नहीं है ।' मेरा मातृभाव है । देखा कि लम्बी लम्बी बातें बनाता है और फिर साथ ही व्यभिचार भी करता है । वे लोग देवपूजा, मूर्तिपूजा, पसन्द नहीं करते । जीवित मनुष्य चाहते हैं । उनमें से कई राधातन्त्र का मत मानते हैं; पृथ्वीतत्त्व, अग्नितत्त्व, जलतत्त्व, वायुतत्त्व, आकाशतत्त्व -  विष्ठा, मूत्र, रज, वीर्य, ये ही सब तत्त्व, यह साधन बहुत मैला साधन है; जैसे पैखाने के रास्ते से मकान में प्रवेश करना ।"
.
श्रीरामकृष्ण के उपदेशानुसार स्वामी विवेकानन्द ने भी वामाचार की खूब निन्दा की है । उन्होंने कहा है, "भारतवर्ष के प्रायः सभी स्थानों में विशेष रूप से बंगाल प्रान्त में, गुप्त रूप से अनेक व्यक्ति ऐसी साधना करते हैं । वे वामाचार तन्त्र का प्रमाण दिखाते हैं । उन सब तन्त्रों का त्याग कर लड़कों को उपनिषद, गीता आदि शास्त्र पढ़ने को देना चाहिए ।"
.
स्वामी विवेकानन्द ने विलायत से लौटने के बाद शोभाबाजार के स्व. राधाकान्त देव के देव-मन्दिर में वेदान्त के सम्बन्ध में एक सारगर्भित भाषण दिया था, उसमें औरतों को लेकर साधना करने की निन्दा करके निम्नलिखित बातें कही थीं -
"...यह घृण्य वामाचार छोड़ो, जो देश का नाश कर रहा है । तुमने भारत के अन्यान्य भाग नहीं देखे । 
.
जब में देखता हूँ कि हमारे समाज में कितना वामाचार फैला हुआ है, तब उन्नति का इसे बड़ा गर्व रहने पर भी मेरी नजरों में यह अत्यन्त गिरा हुआ मालूम होता है । इन वामाचार सम्प्रदायों ने मधुमक्खियों की तरह हमारे बंगाल के समाज को छा लिया है । वे ही, जो दिन को गरजते हुए आचार के सम्बन्ध में प्रचार करते हैं, रात को घोर पैशाचिक कृत्य करने से बाज नहीं आते, और अति भयानक ग्रन्थसमूह उनके कर्म के समर्थक हैं । 
.
इन्हीं शास्त्रों की आज्ञा मानकर वे उन घोर दुष्कर्मों में हाथ देते हैं । तुम बंगालियों को यह विदित है । बंगालियों के शास्त्र वामाचार-तन्त्र हैं । ये ग्रन्थ ढेरों प्रकाशित होते हैं, जिन्हें लेकर तुम अपनी सन्तानों के मन को विषाक्त करते हो, किन्तु उन्हें श्रुतियों की शिक्षा नहीं देते । ऐ कलकत्तावासियों, क्या तुम्हें लज्जा नहीं आती कि अनुवादसहित वामाचार-तन्त्रों का यह बीभत्स संग्रह तुम्हारे बालकों और बालिकाओं के हाथ रखा जाय, उनका चित्त विषविह्वल हो और वे जन्म से यही धारणा लेकर पलें कि हिन्दुओं के शास्त्र ये वामाचार ग्रन्थ हैं ? 
.
यदि तुम लज्जित हो तो अपने बच्चों से उन्हें अलग करो, और उन्हें यथार्थ शास्त्र - वेद, गीता, उपविषद् - पढ़ने दो । ..." 
-'भारत में विवेकानन्द' से उद्धृत
.
काशीपुर बगीचे में श्रीरामकृष्ण जब (१८८६ ई.) बीमार थे, तो एक दिन नरेन्द्र को बुलाकर बोले, 'भैया, यहाँ पर कोई शराब न पीये । धर्म के नाम पर मदिरा पीना ठीक नहीं; मैंने देखा है, जहाँ ऐसा किया गया है, वहाँ भला नहीं हुआ ।'
(क्रमशः)

जयपुर नरेश की रसोई ~

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
.
१२ आचार्य नारायणदास जी ~
.
जयपुर नरेश की रसोई ~
वि. सं. १९०९ कार्तिक कृष्णा १ को जयपुर नरेश सवाई रामसिंहजी ने आचार्य नारायणदासजी महाराज को शिष्य मंडल के सहित भोजनार्थ निमंत्रण देकर जिमाने के लिये सत्कार पूर्वक अपने बादल महल में बुलाया और विधि सहित भोजन कराकर ११ स्वर्ण मुद्रा, दुशाला आदि भेंट दी और उदयपुरिया ग्राम भी आचार्यजी के समर्पण किया कहा भी है - 
जैपुर नरपति रामने, पधराये निज धाम । 
भक्ति भाव पद पूजके, भेंट चढायो ग्राम ॥
(दादू चरित्र चन्द्रिका) 
.
उसका पट्टा वि. सं. १९१० फाल्गुण कृष्णा १२ को होकर नारायणा दादूद्वारे में आचार्य नारायणदासजी महाराज के पास आया । नारायणा ग्राम से दक्षिण की ओर चार मील पर पांच सौ बीघा का बीड हैं, उस का पट्टा भी दादूद्वारे के नाम कर दिया गया । उसका पट्टा वि. सं. १९०९ आश्‍विन शुक्ला १५ को दादूद्वारे को दिया गया । पास के एक कुये पर माली लोग साधुओं को कष्ट देते थे । जयपुर नरेश को यह ज्ञात होने पर १९ बीघा भूमि के साथ कुआ शम्भू वाले का पट्टा भी राज्य से मिला । 
.
घाटडे के महन्त का सम्मान ~ 
वि. सं. १९०९ के नारायणा दादूद्वारे के मेले में आचार्य नारायणदासजी महाराज ने जमात के पंचों के आग्रह से घाटडा के महन्त हरिचरणजी की भेंट लेकर उनको छडी रखने का अधिकार दिया तथा जमातों के ११ अखाडों के महन्तों के समान ही घाटडे के महन्तों का सम्मान करना नियत किया ।
.
पूर्वाचार्यों की चरण प्रतिष्ठा ~ 
आचार्य नारायणादासजी महाराज ने अपने पूर्वाचार्य दिलेरामजी महाराज तथा प्रेमदासजी महाराज के चरणों की प्रतिष्ठा कराकर पूजा बांटी थी । इसी वर्ष सभी जमातों के भेष का धर्म अखाडा बना था और सब जमातों को मिठाई बांटी गई थी । बांटने में कोई भी प्रकार की त्रुटी नहीं होनी जाहिये, इसका पूरा पूरा ध्यान रखने की कर्मचारियों को आज्ञा दी । 
.
सांभर गमन ~ 
वि. सं. १९१० में आचार्य नारायणदासजी महाराज सांभर निजामत के ग्रामों में रामत करते हुये जब सांभर पहुँचे तब जयपुर तथा जोधपुर राज्य के हाकिम और नगर के भक्तों ने बाजे गाजे के साथ संकीर्तन करते हुये आचार्य नारायणदासजी महाराज की अगवानी की । आचार्यजी की मर्यादा के अनुसार प्रणामादि शिष्टाचार के पश्‍चात् संकीर्तन करते हुये नगर के मुख्य बाजार से नगर में लाये और श्री दादू मंदिर पर लाकर ठहराया । 
.
फिर आचार्य जी के प्रसाद बांटने पर शोभा यात्रा समाप्त हो गई और जब तक आचार्य नारायणदासजी महाराज सांभर में विराजे तब तक सांभर के भक्तों ने महाराज की सेवा का पूर्ण रुप से ध्यान रखा तथा अति प्रेम से सत्संग किया । सांभर के भक्तों की सेवा की सेवा श्‍लाघनीय रही । आचार्यजी जब सांभर से पधारने लगे तब उनकी मर्यादा के समान सस्नेह उनको विदा किया । 
(क्रमशः)

*१५. मन कौ अंग ४५/४८*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
.
*१५. मन कौ अंग ४५/४८*
.
मन ही बडौ कपूत है, मन ही महा सपूत । 
सुन्दर जौ मन थिर रहै, तौ मन ही अबधूत ॥४५॥
हमारा यह मन कभी कुकृत्य करता हुआ 'कपूत'(कुपुत्र) प्रतीत होने लगता है तथा कभी सत्कृत्य करता हुआ 'सपूत'(सुपुत्र) प्रतीत होता है । यदि यह मन स्थिर(एकाग्र) होकर भगवद्भजन में निरन्तर लगा रहे तो इसे 'अवधूत'(ज्ञानी, सिद्ध पुरुष) भी कहा जा सकता है ॥४५॥
.
मन ही यह बिस्तरि रह्यौ, मन ही रूप कुरूप । 
सुन्दर यहु मन जीव है, मन ही ब्रह्म स्वरूप ॥४६॥
श्रीसुन्दरदासजी महाराज कहते हैं - यह समस्त संसार हमारे मन का ही विस्तार है । इसी के कारण कभी हमें कोई वस्तु सुरूप(सुन्दर) दिखायी देती है, कभी कुरूप(असुन्दर) । यह मन अपने ही कृत्यों(कल्पनाओं) से कभी 'जीव'(संसार में मुग्ध) दिखायी देता है और कभी(संसार से विरक्ति दिखाता हुआ) यह 'ब्रह्म'(निरञ्जन, निराकार) रूप धारण कर लेता है ॥४६॥
.
सुन्दर मन मन सब कहैं, मन जान्यौ नहिं जाइ । 
जौ या मन कौं जांणिये, तौ मन मनहिं समाइ ॥४७॥
इस मन को सभी लोग 'मन' कहते हैं; परन्तु इस मन की यथार्थता(वास्तविकता) कोई नहीं जान पाता । जो बुद्धिमान् इस मन की वास्तविकता को जान ले तो वह मन को उसमें ही लीन(एकाग्र) कर सकता है ॥४७॥
.
मन कौ साधन एक है, निस दिन ब्रह्म बिचार । 
सुन्दर ब्रह्म बिचार तें, ब्रह्म होत नहिं बार ॥४८॥
इस मन को एकाग्र(स्थिर) करने का एकमात्र यही उपाय है कि साधक निरन्तर निरञ्जन निराकार प्रभु के ही चिन्तन में लगा रहे । इस निरञ्जन निराकार के चिन्तन से इस मन को निरञ्जन निराकार प्रभुमय होने में कोई विलम्ब नहीं लगता ॥४८॥
(क्रमशः)

*३. श्री गुरुदेव का अंग ~ २१/२४*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
.
*३. श्री गुरुदेव का अंग ~ २१/२४*
.
*गुरु दादू के दस्त१ में, जन रज्जब की जान ।*
*ज्यों राखे त्यों रहेंगे, सदक२ दिया सुबहान३ ॥२१॥*
मुझ शिष्य के प्राण गुरु दादू जी के हाथों१ में हैं, वे जैसे भी रक्खेंगे वैसे ही मैं रहूँगा । मैंने तो उन्हीं को परमेश्वर३ समझ कर उन पर अपने को निछावर२ कर दिया है ।
.
*आदि अंत मधि ह्वै गये, सिद्ध साधक शिरताज ।*
*जन रज्जब के जीव की, गुरु दादू को लाज ॥२२॥*
सृष्टि के आदि, मध्य और अन्त तक अर्थात मेरे जन्म तक साधकों के शिरोमणी अनेक सिद्ध हुये हैं, किन्तु मेरे जीवात्मा की मुक्ति करना रूप लाज तो श्री गुरु दादूजी को ही रखनी पड़ी है ।
.
*दादू के दीदार में, रज्जब मस्त मुरीद१ ।*
*खिल२ खाना३ कुरबान कर, कीया सखुन४ खरीद ॥२३॥*
गुरु दादू जी के दर्शन करने में ही मैं शिष्य१ मस्त रहता हूँ । निश्चय२ पूर्वक कहता हूँ मैंने अपने घर३, भोजनादि सभी दादू जी पर निछावर कर दिये हैं दादू जी ने अपने उपदेश रूप वचनों४ से मुझे खरीद लिया है ।
.
*गुरु दादू का ज्ञान गहि, रज्जब कीया गौन ।*
*तन मन इन्द्रिय अरी दलन मुंहडे आवे कौन ॥२४॥*
तन मन और इन्द्रियों को संयम में रखने वाला तथा कामादि शत्रुओं का नाशक गुरुदेव दादू जी का ज्ञान ग्रहण करके मैंने परब्रह्म प्राप्ति के मार्ग में गमन किया है, अतः मेरे को बीच में रोकने वाला मेरे सन्मुख कौन आ सकता है ? अर्थात कोई भी नहीं आ सकता ।
(क्रमशः)

रविवार, 4 जनवरी 2026

गीतोक्त कर्मयोग

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
.
*काया की संगति तजै, बैठा हरि पद मांहि ।*
*दादू निर्भय ह्वै रहै, कोई गुण व्यापै नांहि ॥*
.
साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
==================
केवल लोक-शिक्षा के लिए ईश्वर ने उनसे ये सब कर्म करा लिये । अब साधु या संसारी सभी सीखेंगे कि यदि वे भी कुछ दिन एकान्त में गुरु के उपदेशानुसार साधना करके ईश्वर की भक्ति प्राप्त करे, तो वे भी स्वामीजी की तरह निष्काम कर्म कर सकेंगे; सचमुच में अनासक्त होकर दानादि सत्कर्म कर सकेंगे ।
.
स्वामीजी के गुरुदेव श्रीरामकृष्ण कहा करते थे, "हाथ में तेल मलकर कटहल काटने से हाथ न चिपकेगा ।" अर्थात् एकान्त में साधना के बाद भक्ति प्राप्त करके, ईश्वर का निर्देश पाकर लोकशिक्षा के लिए यदि संसार के काम में हाथ डाला जाय, तो ईश्वर की कृपा से यथार्थ में निर्लिप्त भाव से काम किया जा सकता है ।
.
स्वामी विवेकानन्द के जीवन को ध्यानपूर्वक देखने से 'एकान्त में साधना' तथा 'लोक-शिक्षा के लिए कर्म' किसे कहते हैं इसका पता लगा सकता है । स्वामी विवेकानन्द के ये सब कर्म लोक-शिक्षा के लिए थे ।
कर्मणैव हि संसिद्विमास्थिता जनकादयः ।
लोकसंग्रहमेवापि संपश्यन् कर्तुमर्हसि ॥
यह गीतोक्त कर्मयोग बहुत ही कठिन है । जनक आदि ने कर्म के द्वारा सिद्धि प्राप्त की थी ।
.
श्रीरामकृष्णदेव कहा करते थे कि जनक ने अपने सांसारिक जीवन के पूर्व, जंगल में एकान्त में बैठकर बहुत कठोर तपस्या की थी । इसलिए साधुगण ज्ञान और भक्ति का पथ अवलम्बन करके, संसार का कोलाहल छोड़कर एकान्त में ईश्वर-साधन करते हैं । स्वामी विवेकानन्द की तरह उत्तम अधिकारी वीर-पुरुष इस कर्मयोग के अधिकारी हैं ।
.
वे भगवान को अनुभव करते हैं, और साथ ही लोकशिक्षा के लिए, ईश्वर का आदेश पाकर संसार में कर्म करते हैं । इस प्रकार के महापुरुष संसार में कितने हैं ? ईश्वर के प्रेम में मतवाले, कामिनी-कांचन का दाग एक भी न लगा हो, परन्तु जीवसेवा के लिए व्यस्त होकर घूम रहे हैं, ऐसे आचार्य कितने देखने में आते हैं ?
.
स्वामीजी ने लन्दन में १० नवम्बर १८९६ को वेदान्त के कर्मयोग की व्याख्या करते हुए गीता का विवरण देते हुए कहा था –
"... और यह आश्चर्य की बात है कि इस उपदेश का केन्द्र है संग्राम-स्थल । यहीं श्रीकृष्ण अर्जुन को इस दर्शन का उपदेश दे रहे हैं और गीता के प्रत्येक पृष्ठ पर यही मत उज्ज्वल रूप से प्रकाशित है - तीव्र कर्मण्यता, किन्तु उसी के बीच अनन्त शान्तभाव । इसी तत्त्व को कर्मरहस्य कहा गया है और इस अवस्था को पाना ही वेदान्त का लक्ष्य है ।..."
- 'व्यावहारिक जीवन में वेदान्त' से उद्धृत
.
भाषण में स्वामीजी ने कर्म के बीच शान्त भाव की बात कही है । स्वामीजी रागद्वेष से मुक्त होकर कर्म कर सकते थे, यह केवल उनकी तपस्या के गुण तथा उनकी ईश्वरानुभूति के बल पर ही सम्भव था । सिद्धपुरुष अथवा श्रीकृष्ण की तरह अवतारीपुरुष हुए बिना यह स्थिरता तथा शान्ति प्राप्त नहीं होती ।
(क्रमशः)