रविवार, 1 फ़रवरी 2026

३. श्री गुरुदेव का अंग ~१२५/१२८*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी* टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*३. श्री गुरुदेव का अंग ~१२५/१२८*
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*माता पिता असंख्य ह्वैं, चौरासी के माँहिं ।* 
*रज्जब यह सौदा घणा, पर सद्गुरु मेला नाँहिं ॥१२५॥* 
चौरासी लक्ष योनियों में माता-पिता तो असंख्य मिल जाते हैं । अत: स्वजन मिलन रूप व्यापार तो संसार में बहुत अधिक है किन्तु सद्गुरु मिलन दुर्लभ है । 
*युवती जातक योनि बहु, चौरासी के बास ।* 
*जन रज्जब जिव को नहीं, सद्गुरु चरण निवास ॥१२६॥* 
चौरासी लक्ष योनियों में निवास के समय नारी, पुत्रादि तो बहुत प्राप्त होते हैं, किन्तु वहाँ पर प्राणी को सद्गुरु चरणों में निवास प्राप्त नहीं होता ।
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*मात पिता सुत नारि सौं, विष फल आवे हाथ ।*
*जन रज्जब गुरु की दया, सदा सु सांई साथ ॥१२७॥*
१२७ में माता पिता से गुरु की अधिकता बता रहे हैं - माता, पिता, पुत्र, नारी आदि स्वजनों से विषय रूप विष फल ही मिलता है किन्तु गुरुदेव की दया से सदा के लिये परब्रह्म का साथ मिलता है अर्थात प्राणी परब्रह्म रूप ही हो जाता है । 
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*सद्गुरु साधु न छोडिये, जे तू स्याणा दास ।* 
*रज्जब रहँट कहाँ रहे, जब ना वध ह्वै नास ॥१२८॥* 
१२८-१३० में गुरु-त्याग से हानि होती है यह कह रहे हैं - यदि तू चतुर सेवक है तो श्रेष्ठ सद्गुरु का त्याग कभी न करना । कारण - जैसे बैलों के नासिका में बँधी हुई रस्सी अरहट की हाल की खूंटी के न बंधी हो तो बैल अरहट के पास कहाँ रहेंगे ? मार्ग छोड़ देंगे । वैसे ही श्रेष्ठ सद्गुरु के चरणों में न रहेगा तो, भगवान के पास कहाँ रह सकेगा, वह परमार्थ पथ को छोड़कर संसार में ही जायेगा । 
(क्रमशः)

निवाई में चातुर्मास ~

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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१४ आचार्य गुलाबदासजी
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निवाई में चातुर्मास ~ 
वि. सं. १९३२ के चातुर्मास का निमंत्रण आचार्य गुलाबदासजी महाराज को निवाई जमात के पंचों ने दिया । आचार्य जी ने स्वीकार कर लिया । फिर चातुर्मास का समय समीप आने पर आचार्य गुलाबदासजी महाराज अपने शिष्य संतों के सहित निवाई पधारे । 
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निवाई जमात के पंचों के सहित अब जमात- नौबत, निशान, जंबूरे, बाजा, सजे हुये खंडेत आदि के सहित संकीर्तन करते हुये आचार्य गुलाबदासजी महाराज का सामेला करने गये । साष्टांग दंडवत सत्यराम करके बडे ठाट बाट से बाजे गाजे व संकीर्तन करते हुये निवाई के मुख्य बाजार से चले । खंडेत अपनी शस्त्र कला का प्रदर्शन करते जा रहे थे । नगर के नर नारियों की दोनों ओर दर्शनों के लिये भीड लगी थी ।
उक्त प्रकार नगर के नर नारियों को आचार्य जी के तथा संत मंडल के दर्शन कराते हुये शोभा यात्रा शनै: शनै: आगे बढ रही थी । नगर से निकल कर जमात में आये और नियत स्थान पर आचार्य जी को ठहराया । सेवा के लिये सेवक रख दिये गये । चातुर्मास का सत्संग आरंभ हो गया । 
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सत्संग के कार्यक्रम दोनों समय कथा, पद गायन, नाम संकीर्तन, आरती, ‘दादूराम’ मंत्र की ध्वनि आदि सब समय पर होने लगे । चातुर्मास अच्छा हुआ । समाप्ति पर आचार्य जी को मर्यादानुसार भेंट और सब को यथा- योग्य दस्तूर व संतों को वस्त्र देकर सस्नेह विदा किया ।
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मारवाड की रामत ~ 
निवाई का चातुर्मास करके आचार्य गुलाबदासजी महाराज नारायणा दादूधाम में पधार गये । फिर यहाँ से मारवाड की रामत के लिये प्रस्थान किया । मारवाड के निज समाज के साधुओं के स्थानों में तथा सेवकों में भ्रमण करते हुये उन्होंने दादूजी महाराज के रहस्यमय सिद्धांत एवं साधन समझाने का प्रयत्न किया तथा धार्मिक जनता को सत्संग द्वारा ईश्‍वर भक्ति में लगाने का कार्य करते रहे । बडे ग्रामों में अधिक ठहरते थे । व छोटे ग्रामों में कम ठहरते थे । उक्त प्रकार निर्गुण राम की भक्ति के संस्कार जमाने के लिये भ्रमण करते हुये पुन: नारायणा दादूधाम में पधार गये । 
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निर्माण कार्य ~ 
वि. सं. १९३१ में आचार्य गुलाबदासजी महाराज ने जयपुर में स्थान बनवाया था । वि. सं. १९३१ में ही नारायणा दादूधाम में श्री चैनरामजी महाराज की बारहदरी के आगे आचार्य गुलाबदासजी महाराज ने साईवान लगाया था जो अब तक विद्यमान है । 
(क्रमशः)  

*१८. सूरातन कौ अंग १७/१९*

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१८. सूरातन कौ अंग १७/१९*
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सुन्दर सोई सूरमा, लोट पोट ह्वै जाइ । 
बोट कछू राखै नहीं, चोट मुहें मुंह खाइ ॥१७॥
श्रीसुन्दरदासजी उसी पुरुष को सच्चा शूर वीर मानते हैं जो युद्ध करते हुए युद्ध - भूमि में ही गिर कर भी, बिना किसी आवरण के शत्रु पर आक्रमण करता रहे या अपने शरीर पर शत्रु का आक्रमण सहता रहे ॥१७॥
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सुन्दर सूरातन करै, छाडै तन को मोह । 
हबकि थबकि पेलै पिसण, जाइ चखाँवै लोह ॥१८॥
श्रीसुन्दरदासजी की दृष्टि में वही सच्चा वीर है जो अपने शरीर का मोह छोड़ कर आगे बढ़ बढ़ कर तीव्रता के साथ, वीरता का प्रदर्शन कर, शत्रुओं को शस्त्रों से मारता काटता रहे ॥१८॥
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सुन्दर फेरै सांगि जब, होइ जाइ बिकराल । 
सनमुख बांहै ताकि करि, मारै मीर मुछाल ॥१९॥ 
ऐसा वीर युद्ध में जब अपने वास्तविक रूप में आता है तो वह देखने में भयानक लगने लगता है । उस समय वह अपने सामने किसी भी मूंछों वाले (बलवान्) योद्धा को भी नगण्य समझता हुआ मार ही डालता है ॥१९॥
(क्रमशः)  

*श्रीरामकृष्ण का प्रेम तथा राखाल*

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🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*शब्दों मांहिं राम-रस, साधों भर दीया ।*
*आदि अंत सब संत मिलि, यों दादू पीया ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*श्रीरामकृष्ण का प्रेम तथा राखाल*
राखाल काली तपस्वी के कमरे में बैठे हुए हैं । पास ही प्रसन्न है । उसी कमरे में मास्टर भी हैं ।
राखाल अपनी स्त्री और लड़के को छोड़कर आये हैं । उनके हृदय में वैराग्य की गति तीव्र हो रही है । उन्हें एक यही इच्छा है कि अकेले नर्मदा के तट पर या कहीं अन्यत्र चले जायें । फिर भी वे प्रसन्न को बाहर भागने से समझा रहे हैं ।
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राखाल - (प्रसन्न से) - कहाँ तू बाहर भागता फिरता है ? यहाँ साधुओं का संग –
क्या इसे छोड़कर कहीं जाना होता है ? - तिसपर नरेन्द्र जैसे व्यक्ति का साथ छोड़कर ? यह सब छोड़कर तू कहाँ जायगा !
प्रसन्न - कलकत्ते में माँ-बाप हैं । मुझे भय होता है कि कहीं उनका स्नेह मुझे खींच न ले । इसीलिए कहीं दूर भाग जाना चाहता हूँ ।
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राखाल - श्रीगुरु महाराज जितना प्यार करते थे, क्या माँ-बाप उतना प्यार कर सकते हैं ? हम लोगों ने उनके लिए क्या किया है, जो वे हमें उतना चाहते थे ? क्यों वे हमारे शरीर, मन और आत्मा के कल्याण के लिए इतने तत्पर रहा करते थे ? हम लोगों ने उनके लिए क्या किया है ?
मास्टर - (स्वगत) अहा ! राखाल ठीक ही तो कह रहे हैं, इसीलिए उन्हें (श्रीरामकृष्ण को) अहेतुक कृपासिन्धु कहते हैं ।
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प्रसन्न - क्या बाहर चले जाने के लिए तुम्हारी इच्छा नहीं होती ?
राखाल - जी तो चाहता है कि नर्मदा के तट पर जाकर रहूँ । कभी कभी सोचता हूँ कि वहीं किसी बगीचे में जाकर रहूँ और कुछ साधना करूँ । कभी यह तरंग उठती है कि तीन दिन के लिए पंचतप करूँ; परन्तु संसारी मनुष्यों के बगीचे में जाने से हृदय इनकार भी करता है ।
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क्या ईश्वर हैं ?
'दानवों के कमरे' में तारक और प्रसन्न दोनों वार्तालाप कर रहे हैं । तारक की माँ नहीं है । उनके पिता ने राखाल के पिता की तरह दूसरा विवाह कर लिया है । तारक ने भी विवाह किया था, परन्तु पत्नी-वियोग हो गया है । मठ ही तारक का घर हो रहा है । प्रसन्न को वे भी समझा रहे हैं ।
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प्रसन्न - न तो ज्ञान ही हुआ और न प्रेम ही, बताओ क्या लेकर रहा जाय ?
तारक - ज्ञान होना अवश्य कठिन है परन्तु यह कैसे कहते हो कि प्रेम नहीं हुआ ?
प्रसन्न - रोना तो आया ही नहीं, फिर कैसे कहूँ कि प्रेम हुआ ? और इतने दिनों में हुआ भी क्या ?
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तारक - क्यों ? तुमने श्रीरामकृष्णदेव को देखा है या नहीं ? फिर यह क्यों कहें कि तुम्हें ज्ञान नहीं हुआ ?
प्रसन्न - क्या खाक होगा ज्ञान ? ज्ञान का अर्थ है जानना । क्या जाना ? ईश्वर है या नहीं इसी का पता नहीं चलता –
तारक - हाँ, ठीक है, ज्ञानियों के मत से ईश्वर है ही नहीं ।
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मास्टर - (स्वगत) – अहा ! प्रसन्न की कैसी अवस्था है ! श्रीरामकृष्ण कहते थे, "जो लोग ईश्वर को चाहते हैं, उनकी ऐसी अवस्था हुआ करती है । कभी कभी ईश्वर के अस्तित्व में सन्देह होता है ।' जान पड़ता है, तारक इस समय बौद्ध मत का विवेचन कर रहे हैं, इसीलिए शायद उन्होंने कहा - 'ज्ञानियों के मत से ईश्वर है ही नहीं ।' परन्तु श्रीरामकृष्ण कहते थे - 'ज्ञानी और भक्त, दोनों एक ही जगह पहुँचेंगे ।'
(क्रमशः)

शुक्रवार, 30 जनवरी 2026

नाभा गमन ~

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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१४ आचार्य गुलाबदासजी
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नाभा गमन ~ 
आचार्य गुलाबदासजी पटियाला से विदा होकर शिष्य संत मंडल के सहित विरचते हुये नाभा के पास पधारे तब आचार्य गुलाबदासजी महाराज ने अपने आने की सूचना नाभा नरेश हीरासिंहजी को दी । सूचना मिलने पर अपनी कुल परंपरा के अनुसार राजा हीरासिंहजी राजकीय लवाजमा तथा भक्त मंडल के सहित बाजे गाजे से संकीर्तन करते हुये आचार्य गुलाबदासजी की अगवानी करने आये । 
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मर्यादानुसार भेंट चढा, प्रणामकर के आवश्यक  प्रश्‍नोत्तर शिष्टाचार के पश्‍चात् आचार्य गुलाबदासजी महाराज को अति सत्कार से संकीर्तन करते हुये नगर में ले गये और नगर के मुख्य बाजार से ले जाकर नियत स्थान पर ठहराया । राजा हीरासिंहजी ने संत सेवा का अच्छा प्रबन्ध कर दिया । यहां भी कुछ दिन अच्छा सत्संग रहा और आचार्य गुलाबदासजी महाराज पधारने लगे तब राजा प्रजा ने सस्नेह भेंट देकर विदा किया ।  
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जीन्द राजा द्वारा सम्मान ~ 
नाभा से विदा होकर आचार्य गुलाबदासजी महाराज अपने शिष्य संत मंडल के सहित विचरते हुये जीन्द राज्य की राजधानी के पास आये तब अपनी मर्यादानुसार जीन्द नरेश रघुवीरसिंहजी को अपने आने की सूचना दी । 
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तब राजा रघुवीरसिंहजी अपनी को कुल मर्यादा के अनुसार राजकीय लवाजमा तथा भक्त मंडल के सहित बाजे गाजे के साथ संकीर्तन करते हुये आचार्य गुलाबदासजी महाराज की अगवानी करने गये । मर्यादापूर्वक भेंट चढा, प्रणामादि शिष्टाचार के पश्‍चात् अति सत्कार से संकीर्तन करते हुये नगर के मुख्य बाजार से ले जाकर नियत स्थान पर ठहराया । 
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सेवा का प्रबन्ध कर दिया गया । आचार्य गुलाबदासजी महाराज वहां ठहरे तब तक राजा, राजपरिवार तथा जनता ने सत्संग का आनन्द प्राप्त किया । वहां से पधारने लगे तब राजा प्रजा ने सप्रेम भेंट देकर विदा किया । फिर आप भ्रमण करते हुये तथा धार्मिक  जनता को निर्गुण ब्रह्म की भक्ति का उपदेश करते हुये नारायणा दादूधाम में पधार गये । 
(क्रमशः) 

*१८. सूरातन कौ अंग १३/१६*

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१८. सूरातन कौ अंग १३/१६*
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सुन्दर धरती धडहडै, गगन लगै उडि धूरि । 
सूर बीज धीरज धरै, भागि जाइ भकभूरि ॥१३॥
भले ही युद्धभूमि में किसी समय ऐसी स्थिति आ जाय कि भय के कारण भागते हुए हाथियों के पैरों की धमक से पृथ्वी थर्रा उठे, या घोडों की टाप से उड़ी धुल से आकाश मटमैला हो जाय; वैसी स्थिति में भी शूर वीर पुरुष उस युद्धभूमि में धैर्य के साथ डटा रहता है, परन्तु कायर(डरपोक) आदमी भाग जाता है ॥१३॥
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सुन्दर बरछी झलहलैं, छूटै बहु दिसि बांण । 
सूरा पडै पतंग ज्यौं, जहां होइ घंमसांण ॥९४॥
किसी घनघोर युद्ध में चारों ओर भाले चमक रहे हों, या बाणों की बौछार हो रही हो, ऐसी भयङ्कर स्थिति में भी वीर पुरुष अपने शत्रुओं पर, दीपक पर पतङ्ग के समान टूट पड़ता है ॥१४॥
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सुन्दर बाढाली बहैं, होई कडाकडि मार । 
सूर बीर सनमुख रहैं, जहाँ षलक्ंकै सार ॥१५॥
भले ही किसी भयानक युद्ध में तीक्ष्ण धार वाली तलवारों(बाढाली) या अन्य शस्त्रों से सब ओर योद्धा मारे जा रहे हों, ऐसे समय में भी वह वीर वहाँ छाती तान कर शत्रु का दृढता से विरोध करता ही रहता है ॥१५॥
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सुन्दर देखि न थरहरै, हहरि न भागै बीर । 
गहर बड़े घंमसांण मैं, कहर धरै को धीर ॥१६॥
सच्चा वीर किसी युद्ध की भयानकता देख कर भी न काँपता है, न डरता या भागता है; अपितु वह उस युद्ध में आगे से आगे बढ़ता ही जाता है, घबराता नहीं है ॥१६॥
(क्रमशः) 

*नरेन्द्र तथा शरणागति*

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🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*दादू राम हृदय रस भेलि कर,*
*को साधु शब्द सुनाइ ।*
*जानो कर दीपक दिया,*
*भ्रम तिमिर सब जाइ ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*नरेन्द्र तथा शरणागति*
नरेन्द्र वार्तालाप कर रहे हैं । मास्टर भीतर नहीं गये । बड़े घर के पूर्व ओरवाले दालान में टहलते रहे, कुछ अंश सुनायी पड़ रहा था ।
नरेन्द्र कह रहे हैं, 'सन्ध्यादि कर्मों के लिए न तो अब स्थान ही है, न समय ही ।'
एक सज्जन - क्यों महाशय, साधना करने से क्या वे मिलेंगे ।
नरेन्द्र - उनकी कृपा ।
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गीता में कहा है –
"ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेर्जुन तिष्ठति ।
भ्रामयन् सर्वभूतानि यन्त्रारूढ़ानि मायया ॥
तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत ।
तत्प्रसादात् परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम् ॥"
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“उनकी कृपा के बिना हुए साधन-भजन कहीं कुछ नहीं होता । इसलिए उनकी शरण में जाना चाहिए ।"
सज्जन - हम लोग यदा-कदा यहाँ आकर आपको कष्ट देंगे ।
नरेन्द्र - जरूर, जब जी चाहे, आया कीजिये ।
"आप लोगों के वहाँ, गंगा-घाट में हम लोग नहाने के लिए जाया करते हैं ।"
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सज्जन - इसके लिए हमारी ओर से कोई रोक-टोक नहीं । हाँ, कोई और न जाया करे ।
नरेन्द्र - नहीं, अगर आप कहें तो हम भी न जाया करें ।
सज्जन - नहीं, नहीं, ऐसी बात नहीं; परन्तु हाँ, अगर आप देखें कि कुछ और लोग भी जा रहे हैं तो आप न जाइयेगा ।
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सन्ध्या के बाद फिर आरती हुई । भक्तगण फिर हाथ जोड़कर एकस्वर से 'जय शिव ओंकार' गाते हुए श्रीरामकृष्ण की स्तुति करने लगे । आरती हो जाने पर भक्तगण दानवों के कमरे में जाकर बैठे । मास्टर बैठे हुए हैं । प्रसन्न गुरुगीता का पाठ करके सुनाने लगे । नरेन्द्र स्वयं आकर सस्वर पाठ करने लगे । नरेन्द्र गा रहे हैं –
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"ब्रह्मानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिम्
द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्त्वमस्यादिलक्ष्यम् ।
एकं नित्यं विमलमचलं सर्वदा साक्षिभूतम्
भावातीतं त्रिगुणरहितं सद्वरुं तं नमामि ।"
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फिर गाते हैं –
"न गुरोरधिकं न गुरोरधिकम् । 
शिवशासनतः शिवशासनतः ॥
श्रीमत् परं ब्रह्म गुरुं वदामि । 
श्रीमत् परं ब्रह्म गुरुं भजामि ॥
श्रीमत् परं ब्रह्म गुरुं स्मरामि । 
श्रीमत् परं ब्रह्म गुरुं नमामि ॥"
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नरेन्द्र सस्वर गीता का पाठ कर रहे हैं और भक्तों का मन उसे सुनते हुए निर्वात निष्कम्प दीप-शीखा की भाँति स्थिर हो गया । श्रीरामकृष्ण सत्य कहते थे कि 'बंसी की मधुर ध्वनि सुनकर सर्प जिस तरह फन खोलकर स्थिर भाव से खड़ा रहता है, उसी प्रकार नरेन्द्र का गाना सुनकर हृदय के भीतर जो हैं, वे भी चुपचाप सुनते रहते हैं ।' अहा ! मठ के भाइयों की गुरु के प्रति कैसी तीव्र भक्ति है !
(क्रमशः)

*३. श्री गुरुदेव का अंग ~१२१/१२४*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी* टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*३. श्री गुरुदेव का अंग ~१२१/१२४*
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*मन वच्छ ह्वै चूंखिये, सद्गुरु सुरही१ जाय ।*
*रज्जब पीवे थूण२ दे, दीरघ दरवे गाय ॥१२१॥*
जैसे वच्छा गो१ के स्तनों को पकड़ कर थोबे२ देदे कर दूध चूंखता है तब गो अधिक दूध देती है । वैसे ही साधक ज्ञान प्राप्ति की इच्छा मन में करके गुरु के पास जाता है और शंका होने पर बारम्बार पूछता रहता है तो उसे महान ज्ञान प्राप्त होता है ।
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*सुसंवेद१ गुरु ज्ञान मैं, शिष शिक्षा पढ़ लेय ।*
*जैसे दरपन देखते, दर्श दिखाइ देय ॥१२२॥*
१२२ में योग्य शिष्य ज्ञान प्राप्त करता है यह कहते हैं - गुरु के ज्ञान में भली प्रकार अनुभव१ रहता है । शिष्य जब गुरु-शब्दों को पढ़ता है, तब ही उनसे ज्ञान की शिक्षा मिलती है और जैसे दर्पन देखते ही अपने मुख का दर्शन होता है, वैसे ही ज्ञान द्वारा देखने से ब्रह्म साक्षात्कार होता है ।
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*गुरु घर माँही धन घणा, शिष संग्रह्या न जाय ।*
*जब लग लक्षण न लेन के, युक्ति न उपजे आय ॥१२३॥*
१२३ में अयोग्य शिष्य ज्ञान धारण नहीं कर सकता यह कह रहे हैं - गुरु के अंत:करण रूप घर में ज्ञान तो बहुत है किन्तु जब तक शिष्य के अंत:करण में ज्ञान लेने योग्य युक्ति और लक्षण उत्पन्न नहीं होते तब तक शिष्य से ज्ञान ग्रहण नहीं किया जाता ।
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*बहुत बार बेटे भये, परि पिता न पाया आप ।*
*जन रज्जब जन्मे नहीं, जे गुरु मिल्या न बाप ॥१२४॥*
१२४-१२६ में गुरु की दुर्लभता बता रहे हैं - अनंत बार पुत्र रूप में उत्पन्न तो हुये किन्तु स्वयं गुरु रूप पिता तो अभी तक मिल न सके । यदि गुरु-पिता न मिले तो जन्म होने पर भी नहीं होने के समान ही है, कारण - गुरु द्वारा परमात्मा की प्राप्ति के लिये ही मनुष्य जन्म है । प्रभु प्राप्त न हुये तो नर जन्म निष्फल है ।
(क्रमशः)

गुरुवार, 29 जनवरी 2026

१४ आचार्य गुलाबदासजी

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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बारहवां १२ अध्याय~१४ आचार्य गुलाबदासजी
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आचार्य उदयरामजी महाराज के ब्रह्मलीन होने के पश्‍चात् उनके शिष्य गुलाबदासजी महाराज को सब समाज ने मिलकर आश्‍विन कृष्णा १३ बृहस्पतिवार वि. सं. १९३१ को गद्दी पर बैठाया । आपके टीके के दस्तूर पर जयपुर नरेश रामसिंहजी ने घोडा, दुशाला, १००) रु. भेजे । अलवर नरेश मंगलसिंहजी ने हाथी, दुशाला, शिरोपाव, मलमल का  थान आदि भेजे । 
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जोधपुर नरेश ने दुशाला, पारचा थान, १००) रु. भेजे । खेतडी नरेश ने दुशाला, नैन सुख थान, १००) रु. भेजे ।नारायणा दादूद्वारे के मेले पर आचार्य गुलाबदासजी महाराज ने अपने गुरुदेव आचार्य उदयरामजी महाराज के निमित्त दश हजार रुपये व्यय कर के सब समाज के आये हुये साधुओं को भोजन कराया तथा उन्नीस हजार रुपये पूजा में बांटे ।
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उतराध(हरियाणा) की रामत ~ 
वि. सं. १९३२ में आचार्य गुलाबदासजी महाराज ने अपने शिष्य संत मंडल के सहित उतराध की रामत की । उतराध के स्थानधारी साधुओं ने तथा सेवकों ने आपका सत्कार किया । उतराध के सभी संतों तथा सेवकों को अपने दर्शन तथा सत्संग से आनन्दित करते हुये आप पटियाला के पास पहुँचे । 
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पटियाला गमन ~
पटियाला नगर के बाहर ठहरकर पटियाला नरेश को अपनी मर्यादा के अनुसार अपने आने की सूचना दी । सूचना मिलने पर पटियाला नरेश महेन्द्रसिंहजी राजकीय लवाजमा तथा भक्त मंडल के सहित बाजे गाजे से संकीर्तन करते हुये आचार्य गुलाबदासजी महाराज की अगवानी करने आये ।
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मर्यादानुसार भेंट चढाकर प्रणाम की और आवश्यक प्रश्‍नोत्तर रुप शिष्टाचार होने के पश्‍चात् अति सत्कार से बाजे गाजे और भक्त मंडल के साथ संकीर्तन करते हुये आचार्यजी को लेकर नगर में प्रवेश किया और नगर के मुख्य बाजार से जनता को आचार्यजी तथा संत मंडल के दर्शन कराते हुये नियत स्थान पर ले जाकर ठहराया । प्रसाद बांट कर शोभा यात्रा समाप्त की । 
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राजा महेन्द्रसिंहजी ने आचार्यजी की सेवा का पूरा- पूरा प्रबन्ध करा दिया और सत्संग आरंभ हो गया । पटियाला का राज परिवार व धार्मिक जनता सप्रेम सत्संग करने लगी । दादूजी महाराज की मधुर वाणी सुनकर सत्संगी लोग परमानन्द में निमग्न हो जाते थे । आचार्य गुलाबदासजी महाराज पटियाला में रहे तब तक अति से भक्त लोगों ने दादूवाणी श्रवण की और जब पधारने लगे तब राजा महेन्द्रसिंहजी ने तथा धार्मिक जनता ने सस्नेह मर्यादानुसार भेंट देकर विदा किया । 
(क्रमशः)  

*१८. सूरातन कौ अंग ९/१२*

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१८. सूरातन कौ अंग ९/१२*
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सीस उतारै हाथि करि, संक न आनै कोइ । 
ऐसै मंहगे मोल का, सुन्दर हरि रस होइ ॥९॥
इसी प्रकार प्रभुभक्ति का भाव भी बहुत मँहगा है । उसकी प्राप्ति हेतु अपना शिर शेष शरीर से पृथक् कर हाथ में लेना पड़े तब भी भक्त के लिये यह व्यापार कुछ हानिप्रद नहीं है ॥९॥
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सुन्दर तन मन आपनौ, आवै प्रभु कै काम । 
रण मैं तैं भाजै नहीं, करै न लौंन हराम ॥१०॥
महाराज श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - यदि कभी मन सहित यह समस्त शरीर प्रभु के हित में समर्पित होने की स्थिति आ जाय तो भी भक्तियुद्ध के वीर योद्धा को इस युद्ध से भागकर अपना विश्वासघात(नमकहरामी) नहीं प्रमाणित करना चाहिये ॥१०॥
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सुन्दर दोऊ दल जुरैं, अरु बाजै सहनाइ । 
सूरा कै मुख श्री चढै, काइर दे फिसकाइ ॥११॥
युद्ध की स्थिति आने पर रणभेरी बजने लगे तथा उभय पक्ष की सेनाएँ एक दूसरे के सम्मुख आकर खड़ी हो जायँ तो ऐसे समय में सच्चे वीर के मुख पर एक विशिष्ट कान्ति या आभा(श्री) चमकने लगती है; और कायर(डरपोक) लोग अपना मुख विचका कर वहाँ से भाग निकलने की सोचने लगते हैं ॥११॥
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सुन्दर हय हींसै जहां, गय गाजै चहुं फेर । 
काइर भागै सटकदे, सूर अडिग ज्यौं मेर ॥१२॥
जिस युद्धभूमि में चारों ओर घोड़े हिनहिना रहे हों, तथा हाथी चिंघाड़ रहे हों, यह सब भयप्रद स्थिति देख कर भले ही कायर लोग डर कर वहाँ से भाग जायँ, परन्तु वीर पुरुष वहाँ सुमेरु पर्वत के समान अचल हो जाता है ॥१२॥
(क्रमशः) 

*पिता-पुत्र संवाद । पहले माँ-बाप या पहले ईश्वर ?*

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🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*दादू कुसंगति सब परिहरै, मात पिता कुल कोइ ।*
*सजन स्नेही बांधवा, भावै आपा होइ ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*पिता-पुत्र संवाद । पहले माँ-बाप या पहले ईश्वर ?*
श्रीयुत शशी के पिता आये हुए हैं । उनके पिता अपने लड़के को मठ से ले जाना चाहते हैं । श्रीरामकृष्ण की बीमारी के समय प्रायः नौ महीने तक लगातार शशी ने उनकी सेवा की थी । उन्होंने कालेज में बी. ए. तक अध्ययन किया था । प्रवेशिका में इन्हें छात्रवृत्ति मिली थी ।
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इनके पिता गरीब होने पर भी निष्ठावान् ब्राह्मण हैं और साधना भी करते हैं । शशी अपने माता-पिता के सब से बड़े लड़के हैं । उनके माता-पिता को बड़ी आशा थी कि ये लिख-पढ़कर रोजगार करके उनका दुःख दूर करेंगे; परन्तु इन्होंने ईश्वर-प्राप्ति के लिए सब को छोड़ दिया था । अपने मित्रों से ये रो-रोकर कहा करते थे, 'क्या करूँ, मेरी समझ में कुछ नहीं आता ! हाय ! माता-पिता की मैं कुछ भी सेवा न कर सका ।
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उन्होंने न जाने कितनी आशाएँ की थीं ! मेरी माता को अलंकार-आभूषण पहनने को नहीं मिले । मेरी कितनी साध थी कि उन्हें गहने पहनाऊँगा ! कहीं कुछ भी न हुआ । घर लौट जाना मुझे भार-सा जान पड़ता है । उधर श्रीगुरुमहाराज ने कामिनी-कांचन का त्याग करने के लिए कहा है । अब तो जाने की जगह रही ही नहीं ।'
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श्रीरामकृष्ण की महासमाधि के पश्चात् शशी के पिता ने सोचा, बहुत सम्भव है, अब वह घर लौटे; परन्तु कुछ दिन घर रहने के पश्चात् जब मठ स्थापित हुआ तब मठ में आते-जाते ही शशी सदा के लिए मठ में रह गये । जब से यह परिस्थिति हुई तब से उनके पिता उन्हें ले जाने के लिए प्रायः आया करते हैं । परन्तु शशी घर जाने का नाम भी नहीं लेते । आज जब उन्होंने यह सुना कि पिताजी आये हुए हैं, वे एक दूसरे रास्ते से नौ दो ग्यारह हो गये ताकि उनसे भेंट न हो ।
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उनके पिता मास्टर को पहचानते थे । वे मास्टर के साथ ऊपरवाले बरामदे में टहलते हुए उनसे बातचीत करने लगे ।
पिता - यहाँ कर्ता कौन है ? यही नरेन्द्र सारे अनर्थों का कारण जान पड़ता है । सब लड़के राजी-खुशी घर लौट गये थे । फिर से स्कूल-कालेज जाने लगे थे ।
मास्टर - यहाँ कर्ता(मालिक) कोई नहीं है । सब बराबर हैं । नरेन्द्र क्या करे ? बिना अपनी इच्छा के क्या कोई आ सकता है ? क्या हम लोग सदा के लिए घर छोड़कर आ सके हैं ?
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पिता - अजी, तुम लोगों ने तो अच्छा किया, क्योंकि दोनों तरफ की रक्षा कर रहे हो, तुम लोग जो कुछ कर रहे हो, इसमें धर्म नहीं है क्या ? हम लोगों की भी तो यही इच्छा है कि शशी यहाँ भी रहे और वहाँ भी रहे । देखो तो जरा, उसकी माँ कितना रो रही है !
मास्टर दुःखित होकर चुप हो गये ।
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पिता - और साधुओं की तलाश में इतना क्यों मारा-मारा फिरता है ? वह कहे तो मैं उसे एक अच्छे महात्मा के पास ले जाऊँ । इन्द्रनारायण के पास एक महात्मा आये हुए हैं, बहुत सुन्दर स्वभाव है । चलें, देखें न ऐसे महात्मा को !
राखाल और मास्टर काली तपस्वी के घर के पूर्व ओर के बरामदे में टहल रहे हैं । श्रीरामकृष्ण और उनके भक्तों के सम्बन्ध में वार्तालाप हो रहा है ।
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राखाल - (व्यस्त भाव से) - मास्टर महाशय, आइये, सब एक साथ साधना करें ।
"देखिये न, अब घर भी सदा के लिए छोड़ दिया है । अगर कोई कहता है, 'ईश्वर तो मिले ही नहीं, फिर क्यों अब यह सब हो रहा है ?' - तो इसका उत्तर नरेन्द्र बड़ा सुन्दर देता है । कहता है, 'राम नहीं मिले तो क्या इसलिए हमें श्याम (अमुक किसी भी) के साथ रहकर लड़के-बच्चों का बाप बनना ही होगा ?' अहा ! एक एक बात नरेन्द्र बड़े मार्के की कह देता है । जरा आप भी पूछियेगा ।"
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मास्टर - ठीक तो है । राखाल भाई, देखता हूँ, तुम्हारा मन भी खूब व्याकुल हो रहा है ।
राखाल - मास्टर महाशय, क्या कहूँ, दोपहर को नर्मदा जाने के लिए जी में कैसी विकलता थी । मास्टर महाशय, साधना कीजिये, नहीं तो कहीं कुछ न होगा । देखिये न, शुकदेव भी डरते थे । जन्मग्रहण करते ही भगे । व्यासदेव ने खड़े होने के लिए कहा, परन्तु वे खड़े भी नहीं होते थे ।
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मास्टर - योगोपनिषद् की कथा है । माया के राज्य से शुकदेव भाग रहे थे । हाँ, व्यास और शुकदेव की कथा बड़ी ही रोचक है । व्यास संसार में रहकर धर्म करने के लिए कह रहे थे । शुकदेव ने कहा, 'ईश्वर के पादपद्मों में ही सार है ।' और संसारियों के विवाह तथा स्त्री के साथ रहने पर उन्होंने घृणा प्रकट की ।
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राखाल - बहुतेरे सोचते हैं, स्त्री को न देखा तो बस फतह है । स्त्री को देखकर सिर झुका लेने से क्या होगा ? कल रात को नरेन्द्र ने खूब कहा, 'जब तक अपने भीतर काम है, तभी तक स्त्री की सत्ता है, अन्यथा स्त्री और पुरुष में कोई भेद नहीं रह जाता ।'
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मास्टर - ठीक है । बालक और बालिकाओं में यह भेद-बुद्धि नहीं रहती ।
राखाल - इसलिए तो कहता हूँ, हम लोगों को चाहिए कि साधना करें । माया के पार गये बिना ज्ञान कैसे होगा ? चलिये, बड़े कमरे में चलें । वराहनगर से कुछ शिक्षित मनुष्य आये हुए हैं । नरेन्द्र से उनकी क्या बातचीत हो रही है, चलिये सुनें ।
(क्रमशः)

*३. श्री गुरुदेव का अंग ~११७/१२०*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी* टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*३. श्री गुरुदेव का अंग ~११७/१२०*
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*माया पानी पुहमि१ घट, निकसे सकल मँझार ।*
*रज्जब रहै सुकुंभ में, घड्या सु गुरु के बार ॥११७॥*
जैसे पृथ्वी१ की मिट्टी तो कैसी भी हो जल निकल जाता है किन्तु कुंभकार के द्वारा तैयार किये हुये घड़े से नहीं निकलता । वैसे ही माया सभी के ह्वदय को छेद डालती है किन्तु गुरु के द्वार पर ज्ञानोपदेश द्वारा तैयार हुये अन्त:करण को नहीं छेद सकती अर्थात उसमे किसी प्रकार का विकार उत्पन्न नहीं कर सकती ।
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*सद्गुरु साधु सवित्त१ तहँ, वैरागर२ की खानि ।*
*रज्जब खोद विवेक सौं, तहाँ नहीं कछु हानि ॥११८॥*
सद्गुरु और संत भक्ति वैराज्ञादि रूप धन१ से युक्त हैं, उन्हीं में ज्ञान रूप हीरों२ की खानि है, हे साधक ! तू विवेक पूर्वक उनसे प्रश्न पूछनादिरूप खोदने की क्रिया कर तो तुझे लाभ ही होगा, वहां पर हानि तो कुछ नहीं होती ।
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*सद्गुरु पारस पौरसा१, अक्षय अभय भण्डार ।*
*रज्जब बचन विवेक धन, लहिये बारम्बार ॥ ११९॥*
सद्गुरु पारस और पूजा करके काटने से हाथ-पैरों का सुवर्ण प्रति दिन देने वाली स्वर्ण निर्मित मनुष्याकार मूर्ति१ के समान है, निर्भय करने वाले ज्ञान-धन के अक्षय भण्डार हैं । अत: विवेकपूर्वक उसके वचनों से ज्ञान-धन बारम्बार लेना चाहिये ।
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*ज्यो बहु रत्न समुद्र में, त्यों सद्गुरु शब्द धनाढि ।*
*मरजीवा ह्वै मांहि मिल, जन रज्जब वित१ काढि ॥१२०॥*
जैसे समुद्र में बहुत रत्न हैं, वैसे ही सद्गुरु भी भक्ति, वैराग्य, ज्ञानादि युक्त शब्द धन के धनाढ़य हैं किन्तु जो मरजीवा समुद्र में गोता लगाता है, उसे ही रत्न मिलते हैं । वैसे ही सद्गुरु के शब्दों में मन लगाता है वही ज्ञानादिक धन१ निकाल सकता है ।
(क्रमशः)

ब्रह्मलीन होना ~

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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ब्रह्मलीन होना ~ 
वि. सं. १९३१ आश्‍विन कृष्णा १० सोमवार को १८ वर्ष १० मास २७ दिन गद्दी पर विराज कर आचार्य उदयराम जी महाराज ब्रह्मलीन हुये थे । आपने- अपने समय में समाज का अच्छा संचालन किया था । आपके समय में समाज में सुखशांति की वृद्धि के साथ- साथ समाज की संख्या की भी वृद्धि हुई थी । 
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दादूवाणी का प्रचार भी आपने अच्छा किया था । आप अपने कर्तव्य का सुन्दर रुप से पालन करके ही ब्रह्मलीन हुये थे । आपकी चरण स्थापना पर १९२६०) रु. पूजार्थ साधुओं को वितरण किये गये थे ।  
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गुण गाथा ~ 
उदयराम आचार्य जी, थे शुभ गुण की खान । 
ऐसा ही उनके लिये, कहते संत सुजान ॥१॥
उदयराम के वचन में, आकर्षण सु विशेष । 
था सु प्रभावित होत थी, उनसे सभा अशेष ॥२॥
इससे दादू वाणी का, उनसे हुआ प्रचार । 
देश विदेशों में भले, सुखी हुये सब धार ॥३॥
परमार्थ रु व्यवहार में, अधिक कुशल थे आप । 
अपने युक्ति प्रमाण से, हरते पर की ताप ॥४॥
उदयराम आचार्य से, फूला फला समाज ।  
वे विशेष रखते रहे, शरणागत की लाज ॥५॥
उदयराम उपकार में, सदा बढाते हाथ ।
इस कारण ही सर्व मिल, देते उनको साथ ॥६॥
दादूवाणी की कथा, करते परम ललाम ।
उनसे सुनना चाहते, नर नारी सब धाम ॥७॥ 
संत रु सेवक सभी से, उदयराम का स्नेह । 
था उनको सब चाहते, ले जाना निज गेह ॥८॥
संतों की महिमा अमित, कौन पासके पार । 
‘नारायणा’ इस से करे, वन्दन बारंबार ॥९॥
इति श्री एकादश अध्याय समाप्त:  
(क्रमशः) 

१८. सूरातन कौ अंग ५/८*

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१८. सूरातन कौ अंग ५/८*
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घर मैं सब कोइ बंकुडा, मारहिं गाल अनेक । 
सुन्दर रण मैं ठाहरै, सूर बीर कौ एक ॥५॥
महाराज सुन्दरदासजी कहते हैं - घर में तो प्रत्येक मनुष्य स्वयं को रणवांकुरा(रणवीर) मानता हुआ अपनी वीरता की कपोलकल्पित कहानियाँ सुनाता रहता है; परन्तु सच्चा वीर तो हजारों में एक वहीं होता है जो किसी भयङ्कर युद्ध में आदि से अन्त तक ठहरकर वीरतापूर्वक युद्ध में संलग्न रहे ॥५॥
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सुन्दर सूरातन बिना, बात कहै मुख कोरि । 
सूरातन तब जाणिये, जाइ देत दल मोरि ॥६॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - कोई अपने शौर्य प्रदर्शन के विना केवल मुख से उस विषय में बड़ा चढ़ा कर हजार बातें कहता रहे तो उससे दूसरों को कोई हानि लाभ नहीं होगा । लोग उस की वास्तविक शूरता तो तभी मानेंगे जब वह किसी युद्ध में पहुँचते ही शत्रुओं को नष्ट करना आरम्भ कर दे ॥६॥
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सुन्दर सूरातन कठिन, यह नहिं हांसी खेल । 
कमधज कोई रुपि रहै, जबहिं होत मुख मेल ॥७॥
संसार में किसी का शूरवीर होना बहुत दुष्कर कर्म है, कोई हंसी-खेल नहीं है । अैसा कोई ही वीर होता है जो शत्रुसेना का सामना होते ही अपने शिर काटकर उसे हथेली पर रख कर(कमधज = कबन्धज बन कर) उस प्रबल सेना पर टूट पड़े ॥७॥
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सुन्दर सूरातन किये, जगत मांहिं जस होइ । 
सीस समर्पै स्याम कौं, संक न आनै कोइ ॥८॥
जो पुरुष अपनी ऐसी वीरता दिखाता है उसी का लोक में यश फैलता है । जो अपना सिर धड़ से पृथक होने की शङ्का न कर के भी शत्रु से युद्ध करता रहे - वही सच्चा वीर है ॥८॥
(क्रमशः)

बुधवार, 28 जनवरी 2026

*नरेन्द्र तथा धर्मप्रचार । ध्यानयोग और कर्मयोग*

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🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*घीव दूध में रमि रह्या, व्यापक सब ही ठौर ।*
*दादू वक्ता बहुत हैं, मथि काढैं ते और ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*नरेन्द्र तथा धर्मप्रचार । ध्यानयोग और कर्मयोग*
नरेन्द्र 'दानवों के कमरे' में बैठे हुए हैं । चुन्नीलाल, मास्टर तथा मठ के और भाई भी बैठे हुए हैं । धर्म-प्रचार की बातें होने लगी ।
मास्टर - (नरेन्द्र से) - विद्यासागर कहते हैं, 'मैं तो बेतों की मार खाने के डर से ईश्वर की बात किसी दूसरे से नहीं कहता ।'
नरेन्द्र - बेतों की मार खाने का क्या मतलब ?
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मास्टर - विद्यासागर कहते हैं, 'सोचो मरने के बाद हम सब ईश्वर के पास गये । सोचो कि केशव सेन को यमदूत ईश्वर के पास ले गये । केशव ने संसार में पाप भी किया है । जब यह सप्रमाण सिद्ध हुआ, तब बहुत सम्भव है, ईश्वर कहें कि इसे पच्चीस बेंत लगाओ । इसके बाद, सोचो, मुझे ले गये । मैं भी अगर केशव सेन के समाज में जाता हूँ, अन्याय करता हूँ, तो इसके लिए सम्भव है, आदेश हो कि इसको बेंत लगाओ ।
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तब, अगर मैं कहूँ कि केशव सेन ने ही मुझे इस तरह समझाया था, तो सम्भव है कि ईश्वर दूत से कहें, "केशव सेन को फिर ले आओ ।" केशव के आने पर सम्भव है, उससे वे पूछें - "क्या तूने इसे उपदेश दिया था ? खुद तो तू ईश्वर के सम्बन्ध में कुछ जानता नहीं और दूसरे को उपदेश दे रहा था ? है कोई - इसको पच्चीस बेंत और लगाओ ।" " (सब हँसते हैं)
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"इसीलिए विद्यासागर कहते हैं, 'मैं खुद तो सम्हल सकता ही नहीं, फिर दूसरों के लिए बेंत क्यों सहूँ ? (सब हँसते हैं) मैं खुद तो ईश्वर के सम्बन्ध में कुछ जानता नहीं, फिर दूसरे को क्या लेक्चर देकर समझाऊँ ?’ "
नरेन्द्र - जिसने इस विषय को (ईश्वर को) नहीं समझा, उसने और दस-पाँच विषयों को कैसे समझ लिया ?
मास्टर - दस-पाँच विषय कैसे ?
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नरेन्द्र - जिसने इस विषय को नहीं समझा, उसने दया और उपकार कैसे समझ लिया ? – स्कूल कैसे समझ लिया ? स्कूल खोलकर बच्चों को विद्या पढ़ानी चाहिए और संसार में प्रवेश करके, विवाह करके, लड़कों और लड़कियों का बाप बनना ही ठीक है, यही कैसे समझ लिया ?
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"जो एक बात को अच्छी तरह समझता है, वह सब बातों की समझ रखता है ।"
मास्टर - (स्वगत) - सच है, श्रीरामकृष्ण भी तो कहते थे - "जिसने ईश्वर को समझा है, वह सब कुछ समझता है ।" और संसार में रहना, स्कूल करना, इन सब बातों के सम्बन्ध में उन्होंने कहा था, "ये सब रजोगुण से होते हैं ।" विद्यासागर में दया है, इस प्रसंग में उन्होंने कहा था, "यह रजोगुणी सत्त्व है, इसमें दोष नहीं ।"
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भोजन आदि के पश्चात् मठ के सब गुरुभाई विश्राम कर रहे हैं । मास्टर और चुन्नीलाल नैवेद्यवाले कमरे के पूर्व ओर अन्दर से महल की जो सीढ़ी है, उसके पटाव पर बैठे हुए वार्तालाप कर रहे हैं । चुन्नीलाल बतला रहे हैं किस तरह उन्होंने दक्षिणेश्वर में पहले-पहले श्रीरामकृष्ण के दर्शन किये ।
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संसार में जी नहीं लग रहा था, इसलिए एक बार वे पहले संसार छोड़कर चले गये थे और तीर्थों में भ्रमण किया करते थे । वही सब बातें हो रही हैं । कुछ देर में नरेन्द्र भी पास आकर बैठे । फिर योगवासिष्ठ की बातें होने लगीं ।
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नरेन्द्र - (मास्टर से -) और विदूरथ का चाण्डाल होना ?
मास्टर - क्या तुम लवण की बात कह रहे हो !
नरेन्द्र - अच्छा, क्या आपने योगवासिष्ठ पढ़ा है ।
मास्टर - हाँ, कुछ पढ़ा है ।
नरेन्द्र - क्या यहीं की पुस्तक पढ़ी है ?
मास्टर - नहीं, मैंने घर में कुछ पढ़ा था ।
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मठ की इमारत से मिली हुई पीछे कुछ जमीन है ! वहाँ बहुतसे पेड़-पौधे हैं । मास्टर पेड़ के नीचे अकेले बैठे हुए हैं, इसी समय प्रसन्न आ पहुँचे । दिन के तीन बजे का समय होगा ।
मास्टर - इधर कुछ दिनों से कहाँ थे तुम ! तुम्हारे लिए सब के सब बड़े सोच में पड़े हुए हैं । उनसे मुलाकात हुई ? तुम कब आये ?
प्रसन्न - मैं अभी आया, आकर मिल चुका हूँ ।
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मास्टर - तुमने चिट्ठी लिखी थी कि मैं वृन्दावन चला । हम लोग बड़ी चिन्ता में पड़े थे । तुम कितनी दूर गये थे ?
प्रसन्न – कोन्नगर तक गया था । (दोनों हँसते हैं)
मास्टर - बैठो, जरा कुछ कहो, सुनूँ । पहले तुम कहाँ गये थे ?
प्रसन्न - दक्षिणेश्वर कालीमन्दिर - एक रात वहीं रहा ।
मास्टर - (सहास्य) - हाजरा महाशय अब किस भाव में हैं ?
प्रसन्न - हाजरा ने कहा, 'मुझे भला क्या समझते हो ?' (दोनों हँसते हैं)
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मास्टर - (सहास्य) - तुमने क्या कहा ?
प्रसन्न - मैं चुप हो रहा ।
मास्टर – फिर ?
प्रसन्न - फिर उसने कहा, 'मेरे लिए तम्बाकू ले आये हो ?' (दोनों हँसते हैं) मेहनत पूरी करा लेना चाहता है । (हास्य)
मास्टर - फिर तुम कहाँ गये ?
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प्रसन्न - फिर कोन्नगर गया । रात को एक जगह पड़ा रहा । और भी आगे चले जाने के लिए सोचा । पश्चिम जाने के लिए किराये के लिए भलेमानसों से पूछा कि यहाँ किराया मिल सकता है या नहीं ।
मास्टर - उन लोगों ने क्या कहा ?
प्रसन्न - कहा, 'धेली-रुपया कोई चाहे दे दे, पर इतना किराया अकेला कौन देगा ?' (दोनों हँसे)
मास्टर - तुम्हारे साथ क्या था ?
प्रसन्न - दो-एक कपड़े और श्रीरामकृष्णदेव की तस्वीर । तस्वीर मैंने किसी को नहीं दिखलायी ।
(क्रमशः)

*३. श्री गुरुदेव का अंग ~११३/११६*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी* टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*३. श्री गुरुदेव का अंग ~११३/११६*
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*ब्यालों माँहिं बालक बाँधे, विद्या के बल बादि१ ।*
*गुरु प्रसाद रहै इन्द्रियों में, पाया मंत्र युगादि ॥११३॥*
जैसे सँपेरा१ सर्प कीलने विध्या के बल से अपने बालक को सर्पों के बीच बाँध देता है, वह बालक डरता नहीं, वैसे ही गुरु के कृपा-प्रसाद से युगादि परमेश्वर का नाम रूप मंत्र वा ज्ञान रूप मंत्र गुरुदेव के शब्द द्वारा प्राप्त किया है, उसी के बल से इन्द्रियों के विषयों में रहने पर भी डरता नहीं ।
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*मन मनसा१ इन्द्रिय गुण माँखी, हरि सुमिरण हरताल ।*
*गुरु की दया दिनाई२ पाई, दुख दायों का काल ॥११४॥*
११४ में गुरु की दया की विशेषता बता रहे हैं - मन की मलीनता, चपलता, बुध्दि१ की विपरीतता, विभिन्नता, इन्द्रियों के दोष रूप गुण ये सभी मक्खी के समान हैं । हरि स्मरण हरताल के समान है, जैसे हरताल पर मक्खी नहीं बैठती वैसे ही हरि स्मरण करने से उक्त सभी की हानिकारक शक्ति नष्ट हो जाती है । शिष्य पर गुरुदेव की ज्ञान प्रदान रूप दया है वही उक्त सभी संसारिक दुख देने वालों की विनाशक२ है ।
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*अहि इन्द्रिय के गिलन को, गरुड़ सुगुरु उर आनि ।*
*मारुत भख ऐसे मरे, जन रज्जब पहिचानी ॥११५॥*
११५ से १२१ में गुरु की विशेषता पूर्वक गुरु ज्ञान ग्रहण करने की प्रेरणा कर रहे हैं - जैसे सर्प को खाने के लिये गरुड़ समर्थ है, सर्प को गरुड़ के द्वारा मराया जाय तो वह सहज ही मारा जाता है, वैसे इन्द्रियों को वश में करने के लिये गुरु समर्थ हैं उनका ज्ञान हृदय में धारण करोगे तो, इस युक्ति से इन्द्रियाँ सहज ही अधीन हो जायँगी यह यथार्थ ही जानो ।
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*पंच तिणे गुरु मुख छये, माया मेघ डर नाँहिं ।*
*जन रज्जब सो जल इसा, निकसे परवत माँहिं ॥११६॥*
जैसे मुंजा की पत्तियों से अच्छी प्रकार छप्पर बना दिया जाय तो बादल से वर्षने वाला जल का डर नहीं रहता, नहीं तो जल ऐसा है कि पर्वत से भी निकल जाता है । वैसे ही पाँचो इन्द्रियें यदि गुरु-मुख से सुने ज्ञान द्वारा परमात्मा के स्वरूप में ही लग जावें तो माया के द्वारा पतन का भय नहीं रहता, नहीं तो माया ऐसी है कि बड़े बड़े तपस्वियों को भी मोहित करके परमार्थ से गिरा देती है ।
(क्रमशः)

*३. श्री गुरुदेव का अंग ~१०९/११२*

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी* टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*३. श्री गुरुदेव का अंग ~१०९/११२*
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*शिष्य सदा सुस्थिर रहैं, सुन सद्गुरु की सीख ।*
*रज्जब विषय विकार दिशि, कबहूँ भरहि न बीख१ ॥१०९॥*
सद्गुरु का सत्योपदेश सुन कर शिष्य का मन परमात्मा के स्वरूप में सदा स्थिर रहता है विषय-विकारों की ओर कभी एक पैर१ भी नहीं रखता ।
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*जन रज्जब गुरु बैन सुन, बिलय होत बपु बीज ।*
*यथा हाक हनुमंत की, सुनत होत नर हीज ॥ ११०॥*
(११०- ११३ में गुरु-वचन की विशेषता बता रहे हैं) - जैसे सिंहल द्वीप में हनुमान जी की आवाज जो नर सुन लेता है, वह हिजड़ा हो जाता है वैसे ही गुरु के वचनों को श्रवण करने पर श्रोता के शरीर में ही बिंदु लय हो जाता है ।
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*मन अहि लहै न माग, रोक्या मोर महंत मुनि ।*
*रज्जब रहि गये पाग, फनि श्रवननि सुन नाद ध्वनि ॥१११॥*
जैसे मोर मार्ग रोक लेता है तब सर्प उस मार्ग में आगे नहीं बढ़ पाता, मोर की आवाज सुनकर सर्प के पैर रुक जाते हैं । वैसे ही सद्गुरु रूप महन्तमुनि अपने शिष्यों के मन का विषय-मार्ग रोक लेते हैं, गुरु की ज्ञानोपदेश ध्वनि सुन कर मन के विषयाकार वृत्ति रूप पैर रुक जाते हैं ।
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*रज्जब रहै कपूर मन, मिरच सु शब्दों माँहिं ।*
*नातरु१ डाबी डील में, ढूंढ्या लहिये नाँहिं ॥११२॥*
जैसे कपूर काली मिरचों के साथ तो डिब्बी में ठहरता है, नहीं१ तो नहीं ठहरता, वैसे ही मन सद्गुरु शब्दों के साथ रहने से तो शरीर में रहता है, नहीं तो भाग जाता है, खोजने पर भी नहीं मिलता ।
(क्रमशः)

जोधपुर गमन ~

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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जोधपुर गमन ~ 
वि. सं. १९२९ में मारवाड की रामत करते हुये आचार्य उदयराम जी महाराज माघ शुक्ला ४ को जोधपुर पधारे । अपनी मर्यादा के अनुसार अपने अपने की सूचना जोधपुर नरेश को दी । 
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सूचना मिलने पर जोधपुर राज्य की मर्यादा के अनुसार जोधपुर नरेश की ओर से जालोरी दरवाजे के पास आचार्य उदयराम जी अगवानी करने के लिये चान्दी के होदे का हाथी १, पंचरंगी घोडे ४ मय जेवर के, रिसाले के घोडे ५०, पलटन, चोबदार ४, निशान व बाजा लेकर मोहता विजयसिंह जी का कंवर, बक्शी समरथ जी कंवर आदि आये । 
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मर्यादानुसार प्रणामादि शिष्टाचार व आवश्यक प्रश्‍नोत्तर हो जाने पर आचार्य उदयराम जी महाराज को हाथी पर विराजमान कराके बाजार से ले जाकर बलूंदा ठाकुरों की हवेली में ठहराया । इस समय जोधपुर नरेश अस्वस्थ थे, अत: माघ शुक्ला ११ को महाराज कुमार आचार्य जी का दर्शन करने आये । 
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भेंट चढाकर प्रणाम की और विनय पूर्वक आचार्य जी के सामने बैठ गये । आचार्य जी ने महाराज कुमार को दुपट्टा प्रसाद दिया । महाराज कुमार ने उसे मस्तक के लगा कर ग्रहण किया । फिर कुछ देर शास्त्र चर्चा सत्संग करके तथा प्रणाम करके राजभवन को चले गये ।
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जोधपुर नरेश को प्रसाद ~ 
वि. सं. १९२९ में फाल्गुण कृष्णा १४ को जसवंतसिंह जी द्वितीय जोधपुर राज्य की गद्दी पर बैठे तब आचार्य उदयराम जी ने भंडारी रामरत्नजी के द्वारा नारायणा दादूधाम का आशीर्वाद व प्रसाद भेजा । जोधपुर नरेश जसवंतसिंह जी द्वितीय ने उसे आदर पूर्वक ग्रहण किया तथा मोहता विजयसिंह जी को आज्ञा देकर आचार्य उदयराम जी को प्रसाद प्राप्ति का पत्र और पत्र के साथ ही खासा घोडा दुशाला आदि आचार्य जी की सेवा में भिजवाये ।
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वाटका में चातुर्मास ~  
वि. सं. १९३० में रामविलास जी वाटका वालों ने आचार्य उदयराम जी महाराज को चातुर्मास का निमंत्रण दिया । आचार्य जी ने स्वीकार कर लिया । चातुर्मास का समय आने पर आचार्य जी अपने शिष्य संत मंडल के सहित वाटका पधारे । रामविलास जी ने आचार्य जी के सहित संत मंडल का सामेला किया और स्थान पर लाकर ठहराया । 
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सेवा का सुचारु रुप से प्रबन्ध कर दिया गया । चातुर्मास के कार्यक्रम सब आरंभ हो गये । कथा, पद- गायन, संकीर्तन आदि सब समय पर होने लगे । आस- पास के स्थानधारी साधुओं की तथा सेवकों की रसोइयां भी आने लगी । जागरण के दिन जागरण होने लगे । उक्त प्रकार अच्छा चातुर्मास हुआ । 
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समाप्ति पर आचार्य जी को मर्यादा पूर्वक भेंट, साधुओं को वस्त्रादि देकर सस्नेह विदा किया । वाटका से विदा होकर आचार्य उदयराम जी महाराज अपने शिष्य संत मंडल के सहित मार्ग के स्थानधारी साधुओं तथा सेवकों का आतिथ्य ग्रहण करते हुये शनै: शनै: नारायणा दादूधाम में पधार गये । 
(क्रमशः)