गुरुवार, 17 सितंबर 2026

*२८. साधु असाधु परीक्षा का अंग ~१/४*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
.
*२८. साधु असाधु परीक्षा का अंग ~१/४*
.
*सब गुण सधहि तु१ साध है, अन साधे सु असाध ।*
*रज्जब पाई प्राण ने, पूरी पारिख२ लाध३ ॥१॥*
सभी दैवी गुण रूप साधना सिद्ध कर लेता है, तो१ वही साधु कहलाता है और नहीं सिद्ध कर पाता है तब तक असाधु है । बुद्धिमान प्राणियों ने साधु असाधु की यही पूरी परीक्षा२ उपलब्ध३ की है ।
.
*भगवंत न भूले सो भला, बुरा बिसारे सोय ।*
*रज्जब काढे मांड में, भले बुरे चुन दोय ॥२॥*
जो भगवान को नहीं भूले वही साधु है और भूलता है वही असाधु है, सभी ब्रह्माण्ड में खोज करने पर ये दो ही चुनकर साधु असाधु निकाले गये है ।
.
*त्रिगुण तुला ऊपर तुले, कंकर पुन: कपूर ।*
*एक समाने शून्य में, एक धरा मधि धूर ॥३॥*
तुला पर तोलने से कंकर और कपूर बराबर उतर जाते हैं, किन्तु कंकर तो धरा की धूली में मिलता है और कपूर आकाश में मिलता है, वैसे ही त्रिगुणात्मक संसार में चाहे साधु - असाधु का शरीर बराबर मान लिया जाय किन्तु, साधु तो ब्रह्म को प्राप्त करता है और असाधु मायिक संसार में मिलता है ।
.
*धरे माँहिं सौं धर्या ऊपजे, सो धरती ह्वै जाय ।*
*रज्जब साधु कपूर शून्य सुत, शून्यहिं माँहिं समाय ॥४॥*
धरती पर धरे पर्वत का कंकर धरती ही बन जाता है और आकाश की स्वाति बिन्दु से बना कपूर आकाश में ही समाता है, वैसे ही मायिक प्रपंच में फंसा हुआ असाधु संसार में ही रहता है और साधु ब्रह्म में समा जाता है, यही साधु असाधु की परीक्षा है ।
(क्रमशः)

*२७. साधु परीक्षा का अंग ~२०/२२*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
.
*२७. साधु परीक्षा का अंग ~२०/२२*
.
*तन योगी मन भोगिया, रहति१ रुपइये खोट ।*
*स्वप्ने के सूलाक२ में, उघड़ी पत्री ओट३ ॥२०॥*
तांबे के रुपये के उपर चांदी की पत्री लगा दे, तो उसमें छेद२ करते ही पत्री की आड३ हट जाती है और खोट सिद्ध होकर पोल खुल जाती है, वैसे ही तन से तो जो योगी बना है और मन से भोगी है, उसकी विरक्ता वा ब्रह्मचर्य१ में दोष है और वह तन के योगीपने की आड३ स्वप्न में हटकर उसकी पोल खुल जाती है ।
.
*मन मुक्ता काचे बुरे, माँहिं मनोरथ नीर ।*
*रज्जब राम जु जौहरी, पाड़ा२ लागे वीर१ ॥२१॥*
जब तक मोती में जल रहता है तब तक वह कच्चा है, जौहरी के पास उसके मूल्य में बट्टा२ लगाता है वैसे ही हे भाई१ ! जब तक विषय-मनोरथ मन में है, तब तक रामजी के पास उसके संतपने में बट्टा२ लगता है, अर्थात उसे पूरा संत नहीं मानते ।
.
*मन की मिटी न लालसा, तन करि परसे नाँहिं ।*
*रहति१ रुपये खोट है, तुछ मति तामा माँहिं ॥२२॥*
मन की विषयाशा तो नष्ट हुई नहीं, किन्तु शरीर से कामिनी को नहीं छूता तो उसकी विरक्तता१ वा ब्रह्माचर्य रूप रुपये में तुच्छ बुद्धि रूप ताँबा का खोट है ।
इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित “२७. साधु परीक्षा का अंग” समाप्त ॥
(क्रमशः)

*२७. साधु परीक्षा का अंग ~१७/१९*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
.
*२७. साधु परीक्षा का अंग ~१७/१९*
.
*अचेत अवस्था नींद नर, यहु चूकण की ठौर ।*
*पै सूतों१ स्यावत२ रहै, सो रज्जब शिर मौर ॥१७॥*
मनुष्य की अज्ञान१ अवस्था ही निद्रा है और यही लक्ष्य से भ्रष्ट होने का स्थान है, किन्तु जो सुप्तावस्था२ में भी ब्रह्म रूप लक्ष्य प्राप्ति के लिये सावधान है, वही हमारा शिरोमणी संत है ।
.
*ज्यो जागत त्यों सोवतैं, स्वप्ने माँहिं सु होय ।*
*रज्जब पारिख१ प्रीति की, लग्न कहावे सोय ॥१८॥*
जैसी जाग्रतावस्था में लग्न हो, वैसे ही सोते समय स्वप्नावस्था में भी हो, वही प्रिति-परीक्षा१ की लग्न कहलाती है, अर्थात जागते तथा सोते जिसकी वृत्ति निरंतर ब्रह्म परायण रहती है, वही संत है ।
.
*तन त्यागी त्रिभुवन भरे, मन त्यागी कोउ एक ।*
*रज्जब रैनि स्वप्न में, लहिये विगति१ विवेक ॥१९॥*
तन से कामिनी का त्याग करने वाले त्यागी तो त्रिभुवन में बहुत भरे हैं, किन्तु मन से त्यागी कोई विरला ही मिलेगा । रात्रि के समय स्वप्न में विवेक-पूर्वक देखने से अपनी विशेष दशा१ का ज्ञान प्राप्त होगा कि मैं त्यागी हूँ या रागी ।
(क्रमशः) 

*२७. साधु परीक्षा का अंग ~१३/१६*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
.
*२७. साधु परीक्षा का अंग ~१३/१६*
.
*रज्जब परखे प्राणि को, दिल में देखे जोय ।*
*जैसी ह्वै तैसी कहै, पूरा पारिख सोय ॥१३॥*
जो प्राणी के मन में स्थित दोष-गुणों को देखता है वही उसकी परीक्षा कर सकता है, फिर जैसे मन की स्थिति हो वैसा ही कथन करे, वही पुरा परीक्षक है ।
.
*नख शिख काढे नजर में, मन मत१ ले निरताय२ ।*
*जन रज्जब दे हाथ में, खोटी खरी बताय ॥१४॥*
नख से शिखा पर्यन्त दृष्टि से देखे और मन के भाव१ को विचार२ करके देखे, फिर जैसे कोई वस्तु को हाथ में देकर बताते हैं, वैसे ही उसकी बुराई और सच्चाई को बता दे वही साधु की परीक्षा कर सकता है ।
.
*जीव की जाणे जौहरी, परखे सौंज१ सराफ ।*
*जन रज्जब जान रु कहै, सो कहना सब माफ ॥१५॥*
जैसे रत्नों की परीक्षा जौहरी जानता है और सुवर्ण की बनी भूषणरूप सामग्री१ की परीक्षा सराफ जानता है, वैसे ही जीव के हृदय की बात तो साधु की परीक्षा करने वाला जानता है । वस्तु को जानकर उसका दोष कहा जाता है तब उसका परीक्षक का कहना सभी माफ होता है, अर्थात दोष बताने पर भी परीक्षक को दोषी नहीं कहा जाता ।
.
*रज्जब मन मंडाण१ को, विरला परखणहार ।*
*नग नाणे३ अंग४ अंग२ अनन्त, बहु विधि वित विस्तार ॥१६॥*
मन की सजावट१ की परीक्षा कोई विरला ही कर सकता है । अनन्त शरीरों२ के मनों में सात्त्विक गुण रूप नग राजस-गुण रूप सिक्के३, तामसगुण रूप हीन लक्षण४ अनन्त रहते हैं, इस प्रकार बहुत प्रकार का गुण रूप धन का विस्तार मन में रहता है । अत: उसकी परीक्षा मानव नहीं कर पाता । मन की परीक्षा ही साधु परीक्षा है ।
(क्रमशः) 

*२७. साधु परीक्षा का अंग ~९/१२*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
.
*२७. साधु परीक्षा का अंग ~९/१२*
.
*आतम१ कहीं न बंधही, बिन सांई अरु साध ।*
*जन रज्जब ता संत की, पूरण बुद्धि अगाध ॥९॥*
जिसका मन१ परमात्मा और सिद्ध संतों के बिना अन्य किसी में नहीं बँधता, उस साधक संत की बुद्धि पूर्ण रूप से अगाध है ।
.
*ज्यों मुख दोष लहै दर्पण में, फूटा मोती मोती माँहिं ।*
*त्यों रज्जब साधु सौं साधु, मनसा वाचा छाना नाँहिं ॥१०॥*
जैसे मुख का दोष दर्पण में और फूटा मोती मोतियों में दीख जाता है छिपता नहीं, वैसे ही मन तथा वचन से साधु से साधु छिप नहीं सकता ।
.
*सब घट में सांई दरसै, बोले भया विनाण१ ।*
*रज्जब साधु परखिये, कहि गुण कहा बँधाण ॥११॥*
आत्मा रूप से परमात्मा सभी शरीरों में दिखाई देते हैं, किन्तु बोलने से उसके विज्ञान१ वा अज्ञान१ का पता चलता है । अत: साधु की परीक्षा जो उसके लक्षण रूप गुण शास्त्र संतों ने कहे हैं तथा जो उसके शरीर की दिनचर्या का बंधान कहा है, उसकी तुलना करके करना चाहिये ।
.
*ढोल दमामा१ थाल शिर, डंका एकहि होय ।*
*त्यों वायक बहुगुण भर्या, बूझे विरला कोय ॥१२॥*
ढोल, नगाड़ा१ थाल इन पर एक ही डंका पड़ता है, किन्तु ध्वनि भिन्न भिन्न निकलती है, उस ध्वनि से पहचान होती है कि यह उसकी आवाज है, वैसे ही एक प्रश्न से ही प्राणियों के मुख से अनेक वचन निकलते हैं । और वे बहुत गुणों से भरे रहते हैं, उनको कोई विरला विचार शील मनुष्य ही समझ पाता है और वही साधु की परीक्षा कर सकता है ।
(क्रमशः) 

*२७. साधु परीक्षा का अंग ~५/८*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
.
*२७. साधु परीक्षा का अंग ~५/८*
.
*नर नक्षत्र१ दोऊ दिपहिं३, नाम ध्वजा२ जिन शीश ।*
*सो रज्जब कैसे छिपहिं, प्रकट किये जगदीश ॥५॥*
जिस तारे१ के शिर पर चोटी२ होती है और जिस नर के हृदय में भगवान का नाम-स्मरण होता है वे दोनों ही प्रकाश तथा यश से प्रदीप्त३ होते हैं, जिनको जगदीश्वर ने ही प्रकट किया है, वे कैसे छिप सकते हैं ?
.
*हरि हीरा हृदय रहे, सो घट छाना नाँहिं ।*
*रज्जब दीसे दूर सों, ज्यों दीपक भोडल माँहिं ॥६॥*
जिसके हृदय में हरि रूप हीरा रहता है, अर्थात निरंतर हरि का ध्यान रहता है, वह शरीर छिप कैसे रह सकता है ? वह तो जैसे भोडल में जलने वाला दीपक दूर से ही दिखता है वैसे ही दूर देश से भी यश रूप प्रकाश द्वारा दीख जाता है ।
.
*दुर्बल देही दीन मत१, रहे राम के संग ।*
*जन रज्जब जग सौं जुदे, ये संतन के अंग ॥७॥*
शरीर दुर्बल होना, विचार१ में दीनता होना, सांसारिक भावनाओं से अलग रहते हुये निरंतर नाम-स्मरण द्वारा राम के संग रहना ये ही संतों के लक्षण हैं ।
.
*सकल धरे१ सौं धूत२ गति, कहीं न बाँधे मन्न ।*
*जन रज्जब जग सौं जुदे, सोई साधु जन्न ॥८॥*
संपूर्ण मायिक१ प्रपंच से कांपते२ रहते हैं, अर्थात डरते रहते हैं । किसी भी वस्तु वा व्यक्ति में आसक्ति रज्जू द्वारा मन को नहीं बाँधते, इस प्रकार सांसारिक भावनाओं से अलग रहते हैं, वे ही जन संत हैं ।
(क्रमशः) 

*२७. साधु परीक्षा का अंग ~१/४*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
.
*२७. साधु परीक्षा का अंग ~१/४*
इस अंग में साधु की परीक्षा संबन्धी विचार कहेंगे -
.
*रज्जब नर नग सो सही, तम त्रासन रु उजास ।*
*जग जल में बूडे नहीं, सो हीरा हरिदास ॥१॥*
नर वही है जो अंधेरे को नष्ट करके प्रकास करे, नर वही है जो अज्ञान को दूर कर ज्ञान प्रकट करे, हीरा वही है जो जल में नहीं डूबे१, संत२ वही है जो जगत में न डूबे अर्थात ब्रह्मरूप हो जाय ।
.
*महा पुरुष पारस परखि, निश्चय रूप न रंग ।*
*प्राण पषाण सु मानिये, रज्जब पलटे अंग ॥२॥*
पारस और संत की परीक्षा, रूप वा रंग से नहीं होती, लोहे को सुवर्ण व जीव को ब्रह्म बना देने से होती है जो प्राणी केवल भेषादि द्वारा रूप-रंग बदलते हैं, वे तो साधारण पत्थर के समान हैं जो साधन द्वारा संत बनते हैं, वे पारस के समान हैं ।
.
*तन मन तेल कड़ाह विधि, तपता शीतल होय ।*
*सो साधु स्रक१ बावना२, रज्जब लीजे जोय ॥३॥*
कड़ाह के तपे हुये तेल में फूल माला१ डालने से तेल शीतल हो जाय, तो समझना चाहिये यह माला बावने चन्दन२ के फूलों की है, वैसे ही दुखों से संतप्त तन मन को अपने उपदेश से शीतल करदे वही संत है यही संत और बावने चन्दन की परीक्षा है ।
.
*रज्जब रचना रहित की, दर्श परस दर्शन्त ।
वपु संयम वाणी विमल, वदन३ ज्योति१ झलकन्त२ ॥४॥*
अज्ञानादि विकार रहित संत की चेष्टादि रचनायें, दर्शन तथा मिलन से आप ही ज्ञात हो जाती हैं, उनके शरीर में पूर्ण संयम, वाणी में पवित्रता और मुख३मंडल पर ब्रह्म तेज१ चमकता२ रहता है ।
(क्रमशः) 

*२६. भजन प्रताप का अंग ~८२/८५*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
.
*२६. भजन प्रताप का अंग ~८२/८५*
.
*काया कुंभनि१ पैठ तों, जीव जल स्वाद अनेक ।*
*रज्जब भगवंत भानु मिल, उभय रूप रस एक ॥८२॥*
पृथ्वी१ में जल प्रवेश करता है तब उसके अनेक स्वाद हो जाते हैं, वैसे ही शरीर में जीव प्रवेश करता है तब उनमें भी अनेक विषयों की आशा प्रकट होती है, किन्तु सूर्य की किरण द्वारा जल आकाश में जाता है और जीव को भजन द्वारा भगवान् की प्राप्ति होती है, तब दोनों के स्वरूप में एक ही रस और जीव में आत्मा स्थिति रूप रस रहता है ।
.
*शूद्र वैश्य क्षत्रिय ब्रह्म, चतुर वर्ण बे काम ।*
*जन रज्जब मध्यम सभी, जो सुमिरैं नहिं राम ॥८३॥*
शुद्र वैश्य क्षत्रिय और ब्राह्मण चारों वर्णो में जो राम का स्मरण नहीं करते हैं वे सभी बेकार हैं तथा उत्तम नहीं कहे जाते ।
.
*मुख भुज उपजै पेट पग, पड़ धरती धर१ होय ।*
*दंत केश विष्टा रु नख, रज्जब बिछुड़े जोय२ ॥८४॥*
जैसे शरीर के मुख के दांत, भुजा के केश, पेट का मल और पैर के नख, जब तक शरीर के लगे हैं तब तक तो उत्तम हैं, किन्तु देखो२ शरीर से अलग होकर पृथ्वी पर पड़ने से अछूत हो जाते हैं वैसे ही ईश्वर के मुख से ब्राह्मण, भुजा से क्षत्रिय, पेट से वेश्य पैर से शूद्र उत्पन्न होते हैं, किन्तु ईश्वर के भजन को त्यागकर माया१ के उपासक हो जाते हैं, तब उत्तम नहीं रहते ।
.
*पारस मय मूरति प्रभू, चतुर वर्ण लोह भाय ।*
*रज्जब कंचन होत है, ठाहर कहीं लगाय ॥८५॥*
पारस की मूर्ति के मुख, भुजा, पेट, पैरों में से चाहे कैसे भी स्थान पर लोह लगा दो, वह तो सुवर्ण हो ही जायगा, वैसे ही चारों वर्ण भगवान के स्वरूप में लगने से तो उत्तम हो ही जायेंगे नहीं लगे तो अधम ही हैं ।
.
इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित “२६. भजन प्रताप का अंग” समाप्त ॥
(क्रमशः) 

सोमवार, 7 सितंबर 2026

परम तितिक्षु संत विदुरजी

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
.
*दादू धरती ह्वै रहै, तज कूड़ कपट अहंकार ।*
*सांई कारण सिर सहै, ताको प्रत्यक्ष सिरजनहार ॥*
.
अब परिचितों को भी पढ़िये—दादूपंथियों की छावनी में जागरण था । वह मेला शीतकाल में था । विदुरजी संतों के भजन सुनना चाहते थे, इससे वे दादूवाणी मंदिर में बैठे थे जो विशाल छप्पर के रूप में था । उनको वहां नंगे बैठे देखकर भूरादास कलानोरिया कुपित होकर बोला- यहां क्यों आकर बैठा है ? यहां मातायें बैठी हैं, दीखता नहीं तेरे को यह नंगे बैठने का स्थान है क्या ?
.
भूरादास के उक्त वचन सुनकर विदुरजी तो क्या बोलते अन्य किसी साधु ने भी कुछ नहीं कहा- किन्तु मातृमंडल से आवाज आई । महाराज को बैठे रहने दो । ये तो संत हैं इनमें भेद दृष्टि ही ही कहां है और हम तो दूषित भाव रहित अपने बच्चों को रात दिन नंगा देखती हैं । यही बालवृत्ति इन संतजी की है । फिर भूरादास को कहा-तुम्हारा भाव अवश्य दूषित है तुम यहां बैठने के अधिकारी अवश्य नहीं हो । फिर भूरादास भी चुप हो गया । अन्य सन्तों व गृहस्थों ने किसी ने भी कुछ नहीं कहा ।
.
बेरीवाले घनश्यामदासजी के शिष्य नन्दकिशोरजी मेरे से स्नेह रखते थे साथ ही आते जाते खाते पीते बैठते प्रायः साथ रहते थे । जागरण में भी हम दोनों साथ ही बैठे थे । शीत बहुत पड़ रहा था । मैंने नन्दकिशोरजी को कहा-अपन दोनों एक कम्बल में काम चला लेंगे । एक कम्बल विदुरजी को ओढ़ा आओ । मैंने मेरा कम्बल उतार कर नन्दकिशोरजी को दिया । 
.
वे उठै और विदुरजी के शरीर को अच्छी प्रकार ढकर आ गये । विदुरजीने कुछ भी नहीं कहा । वे चित्रलिखित मूर्ती के समान ही विराजे रहे । हम दोनों एक कम्बल ओढ़े रहे वहां गायक संत उच्च कोटि के संतों के भजन गा रहे थे । महान् आनन्द की वर्षा हो रही थी । विदुरजी का शरीर किसी कारण हिल गया तो कम्बल उनके शरीर से नीचे गिर गया ।
.
किन्तु उन परम तितिक्षु संत विदुरजी ने उस कम्बल को अपने हाथों उठाकर पुनः नहीं ओढ़ा । उक्त प्रकार की उनकी सहनशक्ति और तितिक्षा तो मैंने मेरे नेत्रों से देखी थी । इससे सूचित होता है, वे महान् तितिक्षु क्षमाशील, भजनानन्दी संत थे । उनके जीवन में ऐसी अनेक घटना घटी होगी, मैंने तो उक्त घटनायें आखों देखी लिखी हैं । उनके दर्शन फिर नारायणा दादूधाम के मेले में होते रहते थे । उनके किसी प्रकार का आग्रह नहीं था, वे गद्दे पर भी बैठ जाते थे और रेते में वैसे ही प्रसन्नता से बैठते थे ।
.
स्नान के समय तो कुछ देर लगती ही नहीं थी । कारण कुछ धोना निचोना तो पड़ता ही नहीं था । वे अन्त तक दिगम्बर ही रहे थे । वे सदा अपना जीवन परम संतोष से ही व्यतीत करते रहे थे । सुनते हैं कि वि. सं. १९८९ में गोदावरी के कुंभ मेले में जाते समय बनास नदी से निकल रहे थे चातुर्मास का समय था वर्षा वर्षती ही रहती थी । पीछे से जोर से बाढ़ आ गई । इससे उनका शरीर बनास में ही बह गया । भगवान् की ऐसी ही इच्छा होगी । इस प्रकार संत विदुरजी की जीवन यात्रा समाप्त हुई ।
(क्रमशः)

*२६. भजन प्रताप का अंग ~७७/८१*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
.
*२६. भजन प्रताप का अंग ~७७/८१*
.
*माया काया मसि मिली, प्राण सु पाणी माँहिं ।*
*रज्जब सुमिरन सूर बिन, जीव जल निर्मल नाँहिं ॥७७॥*
जैसे शुद्ध जल में काला रंग मिल जाय, तो वह सूर्य की किरण द्वारा जल सूखे बिना नहीं निकलता, वैसे ही प्राणी में माया तथा काया की आसक्ति रूप मैल मिला है, नाम-स्मरण बिना जीव निर्मल नहीं हो सकता ।
.
*रज्जब स्याही सुकल१ करि, सब अक्षर अरु स्थूल ।*
*नामहि निर्मल ठौर दोउ, बाकी मैले मूल ॥७८॥*
स्याही से सब अक्षर बने है ओर वीर्य१ से सब स्थूल शरीर बने हैं, जिन अक्षरों से भगवान का नाम आ जाता है, वे अक्षर तथा जिन शरीरों के हृदय में नाम चिंतन होता है वे शरीर तो निर्मल हैं, बाकि के सभी मैले हैं । अतः दोनों में निर्मलता का हेतु नाम ही है ।
.
*कुलक्षण क्वैलों१ भरी, काया रीठ२ समान ।*
*नाम अग्नि उज्वल उभय, और उपाय न आन ॥७९॥*
कोयलों१ से भरी कोटड़ी अति काली होती है उसी के समान कुलक्षणों से भरी काया अति काली२ है कोयलों की कोटड़ी में अग्नि लगा दी जाय और काया के हृदय देश में नाम चिन्तन आरम्भ कर दिया, तो दोनों उज्वल हो जायँगी इनको उज्वल करने का अन्य कोई उपाय नहीं है ।
.
*अंभ१ आतमा घटा घटि२, तबै बीज३ बल४ संग ।*
*भानु भजन मिलतों रजब, उभय अनुपम अंग५ ॥८०॥*
बादलों की घटा में जल१ होता है तब उसमें बिजली३ का संयोग भासता है और सूर्य का प्रकाश मिलनै से उस घटा का स्वरूप५ अनुपम भासने लगता है वैसे ही शरीर में२ आत्मा होती है तब उसमें माया की शक्ति४ भासने लगती है, फिर भगवद् - भजन होने लगता है तब तो उसके भी दैवी गुण रूप लक्षण अति उत्तम भासने लगते हैं ।
.
*वपु१ वसुधा२ जीव जल पड़े, पंच स्वाद कर्म कीच ।*
*रज्जब नाम निहंग३ चढि, तब सु ते४ न तिन५ बीच ॥८१॥*
पृथ्वी२ पर जल पड़ने से कीचड़ हो जाता है, फिर सूर्य की किरण से जल आकाश३ में चढ़ जाता है तब उन५ जल कणों में वे४ रज कण नहीं रहते, वैसे ही जीव शरीर१ को धारण करता है तब पंच ज्ञानेन्द्रियों के पंच विषयों के स्वाद रूप रेता मिलने से कर्म रूप कीचड़ हो जाता है और जीव उसमें फँस जाता है, फिर नाम चिन्तन द्वारा ब्रह्म की प्राप्ति होने पर जीवों५ में वे४ विषय के राग नहीं रहते ।
(क्रमशः)

*४७. अध्यातम कौ अंग ३३/३६*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
.
*४७. अध्यातम कौ अंग ३३/३६*
.
रिदै चक्र मंहि रांमजी, रोम रोम सब ठांम ।
कहि जगजीवन जन जपै, ए अजपा ए नांम ॥३३॥
हृदय चक्र में ही राम जी हैं, जो रोम-रोम और सब जगह विराजमान हैं । जगजीवन जी महाराज कहते हैं भक्त जन इसी अजपा नाम को जपते हैं ।
.
कंठ चक्र करता पुरष, करन करावन जोग ।
कहि जगजीवन ते लहैं, तिंहिं तन हरष न सोक ॥३४॥
कंठ चक्र में वह कर्ता पुरुष विराजमान है, जो सब कुछ करने-कराने योग्य है । संत जगजीवन जी कहते हैं उसे पा लेने पर शरीर में न हर्ष रहता है न शोक ।
.
भौंर चक्र१ भगवंत भजि, भाव भगति रस होइ ।
कहि जगजीवन सहज मैं, सुन्नि समांवै सोइ ॥३५॥
(१. भौंर चक्र=भ्रमर चक्र) 
भ्रमर चक्र में भगवान का भजन करने से जीव में भाव-भक्ति का रस उत्पन्न होता है । संत जगजीवन जी कहते हैं की जीव उसी सहज अवस्था से शून्य में समा जाता है । 
.
नोली२ बांधि भुवंगम, ये अध्यातम जोग ।
कहि जगजीवन नांउं भजि, भूलै षटरस भोग ॥३६॥
(२. नोली=नेती-धोती आदि हठयोग के छह कर्मों में से पाँचवां कर्म)
नेती-धोती से शरीर को बांध कर भुजंगम अर्थात कुंडलिनी को जगाना, यही अध्यात्म योग है । संत जगजीवन जी कहते हैं नाम भजने से साधक छहों रसों के भोगों को भूल जाता है ।
(क्रमशः)  

रविवार, 6 सितंबर 2026

*विदुरजी का दिगम्बर होना*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
.
*निश वासर लागै नहीं, नहिं लागै शीतल घाम ।*
*क्षुधा तृषा लागै नहीं, घट-घट आतम राम ॥*
.
*विदुरजी का दिगम्बर होना* = नारायणा दादूधाम के आचार्य दयारामजी महाराज ने गुहाला के स्थान में चातुर्मास किया था । चातुर्मास में विदुर जी भी साथ थे । एक दिन विदुर जी प्रातः स्नान करके आये थे और पहाड़ की टेकड़ी पर बने हुए स्थान में अपनी धोती खोलकर ठीक तरह बांधने लगे थे । उसी समय पांचूजी नामक एक साधू ने विदुरजी को कहा- “प्रातः काल ही क्या दर्शन करा रहा है, रोटी मिलने देगा या नहीं ।” यह सुनकर विदुरजी ने अपने मुख से कुछ नहीं कहा किन्तु धोती को वहां ही पटककर मां के गर्भ से निकले थे वैसे ही दिगम्बर रूप में महल के उत्तर की ओर अधिक ऊंचाई नहीं थी वहां से कूदकर चल दिए और सालवाड़ी डूंगरी पर जाकर ऊंधे पड़ गए ।
.
४-५ दिन के पश्चात् विजारण्या जाटों की ढांणी की एक वृद्धमाता ने उनको पड़ा देखकर पूछा-महाराज ! यहां क्यों पड़े हो ? तब विदुरजी बोल तो नहीं सके किन्तु हाथ की ओक मुख के लगाकर जल मांगा । फिर बुढिया ने जल मंगवाकर विदुरजी को पिलाया और उस वृद्धा माता ने उनको दूध देकर एक दो दिन पश्चात् रोटी देना आरम्भ किया और गुहाला स्थान में सूचना दी कि आपके एक साधु दिगम्बर अवस्था में पहाड़ी पर पड़े हैं । इनको ले जाओ । फिर साधु आये भी और साथ चलने का आग्रह भी बहुत किया किन्तु न तो विदुरजी उन साधुओं के साथ गए और न पुनः वस्त्र ही धारण किए । कुछ दिन के पश्चात् उस पहाड़ी से भी विचार गये फिर रमते ही रहते थे ।
.
डूंगर के मलारणे में दादूपंथी नागों की छावनी में भंडारी मोतीराम जी ने जुगतरामजी मंडलेश्वर का चातुर्मास कराया था । उस चातुर्मास में, मेरा राम भी था और विदुरजी भी थे । वे गणेशदासजी संत की कुटिया पर एक तखत पर रहा करते थे । आपका शरीर श्यामवर्ण था पेट बढ़ा हुआ था जिससे आपकी गोप्येन्द्रिय प्रायः दीखती भी नहीं थी । 
.
आप परिग्रह शून्य दिगम्बर तो थे ही आपका हृदय भी परम विरक्त था ।आपकी सहन शक्ति भी विलक्षण ही थी । आप प्रतिदिन वहां मोरेढ़ नदी को लांघकर ही शौच किया करने जाते थे । चातुर्मास में भी उनका यह क्रम भारी बाढ़ आने पर ही बन्द होता था । साधारण बाढ़ से तो पार चले ही जाते थे । सारे चातुर्मास में मेरा उनसे संपर्क रहा था । वे कभी२ इच्छा होने पर अपने रचित पद्य भी सूना दिया करते थे ।
.
*विदुरजी की सहन शक्ति* = एक समय जुगतरामजी की मंडली कुरुक्षेत्र सूर्यग्रहण पर जाने लगी तब विदुरजी ने भी कहा- मेरा रामजी संत दर्शन करना चाहता है, मुझे भी साथ ले चलें । मंडलेश्वरजी ने कहा- आप दिगम्बर हैं विदेश में आपको कष्ट होगा । सब प्रकार के प्राणी मिलेंगे । दुर्जन लोग आपको दुःख भी दे सकतें हैं । उस स्थिति में मंडली के सभी साधुओं को दुःख होगा । विदुरजी ने कहा- इस बात की चिन्ता मत करो, मंडली के संतों को दुःख होने की स्थिति मैं नहीं आने दूंगा । दुःख देने वालों का आघात मैं स्वयं ही सहन कर लूंगा ।
.
उस वर्ष मेरा रामजी भी मंडली के साथ ही था । मैं देखता रहा कि स्थान २ पर ग्रामों में, नगरों में उन पर कहीं बच्चे ही धूलि डालते थे तो कहीं कंकर ही उन पर फैंकते थे तो कटु वचन भी सुनाते थे किंतु संत विदुरजी का उनको कुछ कहना तो दूर रहा वे उनकी ओर देखते भी नहीं थे । कुरुक्षेत्र के मेले में दशनामी नागों ने यह कहकर कि नंगे तो हम ही रह सकते हैं तुम कैसे नंगे घूम रहे हो ? ईंटें मारी । एक दो विदुरजी के लगी भी किन्तु विदुरजी उनके दर्शन कर चल दिए कुछ भी नहीं बोले । मैं साथ था, उनकी सहन शक्ति को देखकर आश्चर्य कर रहा था ।
.
कहा भी है ~
“सहनशक्ति अति होत है, संत जनों के मांहिं ।
पत्थर खाते ही रहे, विदुर कहा कुछ नांहिं ।७०।दृ.त.११।
विदुरजी ने मुझे पहले ही कह कह रखा था कि मेरे साथ कोई अनुचित व्यवहार करे उस पर आप कुछ भी नहीं बोलना । अतः उनके पीछे२ अज्ञात के समान चलता था । उक्त प्रकार मेले में उन्होंने मेरे साथ घूम२ कर सब संतों के दर्शन किए । कोई उन पर श्रद्धा भी करता था, कोई नंगा फिरना बुरा भी बताता था किन्तु वे सब सुन लेते थे । कुछ बोलते नहीं थे । यह अपरिचित समाज की बात कही गई ।
(क्रमशः)

*४७. अध्यातम कौ अंग २९/३२*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
.
*४७. अध्यातम कौ अंग २९/३२*
र रौ म मौ अक्षर उभै, ए गुर ग्यांन निवास ।
अबिगत आग्या१२ चक्रषट१३ खोजौ, सु कहि जगजीवनदास ॥२९॥
{१२. आग्या=आज्ञा(हटयोग का षष्ठ) चक्र}   {१३. चक्र षट=छह चक्र(उपरि लिखित)}
र-रौं और म-मौं ये दोनों अक्षर गुरु के ज्ञान का निवास हैं । जगजीवनदास जी महाराज कहते हैं अविगत ब्रह्म को आज्ञा चक्र में और इन छहों चक्रों में खोजो ।
.
मूल चक्र मंहि महारस, मन पावन मथि धाम ।
कहि जगजीवन मेर परि, सैर सिरै१४  सुख नांम ॥३०॥
(१४. सैर सिरै=उत्तम साधना)
मूलाधार चक्र में महारस भरा है, जो मन को पवित्र करने वाला परम धाम है । संत जगजीवन जी कहते हैं मेरुदंड पर उत्तम साधना करने से उस सुख-स्वरूप नाम की प्राप्ति होती है ।
.
इन्द्री चक्र अगाध हरि, अबिगत अलख अनंत ।
कहि जगजीवन उनमनी, केई जन परसैं कंत१५ ॥३१॥
(१५. परसै कंत=ब्रह्म साक्षात्कार)
इन्द्री चक्र में वह अगाध हरि अविगत, अलख और अनंत रूप में है । जगजीवन जी महाराज कहते हैं उनमनी अवस्था में कोई बिरला जन ही उस कांत रूप ब्रह्म का साक्षात्कार कर पाता है ।
.
नाभि चक्र नीझर झरै, निरमल नूर निवास ।
अनहद बांणी ऊपजै, सु कहि जगजीवनदास ॥३२॥
नाभि चक्र में अमृत का झरना झरता है, वहाँ निर्मल प्रकाश का निवास है । संत जगजीवनदास जी कहते हैं वहीं से अनहद वाणी उपजती है ।
(क्रमशः) 

*२६. भजन प्रताप का अंग ~७३/७६*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
.
*२६. भजन प्रताप का अंग ~७३/७६*
.
*निष्काम नाम ले नर नारायण, सुमिरत शक्ति१ सकाम ।*
*रज्जब रज२ तज काढ़ तू, भजन भेद गति३ प्राम४ ॥७३॥*
निष्काम भाव से नाम-स्मरण करने से नर नारायण को प्राप्त करता है और सकाम भाव से करने से माया१ मिलती है । हे साधक ! तू रजोगुण२ का त्याग करके मन को माया से निकाल, तभी तुझे भजन भेद की रीति३ प्राप्त४ होगी ।
.
*नाम विसारे नींद है, गृह वैराग्य सु हानि ।*
*रज्जब रटे सु रैनि दिन, सोई जाग्या जानि ॥७४॥*
राम नाम को भूलना ही निद्रा है, नाम को भूलने से गृहस्थ तथा विरक्त दोनों को ही हानि है जो रात्रि-दिन नाम को रटता है, वही जगा हुआ है ऐसा ही जानना चाहिये ।
.
*झूंठ साँच के संग सदा, ज्यों दीपक अँधियार ।*
*रज्जब लोई लय बुझत, तिमिर न आवत बार ॥७५॥*
जैसे दीपक के साथ अँधेरा रहता है, वैसे ही सत्य के साथ मिथ्या रहता है । दीपक की ज्योति बुझने पर अँधेरे को आते देर नहीं लगती, वैसे ही सत्य स्वरूप परमात्मा के नाम का स्मरण हटाते ही हृदय में मिथ्या मायिक प्रपंच आते देर नहीं लगती ।
.
*रज्जब रीता राम बिन, भर्या भजे भगवान ।*
*मनसा वाचा कर्मना, नीके किया निदान ॥७६॥*
राम के भजन के बिना प्राणी खाली है, जो भगवान का भजन करता है वही भरा है । हमने मन, वचन, कर्म से खाली और भरे का यही मूल कारण निश्चय किया है ।
(क्रमशः)

*४७. अध्यातम कौ अंग २५/२८*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
.
*४७. अध्यातम कौ अंग २५/२८*
.
रांम निरंजन निराकार हरि, स्वाधिस्टांन४ अस्थान ।
कहि जगजीवन ब्रह्मा उतपति, सावत्री भी ग्यांन ॥२५॥
(४. स्वाधिस्टांन=हठयोग का द्वितीय चक्र)
वह राम ही निरंजन और निराकार हरि है, उसी का निवास स्वाधिष्ठान चक्र में है । संत जगजीवन जी कहते हैं वहीं से ब्रह्मा जी की उत्पत्ति होती है और सावित्री रूपी ज्ञान भी वहीं से प्रकट होता है ।
.
निराकार निरलेप हरि, मणिपुर५ बिसनु बिलास ।
लिछमी सक्ति तहँ रहै, सु कहि जगजीवनदास ॥२६॥
(५. मणिपुर=हठयोग का तृतीय चक्र)
जो हरि निराकार और निर्लेप है, वही मणिपुर चक्र में विष्णु रूप में विलास करता है । संत जगजीवनदास जी कहते हैं लक्ष्मी रूपी शक्ति भी वहीं निवास करती है ।
.
परम पुरुष परमातमा, अनहद६ धुनि हरि हेत ।
कहि जगजीवन पारबतीप्रिय७, सुमिरण भये सचेत ॥२७॥
{६. अनहद=अनाहत(हठयोग का चतुर्थ) चक्र}   {७. पारबती प्रिय=शिव(आदिनाथ)} 
परम पुरुष परमात्मा ही अनाहत चक्र में अनहद धुनि के रूप में प्रेम रूप है । जगजीवन जी कहते हैं वहीं पार्वती-प्रिय शिव जी विराजते हैं, जिनके स्मरण से जीव सचेत हो जाता है ।
तेज पुंज प्रकाश परम गुर,  विसुध८ मारग हंस९ ।
कहि जगजीवन विद्या१० वांणी, तजै अविद्या११ अंस ॥२८॥
{८. विशुध=विशुद्ध(हठयोग का पंच्चम) चक्र}   {९. हंस=अवधूत योगी)  
(१०. विद्या=ब्रह्मविद्या)   (११. अविद्या=अज्ञान)    
विशुद्ध चक्र में तेज के पुंज स्वरूप परम गुरु का प्रकाश है और वही हंस रूपी अवधूत योगी का मार्ग है । जगजीवन जी कहते हैं वहाँ ब्रह्मविद्या की वाणी प्रकट होती है जिससे अज्ञान का अंश मिट जाता है ।
(क्रमशः)

१२वें आचार्य नारायणदास जी

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
.
*ता माली की अकथ कहानी, कहत कही नहिं आवै ।*
*अगम अगोचर करत अनन्दा, दादू ये जस गावै ॥*
.
१२वें आचार्य नारायणदास जी के खालसे का स्थान पहले दादूद्वारे नारायणा के बाग़ में एक था । उनमें आपकी शिष्य परंपरा के संत नानकदासजी, रामदासजी हुये हैं किन्तु उस स्थान में भी अब कोई साधु नहीं है । आचार्य नारायणदासजी की शिष्य परंपरा में चतुर्भुजजी अच्छे विद्वान् संत हुये हैं । आप सामान्य रूप से तो शास्त्रों के ज्ञाता थे ही किन्तु विशेष रूप से पौराणिक पंडित थे ।
.
भागवत् व दादूवाणी की कथा विशेष रूप से करते थे । वाणी पर इनकी टिप्पणी है । आजकल नारायणा में उसी पुस्तक से कथा होती है । वि. सं. १९५० के लगभग इनका देहांत हुआ था । ये अच्छे संत थे । इनके शिष्य पंडित नन्दरामजी भी अच्छे विद्वान् थे । आचार्य दयारामजी के कथावाचक भी रहे थे । चन्द्रिका प्रसाद द्वारा संपादित दादूवाणी पर आपकी सम्मति भी छपी है ।
.
१३ वें आचार्य उदयरामजी महाराज के दो शिष्य थे १~ गुलाबदासजी २-काशीरामजी । गुलाबदासजी आचार्य हुये और काशीरामजी की शिष्य परंपरा इस प्रकार है~ काशीरामजी के लक्षमणदासजी । इन दोनों के चरण एक चौकी में नारायणा में ही हैं । वि. सं. १९३६ वैशाख वदि ७ शुक्रवार को पधराये । लक्षमणदासजी के लायकरामजी उनके शिवलालदासजी । लायकरामजी के चरण शिवलालदासजी ने वि. सं. २००० कार्तिक वदि ९ शुक्र को नारायणा में पधराये ।
.
शिवलालदासजी के शिष्य गोपालदासजी नलू ग्राम में रहे । उनके सुखदेवदासजी, उनके मेदरामजी वर्तमान में हैं । आचार्य उदयरामजी की परंपरा का एक स्थान मूडोती ग्राम में भी है । मेदरामजी रहते हैं किन्तु यह स्थान बहुत पुराणा है । वि. सं. १७७७ में नारायणा से पहले नारायणदासजी ने मूडोती में अपना साधन धाम बनाया था और परमार्थ के लिये एक बावड़ी बनाई थी । वि. सं. १७७७ में । उसमें शिला लेख हैं ।
.
१४वें आचार्य गुलाबदासजी के दो प्रमुख शिष्य थे- हरजीरामजी तथा दयारामजी । दोनों ही आगे पीछे आचार्य गद्दी पर विराजे । इससे इनका खालसा अलग नहीं चला । इससे इनकी शिष्य परंपरा का कोई अन्य स्थान नहीं है ।
.
१५वें आचार्य हरजीरामजी के दो शिष्य थे-बालदासजी पुजारी और भूरादासजी भंडारी । बालदासजी पुजारी के शिष्य बसन्तीदासजी वर्तमान हैं । भूरादासजी भंडारी के शिष्य सन्मानदासजी भंडारी वर्तमान हैं । इनकी परंपरा का अन्य कोई स्थान नहीं है ।
.
१६वें आचार्य दयारामजी के अनेक शिष्य हुये हैं किन्तु कोई स्थानधारी या स्वतंत्र रूप से स्थान स्थापित नहीं किया । आपके शिष्य- १ भंडारी रामनाथदासजी । २- रामचन्द्रदासजी, ये आचार्य चैनरामजी के स्थान रैंण में चले गये । ३- बलरामदासजी ४- लालदासजी थे सिरोही(शेखावटी) के स्थान में चले गये । ५- रामलालजी आचार्य हो गये ।
.
६ पं. रामदासजी कथा वाचक ये भी मेड़ता में अन्य स्थान कृष्णदेवजी महाराज के स्थान में चले गये । ७- भंडारी मंगलदासजी ये भी आचार्य चैनरामजी की परंपरा के स्थान इन्दावड़ में चले गये । ८- विदुरजी इन्होंने प्रथम चानसेन के किशनदासजी से जयपुर जेल में दीक्षा ली थी । किशनदासजी भी जमात में एक मीणे के मारे जाने से जेल में थे । जेल से छूटने पर विदुरजी आचार्य दयारामजी महाराज के साथ रहने लगेथे और आचार्यजी से सत्य उपदेश प्राप्त होने से उनको ही गुरु मानते थे ।
(क्रमशः)

शनिवार, 5 सितंबर 2026

*२६. भजन प्रताप का अंग ~६९/७२*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
.
*२६. भजन प्रताप का अंग ~६९/७२*
.
*नर नारायण नाम में, सुमिरन सम ये श्वास ।*
*भूलैं भूत१ विभूति२ में, रज्जब किया विमास३ ॥६९॥*
नर यदि अपने ये श्वास नाम स्मरण में लगाकर बराबर स्मरण करता रहे, तो नारायण हो जाय, किन्तु विचार३ करने पर ज्ञात हुआ कि प्राणी१ माया२ में लगकर परमात्मा के स्मरण को भूल जाते हैं ।
.
*तिति२ बार३ माया मुक्त, नरहरि१ नाम समाय ।*
*रज्जब छूटे लय लक्ष्य, लच्छी४ मय ह्वै जाय ॥७०॥*
जितनी देर मन भगवान्१ के नाम-स्मरण में रहता है, उतनी२ देर३ माया से मुक्त रहता है और जब मन को स्मरण द्वारा नाम में लय करने का लक्ष्य छूट जाता है तब मन माया४मय हो जाता है अत: मन को स्मरण में ही रखना चाहिये ।
.
*रज्जब जाप जिकर१ करै, तिति बार जीव जाग ।*
*सुमिरण भूले श्वास जिहिं, तब सूता पल लाग ॥७१॥*
जितनी देर जीव नाम का जप, तथा भगवद् सम्बन्धी चर्चा१ करता है, उतनी देर ही जागता है और जिसके श्वास नाम स्मरण भूलने पर आते हैं तब समझो उसके नेत्रों की पलक लग गई और वह सूता है ।
.
*नाम विसारन नींद निज, जागण जप जगदीश ।*
*मन वच कर्म रज्जब कहै, खैंचत वेद हदीस ॥७२॥*
जगदीश्वर के नाम को भूलना ही निद्रा है और जपना ही जागना है । यह मैं भी मन, वचन, कर्म से कहता हूँ और वेद हदीस(मुसलमानों का स्मृति जैसा ग्रन्थ, मुहम्मद साहिब के वचनों का संग्रह) भी रेखा खैंच कर कहते हैं, अर्थात प्रतिज्ञापूर्वक कहते हैं ।
(क्रमशः)

*२६. भजन प्रताप का अंग ~६५/६८*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
.
*२६. भजन प्रताप का अंग ~६५/६८*
.
*रज्जब हरि रिधि तिनहुं की, जो जप जीवित बाल ।*
*माल न मूओं को मिले, जे खाये कर्म काल ॥६५॥*
पिता के मरने पर उसका बालक जीवित हो तो उसे धन मिलता है, मरे हुये को नहीं मिलता, वैसे ही जीवत्व अहंकार मरनै पर ब्रह्मचिन्तन रूप बाल जीवित रहता है तभी उसे ब्रह्म साक्षात्कार रूप ऋद्धि प्राप्त होती है, कर्म और काल के द्वारा खाये जाकर मरने वालों को ब्रह्म साक्षात्कार रूप माल नहीं मिलता ।
.
*रज्जब भागी भूख, भजन करत भगवंत का ।*
*गये सु दारिद दूख, आपद फिर आवे नहीं ॥६६॥*
भगवान् का भजन करने से भक्तों की सभी प्रकार की आशा तृष्ण रूप भूख भाग जाती है तथा दरिद्रता जन्य दु:ख दूर जाते हैं, पुन: विपत्ति नहीं आती ।
.
*माया छाया पांव तल, जब सांई सूरज शीश ।*
*रज्जब कही विचार कर, दीसै विश्वा बीस ॥६७॥*
जब सूर्य शिर पर होते हैं, तब छाया पैरों के पास नहीं आती, वैसे ही जब भजन द्वारा परमात्मा निरंतर हृदय में रहते हैं तब माया चरणों में आ गिरती है । हम ने अपने विचार करके ही कहा है और विचारशीलों को यह बात बीसों विश्वा यथार्थ ही दिखाई देती है ।
.
*रंकार अलिफ१ भीतर लिखे, कागज कमल कलूब२ ।*
*अतुल तुला कैसे तुले, बिच बैठा महबूब३ ॥६८॥*
किसी दानी सेठ के बहुत आग्रह करने पर कि कुछ तो ग्रहण करो, तब नामदेव ने तुलसी पत्र पर "राँ" लिखकर कहा - "इसकी बराबर तोल दो" सेठ ने तुला पर हीरादि रत्न, सुवर्णादि धातु, अन्न, यज्ञ, दानादि सभी चढाये किन्तु "राँ" की बराबरी नहीं हुआ । वैसे ही राम मंत्र का पहला१ अक्षर "राँ" जिसके भीतर हृदय२ कमल रूप कागज पर लिखा है अर्थात उसका निरंतर चिन्तन होता है और प्रेम-पात्र३ परमात्मा भीतर बैठा है, वह भक्त भजन के प्रताप से अतुल्य है, वह कैसे किसके बराबर हो सकता है ?
(क्रमशः)

*२६. भजन प्रताप का अंग ~६१/६४*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
.
*२६. भजन प्रताप का अंग ~६१/६४*
.
*कुल साँकल काया कड़ी, लोहा में सु विशेष ।*
*रज्जब प्रभु पारस परसि, कचंन होत सु देख ॥६१॥*
जैसे लोहे की साँकल में लोहे की कङियां विशेष रूप से लगी रहती हैं, किन्तु देख, पारस का स्पर्श होते ही सुवर्ण हो जाता है, वैसे ही कुल में विशेष रूप से शरीर फँसा है, किन्तु भजन द्वारा प्रभु की प्राप्ति होते ही कुल और शरीर का अध्यास जाता रहता है ।
.
*राम नाम की गर्ज सुन, बधै वंश ज्यों भाव ।*
*रज्जब रीझ्या देखकर, अति आतुर गति चाव ॥६२॥*
जैसे बादल की गर्जना सुनकर बाँस बढ़ता है, वैसे ही राम-नाम की ध्वनी सुनकर भाव बढ़ता है उत्साह और आतुरतापूर्वक शीध्र गति से जो भाव बढ़ता है उसे देख कर हम अति प्रसन्न हैं ।
.
*आतम फल आतुर उदय, तथा आँवली राति ।*
*रज्जब अज्जब देखिये, इस अंकुर की जाति ॥६३॥*
जैसे आमला के भादू के कृष्ण पक्ष की एक ही अंधेरी रात्रि में एक साथ ही सब फल आ जाते हैं, वैसे ही अन्त:करण में भजन का फल शीध्रता से एक साथ उदय हो जाता है, इस आमला और भजन रूप अंकुर की जाति ऐसी अदभुत देखी जाती है ।
.
*एक आदमी आँवलनि, फल पावे तत्काल ।*
*अन्य सु अठारह भार नर, सहज सु फल सुन साल१ ॥६४॥*
एक भजनानन्दी मनुष्य तो ऐसा होता है कि उसे आमलिन के समान तत्काल ही फल मिल जाता है और सुनो, अन्य मनुष्य अठारह भार वनस्पतियों के समान है, जैसे अन्य वनस्पतियों के वर्ष१ भर में कोई के कब, कोई के कब शनै: शनै: फल लगता है, वैसे ही उन मनुष्यों को अपने कर्म का शनै:शनै: फल मिलता है ।
(क्रमशः) 

*अथ अध्याय ५ =*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
.
*प्रेम भक्ति दिन दिन बधै, सोई ज्ञान विचार ।*
*दादू आतम शोध कर, मथ कर काढ़या सार ॥*
.
*अथ अध्याय ५ =*
*८ वें आचार्य निर्भयरामजी की शिष्य परंपरा =*
आचार्य निर्भयरामजी के शिष्य चरणदासजी की परंपरा इस प्रकार है~
१~ चरणदासजी पुजारी, २~ लालदासजी, ३~सुखरामजी पुजारी, ४~ साहिबरामजी, ५~ लायकरामजी, ६~ आत्मारामजी, ७~ वन्नादासजी वर्तमान हैं । इनके सुयोग शिष्य पूर्णदासजी भी अच्छे संत हैं । १~ चरणदासजी प्रसिद्ध संत तथा पुजारी थे । ८~ सुखरामजी मान्यता प्राप्त पुजारी हुये हैं ।
.
आचार्य निर्भयरामजी के खालसे का दूसरा स्थान-नारायणा में है । इसमें रामदयालदासजी वि. सं. १८५१ में थे, उनके हरविलासदासजी । आगे इस स्थान की प्रणाली अप्राप्त है । तीसरा स्थान नारायणा में केशवरामजी वि. सं. १८९१ में थे । आगे इस स्थान की प्रणाली भी अप्राप्त है । चौथा स्थान-तुलसीदासजी वि. सं. १९०८ में थे । उनके तोतारामजी हुये । आगे इस स्थान की भी प्रणाली प्राप्त नहीं हो रही है ।
.
निर्भयरामजी महाराज के खालसे की एक चरणदासजी की प्रणाली चल रही है । इनका एक स्थान नारायणा ग्राम में कुंड के पास सुखरामदासजी वाला स्थान है । नारायणा के खाख चौक में तालाब के किनारे पुजारी चरणदासजी की बगीची भी विद्यमान है । पुजारी सुखरामदासजी ने कुंडवाली हवेली तथा अपनी सभी संपत्ति दादू पंथ के वर्तमान आचार्य को भेंट कर दी थी । खाख चौक की बगीची भी आचार्यजी को भेंट कर दी थी । इस परंपरा में चरणदासजी पुजारी तथा सुखरामदास जी पुजारी दोनों अच्छे महात्मा हो गये हैं । अन्य संत भी भजनानन्दी ही हुये हैं ।
.
९ वें आचार्य जीवणदासजी महाराज के खालसे का अब कोई स्थान नहीं है और पूर्व का विवरण भी नहीं मिल रहा है । आप गादी पर ६ वर्ष विराजे थे । अतः आपने अधिक शिष्य भी नहीं किये हों तथा आप परम विरक्त भजनानन्दी थे । अतः शिष्य करना भी नहीं चाहते होंगे । कोई भी कारण हो । आपके खालसे के स्थान अब नहीं हैं ।
.
१० वें आचार्य दिलेरामजी महाराज के खालसे में भी अब कोई स्थान शेष नहीं है तथा पूर्व का विवरण भी नहीं मिल सका है । दिलेरामजी महाराज ने अपना उत्तराधिकारी अपने ज्येष्ठ शिष्य रामबगसजी को बनाया था किन्त्तु वे गद्दी पर केवल १७ दिन विराजकर विरक्त होने से गद्दी छोड़कर विचर गये थे । उनका स्थान हरमाड़ा ग्राम में है । वे हरमाड़ा में रहने लग गये थे । उस स्थान को दादूद्वारा अस्थल से बोलते थे । यह स्थान हरमाड़ा ग्राम के बीच में है । स्थान के नीचे दुकानें भी हैं । एक मकान और एक दुकान अलग भी है ।
.
कृषि योग्य भूमि और कुंआ भी था किन्तु अब स्थान में कोई साधु नहीं है । इस स्थान के अन्तिम उत्तराधिकारी रामरसदासजी हुये हैं । यह स्थान अच्छा प्रतिष्ठित था । ग्राम के ठाकुर व बस्ती इस पर पूर्ण श्रद्धा रखती थी । कारण यहां निवास करके परम विरक्त रामबागसजी महाराज ने भजन किया था और उनकी शिष्य परंपरा के संत भी भजनानन्दी होते रहे होंगे । अतः भजनानन्दी संतों का आश्रम होने से सबकी श्रद्धा थी किन्तु अब स्थान समाप्त है ।
.
११ वें आचार्य प्रेमदासजी महाराज के खालसे के स्थान भी अब नहीं हैं और पूर्व का विवरण कुछ नहीं मिल सका है ।
(क्रमशः)

*४७. अध्यातम कौ अंग २१/२४*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
.
*४७. अध्यातम कौ अंग २१/२४*
.
जोगी जल पीवै सदा, पच्छिम नीर निवांण ।
जगजीवन ऊँड़ा७ अथग८, जांणै सोई जांण ॥२१॥
(७. ऊँडा=गहरा)   {८. अथग=अथाह(अगाध)}
सच्चा योगी सदा पश्चिम दिशा के शांत जल को पीता है । यहाँ पश्चिम नीर का अर्थ है सुषुम्ना नाड़ी से बहने वाला अमृत, और निवांण का अर्थ है इड़ा-पिंगला को रोक कर पश्चिमवाहिनी* करना । संत जगजीवन जी कहते हैं वह जल बहुत गहरा और अथाह है, उसका स्वाद वही जानता है जिसने पीया है ।
{पश्चिमवाहिनी*=हमारी साँस सामान्य दिनों में आगे की तरफ बहती है, संसार की तरफ । इसे पूर्ववाहिनी कहते हैं । जब योगी प्राणायाम से इड़ा(बायीं) और पिंगला(दायीं) नाड़ी को रोक देता है, तब प्राण बीच वाली नाड़ी सुषुम्ना में चलने लगता है । यह सुषुम्ना नाड़ी रीढ़ की हड्डी के साथ-साथ पीछे की ओर, ऊपर की तरफ जाती है। पीछे की दिशा को ही शास्त्रों में पश्चिम दिशा कहा गया है । तो पश्चिमवाहिनी का अर्थ हुआ - प्राण को संसार की ओर से मोड़ कर, पीछे रीढ़ के रास्ते से ऊपर सहस्रार की ओर ले जाना । इसी को उल्टी गंगा बहाना या उल्टी चाल भी कहते हैं ।}
.
प्राण रि देह न पूतला, सैंदेही९ सब जाइ ।
जगजीवन तो जांणिये, जाण्यां जोग जगाइ ॥२२॥
(९. सैंदेही=अनायास ही)
प्राण कोई देह का पुतला नहीं है । देह के बिना भी प्राण अपने आप ही सब जगह चला जाता है । संत जगजीवन जी कहते हैं उस प्राण-तत्व को तो तभी जाना जाता है, जब योग को जगा कर ज्ञान प्राप्त किया जाए ।
.
कोइ बिरला जोगी जोगवे, मनसा देवी१ लार२ ।
कहि जगजीवन जहाँ आप हरि, तहँ मिलि करैं विचार ॥२३॥
(१. मनसा देवी=मन की वृत्ति)   (२. लार=साथ)
कोई बिरला ही योगी होता है जो अपनी मन की वृत्ति रूपी मनसा देवी को साथ लेकर योग साधता है । संत जगजीवन जी कहते हैं जहाँ स्वयं हरि विराजमान हैं, वहीं मन को ले जाकर उससे मिल कर विचार करना चाहिए ।
.
रांम रांम हरि रांमजी, आधारे आधार३ ।
कहि जगजीवन गणेश अगणित, सिधि बुधि सक्ती सार ॥२४॥
(३. आधार=हठयोग के छह चक्रों में प्रथम आधारचक्र) 
राम-नाम ही सबका मूल आधार है, यहाँ तक कि हठयोग के छह चक्रों में जो पहला मूलाधार चक्र है, उसका भी आधार वही राम है । संत जगजीवन जी कहते हैं वही राम अगणित गणेश रूप हैं और सिद्धि, बुद्धि तथा समस्त शक्तियों का सार हैं ।
(क्रमशः)