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🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*घीव दूध में रमि रह्या, व्यापक सब ही ठौर ।*
*दादू वक्ता बहुत हैं, मथि काढैं ते और ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*नरेन्द्र तथा धर्मप्रचार । ध्यानयोग और कर्मयोग*
नरेन्द्र 'दानवों के कमरे' में बैठे हुए हैं । चुन्नीलाल, मास्टर तथा मठ के और भाई भी बैठे हुए हैं । धर्म-प्रचार की बातें होने लगी ।
मास्टर - (नरेन्द्र से) - विद्यासागर कहते हैं, 'मैं तो बेतों की मार खाने के डर से ईश्वर की बात किसी दूसरे से नहीं कहता ।'
नरेन्द्र - बेतों की मार खाने का क्या मतलब ?
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मास्टर - विद्यासागर कहते हैं, 'सोचो मरने के बाद हम सब ईश्वर के पास गये । सोचो कि केशव सेन को यमदूत ईश्वर के पास ले गये । केशव ने संसार में पाप भी किया है । जब यह सप्रमाण सिद्ध हुआ, तब बहुत सम्भव है, ईश्वर कहें कि इसे पच्चीस बेंत लगाओ । इसके बाद, सोचो, मुझे ले गये । मैं भी अगर केशव सेन के समाज में जाता हूँ, अन्याय करता हूँ, तो इसके लिए सम्भव है, आदेश हो कि इसको बेंत लगाओ ।
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तब, अगर मैं कहूँ कि केशव सेन ने ही मुझे इस तरह समझाया था, तो सम्भव है कि ईश्वर दूत से कहें, "केशव सेन को फिर ले आओ ।" केशव के आने पर सम्भव है, उससे वे पूछें - "क्या तूने इसे उपदेश दिया था ? खुद तो तू ईश्वर के सम्बन्ध में कुछ जानता नहीं और दूसरे को उपदेश दे रहा था ? है कोई - इसको पच्चीस बेंत और लगाओ ।" " (सब हँसते हैं)
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"इसीलिए विद्यासागर कहते हैं, 'मैं खुद तो सम्हल सकता ही नहीं, फिर दूसरों के लिए बेंत क्यों सहूँ ? (सब हँसते हैं) मैं खुद तो ईश्वर के सम्बन्ध में कुछ जानता नहीं, फिर दूसरे को क्या लेक्चर देकर समझाऊँ ?’ "
नरेन्द्र - जिसने इस विषय को (ईश्वर को) नहीं समझा, उसने और दस-पाँच विषयों को कैसे समझ लिया ?
मास्टर - दस-पाँच विषय कैसे ?
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नरेन्द्र - जिसने इस विषय को नहीं समझा, उसने दया और उपकार कैसे समझ लिया ? – स्कूल कैसे समझ लिया ? स्कूल खोलकर बच्चों को विद्या पढ़ानी चाहिए और संसार में प्रवेश करके, विवाह करके, लड़कों और लड़कियों का बाप बनना ही ठीक है, यही कैसे समझ लिया ?
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"जो एक बात को अच्छी तरह समझता है, वह सब बातों की समझ रखता है ।"
मास्टर - (स्वगत) - सच है, श्रीरामकृष्ण भी तो कहते थे - "जिसने ईश्वर को समझा है, वह सब कुछ समझता है ।" और संसार में रहना, स्कूल करना, इन सब बातों के सम्बन्ध में उन्होंने कहा था, "ये सब रजोगुण से होते हैं ।" विद्यासागर में दया है, इस प्रसंग में उन्होंने कहा था, "यह रजोगुणी सत्त्व है, इसमें दोष नहीं ।"
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भोजन आदि के पश्चात् मठ के सब गुरुभाई विश्राम कर रहे हैं । मास्टर और चुन्नीलाल नैवेद्यवाले कमरे के पूर्व ओर अन्दर से महल की जो सीढ़ी है, उसके पटाव पर बैठे हुए वार्तालाप कर रहे हैं । चुन्नीलाल बतला रहे हैं किस तरह उन्होंने दक्षिणेश्वर में पहले-पहले श्रीरामकृष्ण के दर्शन किये ।
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संसार में जी नहीं लग रहा था, इसलिए एक बार वे पहले संसार छोड़कर चले गये थे और तीर्थों में भ्रमण किया करते थे । वही सब बातें हो रही हैं । कुछ देर में नरेन्द्र भी पास आकर बैठे । फिर योगवासिष्ठ की बातें होने लगीं ।
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नरेन्द्र - (मास्टर से -) और विदूरथ का चाण्डाल होना ?
मास्टर - क्या तुम लवण की बात कह रहे हो !
नरेन्द्र - अच्छा, क्या आपने योगवासिष्ठ पढ़ा है ।
मास्टर - हाँ, कुछ पढ़ा है ।
नरेन्द्र - क्या यहीं की पुस्तक पढ़ी है ?
मास्टर - नहीं, मैंने घर में कुछ पढ़ा था ।
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मठ की इमारत से मिली हुई पीछे कुछ जमीन है ! वहाँ बहुतसे पेड़-पौधे हैं । मास्टर पेड़ के नीचे अकेले बैठे हुए हैं, इसी समय प्रसन्न आ पहुँचे । दिन के तीन बजे का समय होगा ।
मास्टर - इधर कुछ दिनों से कहाँ थे तुम ! तुम्हारे लिए सब के सब बड़े सोच में पड़े हुए हैं । उनसे मुलाकात हुई ? तुम कब आये ?
प्रसन्न - मैं अभी आया, आकर मिल चुका हूँ ।
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मास्टर - तुमने चिट्ठी लिखी थी कि मैं वृन्दावन चला । हम लोग बड़ी चिन्ता में पड़े थे । तुम कितनी दूर गये थे ?
प्रसन्न – कोन्नगर तक गया था । (दोनों हँसते हैं)
मास्टर - बैठो, जरा कुछ कहो, सुनूँ । पहले तुम कहाँ गये थे ?
प्रसन्न - दक्षिणेश्वर कालीमन्दिर - एक रात वहीं रहा ।
मास्टर - (सहास्य) - हाजरा महाशय अब किस भाव में हैं ?
प्रसन्न - हाजरा ने कहा, 'मुझे भला क्या समझते हो ?' (दोनों हँसते हैं)
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मास्टर - (सहास्य) - तुमने क्या कहा ?
प्रसन्न - मैं चुप हो रहा ।
मास्टर – फिर ?
प्रसन्न - फिर उसने कहा, 'मेरे लिए तम्बाकू ले आये हो ?' (दोनों हँसते हैं) मेहनत पूरी करा लेना चाहता है । (हास्य)
मास्टर - फिर तुम कहाँ गये ?
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प्रसन्न - फिर कोन्नगर गया । रात को एक जगह पड़ा रहा । और भी आगे चले जाने के लिए सोचा । पश्चिम जाने के लिए किराये के लिए भलेमानसों से पूछा कि यहाँ किराया मिल सकता है या नहीं ।
मास्टर - उन लोगों ने क्या कहा ?
प्रसन्न - कहा, 'धेली-रुपया कोई चाहे दे दे, पर इतना किराया अकेला कौन देगा ?' (दोनों हँसे)
मास्टर - तुम्हारे साथ क्या था ?
प्रसन्न - दो-एक कपड़े और श्रीरामकृष्णदेव की तस्वीर । तस्वीर मैंने किसी को नहीं दिखलायी ।
(क्रमशः)