बुधवार, 30 अप्रैल 2014

= ११६ =


#daduji
卐 सत्यराम सा 卐 
कोरा कलश अवाह का, ऊपरि चित्र अनेक । 
क्या कीजे दादू वस्तु बिन, ऐसे नाना भेष ॥ 
बाहर दादू भेष बिन, भीतर वस्तु अगाध । 
सो ले हिरदै राखिये, दादू सन्मुख साध ॥ 
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*मंथन* ~ Ashok Kumar Jaiswal

अँग्रेजी भाषा में एक शब्द है "PERSONALITY" 
जिसका हिंदी में अर्थ "व्यक्तित्व" बताया जाता है .... !! 
वास्तव में यह अर्थ सिरे से ही गलत है....हकीकतन "PERSONALITY" के लिए हिंदी में कोई सठीक अर्थ या व्याख्या है ही नहीं .... !! 

प्राचीनकाल में "ग्रीस" के नाट्यघरों में कलाकार जिस भूमिका को निभाते थे उस पात्र को हूबहू अभिव्यक्त करता हो ऐसा एक मुखौटा अभिनय के वक्त ओढ़ लेते थे, वह मुखौटा PERSONA कहलाता था....इसी "PERSONA" से "PERSONALITY" बना जिसका वास्तविक अर्थ बनता है "ओढ़ा हुआ व्यक्तित्व" .... !! 

वस्तुतः सँसार में जितने भी मुखौटे हैं, सब के सब ओढ़े हुए व्यक्तित्व ही हैं....इनसे अपना खुद का मौलिक व्यक्तित्व ढँक जाता है और इसके अन्दर का माल तो कुछ और दीखे, बाहर का कुछ और नज़र आता है .... !! 

हमें नकाबों से बहुत ज्यादा लगाव हो गया है, तस्वीर चाहे किसी की हो या फिर अपनी ही क्यों न हो दरअसल लगभग हम सब एक न एक नकाब ओढ़े हुए हैं....असली तस्वीर तो सभी को बहुत जगह दिखाई पड़ भी जाएगी पर वह चेहरा असली है इसकी गारंटी तो फिर भी नहीं है, क्या जाने अन्दर कौन महाशय बैठे हों .... !! 

आज हर कोई अपना वास्तविक रूप छुपा कर रखना चाहता है और सच्चाई से सब बचते फिरते हैं, ऐसा क्यों .... ?? 

शायद इसलिए कि सभी अपना मनपसंद नकाब ओढ़े हुए हैं .... !!

= ११५ =

#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
साच अमर जुग जुग रहै, दादू विरला कोइ । 
झूठ बहुत संसार में, उत्पत्ति परलै होइ ॥ 
दादू झूठा बदलिये, साच न बदल्या जाइ । 
साचा सिर पर राखिये, साध कहै समझाइ ॥ 
साच न सूझै जब लगै, तब लग लोचन अंध । 
दादू मुक्ता छाड़ कर, गल में घाल्या फंद ॥ 
साच न सूझै जब लगै, तब लग लोचन नांहि । 
दादू निर्बंध छाड़ कर, बंध्या द्वै पख मॉंहि ॥ 
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*मंथन* ~ Ashok Kumar Jaiswal 

ईमानदारी के बिना आत्मविश्वास और कार्यकुशलता दोनों ही मर जाते हैं....!! 
यह सच है बिना ईमानदार हुये सही मायनों में सफलता नहीं पायी जा सकती है....बेईमानी से सफलता का धोखा दिया जा सकता है, भ्रम पैदा किया जा सकता है पर पाया नहीं जा सकता .... !! 
ईमानदारी एक ऎसा गुण है जिसे जीवन में उतार लेने पर जीवन की सार्थकता पूर्ण हो जाती है, इससे न केवल मानव मात्र का बल्कि संपूर्ण समाज और राष्ट्र का परिवर्तन हो सकता है .... !! 
मानव अपनी गलतियों को छिपाने के लिए असत्य का बहाना करता है, किसी से कभी कोई अनबन हो जाने पर बिना छोटे-बड़े की ग्रंथि पाले स्वतंत्र रूप से परापर ईमानदारी पूर्वक चर्चा कर लेने पर एक-दूसरे के प्रति शिकायतें दूर होकर सारी बातें लोक-मर्यादा में ही संपन्न होकर अपने सुनिश्चित एवं सार्थक परिणाम भी दे जाती हैं .... !! 
ईमानदारी से काम करने पर सर्वत्र प्रसन्नता जन्मेगी, इससे समाज समृद्ध होने के साथ-साथ देश आगे बढ़ता है....ईमानदारी से ही रामराज्य की कल्पना साकार हो सकती है .... !! 
अपनी भूलें न मानने के कारण ही पूर्ण परिवार का आपसी सद्भाव और प्रेम सूखने लगता है, परिवार में की गई ईमानदारी ही राष्ट्र और विश्व को शक्ति प्रदान करती है....ईमानदारी यदि सच्चे और खुले मन से अपनाई जाए तो मानव जीवन अत्यंत पावन, सात्विक और महानता का पुंज बन सकता है परंतु मन की ईमानदारी को प्रतिदिन के जीवन में उतारनी पड़ेगी .... !! 
सत्य वचन मात्र शब्दों का ही सत्य नहीं अपितु भावों को सच्ची ईमानदारी से रखना ही सार्थक होता है, अपने संकुचित स्वार्थ से पृथक जगत के कल्याण के लिए आवश्यकता पड़ने पर झूठ बोलने का पाप नहीं लगता....अपने कलुषित स्वार्थ में छल से बोला गया सत्य वचन भी अमंगलकारी बन जाता है, यदि शब्दों द्वारा सत्य वचन से भावनाएं झूठी लगें तो वह सत्य भी असत्य ही रहता है .... अतः मनुष्य का सबसे बड़ा गुण है ईमानदारी....ईमानदारी सारी सफलता का मूल है, उसके बिना आत्मविश्वास और कार्यकुशलता दोनों ही मर जाते हैं .... !!

१. गुरुदेव को अंग ~ १६

#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
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*सवैया ग्रन्थ(सुन्दर विलास)* 
साभार ~ @महंत बजरंगदास शास्त्री जी, 
पूर्व प्राचार्य - श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व 
राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान) 
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*पढ़े के न बैठ्यो पास आखिर न बांचि सकै,*
*बिन ही पढ़े तैं कैसें आवत है फ़ारसी ।*
*जौंहरी के मिलै बिन परख न जानैं कोई,*
*हाथ नग लिये फिरै संशै नहिं टारसी ॥*
*वैद हू मिल्यौ न कोऊ बूंटी कौ बताइ देत,*
*भेद बिनु पाये वाकै औषध है छारसी ।*
*सुन्दर कहत मुख रंच हूं न देख्यौ जाइ,*
*गुर बिन ज्ञान ज्यौं अंधेरै मांहि आरसी ॥१६॥*
गुरु के बिना ज्ञान का असम्भव : 
१. जब तक कोई विद्यार्थी पहले से किसी पाठशाला में पढ़कर नहीं आयगा या उसे अक्षर ज्ञान न होगा, तो वह कुछ भी पढ़े बिना फारसी के समान किसी गम्भीर भाषा का ज्ञान कैसे प्राप्त कर सकेगा ! 
२. जैसे हाथ में लिये हुए रत्न की परीक्षा किसी जौहरी(रत्न - परीक्षक) के बिना नहीं हो सकती, भले ही वह उसे लेकर कहीं भी फिरता रहे, उसका वह रत्नविषयक सन्देह निराकृत नहीं हो सकता । 
३. जैसे किसी औषध की वास्तविकता ज्ञानी वैद्य के बिना नहीं जानी जा सकती, फिर वास्तविकता जाने बिना वह औषध उसके लिये राख के समान ही है ।
४. जैसे अन्धकार होने पर किसी दर्पण में अपनी मुखाकृति नहीं देखी जा सकती; श्री सुन्दरदास जी कहते हैं - इसी तरह गुरु द्वारा ज्ञान प्राप्त किये बिना साधक की सन्मार्ग में प्रवृत्ति नहीं हो सकती ॥१६॥ 
(क्रमशः)

*दादू करह पलाण कर ~ २९/२५*

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साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*काल का अंग २५/२९*
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*दादू करह पलाण कर, को चेतन चढ़ जाइ ।*
*मिल साहिब दिन देखतो, सांझ पड़े जनि आई ॥२९॥*
दृष्टांत -
बाणिक पुत्र ठग वश भया, दिये चार दृष्टांत ।
सूवा वाज कुत्ता रु मृग, करह चढ़ गया कंत ॥५॥
एक वैश्य पुत्र धन कमाने के लिये विदेश गया था । धम कमाकर घर लौटने लगा तो सोचा - धन को साथ लेकर निर्विघ्न घर पहुँचना कठिन है । अतः उसने अपनी कमाई के धन से चार लाल खरीदे और उनको अपनी जंघा को चिरवाकर चारों लाल उसमें रखवा कर टाँका लगवा लिया और अच्छा होने पर घर को चला । मार्ग में एक घर ठगों का आया ।
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उस ठग की पुत्री को दूसरे को पास छिपे हुये धन को जानने की विद्या आती थी । उसने अपने पिता आदि को बता दिया कि इस व्यक्ति के पास चार लाल हैं । इससे उन्होंने इसका अच्छा स्वागत सत्कार किया और उसको अपने घर के एक कमरे में रख दिया । रात्रि को उक्त ठग की पुत्री इसके पास आई और बोली - तुम्हारे पास चार लाल हैं, उनको दे दो नहीं तो तुमको मेरे पिता आदि मार देंगे ।
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वह बोला - मेरे को मार कर के तो जैसे राजा ने तोते को मार करके पश्चात्ताप किया था, वैसे ही पश्चात्ताप करोगे । लड़की ने पू़छा - राजा ने तोते को मार कर पश्चाताप कैसे किया था ? यह कथा मुझे सारी सुनाओ । तब वैश्य पुत्र बोला - एक राजा का पालतू तोता बड़ा बुद्धिमान था । उसे एक अमृत फल प्राप्त हो गया था । उसने वह राजा को देकर खाने को कहा ।
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राजा खाने को तैयार हुआ तब मंत्री ने कहा - पक्षी का लाया हुआ है, अतः परीक्षा करके ही खाना चाहिये और इसकी परीक्षा कल कराना । राजा ने मंत्री की बात मान ली । मंत्री तोता से रुष्ट था । कारण ? राजा कभी - कभी मंत्री की बात न मानकर तोता की मानता था । मंत्री ने वैसा ही बनावटी विष फल रात्रि में अमृत फल के स्थान पर रखकर अमृत फल चुरा लिया ।
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दूसरे दिन उस फल का टुकड़ा कुत्ते को खिलाया । उसके खाने से कुत्ता मर गया । तब राजा ने यह सोचकर कि तोता तो मुझे मारना ही चाहता था । राजा ने तोते को मार डाला । मंत्री ने वह अमृत फल अपनी प्यारी वेश्या को दिया । वेश्या ने राजा को भेंट किया । राजा उसे पहचान गया कि यह तो वही अमृत फल है जो तोते ने मुझे दिया था ।
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वेश्या से पू़छा - यह फल तुम्हें किसने दिया ? वेश्या ने कहा - मंत्री ने दिया था । फिर मंत्री को राजा ने कहा - सत्य - सत्य कहो अमृत फल तुमको कहां से मिला है । असत्य कहने से मृत्यु दंड मिलेगा । तब मंत्री ने सत्य कह दिया कि मैंने चुराकर विषफल रक्खा था । यह सुनकर राजा ने पश्चाताप किया था मैंने मेरे भक्त निर्दोष तोते को व्यर्थ ही मार दिया । वैसे ही मेरे को मारकर आप लोग पश्चाताप ही करेंगे ।
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*दूसरी कथा* - लड़की ने कहा - लाल दे दें, नहीं दोगे तब तो मारेंगे ही । वेश्य पुत्र बोला - जैसे एक राजकुमार ने बाज को मारकर पश्चाताप किया था वैसे ही आप लोग मुझे मारकर पश्चात्ताप ही करेंगे । लड़की ने पू़छा - बाज को राजकुमार ने क्यों मारा था ? मुझे पूरी कथा सुनाओ । वैश्य पुत्र बोला । राजकुमार शिकार को गया था । उसके साथ उसका शिकारी बाज भी साथ था ।
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राजकुमार वन में भ्रमण करता - करता थक गया और प्यास से भी व्याकुल हो गया । फिर एक बड़ के वृक्ष के नीचे जाकर बैठा और देखा कि बड़ के वृक्ष से एक - एक बिन्दु पानी गिर रहा है । उसके पास एक प्याला था । जहां बिन्दु पड़ती थी उसके नीचे रख दिया और सो गया । नींद टूटी तब देखा तो प्याला भर गया था । 
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उसे उठाकर राजकुमार पीने लगा तो मुँह से न लगाया उससे पहलेही बाज ने भूमि पर गिरा दिया । राजकुमार प्यास से व्याकुल तो था ही प्याल क्यों गिराया । उसने बाज को मार दिया । फिर उसकी में विचार आया कि बाज तो मेरा हितैषी था उसने प्याला क्यों गिराया । देखू तो सही यह बिन्दु कहां से गिरती है ?
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फिर राजकुमार ने बड़ पर चढ़कर देखा तो ज्ञात हुआ वह बिन्दु एक विशाल सर्प के मुख से गिर रही थी । यह देखकर राजकुमार ने पश्चाताप किया, कि मैंने मेरे हितैषी निर्दोष बाज को व्यर्थ ही मारा, उसने तो मेरी रक्षा के लिये ही प्याला गिरवाया था । उसे पीनेसे तो मैं अवश्य ही मर जाता । जैसे राजकुमार ने बाज को मारकर पश्चात्ताप किया था, वैसे ही आप लोग मुझे मारकर पश्चात्ताप ही करोगे । इस में क्या संशय है ?
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*तीसरी कथा* - ठग की पुत्री ने फिर कहा - यदि आप लालें नहीं देंगे तब तो मार ही देंगे । फिर वैश्य पुत्र ने कहा - जैसे बणजारे ने कुत्ते को मार कर पश्चात्ताप किया था वैसे ही आप लोग मुझे मारकर पश्चात्ताप ही करोगे । ठग की पुत्री ने पू़छा - बणजारे ने कुत्ते को क्यों मारा था ? मुझे सारी कथा सुनाओ ।
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वैश्य पुत्र बोला - एक बणजारे को धन की आवश्यकता हुई तब वह अपने परम बुद्धीमान कुत्ते को साथ लेकर एक नगर सेठ के पास गया और बोला - मुझे इतना धन चाहिये । उस धन के बदले में मैं मेरा यह परम बुद्धिमान कुत्ता आपके पास रख जाता हूँ । यह जैसे हमारी रक्षा करता था, वैसे सदा आपकी रक्षा करेगा । फिर मैं आपका धन पूरा दे जाऊंगा तब इसे ले जाऊंगा । सेठ ने मान लिया और धन देकर कुत्ता रख लिया । पांच - सात दिन बाद ही सेठ के यहां चोर घुस गये और भारी धन राशि निकाल कर चल दिये ।
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उनके पीछे उक्त कुत्ता छिपकर चला । चोरों ने सोचा - इतनी धन राशि धरों तक ले चलें, इतनी रात नहीं रही है । मार्ग में ही सूर्योदय हो जायगा । अतः इस धन राशि को यहां के तालाब के गहरे पानी में रख चलें । फिर इसकी खोज समाप्त हो जाने पर एक रात्रि को निकालकर ले चलेंगे । फिर उन लोगों ने तालाब के गहरे पानी में धनराशि को रख दी और चल दिये ।
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प्रातः सेठ के यहां चोरी होने का हल्ला हुआ । बहुत लोग एकत्र हो गये । उक्त कुत्ता सेठ की धोती अपने मुख से पकड़ कर खेंचता है, उसे देखकर एक विचारशील व्यक्ति ने कहा - इस कुत्ते के साथ चलें यह क्या कहता है तब सब कुत्ते के पीछे - पीछे चले । कुत्ते ने तालाब में घुसकर जहां धन रखा था, वहां जाकर अपनी गर्दन से संकेत किया यहां है । खोजियां ने भी कहा - चोर तालाब में घुसे हैं फिर सेठ के मानवों ने गोता लगाकर देखा तो सब धन मिल गया सब निकाल लाये ।
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फिर सेठ ने बणजारे को पत्र लिखा कि तुम धन ले गये थे सो सब तुम्हारे कुत्ते से मिल गया है । अब तुम अपने कुत्ते को सँभाल लेना । कुत्ते के गले में उक्त पत्र बाँधकर कुत्ते को कहा - तुम तुम्हारे स्वामी बणजारे के पास चले जाओ । कुत्ता बणजारे के पास पहुँचा । बणजारे ने दूर से देखा तो उसने सोचा - इसने मेरी बात ही खो दी बिन धन दिये पहले ही आ गया । क्रोधित होकर दूर से ही बणजारे ने कुत्ते के गोली मार दी ।
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फिर उसके पास आया तो गले में पत्र बँधा हुआ खोलकर पढ़ा तो ज्ञात हुआ कि यह धन चुकाकर आया है । मैंने इस मेरे परम भक्त बुद्धिमान निर्दोष कुत्ते को व्यर्थ ही मार दिया है । यह सोचकर बणजारे ने बहुत पश्चाताप किया । हे ठगपुत्री ! मुझे मारकर आप लोग भी उक्त बणजारे के समान ही पश्चाताप करेंगे ।
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*चौथी कथा* - ठग की पुत्री ने कहा - लालें देने से ही बचोंगे नहीं तो आप को मार देंगे । वैश्य पुत्र ने कहा - आप मेरे पास तीन पहर से हैं । अच्छे मानवों के साथ सात पग चलने पर ही मित्रता हो जाती है फिर भी आप मेरे को मरावाओगी तो जैसे मित्रद्रोह सी गीदड़ ने पश्चाताप किया था, वैसे आप भी पश्चाताप ही करेंगी । ठगपुत्री ने कहा - मित्रद्रोह से गीदड़ ने कैसे पश्चाताप किया था ? पूरी कथा मुझे सुनाइये ।
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वैश्य पुत्र बोला - एक मृग और एक काक मित्र थे । एक गीदड़ ने उनसे कहा - मुझे भी मित्र बनालो । फिर तीन मित्र हो गये । एक रात्रि को गीदड़ उक्त दोनों को काकडी, मतीरों की बाड़ी में ले गया । तीनों खा कर चले गये । प्रातः बाडी वाले ने मृग और गीदड़ के खोज देखे और बाड़ी में गड़बड़ देखी तो आज उसने जिधर से उक्त पशु आ सकते थे उधर - उधर फेंदे लगा दिये । रात्रि को तीनों आये ।
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रात्रि में काक मृग पर बैठकर ही प्रायः चलता था । गीदड़ तो चालाक था इससे फेंदे से बच गया किन्तु मृग के पग फँदे में बँध गये । काक ने गीदड़ को कहा - मृग के पगों के फँदे तुम अपने दाँतों से काट दो । गीदड़ बोला - मैं गंगाजी गया था तब चमड़े को मुख में लेना़ छोड़ आया था । तब कैसे काटूं ? इस मित्र द्रोह से काक रुष्ट हो गया और काक ने गीदड़ की आँखे फोड दी । फिर काक ने मृग को कहा - जब तक मैं पास बोलता रहूँ तब तक तुम मुरदे के समान पड़े रहना और मैं दूर जाकर बोलूं तब तुम उठकर भाग जाना ।
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प्रातः बाड़ी का मालिक आया तो देखा मृग पर बैठा काक बोल रहा है । उसने सोचा - मृग मर गया है । अतः उसने कुल्हाड़े से मृग के पगों के फँदे काट दिये फिर वह कु़छ दूर चला गया तब काक दूर जाकर बोला तब मृग उठकर भागा । उसके पीछे बाड़ी वाले का कुत्ता भी भागा किन्तु मृग तो हाथ नहीं आया और अंधा गीदड़ हाथ आ गया । तब गीदड़ ने मित्र द्रोह के कारण बहुत पश्चाताप किया था । वैसे ही हे ठग पुत्री मुझे मरवाकर आप भी पश्चाताप ही करेंगी ।
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उक्त लड़की का ठगों ने विवाह इसलिये नहीं किया था कि उसकी विद्या से उन्हें बहुत धन मिलता रहता था । लड़की इतने समय वैश्य पुत्र की बातें भी सुनती रही । वैश्य पुत्र शरीर से भी सुन्दर था और लड़की भी विवाह की इच्छा करती थी । अतः उक्त लड़की का वैश्य पुत्र से प्रेम हो गया । इससे लड़की ने कहा - आपको मृत्यु से बचाने का एक ही उपाय है, आप मुझे अपने साथ ले चलो ।
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वैश्य पुत्र ने कहा - कैसे साथ ले चलूं । ठग पुत्री ने कहा - वह प्रबन्ध तो सब मैं कर लूंगी । तब वैश्य पुत्र ने कहा - फिर तो आप सहर्ष चलें, मैं अवश्य ले चलूंगा । लड़की ने कहा - हमारे दो ऊंट हैं एक रात्रि में तेज चलता है और एक दिन में तेज चलता है । आप दिन में तेज चलने वाले ऊंट पर जीन करके तैयार हो जायें । मैं जो कीमती धन साथ ले जा सकें सो ले आती हूँ फिर उस पर बैठकर चल देंगे । वैश्य पुत्र ने रात्रि में तेज चलने वाले ऊंट पर जीन कर ली । लड़की धन लेकर आई । जल्दी में ध्यान नहीं रहा बैठकर चल दिये ।
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जब सूर्योदय होने पर ऊंट की चाल मंद पड़ी तब लड़की ने कहा - आप रात्रि में तेज चलने वाले ऊंट को ले आये । अब तो वे लोग अपने को आ पकड़ेंगे । वैश्य पुत्र ने पु़छा - फिर कैसे बचेंगे । लड़की ने कहा - यह सामने मार्ग पर विशाल बड़ का वृक्ष आ रहा है वहां चलकर अपन ठहर जायेंगे । वे आयें उससे पहले ही आप बड़ पर चढ़ जाना । वैसा ही किया । इतने में पुत्री का पिता और बड़ा भाई आ पहुँचे, लड़की ने रोते हुये कहा - यह मुझे बहकाकर ले आया है और पेड़ पर चढ़ गया है ।
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लड़की ने वैश्य पुत्र को पहले ही समझा दिया था कि आपको पकड़ने बड़ पर चढ़ेंगे तब मैं वे जिस पर बैठकर आयेंगे उस ऊंट पर बैठकर बड़ की जो यह नीची साखा है उसके नीचे ले आऊंगी, आप इस साखा से ऊंट पर आ जाना फिर हम उनके हाथ नहीं आयेंगे । वैसा ही किया उनको जाते देखकर बड़ पर से लड़की के पिता ने कहा - ऊंचा चढ़कर नीचे देखे तो यह भी धन लाली के लेखे । फिर वे बड़ से उतरे तब तक वह बहुत दूर चले गये थे । पीछे ऊंट रहा वह दिन में बहुत धीरे चलता था ।
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अतः ठग पुत्री को साथ लेकर वैश्य पुत्र अपने देश को चला आया सोई उक्त २९ की साखी में कहा है कि - साधक अपने मन रूप ऊंट पर साधन रूप जीन करके अर्थात् मन द्वारा ध्यान करके उक्त वैश्य पुत्र के समान अपनी बुद्धि को ब्रह्मविचार में लगाकर शीघ्र ही अपने निज स्थान ब्रह्मरूप को प्राप्त करे । बुद्धि यदि साथ देगी तो महामोह और उसका पुत्र काम भी पकड़ने का प्रयत्न करके उक्त वैश्य पुत्र के समान वे नहीं पकड़ सकेंगे ।

= त्र. त./३३-३४ =

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🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
*श्री सन्त-गुण-सागरामृत श्री दादूराम कथा अतिपावन गंगा* ~
स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्‍वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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*(“त्रयोदश - तरंग” ३३-३४)* 
*बादशाह ने अपना सिंहासन छोड़ा*
भूमि अकाश बिचे दिव्य असन, 
देखि रहे दरबारि खरे हैं । 
स्तम्भित होवहिं शाह अकैंबर, 
आसन तेजहिं देखि हुरे हैं ।
आपनु आसन छाँड़ि अकैंबर, 
जोरहिं हाथ रु भूमि परे हैं । 
दादू दयालु हिं मैं न लखी गति, 
साहिब की गति आप धरे हैं ॥३३॥ 
भूमि और आकाश के बीच दिव्य आसन को देखकर सभी दरबारी खड़े हो गये । बादशाह अकबर इस अद्भुत लीला को देखकर स्तम्भित हो गया और दिव्यासन के तेज से डरने लगा । वह अपना सिंहासन छोड़कर, हाथ जोड़े हुये भूमि पर गिर पड़ा, तथा प्रार्थना करने लगा - हे दादू दयालु । मैं आपकी गति नहीं पहिचान सकता, आप तो साहिब जैसी समर्थाई धारण करने वाले हैं । 
तज्यो सिंहासन, करी सलाम, 
तुम मुरसीद, मैं गरीब गुलाम । 
जो दादू का बुरा विचारे, 
ताकूं गज व गैब का मारे ॥३३॥ 
*अकबर का माफी मांगना*
संत दया करि मोहि उबारहु, 
शान्त करो अब आपनु कोपा ।
काजि मुल्ला खल की करतूत जु, 
वे कुटिलाय जु आसन लोपा । 
साधुन की समता सुखदायक, 
वेद कुरान लखे नहिं ओपा ।
ये जग जीव कहाँ लगि जानत, 
मूढ वृथा करि वाद हिं रोपा ॥३४॥ 
हे संत ! दया करके मुझे उबारो, अब अपना कोप शान्त करो । यह सारी करतूत इन दुष्ट काजी मुल्लाओं की है, जिन्होंने आपका आसन छिपाया । ये कुटिलमति आप जैसे सिद्ध - संतों की सुखदायक क्षमता भला कैसे जान सकते हैं ? आपकी उपमा - महिमा तो वेद कुरान द्वारा भी अगम अलक्ष्य है । ये जगत् के साधारण जीव मूढ हैं, जो वृथा ही विवाद कर बैठे हैं ॥३४॥
(क्रमशः)

= सुन्दरी का अंग ३० =(२३/२४)

#daduji
॥ दादूराम सत्यराम ॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*सुन्दरी का अंग ३०*
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*सुन्दरी सुहाग ~*
*प्रेम लहर गह ले गई, अपने प्रीतम पास ।* 
*आत्म सुन्दरी पीव को, विलसै दादू दास ॥२३॥* 
टीका ~ हे जिज्ञासु ! परमेश्वर में अनन्य प्रेम की अवस्था ही, वृत्ति रूप सुन्दरी को पकड़कर आत्मा के स्वरूप में स्थिर करती है । तब शुद्ध बुद्धि रूप सुन्दरी अपने अधिष्ठान स्वरूप चैतन्य आत्मा का भजन करती है ॥२३॥ 
*सुन्दरी को साँई मिल्या, पाया सेज सुहाग ।* 
*पीव सौं खेलै प्रेम रस, दादू मोटे भाग ॥२४॥* 
टीका ~ हे जिज्ञासु ! अति उत्तम वृत्ति पुरुष सुन्दरी को अधिष्ठान चैतन्य रूप परमेश्वर का साक्षात्कार सुहाग प्राप्त होता है । वही मुख प्रीति का विषय परमेश्वर से एकत्व रूपी प्रेम - रस पीकर कृत - कृत्य होती है ॥२४॥
(क्रमशः)

मंगलवार, 29 अप्रैल 2014

*सींगी नाद न बाज ही ~ २१/२५*

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🌷 *#श्रीदादूवाणी०प्रवचनपद्धति* 🌷
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साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*काल का अंग २५/२१*
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*सींगी नाद न बाज ही, कत गये सो जोगी ।*
*दादू रहते मढ़ी में, करते रस भोगी ॥२१॥*
प्रसंग कथा -
गुरु दादू आमेर थे, ढिग जोगी का थान ।
इक दिन सींगी ना बजी, मरगा जोगी जान ॥४॥
गुरुदेव दादूजी जब आमेर में निवास करते थे तब उनके आश्रम के पास ही एक नाथयोगी का भी स्थान था । उस स्थान में वह योगी अपने भक्तों द्वारा लाये हुये अनेक रसों का उपभोग करते थे और सायं, प्रातः सींगी नाद भी बजाते थे । एक रात्रि को उनका देहान्त हो गया । इससे प्रातः सींगी नहीं बजी । दादूजी तो अपने समय पर शारीरिक क्रिया करते ही थे ।
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एक शिष्य ने कहा - स्वामिन् ! अभी तो योगी की सींगी भी नहीं बजी है, अतः रात्रि बहुत है । तब दादूजी ने उक्त २१ कि साखी सुनाकर कहा - आज नाथ योगी अपने आसन पर नहीं हैं । उनका देहांत हो गया है । इसी से सींगी नहीं बजी है । वास्तव में हमारी शीरीरिक क्रिया करने का समय हो गया है । फिर सूर्योदय होने पर सब को ज्ञात हो गया कि नाथजी की देहान्त हो गया है । किन्तु दादूजी ने ब्राह्ममुहूर्त में ही अपने शिष्य को बता दिया था । सो दादूजी की योग शक्ति का द्योतक है ।
(क्रमशः)

#daduji 

श्री दादूवाणी आनन्दलहरी ~ ५

http://youtu.be/lSL9OBn7nA0

जरणा का अंग ~ ५

दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः ।
वंदनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगतः ॥ १ ॥

को साधु राखै रामधन, गुरु बाइक वचन विचार ।
गहिला दादू क्यों रहै, मरकत हाथ गँवार ॥ २ ॥

जनि खोवै दादू रामधन, हिरदै राखि जनि जाइ ।
रतन जतन करि राखिये, चिंतामणि चित लाइ ॥ ३ ॥

दादू मन ही मांहि समझ कर, मन ही मांहि समाइ ।
मन ही मांहि राखिये, बाहर कहि न जनाइ ॥ ४ ॥

दादू समझ समाइ रहु, बाहरि कहि न जनाइ ।
दादू अद्भुत देखिया, तहँ ना को आवै जाइ ॥ ५ ॥

कहि कहि क्या दिखलाइये, सांई सब जाने ।
दादू प्रगट क्या कहै, कुछ समझि सयाने ॥ ६ ॥

दादू मन ही मांहैं ऊपजै, मन ही मांहि समाइ ।
मन ही मांहैं राखिये, बाहर कहि न जनाइ ॥ ७ ॥

लै विचार लागा रहै, दादू जरता जाइ ।
कबहुँ पेट न आफरै, भावै तेता खाइ ॥ ८ ॥

सोइ सेवक सब जरै, जेती उपजै आइ ।
कहि न जनावै और को, दादू मांहि समाइ ॥ ९ ॥

सोइ सेवग सब जरै, जेता रस पीया ।
दादू गुझ गंभीर का, प्रकाश न कीया ॥ १० ॥

सोई सेवक सब जरै, जे अलख लखावा ।
दादू राखै रामधन, जेता कुछ पावा ॥ ११ ॥

सोइ सेवक सब जरै, प्रेम रस खेला ।
दादू सो सुख कस कहै, जहाँ आप अकेला ॥ १२ ॥

सोई सेवक सब जरै, जेता घट परकास ।
दादू सेवक सब लखै, कहि न जनावै दास ॥ १३ ॥

अजर जरै रस ना झरै, घट मांहि समावै ।
दादू सेवक सो भला, जे कहि न जनावै ॥ १४ ॥

अजर जरै रस ना झरै, घट अपना भर लेइ ।
दादू सेवक सो भला, जारै जाण न देइ ॥ १५ ॥

अजर जरै रस ना झरै, जेता सब पीवै ।
दादू सेवक सो भला, राखै रस जीवै ॥ १६ ॥

अजर जरै रस ना झरै, पीवत थाकै नांहि ।
दादू सेवक सो भला, भर राखै घट मांहि ॥ १७ ॥

जरणा जोगी जुग जुग जीवै, झरणा मर मर जाइ ।
दादू जोगी गुरुमुखी, सहजैं रहै समाइ ॥ १८ ॥

जरणा जोगी जग रहै, झरणा परलै होइ ।
दादू जोगी गुरुमुखी, सहज समाना सोइ ॥ १९ ॥

जरणा जोगी थिर रहै, झरणा घट फूटै ।
दादू जोगी गुरुमुखी, काल थैं छूटै ॥ २० ॥

जरणा जोगी जगपती, अविनाशी अवधूत ।
दादू जोगी गुरुमुखी, निरंजन का पूत ॥ २१ ॥

जरै सु नाथ निरंजन बाबा, जरै सु अलख अभेव ।
जरै सु जोगी सब की जीवन, जरै सु जग में देव ॥ २२ ॥

जरै सु आप उपावनहारा, जरै सु जगपति सांईं ।
जरै सु अलख अनूप है, जरै सु मरणा नांहीं ॥ २३ ॥

जरै सु अविचल राम है, जरै सु अमर अलेख ।
जरै सु अविगत आप है, जरै सु जग में एक ॥ २४ ॥

जरै सु अविगत आप है, जरै सु अपरम्पार ।
जरै सु अगम अगाध है, जरै सु सिरजनहार ॥ २५ ॥

जरै सु निज निराकार है, जरै सु निज निरधार ।
जरै सु निज निर्गुणमयी, जरै सु निज तत सार ॥ २६ ॥

जरै सु पूरण ब्रह्म है, जरै सु पूरणहार ।
जरै सु पूरण परमगुरु, जरै सु प्राण हमार ॥ २७ ॥

दादू जरै सु ज्योति स्वरूप है, जरै सु तेज अनन्त ।
जरै सु झिलमिल नूर है, जरै सु पुंज रहंत ॥ २८ ॥

दादू जरै सु परम प्रकाश है, जरै सु परम उजास ।
जरै सु परम उदीत है, जरै सु परम विलास ॥ २९ ॥

दादू जरै सु परम पगार है, जरै सु परम विगास ।
जरै सु परम प्रभास है, जरै सु परम निवास ॥ ३० ॥

दादू एक बोल भूले हरि, सो कोई न जाणै प्राण ।
औगुण मन आणै नहिं, और सब जाणै हरि जाण ॥ ३१ ॥

दादू तुम जीवों के औगुण तजे, सु कारण कौन अगाध?
मेरी जरणा देख कर, मति को सीखें साध ॥ ३२ ॥

पवना पानी सब पिया, धरती अरु आकास ।
चन्द सूर पावक मिले, पंचों एक ग्रास ॥ ३३ ॥

चौदह तीनों लोक सब, ठूंगे श्वासै श्वास ।
दादू साधू सब जरैं, सतगुरु के विश्वास ॥ ३४ ॥

दिव्य प्रेरणा ~ महंत महामंडलेश्वर सन्त श्री १०८ स्वामी क्षमारामजी महाराज

साभार ~ अखिल भारतीय श्री दादू सेवक समाज, दिल्ली

= ११४ =

#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
जब समझ्या तब सुरझिया, उलट समाना सोइ ।
कछु कहावै जब लगै, तब लग समझ न होइ ॥
जब समझ्या तब सुरझिया, गुरुमुख ज्ञान अलेख ।
ऊर्ध्व कमल में आरसी, फिर कर आपा देख ॥ 
दादू आपा उरझे उरझिया, दीसे सब संसार ।
आपा सुरझे सुरझिया, यहु गुरु ज्ञान विचार ॥ 
------------------------------------------------------
*मंथन* ~ Ashok Kumar Jaiswal

हम जिन चीजों अथवा बातों से भयभीत हो जाते हैं, उन्हें हमारा अवचेतन मस्तिष्क देर-सबेर साकार कर देता है और यूँ हम खुद के निर्मित "भस्मासुर" से बचने के लिए यहाँ-वहाँ भागते फिरते हैं परन्तु जब तक भीतर छुपे भय को हिरण्यकश्यप की भाँति ढूँढकर उसका वजूद समाप्त नहीं कर देगें....इसी तरह आजीवन "कष्टनिवारण-संजीवनी" खोजते-खोजते कस्तूरी-मृग की तरह भागते ही फिरेंगें .... !!

वास्तव में यह एक ध्रुव सत्य है कि समस्या के भीतर ही समस्या का समाधान भी छिपा होता है, जरूरत है तो सिर्फ उसे शांतचित्त होकर खोजने की....न कि समस्या से भयभीत होते रहने की .... !!

= ११३ =

#daduji
卐 सत्यराम सा 卐

राम धन खात न खूटै रे,
अपरंपार पार नहिं आवै, आथि न टूटै रे ॥टेक॥
तस्कर लेइ न पावक जालै, प्रेम न छूटै रे ॥१॥
चहुंदिशि पसर्यो बिन रखवाले, चोर न लूटै रै ॥२॥
हरि हीरा है राम रसायन, सरस न सूखै रे ॥३॥
दादू और आथि बहुतेरी, तुस नर कूटै रे ॥४॥
--------------------------------------------
साभार : Savita Savi Lumb ~ श्री राम नाम की महिमा
एक बार पार्वती जी ने भगवान शिवजी से श्री हरि की आराधना के बारे में पूछा तो भगवान शिव ने उनको भगवान श्री विष्णु की श्रेष्ठ आराधना, नित्य-नैमित्तिक कृत्य तथा भगवत्भक्तों की पूजा का वर्णन किया। जिसे सुन कर पार्वती जी ने कहा - नाथ ! आपने उत्तम वैष्णव धर्म का भलीभाँति वर्णन किया। वास्तव में परमात्मा श्री विष्णु का स्वरूप गोपनीय से भी अत्यन्त गोपनीय है। सर्वदेव वन्दित महेश्वर ! मैं आपके प्रसाद से धन्य और कृतकृत्य हो गयी। अब मैं भी सनातन देव श्री हरि का पूजन करूँगी।
श्री महादेव जी बोले - देवी ! बहुत अच्छा, बहुत अच्छा ! तुम सम्पूर्ण इन्द्रियों के स्वामी भगवान लक्ष्मीपति का पूजन अवश्य करो। भद्रे ! मैं तुम-जैसी वैष्णवी पत्नी को पाकर अपने को कृतकृत्य मानता हूँ।
वसिष्ठजी कहते हैं- तदनन्तर महादेव जी से उपदेशानुसार पार्वती जी प्रतिदिन श्रीविष्णुसहस्त्रनाम का पाठ करने के पश्चात भोजन करने लगीं। एक दिन परम मनोहर कैलास शिखर पर भगवान श्री विष्णु की आराधना करके भगवान शंकर ने पार्वतीदेवी को अपने साथ भोजन करने के लिये बुलाया। तब पार्वति देवी ने कहा - "प्रभो ! मैं श्रीविष्णुसहस्त्रनाम का पाठ करने के पश्चात भोजन करूँगी, तब तक आप भोजन कर लें" यह सुन कर महादेव जी ने हँसते हुए कहा - "पार्वती ! तुम धन्य हो, पुण्यात्मा हो ; क्योकि भगवान श्रीविष्णु में तुम्हारी भक्ति है। देवि ! भाग्य के बिना भगवान श्रीविष्णु की भक्ति प्राप्त होना बहुत कठिन है। सुमुखि ! मैं तो "राम ! राम ! राम !" इस प्रकार जप करते हुये परम मनोहर श्रीराम नाम में ही निरन्तर रमण किया करता हूँ । राम-नाम सम्पूर्ण सहस्त्रनाम के समान है। पार्वती ! रकारादि जितने नाम हैं, उन्हें सुनकर रामनाम ही आशंका से मेरा मन प्रसन्न हो जाता है।
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श्रीराम राम रामेति रमे रामे मनोरमे । 
सहस्त्रनाम ततुल्यं रामनाम वरानने ॥
रकारादीनि नामानि श्रृण्वतो म्म पार्वति । 
मनः प्रसप्रतां याति रामनामाभिशंकया ॥
(२८१ । २१-२२)
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अतः महादेवि ! तुम राम-नाम का उच्चारण करके इस समय मेरे साथ भोजन करो ।" यह सुन कर पार्वती जी ने राम-नाम का उच्चारण करके भगवान शंकर के साथ बैठकर भोजन किया। इसके बाद उन्होने प्रसन्नचित होकर पूछा - ‘ देवेश्वर ! आपने राम-नाम को सम्पूर्ण सहस्त्र नाम के तुल्य बतलाया है यह सुन कर राम-नाम में मेरी बडी भक्ति हो गयी है अतः भगवान श्री राम के यदि और भी नाम हों तो बताइये।’
श्री महादेव जी बोले - "पार्वती ! सुनो, मैं श्रीरामचन्द्र जी के नामों का वर्णन करता हूँ। लौकिक और वैदिक जितने भी शब्द हैं, वे सब श्रीरामचन्द्रजी के ही नाम हैं। किन्तु सहस्त्रनाम उन सबमें अधिक है और उन सहस्त्रनामों में भी श्रीराम के एक सौ आठ नामों की प्रधानता अधिक है। श्रीविष्णु का एक-एक नाम ही सब वेदों से अधिक माना गया है। वैसे ही एक हजार नामों के समान अकेला श्रीराम-नाम माना गया है। पार्वती ! जो सम्पूर्ण मन्त्रों और समस्त वेदों का जप करता है, उसकी अपेक्षा कोटिगुना पुण्य केवल राम-नाम से उपलब्ध होता है !


१. गुरुदेव को अंग ~ १५

#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
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*सवैया ग्रन्थ(सुन्दर विलास)* 
साभार ~ @महंत बजरंगदास शास्त्री जी, 
पूर्व प्राचार्य - श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व 
राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान) 
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*गुरु बिन ज्ञांन नांहि गुरु बिन ध्यान नांहि,*
*गुरु बिन आतम - बिचार न लहतु है ।*
*गुरु बिन प्रेम नांहि गुरु बिन प्रीति नांहि,*
*गुरु बिन शील हू सन्तोष न गहतु है ॥*
*गुरु बिन प्यास नांहि बुधि कौ प्रकाश नांहि,*
*भ्रम हू कौ नाश नांहि संशय रहतु है ।*
*गुरु बिन बाट नांहि कौड़ी बिन हाट नांहि,*
*सुन्दर प्रकट लोक वेद यौं कहतु है ॥१५॥*
किसी भी साधक को गुरु के बिना ज्ञान एवं ध्यान का मार्ग नहीं मिल पाता, न वह गुरु के बिना आत्मविचार में ही प्रवृत्त हो सकता है । 
गुरु के बिना साधक का प्रभु में न प्रेम हो सकता है, न प्रीति; तथा न वह उसके बिना सदाचार एवं सन्तोष आदि सद्गुण ही प्राप्त कर सकता है ।
गुरु के बिना साधक को न आत्मज्ञान - पिपासा हो सकती है और न उस के हृदय में ज्ञान का प्रकाश ही हो सकता है; न उसके जगद्विषयक भ्रम एवं सन्देह ही दूर हो सकते हैं । 
जैसे किसी सच्चे पथप्रदर्शक के बिना मार्गज्ञान नहीं हो पाता; या जैसे पैसे(कौड़ी) के बिना बाजार से कोई वस्तु नहीं खरीदी जा सकती; श्री सुन्दरदास जी कहते हैं - वैसे ही 'गुरु के बिना किसी भी साधक को सन्मार्ग में प्रवृत्ति नहीं हो सकती' - यह बात समस्त संसार और शास्त्रों द्वारा स्पष्टत: कही गयी है ॥१५॥
(क्रमशः)

= त्र. त./३१-३२ =

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🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
*श्री सन्त-गुण-सागरामृत श्री दादूराम कथा अतिपावन गंगा* ~
स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्‍वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
.
*(“त्रयोदश - तरंग” ३१-३२)* 
*तेज का कमलासन तखत* 
एकहिं एक भिड़े सब बैठत, 
ठौर नहीं कछु भी तिल जाये । 
आवत सोहि फकीर कहाँ इत, 
बैठन की निज ठौर बनाये ॥ 
तेज स्वरूप रच्यो कमलासन, 
अद्भुत देख अचम्भ भराये । 
व्योम दिपै अधरा गुरु आसन, 
तेजहिं पुंज प्रकाश रहाये ॥३१॥ 
फिर एक से एक सटकर इस तरह बैठ गये कि - पूरे दरबार भवन में तिल रखने की जगह भी नहीं छोड़ी । वे मूढ़ परस्पर बातें करने लगे कि - देखें, अब वह फकीर आकर कहाँ बैठता है ? सिद्ध संत श्री दादूजी ने दरबार की स्थिति को देखा और तत्काल तेजोमय कमलासन की रचना की । सभी दरबारी यह देखकर अचम्भित रह गये कि - अधर आकाश में गुरुदेव का कमलरूप सिंहासन सुशोभित हो रहा है, उसका दिव्य तेजपुंज सर्वत्र प्रकाश फैला रहा है ॥३१॥ 
छाय रहि छवि तेज सिंहासन, 
कोटिक भानु उजास भये है । 
वर्ण सकै जन कौन महामति, 
शारद शेष न पार लह्ये है । 
जय जय शब्द भये नभ तै जब, 
दिव्यहिं पुष्प झराय रह्ये है । 
और सबै शिष स्तुति गावत, 
चामर टील झुलाय थह्ये है ॥३२॥ 
उस तेजोमय सिंहासन की छवि कोटि सूर्यों के समान उजागर होने लगी । उसकी महिमा कौन महामति वर्णन कर सकता है, जिसका पार शारदा और शेषनाग भी नहीं पा सकते । आकाश में जय - जय शब्द होने लगे, दिव्य पुष्पों की वर्षा होने लगी । सभी शिष्य संत स्तुति करने लगे, टीलाजी चामर ढुलाने लगे ॥३२॥ 
(क्रमशः)

= सुन्दरी का अंग ३० =(२१/२२)

#daduji
॥ दादूराम सत्यराम ॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*सुन्दरी का अंग ३०*
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*सुन्दरी मोहे पीव को, बहुत भाँति भरतार ।*
*त्यों दादू रिझवै राम को, अनन्त कला करतार ॥२१॥* 
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! पतिव्रता स्त्री अपने पति को, अनेकों प्रकार की सेवा द्वारा, अपने वश कर लेती है । इसी प्रकार अनन्य भक्तों की वृत्ति रूप सुन्दरी, निर्वासनिकता आदिक भाव द्वारा, सृष्टि - कर्त्ता परमेश्वर को रिझा लेती है ॥२१॥ 
*नदियाँ नीर उलंघ कर, दरिया पैली पार ।* 
*दादू सुन्दरी सो भली, जाइ मिले भरतार ॥२२॥* 
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! ब्रह्मऋषि दादूदयाल महाराज कहते हैं कि आशा तृष्णा रूप ही तो नदी है मन के मनोरथ ही इसमें जल है और संसार ही दरियाव है । परन्तु इसके अध्यास को छोड़ना ही पार होना है । इस साधना द्वारा जो मुमुक्षुओं की वृत्ति रूप सुन्दरी अधिष्ठान - चैतन्य से अभेद होती है, वही धन्य है ॥२२॥
(क्रमशः)

सोमवार, 28 अप्रैल 2014

= ११२ =


#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
उपज्यो प्रपंच अनादिको,
यह महामाया विस्तरी । 
नानात्व ह्वै करि जगत भास्यो,
बुद्धि सबहिन की हरी ॥ 
जिनि भ्रम मिटाय दिखाय दीयो,
सर्व व्यापक राम हैं । 
दादूदयालु प्रसिद्ध सद्गुरु,
ताहि मोर प्रणाम हैं ॥ 
-------------------------------
श्री योगवशिष्ठ महारामायण ~ 
ब्रह्माण्ड में सिर्फ एक अद्वैत आत्मसत्ता ज्यों की त्यों स्थित है; उसमें नानात्व आभास होते हैं पर वह भ्रममात्र है - वास्तव में ये सब अपने आप एक अनुभव सत्ता है । 

प्रश्न :- जो एक अनुभवसत्ता और मेरा अपना आप है तो मैं इतने काल से क्यों भ्रमता रहा ? 

उत्तर :- हम अविचाररूप भ्रम से भ्रमते रहे हैं । विचार करने से भ्रम शान्त हो जाता है । भ्रम और विचार भी दोनों अपने ही स्वरूप हैं और हमको ही उपजे हैं । जब हमको अपना विचार होगा तब भ्रम निवृत्त हो जावेगा । जैसे दीपक के प्रकाश से अन्धकार नष्ट हो जाता है वैसे ही विचार से द्वैतभ्रम नष्ट हो जावेगा और जैसे रस्सी के जाने से सर्पभ्रम नष्ट हो जाता है और सीप के जाने से रूप भ्रम नष्ट हो जाता है वैसे ही आत्मा के जाने से आधिभौतिक भ्रम शान्त हो जावेगा ।

= १११ =

#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
नाम न आवै तब दुखी, आवै सुख संतोष ।
दादू सेवक राम का, दूजा हर्ष न शोक ॥ 
मिले तो सब सुख पाइये, बिछुरे बहु दु:ख होइ ।
दादू सुख दु:ख राम का, दूजा नाहीं कोइ ॥ 
दादू हरि का नाम जल, मैं मीन ता माहिं ।
संगि सदा आनन्द करै, बिछुरत ही मर जाहिं ॥ 
दादू राम बिसार कर, जीवैं किहिं आधार ।
ज्यूं चातक जल बूँद को, करै पुकार पुकार ॥ 
हम जीवैं इहि आसरे, सुमिरण के आधार ।
दादू छिटके हाथ थैं, तो हमको वार न पार ॥ 
-----------------------------------------
नाम-जप की महिमा ~
प्रश्न‒शास्त्रों, सन्तों ने भगवन्नाम की जो महिमा गायी है, वह कहाँ तक सच्ची है?

उत्तर‒शास्त्रों और सन्तोंने नाम की जो महिमा गायी है, वह पूरी सच्ची है । इतना ही नहीं, आजतक जितनी नाम-महिमा गायी गयी है, उससे नाम-महिमा पूरी नहीं हुई है, प्रत्युत अभी बहुत नाम-महिमा बाकी है । कारण कि भगवान् अनन्त हैं; अत: उनके नाम की महिमा भी अनन्त है‒‘हरि अनंत हरि कथा अनंता’(मानस १।१४०।३) । नाम की पूरी महिमा स्वयं भगवान् भी नहीं कह सकते‒‘रामु न सकहिं नाम गुन गाई’ (१।२६।४) ।

प्रश्न‒नाम की जो महिमा गायी गयी है, वह नामजप करनेवाले व्यक्तियों में देखने में नहीं आती, इसमें क्या कारण है ?

उत्तर‒नाम के माहात्म्य को स्वीकार न करने से नाम का तिरस्कार, अपमान होता है; अत: वह नाम उतना असर नहीं करता । नाम-जप में मन न लगाने से, इष्ट के ध्यान सहित नाम-जप न करने से, हृदय से नाम को महत्त्व न देने से, आदि-आदि दोषों के कारण नाम का माहात्म्य शीघ्र देखने में नहीं आता । हाँ, किसी प्रकार से नाम-जप मुख से चलता रहे तो उससे भी लाभ होता ही है, पर इसमें समय लगता है । मन लगे चाहे न लगे, पर नामजप निरन्तर चलता रहे कभी छूटे नहीं तो नाम-महाराज की कृपा से सब काम हो जायगा, अर्थात् मन लगने लग जायगा, नामपर श्रद्धा-विश्वास भी हो जायँगे, आदि- आदि ।

अगर भगवन्नाम में अनन्यभाव हो और नाम-जप निरन्तर चलता रहे तो उससे वास्तविक लाभ हो ही जाता है; क्योंकि भगवान्‌ का नाम सांसारिक नामों की तरह नहीं है । भगवान् चिन्मय हैं; अत: उनका नाम भी चिन्मय(चेतन) है । राजस्थान में बुधारामजी नामक एक सन्त हुए हैं । वे जब नाम-जप में लगे, तब उनको नाम-जप के बिना थोड़ा भी समय खाली जाना सुहाता नहीं था । जब भोजन तैयार हो जाता, तब माँ उनको भोजन के लिये बुलाती और वे भोजन करके पुन: नाम-जप में लग जाते । एक दिन उन्होंने माँ से कहा कि माँ ! रोटी खाने में बहुत समय लगता है; अत: केवल दलिया बनाकर थाली में परोस दिया कर और जब वह थोड़ा ठण्डा हो जाया करे, तब मेरे को बुलाया कर । माँ ने वैसा ही किया । एक दिन फिर उन्होंने कहा कि माँ ! दलिया खाने में भी समय लगता है; अत: केवल राबड़ी बना दिया कर और जब वह ठण्डी हो जाया करे, तब बुलाया कर । इस तरह लगन से नाम-जप किया जाय तो उससे वास्तविक लाभ होता ही है ।

१. गुरुदेव को अंग ~ १४


#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
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*सवैया ग्रन्थ(सुन्दर विलास)* 
साभार ~ @महंत बजरंगदास शास्त्री जी, 
पूर्व प्राचार्य - श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व 
राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान) 
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*लोह कौं ज्यौं पारस पखान हू पलटि लेत,* 
*कंचन छुवत होई जग मैं प्रवांनिये ।*
*द्रुम कौ ज्यौं चंदन हू पलटि लगाइ बास,* 
*आपु कै समांन तां मैं शीतलता आंनिये ॥*
*कीट कौ ज्यौं भृंग हू पलटि कै करत भृंग,* 
*सोई उड़ि जाइ ताकौ अचिरज मांनिये ।*
*सुन्दर कहत यह सगरै प्रसिद्ध बात,* 
*सद्यः शिष्य पलटै सु सत्य गुरु जांनिये ॥१४॥*
शिष्य को तत्व विचारक बनाने वाला ही गुरु : ये बातें जगत् में प्रसिद्ध हैं कि - 
१. पारस पत्थर साधारण लोह को भी, स्पर्श करते ही, सुवर्ण के रूप में परिवर्तन कर देता है । 
२. चन्दन वृक्ष अपने पास खड़े वृक्षों में भी अपने ही सामान सुगन्ध तथा शीतलता उत्पन्न कर देता है । 
३. इसी तरह भृंग(भवँरा) साधारण कीट को अपनी विशेष ध्वनि, निरन्तर कुछ समय तक सुना कर, अपने सामान भृंग बना लेता है तथा वह उड़ने लगता है - इसे देखकर लोग आश्चर्य करते हैं । 
श्री सुन्दरदास जी कहते हैं - इसी तरह यह बात सर्वजनप्रसिद्ध है कि कोई सच्चा गुरु शिष्य की सांसारिक बुद्धि को भी तत्काल ब्रह्मविचार में लगा देता है । हम तो ऐसे महापुरुष को ही अपना 'गुरु' मानते हैं ॥१४॥ 
(क्रमशः) 

= त्र. त./२९-३० =

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🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
*श्री सन्त-गुण-सागरामृत श्री दादूराम कथा अतिपावन गंगा* ~
स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्‍वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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*(“त्रयोदश - तरंग” २९-३०)* 
शाह कहे - गुरु सूरज रूप जु, 
तेज छिपै नहिं बाद घनेरे ।
साफ भयो दिल, ज्ञान सुन्यो तब, 
पीर सचा, खुद देखहु नेरे ॥ 
मैं दरबार लगाय बुलावहुं, 
आपहि देखहु संत सुकुरे ।
देखन कूं अजमात जुड़े सब, 
नाहिं लखी करता गति तेरे ॥२९॥ 
तब बादशाह ने कहा - गुरुदेव श्री दादूजी सूर्य के समान ज्ञान से प्रकाशित हैं, उनका तप तेज वाद विवाद के बादलों से नहीं छिप सकता । उनका ज्ञान सुनकर मेरा दिल साफ हो गया है, वे सच्चे पीर है । तुम्हें विश्‍वास नहीं हो तो खुद समीप जाकर आजमा लो फिर यकीन हो जावेगा । अच्छा मैं कल दरबार लगाकर, वहाँ उन्हें बुलाता हूँ । तब तुम सब लोग देख परख कर यकीन कर लेना । बादशाह की बात सुनकर संत श्री दादूजी की करामात देखने के लिये दरबार में लोगों की भारी भीड़ जुड़ गई । वे मूढ लोग सृष्टिकर्ता परमेश्‍वर की लीला और संतों की गति भला क्या पहिचाने ॥२९॥ 
*बड़ा भारी दरबार लगा*
आसन बेगि बिछाय अकैंबर, 
भूपति को गुरु पास पठाये ।
भूपति बेगहिं जाय कही गुरु, 
शीश निवाय वृतान्त सुनाये ॥ 
संत विचारत जानत हैं सब, 
ज्यों हरि चाहत होवत आये ।
काजि मुल्ला दरबार जुड़े सब, 
व गुरु आसन देत छिपाये ॥३०॥ 
अकबर ने शाही दरबार में बिछायत करवा कर राजा भगवानदास को भेजा ताकि संत श्री दादूजी को सादर बुला लावे । राजा ने जाकर संत चरणों में शीश निवाया, और दरबार में पधारने हेतु बादशाह का निवेदन सुनाया, तथा इस दरबार के आयोजन का वृतान्त भी सुनाया । अन्तर्यामी संत जान गये और विचार किया कि श्री हरि जो लीला करवाना चाहते हैं, उसका समय आ गया है । दरबार में काजी मुल्लाओं की भीड़ जुटी हुई थी । कुछ धूर्तों ने संत के लिये बिछाया गया था, उस आसन छिपा दिया ॥३०॥ 
(क्रमशः) 

= सुन्दरी का अंग ३० =(१९/२०)

#daduji
॥ दादूराम सत्यराम ॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*सुन्दरी का अंग ३०*
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*नैन बैन कर वारणै, तन मन पिंड पराण ।* 
*दादू सुन्दरी बलि गई, तुम पर कंत सुजान ॥१९॥* 
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! सच्ची पतिव्रता देवी, अपने मन से, अपने पति के ऊपर, नैन - बैन न्यौछावर करती है । अर्थात् सिवाय अपने पति के, न तो नेत्रों से किसी को पुरुष भावना से देखती है और न पति की सिवाय, अपने मुख से किसी का यश कहती है । अपना तन - मन और प्राण, ये सब पति के समर्पित करती है और कहती हैं कि हे पतिदेव ! आप ही मेरे सर्वेसर्वा हैं, मैं आपके ऊपर न्यौछावर जाती हूँ । अथवा संत - वृत्ति सुन्दरी, शरीर के स्थूल, सूक्ष्म संघात सहित, अपने उपास्य देव के आप समर्पित हो गई ॥१९॥
*तन भी तेरा, मन भी तेरा, तेरा पिंड पराण ।*
*सब कुछ तेरा, तूँ है मेरा, यहु दादू का ज्ञान ॥२०॥*
टीका ~ हे परमेश्वर ! यह तन आपका दिया हुआ, आपकी आराधना द्वारा, आपके ही अर्पण करते हैं और मन भी आपके अर्पण है । यह प्राण और स्थूल शरीर, यह सब आपका दिया हुआ, निष्काम कर्मों द्वारा, आपके ही अर्पण करते हैं । स्थूल, सूक्ष्म सौंज सब आपके अर्पण है और आप हमारे हो । यही आपके अनन्य भक्तों का ज्ञान है ॥२०॥
(क्रमशः)

*कहता सुनता देखता ~ २०/२५*

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🌷 *#श्रीदादूवाणी०प्रवचनपद्धति* 🌷
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साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*काल का अंग २५/२०*
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*कहता सुनता देखता, लेता देता प्राण ।*
*दादू सौ कतहूं गया, माटी धरी मशाण ॥२०॥*
दृष्टांत -
चले जात बाजन्द मग, ऊंट पड़ा इक देख ।
कहा उठाओ को उठै, चेतन गया अलेख ॥३॥
बाजिन्द बुखारा बादशाह के पुत्र थे । इनके पिता को एक ज्योतिषी ने कहा था तुम्हारा पुत्र बाजिन्द महान् त्यागी भक्त होगा । यह सुनकर बादशाह डर गये और बाजिन्द को विषय सुखों में निमग्न कर दिया तथा नगर में ऐसी व्यवस्था कर दी कि किसी की मृत्यु की खबर बाजिन्द को नहीं मिले ।
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इन्हीं दिनों में स्वयं बाजिन्द के पिता की मृत्यु हो गई किन्तु उसका पता बाजिन्द को नहीं लगने दिया और कह दिया कि बादशाह हज करने गये हैं । एक दिन बड़े ठाट - बाट से बाजिन्द की सवारी एक गांव से दूसरे गांव को जा रही थी । दो पर्वतों के बीच में संकुचित मार्ग में सबसे आगे के इक डंके वाले ऊंट की मृत्यु हो गई । मार्ग रुक गया । इससे सब रुक गये ।
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बाजिन्द हाथी से उतर कर आगे बढ़े और ऊंट को पड़ा देखकर दीवान को कहा - ऊंट को जल्दी खड़ा करो । दीवान ने कहा - यह मर गया है अब खड़ा नहीं हो सकता । बाजिन्द - इसका क्या मर गया ? यह तो ज्यों का त्यों है । दीवान - इसका जीव निकल गया है, अब इसका शरीर बेकाम हो गया । बाजिन्द - मेरे शरीर से भी जीव निकल जायगा, तब इसे भी भूमि में गाड़ा जायगा क्या ? दीवान - जी हां ।
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बाजिन्द - फिर इस जीव का उद्धार कैसे हो ? दीवान - संत कहते हैं ईश्वर के भजन से उद्धार होता है । बाजिन्द - फिर मैं तो वही मार्ग पकड़ता हूँ जिस में चलने पर मृत्यु को भय नहीं रहता है और शांति का सम्राज्य है । तुम सवारी को वापस लौटा ले जाओ । यह कहकर बाजिन्द वन को चले गये और निरंतर प्रभु भजन करते हुये अन्त में प्रभु को ही प्राप्त हुये ।

रविवार, 27 अप्रैल 2014

* दादू काया कारवीं ~ १९/२५*

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साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*काल का अंग २५/१९*
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*दादू काया कारवीं, कदे न चाले संग ।*
*कोटि वर्ष जे जीवना, तऊ होइला भंग ॥१९॥*
दृष्टांत -
च्यार पुरुष भाड़े लई, बणिक कोठरी च्यार ।
कहि भाड़ा हमरा यही, कबहु देऊ निकार ॥२॥
चार पुरुषों ने एक वैश्य से चार कोठरी किराये पर मांगी । वैश्य ने कहा - मेरा किराया यही है कि मैं जब चाहूँ तब ही खाली करा लूंगा । उक्त शर्त पर वे चारों चार कोठरियों में रहने लगे । उनमें से एक ने अपनी कोठरी में बहुत सामान ला लाकर भर दिया । दूसरे ने खाने पीने का सामान ही अपनी कोठरी में रक्खा । तीसरे ने ओढने बिछाने के कपड़े ही रखे और चौथा अपनी कोठरी में रखता कु़छ भी नहीं था केवल विश्राम ही करता था ।
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एक दिन वैश्य ने कहा - आज सभी कोठरियां खाली करो । तब प्रथम पुरुष को बड़ा दुःख हुआ । दूसरे को उससे कम दुःख हुआ तीसरे को अपने कपड़े उठाने का परिश्रम ही हुआ और चौथे को परिश्रम कु़छ नहीं हुआ, उठकर चल दिया ।
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तात्पर्य यह है - प्रारब्ध रूप वैश्य से शरीर रूप कोठरियां मिलती हैं । प्रारब्ध समाप्त होते ही कोठरियां छोड़नी पड़ती हैं । पामर, विषयी, जिज्ञासु और भक्त ये चार पुरुष हैं । पामर की शरीर में अधिक आसक्ति होने से छोड़ते समय बहुत दुःख होता है ।
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विषयी मर्यादा में चलता है । अतः उसकी आसक्ति शरीर में कम होनेसे देह उसे त्यागते समय दुःख भी पामर से कम ही होता है । जिज्ञासु को जिज्ञासा पूर्ण न होने का विक्षेप ही होता है और भक्त को देह त्यागते समय दुःख नहीं होता । सोई उक्त १९ की साखी में कहा है कि काया पथिक विश्राम के समान है, इसमे आसक्ति नहीं करके हरि भजन ही करना चाहिये ।

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श्री दादूवाणी आनन्दलहरी ४~१०

http://youtu.be/YnPsKnUQ_2Q

परिचय का अंग ~ ४(१०)

ज्यों घट आत्म एक है, ऐसे होंहि असंख ।
भर भर राखै रामरस, दादू एकै अंक ॥ ३२३ ॥

ज्यों ज्यों पीवै राम रस, त्यों त्यों बढै पियास ।
ऐसा कोई एक है, बिरला दादू दास ॥ ३२४ ॥

राता माता राम का, मतवाला मैमंत ।
दादू पीवत क्यों रहै, जे जुग जांहि अनन्त ॥ ३२५ ॥

दादू निर्मल ज्योति जल, वर्षा बारह मास ।
तिहि रस राता प्राणिया, माता प्रेम पियास ॥ ३२६ ॥

रोम रोम रस पीजिए, एती रसना होइ ।
दादू प्यासा प्रेम का, यों बिन तृप्ति न होइ ॥ ३२७ ॥

तन गृह छाड़ै लाज पति, जब रस माता होइ ।
जब लग दादू सावधान, कदे न छाड़े कोइ ॥ ३२८ ॥

आंगण एक कलाल के, मतवाला रस मांहि ।
दादू देख्या नैन भर, ताके दुविधा नांहि ॥ ३२९ ॥

पीवत चेतन जब लगै, तब लग लेवै आइ ।
जब माता दादू प्रेम रस, तब काहे को जाइ ॥ ३३० ॥

दादू अंतर आत्मा, पीवै हरि जल नीर ।
सौंज सकल ले उद्धरै, निर्मल होइ शरीर ॥ ३३१ ॥

दादू मीठा राम रस, एक घूँट कर जाऊँ ।
पुणग न पीछे को रहे, सब हिरदै मांहि समाऊँ ॥ ३३२ ॥

चिड़ी चंचु भरि ले गई, नीर निघट नहिं जाइ ।
ऐसा बासण ना किया, सब दरिया मांहि समाइ ॥ ३३३ ॥

दादू अमली राम का, रस बिन रह्या न जाइ ।
पलक एक पावै नहीं, तो तबहिं तलफ मर जाइ ॥ ३३४ ॥

दादू राता राम का, पीवै प्रेम अघाइ ।
मतवाला दीदार का, मांगै मुक्ति बलाइ ॥ ३३५ ॥

उज्जवल भँवरा हरि कमल, रस रुचि बारह मास ।
पीवै निर्मल वासना, सो दादू निज दास ॥ ३३६ ॥

नैनहुँ सौं रस पीजिये, दादू सुरति सहेत ।
तन मन मंगल होत है, हरि सौं लागा हेत ॥ ३३७ ॥

पीवै पिलावै राम रस, माता है हुसियार ।
दादू रस पीवै घणां, औरों को उपकार ॥ ३३८ ॥

नाना विधि पिया राम रस, केती भाँति अनेक ।
दादू बहुत विवेक सौं, आत्म अविगत एक ॥ ३३९ ॥

परिचय का पय प्रेम रस, जे कोई पीवै ।
मतवाला माता रहै, यों दादू जीवै ॥ ३४० ॥

परिचय का पय प्रेम रस, पीवै हित चित लाइ ।
मनसा वाचा कर्मणा, दादू काल न खाइ ॥ ३४१ ॥

परिचय पीवै राम रस, युग युग सुस्थिर होइ ।
दादू अविचल आतमा, काल न लागै कोइ ॥ ३४२ ॥

परिचय पीवै राम रस, सो अविनाशी अंग ।
काल मीच लागै नहीं, दादू सांई संग ॥ ३४३ ॥

परिचय पीवै राम रस, सुख में रहै समाइ ।
मनसा वाचा कर्मणा, दादू काल न खाइ ॥ ३४४ ॥

परिचय पीवै राम रस, राता सिरजनहार ।
दादू कुछ व्यापै नहीं, ते छूटे संसार ॥ ३४५ ॥

अमृत भोजन राम रस, काहे न विलसै खाइ ।
काल विचारा क्या करै, रम रम राम समाइ ॥ ३४६ ॥

दादू जीव अजा बिघ काल है, छेली जाया सोइ ।
जब कुछ बस नहीं काल का, तब मीनी का मुख होइ ॥ ३४७ ॥

मन लवरू के पंख हैं, उनमनि चढै आकास ।
पग रहि पूरे साच के, रोपि रह्या हरि पास ॥ ३४८ ॥

तन मन वृक्ष बबूल का, कांटे लागे सूल ।
दादू माखण ह्वै गया, काहू का स्थूल ॥ ३४९ ॥

दादू संषा शब्द है, सुनहाँ संशा मारि ।
मन मींडक सूं मारिये, शंका सर्प निवारि ॥ ३५० ॥

दादू गांझी ज्ञान है, भंजन है सब लोक ।
राम दूध सब भरि रह्या, ऐसा अमृत पोष ॥ ३५१ ॥

दादू झूठा जीव है, गढिया गोविन्द बैन ।
मनसा मूंगी पंखि सौं, सूरज सरीखे नैन ॥ ३५२ ॥

सांई दीया दत घणां, तिसका वार न पार ।
दादू पाया राम धन, भाव भक्ति दीदार ॥ ३५३ ॥

दिव्य प्रेरणा ~ महंत महामंडलेश्वर सन्त श्री १०८ स्वामी क्षमारामजी महाराज 

साभार ~ अखिल भारतीय श्री दादू सेवक समाज, दिल्ली

= ११० =

#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
दादू बुरा न बांछै जीव का, सदा सजीवन सोइ । 
परलै विषय विकार सब, भाव भक्ति रत होइ ॥ 
सतगुरु संतों की यह रीत, आत्म भाव सौं राखैं प्रीत । 
ना को बैरी ना को मीत, दादू राम मिलन की चीत ॥ 
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साभार : बिष्णु देव चंद्रवंशी ~ 
*-----●●●●|||| स्वयं बिचार करें ||||●●●●-----* 

निश्चय ही, मनुष्य को फलरूप में जो कुछ भी भला-बुरा, अनुकूल-प्रतिकूल प्राप्त हो रहा है, वह उसके अपने ही किये हुए कर्म का फल है; दूसरे तो केवल निमित्तमात्र हैं । अतएव उन पर रोष करके उनके प्रति मन में द्वेष को स्थान नहीं देना चाहिए । वे तुम्हारा बुरा करने जाकर वस्तुत: अपना ही बुरा कर रहे है - अपने लिए आप ही दुखों का निर्माण कर रहे हैं; अतएव दया के पात्र हैं । 
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फिर तुम्हारे मन में द्वेष होगा तो तुम अन्दर-ही-अन्दर जलते रहोगे, द्वेषाग्नि जलाया करती है और द्वेषवश उनको हानि पहुँचाने की चेष्टा करोगे, जिससे वैर बद्धमूल होगा, तुम्हारे चित्त की अशान्ति बढ़ेगी और तुम्हारी साधन-शक्ति, जो अपने तथा दूसरों के मंगल-सम्पादन में लगती, अमंगल में लगकर सब ओर अमंगल की सृष्टि करती रहेगी । 
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सर्वोत्तम तो यह है कि बुरा करनेवाले का भला करने कि चेष्टा करके तुम अमृत वितरण करो, उसके मन के विष को नष्ट कर दो । यही संत का आदर्श है- मनुष्य को सदा मंगल सोचना तथा मंगल-कार्य करना चाहिए । प्राणिमात्र का मंगल सोचने, करने वाले का कभी अमंगल नहीं होता । उसका प्रत्येक श्वास मंगलमय बन जाता है । उससे सूर्य से प्रकाश की भान्ति सहज ही सब को मंगल प्राप्त होता है । उसका बुरा चाहने वालों का मन भी उसकी मंगलमयता से प्रभावित होकर बदल जाता है । वह कहीं कदाचित ऐसा भी हो तो उसका अपना अमंगल तो होता ही नहीं । वहीं बड़ा लाभ है । 
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अतएव तुम मन में भली-भान्ति सोचकर, दूसरे तुम्हारा अहित - अमंगल कर रहे हैं, इस मान्यता को छोड़कर कभी किसी का बुरा मत चाहो । अपने मन को तथा क्रिया को अपना तथा सब का भला सोचने करने में लगाकर सब को सहज ही मित्र बनाने का मार्ग स्वीकार करो । शक्ति का सदुपयोग करके उससे लाभ उठाओ । कभी उसका दुरूपयोग मत करो । जो संकट आया है, उसे भगवान् का मंगल-विधान मानकर स्वीकार करो । उसे टालने की न्याययुक्त चेष्टा करो । इसके लिए प्रधान उपाय है - 'सच्चे विश्वास के साथ भगवान् से कातर प्रार्थना ।' पर ध्यान रहे, प्रार्थना में कभी भी दूसरों का अमंगल न हो । बुद्धि को स्थिर रखकर भगवान् से यही प्रार्थना करो कि 'नाथ ! किसी का भी कभी तनिक भी अमंगल हो ऐसा विचार मेरे मन में कभी न आये, ऐसी चेष्टा मुझ से कभी न बन पड़े । सब का मंगल हो एवं उसी के साथ मेरा भी मंगल हो । मुझ पर जो कष्ट आया है उसे आप हरण कर लें ।