शनिवार, 30 नवंबर 2019

= सुन्दर पदावली(कंकन बंध. १४) =

#daduji

॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली*
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
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*= (कंकन बंध. १४) =*
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*डुमिला* 
*गुरु ग्यांन गहै अति होइ सुखी,*
*मन मोह तजै सब काज सरै ।* 
*धुर ध्यांन रहै पति खोइ मुखी,*
*रन लोह बजै तब लाज परै ॥* 
*सुरतान उहै हति दोइ रुखी,*
*तन छोह सजै अब आज मरै ।* 
*पुरथान लहै मति धोइ दुखी,*
*जन वोह रजै जब राज करै ॥२४॥* 
गुरु ज्ञान ग्रहण करने से ही नित्य सुख प्राप्त होगा, मोह ममता के त्याग से ही आध्यात्मिक कार्य पूर्ण हो सकते हैं । सांसारिक प्रतिष्ठा को भूलने से ही हरिभजन में ध्यान लग सकता है । देह गेहादि के ममत्व त्यागने पर ही दिग्विजयी हो सकता है । गुरुज्ञान से जिसकी बुद्धि शुद्ध हो गयी है वही मोक्ष का अधिकारी है । परम कृपालु प्रभु की कृपा हो जाय तो वह अक्षय राज्य करने में समर्थ हो जाता है । 
॥इति चित्रकाव्य के बंध॥६॥
(क्रमशः)

= १९२ =

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*दादू सोई हमारा सांइयां, जे सबका पूरणहार ।*
*दादू जीवन मरण का, जाके हाथ विचार ॥*
*करणहार कर्त्ता पुरुष, हमको कैसी चिंत ।*
*सब काहू की करत है, सो दादू का दादू मिंत ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ विश्वास का अंग)*
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श्री कृष्ण कहते हैं, तू सब कुछ मुझमें समर्पित करके, आशा और ममता से मुक्त होकर, विगतज्वर होकर, सब तरह के बुखारों से ऊपर उठकर, तू कर्म कर।
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इसमें दो तीन बातें समझने की हैं। एक, सब मुझमें समर्पित करके, यहां श्री कृष्ण जब भी कहें, जब भी कहते हैं, सब मुझमें समर्पित करके, तो यह श्री कृष्ण नाम के व्यक्ति के लिए कही गई बातें नहीं हैं। जब भी श्री कृष्ण कहते हैं, सब मुझमें समर्पित करके, तो यहां वे मुझसे, मैं से समग्र परमात्मा का ही अर्थ लेते हैं।
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यहां व्यक्ति कृष्ण से कोई प्रयोजन नहीं है। वे व्यक्ति हैं भी नहीं। क्योंकि जिसने भी जान लिया कि मेरे पास कोई अहंकार नहीं है, वह व्यक्ति नहीं परमात्मा ही है। जिसने भी जान लिया, मैं बूंद नहीं सागर हूं वह परमात्मा ही है। यहां जब श्री कृष्ण कहते हैं, सब मुझमें समर्पित करके, सब कर्म भी, कर्म का फल भी, कर्म की प्रेरणा भी, कर्म का परिणाम भी सब, मुझमें समर्पित करके तू युद्ध में उतर। कठिन है बहुत। समर्पण से ज्यादा कठिन सम्भवतय और कुछ भी नहीं है। यह समर्पण, संभव हो सके, इसलिए वे दो बातें और कहते हैं।
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हम सब ज्वर से भरे हैं। बहुत तरह के ज्वर हैं। क्रोध का ज्वर है, काम का ज्वर है, लोभ का ज्वर है। इनको ज्वर क्यों कह रहे हैं, इनको ज्वर क्यों कहते हैं श्री कृष्ण? वास्तव में जिस वस्तु से भी शरीर का उत्ताप बढ़ जाए, वे सभी ज्वर हैं। चिकित्सा शास्त्र के विचार से भी। क्रोध में भी शरीर का उत्ताप बढ़ जाता है। क्रोध में भी हमारा रक्तचाप बढ़ जाता है। क्रोध में हृदय तेजी से धड़कता है, श्वास जोर से चलती है, शरीर उत्तप्त होकर गर्म हो जाता है। कभी-कभी तो क्रोध में मृत्यु भी घटित होती है। यदि कोई व्यक्ति पूरी तरह क्रोधित हो जाए, तो जलकर राख हो जा सकता है, मर ही सकता है।
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पूरे तो हम नहीं मरते, क्योंकि पूरा हम कभी क्रोध नहीं करते, परन्तु थोड़ा तो मरते ही हैं, इंच-इंच मरते हैं। परन्तु जब भी हम क्रोध करते हैं, तभी उम्र क्षीण होती है, तत्सण क्षीण होती है। कुछ हमारे भीतर जल जाता है और सूख जाता है। जीवन की कोई लहर मर जाती और जीवन की कोई हरियाली सूख जाती है। क्रोध करें और देखें कि ज्वर है क्रोध। श्री कृष्ण यहां बड़ी ही वैज्ञानिक भाषा का उपयोग कर रहे हैं।
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*श्री कृष्ण जब कह रहे हैं कि ज्वर से मुक्त हुए बिना कोई समर्पण नहीं कर सकता। क्यों? विगतज्वर ही समर्पण कर सकता है, जिसके जीवन में कोई ज्वर नहीं रहा। अब यह बड़े आश्चर्य की बात है, यदि जीवन में ज्वर न रहे, तो अहंकार नहीं रहता, क्योंकि अहंकार के लिए ज्वर भोजन है। जितना जीवन में क्रोध हो, लोभ हो, काम हो, उतना ही अहंकार होता है। और अहंकार समर्पण में बाधा है। अहंकार ही एकमात्र बाधा है, जो समर्पण नहीं करने देती।*

श्री कृष्ण अवश्य इस क्षण में एक द्वार बन गए होंगे। नहीं तो अर्जुन भी प्रश्न उठाता, उठाता ही। अर्जुन छोटा प्रश्न उठाने वाला नहीं है। अर्जुन ने अनुभव किया होगा कि जो कह रहा है, वह मेरा सारथी नहीं है, जो कह रहा है, वह मेरा सखा नहीं है, जो कह रहा है, वह स्वयं परमात्मा है। ऐसी प्रतीति में यदि अर्जुन को कठिनाई लगी होगी, तो वह श्री कृष्ण के भगवान होने की नहीं, वह अपने समर्पण के सामर्थ्य न होने की कठिनाई लगी होगी। वही लगी है

= १९१ =

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*पाणी पावक, पावक पाणी, जाणै नहीं अजाण ।*
*आदि रु अंत विचार कर, दादू जाण सुजाण ॥*
*सुख मांहि दुख बहुत हैं, दुख मांही सुख होइ ।*
*दादू देख विचार कर, आदि अंत फल दोइ ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ विचार का अंग)*
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जैसे धुएं से अग्नि और मल से दर्पण ढंक जाता है(तथा) जैसे स्निग्ध झिल्ली से गर्भ ढंका हुआ ह्रै वैसे ही उस काम के द्वारा यह ज्ञान ढंका हुआ है। और हे अर्जुन ! हम अग्नि(सदृश) न पूर्ण होने वाले कामना रूपी ज्ञानियों के नित्य वैरी से मनुष्य का ज्ञान ढंका हुआ है।
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श्री कृष्ण ने कहा है, जैसे धुएं से अग्नि ढंकी हो, ऐसे ही काम से ज्ञान ढंका है। जैसे बीज अपनी खोल से ढंका होता है, ऐसे ही मनुष्य की चेतना उसकी वासना से ढंकी होती है। जैसे गर्भ झिल्ली में बंद और ढंका होता है, ऐसे ही मनुष्य की आत्मा उसकी कामना से ढंकी होती है। इन श्लोकों को ठीक से समझ लेना उपयोगी है।
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*पहले तो यह समझ लेना आवश्यक है कि ज्ञान स्वभाव है, विधमान, अभी और यहीं। ज्ञान कोई उपलब्धि नहीं है। ज्ञान कोई ऐसी बात नहीं है, जो आज हमारे पास नहीं है और कल हम पा लेंगे। क्योंकि अध्यात्म मानता है कि जो हमारे पास नहीं है, उसे हम कभी नहीं पा सकेंगे। अध्यात्म की समझ है कि जो हमारे पास है, हम केवल उसे ही पा सकते हैं। यह बड़ी उलटी बात दिखाई पड़ती है। जो हमारे पास है, उसे ही हम केवल पा सकते हैं; और जो हमारे पास नहीं है, हम उसे कभी भी नहीं पा सकते हैं। इसे ऐसा कहें कि जो हम हैं, अंततः वही हमें मिलता है, और जो हम नहीं हैं, हमारे अनंत प्रयास, दौड़ धूप हमें वहां नहीं पहुंचाते, वह नहीं उपलब्ध होता, जो हम नहीं हैं।*
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जैसे धुएं में आग ढंकी हो, तो आग को पाना नहीं होता, केवल धुआं अलग हो जाए, तो आग प्रकट हो जाती है। जैसे सूरज बदलियों से ढंका हो, तो सूरज को पाना नहीं होता; केवल बदलिया हट जाएं, तो सूरज प्रकट हो जाता है। जैसे बीज ढंका है, वृक्ष को पाना नहीं है। वृक्ष बीज में है ही, अप्रकट है, छिपा है, कल प्रकट हो जाएगा। ऐसे ही ज्ञान केवल अप्रकट है, कल प्रकट हो जाएगा। इसके दो अर्थ हैं। इसका एक अर्थ तो यह है कि ....
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*अज्ञानी भी उतने ही ज्ञान से भरा है, जितना परमज्ञानी। भेद अज्ञानी और ज्ञानी में यदि हम ठीक से समझें, तो अज्ञानी के पास ज्ञानी से कुछ थोड़ा ज्यादा होता है, धुआं ज्यादा होता है। आग तो उतनी ही होती है, जितनी ज्ञानी के पास होती है; अज्ञानी के पास कुछ और अधिक भी होता है, धुआं भी होता है। सूरज तो उतना ही होता है जितना ज्ञानी के पास होता है, अज्ञानी के पास काली बदलिया भी होती हैं। यदि इस तरह सोचें, तो अज्ञानी के पास ज्ञानी से कुछ अधिक होता है। और जिस दिन ज्ञान उपलब्ध होता है, उस दिन यह जो अधिक है, यही खोता है, यही आवरण टूटकर गिर जाता है। और जो भीतर छिपा है, वह प्रकट हो जाता है।*
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तो पहली बात तो यह समझ लेनी आवश्यक है कि अज्ञानी से अज्ञानी मनुष्य के भीतर ज्ञान पूरी तरह विद्धमान है, अंधेरे से अंधेरे में भी, गहन अंधकार में भी परमात्मा पूरी तरह विद्धमान है। कोई कितना ही भटक गया हो, कितना ही भटक जाए, तो भी ज्ञान से नहीं भटक सकता, वह उसके भीतर विद्धमान है। हम कहीं भी चले जाएं और हम कैसे भी पापी हो जाएं और कितने भी अज्ञानी और कितना ही अंधेरा और जीवन कितने ही धुएं में घिर जाए, तो भी हमारे भीतर जो है, वह नहीं खोता है। उसके खोने का कोई उपाय नहीं है।
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अज्ञान को हम क्या समझें? अज्ञान से दो अर्थ हो सकते हैं। ज्ञान का अभाव हो सकता है अज्ञान से। श्री कृष्ण का यह अर्थ नहीं है। अज्ञान ज्ञान का अभाव नहीं है, यह भी बहुत आश्चर्य की बात है कि धुआं वहीं प्रकट हो सकता है, जहां अग्नि हो। धुआं वहां प्रकट नहीं हो सकता, जहां अग्नि न हो। अज्ञान भी वहीं प्रकट हो सकता है, जहां ज्ञान हो। अज्ञान भी वहां प्रकट नहीं हो सकता, जहां ज्ञान न हो।
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दूसरी आश्चर्य की बात यह है कि धुआं तो बिना अग्नि के कभी नहीं होता, परन्तु अग्नि कभी बिना धुएं के हो सकती है? वास्तव में धुएं का संबंध अग्नि से इतना ही है कि अग्नि बिना ईंधन के नहीं होती। और ईंधन यदि गीला है, तो धुआं होता है, और ईंधन यदि सूखा है, तो धुआं नहीं होता। परन्तु धुआं बिना आग के नहीं हो सकता, ईंधन कितना ही गीला हो। ईंधन यदि सूखा हो, तो आग बिना धुएं के हो सकती है, दमकता हुआ अंगारा बिलकुल बिना धुएं के होता है।
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अज्ञान के अस्तित्व के लिए पीछे ज्ञान आवश्यक है, इसलिए अज्ञान ज्ञान का अभाव नहीं है, अनुपस्थिति नहीं है। अज्ञान भी बताता है कि भीतर ज्ञान विद्धमान है। अन्यथा अज्ञान भी संभव नहीं है, अज्ञान भी नहीं हो सकता है। अज्ञान केवल आवरण की जानकारी देता है। और आवरण सदा उसकी भी जानकारी देता है, जो भीतर विद्धमान है। बीज केवल आवरण की जानकारी देता है, अंडे के ऊपर की खोल केवल आवरण की जानकारी देती है। साथ में यह भी जानकारी देती है कि भीतर वह भी विद्धमान है, जो आवरण नहीं है।
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*वासना को समझना आवश्यक है, अन्यथा आत्मा को हम न समझ पाएंगे। वासना को समझना आवश्यक है, अन्यथा अज्ञान को हम न समझ पाएंगे। वासना को समझना आवश्यक है, अन्यथा का ज्ञान प्रकट होना असंभव है। अब यदि हम ठीक से समझें, तो ज्ञान में अज्ञान बाधा नहीं बन रहा है, ठीक से समझें, तो ज्ञान में वासना बाधा बन रही है। क्योंकि वासना ही गीला ईंधन है, जिससे कि धुआं उठता है, वासना मुक्त व्यक्ति सूखे ईंधन की भांति है।*

= *सुकृत का अंग ९५(१/४)* =

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*जिसका तिसकौं दीजिये, सांई सन्मुख आइ ।*
*दादू नख शिख सौंप सब, जनि यहु बंट्या जाइ ॥*
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**श्री रज्जबवाणी**
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*सुकृत का अंग ९५*
इस अंग में पुण्य कर्मों की विशेषता और करने की प्रेरणादि संबंधी विचार दिखा रहे हैं ~ 
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सकल जोग१ जीव को मिलै, कहु सुकृत किन होय । 
रज्जब पहरे२ पुण्य के, न करि नींद कछु जोय ॥१॥ 
संपूर्ण योग्यता१ जीव को मिलने पर भी कहो पुण्य कर्म क्यों नहीं होते ? इस मनुष्य शरीर रूप पुण्य में समय२ में निद्रा में ही मत पड़ा रह कुछ विचार करके देख किसमें तेरा भला है । 
माया काया कारवी१, प्राणहि परिहर जाय । 
ताथै रज्जब समयसिरि२, सुकृत लीजे लाय ॥२॥ 
माया और काया शुभ कर्म करने१ के लिये ही प्राप्त हुई है और सदा रहने वाली नहीं हैं, ये दोनों ही प्राणी को त्याग कर चली जाती हैं । अत: इन दोनों को इस प्राप्त अवसर२ में ही पुण्यकर्मो में लगाकर सफल करले । 
रज्जब पावक प्राणि का, अंत निरंतर बास । 
तो धन काढो धूम ज्यों, पहले धरो अकाश ॥३॥ 
काष्ट में अग्नि के निरंतर निवास का अंत होता है तब धुआं को पहले ही अकाश में पहुँचा कर आप व्यापक अग्नि में मिलता है, वैसे ही शरीर में प्राणी के निरंतर निवास का अंत होगा, इसलिये धन को पहले ही पुण्यकर्म में लगाकर प्रभु के पास पहुँचा देना चाहिये । 
जेता सुकृत कर लिया, तेता प्राणि अधार । 
जन रज्जब धन धाम में, पीछे चले न लार ॥४॥ 
जितना धन पुण्य कर्मो में लगाया जाता है, यही प्राणी के सुख का आधार होता है, और जो घर में पड़ा रहता है वह फिर साथ नहीं जाता । 
(क्रमशः)

= ११४ =

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🙏 *#श्रीदादूअनुभववाणी* 🙏

*द्वितीय भाग : शब्द*, *राग कान्हड़ा ४ (गायन समय रात्रि १२ से ३)*

साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, राज. ॥

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११४ - विनती । पँचम ताल
बाबा ! मन अपराधी मेरा, कह्या न मानै तेरा ॥टेक॥
माया मोह मद माता, कनक कामिनी राता ॥१॥
काम क्रोध अहँकारा, भावै विषय विकारा ॥२॥
काल मीच१ नहिं सूझै, आतम राम न बूझै ॥३॥
सम्रथ सिरजनहारा, दादू करै पुकारा ॥४॥
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मन - सुधारार्थ प्रभु से विनय कर रहे हैं, हे पितामह परमेश्वर ! यह मेरा मन बड़ा अपराधी है । 
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मायिक मोह - मद से मतवाला हो, कनक - कामिनी में अनुरक्त रहता है । 
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इसे काम, क्रोध, अहँकार और विषय - विकार ही प्रिय लगते हैं । 
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जाता हुआ आयु का समय और आने वाली मृत्यु१ इसे नहीं दीखती । यह अपने आत्म - स्वरूप राम को समझने का प्रयत्न नहीं करता । 
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अत: हे समर्थ सृष्टि - कर्ता परमेश्वर ! मैं आपके आगे प्रार्थना करता हूं, आप इसे ठीक करें ।
(क्रमशः)

= १७६ =

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*ज्यों यहु काया जीव की, त्यों सांई के साध ।*
*दादू सब संतोषिये, मांहि आप अगाध ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ साधु का अंग)*
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साभार ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी ​ 
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*श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु* *भाग २* *सेवा* 
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चतुरदास गुरु के परम भक्त थे । गुरु को भगवतरूप ही मानते थे । वे अन्त में अपना सब घरबार गुरु के अर्पण करके व्रजमण्डल में जाकर विचरने लगे थे । 
एक समय नन्दगांव मे मान सरोवर पर भूखे-प्यासे पड़े थे । बारह वर्ष की अवस्था के लड़के के रूप में श्रीकृष्ण ने दूध का कटोरा लाकर उन्हें दिया । लड़के के पुन:दर्शन के लोभ से चतुरदासजी ने उससे जल भी मांगा । लड़का जल लेकर नहीं आया तब चतुरदासजी व्याकुल होकर पड़ गये । नींद आते ही स्वप्न में श्रीकृष्ण ने कहा - "जल की कोई आवश्यकता नहीं, तुम्हें सब व्रजवासियों से दूध मिलता रहेगा ।" 
चतुरदासजी को सब ब्रजवासी दूध देने लगे । अब भी उनकी शिष्य परम्परा को ब्रज में सब जगह दूध मिलता है । इससे सुचित होता है कि गुरु सेवा से महान् उन्नति होती है, भगवान भी गुरु भक्त का मान करते हैं।
गुरु इच्छा अनुकूल गमन गुरुसेव है,
गुरु सेवा का लाभ प्राप्ति विभुदेव है ।
गुरु सेवा से हीन नाम ही मात्र है,
शिष्यपना वह हो न बोध का पात्र है ॥
गुरु सेवा संसार में, उन्नति हेतु महान ।
गुरु सेवा से ही हुआ, चतुरदास का मान ॥३२८॥
#### श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ####
### श्री नारायणदासजी पुष्कर, अजमेर ###
### सत्यराम सा ###

= १७५ =

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*परमारथ को सब किया, आप स्वार्थ नांहि ।*
*परमेश्‍वर परमार्थी, कै साधु कलि मांहि ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ साधु का अंग)*
=====================
साभार ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी ​ 
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*श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु* *भाग २* *निष्कामता* 
############################ 
एक विद्वान दैवयोग से कुएं मे गिर पड़े थे । उन्हें जब रस्सा डाल करके निकालने लगे, तब उन्होंने कुएं में से ही भगवान् की शपथ कराकर कहा - भाई ! जिसने मुझसे विद्या पढी हो वह मेरे निकालने रूप कार्य नहीं आवे, कारण मैने निष्काम भाव से ही सबकों पढाया है । मेरे निकालने के कार्य में विद्यार्थी शामिल होगा तो मेरी निष्कामता का फल नष्ट हो जायेगा । इससे सूचित होता है कि निष्कामी उपकार का बदला नहीं चाहता ।
निष्कामी उपकार का, बदला चाहत नांहि ।
कूप पड़े दुध्य ने कहा, छात्र न आये मांहि ॥२९९॥
#### श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ####
### श्री नारायणदासजी पुष्कर, अजमेर ###
### सत्यराम सा ###

स्मरण का अंग ८८/९१

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श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य ।
साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी 
*(श्री दादूवाणी ~ स्मरण का अंग. २)*
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*कथनी बिना करणी* 
*दादू अलिफ एक अल्लाह का, जे पढ़ि जाणै कोइ ।* 
*कुरान कतेबां इल्म सब, पढकर पूरा होइ ॥८८॥* 
आयु स्वल्प है, शरीर क्षणभंगुर है, शास्त्र भी अनन्त हैं, उनका पूर्ण अध्ययन भी नहीं हो सकता । सब शास्त्रों, वेदों का मुख्य प्रयोजन यही है कि इसी जीवन में भगवान् की प्राप्ति हो जाय । अतः सब शास्त्रों का सार मूल हरि का नाम है उस को ही जपते रहना चाहिये । ऐसा करने से सब शास्त्र पढ़े जाते हैं । अन्यथा उनका पढ़ना-सुनना केवल श्रममात्र है । 
कल्याणप्रद भक्तिरूपी प्रवाह को त्यागकर जो केवल ज्ञानप्राप्ति के लिये यत्न करता है उसको केवल क्लेश ही मिलता है । जैसे स्थूल तुष कूटने वाले को परिश्रम के अतिरिक्त कुछ नहीं मिलता । 
जिनकी ग्रन्थि नष्ट हो गयी है और आत्मा में ही रमण करने वाले मुनि भी उस परमात्मा की अहेतुकी भक्ति करते हैं । क्योंकि श्री हरि का गुण ही ऐसा है ।
जो गोविन्द भगवान् की भक्ति करते हैं, उनको देवता भी प्रसन्न होकर शान्ति प्रदान करते हैं, पितामह(ब्रह्मा) भी उनका कल्याण करते हैं और मुनीन्द्र भी शान्ति प्रदान करते हैं ॥ 
उनके सब ग्रह शुभ हो जाते हैं, भूत-पिशाच भी उनके अनुकूल रहते हैं; ब्रह्मा आदि देवता भी प्रसन्न रहते हैं, उनके घरों में लक्ष्मी का स्थिर निवास होता है जो गोविन्द भगवान् की भक्ति करते हैं । 
गोविन्द की भक्ति करने वाले के शरीर में गंगा, गया, नैमिषारण्य, पुष्कर, कशी, प्रयाग कुरुजांगल देशों के तीर्थ उनके शरीर में स्वयं को पवित्र बनाने के लिये रहते हैं ॥८८॥ 
*दादू यहु तन पिंजरा, मांहीं मन सूवा ।* 
*एक नाम अल्लाह का, पढि हाफिज हूवा ॥८९॥* 
एक समय सम्राट अकबर ने अपनी राजसभा में स्थित श्रीदादूजी महाराज की परीक्षा से प्रसन्न होकर उनसे प्रार्थना की कि हे भगवन् ! यह इस सुवर्ण के पिंजरे में बैठा तोता है, इसे आप ग्रहण करें । आपके साथ यह तोता भी रामनाम जपता रहेगा । इस समय इस साखी पद्य के द्वारा महाराजश्री ने सम्राट को जो उत्तर दिया था उसी का भाव यह है- हे अकबर ! यह मेरा शरीर ही पिंजरा है, इसमें स्थित मेरा जीवात्मा सतत रामनाम जप कर पण्डित(हाफिज) हो गया है । यहाँ ‘पण्डित’ शब्द के अर्थ ब्रह्मज्ञानी है । क्योंकि ‘पण्डा’ कहते हैं ब्रह्मविषयक बुद्धि को । वह जिसको प्राप्त हो जाय वही पण्डित है । अतः यह मेरा जीवात्मा रूप पक्षी सतत रामनाम स्मरण से पहले ही पंडित हो चुका है । अब मुझे आपके इस पिंजरे और इसमें बैठे तोते से कोई प्रयोजन नहीं । अतः आप इसे वापस अपने महल में ही ले जाओ । लिखा भी है- 
“जो सार तत्त्व जानने वाले मेरे भक्त हैं, वे सदा भक्ति ही चाहते हैं । अतः हे प्रभो ! आपके चरणकमलों में मेरी निरन्तर भक्ति रहे ॥” 
“हे नाथ ! मुझे मुक्ति नहीं चाहिये, न सांसारिक धन-सम्पत्ति; किन्तु दोनों हाथ जोड़कर आपसे यही निवेदन करना चाहता हूँ कि मुझे स्वप्न, जाग्रत, उठते-बैठते, चलते-फिरते दिन और रात्रि में, सुख-दुःख में, मन्दिर या जंगल में रहते आपकी भक्ति ही प्राप्त हो ॥८९॥” 
*स्मरण नाम पारख लक्षण* 
*नाम लिया तब जाणिए, जे तन मन रहै समाइ ।* 
*आदि अंत मधि एक रस, कबहूँ भूल न जाइ ॥९०॥* 
वास्तविक हरि स्मरण तभी माना जाता है कि जब तन, मन और इन्द्रियाँ सभी हरिनाम स्मरण करती हुई भगवान् में लीन हो जायं । अर्थात् बाह्य ज्ञानशून्य हो जाय । वह स्मरण अखण्ड तैलधारा की तरह अखण्ड स्मरण होता है । भागवत में लिख है- 
मेरा मन सुनते, नाम जपते, तथा मंगलमयनाम-रूपों को याद करते एवं सभी क्रियाएं करते हुए भगवच्चरणकमलों में आविष्ट होकर संसार में फिर न आवे ॥९०॥ 
*विरह पतिव्रत* 
*दादू एकै दशा अनन्य की, दूजी दशा न जाइ ।* 
*आपा भूलै आन सब, एकै रहै समाइ ॥९१॥* 
भक्त क्षण भर भी भगवान् का वियोग नहीं सहन कर सकते, वे निरन्तर भगवत्परायण ही रहते हैं । और उनसे विमुख कभी नहीं होते; क्योंकि उनका शरीराध्यास दूर हो चुका है । उनकी सभी इन्द्रियां नाम स्मरण करते करते भगवद्रूप हो गयी है । अतः उनकी सदा एक ही दशा रहती है ॥ 
“हे प्यारे ! जो भगवान् की भक्ति(सेवा) करता है, वह संसार में अन्य पुरुषों की तरह नहीं आता, और न वह भगवान् के चरणकमलों को स्मरण करता हुआ उन्हें छोड़ ही सकता है; क्यों कि उस भक्त को उन के चरणों में ही रसास्वादन हो रहा है । अन्यत्र नहीं ॥९१॥” 
(क्रमशः)

शुक्रवार, 29 नवंबर 2019

= सुन्दर पदावली(कंकन बंध. १३) =

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॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली*
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
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*= (कंकन बंध. १३) =*
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*डुमिला*
*हठ योग धरौ तन जात भिया,*
*हरि नांम बिना मुख धूरि परै ।* 
*शठ सोग हरौ छन गात किया,*
*चरि चांम दिना भुष पूरि जरै ॥* 
*भठ भोग परौ गन खात धिया,*
*अरि काम किना सुख झूरि मरै ।* 
*मठ रोग करौ घन घात हिया,*
*परि रांम तिना दुख दूरि करै ॥२३॥* 
अरे साधक जनो ! हठयोग का अभ्यास करो, जिससे तुम्हारे शरीर में रोग उत्पन्न होने का भय नष्ट हो जायगा । हरिनाम के स्मरण बिना संसार में तुम्हारा सर्वत्र अपमान ही होगा ॥
(क्रमशः)

= १९० =

🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
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*प्रेम भक्ति दिन दिन बधै, सोई ज्ञान विचार ।*
*दादू आतम शोध कर, मथ कर काढ़या सार ॥*
*काया की संगति तजै, बैठा हरि पद मांहि ।*
*दादू निर्भय ह्वै रहै, कोई गुण व्यापै नांहि ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ विचार का अंग)*
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साभार ~ satsangosho.blogspot.com

हे पार्थ जो पुरुष इस लोक में इस प्रकार चलाए हुए सृष्टि चक्र के अनुसार नहीं बर्तता है(अर्थात शास्त्र के अनुसार कर्मों को नहीं करता है), वह इंद्रियों के सुख को भोगने वाला पाप आयु पुरुष व्यर्थ ही जीता है। परंतु, जो मनुष्य आत्मा ही में प्रीति वाला और आत्मा ही में तृप्त तथा आत्मा में ही संतुष्ट होवे, उसके लिए कोई कर्तव्य नहीं है।
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क्योंकि, हम संसार में उस पुरुष का किए जाने से भी कोई प्रयोजन नहीं है और न किए जाने से भी कोई प्रयोजन नहीं है तथा उसका संपूर्ण भूतों में कुछ भी स्वार्थ का संबंध नहीं है। तो भी उसके द्वारा केवल लोक हितार्थ कर्म किए जाते हैं।
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सष्टि के क्रम के अनुसार। श्रीकृष्ण पहली बात कह रहे हैं, सृष्टि के क्रम के अनुसार, इसे समझ लें, तो बाकी बात भी समझ में आ सकेगी। जीवन दो प्रकार से जीया जा सकता है। एक तो सृष्टि के क्रम के प्रतिकूल विरोध में, विद्रोह में। और एक सृष्टि के क्रम के अनुसार सहज, सरल, प्रवाह में। एक जीवन की धारा के प्रतिकूल तैरा जा सकता है और एक धारा में बहा जा सकता है। संक्षिप्त में कहें तो ऐसा कह सकते हैं कि दो तरह के लोग हैं। एक, जो जीवन में धारा से लड़ते हैं, उलटे तैरते हैं। और एक वे, जो धारा के साथ बहते हैं, धारा के साथ एक हो जाते हैं। सृष्टि क्रम के अनुसार दूसरी तरह का व्यक्ति जीता है, जीवन की धारा के साथ, जीवन से लड़ता हुआ नहीं, जीवन के साथ बहता हुआ। धार्मिक व्यक्ति का वही लक्षण है। अधार्मिक व्यक्ति का उसके प्रतिकूल लक्षण है।
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श्री कृष्ण कह रहे हैं की "जीवन के क्रम के अनुसार" का अर्थ है कि सारा जगत हमसे भिन्न नहीं है, हमसे अलग नहीं है। हम उसमें ही पैदा होते हैं और उसी में लीन हो जाते हैं। इसलिए जो व्यक्ति भी इस जगत की जीवन धारा से लड़ता है, वह रुग्ण हो जाता है। जो व्यक्ति भी परिपूर्ण स्वस्थ होना चाहता है, उसे जीवन के क्रम के साथ बिलकुल एक हो जाना चाहिए। इस जीवन के क्रम के आधार पर ही भारत ने जीवन की एक सहज धारणा विकसित की थी। वह मैं आपको कहना चाहूंगा।
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और शास्त्र सम्मत कर्म करने का अर्थ क्या है। श्री कृष्ण जब शास्त्र शब्द का प्रयोग करते हैं, तो वे ठीक वैसे ही करते हैं, जैसे आज हम विज्ञान शब्द का प्रयोग करते हैं। यदि आप एलोपैथिक चिकित्सक के पास जाते हैं, तो हम कहेंगे, आप विज्ञान सम्मत चिकित्सा करवा रहे हैं। और यदि आप किसी नीमहकीम से इलाज करवाने जाते हैं, तो हम कहेंगे, आप विज्ञान सम्मत चिकित्सा नहीं करवा रहे हैं। श्री कृष्ण जब भी कहते हैं शास्त्र सम्मत, तो श्री कृष्ण का अर्थ शास्त्र से यही है। शास्त्र का अर्थ भी गहरे में यही है। उस दिन तक जो भी जाना गया विज्ञान था, उसके द्वारा जो सम्मत कर्म हैं, उस कर्म की ओर वे इशारा कर रहे हैं।
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और जितना विज्ञान हम आज जानते हैं, वह एक अर्थ में अपूर्ण है, पूर्ण नहीं है, खंडित है। हम केवल पदार्थ के संबंध में विज्ञान को जानते हैं, जीवन के संबंध में हमारे पास अभी कोई विज्ञान नहीं है। श्री कृष्ण के सामने एक पूर्ण विज्ञान था। पदार्थ और जीवन को खंड खंड में बांटने वाला नहीं, अखंड इकाई में स्वीकार करने वाला। उस विज्ञान ने जीवन को चार हिस्सों में बांट दिया था। जैसे व्यक्तियों को चार प्रकार में बांट दिया था, ऐसे एक एक व्यक्ति के जीवन को चार हिस्सों में बांट दिया था। वे हिस्से जीवन की धारा के साथ थे।
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पहले हिस्से को हम कहते थे, ब्रह्मचर्य पच्चीस वर्ष। यदि सौ : वर्ष मनुष्य की आयु स्वीकार करें, तो पच्चीस वर्ष का काल ब्रह्मचर्य आश्रम का था। दूसरे पच्चीस वर्ष गृहस्थ आश्रम के थे, तीसरे पच्चीस वर्ष वानप्रस्थ आश्रम के थे और चौथे पच्चीस वर्ष संन्यास आश्रम के थे। पहले पच्चीस वर्ष जीवन प्रभात के हैं, जब कि ऊर्जा जगती है, शरीर सशक्त होता है, इंद्रियां बलशाली होती हैं, बुद्धि तेजस्वी होती है, जीवन उगता है सुबह। इस पच्चीस वर्ष के जीवन को हमने ब्रह्मचर्य आश्रम कहा था।
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श्री कृष्ण कहते हैं अर्जुन से, जो इस भांति शास्त्र-सम्मत जीवन की कर्म व्यवस्था में प्रवेश करता है, अनुकूल जीवन के बहता है, वह इंद्रियों के सुखों को तो उपलब्ध हो ही जाता है, अंततः आत्मा के आनंद को भी उपलब्ध हो जाता है। और इस जीवन के क्रम में प्रवाहित होकर अंत में जरूर वह ऐसे स्थान पर पहुंच जाता है, जब करने और न करने में कोई भेद नहीं रहता।
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अर्जुन से वे यह कह रहे हैं कि अभी,अभी तू उस स्थान में नहीं है, जहां से तू संन्यस्त हो सके। अभी तू उस जगह नहीं है जीवन के क्रम में, जहां से तू मुक्त हो सके कर्म से। अभी तुझे करने और न करने में समानता नहीं हो सकती। अभी तू यदि न करने को चुनेगा, तो भी चुन।

= १८९ =

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*दादू मेरा वैरी मैं मुवा, मुझे न मारै कोइ ।*
*मैं ही मुझको मारता, मैं मरजीवा होइ ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ जीवित मृतक का अंग)*
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साभार ~ oshoganga.blogspot.com

*श्री कृष्ण कहते हैं, अपनी शक्ति को पहचानकर, और अपनी शक्ति परमात्मा की ही शक्ति है, और अपनी परम ऊर्जा को समझकर, और अपनी परम ऊर्जा परमात्मा की ही ऊर्जा है, इंद्रियों को वश में कर मन से, मन को वश में ला बुद्धि से और बुद्धि की बागडोर दे दे परमात्मा के हाथ में। और फिर इस दुर्जय काम के तू बाहर हो जाएगा, इस दुर्जय वासना के तू बाहर हो जाएगा।*
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जो जितना गहरा है, उतना ही परमसत्य है, और जो जितना गहरा है, उतना ही शक्तिवान है, और जो जितना गहरा है, उतना ही भरोसे योग्य है। जो जितना ऊपर है, उतना भरोसे योग्य नहीं है। लहरें भरोसे योग्य नहीं हैं, सागर की गहराई में भरोसा है। ऊपर जो है, वह केवल आवरण है, गहरे में जो है, वह आत्मा है। इसलिए तू ऊपर को गहरे पर मत आरोपित कर, गहरे को ही ऊपर को संचालित करने दे। और एक एक कदम श्री कृष्ण पीछे हटाने की बात करते हैं। कैसे?
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इंद्रियों को मन से। साधारणत: इंद्रियां अभ्यास के अनुसार चलती हैं, मन के अनुसार नहीं, क्योंकि मन के अनुसार हमने उन्हें कभी चलाया नहीं होता। इंद्रियां अभ्यास के अनुसार चलती हैं। इंद्रियों से हम इतने वशीभूत होकर जीते हैं कि इंद्रियां जब अड़चन में होती हैं, तभी मन की आवश्यकता पड़ती है। अन्यथा मन को वे कहती हैं कि तुम आराम करो, तुमसे कोई लेना देना नहीं है, हम अपना काम कर लेंगे। पता ही नहीं चलता।
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हमने सारा काम अपनी इंद्रियों पर सौंप दिया है, अब वे हमें चलाती रहती हैं। मन को बीच में कब लाया जाएगा, जब हम मन को केवल सेवा के लिए न लाते हों, स्वामी के लिए लाते हों। बुद्धि को हम तभी बीच में लाते हैं। जब मन उलझ जाता है, उलझ जाता अर्थात यह कि हम जब कोई ऐसी वस्तु पाते हैं जो मन हल नहीं कर पाता, कोई संशय खड़ा हो जाता, मन के बाहर होता।
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यह जो बुद्धि है, इसको भी सब कुछ न सौंप दें, क्योंकि यह भी परम नहीं है। परम तो इसके पार है, जहां से यह बुद्धि भी आती है। तो यह भी हो सकता है, एक व्यक्ति बुद्धि से मन को वश में कर ले, मन से इंद्रियों को वश में कर ले, परन्तु बुद्धि के वश में हो जाए तो अहंकार से भर जाएगा। बुद्धि अहम् हो जाएगी। बुद्धि बहुत अहंकारी है। वह कहेगा, मैं जानता, सब मुझे पता है। मैंने मन को भी जीता, इंद्रियों को भी जीता, अब मैं बिलकुल ही अपना सम्राट हो गया हूं। तो यहां भी अटक जायेगा बुद्धि सोच सकती है, विचार सकती है। परन्तु जीवन का सत्य अगम है, बुद्धि की पकड़ के बाहर है। बुद्धि कितना ही सोचे, सोच-सोचकर कितना ही पाए फिर भी जीवन एक रहस्य है, और उसके द्वार बुद्धि से नहीं खुलते।
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हां, बुद्धि भी जब उलझती है, तब परमात्मा को याद करती है। परन्तु जब तक सुलझी रहती है, तब तक कभी याद नहीं करती। धंधा बिलकुल ठीक चल रहा है, दुकान ठीक चल रही है, पैसा ठीक आ रहा’ है, लाभ ठीक हो रहा है, गणित ठीक हल हो रहा है, विज्ञानं की खोज ठीक चल रही है, परमात्मा की कोई याद नहीं आती। जब दुख में पड़ती है बुद्धि, तब परमात्मा की याद आती है। जब उलझती है, जब लगता है, अपने से अब क्या होगा?
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जो हम कर सकते थे, वह हम कर चुके। जो हम कर सकते हैं, वह हम कर रहे हैं। परन्तु अब हमारे हाथ में कुछ भी नहीं है। तब एकदम हाथ जुड़ जाते हैं कि हे भगवान ! तू कहां है? परन्तु अभी तक कहां था भगवान? यह डाक्टर की बुद्धि थक गई, अपनी बुद्धि थक गई, अब भगवान है?
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नहीं, इतने से नहीं चलेगा। जब बुद्धि हारती है, तब समर्पण का कोई आनंद नहीं। हारे हुए समर्पण का कोई अर्थ है? जब बुद्धि जीतती है और जब सुख चरणों पर लोटता है और जब लगता है, सब सफल हो रहा है, सब ठीक हो रहा है, बिलकुल सब सही है, तब जो व्यक्ति परमात्मा को स्मरण करता है, उसकी बुद्धि परमात्मा के लिए समर्पित होकर परमात्मा के वश में हो जाती है।
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*इंद्रियों को दें मन के हाथ में, मन को दें बुद्धि के हाथ में, बुद्धि को दे दें परम सत्ता के हाथ में।*

= *कमला काढ का अंग ९४(१७/२०)* =

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*सब ही मृतक देखिये, किहिं विधि जीवैं जीव ।*
*साधु सुधारस आणि करि, दादू बरसे पीव ॥*
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**श्री रज्जबवाणी**
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*कमला काढ का अंग ९४*
नर उर१ हिम गिरि ज्यों झरै, साधू सूरज देख । 
जन रज्जब तप ताप में, विगता२ विगत३ विशेख ॥१७॥ 
सूर्य को देखकर जैसे हिमालय पर्वत झरने लगता है, वैसे ही संत को देखकर नर का हृदय१ माया को त्याग कर रूप झरने लगता है किन्तु संत उपदेश रूप ताप में और सूर्य के ताप में विशेष भेद रह जाता है जिसको ज्ञानी२ ही जानते३ हैं अर्थात सूर्य का ताप तपाता है और संत का उपदेश रूप ताप शीतल करके मुक्ति प्रदान करता है । 
संसार सुई ज्यों उठ मिलै, साधू चुम्बक चाहि१ । 
सारा२ किसही का नहीं, बाबै३ वस्तु सु बाहि४ ॥१८॥ 
जैसे सुई अपने आप उठकर चुम्बक पत्थर से मिलती है, वैसे ही संसारी प्राणी अपनी इच्छा१ से ही संतो से मिलते हैं । इसमें किसी का बल२ नहीं है, यह तो भगवान३ ने ही संतों में वस्तु बल रक्खा४ है । 
माया मन मिश्रित१ सदा, नख शिख सानी२ राम । 
रज्जब रिधि३ काढण कठिन, महा सु मुश्किल काम ॥१९॥ 
माया और मन सदा ही मिले१ ही रहते हैं, राम ने ही प्राणी में नख से शिखा तक माया मिला२ रक्खी है मन से माया३ निकालना कठिन ही क्या महा कठिन काम है । 
जन रज्जब नर नाज में, उभय ठौर भरपूर१ । 
बाणी पाणी भेइये, निकसै शक्ति२ अंकूर ॥२०॥ 
नर और नाज दोनों स्थानों में माया और अंकुर परिपूर्ण१ है । संतों की वाणी द्वारा नर से माया२ निकलती है और जल से भिगोने पर नाज से अंकुर निकलते हैं । 
इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित कमला काढ का अंग ९४ समाप्तः ॥सा. २९२८॥ 
(क्रमशः)

= ११३ =

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*द्वितीय भाग : शब्द*, *राग कान्हड़ा ४ (गायन समय रात्रि १२ से ३)*
साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, राज. ॥
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११३ - गुरु उपदेश । ललित ताल ।
भाई रे, तेन्हों रूड़ो१ थाये२, 
जे गुरुमुख मारग जाये ॥टेक॥
कुसंगति परिहरिये, सत्संगति अणसरिये ॥१॥
काम क्रोध नहिं आणैं, वाणी ब्रह्म बखाणैं ॥२॥
विषिया तैं मन वारै, ते आपणपो तारै ॥३॥
विष मूकी३ अमृत लीधो, दादू रूड़ो१ कीधो ॥४॥
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गुरुमुख उपदेश की विशेषता बता रहे हैं, हे भाई ! तुम्हारे लिये बहुत सुन्दर१ हुआ२ कि तुम गुरु की आज्ञानुसार साधन मार्ग पर चल रहे है हो जो कल्याण कारक है । 
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और कुसंगति को त्याग कर सत्संग में रहते हुये काम - क्रोधादि को हृदय में स्थान न देकर, 
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ब्रह्म सम्बन्धी वाणी बोलते हो जो विषयों से मन को दूर रखते हैं, वे अपने को सँसार से तार लेते हैं । 
.
तुमने विषय - विष को त्याग३ कर भगवन्नामामृत का पान कर लिया है, यह बहुत अच्छा१ किया है ।
(क्रमशः)

= १७४ =

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*परमार्थ को राखिये, कीजे पर उपकार ।*
*दादू सेवक सो भला, निरंजन निराकार ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ साधु का अंग)*
=====================
साभार ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी ​ 
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*श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु* *भाग ३* *भक्त* 
############################ 
मेवाड़ के कौण गांव में दादूपंथी संत हंसदासजी रहा करते थे, वहां का तालाब बारम्बार टूटता रहता था ।
ज्योतिषियों ने कहा - 'तालाब की बीच की नीव पर भैंसों की बलि दी जाय तो फिर न टूटेगा और न ही सूखेगा ।'
जब वहां बलि देने लगे तब सर्वहितैषि संत हंसदासजी ने कहा - 'भैंसों की बलि मत दो, इन्हे छोड़ दो । मैं बताउं वहाँ से बांध दो फिर न टूटेगा और न ही सुखेगा ।'
उन्होंने दोनों पहाडियों के बीच एक कंकर रखकर कहां - 'यहां से बाँध दो वैसा ही किया ।' फिर कभी न टूटा और न सुखा ही । इस तरह भैंसों को भी बचाया और जनता का हित भी किया ।
सर्व हितैषी भक्त जन, होते संशय नाँहि ।
हंसदास हिंसा हरी, कौण गांव के माँहि ॥४३१॥
#### श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ####
### श्री नारायणदासजी पुष्कर, अजमेर ###
### सत्यराम सा ###

= १७३ =

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*जहाँ राम तहाँ संतजन, जहाँ साधु तहाँ राम ।*
*दादू दोन्यूं एकठे, अरस परस विश्राम ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ परिचय का अंग)*
=====================
साभार ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी ​ 
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*श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु* *भाग २* *ईश्वर* 
############################ 
मुरारीदास मध्य प्रान्त छतीसगढ परगने के विलौदा गांव के पास एक टूटे हुए एक मंदिर मे रहा करते थे । अयाच की वृत्ति थी, एक समय तीन दिन भूखे रहे तब भगवान ने एक माता का रूप बनाकर उन्हें भोजन दिया था । तब से वे सब के चरण छूकर आंखों के लगाते थे । 
इससे राजा नाराज होकर उन्हें देश निकाला दे दिया । वृन्दावन आ गये । उधर राजा को बड़ा कष्ट हुआ, तब उन्हें फिर पीछे ले गये । राजा अच्छा हो गया । इससे ज्ञात होता है कि भक्त के लिये भगवान माता बनकर भोजन देते थे ।
भूखे भक्तन को हरि, भोजन दें बन माता ।
भक्त मुरारीदास को, दीना आधी रात ॥९०॥
#### श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ####
### श्री नारायणदासजी पुष्कर, अजमेर ###
### सत्यराम सा ###

स्मरण का अंग ८४/८७

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श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य ।
साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी 
*(श्री दादूवाणी ~ स्मरण का अंग. २)*
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*अपणी जाणै आप गति, और न जाणै कोइ ।* 
*सुमरि सुमरि रस पीजिये, दादू आनन्द होइ ॥८४॥* 
अवेद्य होने से उसे दूसरा जान भी नहीं सकता । वह स्वयं ही अपने को जानता है । अतः उसका दूसरा ज्ञाता, वक्ता असम्भव है । अतः मैं कैसे कह सकता हूँ कि राम ऐसा है । अर्थात् वह तो अनुपम है । इसलिये साधक का यही कर्तव्य है वह राम के भजन से ब्रह्मानन्द का रसपान करे । भागवत में लिखा है- 
“यह भागवत पुराण सम्पूर्ण वेद-वेदांगो के पके हुए और रसभरे फल के समान है । इसके रस का भागवत लोग कल्पपर्यन्त, बार-बार इस पृथ्वी पर रहते हए पान करें” ॥८४॥ 
*करणी बिना कथणी* 
*दादू सबही वेद पुराण पढ़ि, नेटि नाम निर्धार ।* 
*सब कुछ इन ही मांहि है, क्या करिये विस्तार ॥८५॥* 
वेद पुराण शास्त्रों के अध्ययन का मुख्य प्रयोजन मनुष्यों का यही है कि श्री भगवान् तथा उनके नाम में दृढ़ निष्ठा पैदा हो जाय । अन्यथा सब व्यर्थ है । क्योंकि भगवत्स्मरण से साधक अनायास ही सब कुछ फल पा सकता है । भागवत में लिखा है- 
“जिसके नाम श्रवणमात्र से मनुष्य निर्मल हो जाता है तो फिर उस तीर्थपद भगवान् के दासों के लिये प्राप्त करने योग्य क्या शेष रह जाता है ।” 
हनुमन्नाटक में लिखा है- 
“जो सारे वेदों का पढ़ा हुआ हो, सब शास्त्रों में पारंगत हो, विधि-निषेध का पालन करने वाला स्नातक हो या अग्निहोत्री हो, सब तीर्थों का भ्रमण कर चुका हो, फिर भी यदि उसके हृदय में राम की भक्ति न हो तो ये सब पूर्वोक्त साधन व्यर्थ ही है ॥८५॥” 
*नाम अगाधता* 
*पढि पढि थाके पंडिता, किनहुँ न पाया पार ।* 
*कथि कथि थाके मुनिजना, दादू नाम आधार ॥८६॥* 
परात्पर परमात्मा वाणी का विषय नहीं, तथा वह अगाध है, शास्त्रों में निष्णात विद्वान् भी पार नहीं पा सकते । 
गीता में लिखा है- 
“मैं वेदों के पढ़ने, तपस्या, दान तथा यज्ञ से भी नहीं जाना जा सकता हूँ ।” श्रुति में भी कहा है- 
“जहाँ से वाणी विना जाने ही लौट आती है तथा मन भी जिसे नहीं जान सकता, अनेक तपःस्वाध्यायपरायण मुनि भी जिसे नहीं जान पाये; उसके भक्त उसकी अनन्य भक्ति द्वारा, हे अर्जुन ! तूं जिस रूप को देख रहा है, उसे जान जाते हैं और उस में अन्तर्भूत(समाविष्ट) हो जाते हैं ।” और भी लिखा है- 
‘अनेक शास्त्रों की कथारूपी रोमन्थ(जुगाली) करने से कोई लाभ नहीं; किन्तु तत्त्वज्ञ पुरुषों द्वारा आन्तर ज्योति को खोजना चाहिये ।” 
“चारों वेद तथा धर्मशास्त्रों के पठनमात्र से कोई लाभ नहीं, जब तक वह ब्रह्म तत्त्व को नहीं जान लेता । जैसे चम्मच साक-डाल में रहती अवश्य है, परन्तु उनका स्वाद नहीं जान पाती, उसके पल्ले तो तापमात्र ही पड़ता है, वैसे ही ब्रह्मतत्त्व को जाने विना सब शास्त्रों का अध्ययन भी व्यर्थ है ।” अन्यत्र भी लिखा है- 
“जप, तप तथा यज्ञ और अनेक तीर्थों में परिभ्रमण या नानाविध शास्त्रों का अवलोकन व्यर्थ ही है । अतः भगवान् शंकर का भजन करो जिससे तुम्हारा कल्याण हो ॥८६॥” 
*निगम हि अगम विचारिये, तऊ पार न आवै ।* 
*ताथैं सेवग क्या करै, सुमिरण ल्यौ लावै ॥८७॥* 
निगमागम का निरन्तर विचार करने पर भी उस परमात्मा का अन्त नहीं पाया जा सकता, कारण कि वह अनन्त है । अतः अपने मन को परमात्मा के ध्यान में ही लगाओ ॥८७॥ 
(क्रमशः)

गुरुवार, 28 नवंबर 2019

= सुन्दर पदावली(हार बंध. १२) =

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॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली*
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
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*= (हार बंध. १२) =*
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*मनहर* 
*जग मग पग तजि सजि भजि रांम नांम,* 
*कांम कौ न तन मन घेर घेर मारिये ।* 
*झूंठ मूंठ हठ त्यागि जागि भागि सुनि पुनि,* 
*गुनि ग्यांन आंन आंन वारि वारि डारिये ॥* 
*गहि ताहि जाहि शेष ईश सीस सुर नर,* 
*और बात हेत तात फेरी फेरी जारिये ।* 
*सुन्दर दरद खोइ धोइ धोइ बार बार,* 
*साध संग रंग अंग हेरि हेरि धारिये ॥२२॥* 
संसार के कुत्सित मार्ग का त्याग कर रामनाम का स्मरण कर । अन्यथा ये कामवासनाएं तेरे तन एवं मन को अपने बंधन से लेकर तुझे नष्ट कर डालेंगी । तूँ इस मिथ्या हठ का त्याग कर दे । इससे दूर हट कर, गुणी जनों के उपदेश ग्रहण करता हुआ अन्य सांसारिक मिथ्या कल्पनाओं को अपने से दूर फेंक दे । 
इनके बदले उन सदुपदेश का ग्रहण कर जिनको शेष, शंकर एवं अन्य मुनिजनों ने ग्रहण किया है । *महात्मा सुन्दरदासजी* कहते हैं – इस प्रकार, तेरा वह मानसिक क्लेश भी विनष्ट हो जायगा, जिसको धोने के लिए तूँ अन्य अन्य उपाय कर रहा है । अतः यही उचित होगा कि तूँ सत्संग करता हुआ श्रवण, मनन, निदिध्यासन द्वारा अपने अज्ञान को नष्ट कर, साधुओं के उपदेश को खोज खोज कर अपने मन में धारण कर ले ॥२२॥ 
(क्रमशः)

= १८८ =

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*दादू जब लग जीविये, सुमिरण संगति साध ।*
*दादू साधू राम बिन, दूजा सब अपराध ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ साधु का अंग)*
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सौ में से नब्बे प्रतिशत प्रश्न केवल कुतूहल होते हैं। जैसे छोटे बच्चे कुछ भी प्रश्न कुतूहल में पूछे हैं, कुतूहल से जो प्रश्न पूछे गए होते हैं, वे किसी भी उत्तर की चिंता नहीं करते। मिले तो ठीक, न मिले तो ठीक। क्योंकि तब तक कुतूहल आगे बढ़ गया होता है।
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*इसलिए श्रीकृष्ण पहले ही कहते हैं, दंडवत करके; कुतूहल से नहीं। क्योंकि जो कुतूहल से पूछेगा, उसे कभी गहरे उत्तर नहीं मिल सकते हैं। आपकी आंखों में दिखा कुतूहल, और उत्तर देने वाला बचाव कर जाएगा। क्योंकि जो जानता है, वह हीरे उन्हीं के सामने रख सकता है, जो हीरों को पहचान सकते हों। हर किसी के सामने हीरे रख देना नासमझी है। अर्थ भी नहीं है, प्रयोजन भी नहीं है। तो जो जानता है, वह कुतूहल का उत्तर नहीं दे सकता है।*
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दूसरी बात, कुतूहल न हो, जिज्ञासा हो,। कुतूहल नहीं है; सच में ही जानना चाहता है एक व्यक्ति। ऐसा नहीं कि ऐसे ही पूछ लिया, ऐसा नहीं, चलते थे रास्ते से, पूछ लिया, ऐसा नहीं। सच में ही जानना चाहता है; जानने को बड़ा आतुर है। परन्तु आतुर तो जानने को है, बहुत आतुर है, परन्तु जिससे जानना चाहता है, उसे इतना भी आदर नहीं देना चाहता कि मैं तुमसे जानना चाहता हूं; तो जानने की आतुरता भी सार्थक जिज्ञासा नहीं बन सकती है।
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वह ठीक ऐसा ही है कि एक व्यक्ति बहुत प्यासा है। हाथ चुल्लू बांधकर खड़ा है नदी के किनारे; परन्तु झुकना नहीं चाहता है कि झुके और पानी भर ले; तो नदी अपने नीचे बहती रहेगी। कोई नदी छलांग लगाकर और किन्हीं की चुल्लुओं में नहीं आती। चुल्लुओं को ही नदी तक झुकना पड़ता है। इसलिए श्री कृष्ण कहते हैं, दंडवत करके।
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ज्ञान की भी एक नदी है, धारा है। उसे कोई अहंकार में अकड़कर खड़ा होकर चाहे कि ज्ञान पा ले, कि किसी प्रश्न का सार्थक उत्तर पा ले, तो असंभव है। क्योंकि वह अहंकार ही बताता है कि जो झुकने को राजी नहीं, उसका चुल्लू भरा नहीं जा सकता। झुकने में राज क्या है? झुकने का इतना आग्रह क्या है?
दंडवत यहाँ प्रतीकात्मक है। दंडवत का अर्थ यह नहीं है कि सच में ही कोई व्यक्ति सिर जमीन पर रख दे, तो कुछ हल हो जाए। नहीं; भाव चाहिए दंडवत का। अहंकार झुका हुआ चाहिए; क्योंकि जहां अहंकार झुकता है, वहां हृदय का द्वार खुलता है। उस खुले द्वार में ही ग्राहकता पैदा होती है।
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जहां हृदय का द्वार बंद है, अहंकार अकड़कर खड़ा है, द्वार बंद है, वहां उत्तर प्रवेश भी नहीं कर सकता। इसलिए अहंकार से पूछी गई जिज्ञासा को ज्ञानीजन उत्तर नहीं देते हैं। वे कहते हैं, जाओ, अभी समय नहीं आया। *शिष्य होना होता हैं, शिष्य होने का अर्थ है, जो कि सीखने को, झुकने को, विनम्र होने को राजी है। क्योंकि विनम्रता में ही द्वार खुलता है। जब हम झुकते हैं, तभी द्वार खुलता है। अकड़कर खड़े हुए व्यक्ति के द्वार बंद होते हैं।*
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इसलिए श्री कृष्ण कहते हैं, दंडवत करके जो प्रश्न पूछता है !
दंडवत करके कौन प्रश्न पूछता है? और दंडवत करके कौन प्रश्न नहीं पूछता है? जो व्यक्ति दंडवत करके प्रश्न नहीं पूछता है, वह, वह व्यक्ति है, जो भीतर तो यह मानकर ही चलता है कि मुझे तो स्वयं ही पता है। ऐसे ही पूछे रहे हैं कि यदि इनको भी पता हो, तो गवाही मिल जाए कि जो हम जानते थे, वह ठीक है। दंडवत करके वही पूछता है, जिसे बोध है अपने अज्ञान का।
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इसलिए कृष्ण कहते हैं, दंडवत करके प्रश्न पूछना ऐसे पुरुष से।
परन्तु प्रश्न पूछने वाले आते हैं; तो चारों तरफ देखते हैं कि कहां बैठें? प्रश्न क्या पूछना है, सम्भवतय प्रश्न के बहाने कुछ बताने ही चले आए हों।
उस क्षण में ही प्रश्न पूछा जा सकता है। उस क्षण में प्रश्न न तो कुतूहल होता, न जिज्ञासा होता; बल्कि उस क्षण में प्रश्न मुमुक्षा बन जाता है। उस क्षण में प्रश्न प्यास हो जाता है। उस क्षण में प्रश्न ऐसा नहीं है कि चलते हुए पूछ लिया; प्रश्न ऐसा नहीं है कि जानना चाहते थे, इसलिए पूछ लिया। प्रश्न ऐसा है कि रूपांतरित होना चाहते हैं, इसलिए पूछा। बदलना चाहते हैं, क्रांति से गुजरना चाहते हैं, और हो जाना चाहते हैं।
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दंडवत का एक और अर्थ आपको स्पष्ट करना चाहूंगा। क्योंकि बड़ी भ्रांतियां हैं। पैर छूना उस क्षण दंडवत बन जाता है, जिस क्षण हमे पता ही नहीं चलता कि हम पैर छू रहे हैं। पता ही तब चलता है, जब पैर छूने की घटना घट गई होती है, जब कहीं सिर रख जाता है किसी चरण पर। तब ध्यान रहे, जब ऐसी मनोदशा में सिर रख जाता है किसी चरण पर, तो प्रार्थना घटित हो जाती है, ध्यान घटित हो जाता है। तो ऐसे क्षण में वह विनम्रता घटित हो जाती है, जो शिष्यत्व है।
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*जब क्रोध से पीड़ित, विक्षिप्त चित्त दूसरे के सिर पर पैर रखना चाहता है, तो मौन से, प्रेम से, प्रार्थना से, शांत हुआ चित्त, यदि दूसरे के पैरों में सिर रखना चाहे, तो आश्चर्य क्या है?
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*ध्यान रहे कि दंडवत प्रणाम हमारे भारत में एक बहुत वैज्ञानिक प्रक्रिया थी। प्रत्येक व्यक्ति का शरीर विद्युत-ऊर्जा से भरा है। और यह विद्युत-ऊर्जा कोणों से, से बहती है, हाथों की अंगुलियों से और पैर की अंगुलियों से। जब भी कोई व्यक्ति इस स्थिति में पहुंच जाता है, समर्पित परमात्मा पर, तो उसकी ऊर्जा परमात्मा से संबंधित हो जाती है। उसके पैरों पर यदि सिर रख दिया है, तो विद्युत-संचरण, तरंगों का प्रवाह भीतर तक दौड़ जाता है। उसके हाथों से भी यह होता है। इसलिए पैर पर सिर रखने का रिवाज था। और हाथ सिर पर रखकर आशीष देने का रिवाज था।*
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यदि किसी व्यक्ति के पैरों पर आपने सिर रखा और उसने भी आपके सिर पर हाथ रख दिया, तो आपके दोनों के शरीर विद्युत-धारा बन जाती हैं और विद्युत-धारा दोनों तरफ से दौड़ जाती है। इस विद्युत-धारा के दौड़ जाने के गहरे परिणाम हैं।
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परन्तु जीवन के बहुत-से सत्य समय की धूल से जमकर व्यर्थ हो जाते हैं। जीवन के बहुत-से सत्य व्यर्थ लोगों के हाथ में पड़कर घातक भी हो जाते हैं।
दंडवत करके पूछना, प्रश्न करना, जिज्ञासा, तो जिसने जाना है, उससे ज्ञान का अमृत तेरी तरफ बह सकता है अर्जुन, ऐसा श्री कृष्ण कहते हैं।

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*समर्थ सो सेरी समझाइनैं, कर अणकर्ता होइ ।*
*घट घट व्यापक पूर सब, रहै निरंतर सोइ ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ समर्थता का अंग)*
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जैसे हम भोजन कर रहे हैं। भोजन करते हुए भी जाना जा सकता है कि हम भोजन नहीं कर रहे हैं। यदि साक्षी हों, तो हम देखेंगे कि शरीर को ही भूख लगी है, शरीर ही भोजन कर रहा है, मैं देख रहा हूं। कठिन नहीं है। थोड़े से जागकर देखने की बात है। घर के लोग थोड़े हैरान हुए। वे राम की भाषा से परिचित न थे। राम को मिल गए ! ऐसा खुद राम कह रहे हैं?
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*जब हम भोजन कर रहे हैं, तो राम भोजन कर रहे हैं; हम जरा खड़े होकर देखें। हम जरा पीछे खड़े हो जाएं और देखें कि राम भोजन कर रहे हैं। राम को भूख लगी, राम को नींद लगी, हम खड़े पीछे देख रहे हैं। यह पीछे खड़े होकर देखने की कला ही कर्म को अकर्म बना देती है। तब व्यक्ति करते हुए न करने जैसा हो जाता है।*
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और इससे भी जटिल बात दूसरी श्री कृष्ण कहते हैं कि तब न करते हुए भी कर्ता जैसा हो जाता है। वह और भी कठिन है बात समझनी। यह तो पहली बात समझ में आ सकती है कि यदि साक्षी-भाव हो, तो कर्म होते हुए भी ऐसा नहीं लगता कि मैं कर रहा हूं; देख रहा हूं कि हो रहा है। दूसरी बात और भी गहरी है कि न करते हुए भी कर रहा हूं। इसका क्या अर्थ हुआ?
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*वास्तव में जब कोई व्यक्ति पहली घटना को उपलब्ध हो जाता है कि करते हुए न करने को अनुभव करने लगता है, तब अनिवार्य रूप से दूसरी गहराई भी उपलब्ध हो जाती है कि वह न करते हुए भी अनुभव करता है कि कर रहा हूं। क्यों? क्योंकि जो व्यक्ति ऐसा जान लेता है कि मैं साक्षी हूं, वह व्यक्ति अपने को स्वयं से तो तोड़ लेता है और सर्व से जोड़ देता है। जो व्यक्ति ऐसा जान लेता है कि मैं नहीं कर रहा हूं, सब हो रहा है, मैं देख रहा हूं, उसका परमात्मा और उसके बीच तादात्म्य हो जाता है।*
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*फिर वह कुछ भी नहीं करता। हवाएं चल रही हैं, तो भी वह जानता है, मैं ही चला रहा हूं। चन्द्रमा, तारे घूम रहे हैं, तो वह जानता है, मैं ही चला रहा हूं।*
*वह जो भीतर है, यदि जान ले कि मैं साक्षी हूं, तो परमात्मा के साथ एक हो जाता है। फिर जो भी हो रहा है, वही कर रहा है। फिर वह यदि खाली भी बैठा हुआ है, तो भी वही कर रहा है। हवाएं भी वही चला रहा है, वृक्ष भी वही उगा रहा है, फूल भी वही खिला रहा है। वह जो बैठा हुआ है वृक्ष के नीचे आंखें मूंदे हुए, वही चन्द्रमा, तारे और सूरज भी चला रहा है।* परन्तु वह दूसरी घटना है। पहले तो कर्म में अकर्म का अनुभव हो, तो फिर अकर्म में कर्म का अनुभव होता है।
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*और जो इस गहन प्रतीति को उपलब्ध हो जाता है, श्री कृष्ण कहते हैं, वह ज्ञान को, सत्य को, सत्य के अनुभव को उपलब्ध हो जाता है।* और साथ ही आपसे यह भी कह दूं कि जो व्यक्ति साक्षी बन जाता है, उसे निषिद्ध कर्म क्या है, यह पहले से तय नहीं करना पड़ता। जब भी आवश्यकता होती है, जैसे ही वह साक्षी होता है, दिखाई पड़ जाता है कि यह निषिद्ध है और यह निषिद्ध नहीं है। इसे सोचना नहीं पड़ता। उसकी अवस्था ठीक ऐसे हो जाती है।
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जैसे एक अंधेरा कमरा है, उसमे एक अंधा व्यक्ति है; उसे कमरे के बाहर जाना है, तो वह पूछता है, द्वार कहां है? स्वभावतः, अंधे व्यक्ति को दरवाजे का पता नहीं है। वह पूछता है, द्वार कहां है? यदि कोई बता दे, तो भी कुछ भेद नहीं पड़ता। अनुमान हो जाता है; फिर भी लकड़ी से टटोलता है कि द्वार कहां है? बता दिया, तो भी टटोलता है, तो भी सीधे दरवाजे पर थोड़े ही पहुंच जाता है। कौन टटोलने वाला सीधा पहुंच सकता है? कभी खिड़की को छूता है, कभी कुर्सी को छूता है। फिर टटोल-टटोलकर कहां द्वार है, पता लगाता है।
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परन्तु आंख वाला व्यक्ति? आंख वाला आदमी पूछता नहीं, दरवाजा कहां है? निकलना है; उठता है और निकल जाता है। यदि हमने कभी विचार किया हो, जब हम दरवाजे से निकलते हैं, पहले सोचते हैं, दरवाजा कहां है, फिर देखते हैं कि यह रहा दरवाजा। फिर सोचते हैं, इसी से निकल जाएं। फिर निकल जाते हैं। ऐसी कोई प्रक्रिया होती है? नहीं; हमे पता ही नहीं चलता कि द्वार कहां है और हम निकल जाते हैं। दिखता है, तो दरवाजे से निकल जाते हैं।
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*ठीक ऐसे ही जिस व्यक्ति की साक्षी-भावना गहरी हो जाती है, उसे दिखाई पड़ता है, निषिद्ध कर्म क्या है। दिखाई पड़ता है। टटोलना नहीं पड़ता, पूछना नहीं पड़ता, सोचना नहीं पड़ता, शास्त्र नहीं खोलने पड़ते। बस, दिखाई पड़ता है कि निषिद्ध कर्म क्या है। और जो निषिद्ध है, वह फिर नहीं किया जा सकता। और जो निषिद्ध नहीं है, वही किया जा सकता है। बस, वह निकल जाता है। आप उससे पूछेंगे, तो उसको पीछे पता चलेगा कि मैंने वह कर्म नहीं किया। उसे पता नहीं चलता कि मैंने नहीं किया, क्योंकि इतना पता चलना भी केवल अंधों के लिए है। साक्षी-भाव आंख बन जाता है।*

= *कमला काढ का अंग ९४(१३/१६)* =

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*चार पदार्थ मुक्ति बापुरी, अठ सिधि नव निधि चेरी ।*
*माया दासी ताके आगे, जहँ भक्ति निरंजन तेरी ॥*
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**श्री रज्जबवाणी**
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*कमला काढ का अंग ९४*
शक्ति१ सजीवनि जड़ी ज्यों, दुर्लभ लही न जाय । 
को ल्यावै हनुमंत ज्यों, उर२ गिरि सहित उठाय ॥१३॥ 
माया१ सजीवनि बूंटी के समान दुर्लभ है, सहज ही प्राप्त नहीं की जाती, जैसे हनुमान पर्वत के सहित सजीवनी बूंटी ले आये थे, वैसे ही कोई समर्थ संत हृदय२ सहित माया को उठा लाते हैं, अर्थात प्राणी का हृदय भी उनकी और खिंच जाता है और हृदय से माया की आसक्ति भी निकल जाती है । 
मन सु मरुस्थल१ देश, सम, शक्ति२ सलिल३ अति दूर । 
साधु सगर से काढ हीं, औरों कढे न मूर४ ॥१४॥ 
मारवाड़१ में जल३ पृथ्वी में बहुत दूर नीचे है, उसे सगर नरेश के पुत्रों ने ही निकाला था, अन्य से यह अपने मूल-स्थान४ से बाहर नहीं निकलता, वैसे ही मन में माया२ बहुत गहरी बैठी हुई है, उसे सगर पुत्रों के समान परमार्थ में पुरुषार्थ करने वाला संत ही निकाल सकता है अन्य से मूलाज्ञान४ के सहित नहीं निकलती । 
मन समुद्र माया मुकत१, सुरति२ सीप के माँहिं । 
साधू मरजीवों बिना, रज्जब निकसे नाँहिं ॥१५॥ 
समुद्र की सीप में मोती१ होता है, वह मरजीवों बिना नहीं निकल सकता, वैसे ही मन की वृत्ति२ में माया है, वह संत बिना नहीं निकल सकती । 
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ज्यों अपसरा आकाश में, त्यों हरिसिद्धि हिय आनि । 
रज्जब शूर सु संत परि, उभय ऊतरै आनि ॥१६॥
आकाश में स्वर्ग की अप्सरा होती हैं, वैसे ही हृदय में माया है । अप्सरा शूरवीर के लिये नीचे उतरती है, वैसे ही श्रेष्ठ संत के उपदेश से हृदय से माया उतरती है । 
(क्रमशः)