बुधवार, 31 जनवरी 2024

= ६७ =

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*छह सौ, सहस्र इक्कीस का, अजपा जाप विचार ।*
*यों दादू निज नांव ले, काल पुरुष को मार ॥*
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*साभार ~ @Subhash Jain*
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"हम जन्म से मृत्यु के क्षण तक निरंतर श्वांस लेते रहते है। इन दो बिंदुओ के बीच सब कुछ बदल जाता है। सब चीज बदल जाती है, कुछ भी बदले बिना नहीं रहता। लेकिन जन्म और मृत्यु के बीच श्वांस क्रिया अचल रहती है।"
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शिव उत्‍तर में कहते हैं—हे देवी, यह अनुभव दो श्‍वासों के बीच घटित हो सकता है। श्‍वास के भीतर आने के पश्‍चात और बाहर लौटने के ठीक पूर्व—श्रेयस् है, कल्‍याण है।
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यह विधि है: हे देवी, यह अनुभव दो श्‍वासों के बीच घटित हो सकता है। जब श्‍वास भीतर अथवा नीचे को आती है उसके बाद फिर श्‍वास के लौटने के ठीक पूर्व—श्रेयस् है। इन दो बिंदुओं के बीच होश पुर्ण होने से घटना घटती है।
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जब तुम्‍हारी श्‍वास भीतर आये तो उसका निरीक्षण करो। उसके फिर बाहर या ऊपर के लिए मुड़ने के पहले एक क्षण के लिए, या क्षण के हज़ारवें भाग के लिए श्‍वास बंद हो जाती है। श्‍वास भीतर आती है, और वहां एक बिंदु है जहां वह ठहर जाती है। फिर श्‍वास बाहर जाती है। और जब श्‍वास बाहर जाती है। तो वहां एक बिंदु पर ठहर जाती है। और फिर वह भीतर के लौटती है।
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श्‍वास के भीतर या बाहर के लिए मुड़ने के पहले एक क्षण है जब तुम श्‍वास नहीं लेते हो। उसी क्षण में घटना घटनी संभव है। क्‍योंकि जब तुम श्‍वास नहीं लेते हो तो तुम संसार में नहीं होते हो। समझ लो कि जब तुम श्‍वास नहीं लेते हो तब तुम मृत हो; तुम तो हो, लेकिन मृत। लेकिन यह क्षण इतना छोटा है कि तुम उसे कभी देख नहीं पाते।
॥ओशो॥

*३९. बिनती कौ अंग १३३/१३६*

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*श्रद्धेय श्री @महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी, @Ram Gopal Das बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ @Premsakhi Goswami*
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*३९. बिनती कौ अंग १३३/१३६*
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कहि जगजीवन जीव का, (जो) ओगण देख्या रांम ।
(तो) पांव धरन इस धरा पर, तीन लोक नहीं ठांम ॥१३३॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हे प्रभु यदि आप जीव के अवगुण देखने लगेंगे तो हमें पांव रखने भर को भी जगह न मिलेगी धरती हो या फिर तीनों लोक हो । अतः प्रभु जी आप हमारे अवगुणों पर ध्यान न दे ।
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जे हरि बकस्या मिहर करि, नांउ दिया षत छेकि८ ।
कहि जगजीवन अनंत जुग, जिया जिया जसि एक ॥१३४॥
(८. षत छेकि=माफीनामा लिख कर)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि यदि आप क्षमा कर फिर अपना नाम इस सेवक को दे दे तो यह ही क्षमा है । फिर यह सेवक  युग युग तक आपका यश गान करेगा ।
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ओगण अबिगत बकस हरि, अपनां कीजै मोहि ।
कहि जगजीवन रांमजी, नित प्रति निरखूं तोहि ॥१३५॥ 
संतजगजीवन जी कहते हैं कि मेरे सब अवगुण जानकर भी आप क्षमा कर अपना लें मैं नित्य आपके दर्शन पाता रहूँ ।
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जीवौं सौ हरि जांनिये, जे तुम आवौ भाइ ।
कहि जगजीवन रांमजी, सब सुख दीजै आइ ॥१३६॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हम अपने आपको तभी जीवित मानेंगे जब आप आयेंगे । आप आकर हमें सब सुख दीजिये ।
(क्रमशः)

*मान अचंभ कहा किमि सीख हु*

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*दादू परमारथ को सब किया, आप स्वारथ नांहिं ।*
*परमेश्‍वर परमारथी, कै साधू कलि मांहिं ॥*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*बालन मांहिं पढो रु कढो बड़,*
*पूछ कहूँ सु स्वभावहि रीझै ।*
*गंग स्वरूप कहो जु लहो दृग,*
*सौ सु शलोक करे सुन भीजै ॥*
*कंठ करयो इक पाठ सुनावत,*
*देहु लगाय दया अब कीजै ।*
*मान अचंभ कहा किमि सीख हु,*
*आप मयातरै यहै सुन लीजै ॥३८०॥*
केशव भट्टजी ने कहा - "बालकों में तो पढ़ते हो और मुख से बड़ी बड़ी बातें बौलते हो, फिर भी जो तुम पूछोगे, वह हम कहेंगे । कारण-तुम्हारे शील स्वभाव से हम प्रसन्न हैं ।"
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चैतन्य महाप्रभु बोले- "गंगाजी का स्वरूप कहिये ।" भट्टजी बोले-"जो नेत्रों से देख रहे हो, वही गंगाजी का स्वरूप है ।" चैतन्यजी ने कहा- "नये श्लोक बनाकर कहिये ।" तब भट्टजी ने १०० नये श्लोक बनाकर गंगाजी का स्वरूप तथा महिमा सुनाई ।
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चैतन्यजी उनको सुन कर प्रसन्न' हुये और उनमें से एक श्लोक कंठ करके उसका पाठ भट्टजी को सुनाया तथा कहा-" अब दया करके इसका अर्थ भी लगा दीजिये, मुझे सुनने की बहुत इच्छा है ।"
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भट्टजी ने आश्चर्य मानकर कहा- "तुमने यह कैसे सीख लिया ?" चैतन्यजी ने कहा- " आपकी दया से यह सुन लिया था और जिसने आपको बताने की शक्ति दी है, उसी ने मुझे सीखने की शक्ति दी है ।
(क्रमशः)

मंगलवार, 30 जनवरी 2024

विश्वास पहले होना चाहिए

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*दादू जुवा खेले जाणराइ, ताको लखै न कोइ ।*
*सब जग बैठा जीत कर, काहू लिप्त न होइ ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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श्रीरामकृष्ण - कर्म करने के पहले उस पर विश्वास चाहिए, उसके साथ वस्तु की याद करने पर आनन्द होता है, तभी काम करने में उस आदमी की प्रवृत्ति होती है । मिट्टी के नीचे एक घड़े में अशर्फियाँ भरी हैं, यह ज्ञान - यह विश्वास पहले होना चाहिए । घड़े को सोचने से ही आनन्द मिलता है - फिर खोदा जाता है ।
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खोदते हुए घड़े में कुदाल के लगने पर जब ठनकार होती है, तब आनन्द और भी बढ जाता है । फिर जब घड़े की कोर दीख पड़ती है तब आनन्द और बढ़ता है । इसी तरह आनन्द बढ़ता ही जाता है । मैंने स्वयं ठाकुरबाड़ी के बरामदे में खड़े होकर देखा है - साधुओं ने गाँजा मलकर तैयार किया कि चिलम पर चढ़ाते चढ़ाते उनका आनन्द उमड़ने लगा ।
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डाक्टर - परन्तु आग गरमी भी पहुँचाती है और प्रकाश भी । प्रकाश से पदार्थ दीख तो पड़ते हैं, परन्तु गरमी देह को जलाती है । कर्तव्य करते हुए आनन्द ही आनन्द मिलता हो सो बात नहीं, कष्ट भी होता है ।
मास्टर (गिरीश से) - पेट में दाना पड़ता है तो मार सहने के लिए पीठ भी मजबूत रहती है । कष्ट में भी आनन्द है ।
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गिरीश - (डाक्टर से) - कर्तव्य रूखा है ।
डाक्टर – क्यों ?
गिरीश - तो सरस सही ! (सब हँसते हैं)
मास्टर - फिर हम उसी बात पर आ गये - मिठाई के लाभ से अफीम खाना !
गिरीश - (डाक्टर से) - कर्तव्य सरस है, अन्यथा आप वह करते क्यों हैं ?
डाक्टर - मन की गति उसी ओर है ।
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मास्टर - (गिरीश से) - अभागा स्वभाव खींचता है । (हास्य) अगर एक ही ओर मन का झुकाव रहा तो स्वाधीन इच्छा फिर कहाँ रही ?
डाक्टर - मैं बिलकुल स्वाधीन नहीं कहता । गौ खूँटी से बँधी है, रस्सी की पहुँच जहाँ तक है, वहीं तक स्वाधीन है । परन्तु जहाँ उसे रस्सी का खिंचाव लगा तो –
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श्रीरामकृष्ण - यह उपमा यदु मल्लिक ने भी दी थी । (छोटे नरेन्द्र से) क्या यह अंग्रेजी में है ?
(डाक्टर से) - "देखो, ईश्वर ही सब कुछ कर रहे हैं । ‘वे यन्त्री हैं, मैं यन्त्र हूँ’, अगर किसी में यह विश्वास आ जाय, तब तो वह जीवन्मुक्त हो गया । 'हे ईश्वर, अपना काम तुम खुद करते हो, परन्तु लोग कहते हैं मैं करता हूँ ।'
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यह किस तरह, जानते हो ? वेदान्त में एक उपमा है, - एक हण्डी में तुमने चावल चढ़ाये, आलू और भटे उसमें छोड़ दिये । कुछ देर बाद आलू, भटे और चावल उछलने लगते हैं, मानो अभिमान कर रहे हों कि 'मैं उछलता हूँ - मैं कूदता हूँ ।' छोटे बच्चे आलू और परवरों को उछलते हुए देखकर उन्हें जीवित समझ लेते हैं ।
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किन्तु जो जानते हैं वे समझा देते हैं कि आलू, भटे और परवरों में जान नहीं है, वे खुद नहीं उछल रहे; हण्डी के नीचे आग जल रही है, इसलिए वे उछल रहे हैं; अगर लकड़ी निकाल ली जाय, तो फिर वे नहीं हिलते । उसी तरह जीवों का यह अभिमान कि 'मैं कर्ता हूँ', अज्ञान से होता है । ईश्वर की ही शक्ति से सब में शक्ति है । जलती हुई लकड़ी निकाल लेने पर सब चुप हैं !
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कठपुतलियाँ बाजीगर के हाथ से खूब नाचती हैं; किन्तु हाथ से छोड़ देने पर वे हिलती-डुलती तक नहीं ! "जब तक ईश्वर के दर्शन न हो, जब तक उस पारसमणि का स्पर्श न किया जाय, तब तक; ‘मैं कर्ता हूँ’ यह भ्रम रहेगा ही ‘मैं सत् कार्य कर रहा हूँ, मै असत् कर्म कर रहा हूँ’, इस तरह की भूले होंगी ही ।
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यह भेद-बोध उन्हीं की माया है; और इस मिथ्या संसार को चलाने के लिए इस माया का प्रयोजन है । किन्तु विद्यामाया का आश्रय लेने पर सत्-मार्ग को पकड़ लेने पर लोग उन्हें प्राप्त कर सकते हैं । जो ईश्वर को प्राप्त कर लेता है, जो उनके दर्शन करता है वही माया को पार कर सकता है । ‘वे ही एकमात्र कर्ता हैं, में अकर्ता हूँ’ यह विश्वास जिसे है, वहीं जीवन्मुक्त है । यह बात मैंने केशव सेन से कही थी ।"
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गिरीश - (डाक्टर से) - स्वाधीन इच्छा का ज्ञान आपको कैसे हुआ ?
डाक्टर - यह युक्ति के द्वारा नहीं जानी गयी - मैं इसका अनुभव कर रहा हूँ ।
गिरीश - हम तथा दूसरे लोग बिलकुल इसके विपरीत भाव का अनुभव करते हैं, अर्थात् यह कि हम परतन्त्र हैं । (सब हँसते हैं)
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डाक्टर - कर्तव्य में दो बाते हैं । एक तो कर्तव्य के विचार से उसे करने के लिए जाना, और दूसरा बाद में आनन्द का होना । परन्तु आरम्भिक अवस्था में ही आनन्द होगा यह सोचकर हम कर्म करने नहीं जाते । मुझे स्मरण है कि जब मैं छोटा था तब भोग की मिठाई में चीटियों को देखकर पुरोहित महाराज को बड़ी चिन्ता हो जाती थी । उन्हें पहले से ही मिठाइयों को देखकर आनन्द नहीं होता था । (हास्य) पहले तो उन्हें चिन्ता ही होती थी ।
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मास्टर - (स्वगत) - बाद में आनन्द मिलता है या साथ-साथ, यह कहना कठिन है । आनन्द के बल से यदि कार्य होता रहा तो स्वाधीन इच्छा फिर कहाँ रह गयी ?
(क्रमशः)

*श्री रज्जबवाणी पद ~ २०८*

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*चित चाँवर हेत हरि ढ़ारे,*
*दीपक ज्ञान हरि ज्योति विचारे ॥*
*घंटा शब्द अनाहद बाजे,*
*आनन्द आरती गगन गाजे ॥*
(श्री दादूवाणी ~ पद्यांश. ४४१)
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*श्री रज्जबवाणी पद ~ भाग २*
राग धनाश्री २०(गायन समय दिन ३ से ६)
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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२०८ पंजाबी त्रिताल 
आरती कहु कैसी विधि होई, 
सौंज१ शिरोमणि सारी खोई ॥टेक॥ 
प्रथम पाट२ उर बैठें औरे, 
परम पुरुष को नांही ठौरें ॥१॥
बामा३ वायु बही बिच आई, 
ज्ञान दीप दिल दिया बुझाई ॥२॥
स्वाद शिला पर घण्टा फूटी, 
पवन४ चंवर डांडी सुरति५ छुटी ॥३॥
पाती प्रीति पहम६ परिडारी, 
फहम७ फूल की माला विसारी ॥४॥
चिंता चोर लिया चित चंदन, 
क्यों कीजे अरचा८ प्रभु वंदन९ ॥५॥
ठाकुर खड़े खोड़ि१० को खड़िया, 
खोस्यो खल षट् पेड़ा पड़िया११ ॥६॥ 
रज्जब मांगे सौंज सु दीजे, 
अन्तर्यामी आरती कीजे ॥७॥४॥
✦ कहो ? प्रभु की आरती किस प्रकार करें ? आरती करने की श्रेष्ठ सामग्री१ तो सब खो दी है । 
✦ पहले तो हृदय रूप सिंहासन२ पर कामादिक ओर ही अनेक बैठे हैं, परम पुरुष प्रभो को बैठने के लिये स्थान ही नहीं है । 
✦ नारी३ असक्ति रूप वायु हृदय के मध्य आकर जोर से चली है, उसने हृदय का ज्ञान दीपक बुझा दिया है । 
✦ स्वादरूप शिला पर घंटा फूट गया है । प्राण वायु४रूप चंवर की वृत्ति५रूप डंडी हाथ से छुट गई है । अर्थात श्वास के साथ वृत्ति नहीं है । 
✦ प्रीतिरूप तुलसी पत्र पृथ्वी६ पर डाल दिया है अर्थात पृथ्वी के पदार्थों और व्यक्तियों में प्रीति कर ली है । ज्ञान७ रूपी फूलों की माला भूल गये हैं अर्थात ज्ञान विचार नहीं रहा है । 
✦ चिंता ने चित्तरूप चंदन चुरा लिया है । तब प्रभु की पूजा८ और नमस्कार९ कैसे करें । 
✦ जैसे मूर्तिरूप१० ठाकुर खड़िया मिट्टीरूप चंदन का तिलक लगाये खड़े हैं और उनके आगे पड़ा११ हुआ पेड़ा अन्य लोग ही उठा लेते हैं, वैसै ही अजित मन और पंच ज्ञानेन्द्रिय ज्ञान इन छ: दुष्टों ने हमारी पूजा सामग्री छीन ली है । 
✦ अन्तर्यामी प्रभो ! मैं मांग रहा हूँ, मुझे आप अपनी पूजा की सामग्री प्रदान करें, जिससे मैं आपकी आरती कर सकूं । 
(क्रमशः)

अंति ठौड़ की ठौड़



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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी*
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*दादू कहतां कहतां दिन गये, सुनतां सुनतां जाइ ।*
*दादू ऐसा को नहीं, कहि सुनि राम समाइ ॥*
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*लखौटिया ग्यान कौ अंग ॥*
बषनां लोग कौ चालिबौ, डागुल की सी दौड़ ।
भौंण कुवा परि नित चलै, अंति ठौड़ की ठौड़ ॥१॥
बषनां जी कहते हैं, शास्त्राभ्यासी पंडितों का ज्ञान ठीक उसी तरह छिछला = अधूरा = सीमित होता है जिस प्रकार लोग = लोक = संसारियों का डागुल = छत पर दौड़ना = अत्यन्त सीमित दूरी में दौड़ना होता है । 
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अन्य उदाहरण से कथन को पुनः स्पष्ट करते हैं जैसे कुवे पर नित्यप्रति चलने वाला भौंण = चाक (चक्र, जिस पर रस्सी चढ़ा कर कुवे से पानी निकाला जाता है) सारे दिन घूमता है किन्तु अंत में जब वह रुकता है तब उसी स्थान पर रुकता है जहाँ से वह प्रारम्भ होता है । 
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कहने का आशय यह है कि जिस प्रकार चाक का रात दिन घूमना न घूमना के बराबर है, ऐसे ही शास्त्राभ्यासी पंडितों का शास्त्रीयज्ञान आत्मज्ञान कराने में कतई लाभकारी नहीं है यदि उसका चिंतन-मनन व निदिध्यासन न किया जाए ॥१॥

इति फोकट करणी कौ अंग सम्पूर्ण ॥अंग ६५॥साषी १२१॥
(क्रमशः)

शब्दस्कन्ध ~ पद #३९०

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भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामी अर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #३९०)*
*राग भैरूं ॥२४॥**(गायन समय प्रातः काल)*
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**३९०. समर्थाई । प्रतिपाल*
*ऐसो अलख अनंत अपारा, तीन लोक जाको विस्तारा ॥टेक॥*
*निर्मल सदा सहज घर रहै, ताको पार न कोई लहै ।*
*निर्गुण निकट सब रह्यो समाइ, निश्‍चल सदा न आवै जाइ ॥१॥*
*अविनाशी है अपरंपार, आदि अनंत रहै निरधार ।*
*पावन सदा निरंतर आप, कला अतीत लिप्त नहिं पाप ॥२॥*
*समर्थ सोई सकल भरपूर, बाहर भीतर नेड़ा न दूर ।*
*अकल आप कलै नहीं कोई, सब घट रह्यो निरंजन होई ॥३॥*
*अवरण आपै अजर अलेख, अगम अगाध रूप नहिं रेख ।*
*अविगत की गति लखी न जाइ, दादू दीन ताहि चित्त लाइ ॥४॥*

श्री महर्षि दादूजी महाराज ईश्वरस्वरूप तथा उसका सामर्थ्य बतला रहे हैं कि त्रिभुवन को बनाने वाले विराड्स्वरूप, अनन्त, अपार, इन्द्रियातीत प्रभु का अव्यक्त जो वास्तविक स्वरूप है, उसको कोई नहीं जान सकता । 
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जो हृदयाकाश में स्वाभाविक रूप से विराजते हैं, वेअपार प्रभु निर्गुण स्वरूप सबके पास में, सबके अन्दर निश्चल रूप से विराजते हैं । व्यापक होने से उनमें गमन-आगमन आकाश की तरह नहीं हो सकता । सृष्टि के आदि और अन्त में वे ही प्रभु पारावार रहित विराजते हैं । 
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वह प्रभु सर्वदा पवित्र कालातीत पापपुण्य से रहित सर्वसमर्थ बाहर और भीतर एकरस से सबके पास हैं । अज्ञानियों के लिये बहुत दूर हैं । निराकार मायातीत सबके हृदयकमल में निश्चितरूप से रहते हैं । व्यापक होने से वे आते जाते नहीं । उनका कोई एक रूप नहीं है । जरा आदि शारीरिक धर्म से रहित अगम अगाध मन वाणी के अविषय असीम है । उनका सामर्थ्य अपार हैं । मैं तो दीनभाव से उन्हीं की सेवा में संलग्न रहता हूँ ।
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छान्दोग्य में लिखा है कि –
ब्रह्माजी ने कहा कि जो आत्मा है, वह पापों से सर्वथा अलिप्त हैं । न कभी बूढा होता है, न जन्मता मरता है । शोक चिन्ता से विमुक्त भूख प्यास से रहित सत्यकाम सत्यसंकल्प है । जिज्ञासु जनों को उसको ही जानना, खोजना चाहिये । उसको जानने वाला आत्मज्ञानी सभी लोकों को प्राप्त कर लेता है । उसकी सभी कामनायें पूर्ण हो जाती हैं । गुरुमुख से सुनकर जो अधिकारी उसका निश्चय कर लेता है वह कृतकृत्य हो जाता है । 
(क्रमशः)

सोमवार, 29 जनवरी 2024

*३९. बिनती कौ अंग १२९/१३२*

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*श्रद्धेय श्री @महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी, @Ram Gopal Das बाबाजी के आशीर्वाद से*
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*३९. बिनती कौ अंग १२९/१३२*
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दोजग कदे न जाइ तन, जे हरि राखहु संग ।
कहि जगजीवन रांमजी, कबहुं न होवै भंग ॥१२९॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हे प्रभु यदि आप अपना सानिध्य दें तो ये जीव कभी नर्क में ना जायेंगे और यह क्रम कभी भी भंग नहीं होगा ।
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सीस तुम्हारे पांव हरि, दोउ कर जोड़ि नवाइ ।
कहि जगजीवन रांमजी, अनत्त५ कहौ कहां जाइ ॥१३०॥
(५. अनत्त=अन्यत्र)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हे प्रभु में दोनों हाथ जोडकर आपके चरणों में सिर नवाता हूँ । अब मैं आपको छोडकर अन्यत्र कहाँ जाउं !
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कहि जगजीवन रांमजी, प्रेम पाइ करि लीन ।
अपणैं अंग मंहि राखिये, ज्यौं जल मांहैं मीन ॥१३१॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हे प्रभु प्रेम पिलाकर मस्त कर दीजिये अपने सानिध्य में ऐसै रखिए जैसे जल में मछली रहती है ।
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कहि जगजीवन रांमजी, तेज पुंज तन मांहि ।
अस्त६ तुचा७ तहँ गालिये, कोई दुख व्यापै नांहि ॥१३२॥
{६. अस्त=अस्थि (=हड्डी)}    {७. तुचा=त्वचा (=चर्म)}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हे प्रभु इस देह में तेज पुंज प्रदान करें और इस प्रकार इस देह के अस्थि चर्म ऐसे समेटे कि कोइ दुख न हो कालभय से मुक्त मृत्यु हो ।
(क्रमशः)

पंडित जीत करी सु विजै दिग

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*एक साच सौं गहगही, जीवन मरण निबाहि ।*
*दादू दुखिया राम बिन, भावै तीधर जाहि ॥*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*इन्दव-*
*पद्य टीका*
*पंडित जीत करी सु विजै दिग,*
*हार गये सब भीत उपाई ।*
*है सुखपाल चढै द्विप१ बाजि२ हु,*
*आत भये नदियापुर भाई ॥*
*ब्राह्मण शंक महाप्रभु लेखत३,*
*जावत देव-धुनी४ सुखदाई ।*
*बैठ गये ढिग नम्र किये मुख,*
*नैक सुनैं जग कीरति छाई ॥३७९॥*
प्रथम अवस्था में काश्मीरी केशवभट्टजी ने दिग्विजय करी थी, उनसे सब पंडित हार गये थे । आपने महाविद्वानों को हरा कर उनके लिये भय उत्पन्न कर दिया था ।
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आप चौडोल नामक सुखपाल(पालकी) पर चढ़कर चलते थे और आपके साथ बहुत से हाथी१, घोड़े२ तथा मनुष्य चलते थे । दिग्विजय करते करते नदिया(नवद्वीप) शांतिपुर में आये । 
.
हे श्रोता भाइयो ! वहाँ के ब्राह्मण बड़े बड़े नैयायिक पंडित थे । केशवभट्टजी का प्रभाव देखकर डर गये तब महाप्रभु श्रीकृष्ण चैतन्यजी कुछ विचार३ करके, सुखदाता लीला का विस्तार करते हुये श्रीगंगाजी४ के तीर जहाँ केशवभट्टजी बैठे थे,
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वहाँ आकर पास में बैठ गये और प्रणाम करके नम्रतापूर्वक बोले कि- आपका यश जगत् में छा रहा है । इसलिये आपके मुख से किंचित शास्त्रचर्चा सुनने की अभिलाषा है । सो कृपा करके सुनाइये ।
(क्रमशः)

रविवार, 28 जनवरी 2024

ईश्वर की इच्छा ?

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*कर्त्ता ह्वै कर कुछ करै, उस मांहि बँधावै ।*
*दादू उसको पूछिये, उत्तर नहीं आवै ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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डाक्टर - (श्रीरामकृष्ण से) - आप क्या कहते हैं ? ईश्वर की इच्छा ?
श्रीरामकृष्ण - और नहीं तो क्या कह रहा हूँ ? ईश्वरीय शक्ति के निकट मनुष्य क्या कर सकता है ? कुरुक्षेत्र में अर्जुन ने कहा, 'लड़ाई मुझसे न होगी, अपने ही भाइयों का वध मैं न कर सकूँगा ।'
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श्रीकृष्ण ने कहा, 'अर्जुन, तुम्हें लड़ना ही होगा । तुम्हारा स्वभाव तुमसे युद्ध करायेगा ।' श्रीकृष्ण ने सब दिखला दिया कि ये सब आदमी मरे हुए हैं । ठाकुरबाड़ी में कुछ सिक्ख आये थे । उनके मत से पीपल का पत्ता भी ईश्वर की इच्छा से डोलता है - बिना उनकी इच्छा के पीपल का पत्ता तक नहीं डोल सकता ।
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डाक्टर - यदि ईश्वर की ही सब इच्छा है तो आप बातचीत क्यों करते हैं ? लोगों को ज्ञान देने के लिए इतनी बातें क्यों कहते हैं ?
श्रीरामकृष्ण - कहलवाते हैं, इसलिए कहता हूँ । मैं यन्त्र हूँ, वे यन्त्री हैं ।
डाक्टर - आप अपने को यन्त्र कह रहे हैं । यह ठीक है । या चुप ही रहिये, क्योंकि सब कुछ तो ईश्वर ही हैं ।
.
गिरीश (डाक्टर के प्रति) - महाशय, आप कुछ भी सोचें, परन्तु वे कराते हैं इसीलिए हम लोग करते हैं । क्या उस सर्वशक्तिमान ईश्वर की इच्छा के प्रतिकूल कोई एक पग भी चल सकता है ?
डाक्टर - स्वाधीन इच्छा भी तो उन्होंने दी है । मैं यदि चाहूँ तो ईश्वर-चिन्ता कर भी सकता हूँ, और न चाहूँ तो नहीं भी कर सकता ।
.
गिरीश - आप ईश्वर की चिन्ता या सत्कर्म इसलिए करते हैं कि वह आपको अच्छा लगता है । अतएव वह कर्म आप स्वयं नहीं करते, वह अच्छा लगना ही आपसे करवाता है ।
डाक्टर - क्यों, मैं कर्तव्य समझकर करता हूँ –
गिरीश - वह भी इसलिए कि मन कर्तव्य कर्म करना पसन्द करता है –
.
डाक्टर - सोचो कि एक लड़का जला जा रहा है । उसे बचाने के लिए जाना कर्तव्य के विचार से ही तो होता है ।
गिरीश - बच्चे को बचाते हुए आपको आनन्द मिलता है, इसलिए आप आग में कूद पड़ते हैं, आनन्द आपको खींच ले जाता है । मिठाई का मजा लेने के लिए जैसे पहले अफीम खाना । (सब हँसते हैं ।)
(क्रमशः)

*श्री रज्जबवाणी पद ~ २०७*

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*संत उतारैं आरती, तन मन मंगलचार ।*
*दादू बलि बलि वारणैं, तुम पर सिरजनहार ॥*
================
*श्री रज्जबवाणी पद ~ भाग २*
राग धनाश्री २०(गायन समय दिन ३ से ६)
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
.
२०७ त्रिताल
आरती अविगत१ नाथ तुम्हारी,
कर कहा जाने सुरति हमारी ॥टेक॥
अपने पाट२ प्रभु आप विराजैं,
सेवक उर आसन कहा साजैं ॥१॥
पहुप पान अंग३ अंग४ न मावैं५,
हम कहा पाती प्रीति चढावैं ॥२॥
ज्योति प्रकाश सकल उजियारा,
ज्ञान अग्नि का दीपक जारा ॥३॥
शून्य६ सरोवर सलिल अनंता,
काया कुंभ कहा भरे संता ॥४॥
अह निशि अनहद गोप्य७ सु गाजै,
घंटा चामोधर८ कहा बाजै ॥५॥
सकल सौंज९ सांई कन१० साँची,
रज्जब आरती कर हिं सु काची ॥६॥३॥
✦ मन इन्द्रियों के अविषय१ प्रभो ! हमारी वृत्ति आपकी आरती क्या कर जानती है ? अर्थात नहीं कर जानती ।
✦ प्रभो ! आप तो अपनी महिमा रूप सिंहासन२ पर विराजते हैं, फिर सेवक अपने हृदय में क्या आसन सजायेगा ?
✦ हे प्रिय३ ! पुष्प और तुलसी पत्र भी आपके स्वरूप४ में स्थूल होने से नहीं समाते५, तब हम प्रेम से क्या तुलसी पत्र चढावें ?
✦ आपकी ज्ञान ज्योति के प्रकाश से सब विश्व में प्रकाश हो रहा है इससे हमने भी ज्ञानाग्नि का ही दीपक हृदय में जलाया है, घृत दीपक आपके योग्य कहां है ?
✦ ब्रह्मरन्ध्र६ के पास सोम चक्र में अमृत सरोवर है उससे अनन्त जल नीचे शरीर में आता ही रहता है । इसलिये संत जल का कलश आपकी सेवा के लिये क्या भरेंगे ?
✦ दिन रात अनाहत ध्वनि रूप गुप्त७ बाजे बजते रहते हैं, तब घंटा और नगारा८ क्या बजायेंगे ?
✦ प्रभु के पास१० सेवा की सभी सामग्री सच्ची९ है हम तो आरती करते हैं वह तो कच्ची है ।
(क्रमशः)

सब लिखि मेल्यौ कागद मांहि

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी*
.
*काजी कजा न जानहीं, कागद हाथ कतेब ।*
*पढतां पढतां दिन गये, भीतर नांहि भेद ॥*
=============
कागद मांहै ल्यौ का अंग । कागद मैं साधौं का संग ॥
सब लिखि मेल्यौ कागद मांहि । कागद मैं सो घट मैं नाहिं ॥३॥
कागजों में ही ल्यौ = लय = अखंडाकार एकरस अन्तःकरण की वृत्ति का अंग है तो कागजों में ही साधुओं की संगति में निवास, साधुओं का उपदेश* श्रवण करने का अंग है । इन वाचक पंडितों ने सभी कुछ कागजों में ही लिख रखा है ।
.
वस्तुतः जो कागजों में लिख रखा है, उसका लेशमात्र भी इनके घट = हृदय में नहीं है । दादूजी महाराज ने जहाँ भी साधु शब्द का* व्यवहार है, वहाँ प्रायः उसका अर्थ ब्रहमनिष्ठ सिद्ध पुरुष है । जिज्ञासु* साधक के लिये उन्होंने प्रायः संत शब्द काम में लिया है ? यहाँ साधुसंग का तात्पर्य ब्रहमनिष्ठ साधुओं के संग से ही है ॥३॥
.
मैं साषी सगलीं सुणी, बीचारी मन माहिं ।
कागद मैं जरणा लिखी, पणि घट मैं जरणा नाहिं ॥४॥
मैंने लिखा हुई सारी ही साषियों को सुना है । उन पर चिंतन मनन भी किया है । उनको लिखने वालों ने जरणा से सम्बन्धित साषियाँ कागज पर ही लिखी हैं किन्तु अन्तःकरण में जरणा का लेशमात्र भी नहीं है ॥४॥
.
कागद मैं निर्बैरता, सब साख्याँ कौ ढेर ।
पणि हिरदै मांहै बैरता, कोइ बात कहण का फेर ॥५॥
निर्वैरता के अंग की ढेर सारी साषियों में निर्वैरता का उपदेश कूट-कूट कर भरा पड़ा है । वह निर्वैरता का उपदेश कागजों तक ही सीमित है क्योंकि हृदय में तो उसका लेश भी न होकर द्वेष ही द्वेष भरा पड़ा है । वस्तुतः ब्राह्मण/उपदेशक बात कहने में अत्यन्त चतुर है । वह अपनी बात बड़ी ही फेर = चतुराई के साथ कहता है जिससे श्रोता को सुनते समय ऐसा अनुभव होता है जैसे उपदेशक अजातशत्रु ही है ॥५॥
.
उपदेस कौ अंग ॥
सौ बाताँ की एक है, सब साधौं की साषि ।
गुरि कागद मैं लिखि दियौ, सो बषनां हिरदै राषि ॥६॥
बषनांजी कहते हैं, सौ बातों की एक ही बात है कि जो कुछ ब्रहमनिष्ठ और श्रोत्रिय गुरुमहाराज ने कागज में लिखकर दे दिया है, उसे ही हृदय में धारण कर लेना चाहिये; कागजों में लिखा हुआ ही न छोड़ देना चाहिये । मैंने (बषनांजी ने) जो ऊपर बात कही है, वह मात्र मेरा परामर्श ही नहीं है, यह सभी ब्रहमनिष्ठ साधु महात्माओं की साक्षी = कथन है ॥६॥

इति करणीहीन बकता कौ अंग ॥अंग ६४॥साषी १२०॥
(क्रमशः)

शब्दस्कन्ध ~ पद #३८९

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भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामी अर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #३८९)*
*राग भैरूं ॥२४॥**(गायन समय प्रातः काल)*
==============
*३८९. नाम शूरातन । मकरन्द ताल*
*निर्भय नाम निरंजन लीजे, इन लोगन का भय नहिं कीजे ॥टेक॥*
*सेवक शूर शंक नही मानै, राणा राव रंक कर जानै ॥१॥*
*नाम निशंक मगन मतवाला, राम रसायन पीवै पियाला ॥२॥*
*सहजैं सदा राम रंग राता, पूरण ब्रह्म प्रेम रस माता ॥३॥*
*हरि बलवंत सकल सिर गाजै, दादू सेवक कैसे भाजै ॥४॥*
.
श्रीदादूजी महाराज भक्तों के लिये निर्भयता का उपदेश कर रहे हैं । विषयों में आसक्त रहने वाले सांसारिक पुरुषों का भय त्यागकर निर्भय मन से साधक भक्त को निरंजन निराकार परब्रह्म का चिन्ता करना चाहिये, क्योंकि भगवान् का जो भक्त है वह शूरवीर होता है, वह किसी का भी भय नहीं मानता ।
.
उसकी दृष्टि में ऐश्वर्य से उन्मत्त राजा और अहंकारी महाराजा तथा कामी धनवान् पुरुष और निर्धन मनुष्य ये सब समान ही होते हैं । वह स्वयं भगवान् के भजन में मस्त रहता है और उस रस को पीकर ब्रह्म में लीन रहता है । ऐसा भक्त किसी से भी भयभीत नहीं होता है । क्योंकि उसकी रक्षा करने वाला अति बलवान् सर्वसमर्थ प्रभु सर्वत्र विराजता हैं । अतः साधक को किसी के भी भय से भजन से विमुख नहीं होना चाहिये ।
.
वेदान्तसंदर्भ में मनोनियमन में कहा है कि –
यह उदर दुष्पूर है, इसकी पूर्ति के लिये मानवापराधीन परवश हो जाता है । लेकिन भक्तजन कपूर के समान गौरवर्ण और चन्द्रचूडामणि भगवान् शंकर के अलावा किसी भी धनवान् का आश्रय नहीं लेता । हे मन ! तू उसी भगवान् को भज ।
.
जबकि फल पत्ते आदि का भोजन सर्वत्र सुलभ है, और भगवान् भी भक्त की कामना को पूर्ण करने के लिये उसके पास ही रहते हैं । फिर भी मन तू कृपण तथा पशुतुल्य जिसकी सेवा भी करना कठिन है उन मनुष्यों का आश्रय लेता है, तो तुझे धिक्कार है ।
(क्रमशः)

शनिवार, 27 जनवरी 2024

*३९. बिनती कौ अंग १२५/१२८*

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*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ @Premsakhi Goswami*
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*३९. बिनती कौ अंग १२५/१२८*
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मोहि अपनां करि लीजिये, प्रेम सुधारस पाइ ।
कहि जगजीवन रांमजी, सब सुख दीजै आइ ॥१२५॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि मुझे, हे प्रभु जी प्रेमामृत पिला कर अपना कर सब सुख दीजिए ।
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कहि जगजीवन रांमजी, हम गुनही१ गरगाब२ ।
तुम साहिब समरथ धणीं, क्यूं करि कीजै ज्वाब३ ॥१२६॥
(१. गुनही=अपराधी) (२. गरगाब=गरकाव, सांसारिक भोगों में मग्न)
(३. ज्वाब=जवाब, उत्तर)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हम संसारिक भोगों में मग्न हो आपके गुनहगार हैं । आप तो हर तरह से समर्थ है अतः हम आपको कैसे उत्तर दे हम अपराधी है प्रभु ।
.
ज्वाब न कीया जाइ छिन, थर थर कांपै देह ।
कहि जगजीवन रांमजी, क्यौं करि जुडै सनेह ॥१२७॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि आपको अपने कृत कर्मों का उत्तर कैसे दे ? भय से देह कांपती है । अतः ऐसी स्थिति में आपसे स्नेह जोड़ने की हिम्मत हम अपने अपराधों के कारण नहीं दे सकते ।
.
जुड़ै सनेह सनमुख हुयां, जे हरि करौ सहाइ ।
कहि जगजीवन रांमजी, (तो) दोजग४ कदे न जाइ४ ॥१२८॥
(४-४. दोजग कदे न जाइ=नरकपात कभी न हो, पाप कर्म कभी न करे)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि आपके दर्शन से स्नेह उत्पन्न होता है । और दर्शन आपकी सहायता से ही हो सकते हैं अगर ऐसा हो जाये तो जीव कभी नर्कगामी नहीं होता है ।
(क्रमशः)

*काश्मीरी केशव भट्टर्जी*

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*परमार्थ को राखिये, कीजे पर उपकार ।*
*दादू सेवक सो भला, निरंजन निराकार ॥*
==========
*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
.
*छप्पय-*
*काश्मीरी केशव भट्टर्जी*
*काश्मीरी करता कियो, केशव भट शोभा सरस१ ॥*
*मनुष्यों मांहिं मुख्य, ताप त्रय पाप नशावन ।*
*कर परसी२ हरि भक्ति, विमुख मारग द्रुम३ ढावन ॥*
*परचो४ प्रचुर५ दिखाय, तुरक मधुपुरी हराये ।*
*काजी दिये कढ़ाय, मारि जमुना डरवाये ॥*
*कथा सकल जग में प्रकट, ह्वै पुनीत वाके दरस ।*
*काश्मीरी करता कियो, केशव भट शोभा सरस ॥२७६॥*
.
सृष्टिकर्ता ईश्वर ने कश्मीरी केशव भट्टजी को सुन्दर१ शोभायुक्त ही बनाया था ।
.
आप मनुष्यों में मुख्य महामानव थे । प्राणियों की तीनों ताप और पापों को नष्ट करने वाले थे । हरि से विमुख प्राणियों के धर्म मार्ग रूप वृक्षों३ को काटने के लिये आपने अपने अन्तःकरण रूप हाथ में हरिभक्त रूप कुल्हाड़ी२ धारण की थी ....
.
और बहुत बड़ा४ चमत्कार५ दिखाकर मथुरा में मुसलमानों को हराया था । विश्रान्त घाट के मार्ग में से काजियों को निकालकर तथा मारकर यमुना में डलवा दिया था ।
.
यह कथा सब जगत में प्रकट है । उनके काश्मीरी केशवभट्टजी के दर्शन से प्राणी पवित्र होते हैं ॥३८५॥
(क्रमशः)

शुक्रवार, 26 जनवरी 2024

= ६६ =

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*दादू है को भय घणां, नाहीं को कुछ नाहीं ।* 
*दादू नाहीं होइ रहु, अपणे साहिब माहिं ॥* 
============= 
*साभार ~ @Subhash Jain* 
.
एक प्रश्न(३)~तो तीसरा रत्न है—धम्मं शरणं गच्छामि। तीसरी शरण में जाकर तुम समस्त की शरण में चले गए—सार्वभौम है धर्म। पहले बुद्ध की शरण में गए, वह एक; फिर संघ की शरण में गए, अनेक, फिर धर्म की शरण में गए, सर्व। सार्वभौम। विसर्जन पूरा हो गया। इसके पार विसर्जन करने को कुछ है नहीं। तुम उससे एक हो गए, जो है।
.
ऐसे ये तीन रत्न हैं। इनके संबंध में कुछ और बातें भी समझ लेनी चाहिए। पहली बात, बुद्ध की शरण जाना सबसे सरल है। ऐसा रोज यहां होता है। कोई आकर मुझसे कहता है कि हमने समर्पण आपको किया है, हम लक्ष्मी की क्यों मानें ? तो मैं उनसे कहता हूं मुझे समर्पण करना सरल है। तुम लक्ष्मी को समर्पण करोगे तो और रस आएगा, और गहरा रस आएगा। मुझे समर्पण करना तो बहुत सुगम है। क्योंकि तुम मेरे इतने प्रेम में हो। तुम मेरे रस में ऐसे डूबे हो।
.
कोई भोजनालय में काम करता है, दीक्षा से उसकी नहीं बनती, तो मैं उससे कहता हूं, जाकर दीक्षा को समर्पण कर दो। वह कहता है, दीक्षा को ! आपकी शरण में हम आए हैं, दीक्षा की शरण में नहीं। मैं उनसे कहता हूं, तो मैं ही तो तुमसे कह रहा न ! तुम मेरी शरण आ गए, अब गए हाथ से, अब मैं कहता हूं तुम जाओ दीक्षा के शरण में, तो मेरी मानोगे या नहीं ? कहते हैं, मानेंगे तो जरूर लेकिन दीक्षा की शरण ! दीक्षा तो हमारे ही जैसी है ! कठिन हो गया दीक्षा की शरण जाना। लेकिन मैं कहता हूं, जाओ।
मेरी शरण आना तो बहुत सरल है, क्योंकि तुम मेरे लगाव में पड़े हो, तुम मेरे प्रेम में पड़े हो, तुम दीवाने हो, तो झुक गए। दीक्षा से तुम्हारा कोई ऐसा लगाव नहीं, ऐसा कोई दीवानापन नहीं, दीक्षा तो लगती ठीक तुम जैसी है, लेकिन अर्थ समझना। जब तक तुम तुम जैसों के शरण में नहीं जाओगे, तब तक तुमने अभी तक अपने को समझा ही नहीं। क्योंकि जो तुम जैसा है, वह तुम्हें आदर योग्य नहीं मालूम होता, इसका अर्थ क्या हुआ ?
.
इसका अर्थ हुआ कि तुम स्वयं ही अभी अपनी आंखों में आदर योग्य नहीं हो। जब तुम कहते हो कि अपने ही जैसे की शरण जाएं, तो तुम क्या कह रहे हो, तुमने शायद सोचा नहीं। तुम यह कह रहे हो कि मैं तो निंदित, पापी, अपराधी, और मेरे ही जैसे किसी की शरण जाऊं ! तो तुम्हारे मन में बड़ी आत्मग्लानि है। तुम्हारे मन में बडा आत्म—तिरस्कार है। अपमान है अपना।
.
और जिसके मन में अपने प्रति अपमान है, वह कैसे आत्मवान हो सकेगा? जो अपनी निंदा कर रहा है, जो अभी अपना सम्मान भी नहीं सीख सका, वह अपने भीतर कैसे प्रवेश कर सकेगा ? जो अभी अपने को प्रेम भी नहीं कर सकता, वह किसको प्रेम कर सकेगा? कहने वाला तो यही कह रहा है कि शायद वह दीक्षा का असम्मान कर रहा है यह कहकर कि वह तो मेरे ही जैसी है, उसकी क्या शरण जाना ! लेकिन वह अपना ही अपमान कर रहा है। वह घोषणा कर रहा है कि मैं दो कौड़ी का, और दीक्षा मेरे जैसी, तो मैं कैसे शरण जाऊं ?
जिस दिन तुम अपने ही जैसों की शरण जाने लगोगे, उस दिन तुम्हारे जीवन में आत्म—गौरव आएगा। यह बात तुम्हें बड़ी विरोधाभासी लगेगी कि जिस दिन व्यक्ति समस्त के चरणों में झुक जाता है, उस दिन वह आत्म—गौरव को उपलब्ध हो गया। उसने कहा कि निम्नतम के भी शरण में मैं झुक जाता हूं पत्थर के शरण झुक जाता हूं क्योंकि अस्तित्व महिमावान है, निम्न यहां कोई हो ही कैसे सकता है ! उस दिन उसे अपने भीतर की गरिमा का बोध होगा। 
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तो बुद्ध की शरण जाना तो बड़ा सरल है। सरल से शुरू करो मगर सरल पर अटके मत रह जाना। इसलिए संघं शरणं गच्छामि। संघ का मतलब, दीक्षा, लक्ष्मी, मैत्रेय, इनकी शरण जाओ, कभी—कभी अपनी ही शरण. जाओ, कभी—कभी अपने ही पैर छू लो। क्योंकि तुम्हारे भीतर भी परमात्मा विराजमान है। लगेगा पागलपन, पहले तो दूसरे के पैर छूने में बड़ा पागलपन लगता है, फिर अपने पैर छूने में तो निश्चित ही पागलपन लगेगा।
.
लेकिन मैं तुमसे कहता हूं, कभी—कभी अपने भी पैर छुओ। तुम्हारे भीतर भी परमात्मा ही विराजमान है—उतना ही जितना मेरे भीतर, उतना ही जितना बुद्ध के भीतर, उतना ही जितना महावीर के भीतर। ऐसा हुआ एक बार, रामकृष्ण की किसी ने तस्वीर उतारी। वह तस्वीर लेकर आया तो रामकृष्ण ने झुककर उस तस्वीर के चरण छुए। खुद की तस्वीर !
.
शिष्य जरा बेचैन हुए, उन्होंने कहा कि लोग पागल तो समझते ही हैं इन्हें, अब और बिलकुल पागल समझेंगे, यह हद्द हो गयी। किसी ने जरा टेहुनी मारी कि परमहंसदेव, क्या कर रहे ? खबर हो गयी लोगों को तो, लोग पागल मानते ही हैं, अब हद्द हो जाएगी कि अब अपनी ही तस्वीर के पैर छूने लगे। तो उन्होंने कहा कि मेरी तस्वीर ! मेरी तस्वीर तो हो कैसे सकती है ! क्योंकि मैं तो देह नहीं हूं।
.
लेकिन यह जो तस्वीर है, बड़ी समाधि की है। जिसकी भी ली गयी हो यह तस्वीर, यह आदमी बड़ी समाधि में रहा होगा ! तो मैं तो समाधि को झुक रहा हूं। अब इससे क्या फर्क पड़ता है कि मैं ही समाधि में था कि कोई और समाधि में था। समाधि में कहां मैं, कहां तू ? समाधि तो समाधि है। कभी अपने पैर भी छूना, और तुम अपूर्व पुलक का अनुभव करोगे। कभी अपने जैसों के भी पैर छूना।
.
अपने से बड़ों के पैर छूने में तो अहंकार गिरता नहीं। कैसे गिरेगा ? जिसको तुम अपने से बड़ा मानते हो, उसके पैर छूने में कैसे अहंकार गिरेगा ? जिसको तुम अपने जैसा मानते हो, या अपने से छोटा मानते हो, उसके पैर छूने में अहंकार गिरेगा। मगर स्वाभाविक है, पहले तो यात्रा वहां से करनी होती है जो सुगम हो। इसलिए बुद्धं शरणं गच्छामि। पहले अपने से विराट के चरण छू लो।
.
फिर संघं शरणं गच्छामि। फिर संघ में तो सब तरह के लोग होंगे, कोई तुम जैसा होगा, कोई तुमसे अच्छा होगा, कोई तुमसे गया—बीता होगा। संघ की शरण जाने का अर्थ है, अब मैं हिसाब नहीं रखता कि कौन बड़ा, कौन छोटा, कौन ऊपर, कौन नीचे, अब तो जो भी सत्य की खोज कर रहे हैं, सब की शरण जाता हूं।
.
और तीसरा, धम्मं शरणं। लेकिन संघ की शरण में भी सीमा है। अगर बुद्ध के मानने वाले बौद्ध भिक्षुओं की शरण जाते हैं, तो वे जैन भिक्षुओं की शरण तो न जाएंगे, हिंदू संन्यासियों की शरण तो न जाएंगे, मुसलमान फकीरों की शरण तो न जाएंगे, ईसाइयों की शरण तो न जाएंगे। सीमा है। और जहा सीमा है, वहा अभी हम परमात्मा से दूर हैं। इसलिए आखिरी कदम उठाया जाता है, सीमा तोड़ दी जाती है —धम्मं शरणं गच्छामि।
.
अब कौन हिंदू कौन मुसलमान, कौन ईसाई, कौन सिख, कौन जैन, कुछ भेद न रहा। हिंदू मुसलमान, ईसाई की तो बात ही छोड़ो; पौधे, पशु, पक्षी, पत्थर, पहाड़, चांद—तारे, सबके भीतर जो एक ही सत्य समाया हुआ है, हम उसकी शरण जाते हैं। ऐसे ये त्रि—रत्‍न हैं। ये बड़े बहुमूल्य हैं। इनका अर्थ समझोगे, तो इनके द्वारा कुंजी मिल सकती है। 
-ओशो

= ६५ =

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*दादू कहै सतगुरु शब्द सुनाइ करि,*
*भावै जीव जगाइ ।* 
*भावै अन्तरि आप कहि, अपने अंग लगाइ ॥*
=============
*साभार ~ @Subhash Jain*
.
एक प्रश्न(२) ~तो पहला चरण है, एक के प्रति समर्पण। क्योंकि वहां से, उस झरोखे से तुम्हें सूरज दिखायी पड़ा। खयाल रखना, जब तुम किसी झरोखे के पास खड़े होकर सूर्य को नमस्कार करते हो तो तुम झरोखे को नमस्कार नहीं कर रहे हो। हालांकि चाहे तुम्हें पहले ऐसा ही लगता हो कि इस झरोखे की बड़ी कृपा—इसी से तो सूरज दिखायी पड़ा न ! 
.
नहीं तो अंधेरे में ही रहते—तो चाहे तुम झरोखे को धन्यवाद भी दो, लेकिन झरोखे के माध्यम से तुम धन्यवाद तो सूरज को ही दे रहे हो। झरोखे ने तो कुछ किया नहीं, सिर्फ द्वार दिया, बाधा नहीं बना। बुद्ध का इतना ही अर्थ है —जिसके भीतर सब बाधा गिर गयी है, तुम आर—पार देख सकते हो। तो पहली समर्पण की भावना है—बुद्धं शरणं गच्छामि।
.
दूसरी समर्पण की धारणा है—संघं शरणं गच्छामि। संघं का अर्थ होता है, उन सबको जो जागे हैं। उन सबको जो जाग रहे हैं। उन सबको जो जागने के करीब आ रहे। उन सबको जो करवट ले रहे। उन सबको जिनके सपने में जागरण की पहली किरण पड गयी है। 
.
जिनकी नींद में खलल पड़ गयी है। तो संघ का स्थूल प्रतीक तो यह है कि जिन लोगों ने बुद्ध से दीक्षा ले ली है, उन समस्त संन्यासियों की मैं शरण जाता हूं। लेकिन इसका मूल अर्थ तो यही हुआ न कि जिन्होंने स्रोत में प्रवेश कर लिया, जो स्रोतापन्न फल को प्राप्त हो गए। जिन्होंने संन्यास लिया है।
.
संन्यास तो अभीप्सा है, खबर है कि मैं अब अपने जीवन की धारा बदलता हूं। अब नहीं धन होगा मूल्यवान मेरे लिए। अब होगा ध्यान मूल्यवान मेरे लिए। अब नहीं खोजूंगा स्थूल को, सूक्ष्म की यात्रा पर जाता हूं। जिसको मृत्यु मिटा देती है, अब उस पर मेरी आंख खराब नहीं करूंगा, अब अमृत की खोज में जाता हूं। अंधेरे से प्रकाश की तरफ, मृत्यु से अमृत की तरफ, असत्य से सत्य की तरफ, ऐसी जो प्रार्थना है वही तो संन्यास है। असतो मा सदगमय।
.
संघ का अर्थ है, वे सब जो स्रोत—आपन्न हो गए। वे सब, जिन्होंने निर्णय लिया है सत्य की खोज का। जो सत्य के अन्वेषण पर निकल गए हैं। उनकी शरण जाता हूं। थोड़ी दृष्टि बड़ी हुई, अब बुद्ध ही काफी नहीं। बुद्ध में तो दिखता ही है, लेकिन अब उनमें भी दिखायी पड़ने लगा जो बुद्ध के पास बैठे हैं।
.
होना भी यही चाहिए। जब बुद्ध के पास रहोगे तो उनकी सुगंध पकड़ेगी न तुम्हें। इस बगीचे से घूमकर निकलोगे, घर जाकर पहुंच जाओगे अपनी पुरानी गंदगी में, तो भी तुम पाओगे वस्त्रों में थोड़ी सी फूलों की गंध साथ चली आयी है। बुद्ध के पास बैठोगे —उठोगे, तो उनका स्वाद लगेगा, उनकी बूंदें तुम पर बरसेंगी, उनका स्पर्श तुम्हें होगा। 
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जो हवा उन्हें छुएगी, वही हवा तुम्हें भी छुएगी। बुद्ध के पास उठोगे——बैठोगे, उनका रंग लगेगा, उनका ढंग लगेगा। बुद्ध के पास उठोगे —बैठोगे, तो बुद्धत्व संक्रामक है। याद रखना, बीमारी ही थोडे ही लगती है, स्वास्थ्य भी लग जाता है। पागलपन ही थोड़े ही लगता है; पागलों के साथ रहोगे, पागल हो जाओगे, मुक्तों के साथ रहोगे तो मुक्त हो जाओगे—होने लगोगे।
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तो अब दृष्टि थोड़ी बड़ी हुई। अब बुद्ध ही नहीं दिखायी पड़ते, अब बुद्ध में वे सब दिखायी पड़ने लगे जो उनके आसपास हैं। जो सब बुद्ध की तरफ उन्‍मुख हैं। दूर है अभी मंजिल उनकी, चल पड़े हैं। बुद्ध पहुंच गए गंगासागर, गंगा गिर गयी सागर में, लेकिन गंगा में जो और लहरें चली जा रही हैं सागर की तरफ भागती हुई, वे भी पहुंच ही जाएंगी, पहुंचने को ही हैं, आज नहीं कल की ही बात है, समय का ही भेद है। 
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पहले नमस्कार किया वृक्ष को, फिर नमस्कार किया बीज को, क्योंकि बीज भी वृक्ष तो हो ही जाएगा। देर— अबेर के लिए नमस्कार रोकोगे क्या ! सिर्फ समय के कारण नमस्कार को रोकोगे क्या ! और जब एक बार नमस्कार करने का मजा आ जाता है, जब बुद्ध के चरणों में सिर रखने का मजा आ गया, तो मन करेगा जितने चरणों में सिर रखा जा सके, रखो। 
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जब एक बार इतना मजा आया है और एक के पास इतना मजा आया है, काश, तुम्हारा सिर सभी के चरणों में लोटने लगे तो आनंद की धार बह उठेगी। इसलिए, संघं शरणं गच्छामि। और भी एक कदम आगे बात उठती है, क्योंकि संघ की शरण जाने का अर्थ हुआ, जो सत्य की खोज कर रहे हैं उनकी शरण जाता हूं। बुद्ध की शरण जाने का अर्थ हुआ, जिसने सत्य पा लिया है उसकी शरण जाता हूं। 
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और धम्मं शरणं गच्छामि का अर्थ होता है, बुद्ध की शरण भी तो इसीलिए गए न कि उन्होंने सत्य को पा लिया, और संघ की शरण भी इसीलिए गए न कि वे सत्य की खोज में जा रहे हैं, तो सत्य की ही शरण जा रहे हो, चाहे बुद्ध की शरण जाओ, चाहे संघ की शरण जाओ। इसलिए, धम्मं शरणं गच्छामि।
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धम्म का अर्थ होता है सत्य। जो परम सत्य है, वही धर्म है। इसलिए अंतिम रूप में आखिरी शरण है—धर्म की शरण जाता हूं; उस परम नियम की शरण जाता हूं जो संसार को चला रहा है; उस ऋत की शरण जाता हूं, ताओ की शरण जाता हूं, जो संसार को धारे हुए है। धर्म का अर्थ, जिसने संसार को धारण किया है। जिस पर सब खेल चल रहा है, उस परम में डूबता हूं।
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बौद्ध उसे भगवान नहीं कहते, क्योंकि भक्त की वह भाषा नहीं है, वे उसे कहते हैं, धर्म। वह ज्ञानी की भाषा है, ध्यानी की भाषा है। वे कहते हैं, नियम, परम नियम, शाश्वत नियम। भक्त इसी को भगवान कहता है, फर्क कुछ भी नहीं है। 
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भक्त कहता है, भगवान ने सबको धारा हुआ है। और ज्ञानी कहता है, धर्म ने सबको धारा हुआ है। शब्दों का भेद है। भक्त धर्म को रूप दे देता है, तो भगवान। प्रतिमा बना लेता है, तो भगवान। इतनी प्रतिमा नहीं बनाता, नियम को शुद्ध नियम रहने देता है। रूप नहीं देता, व्याख्या नहीं देता।
OSHO

= ६४ =

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*काया की संगति तजै, बैठा हरि पद मांहि ।*
*दादू निर्भय ह्वै रहै, कोई गुण व्यापै नांहि ॥*
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*साभार ~ @Subhash Jain*
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एक प्रश्न(१) ~ बुद्ध ने संघं शरणं गच्छामि क्यों कहा ? कृपाकर हमें इसका अभिप्राय समझाएं।
समर्पण अनिवार्य है। फिर चाहे मार्ग भक्ति का हो,चाहे ध्यान का। फर्क ही पड़ेगा कि भक्ति के मार्ग पर समर्पण पहले है, पहले चरण में, और ध्यान के मार्ग पर समर्पण है अंतिम चरण में।
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भक्ति कहती है, अहंकार को छोड्कर ही मंदिर में प्रवेश करो। क्योंकि जिसे छोड़ना ही है, उसे इतने दूर भी क्यों साथ ढोना ? छोड़ ही दो। भक्ति पहले ही क्षण में अहंकार को गिरा देती है। भक्ति को सुविधा है, क्योंकि भगवान की धारणा है। ध्यानी को वैसी सुविधा नहीं है। 
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ध्यानी चलता है बिना किसी धारणा के। तो अहंकार बचा रहेगा। किसके चरणों में रखें अहंकार को ? ध्यानी तो अनुभव के बाद ही, गहरे अनुभव में उतरकर ही, आखिरी घड़ी में, जब कुछ और शेष न रह जाएगा, सिर्फ सूक्ष्म अहंकार मात्र शेष रह जाएगा, वही पर्दा रहेगा। 
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बहुत झीना पर्दा, इतना झीना, इतना पारदर्शी कि बहुतो को तो लगेगा कि यह पर्दा है ही नहीं। जैसे शुद्ध कांच। जब तक तुम पास ही न आ जाओगे, तुम्हें लगेगा कोई पर्दा है ही नहीं बीच में। सब साफ दिखायी पड रहा है। लेकिन जब तुम पास आओगे, तब टकराओगे। उस घड़ी में अहंकार को छोड़ना पड़ता है। अंतिम घड़ी में।
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तो ध्यान—मार्ग भी अंततः कैसे तुम अहंकार को छोड़ोगे उसके लिए व्यवस्था जुटाता है। जुटानी ही पड़ेगी। यह बुद्ध की व्यवस्था है कि उन्होंने त्रि—शरण कहे। बुद्ध इन्हें त्रि—रत्न कहते हैं। हैं भी ये रत्न। इनसे बहुमूल्य और कुछ भी नहीं, क्योंकि इन्हीं को खोकर हमने सब खोया है। और इन्हीं को पाकर हम सब पा लेंगे।
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ये हैं तीन रत्न—
बुद्धं शरणं गच्छामि,
संघं शरणं गच्छामि,
धम्मं शरणं गच्छामि।
और इनके पीछे एक तर्कसरणी है। समझो। पहले तो बुद्ध के प्रति। बुद्ध का अर्थ गौतम बुद्ध नहीं है। इस भ्रांति में मत पड़ना। बुद्ध का अर्थ है, बुद्धत्व।
एक बार बुद्ध से किसी ने पूछा कि आप तो कहते हैं कि किसी की शरण में जाने की जरूरत नहीं है और लोग आपके सामने ही आकर कहते है—बुद्धं शरणं गच्छामि ? आप चुप रहते हैं। चुप्पी से तो समर्थन मिलता है। यह तो मौन समर्थन हो गया। आपको इनकार करना चाहिए।
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तो गौतम बुद्ध ने कहा, वे मेरी शरण जाते हों तो मैं इंकार करूं, और मेरी शरण तो जाएंगे भी कैसे ? क्योंकि मैं तो बचा भी नहीं। वे बुद्धत्व की शरण जाते हैं। जौ बुद्ध हुए हैं अतीत में, जो बुद्ध आज हैं, और जो बुद्ध कभी होंगे, उन सभी के सारभूत तत्व का नाम बुद्धत्व है। जो कभी जागे और कभी जागेंगे और जाग रहे हैं, उस जागरण का नाम बुद्धत्व है।
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तो पूछने वाले ने पूछा, फिर आपके ही चरणों में आकर क्यों कहते हैं ? 
कहीं भी कह दें। तो उन्होंने कहा, वह उनसे पूछो, वह उनकी समस्या है। उन्हें सब जगह दिखायी नहीं पड़ता, उन्हें मुझमें दिखायी पड़ता है। चलो, यहीं से शुरुआत सही, कहीं से तो शुरुआत हो ! झुकना कहीं तो सीखें। आज मुझमें दिखा है, कल और में भी दिखेगा, परसों और में भी दिखेगा, फिर उनकी दृष्टि बड़ी होती जाएगी। 
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एक दफा दिख जाए हीरा, तो फिर तुम्हें बहुत जगह दिखायी पड़ेगा। और एक बार हीरे की ठीक—ठीक परख आ जाए, तो फिर जौहरी की दुकान पर जो साफ—सुथरे, निखरे हीरे रखे हैं, उनमें ही नहीं, खदानों में भी जो हीरे पड़े हैं, जो अभी साफ—सुथरे नहीं हैं, उनमें भी हीरा दिखायी पड़ जाएगा। परख उग जाए।
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तो बुद्ध में और साधारण व्यक्ति में इतना ही फर्क है कि साधारण व्यक्ति ऐसा हीरा है जो अभी खदान में पड़ा है, और बुद्ध ऐसे हीरे हैं जिसको साफ—सुथरा किया गया, तराशा गया, जिस पर चमक आ गयी है। बुद्ध ने अपने हीरे के साथ जो करना था कर लिया, तुमने अपने हीरे के साथ जो करना था अभी नहीं किया। लेकिन जिसको हीरा पहचान में आ गया, उसे तो तुममें भी हीरा दिखायी पड़ जाएगा।
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तो बुद्ध ने कहा, अगर मुझमें उन्हें दिखायी पड़ती है बुद्धत्व की झलक, चलो, यही ठीक ! आज यहां दिखायी पड़ती है, कल और भी कहीं दिखायी पड़ेगी, फिर दिखायी पड़ती जाएगी। फिर सब तरफ दिखायी पड़ने लगेगी।
OSHO

= ६३ =

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*सूरज सन्मुख आरसी, पावक किया प्रकास ।*
*दादू सांई साधु बिच, सहजैं निपजै दास ॥*
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*साभार ~ @Subhash Jain*
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बाबा मलूक दास, यह नाम ही ऐसा प्‍यारा है, तन मन-प्राण में मिसरी घोल दे। ऐसे तो बहुत संत हुए हैं, सारा आकाश संतों के जगमगाते तारों से भरा है। पर मलूक दास की तुलना किसी और से नहीं की जा सकती। मूलक दास बेजोड़ हैं। उनकी अद्वितीयता उनके अल्‍हड़पन में है—मस्‍ती में है, बेखुदी में। यह नाम मलूक का मस्‍ती का पर्यायवाची हो गया। इस नाम में ही कुछ शराब है। यह नाम ही दोहराओं तो भीतर नाच उठने लगे।
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मलूक दास न तो कवि थे, न दार्शनिक है, न धर्मशास्‍त्री है। दीवाने हैं। परवाने हैं । और परमात्‍मा को उन्‍होंने ऐसे जाना है जैसे परवाना शमा को जानता है। यह पहचान बड़ी और है। दूर-दूर से नहीं, परिचय मात्र नहीं है वह पहचान—अपने को गंवा कर, अपने को मिटा कर होती है। 
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राम दुवारे जो मरे। राम के द्वारे पर मर कर राम को पहचाना है। कवि हो जाये। लेकिन मलूक की मस्‍ती सस्‍ती बात नहीं है। महंगा सौदा है। सब कुछ दांव पर लगाना पड़ता है। जरा भी बचाया तो चूके। रति भी बचाया तो चूके। निन्यानवे प्रतिशत दांव पर लगाया और एक प्रतिशत भी बचाया तो चूक गए।
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क्‍योंकि उस एक प्रतिशत बचाने में ही तुम्‍हारी बेईमानी जाहिर हो गयी। निन्‍न्‍यानवे प्रतिशत दांव पर लगाने में तुम्‍हारी श्रद्वा जाहिर न हुई। मगर एक प्रतिशत बचाने में तुम्‍हारा काइयाँपन जाहिर हो गया। दांव तो हो तो सौ प्रतिशत होता है; नहीं तो दांव नहीं होता, दुकानदारी होती है।
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मलूक के साथ चलना हो तो जुआरी कि बात समझनी होगी। दुकानदार की बात छोड़ देनी होगी। यह दांव लगाने वालों की बात है—दीवानों की।/ धर्म शास्‍त्री नहीं है। नहीं समझ में पड़ता कि वेद पढ़े होंगे। नहीं समझ में पड़ता कि उपनिषद जाने होंगे। 
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लेकिन फिर भी वेदों का जो राज है और उपनिषदों का जो सार है, वह उनके प्राणों से बिखरता है। वेद जानकर कभी किसी ने वेद जाने स्‍वयं को जानकर वेद जाने जाते हैं। चार वेद नहीं है—एक ही वेद है। वह तुम्‍हारे भीतर; वह तुम्‍हारे चैतन्‍य का है। और एक सौ आठ उपनिषद नहीं है। एक ही उपनिषद है, और उपनिषद शास्‍त्र नहीं है; स्‍वयं की सत्‍ता है।
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मलूक दास ज्ञानी नहीं थे। पंडित नहीं है। मलूक दास से पहचान करनी हो तो मंदिर को मधुशाला बनाना पड़े। तो पूजा पाठ से नहीं होगा। औपचारिक आडम्‍बर से परमात्‍मा नहीं सधेगा। हार्दिक समर्पण चाहिए। समर्पण—जो कि समग्र हो, समर्पण ऐसा कि झुको तो फिर उठो नहीं। 
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उसके द्वार पर झुक गये तो फिर उठना कैसा। जो काबा से लौट आता है। वह काबा गया ही नहीं। जो मंदिर से वापिस आ जाता है। वह कहीं गया होगा मंदिर नहीं गया।
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मूलक दास के जीवन के संबंध में कुछ बातें जान लें वे प्रतीकात्‍मक हैं। समझ लेने जैसी है। ऊपर से तो नहीं दिखायी पड़ती कि बहुत कीमती है, लेकिन अगर उन प्रतीकों के भीतर प्रवेश करोगे के भीतर प्रवेश करोगे तो जरूर बड़े राज , बड़े रहस्‍यों के द्वार खुलेंगे।
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जो पहली घटना उनके संबंध में ज्ञात है। वह यह है कि बचपन से ही एक अजीब सी आदत उन्‍हें थी। रास्ते पर कोई कांटा पडा मिल जाये तो हजार काम छोड़कर पहले उस कांटे को हटाते। छोटे थे तब से, कूड़ा-करकट कहीं पडा मिल जाये.......ओर भारत के रास्‍ते कूड़ा-कर्कटक की कोई कमी है। कांटों की कमी है। 
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काम के लिए भेजा जाता तो घंटों लग जाते, क्‍योंकि पहले वे रास्‍ता साफ करें, कूड़ा करकट हटायें, कांटे बिनें। कभी-कभी सुबह घर से भेजे जाएं कि जाकर बाजार से सब्‍जी ले आओ, सांझ लौटें। दिन भर मां उनकी राह देखे कि तुम रहे कहां, गये कहां थे। तो वे कहते: और भी जरूरी काम आ गये, सब्‍जी से भी ज्‍यादा जरूरी काम आ गया, रास्‍ते पर कांटे थे कूड़ा करकट था उसे बीना, हटाया।
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ऐसे तो यह छोटी सी बात है, लेकिन छोटी नहीं है। जीवन भर भी यही किया—लोगों के रास्‍तों पर से कांटे बीनें। लोगो के जीवन से कांटे लोगों के मनों से भरा हुआ कूड़ा-कचरा साफ किया। पूत के लक्षण पालने में।
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एक सदगुरु ने यह उन्‍हें करते देखा था कि वे रास्‍ते पर कांटे बीन रहे हे, कूड़ा-करकट बीन रहे हैं। तो वह सदगुरु उनके पीछ हो लिया। दिन भर इस छोटे से बच्‍चे की यह अदभुत जीवनशैली देखता रहा। सांझ को लौटकर उसने मलूक दास के पिता सुंदर दास को कहा: धन्‍य भागी हो तुम। तुम्‍हारे घर एक सदगुरु पैदा हुआ है।
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सुंदर दास ने तो सर ठोक लिया। सुंदर दास ने कहा: हम परेशान हैं इस सद्गुरु से। किसी काम का नहीं। छोटे-मोटे काम को भेजो, दिन-भर व्‍यतीत हो जाता है। लौटता ही नहीं। यह तो किसी भंगी के घर पैदा होता तो अच्‍छा था। यह पिछले जन्‍म का भंगी होगा। 
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इसको पता नहीं क्‍या धुन है, मारा, पिटा, धमकाया, सब तरह से समझाया कि यह काम अपना नहीं है। तुझे क्‍या लेना देना है। और कुछ करना है कि रास्‍ते ही साफ करते रहना है ? मगर छोटा सा बच्‍चा मलूक दास हंसता ओ यह कहता कि यह काम जिन्‍दगी भर मुझे करना है, सो अभ्‍यास करते रहना है।
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लेकिन उस सद्गुरु ने कहा कि मत, मत ऐसा बात कहां। तुम्‍हें पता नहीं तुम क्‍या कह रहे हो। तुम्‍हारे घर ज्‍योति उतरी है। अभी कुछ और नहीं कर सकता छोटा बच्‍चा है, तो बाहर का कूड़ा-कचरा साफ कर रहा है। जल्‍दी ही यह भीतर का कूड़ा कचरा साफ करेगा। 
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बहुत लोगों के जीवन इसके कारण स्‍वच्‍छ और निर्मल होंगे। और देखते ही—सदगुरु ने कहा—यह आजानुबाहु है। इसकी बाहें कितनी लम्‍बी हैं। घुटनों तक पहुँचती है। यह तो चक्रवर्ती सम्राट होगा और या एक अद्भुत बुद्ध पुरूष....
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यह दुनिया बडी अद्भुत है इसका गणित अनोखा है। यहां जो समझदार साबित होने चाहिए, समझदार साबित नहीं होते। बड़े नासमझ सिद्ध होते हैं। यहां नासमझ समझदार सिद्ध हो जाते हैं। मलूक दास की गिनती तुम ना समझों में मत करना। उन्‍होंने मालिक को पा लिया और सब पा लिया।
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ओशो(राम दुवारे जो मरे)
प्रवचन पहला, 11नवम्‍बर 1979;
श्री रजनीश आश्रम; पूना

गुरुवार, 25 जनवरी 2024

= ६२ =

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*सब ही मृतक देखिये, किहिं विधि जीवैं जीव ।*
*साधु सुधारस आणि करि, दादू बरसे पीव ॥*
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*साभार ~ @Subhash Jain*
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यह तो बचपन की पहली घटना मलूक दास के संबंध में ज्ञात है कि वे कूड़ा कचरा रास्‍तों से साफ कर देते थे। और एक सद्गुरू ने कहा था उनके पिता को कि घबडाओं मत चिंतित मत होओ तुम्‍हारे घर ज्योति उतरी है; यह बहुतों के जीवन के कूड़ा कचरा दूर करेगा। यह तो केवल बाहर की सूचना दे रहा है। अभी यह प्रतीक वत है।
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दूसरी घटना बचपन के संबंध में—जो रोज-रोज घटती थी, जिससे मां बाप परेशान हो गये थे। वह थी: साधु सत्‍संग। कोई आ जाये साधु कोई आ जाये संत, फिर मलूक दास घर की सुध-बुध भूल जाते। दिनों बीत जाते, घर न लोटते, साधु-संग में लग जाते। घर में जो भी होता साधुओं को दे आते।
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साधुओं को तो बहुत लोगों ने दिया है। लेकिन जिस ढंग से मलूक दास ने दिया है वैसा किसी ने शायद ही दिया हो। चोरी करके देते। मां-पिता आज्ञा न दें तो घर में से ही चोरी करके, जब रात सब सोये होते, अपने ही घर की चीजें चुराकर साधुओं को दे आते। क्‍योंकि कोई साधु है जिसके पास कम्‍बल नहीं है और सर्दी लगी है उसे और कोई साधु है जिसके पास छाता नही है और वर्षा सिर पर खड़ी है। तो चोरी करके भी बांटते।
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कभी-कभी चोरी भी पुण्‍य हो सकती है। इसीलिए तुमसे कहाता हूं: कृत्‍य नहीं होते पाप और पुण्‍य—कृत्‍यों के पीछे छिपे हुए अभी प्राय। कभी पुण्‍य भी पाप हो सकता है। कभी पाप भी पूण्‍य हो सकता है। जीवन का गणित पहेली जैसा है। सीधी रेखा नही है। जीवन के गणित की कोई नहीं का सकता कि यह ठीक और ऐसा करोगे तो गलत सब कुछ निर्भर करता भीतर की अभीप्‍सा पर।
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चोरी को कौन पुण्‍य कहेगा। अब मूलक दास की चोरी को मैं कैसे पाप कहूं। मूलक दास की चोरी काक पान नहीं कहा जा सकता। और तुम चोरी भी न करो तो भी क्‍या पुण्‍य हो रहा है। तुम दान भी देते हो तो पाप हो जाता है; क्‍योंकि मंदिर के द्वार पर भी तुम अपना पत्‍थर लगवा देते हो।
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कुछ चमत्‍कारों की भी घटनायें बाबा मलूक दास के संबंध में जुड़ी हैं। वैसी घटनाएं करीब-करीब अनेक संतों के साथ जुड़ जाती हैं। उनके जुड़ जाने के पीछे राज है। उनको तथ्‍य मत समझना। तथ्‍य समझा तो भ्रांति हो जाती है। उनको केवल संकेत समझना। वे सांकेतिक हैं।
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जैसे जीसस के संबंध में कथा है कि उन्‍होंने लजारस को मुर्दे से जिला दिया। वापस बुला लिया। वैसी ही कहानी मलूक दास के संबंध में है कि अपने एक शिष्‍य को उन्‍होंने मौत की दुनिया से वापिस बुला लिया था। मूलक दास ने किसी शिष्‍य को, मर गया था और जिन्‍दा कर लिया। फिर मलूक दास कहां हैं ? वे भी मर गये।
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खुद मरते वक्‍त याद न रही अपनी कला, अपना चमत्‍कार, नहीं ये ऐतिहासिक तथ्‍य नहीं है। और जो उनको ऐतिहासिक तथ्‍य मानते है वे बहुत भंयकर भूल कर रहे है। चाहे वे सोचते हों कि हम भक्‍त है, लेकिन वे भक्‍त नहीं हैं। वे हानि पहुंचाते हैं। इसी तरह की बातों के कारण धर्म असत्‍य मालूम होने लगता है। धर्म के साथ अगर तुम इस तरह की बातें जोड़ दोगे, तो ये बातें असत्‍य हैं, इनके साथ धर्म की नाव भी डूब जायेगी। असत्‍य के साथ धर्म को मत जोड़ना।

लेकिन इस तरह की कहानियों में सार बहुत है। सद्गुरू तुम्‍हें पुकारता है तुम्‍हारी कब्र से—उठो, जागों वह पुकारता है। उसकी पुकार अगर तुम सुन लो तो तुम्‍हारी बहरापन खो जाये। उसका स्‍पर्श तुम अनुभव कर लो तो तुम्‍हारी बंध आंखें खुल जाये। ये सिर्फ प्रतीक है इस बात के कि तुम्‍हारी यह सम्‍भावना है, किसी गुरु के सान्‍निध्‍य में सत्‍य बन सकती है। तुम लंगड़े नहीं हो, तुम जीवन के परम शिखर पर चढ़ने योगय हो।
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शिष्‍य मुर्दा है। सद्गुरू मुद्रों को जगाता है। मगर ये ऐतिहासिक तथ्‍य नहीं है। वे सांकेतिक तथ्‍य है। इनमें बड़ा काव्‍य छिपा है और बड़े रहस्‍य भी ये तथ्‍य नहीं है। तथ्‍य तो दो कोड़ी के होते हैं। सत्‍यों का मूल्‍य होता है। लेकिन सत्‍य को कहें कैसे, हमारी भाषा नपुंसक है सत्‍य प्रगट नहीं कर पाती। कथाएं चुननी पड़ती है। उँगली उठानी पड़ती है चाँदकी तरफ पर हम ना समझ ऊंगली को ही पकड़ लेते हैं। चाँद को भूल ही जाते हैं।
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ओशो(राम दुवारे जो मरे)
प्रवचन पहला, 11नवम्‍बर 1979;
श्री रजनीश आश्रम; पूना