शनिवार, 28 फ़रवरी 2015

= १९८ =


#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
दादू शब्दैं बँध्या सब रहै, शब्दैं ही सब जाइ ।
शब्दैं ही सब ऊपजै, शब्दैं सबै समाइ ॥ 
दादू शब्दैं ही सचु पाइये, शब्दैं ही संतोंख ।
शब्दैं ही सुस्थिर भया, शब्दैं भागा शोक ॥
दादू शब्दैं ही सूक्ष्म भया, शब्दैं सहज समान ।
शब्दैं ही निर्गुण मिले, शब्दैं निर्मल ज्ञान ॥
दादू शब्दैं ही मुक्ता भया, शब्दैं समझे प्राण ।
शब्दैं ही सूझे सबै, शब्दैं सुरझे जाण ॥
*(श्री दादूवाणी ~ शब्द का अंग)*
====================
@Yog Shaurya ~
- एक बार रामकृष्ण अपने सत्संग में कह रहे थे कि ओंकार के नाद से बड़ी उपलब्धि होती है । वहां बैठे एक शास्‍त्र ज्ञानी को इससे बड़ी अड़चन हुई । क्योंकि ज्ञानी जानता था कि रामकृष्ण कम पढ़े-लिखे हैं, शास्त्र का तो कुछ पता नहीं है, हांक रहे हैं; संस्कृत तो आती नहीं, कुछ भी कहे चल जा रहे हैं ! वह अपना ज्ञान दिखाना चाहता था।
.
उसने कहा, ठहरें ! शब्दों में क्या रखा है ? ओंकार तो केवल एक शब्द है, इसमें रखा क्या है ? किसी शब्द में इतनी शक्ति कैसे हो सकती है कि उससे आत्मज्ञान प्राप्त हो जाये ? रामकृष्ण ने उसकी तरफ देखा, चुप बैठे रहे । वह और जोर-जोर से शास्त्रों के उल्लेख करने लगा और उद्धरण देने लगा । कोई आधा घंटा बीत गया, तब रामकृष्ण एकदम से चिल्लाये: "चुप, उल्लू के पट्ठे ! बिलकुल चुप ! अगर एक शब्द बोला आगे तो ठीक नहीं होगा ।"
.
"उल्लू के पट्ठे" तो मैं कह रहा हूं, रामकृष्ण ने ज्यादा वजनी गाली दी । तो रामकृष्ण कोई छोटी-मोटी बकवास नहीं मानते थे; वे जब गाली देते थे तो बिलकुल नगद ! वह आदमी घबड़ा गया, तमतमा गया एकदम ! क्रोध भर गया आंख में ! पर कुछ कह ना सका क्योंकि वहां ज्यादातर रामकृष्ण के शिष्य थे, झगड़ा हो सकता था ।
.
फिर, रामकृष्ण फिर अपना समझाने लगे कि ओंकार…। कोई पांच-सात मिनट बाद उस आदमी की तरफ देखा और कहा, महानुभाव ! माफ करना । वह तो मैंने सिर्फ इसलिए कहा था कि देखें "शब्द" का असर होता है कि नहीं ! तुम तो बिलकुल पसीना-पसीना हुए जा रहे हो, मरने-मारने पर उतारू हो । वह तो यह कहो कि लोग मौजूद हैं, नहीं तो तुम मेरी गर्दन पर सवार हो जाते । जरा सोचो तो जब "उल्लू के पट्ठे" शब्द का इतना असर है तो ओंकार का कितना होगा ? ------osho

= १९७ =


#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
योग समाधि सुख सुरति सौं, सहजैं सहजैं आव ।
मुक्ता द्वारा महल का, इहै भक्ति का भाव ॥
*(श्री दादूवाणी ~ लै का अंग)*
https://youtu.be/mGMsc4sJ3Z0
===============
@Yog Shaurya ~ ध्यान :
- ध्यान परमात्मा को पाने की प्रक्रिया नहीं है। परमात्मा तो बिना ध्यान के भी पाया जा सकता है। ध्यान परमात्मा को झेलने का अभ्यास है। ध्यान पात्रता देता है कि तुम परम ऊर्जा को झेल सको।
.
असत्य में भटके हो इतने दिन तक कि तुम्हारी आंखें असत्य की आदी हो गई हैं। सत्य का आघात तुम्हें तोड़ सकता है, विक्षिप्त कर सकता है। परमात्मा के, सत्य के बहुत खोजी पागल हो गए हैं।
.
सत्य के बहुत खोजी ठीक उस दशा के करीब, जब परमहंस होने को होते हैं, तभी पागल हो जाते हैं, विक्षिप्त हो जाते हैं। क्योंकि परमात्मा इतना विराट है, सत्‍य की घटना इतनी बड़ी है, अविश्वसनीय है कि तुम अवाक रह जाओगे।
.
यह ऐसा है जैसे पूरा आकाश टूट पड़े तुम पर, छोटा तुम्हारा पात्र है और विराट तुम्हारे पात्र पर बरस जाए। तुम अस्तव्यस्त हो जाओगे। तुम सम्हाल न पाओगे। जैसे सूरज एकदम सामने आ जाए और तुम्हारी आंखें झकपका जाएं, धुंधलका हो जाए। इसलिए तो ध्यान की तैयारी करनी पड़ती है। ध्यान पात्रता देता है कि तुम विराट को झेल सको। ------osho

= १९६ =

#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
निगुणा गुण मानै नहीं, कोटि करै जे कोइ ।
दादू सब कुछ सौंपिये, सो फिर बैरी होइ ॥
*(श्री दादूवाणी ~ निगुणा का अंग)*
==================
साभार : @नितिन सिंह via देवदत्त आर्य ~

एक ''राज्य मंत्री'', भ्रष्ट था, उसकी खुशकिस्मति कि वो राजा का साला था ! बहुत शिकायतें मिलने पर भी राजा कुछ नहीं कर पाता ! उसके भ्रष्टाचार को सहन करना भी कठिन हो गया ! राजा बोला तुम बड़े मेहनती हो एक काम करो ! हम तुम को नया काम देते हैँ !
.
जाओ आज समुद्र के किनारे बैठ कर लहरेँ गिनो ! राजा का आदेश है काम भी करना है नहीं करते तो जाने क्या हो ! ये भी किसी तरह बडबडाता वहां से निकला और राजा ने भी खैर मनाई कि चलो जान छूटी ! छः महीने हो गये राजा ने सोचा चलो देख आते हैँ ! अगर सुधर गया है तो वापस ले आते हैँ !
.
राजा अपनी नाव लेकर चले किनारे से पहले बीस लोगों ने राजा को रोक लिया बोले टैक्स दो ! 
अरे कैसा टैक्स इस राज्य के राजा को जानता हूँ ! यहाँ ऐसा कोई टैक्स नही है !
अरे ये सब राजा के कहने से हो रहा है ! राजा ने ही लहर मंत्री रखा है हम उसके कर्मचारी हैँ ! तुम लहर गिनने मे अडचन पैदा करते हो ! वो देखो बड़े बड़े जहाज टैक्स दे रहे हैँ तुम जिद करोगे तो राजा की बात न मानने के लिये अंदर कर देंगे ! राजा ने माथा पीट लिया !
.
कहने का मतलब बस इतना कि ''भ्रष्ट'' को ''सुधारा'' नहीं जा सकता !

२१. भक्ति ज्ञान मिश्रित को अंग ~ ५

#daduji
॥ श्री दादूदयालवे नमः॥
*सवैया ग्रन्थ(सुन्दर विलास)*
साभार ~ @महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य - श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व
राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
.
*२१. भक्ति ज्ञान मिश्रित को अंग*
.
*दूरि हु रांम नजीक हु रांम हि,*
*देश हु रांम प्रदेश हु रांमै ।*
*पूरब रांम हि पच्छिम रांम हि,*
*दक्षिन रांम हि उत्तर धांमै ॥*
*आगै हु रांम हिं पीछै हु रांम हि,*
*व्यापक रांम हि है वन ग्रांमै ।*
*सुन्दर रांम दसौं दिसि पूरन,*
*सुरग हु रांम पताल हु तांमै ॥५॥*
वह सर्वव्यापक परमात्मा दूर भी है, समीप भी है, देश में भी है, विदेश में भी है ।
पूर्व में भी पश्चिम में भी है दक्षिण में भी है, उत्तर में भी है । यों वह चारों दिशाओं में व्याप्त हैं ।
वह सर्वव्यापक राम ही आगे, पीछे सर्वत्र व्याप्त है । यहाँ तक सभी वनों एवं ग्रामों में भी वह व्याप्त है ।
*श्री सुन्दरदास जी* कहते हैं - वह सर्वव्यापक राम स्वर्ग एवं पाताल तथा दशों दिशाओं में सर्वत्र व्याप्त है ॥५॥
(क्रमशः)

|| दादूराम सत्यराम ||
"श्री दादू चरितामृत(भाग-१)" लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान |
= बीठलव्यास को माला प्रदान करना = 
फिर कुछ दिन के पश्चात् बीठलव्यास के मन में भाव उठा, ये संत दादूजी ज्ञान की बातें तो बहुत सुन्दर करते हैं, किन्तु बातों से ही क्या हो सकता है ? आज मैं दादूजी के पास जाकर प्रणाम करूं, उस समय वे यदि मुझे बढ़िया चंदन की सुंदर माला देंगे तो मैं उनको साक्षात् भगवान् स्वरूप ही मानूँगा | बीठलव्यास के मन के भाव को दादूजी अपनी योग शक्ति से जान गये | फिर उस दिन जब बीठलव्यास दादूजी को प्रणाम करने आये तब दादूजी ने उनके भाव के अनुसार सुन्दर चन्दन की माला उनको प्रदान की | यह देखकर बीठलव्यास को अति आश्चर्य हुआ | कारण, उन्होंने दादूजी के पास माला कभी देखी नहीं थी | फिर बीठलव्यास ने पूछा भी, भगवन् ! यह माला कहां से आई ?" दादूजी ने कहा--"भगवान् ने तुम्हारे लिए ही भेजी है | तुमने जैसी इच्छा की थी भगवान् ने वैसी ही व्यवस्था कर दी है |" 
फिर तो बीठलव्यास के पिता गंगारामव्यास और बीठलव्यास का छोटा भाई भगवान् व्यास, ये सब दादूजी को साक्षात् भगवान् स्वरूप मानकर अनन्य भाव से सदा सेवा में तत्पर रहने लगे थे | इन सबकी ऐसी श्रद्धा देखकर इन की जाति वाले आश्चर्य करते थे | एक दिन बीठलव्यास के जाति वालों ने बीठलव्यास को पूछा--"तुमको दादूजी ने ऐसा क्या धन दे दिया है, जिससे तुम उनके अनन्य भक्त बन गये हो ?"
बीठलव्यास ने उन लोगों को कहा--"मुझे संत प्रवर दादूजी महाराज ने राम-धन दिया है, जो सब प्रकार के धनों से महान् और अक्षय है | जिन वस्तुओं को सांसारिक प्राणी धन समझते हैं, वे तो परम दुःख रूप हैं | अज्ञान के कारण ही भ्रांति से उनमें सुख भासता है और दादूजी की धनराशि राम-स्वरूप है, उसका नाश तो किसी प्रकार हो ही नहीं सकता, वही धन उन्होंने मुझे दिया है | आप में भी श्रद्धा भक्ति हो तो वह आपको उनके द्वारा प्राप्त हो सकता है | यह मैं सत्य कहता हूँ |" बीठालव्यास के पिता गंगारामव्यास और बीठल के छोटे भाई भगवान्-व्यास भी श्री दादूजी के अच्छे भक्त थे |

इति श्रीदादू चरितामृत पंचम विन्दु समाप्त | 

(क्रमशः)
॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥ 
१४६. अत्यन्त विरह(गुजराती भाषा) । अड्डूताल ~
कोई कहो रे मारा नाथ ने, नारी नैण निहारे बाट रे ॥ टेक ॥
दीन दुखिया सुन्दरी, करुणा वचन कहे रे ।
तुम बिन नाह विरहणी व्याकुल, केम कर नाथ रहे रे ॥ १ ॥
भूधर बिन भावे नहिं कोई, हरि बिन और न जाणे रे ।
देह गृह हूँ तेने आपूं, जे कोई गोविन्द आणे रे ॥ २ ॥
जगपति ने जोवा ने काजे, आतुर थई रही रे ।
दादू ने देखाड़ो स्वामी, व्याकुल होई गई रे ॥ ३ ॥
टीका ~ ब्रह्मऋषि सतगुरु इसमें अत्यन्त विरहभाव कह रहे हैं कि हे संतों ! कोई उस हमारे प्रीतम परमेश्‍वर को जाकर कहो कि आपकी विरहिनी सुन्दरी आपके दर्शनों के लिये नेत्रों से मार्ग देख रही है । हमतो उस प्रभु के दर्शनों के बिना दीन दुःखी हो रही हैं और कातरता युक्त वचन कह रहे हैं । हे पति ! आपके बिना हम विरहिनी अत्यंत व्याकुल हैं । इस शरीर में अब हमारे प्राण कैसे रहें ? हे भूधर ! भूमि को या गोवर्धन को धारण करने वाले! आपके बिना हमें इस त्रिलोकी में कुछ भी प्रिय नहीं लगता है । हम तो हे हरि ! आपके बिना और किसी को भी अपना स्वामी नहीं अपनाते । हे संतों ! जो कोई हमको गोविन्द से मिला दे, तो उसको हम अपना घर - द्वार और प्राण भी अर्पण कर दें । हे जगपति ! आपके दर्शन करने के लिये हम तो अत्यन्त दुःखी हो रहे हैं । अब तो हम विरहीजनों को आप अपना दर्शन दिखाओ, हम अत्यन्त व्याकुल हो रही हैं ।

*= बीठलव्यास को माला प्रदान करना =*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
https://www.facebook.com/DADUVANI
*#श्रीदादूचरितामृत*, *"श्री दादू चरितामृत(भाग-१)"
लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज,
पुष्कर, राजस्थान ।*
.
*~ पंचम बिन्दु ~*
*= बीठलव्यास को माला प्रदान करना =*
.
फिर कुछ दिन के पश्चात् बीठलव्यास के मन में भाव उठा, ये संत दादूजी ज्ञान की बातें तो बहुत सुन्दर करते हैं, किन्तु बातों से ही क्या हो सकता है ? आज मैं दादूजी के पास जाकर प्रणाम करूं, उस समय वे यदि मुझे बढ़िया चंदन की सुंदर माला देंगे तो मैं उनको साक्षात् भगवान् स्वरूप ही मानूँगा ।
.
बीठलव्यास के मन के भाव को दादूजी अपनी योग शक्ति से जान गये । फिर उस दिन जब बीठलव्यास दादूजी को प्रणाम करने आये तब दादूजी ने उनके भाव के अनुसार सुन्दर चन्दन की माला उनको प्रदान की ।
.
यह देखकर बीठलव्यास को अति आश्चर्य हुआ । कारण, उन्होंने दादूजी के पास माला कभी देखी नहीं थी । फिर बीठलव्यास ने पूछा भी, भगवन् ! यह माला कहां से आई ?" दादूजी ने कहा - "भगवान् ने तुम्हारे लिए ही भेजी है । तुमने जैसी इच्छा की थी भगवान् ने वैसी ही व्यवस्था कर दी है ।"
.
फिर तो बीठलव्यास के पिता गंगारामव्यास और बीठलव्यास का छोटा भाई भगवान् व्यास, ये सब दादूजी को साक्षात् भगवान् स्वरूप मानकर अनन्य भाव से सदा सेवा में तत्पर रहने लगे थे । इन सबकी ऐसी श्रद्धा देखकर इन की जाति वाले आश्चर्य करते थे ।
.
एक दिन बीठलव्यास के जाति वालों ने बीठलव्यास को पूछा - "तुमको दादूजी ने ऐसा क्या धन दे दिया है, जिससे तुम उनके अनन्य भक्त बन गये हो ?"
बीठलव्यास ने उन लोगों को कहा - "मुझे संत प्रवर दादूजी महाराज ने राम - धन दिया है, जो सब प्रकार के धनों से महान् और अक्षय है । जिन वस्तुओं को सांसारिक प्राणी धन समझते हैं, वे तो परम दुःख रूप हैं ।
.
अज्ञान के कारण ही भ्रांति से उनमें सुख भासता है और दादूजी की धनराशि राम - स्वरूप है, उसका नाश तो किसी प्रकार हो ही नहीं सकता, वही धन उन्होंने मुझे दिया है । आप में भी श्रद्धा भक्ति हो तो वह आपको उनके द्वारा प्राप्त हो सकता है । यह मैं सत्य कहता हूँ ।" बीठालव्यास के पिता गंगारामव्यास और बीठल के छोटे भाई भगवान् - व्यास भी श्री दादूजी के अच्छे भक्त थे ।
इति श्रीदादू चरितामृत पंचम विन्दु समाप्त ।
(क्रमशः)

शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2015

= १९५ =

#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
*दादू राम रसाइन नित चवै,*
*हरि है हीरा साथ ।*
*सो धन मेरे साइयां,*
*अलख खजाना हाथ ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ स्मरण का अंग)*
https://youtu.be/XUxXTQ0aRIc
================
साभार : Osho Prem Sandesh ~
आनंद चाहते हो? आलोक चाहते हो ? तो सबसे पहले अंतस में खोजो। जो वहां खोजता है, उसे फिर और कहीं नहीं खोजना पड़ता है। और, जो वहां नहीं खोजता, वह खोजता ही रहता है, किंतु पता नहीं है। एक भिखारी था। वह जीवन भर एक ही स्थान पर बैठ कर भीख मांगता रहा। 
.
धनवान बनने की उसकी बढ़ी प्रबल इच्छा थी। उसने बहुत भीख मांगी। पर, भीख मांग-मांग कर क्या कोई धनवान हुआ है ? वह भिखारी था, सो भिखारी ही रहा। वह जिया भी भिखारी और मरा भी भिखारी। जब वह मरा तो उसके कफन के लायक भी पूरे पैसे उसके पास नहीं थे ! 
.
उसके मर जाने पर उसका झोंपड़ा तोड़ दिया गया और वह जमीन साफ की गई। उस सफाई में ज्ञात हुआ कि वह जिस जगह बैठकर जीवन भर भीख मांगता रहा, उसके ठीक नीचे भारी खजाना गड़ा हुआ था।
.
मैं प्रत्येक से पूछना चाहता हूं कि क्या हम भी ऐसे ही भिखारी नहीं हैं? क्या प्रत्येक के भीतर ही वह खजाना नहीं छिपा हुआ है, जिसे कि हम जीवन भर बाहर खोजते रहते हैं !
.
इसके पूर्व कि शांति और संपदा की तलाश में तुम्हारी यात्रा प्रारंभ हो, सबसे पहले उस जगह को खोद लेना, जहां कि तुम खड़े हो। क्योंकि, बड़े से बड़े खोजियों और यात्रियों ने सारी दुनिया में भटक कर अंतत: खजाना वहीं पाया है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

= १९४ =

#daduji
卐 सत्यराम सा 卐 
सोने सेती बैर क्या, मारे घण के घाइ । 
दादू काटि कलंक सब, राखै कंठ लगाइ ॥ 
पाणी माहैं राखिये, कनक कलंक न जाहि । 
दादू गुरु के ज्ञान सों, ताइ अगनि में बाहि ॥
*(श्री दादूवाणी ~ गुरुदेव का अंग)*
=======================
साभार : @Nitin Aggarwal ~ 
Jai ho AGHOR ~ अघोर 

औघड़ वाणी : सच्चा साधक एक स्वर्ण के पिंड के सामान होता है । जिसे गुरु खोज कर पात्र बनाते हैं । जिसमे गुरु उसे तपाते हैं पीटते हैं । पात्र के रूप में ढाल देते हैं । उस पात्र में अपन ज्ञान का अमृत उड़ेल देते हैं । पर उस पात्र की साफ सफाई और रख रखाव साधक के हाथ में होता है । 
.
साफ करके गन्दगी हटा देना आसान है पर कठिन है उसको चमकाना । चमकाने की प्रक्रिया कठिन परिश्रम और लगन से पूर्ण होती है । अंत में चमकता हुआ पात्र श्रद्धा का विषय बन जाता है । अक्सर सब कहते हैं जब संतो के संग होता हूँ मन शुद्ध है और जब संसार में आता हूँ सारी बातें भूल कर संसारिकता में लिप्त हो जाता हूँ । 
.
ऐसे में ज्ञान को आत्मसात करने की क्षमता की कमी दर्शाती है । संत यह नहीं कहते कि संसार में संत बनके दिखाओ । संत के ज्ञान को आत्मसात कर अपने क्रिया कलापों में निवेशित करो । क्रोध लोभ मोह माया तो अवश्यम्भावी है पर उनको दूसरी दिशा में भटकना होगा । इसके उपरान्त जनित भाव स्वयं ही उस दिशा में भटक जायेगा । 
अलख आदेश ।।।

= १९३ =

#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
*झूठे अंधे गुरु घणे,*
*भरम दिढावैं आइ ।*
*दादू साचा गुरु मिलै,*
*जीव ब्रह्म ह्वै जाइ ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ गुरुदेव का अंग)*
===================
अघोर :
क्या आज कल तंत्र और अघोर बस प्रयोगों में समाहित हो गया है ? नौकरी नहीं प्रयोग बताओ । मन नहीं लगता प्रयोग बताओ । घर में पति पत्नी में अनबन है प्रयोग बताओ । आज कल हर प्रयोग के लिए प्रयोग बन गए । कभी लगता है तंत्र आत्म ज्ञान स्वः अनुभूति से कहीं दूर है । जब सांसारिक भटक गया तो कई भटकाव दीक्षा वाले गुरु भी अवतारित हो गए ।
.
ऐसे अनेक गुरु रूपी गुरु घंटाल हर नुक्कड़ पर बैठ गए जो घंटो में प्रेमी या प्रेमिका को वापस लाने का दावा करने लगे । और कामांध सांसारिक मृत अवश्यम्भावी देह को पाने के लिए विचलित हो गया । कुछ महानुभावों ने गुरु धर्म का फायदा उठाया । दीक्षा दूंगा इतने पैसे दो । आय का दशांश दो । घर की परेशानी, अनबन दूर कर दूंगा । रक्षा करूँगा । बस धन देते जाओ ।
.
एक ऐसे महापुरुष हैं जिन्होंने नौकरी छूटे व्यक्ति से ५००००/- की मांग रख दी । पैसे लाओ नौकरी दिलवा दूंगा । नौकरी तो नहीं मिली अपितु जिनसे पैसे मांग के दिए थे वो मांगने लगे । ऐसे भटकाव वाले दीक्षा गुरु खुद मसान नहीं जाते पर अपने शिष्यों को मसान साधना सिखाते हैं ।
.
क्या सांसारिक इतना कामांध और मानसिक रूप से कमजोर है कि जहाँ तिलक और वस्त्र के रंग देख लिया दौड़ पडे ? और ऐसे तथाकथित गुरु भी हर मौके पर देव और देवियों को बदनाम करने लगे । इसका दोष उसका दोष दिखाने लगे । और सांसारिक सब कुछ यथाशीघ्र पाने की आपाधापी और सारे काम तुरंत कराने के चक्कर में और परेशान होने लगे । जब संत कौन है गुरु का भाव कैसा होता है सभी को पता है तो ऐसा कार्य क्यों ?
अलख आदेश ।।।

= १९२ =

#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
*दादू जल में गगन, गगन में जल है,*
*पुनि वै गगन निरालं ।*
*ब्रह्म जीव इहिं विधि रहै,*
*ऐसा भेद विचारं ॥*
*ज्यों दर्पण में मुख देखिये,*
*पानी में प्रतिबिम्ब ।*
*ऐसे आत्मराम है,*
*दादू सब ही संग ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ विचार का अंग)*
===================
जैसे स्याही में सब जगह सब तरह की लिपियाँ विद्यमान हैं, सोने में सब जगह सब तरह के गहने, मूर्तियां और उनके अवयव विद्यमान रहते हैं, ऐसे ही उस परमात्म तत्त्व में सब जगह अनंत वस्तुयें, व्यक्ति, और उनके अवयव विद्यमान रहते हैं ।
.
इसलिए वे सम्पूर्ण ब्रह्मांडों को अपने एक अंश से व्याप्त करके स्थित हैं। वे परमात्मा स्वयम विभाग-रहित होने पर भी अलग-अलग प्राणियों में विभक्त की तरह प्रतीत होते हैं । वे सम्पूर्ण जगत को प्रकाशित करते हैं, पर उनको कोई प्रकाशित नहीं कर सकता । वे ज्ञान-स्वरूप, प्रकाश-स्वरूप,परमात्मा सबके हृदय में नित्य-निरंतर विद्यमान हैं ।
.
ऐसे वे जानने योग्य एक परमात्मा ही, रजो-गुण की प्रधानता स्वीकार करके ब्रह्मा-रूप से सबको उत्पन्न करते हैं, सत्व-गुण की प्रधानता स्वीकार करके विष्णु-रूप से सबका भरण-पोषण करते हैं और तमोगुण की प्रधानता स्वीकार करके शिव-रूप से सबका संहार करते हैं । ऐसा करने पर भी वे सम्पूर्ण गुणों से रहित और निर्लिप्त रहते हैं ।

*= कंठी, माला तिलक =*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
https://www.facebook.com/DADUVANI
*#श्रीदादूचरितामृत*, *"श्री दादू चरितामृत(भाग-१)"
लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज,
पुष्कर, राजस्थान ।*
.
*~ पंचम बिन्दु ~*
*= कंठी, माला तिलक =*
.
एक दिन बीठलव्यास ने प्रणाम करके दादूजी से पूछा भगवन् ! आप अन्य संतों के समान कंठी, माला तिलक क्यों नहीं रखते हैं ?
दादूजी ने कहा -
"दादू माला तिलक से कुछ नहीं, काहू सेती काम ।
अंतर मेरे एक है, अह निश उसका नाम ।"
अर्थ : - माला, तिलक और कंठी से परमात्मा की प्राप्ति रूप कार्य में कुछ भी लाभ नहीं है । तिलक और कंठी तो अपने - अपने संप्रदाय के चिन्ह मात्र है । यदि कंठी और तिलक से ही परमात्मा की प्राप्तिरूप कार्य होता हो, तब तो करोड़ों की संख्या में लोग रखते हैं । उन सबको परमात्मा का साक्षात्कार होना चाहिये ? उनके तो ईर्ष्या द्वेष आदि द्वंद्व भी दूर नहीं होते हैं । तब परमार्थ में उसका क्या लाभ है ? अर्थात् संप्रदाय के चिन्ह मात्र ही हैं । और माला भी जप की संख्या के लिए ही है ।
.
"दादू सतगुरु माला मन दिया, पवन सुरत से पोय ।
बिन हाथों निशि दिन जपैं, परम जाप यूं होय ॥"
अर्थ - हमारे गुरु वृद्ध भगवान् ने हम को मन रूप माला दी है, अर्थात् एकाग्र मन से प्रतिश्वास ब्रह्मचिन्तन करना रूप माला दी है । उस माला को बिना हाथों ही हम रात दिन जपते हैं । इस प्रकार हमारा अन्तः जप निरंतर होता ही रहता है । हमको अन्य माला की आवश्यकता नहीं होती है । उक्त प्रकार से मुझे कंठी, माला और तिलक की प्रभु की उपासना में आवश्यकता नहीं होने से मैं कंठी, माला, तिलक नहीं धारण करता हूँ । और सांसारिक प्राणी तो लकीर पीटने वाली बात चरितार्थ करते हैं । नामदेवादिकों के समान उपासना नहीं कर पाते हैं ।
.
"सांप गया सहणान को, सब मिल मारें लोक ।
दादू ऐसा देखिये, कुल का डोगरा फोक ।"
इससे सांसारिक लोकों का साधन डगर(मार्ग) निःस्सार छाछ के सामान है और संतों की साधना सार नवनीत के समान है । उक्त विचारों को श्रवण करके बीठलव्यास के मनको संतोष हुआ । उसका मुख मंडल प्रसन्न भासने लगा । उसने प्रणाम करके कहा - "आप सत्य ही कहते हैं, सर्वसाधारण से नामदेवादि के समान अंतः साधना नहीं हो पाती है । सांसारिक लोकों में बाहर का दिखावा ही अधिक देखा जाता है ।"
(क्रमशः)

= १९१ =

#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
*राम जी तूँ मोरा हौं तोरा,*
*पाइन परत निहोरा ॥टेक॥*
*एकै संगैं वासा,*
*तुम ठाकुर हम दासा ॥१॥*
*तन मन तुम कौं देबा,*
*तेज पुंज हम लेबा ॥२॥*
*रस माँही रस होइबा,*
*ज्योति स्वरूपी जोइबा ॥३॥*
*ब्रह्म जीव का मेला,*
*दादू नूर अकेला ॥४॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ पद. ४०७)*
==============
साभार : @Yog Shaurya ~
विराट को मांगो :
मांगना है तो विराट को मांगो क्षुद्र को क्यों मांग रहे हो....मैं चाहता हूं कि तुम्हारा पूरा जीवन वसंत सा खिल उठे और तुम हो कि एक फूल के पीछे पड़े हो । तुम इक्के - दुक्के फूलों की मांग मत करो, नहीं तो पीछे पछताओगे और रोओगे कि विराट हो सकता था यह जीवन और मैं छोटे की मांग करता रहा।
रस तो अनंत था, अंजुरी भर ही पिया
जीवन में वसंत था, एक फूल ही दिया
मिटने के दिन आज मुझको यह सोच है
कैसे बड़े युग में कैसा छोटा जीवन जिया !
------osho

२१. भक्ति ज्ञान मिश्रित को अंग ~ ४


॥ श्री दादूदयालवे नमः॥ 
*सवैया ग्रन्थ(सुन्दर विलास)* 
साभार ~ @महंत बजरंगदास शास्त्री जी, 
पूर्व प्राचार्य - श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व 
राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान) 
.
*२१. भक्ति ज्ञान मिश्रित को अंग* 
*देखहु रांम अदेख हु रांम हि,*
*लेख हु रांम अलेख हु रांमै ।*
*एक हु रांम अनेक हु रांम हि,*
*शेषहु रांम अशेष हु तांमै ॥*
*मौंन हू राम अमौंन हु रांम हि,*
*गौंन हु रामं हि भौंन हु ठांमै ।*
*बाहिर रांम हि भीतर रांम हि,*
*सुन्दर रांम हि है जग जामै ॥४॥*
दृश्य या अदृश्य विषय में, लक्ष्य या अलक्ष्य विषय में, 
एक या अनेक के विषय में शेष या अशेष में सर्वत्र राम ही विराजमान है । 
वह मौन हो या बोल रहा हो, चल रहा हो या बैठा हो, सर्वत्र राम को ही विद्यमान समझता है । 
*श्री सुन्दरदास जी* कहते हैं - इस समस्त जगत् में एकमात्र सर्वव्यापक प्रभु परमात्मा ही राम नाम से विराजमान है ॥४॥ 
(क्रमशः)
|| दादूराम सत्यराम ||
"श्री दादू चरितामृत(भाग-१)" लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान |
एक दिन बीठलव्यास ने प्रणाम करके दादूजी से पूछा भगवन् ! आप अन्य संतों के समान कंठी, माला तिलक क्यों नहीं रखते हैं ?
दादूजी ने कहा-
"दादू माला तिलक से कुछ नहीं, काहू सेती काम | 
अंतर मेरे एक है, अह निश उसका नाम |" 
अर्थ :- माला, तिलक और कंठी से परमात्मा की प्राप्ति रूप कार्य में कुछ भी लाभ नहीं है | तिलक और कंठी तो अपने - अपने संप्रदाय के चिन्ह मात्र है | यदि कंठी और तिलक से ही परमात्मा की प्राप्तिरूप कार्य होता हो, तब तो करोड़ों की संख्या में लोग रखते हैं | उन सबको परमात्मा का साक्षात्कार होना चाहिये ? उनके तो ईर्ष्या द्वेष आदि द्वंद्व भी दूर नहीं होते हैं | तब परमार्थ में उसका क्या लाभ है ? अर्थात् संप्रदाय के चिन्ह मात्र ही हैं | और माला भी जप की संख्या के लिए ही है | 
"दादू माला मन दिया, पवन सूत से पोय |
बिन हाथों निशि दिन जपैं, परम जाप यूं होय ||" 
अर्थ - हमारे गुरु वृद्ध भगवान् ने हम को मन रूप माला दी है, अर्थात् एकाग्र मन से प्रतिश्वास ब्रह्मचिन्तन करना रूप माला दी है | उस माला को बिना हाथों ही हम रात दिन जपते हैं | इस प्रकार हमारा अन्तः जप निरंतर होता ही रहता है | हमको अन्य माला की आवश्यकता नहीं होती है | उक्त प्रकार से मुझे कंठी, माला और तिलक की प्रभु की उपासना में आवश्यकता नहीं होने से मैं कंठी, माला, तिलक नहीं धारण करता हूँ | और सांसारिक प्राणी तो लकीर पीटने वाली बात चरितार्थ करते हैं | नामदेवादिकों के समान उपासना नहीं कर पाते हैं | 
"सांप गया सहणान को, सब मिल मारें लोक | 
दादू ऐसा देखिये, कुल का डोगरा फोक |" 
इससे सांसारिक लोकों का साधन डगर(मार्ग) निःस्सार छाछ के सामान है और संतों की साधना सार नवनीत के समान है | उक्त विचारों को श्रवण करके बीठलव्यास के मनको संतोष हुआ | उसका मुख मंडल प्रसन्न भासने लगा | उसने प्रणाम करके कहा - "आप सत्य ही कहते हैं, सर्वसाधारण से नामदेवादि के समान अंतः साधना नहीं हो पाती है | सांसारिक लोकों में बाहर का दिखावा ही अधिक देखा जाता है |" 
(क्रमशः)
॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥ 
http://youtu.be/N3e8mxa3UcQ
१४५. विरह । अड्डुताल ~
क्यों विसरै मेरा पीव पियारा, जीव की जीवन प्राण हमारा ॥ टेक ॥
क्यों कर जीवै मीन जल बिछुरै, तुम्ह बिन प्राण सनेही ।
चिन्तामणि जब कर तैं छूटै, तब दुख पावै देही ॥ १ ॥
माता बालक दूध न देवै, सो कैसे कर पीवै ।
निर्धन का धन अनत भुलाना, सो कैसे कर जीवै ॥ २ ॥
बरषहु राम सदा सुख अमृत, नीझर निर्मल धारा ।
प्रेम पियाला भर भर दीजे, दादू दास तुम्हारा ॥ ३ ॥
टीका ~ ब्रह्मऋषि सद्गुरुदेव इसमें विरह दिखा रहे हैं कि हे हमारे प्यारे पीव परमेश्‍वर ! आप मुझे क्यों भूल रहे हो ? आप तो हमारे जीव को जीवन और प्राणों से भी प्रिय हो । मछली जल से वियोग होने पर, कैसे जीवित रह सकती है ! हे प्राण स्नेही ? ऐसे हम आपके बिना कैसे जीवित रहें ? किसी के हाथ से चिन्तामणि रूप हीरा खो जाय, तब उसको भारी दुःख होता है और जब माता बच्चे को दूध न दे तो वह अपने आप कैसे पी सकता है ? जैसे निर्धन को अनायास धन प्राप्त हो जावे, और वह उस धन को अन्यत्र ऱख कर भूल जावे, तो फिर वह कैसे जीवित रह सकता है ? इसी प्रकार हम विरहीजन आपके बिना कैसे जीवित रह सकते हैं ? हे राम ! आप सदा ही सुख रूप हो । आपके दर्शनरूपी आनन्द की हमारे हृदय में बरसा करो । और फिर आपका अखंड - प्रेम, वृत्ति रूप प्याले में भर - भर कर हमको पिलाओ । हे प्रभु ! हम तो आप ही के विरहीजन दास हैं ।

फकीर रुपया धर धरे, नारनोल के मांहि । 
फौज गई कोउ ले गयो, शीश टेक मर जांहि ॥ १४५ ॥
दृष्टान्त ~ एक फकीर नारनोल की एक बगीची में रहता था । बगीची के बाहर जमीन में कुछ रुपये गाड़ दिये । एक समय सैनिक लोगों ने वहाँ आकर बगीची के आस - पास पड़ाव डाला और रोटी बनाने को जमीन खोदकर चूल्हा बनाया, उसी जगह । सैनिक को रुपये मिल गये । जब सेना वहाँ से रवाना हो गई, फकीर ने जाकर अपने रुपये देखे, तो वहाँ नहीं मिले । वहीं सिर टेक करके जान दे दी । यह माया ऐसे प्राण ले लेती है ।

एक कहत धोवत गई, एक सुनत बोराइ । 
सो कैसे धीरज धरै, जो धरी हाथ सौं जाइ ॥ १४५ ॥
दृष्टान्त ~ एक गरीब बनिये का लड़का था । नदी पर स्नान किया । हाथ धोने को मिट्टी खोदी । वहाँ एक धन का बर्तन निकल आया । लड़के ने खोलकर देखा तो अशर्फी भरी हैं । ईंट लेकर माँजने लगा कि इसको उज्जवल कर लूँ । कोई जानेगा कि पानी ले जा रहा है । फिर उस बर्तन के दोनों किनारे पकड़ कर गहरे पानी में जाकर गोता लगाया, बर्तन हाथ से छूट कर अथाह पानी में चला गया । वह पागल हो गया और “हाय ! धोवत गई”, इस प्रकार कहता हुआ घर आया । लोगों ने देखा, इसको कोई भूत - प्रेत लग गया । बाप ने पूछा ~ “क्या गई धोवत ?” उपरोक्त बात पिता को सुनाई । पिता सुनकर पागल हो गया । वह बोला ~ “हाय ! क्यों धोवे था । हाय ! क्यों धोवे था” । बेटा कहे, “धोवत गई ।” बाप कहे, “हाय ! क्यों धोवे था ? ऐसे ही कपड़े में लपेट कर धन के बर्तन को क्यों नहीं ले आया ?” यह माया इस प्रकार जीवों को पागल बना देती है ।

Why has my dearly Beloved forgotten me?
You are my very life breath.
Like a fish separated from water,
How can I survive without You, O my Lord?
When the wish-granting gem slips from his hand,
one cannot but suffer.
When the mother gives no milk,
how can the baby drink?
If a pauper’s money is lost somewhere,
how can he survive ?
Shower forth eternally, O God,
the pure torrential currents of blissful Nectar,
And give Dadu, Your slave, the cup
of Your love full to the brim.
(English translation from "Dadu~The Compassionate Mystic" 
by K. N. Upadhyaya~Radha Soami Satsang Beas)



गुरुवार, 26 फ़रवरी 2015

= १९० =

#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
सबही मृतक ह्वै रहे, जीवैं कौन उपाइ ।
दादू अमृत रामरस, को साधू सींचे आइ ॥
*(श्री दादूवाणी ~ साधु का अंग)*
https://youtu.be/rJ5_rndMlx8
===================
My Lord! I'm Yours and only yours (नाथ मैँ थारो जी थारो!!)
सत्संग और महात्माओं का प्रभाव -१२
.
गत ब्लॉग से आगे….. महात्माओं के पहचानने की एक साधारण युक्ति यह है की जैसे अग्नि के समीप जाने से जानेवाले पर अग्नि का कुछ-न-कुछ प्रभाव जरुर पड़ता है, वैसे ही महात्मा के समीप जाने से महात्मा का प्रभाव पड़ता है । जैसे सरकार के किसी सिपाही को देखने से सरकार की स्मृति होती है, वैसे ही भगवान् के भक्त के दर्शन से भगवान् की स्मृति होती है । जिसका सँग करने से अपने में दैवी सम्पदा के लक्षण आवे, जिसके सँग से, जिसके साथ वार्तालाप करने से, दर्शन से, स्पर्श से आत्मा का सुधार हो, अपने में भक्तों के लक्षण प्रगट होने लगे, गुणातीत पुरुषों के लक्षण आने लगे तो समझना चाहिये की यह महापुरुष है ।
.
जब हम महापुरुषों का सँग करने के लिए जाय तो हम यह समझे की हम ज्ञान के पुन्ज् के सम्मुख जा रहे है । जैसे सूर्य के सम्मुख जाने से अन्धकार तो दूर भाग ही जाता है, किन्तु अधिक-से-अधिक प्रकाश होता चला जाता है । हम देखते है की जब प्रात:काल सूर्य उदय होता है, तब ज्यों-ज्यों सूर्य नजदीक आता है त्यों-ही-त्यों सूर्य के प्रकाश का अधिक असर पड़ता है । वैसे ही हम जितने ही महात्माओं के समीप होते है, उतना ही हमको अधिक लाभ मिलता है । वे एक ज्ञान के पुंज है, उस ज्ञानपुंज से हमारे अज्ञानान्धकार का नाश होकर हमारे ह्रदय में भी ज्ञान-सूर्य का प्रागटय होता है ।....
.
- श्रद्धेयजयदयाल गोयन्दका सेठजी, 
साधन-कल्पतरु पुस्तक से, गीताप्रेस गोरखपुर

= १८९ =

#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
आड़ा दे दे राम को, दादू राखै मन ।
साखी दे सुस्थिर करै, सोई साधू जन ॥
सोई शूर जे मन गहै, निमख न चलने देइ ।
जब ही दादू पग भरै, तब ही पकड़ि लेइ ॥
https://youtu.be/wCVVmCx_mBQ
===================
साभार : पँ. शिवप्रसाद त्रिपाठी 'आचार्य'
मन वचन और काया से किसी को भी पीड़ा न देना ही यज्ञ है जो बिना कारण ही दिल जलाता है, वह आत्मघात कर रहा है सदा सर्वदा प्रसन्न रहना भी यज्ञ ही है ।
सत्कर्म के बिना चित्तशुद्धि नहीँ होती और चित्तशुद्धि के ज्ञान नहीँ टिकता । सत्कर्म से सभी इन्द्रियाँ शुद्ध होगी । जिसका मन कलुषित है, उसे परमात्मा का अनुभव नहीँ हो सकता ।
.
मानव शरीर एक गगरी है इसमेँ नौ छिद्र हैँ यदि गगरी छिद्र वाली है तो उसे कभी भरा नहीँ जा सकता । प्रत्येक छिद्र से ज्ञान बह जाता है । ज्ञान प्राप्त होना कठिन है ज्ञान आता तो है किन्तु वह रह नही पाता विकार वासना के वेग मे वह कई बार बह जाता है ।
वैसे तो सबकी आत्मा ज्ञानमय है, अतः अज्ञानी तो कोई नहीँ है किन्तु ज्ञान को सतत् बनाए रखने हेतु इन्द्रियोँ के द्वारा बही जाती हुई बुद्धि शक्ति को रोकना है ज्ञानी इन्द्रियोँ के विषय की ओर नहीँ जाने देता जबकि वैष्णव इन्द्रियोँ को प्रभु के मार्ग की ओर मोड़ता है ।
.
ज्ञान टिक नहीँ पाता, क्योँकि मनुष्य का जीवन विलासी हो गया है । सारा का सारा ज्ञान पुस्तक मेँ ही पड़ा रहता है, मस्तक मेँ जाता ही नहीँ । जो पुस्तकोँ के पीछे दौड़े वह विद्वान है और जो भक्तिपूर्वक परमात्मा के पीछे दौड़े वह सन्त है । विद्वान शास्त्र के पीछे दौड़ता है जबकि शास्त्र संत के पीछे दौड़ते हैँ । शास्त्र पढ़कर जो बोले वह विद्वान है, प्रभु को प्रसन्न करके उसी मेँ पागल होकर जो बोलता है वह सन्त है ।
.
गीता मेँ भगवान ने अर्जुन से कहा है > अर्जुन ! ज्ञान तो तुझी में है । हृदय मेँ सात्विक भाव जाग्रत हो, मन शुद्ध हो जाय तो हृदय मेँ ज्ञान अपने आप ही प्रकट होता है । ज्ञान का शत्रु है हिरण्याक्ष अर्थात् लोभ । ज्ञान को बुद्धि मेँ स्थिर रखना है तो हिरण्याक्ष रुपी लोभ को मारना होगा । अपने मन से पूछो कि मुझे जो सुख सम्पत्ति मिली है, उसके लिए मैँ पात्र भी हूँ या नहीँ ।
.
उत्तर नकारात्मक ही होगा । लोभ को संतोष से मारना चाहिए । ज्यादा पाने की इच्छा नही करना चाहिए । पाप इसलिए होता है कि मनुष्य मानता है कि प्रभू ने मुझे जो दिया है वह बहुत कम है । पाप नहीँ होगा तो इन्द्रियोँ की शुद्धि होगी और तभी इन्द्रियोँ मेँ ज्ञान-भक्ति टिक पायेगी । यज्ञादि सत्कर्म से चित्त शुद्धि होगी तभी ब्रह्मज्ञान बुद्धि मेँ टिक पायेगा !!!
स्वान्तः सुखाय ************
श्रीहरिशरणम ************

दादू जब प्राण पिछाणै आपको

#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
दादू जब प्राण पिछाणै आपको, आत्म सब भाई ।
सिरजनहारा सबनि का, तासौं ल्यौ लाई ॥
आत्मराम विचार कर, घट घट देव दयाल ।
दादू सब संतोंषिये, सब जीवों प्रतिपाल ॥

= १८६ =

#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
जैसे कुंजर काम वश, आप बंधाणा आइ ।
ऐसे दादू हम भये, क्यों कर निकस्या जाइ ॥
जैसे मर्कट जीभ रस, आप बंधाणा अंध ।
ऐसे दादू हम भये, क्यों कर छूटै फंध ॥
ज्यों सूवा सुख कारणै, बंध्या मूरख माँ हि ।
ऐसे दादू हम भये, क्यों ही निकसै नांहि ॥
मन ही सन्मुख नूर है, मन ही सन्मुख तेज ।
मन ही सन्मुख ज्योति है, मन ही सन्मुख सेज ॥
मन ही सौं मन थिर भया, मन ही सौं मन लाइ ।
मन ही सौं मन मिल रह्या, दादू अनत न जाइ
https://youtu.be/ojW7tCGymBY
=========================
@NP Pathak ~
साभार धन्यवाद सहित ......दीपक
बन्दर जैसे मन को अध्यात्मिक शक्ति से काबू करें....
====================
ध्यान की पहली सीढ़ी मौन है। मौन की शक्ति इंद्रियों के नियंत्रण में है। इंद्रियों का स्वामी है मन जो सहजता से काबू में नहीं आता। अपने वचन और कर्म पर बहुत कम लोग स्वयं नियंत्रण रखते हैं। उनकी देह का रथ “मन” सारथी के रूप में जहां चाहे खींच लेता है। देखा जाये तो योग सभी करते हैं पर जो मन के वश में हैं, वह असहज रहते हैं।
.
जिनका मन पर नियंत्रण है वह सहज योग की क्रिया में स्वतः ही रत रहते हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि इंसान सहज अथवा असहज योग की क्रिया से जुड़ा ही रहता है। योग साधना का अभ्यास करने वालों को यह पता है कि मन पर नियंत्रण किया जाये तो वह पर्वत के समान साथ होता है नहीं तो बंदर की तरह इधर उधर नाचता और नचाता है।
.
संत कबीरदास जी कहते हैं कि ~
कबीर मन परबत भया, अब मैं पाया जाना।
टांकी प्रेम की, निकसी कंचन की खान।
भावार्थ-मन तो पर्वत के समान है। उसमें प्रेम की टांकी लगाई जाये तो स्वर्णिम भंडार निकल आता है।
.
कबीर मन मरकट भया, नेक न कहूं ठहराय।
राम नाम बांधै, जित भावै तित जाय।।
भावार्थ-मन बंदर के समान इधर उधर भटकता है उसे अगर राम के नाम से बांध दिया जाये तो नियंत्रण में आ जाता है।
.
मन पर निंयत्रण ध्यान से ही संभव है। श्रीमद्भागवत गीता में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि एकांत तथा शुद्ध स्थान पर आसन लगाकर प्राणायाम के बाद भृकुटि पर ध्यान रखने की क्रिया करने के साथ ही ओम(ॐ) शब्द जपने वाला कालांतर में ज्ञानी बन जाता है। ज्ञानी का आशय सांसरिक विषयों से पलायन करने वाला नहीं होता वरन् उसमें निर्लिप्तता की सीमा रखने वाला ही यह उपाधि धारण करने योग्य है।
.
संसार के विषय मनुष्य को इतना व्यस्त रखते हैं कि उसे अध्यात्म का ज्ञान ही नहीं रहता। यह अलग बात है कि इन विषयों में प्रारंभिक रूप से प्राप्त अमृतमय रस बाद में विष का रूप धारण कर लेता है। इसका निवारण ध्यान से ही किया जा सकता है।
.
आमतौर से ध्यान को लेकर अनेक विधियां होने की बात कही जाती है पर श्रीमद्भागवत गीता के अनुसार भृकुटि पर ध्यान क्रेद्रित करने पर सहज अनुभूति होती है। इस तरह ध्यान से मन पर नियंत्रण के बाद यही संसार जो विषयों में आसक्ति से मिले रस के अमृतमय लगने के बाद जब उसके विष के रूप में परिवर्तित होता है तब मुक्ति दिलाता है।

२१. भक्ति ज्ञान मिश्रित को अंग ~ ३


॥ श्री दादूदयालवे नमः॥ 
*सवैया ग्रन्थ(सुन्दर विलास)* 
साभार ~ @महंत बजरंगदास शास्त्री जी, 
पूर्व प्राचार्य - श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व 
राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान) 
.
*२१. भक्ति ज्ञान मिश्रित को अंग* 
*भूमि हु रांम हि आपहु रांम हि,* 
*तेज हु रांम हि वायु हु रांमै ।* 
*व्योम हु रांम हि चंदहु रांम हि,* 
*सूरहु रांम हि शीत न घांमै ॥* 
*आदिहु रांमहि अंतुह रांमहि,* 
*मध्य हु रांमहि पुंस न बांमै ।* 
*आज हु रांमहि कालहु रांमहि,* 
*सुन्दर रांमहि म्हां महिं थांमै ॥३॥* 
*श्री सुन्दरदास जी* कहते हैं - उस साधक के लिये भूमि, जल, तेज, वायु एवं आकाश; चन्द्रमा, सूर्य, सर्दी, गर्मी आदि अन्त मध्य बाँयें, या स्त्री पुरुष, आज कल आदि में सर्वदा सर्वत्र श्री सुन्दरदास जी के मतानुसार यहाँ तक कि हम सब में राम ही विराजमान हैं ॥३॥ 
(क्रमशः)
#daduji 
|| दादूराम सत्यराम ||
"श्री दादू चरितामृत(भाग-१)" लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान |

= बीठलव्यास और दादूजी में विचार गोष्टी = 
एक दिन बीठलव्यास ने दादूजी से प्रश्न किया - आप मूर्ति पूजा क्यों नहीं करते है ? दादूजी ने कहा - मैं मानस पूजा रूप अन्तः साधना करता हूँ | अन्तः साधना करने वाले को मूर्ती पूजा की आवश्यकता नहीं रहती है | मेरा मन अन्तः साधना में ही लगता है, आत्मस्वरूप राम की पूजा मैं निरंतर करता रहता हूँ -
"पूजन हारे पास है, देही माँहीं देव | 
दादू ताको छोड़ कर, बाहर मांडी सेव ||" 
अर्थ - पूजने वाले के पास देह में ही देही(आत्मस्वरूप राम) देव विद्यमान हैं, उसका ज्ञान नहीं होने से ही बाहर मूर्ति की सेवा रूप साधना करनी पड़ती है | मूर्ति पूजा तब तक ही की जाती है, जब तक मूर्ति वाले भगवान् का यथार्थ ज्ञान नहीं होता है | बीठलव्यास बोले - भगवन् ! नामदेव आदि उच्चकोटि के संतों ने भी तो मूर्ती पूजा की थी ? दादूजी ने कहा - उनहोंने भेद दृष्टि को त्याग कर तथा प्रभु को सर्व रूप मानकरके ही मूर्ति पूजा की थी और रात दिन निरंतर नाम चिन्तन करते थे, तभी तो नामदेव के हाथ से प्रभु ने दूध पान किया था | नामदेव ने श्वान, अग्नि और भूत को भगवान् रूप ही समझा था | उनके समान सभी मूर्ति पूजक नहीं होते हैं, वे तो अन्तः पूजा ही करते थे | अन्य सांसारिक प्राणी ऊपर देखावे मात्र करते हैं -
"ऊपर आलम सब करें, साधु जन घट मांहिं | 
दादू एता अन्तरा, तातैं बनती नांहिं ||" 
जो ऊपर से ही करते हैं, उनसे अन्तः साधना नहीं बनती है | नामदेवादि संत प्रायः आन्तर साधना ही करते थे | इससे अन्तर साधना करने वाले और बाह्य साधना करने वाले समान नहीं होते | बाह्य साधना करने वालों को भी अंत में अन्तः साधना करनी ही पड़ती है | इससे मैं अन्तः साधना ही निरंतर करता रहता हूँ | उक्त उपदेश सुनने से व्यास को संतोष हुआ | और उसे शास्त्रीय सिद्धांत स्मरण आ गया - "बालानाँ प्रतिमा पूजा |" अर्थात् परमेश्वर का स्वरूप नहीं जानते, उन अज्ञात तत्व बालकों के लिये ही मूर्ति-पूजा है | आत्मस्वरूप राम का ज्ञान हो जाने के पश्चात् मूर्ति न पूज कर मूर्तिवाले की ही पूजा की जाती है | अतः संत प्रवर दादूजी का कथन शास्त्र संमत तथा निजी अनुभव से पूर्ण ही है | 
(क्रमशः)
#daduji
॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥
१४४. झपताल ~
मना, जप राम नाम कहिये ।
राम नाम मन विश्राम, संगी सो गहिये ॥ टेक ॥
जाग जाग सोवे कहा, काल कंध तेरे ।
बारम्बार कर पुकार, आवत दिन नेरे ॥ १ ॥
सोवत सोवत जन्म बीते, अजहूँ न जीव जागे ।
राम सँभार नींद निवार, जन्म जुरा लागे ॥ २ ॥
आस पास भरम बँध्यो, नारी गृह मेरा ।
अंत काल छाड़ चल्यो, कोई नहिं तेरा ॥ ३ ॥
तज काम क्रोध मोह माया, राम राम करणा ।
जब लग जीव प्राण पिंड, दादू गहि शरणा ॥ ४ ॥
टीका ~ ब्रह्मऋषि सतगुरु मन के प्रति उपदेश करते हैं कि हे मन ! अब राम - नाम का जाप कर और यह राम नाम का स्मरण तेरे विश्राम का स्थान है । इसके द्वारा जो राम आत्म - स्वरूप है, उसे ग्रहण कर । हे मन ! अब मोह रूप निद्रा में क्या सोता है ? जाग ! तेरे शरीर के कंधे पर काल बाजा बजा रहा है । सतगुरु और संतजन अपने उपदेशों द्वारा पुकार - पुकार कर कह रहे हैं कि तेरे अन्त समय का दिन नजदीक आ रहा है । अज्ञान रूप निद्रा में सोते - सोते तेरे अनेकों जन्म बीत गये, परन्तु अभी तक भी, हे मन रूप अज्ञानी जीव ! तूँ नहीं जाग रहा है । अब जागकर राम - नाम के स्मरण द्वारा, मोह रूप निद्रा को दूर कर । इस मनुष्य - जन्म में शरीर की जर्जर अवस्था, कहिये बुढ़ापा आ पहुँचा है । परन्तु अब भी तूँ, आशा रूपी फांसियों से जकड़ा हुआ है कि मेरी स्त्री है, मेरा घर - बार है, मेरे बेटे - पोते हैं, ऐसे करता - करता ही, तूँ अन्तकाल में सबको छोड़कर चला जाएगा । इनमें कोई भी तेरा साथ देने वाला नहीं है । इसलिये अब तूँ काम, क्रोध, मोह, माया को त्यागकर राम - नाम का स्मरण कर । जब तक हे जीव ! तेरे प्राण - पिंड का वियोग नहीं होता, तब तक राम - नाम की शरण ग्रहण करके रह । इसी में तेरा कल्याण है ।
सांई स्वर्ग पधारिया, कुछ सानों भी अक्ख । 
खीर सपासप मारिया, कुछ पींडी भी चक्ख ॥ १४४ ॥
दृष्टान्त ~ एक गृहस्थी था । उसकी स्त्री बदचलन थी, परन्तु वह उसको कहा क रती कि मैं तुम्हारे बिना इस घर में अकेली कैसे रहूँ ? मुझे तो कुछ खाना - पीना, सोना - जागना, पहरना - ओढ़ना, अच्छा ही नहीं लगता । जिस रोज यह विदेश जाने लगा, तब बोला ~ आज खीर और चूरमा बना लो । जब बन गया, तब उसने सोचा, जरा इसकी परीक्षा तो कर लूँ । पलंग पर लेट गया और फिर अपने श्‍वास को चढ़ा लिया । स्त्री आकर पति को जगाने लगी, तो देखा यह तो मर गया । तब सोचा कि पहले खीर तो खा लूँ, फिर रोऊँगी, नहीं तो बहुत लोग घर में आ जायेंगे, फिर खीर कैसे खाऊँगी । उसने थाली में खीर ठंडी करके खूब डट कर चढ़ा ली और बर्तन वगैरा सब माँज धोकर रख दिये । खीर और चूरमा की पिंडी को दबा कर रख दी, फिर बैठ कर रोने लगी । आस - पास के लोग इकट्ठे हो गये तो स्त्री बड़दावे दे - देकर रोने लगी ।
सांई स्वर्ग पधारिया, कुछ सानों भी अक्ख ।
हे स्वामी ! तुम तो स्वर्ग में चले गये, परन्तु कुछ मुझे भी तो कह जाते । तब वह पलंग पर सूता ही बोला - खीर सपासप मारिया, कुछ पींडी भी चक्ख । यह कहकर वह बैठा हो गया । सब लोग चकित हो गये । उस स्त्री को जैसी पतिव्रता थी, वैसी उसने जान ली और फिर उसको तलाक दे दिया । वह पुरुष सत्संगी था ।

*= बीठलव्यास और दादूजी में विचार गोष्टी =*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
https://www.facebook.com/DADUVANI
*#श्रीदादूचरितामृत*, *"श्री दादू चरितामृत(भाग-१)"
लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज,
पुष्कर, राजस्थान ।*
.
*~ पंचम बिन्दु ~*
*= बीठलव्यास और दादूजी में विचार गोष्टी =*
.
एक दिन बीठलव्यास ने दादूजी से प्रश्न किया - आप मूर्ति पूजा क्यों नहीं करते हैं ? दादूजी ने कहा - मैं मानस पूजा रूप अन्तः साधना करता हूँ । अन्तः साधना करने वाले को मूर्ती पूजा की आवश्यकता नहीं रहती है । मेरा मन अन्तः साधना में ही लगता है, आत्मस्वरूप राम की पूजा मैं निरंतर करता रहता हूँ -
"पूजन हारे पास है, देही माँहीं देव ।
दादू ताको छोड़ कर, बाहर मांडी सेव ॥"
अर्थ - पूजने वाले के पास देह में ही देही(आत्मस्वरूप राम) देव विद्यमान हैं, उसका ज्ञान नहीं होने से ही बाहर मूर्ति की सेवा रूप साधना करनी पड़ती है । मूर्ति पूजा तब तक ही की जाती है, जब तक मूर्ति वाले भगवान् का यथार्थ ज्ञान नहीं होता है ।
.
बीठलव्यास बोले - भगवन् ! नामदेव आदि उच्चकोटि के संतों ने भी तो मूर्ती पूजा की थी ? दादूजी ने कहा - उनहोंने भेद दृष्टि को त्याग कर तथा प्रभु को सर्व रूप मानकरके ही मूर्ति पूजा की थी और रात दिन निरंतर नाम चिन्तन करते थे, तभी तो नामदेव के हाथ से प्रभु ने दूध पान किया था । नामदेव ने श्वान, अग्नि और भूत को भगवान् रूप ही समझा था । उनके समान सभी मूर्ति पूजक नहीं होते हैं, वे तो अन्तः पूजा ही करते थे ।
.
अन्य सांसारिक प्राणी ऊपर देखावे मात्र करते हैं -
"ऊपर आलम सब करें, साधु जन घट मांहिं ।
दादू एता अन्तरा, तातैं बनती नांहिं ॥"
https://youtu.be/32n6FUn9lTs
जो ऊपर से ही करते हैं, उनसे अन्तः साधना नहीं बनती है । नामदेवादि संत प्रायः आन्तर साधना ही करते थे । इससे अन्तर साधना करने वाले और बाह्य साधना करने वाले समान नहीं होते । बाह्य साधना करने वालों को भी अंत में अन्तः साधना करनी ही पड़ती है । इससे मैं अन्तः साधना ही निरंतर करता रहता हूँ ।
उक्त उपदेश सुनने से व्यास को संतोष हुआ । और उसे शास्त्रीय सिद्धांत स्मरण आ गया - "बालानाँ प्रतिमा पूजा ।" अर्थात् परमेश्वर का स्वरूप नहीं जानते, उन अज्ञात तत्व बालकों के लिये ही मूर्ति - पूजा है । आत्मस्वरूप राम का ज्ञान हो जाने के पश्चात् मूर्ति न पूज कर मूर्तिवाले की ही पूजा की जाती है । अतः संत प्रवर दादूजी का कथन शास्त्र संमत तथा निजी अनुभव से पूर्ण ही है ।
(क्रमशः)

बुधवार, 25 फ़रवरी 2015

= १८७ =

#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
दादू नीका नांव है, तीन लोक तत सार ।
रात दिवस रटबो करो, रे मन इहै विचार ॥
दादू नीका नांव है, हरि हिरदै न बिसारि ।
मूरति मन मांहैं बसै, सांसैं सांस संभारि ॥
सांसैं सांस संभालतां, इक दिन मिलि है आइ ।
सुमिरण पैंडा सहज का, सतगुरु दिया बताइ ॥
*(श्री दादूवाणी ~ स्मरण का अंग)*
======================
करत-करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान ॥हरी ॐ॥
आज की तेज रफ्तार जिंदगी में हर कोई सबसे आगे जाना चाहता है। ये कहना अतिश्योक्ति न होगी कि हर कोई जीतना चाहता है। जीत का जज़बा किसी भी देश के विकास का सुचक है। परन्तु इस बात पर गौर करना ज्यादा जरूरी है कि हमने सफलता की रेस में आगे बढने के लिए ईमानदारी से कितनी कोशिश की।
.
जिंदगी की प्रत्येक रेस में कभी किसी को जय मिलती है तो कभी किसी को पराजय का सामना करना पड़ता है। लेकिन यदि हम अपना दिमाग खुला रखें तो हर अनुभव हमें समृद्ध बनाता है। सही अभ्यास के साथ जब भी हम अपनी बंधी-बंधाई योग्यता से ऊपर उठकर कुछ करने की कोशिश करते हैं तो ज्ञान और हौसला दोनो ही बढता है।
.
बचपन में हम सभी को कई नैतिक तथा मनोबल बढाने वाली कहानियां सुनाई जाती थी, जो आज भी शुरुवाती कक्षाओं में पढाई जाती हैं। बचपन में शायद उन कहानियों का आशय समझ में न आता हो किन्तु समय के साथ जिसने भी उन कहानियों का गूढ अर्थ समझ लिया उसने सफलता की इबारत लिख दी है। ऐसी ही एक कहानी थी खरगोश और कछुए की जिसे लगभग हम सभी ने पढी होगी।
.
जिसमें, एक जंगल में खरगोश और कछुए के बीच एक प्रतियोगिता का आयोजन रखा गया था कि, लक्ष्य तक कौन तेज दौङकर पहुँचेगा। जाहिर सी बात है दोनो की चाल में जमीन आसमान का अंतर था। मुकाबला एकतरफा ही नजर आ रहा था फिर भी कछुए ने चुनौती स्वीकार कर ली। रेस शुरु हुई खरगोश अपनी तेजरफ्तार से काफी आगे निकल गया। कछुआ धीरे-धीरे चल रहा था किन्तु निरंतर चल रहा था।
.
जबकि अति आत्मविश्वासी खरगोश ने सोचा कि मैं तो बहुत आगे आ गया हुँ तो थोड़ा आराम कर लेता हुँ। पेड़ के नीचे लेटते ही उसे गहरी नींद लग गई। वहीं कछुआ धीमी गति से बिना किसी विश्राम के निरंतर चलते हुए लक्ष्य तक पहुँच गया। असंभव संभव में परिणित हो गया। खरगोश की तेज चाल भी निरंतर और सतत अभ्यास से हार गई थी। खरगोश की हार से ये भी सबक मिलता है कि जब तक लक्ष्य हासिल न हो जाये आराम या आलस के वशीभूत नही होना चाहिए।
.
खरगोश और कछुआ तो प्रतीक मात्र हैं। यदि हम अपने आसपास नजर दौड़ाएं तो हम लोगों की कार्यपद्धति भी इन्ही दो श्रेणियों में बंटी है। कोई निरंतर अभ्यास से अपनी कार्यकुशलता को निखारता है और लक्ष्य के लिए जुनून की हद तक कोशिश करता है, तो कोई अतिआत्मविश्वास की वजह से, सक्षम होते हुए भी लक्ष्य तक नही पहुँच पाता है।
.
क्षेत्र कोई भी हो, नई-नई चीजों को सीखना, नई परिस्थितीयों में खुद को ढालना सफलता का प्रमुख सबक है। अभ्यास के दौरान कभी-कभी नकारत्मक भाव आना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है किन्तु उसे स्वंय पर हावी होने देना सफलता की सबसे बड़ी बाधा है। आशावादी दृष्टीकोंण को सदैव अपनी सांसो की रफ्तार के साथ रखना चाहिए।
.
प्रेमचन्द ने कहा था कि, “चित्त से दृण हो जाने वाला व्यक्ति चूने के र्फश के समान हो जाता है, जिसको बाधाओं के थपेड़े और भी मजबूत कर देते हैं।”
अभ्यास एक ऐसा गुण है जो उपलब्धियों एवं सफलताओं का रास्ता प्रशस्त करता है। जीवन में नित नई बातों को सीखना तथा उसका अभ्यास करते रहना जीवन की सतत प्रक्रिया है। कोई भी व्यक्ति सर्वगुण सम्पन्न नही होता और न ही ज्ञान का भंडार लेकर पैदा होता है। हर कोई निरंतर अभ्यास से अपनी कार्यकुशलता और ज्ञान को बढाने का प्रयास करता है।
.
इसीलिए तो कहा गया है कि,
करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान,
रसरी आवत जात, सिल पर करत निशान।
अर्थात जब रस्सी को बार-बार पत्थर पर रगड़ने से पत्थर पर निशान पड़ सकता है तो, निरंतर अभ्यास से मूर्ख व्यक्ति भी बुद्धिमान बन सकता है।
निरंतर प्रयत्नशीलता और आलस्य का त्याग सफलता की कुंजी है। चारों तरफ फैले ज्ञान के खजाने को स्वयं में समेटने के लिए कुछ नया जानने की इच्छा और अभ्यास की प्रक्रिया को कभी थमने नही देना चाहिए।
.
अपनी योग्यता पर विश्वास भी करना चाहिए किन्तु अतिविश्वास से भी दूर रहना चाहिए वरना खरगोश जैसी स्थिती बनते देर नही लगती। निरंतर प्रयत्न से अभ्यास का सकारात्म फल मिलता है और कछुए की तरह कच्छप अवतार धारण कर सम्पूर्ण विश्व का भार उठाकर विश्व विजयी बन सकते हैं। जो ताउम्र सीखते हैं वही बुलंदियों पर पहुँचते हैं और “प्रैक्टिस मेक्स परफेक्ट” जैसी कहावतों को चरितार्थ करते हैं।
॥वन्दे मातरम् ॥

= १८६ =

#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
दादू दूजा कुछ नहीं, एक सत्य कर जान ।
दादू दूजा क्या करै, जिन एक लिया पहचान ॥
तुम हरि हिरदै हेत सौं, प्रगटहु परमानन्द ।
दादू देखै नैन भर, तब केता होइ आनन्द ॥
======================
साभार : GyanSarovar ज्ञानसरोवर

**ईश्वर से प्रेम !**
एक संत ने एक रात स्वप्न देखा कि उनके पास एक देवदूत आया है। देवदूत के हाथमें एक सूची है ।
उसने कहा, 'यह उन व्यक्तियों की सूची है, जो प्रभुसे प्रेम करते हैं ।’
संतने कहा, ‘मैं भी प्रभु से प्रेम करता हूं । मेरा नाम तो इसमें अवश्य होगा ।’
देवदूत बोला, ‘नहीं, इसमें आपका नाम नहीं है ।”
.
संत ने निराश होकर पूछा, ‘इसमें मेरा नाम क्यों नहीं है ? मैं ईश्वर से ही प्रेम नहीं करता अपितु ईश्वर की बनाई प्रत्येक जड-चेतन वस्तु से भी प्रेम करता हूं । मैं अपना अधिकांश समय धर्म की सेवा में लगाता हूं ।' उसके पश्चात् जो समय बचता है उसमें प्रभु का स्मरण करता हूं’ तभी संत की नींद खुल गई ।
.
दिन में वह स्वप्न का स्मरण कर निराश हो रहे थे । एक शिष्य ने उदासीनता का कारण पूछा तो संत ने स्वप्न की बात बताई और कहा, “वत्स, लगता है, मेरी सेवा में कहीं कोई चूक रह गई है ।” दूसरे दिन संत ने पुनः वही स्वप्न देखा । वही देवदूत पुनः उनके सम्मुख खडा था । इस बार भी उसके हाथ में कागज था । संत ने रुक्षभाव से(रूखेपन से) कहा, “अब क्यों आए हो मेरे पास ? मुझे प्रभु से कुछ नहीं चाहिए ।”
.
देवदूत ने कहा, ‘आपको प्रभु से कुछ नहीं चाहिए, किन्तु प्रभु का तो आप पर विश्वास है । इस समय मेरे हाथ में दूसरी सूची है ।' संत ने कहा, ‘तुम उनके पास जाओ जिनके नाम इस सूची में हैं । मेरे पास क्यों आए हो ?’
.
देवदूत बोला, ‘इस सूची में आपका नाम सबसे ऊपर है । यह सुन कर संत को आश्चर्य हुआ !!! बोले, “क्या यह भी ईश्वर से प्रेम करने वालों की सूची है ।” देवदूत ने कहा, “नहीं, यह वह सूची है जिन्हें प्रभु प्रेम करते हैं ।” ईश्वर से प्रेम करने वाले तो अनेक हैं; परन्तु प्रभु उसको प्रेम करते हैं जो धर्म से, नीति से, मनुष्यों से और आपकी भांति ईश्वर की बनाई प्रत्येक वस्तुसे प्रेम करते हैं । प्रभु उसको प्रेम नहीं करते जो दिन रात कुछ पाने के लिए प्रभु का गुणगान करते हैं।"
.
ईश्वर से हमारा प्रेम निरपेक्ष होना चाहिए । ईश्वर की भक्ति “ईश्वर से पाने हेतु” नहीं अपितु “ईश्वर को पाने” हेतु होनी चाहिए, यही इस प्रसंग का सार है !

= १८५ =

#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
मुये मड़े सौं हेत क्या, जे जीव की जाणै नांहि ।
हेत हरि सौं कीजिये, जे अन्तरजामी मांहि ॥
=====================
साभार : @बिष्णु देव चंद्रवंशी ~
--||●||●|| सुख का साधन ||●||●||--

जिसका वियोग निश्चित है, उसे सुख का साधन बनाना भारी भूल है । संसार में प्रेम बढ़ाओगे तो जन्म - जन्मान्तर तक रोना पड़ेगा सब का यहाँ नदी - नाव की तरह संयोग है। जहाँ हो, जिस परिस्थिति में हो, वहीं चातुरी से काम लो। सब का प्रोग्राम अपना अलग - अलग बना है। छान - बीन करोगे तो कोई किसी का साथी नहीं मिलेगा, केवल हमारा तो यही कहना है कि ठगो मत, चाहे ठगा जाओ। अपने धर्म - कर्म का भरोसा रखो।
.
चालाकी और बेईमानी का भरोसा मत रखो। संसार में ऐसे रहो जैसे कि यहाँ का काम भी चलता जाय और परलोक का मार्ग भी उज्वल बनता जाय। यह तभी होगा जब अपने - अपने धर्म का पालन करते हुए भगवान का स्मरण करते चलोगे। ऐसा करोगे तभी जन्म - मरण के बंधन् से मुक्त होकर इस मलमूत्र के शरीर से छुटकारा मिलेगा। नहीं तो बार - बार इसी में लौट - लौट कर आना पड़ेगा। संसार के सब पदार्थों का वियोग होता है।
.
एक वैश्य ने नारद जी को पृथ्वी का भ्रमण करते देखा तो पूछा - महाराज, कहाँ से आ रहे हो ?
नारद जी ने कहा - स्वर्ग से।
वैश्य ने पूछा - महाराज, अब यहाँ पधारोगे ?
नारद जी ने कहा - थोड़ा मृत्युलोक में घूम कर फिर स्वर्ग लौट जायेंगे।
वैश्य ने प्रार्थना की - महाराज, लौटते समय हमें भी स्वर्ग लेते चलें तो बड़ी कृपा होगी।
नारद ने कहा - अच्छा ले, चलेंगे।
.
कुछ् दिनों के पश्चात् नारद जी घूम - फिर कर लौटे तो पूछा - सेठजी, स्वर्ग चलोगे ?
सेठजी ने कहा - महाराज, चलना तो अवश्य है पर अभी ये लड़के बहुत छोटे नासमझ हैं। ये लोग गृहस्थी का काम संभाल नहीं सकेंगे। थोड़े दिन में ये काम - काज सँभालने योग्य हो जायँ तब चलेंगे।
नारद जी चले गये। थोड़े दिन में वे फिर लौटे। पूछा - सेठजी अब चलोगे ?
.
सेठजी ने कहा - हाँ महाराज, अब तो लड़का बड़ा हो गया है, काम - काज भी कुछ देखने - सुनने लगा है, परन्तु यह अभी अपनी पूरी जिम्मेदारी नहीं समझता। अगले वर्ष इसका विवाह कर दें फिर निश्चिन्त हो जायँ तब चलेंगे। चार वर्ष बाद नारद जी। फिर लौटे तो दुकान पर लड़के से पूछा कि सेठ जी कहाँ हैं ? लड़के ने कहा - महाराज, क्या बतायें। एक ही तो हमारे घर में पिता जी सब सँभाले हुए थे, उनका शरीर छूट गया, तब से हम तो बड़ी परेशानी में हैं।
.
नारद जी ने ध्यान लगा कर देखा तो मालूम हुआ कि सेठजी मर कर बैल हुए हैं। नारद जी बैल के पास गये और कहा कि सेठ जी अब तो मनुष्य शरीर भी छूट गया, अब स्वर्ग चलोगे न ?
बैल ने कहा - महाराज ! आपकी बड़ी कृपा है। मैं भी चलने को तैयार हूँ, पर सोचता हूँ कि घर के और बैल इतने सुस्त हैं कि आगे मैं न चलूँ तो कुछ काम ही न हो। कुछ नये बैल आने वाले हैं तब तक मैं इनका काम संभाल दूं, फिर आप कृपा करना मैं अवश्य चलूँगा।
.
नारद जी फिर दो - चार वर्ष बाद लौटे। उन्हें तो अपना वचन पूरा करना था और वैश्य का एक गिलास दूध चुकाना था इसीलिये बार - बार उसके पास आते थे। इस बार आये तो बैल नहीं दिखा। लड़कों से पूछा कि तुम्हारे यहाँ जो बूढ़ा बैल था वह कहाँ गया ? लड़कों ने दुःखी होकर कहा कि महाराज ! बड़ा मेहनती बैल था। सब से आगे चलता था। जब से मर गया है तब से वैसा दूसरा बैल नहीं मिला।
.
नारद जी ने ध्यान करके देखा तों मालूम हुआ कि इस बार सेठ जी कुत्ता होकर घर के आगे पहरा दे रहे हैं। कुत्ते के पास जाकर नारद जी ने कहा - कहो सेठ जी ! क्या समाचार है ? तीन जन्म तों हो गया, अब स्वर्ग चलने के सम्बन्ध में क्या विचार है ? कुत्ते ने कहा - महाराज ! आप बड़े दयालु हैं। एक ओर मैं आपकी दयालुता देखता हूँ और दूसरी ओर लड़कों का आलस्य और बदइन्तजामी। महाराज ! ये इतने आलसी हो गये हैं हि मैं दरवाजे पर न रहूँ तो दिन में ही लोग इन्हें लूट ले जाँय।
.
इसलिये सोचता हुँ कि जब तक हूँ, तब तक इनकी रक्षा रहे तो अच्छा। थोड़े दिन में जरूर चलूँगा। नारद जी फिर लौट गये। चार - छै वर्ष में फिर आये तो कुत्ता दर्वाजे पर नहीं दिखा। लड़कों से पूछा तो पता चला कि वह मर गया है। ध्यान लगाकर देखा तो मालूम हुआ कि इस बार सर्प होकर उसी घर के तलघर में कोष की रक्षा करते हुए बैठे हैं।
नारद जी वहाँ पहुँचे। कहा - कहिये सेठ जी ! यहाँ आप कैसे बैठे हैं ? स्वर्ग चलने का समय अभी आया कि नहीं ?
.
सर्प ने कहा - महाराज ! ये लड़के इतने फिजूलखर्ची हों गये हैं कि मैं न होता तो अब तक खजाना खाली कर देते। सोचता हूँ कि मेरी गाढ़ी कमाई का पैसा है, जितने दिन रक्षित रह जाय उतना ही अच्छा है। इसीलिये यहाँ मेरी आवश्यकता है, नहीं तो मैं तो चलने को तैयार ही हूँ। नारद जी फिर निराश होकर लौटे। बाहर आकर उन्होंने बड़े लड़के को बुलाकर कहा कि तुम्हारे खजाने में एक भयंकर कालरूप सर्प बैठा हुआ है। महात्मा का आदेश पाकर लड़कों ने वैसा ही किया। सारे शरीर में लाठियों की मार लगाकर उसको लस्त कर दिया और घर के बाहर फेंक आये।
.
वहाँ जाकर नारद जी उससे मिले और कहा - कहिये सेठ जी ! लड़कों ने तो खूब पुटपुटी लगाई अभी आपका मन भरा या नहीं ? फिर वापिस जाकर घर की रक्षा करोगे या अब चलोगे स्वर्ग ? सर्प ने कहा - हाँ महाराज ! अब चलेंगे।
तात्पर्य यह है कि गृह में, पुत्र में, धन में, स्त्री आदि में प्रेम हो जाने पर कई जन्म तक वह प्रेम - बन्धन शिथिल नहीं होता और कई जन्मों तक उसी के कारण अनेक यातनायें सहनी पड़ती हैं। इसीलिये कहा जाता है कि संसार में प्रेम मत फँसाओ। यहाँ प्रेम करोगे तो कई जन्म तक रोना पड़ेगा।
_______श्री कृष्ण हरी !!