गुरुवार, 28 फ़रवरी 2019

= सुन्दर पदावली(१६.राग सोरठ - ९/१) =

#daduji

॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥ 
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली* 
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी, 
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान) 
*= १६. राग सोरठ =*
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(९/१) 
*मोहि, सतगुरु कहि संमुझाया हो ।* 
*परम पुरुष बिन और न परसौं,*
*पीव निरंजन राया हो ॥टेक॥* 
*सब ऊपरि सोई मेरा स्वांमी,*
*उस परि कोई न बताया हो ।* 
*मनसा बाचा और कर्मना,*
*वाही सौं मन लाया हो ॥१॥* 
*घट धारी सौं प्रीति न मेरी,*
*जौ अवतार कहाया हो ।* 
*वै हम भइया बंध आप मैं,*
*एकहि जननी जाया हो ॥२॥* 
मुझे मेरे गुरुदेव ने समझा दिया है कि उन परम पुरुष परमात्मा के अतिरिक्त किसी अन्य से मेल जोल नहीं बढ़ाना है; क्योंकि वे ही सर्वोपरि देवता हैं ॥टेक॥ 
वे ही मेरे सर्वोपरि स्वामी हैं । उन से बढ़कर कोई नहीं है । अतः मैंने मनसा वाचा कर्मणा उसी को अपना रक्षक मान लिया है ॥१॥ 
मेरा किसी शरीरधारी(आकार) देवता से प्रेम नहीं है, जिसे लोक में ‘अवतार’ कहते हैं, वे तो हमारे परस्पर भाई बन्धु हैं; क्योंकि हम दोनों किसी एक ही शरीरधारी माता से पैदा हुए हैं ॥२॥
(क्रमशः)

= १५८ =


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🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*काल गिरासे जीव को, पल पल श्वासैं श्वास ।*
*पग पग मांहि दिन घड़ी, दादू लखै न तास ॥*
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साभार ~ Rini Bhatnagar 

Osho ~~💝 पंडित कोरे के कोरे रह जाते हैं--गीता कंठस्थ हो जाती है, गीत सुनाई नहीं पड़ता; शब्दों से मस्तिष्क भर जाता है, हृदय भीगता नहीं; दोहरा सकते हैं गीता को, आंख में एक आंसू नहीं उतरता; प्राण में कोई स्वर नहीं बजता; पैर में कोई थिरक नहीं आती; पत्थर की तरह, मुर्दे की भांति, यंत्र की भांति दोहरा देते हैं; भीतर सब अछूता ही रह जाता है; रेखा भी नहीं पड़ती, छाया भी नहीं पड़ती।
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इसलिए शंकर कहते हैं: 'जिसने किंचित भी गीता पढ़ी है...'
इस गीता से कोई श्रीमद् भगवद्गीता का संबंध नहीं है। क्योंकि जिसने किंचित भी कुरान पढ़ा है, वह भी पहुंच जाएगा; जिसने किंचित भी बाइबिल पढ़ी है, वह भी पहुंच जाएगा। और जिसने न बाइबिल पढ़ी है, न कुरान पढ़ा है, न गीता पढ़ी है--किंचित भी जीवन पढ़ा है, वह भी पहुंच जाएगा। जोर है इस बात पर कि जिसने थोड़ी अपनी समझ जगाई है, जिसने जाग कर देखा है; जो सोया-सोया नहीं जीया; जिसने आंखें खोलीं और जीवन को पहचाना है--जरा सा भी।
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जरा सा छोर हाथ में आ जाए, फिर सारा स्वर्ग हाथ में है। एक किरण को भी तुम पकड़ लो, पूरा सूरज तुम्हारे हाथ में है। उसी किरण के सहारे अगर तुम चल पड़ो, तो सूरज कहां जाएगा? तुम अंधेरे घर में बैठे हो, खपड़ों के छेद से जरा सी एक किरण उतर रही है। उस किरण में पूरा सूरज छिपा है। तुम उसके सहारे ही चल पड़ो, तुम सूरज तक पहुंच जाओगे। पूरे सूरज को घर में उतारने की जरूरत भी नहीं है। उतने ज्यादा का करोगे क्या? अपच हो जाएगा।
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तो ध्यान रखना, कहीं ऐसा न हो कि तुम शास्त्र को इकट्ठा करने में लग जाओ। अन्यथा शास्त्र तुम्हारा कारागृह बन जाएगा। उससे तुम्हारे पंख उन्मुक्त न होंगे; न तुम्हारे प्राण नाचेंगे; न तुम स्वाभाविक हो सकोगे।
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शास्त्र के कारण जितने लोग अस्वाभाविक हो जाते हैं, उतने और किसी कारण से नहीं होते। अगर तुम समझ सको तो मैं तुमसे कहना चाहूंगा: शास्त्र के कारण जितने लोग अधार्मिक हो गए हैं, उतने किसी और कारण से नहीं। जितने शास्त्र बढ़ते गए हैं, उतना आदमी अंधा होता गया है; क्योंकि उसे लगता है कि सब समझ तो किताब में रखी है; पढ़ लेंगे किताब और समझ हाथ आ जाएगी।
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काश समझ इतनी सस्ती होती ! तो सारी दुनिया समझदार हो गई होती। गीता घर-घर में है; बाइबिल, कुरान घर-घर में है। क्या कमी है? समझ बिलकुल नहीं है। और शास्त्र जितना उपलब्ध हो जाता है, उतना ही तुम चेष्टा छोड़ देते हो। ध्यान रखना, सिद्धांतों के जंगल में मत भटक जाना।
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भज गोविंदम मूढ़मते👣ओशो

= १५७ =

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*अवसर यह जान जगजीवन, समझ देख सचु पावै ।*
*अंग अनेक आन मत भूलै, दादू जनि डहकावै ॥*
(श्री दादूवाणी ~ पद्यांश. ३१)
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साभार ~ oshoganga.blogspot.com

याददाश्त लौटानी है। याददाश्त कराई जा सकती है, मुक्त कोई कैसे कर सकता है? जंजीरें हैं ही नहीं, जंजीरें मान रखी हैं। मान्यता की जंजीरें हैं। झकझोरा जा सकता है कि हाथ पर जंजीर नहीं है; खयाल है जंजीर का। आंख खोल कर कभी गौर से देखा ही नहीं कि हाथ पर जंजीरें नहीं हैं, पैर में बेड़ियां नहीं हैं, मुक्त हैं। मुक्त होना स्वभाव है, संपदा है।

मुक्ति कोई वस्तु नहीं कि अर्जित करनी है, कि जिसका अभ्यास करना है—मुक्ति स्वभाव है। मुक्त मनुष्य पैदा ही हुए है। मुक्त ही जी रहा है। मुक्त ही मरेगा। बीच में बंधन का एक स्वप्न देखा।
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ऐसा समझें कि एक रात सोये और सपना देखा कि पकड़ लिये गये, तस्करी में पकड़ लिये गये, मीसा के अंतर्गत जेल में बंद कर दिये गये, हथकड़ियां डाल दी गयीं।
अब बड़े घबराने लगे रात नींद में कि अब क्या होगा, क्या नहीं होगा, कैसे बाहर निकलेंगे? और सुबह नींद खुली तो हंसने लगे। क्या सुबह यह कहेंगे कि रात जब जेलखाने में पड़े थे, हथकड़ियां लग गयी थीं, तब सच में ही जेलखाने में पड़ गये थे? नहीं, सुबह तो यह कहेंगे सच में तो मैं अपने बिस्तर पर आराम कर रहा था, झूठ में जेलखाने में कैद हो गया था।
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लेकिन बिस्तर पर आराम कर रहे थे, ये याद नहीं रह गया। इस कारण सपना बहुत भारी, हावी हो गया। आंखें सपने से बोझिल हो गयीं। सपने के द्वारा ग्रसित हो गये। सपने ने सम्मोहित कर लिया। सपना ऐसा था कि भूल ही गये कि यह सपना है। सपने में जकड़ गये। रात भर तकलीफ पायी। लेकिन सुबह उठ कर यह तो मानेंगे कि तकलीफ हुई नहीं थी वस्तुत:, मानी हुई थी।
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मुक्त ही पैदा हुए हैं, मुक्त अभी हैं, इस क्षण ! सपना देख रहे हैं—वह सपना है और अगर सपने में खोये हैं—सपना धोखा देता होगा।

= *आसै आसण का अंग ६४(४५/४८)* =

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卐 सत्यराम सा 卐 
*दादू जैसे मांहि जीव रहै, तैसी आवै बास ।*
*मुख बोले तब जानिये, अन्तर का परकास ॥*
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**श्री रज्जबवाणी** 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
*आसै आसण का अंग ६४* 
बोक१ वक्त्र२ डाढी बड़ी, रींछ सु डाढी रूप । 
रज्जब रट३ बिन रोम बल, परस४ न तत्त्व अनूप ॥४५॥ 
बकरे१ के मुख२ पर भी बड़ी डाढी होती है, रीछ तो डाढी रूप ही होता है, बिना नाम की रटन३ लगाये डाढी के केशों के बल से अनुपम तत्त्व ब्रह्म से मिलन४ नहीं होता । 
निर्गुण सहगुण बीज द्वै, अवनि आतमा माँहिं । 
नाम नीर सौं पुष्ट ह्वै, आसै आसण जाँहिं ॥४६॥ 
पृथ्वी में बीज रहते हैं, वे जल से पुष्ट होकर जैसी उनमें वासना है वैसे ही अंकुर निकल आते हैं, वैसे ही जीवात्माओं में निर्गुण - सगुण भावना है, वे नाम चिन्तन से पुष्ट होकर अपनी - अपनी प्रीति के अनुसार निर्गुण तथा सगुण को प्राप्त होते हैं । 
नाद नीर वर्षा विपुल, प्राण पुहमि भरपूर । 
रज्जब काढहिं जाति के, प्रकृति प्राण अंकूर ॥४७॥ 
जल की वर्षा बहुत हो, पृथ्वी के लिये परिपूर्ण हो जाय तो भी बीजों से अंकुर तो अपनी - अपनी जाति के ही निकलेंगे, वैसे ही उपदेश रूप शब्द बहुत सुनने को मिलें तो भी प्राणियों से विचार तो अपनी अपनी प्रकृति अनुसार ही प्रगट होंगे । 
लिखे फटकड़ी फहम१ सौं, कागद कमल सु माँहिं । 
नीर नाद२ सौं भीजतै, अक्षर उघड़ सु जाँहिं ॥४८॥ 
कागज पर फिटकरी से लिखे हुये अक्षर जल में भीगने से उघड़ जाते हैं, वैसे ही गुरु के हृदय - कमल में ज्ञान१ द्वारा अंकित विचार शिष्य के प्रश्न रूप शब्द२ से निकल आते हैं । 
(क्रमशः)

परिचय का अंग २४०/२४४

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🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य ।
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ Tapasvi Ram Gopal
(श्री दादूवाणी ~ परिचय का अंग)
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संतप्रवर महर्षि श्रीदादूदयाल जी महाराज बता रहे हैं कि ::
आशिक अमली साधु सब, अलख दरीबे जाइ ।
साहिब दर दीदार में, सब मिल बैठे आइ ॥२४०॥
साधना को ही अपना व्यसन मानने वाले भक्तजन उस इन्द्रियातीत ब्रह्म के दर्शन के लिए सत्पुरुषों का संग करते हैं । कुछ काल तक ब्रह्माकार वृत्ति की स्थिर बनाते रहते हैं । फिर उसी में स्थिर वृत्ति से ब्रह्म का दर्शन कर के ब्रह्म में मिल जाते हैं ।
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राते माते प्रेम रस, भर भर देहु खुदाइ ।
मस्तान मालिक कर लिये, दादू रहे ल्यौ लाइ ॥२४१॥
भगवान भी अपने निज भक्तों को प्रेमरस परिपूर्ण पात्र से भक्ति रस को बार बार पिला कर अपने में अनुरक्त कर उन्मत्त बना देता है । वे भी भक्तिरस में डूबे हुए, अंतःकरण की वृत्ति से उसका पान कर भवसागर से पार हो जाते हैं ।
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भक्ति अगाध
दादू भक्ति निरंतर राम की, अविचल अविनाशी ।
सदा सजीवन आत्मा, सहजैं परकाशी ॥२४२॥
निरंजन निराकार के अविचल एवं अविनाशिनी भक्ति सद्गुरु की कृपा से ही मिलाती है और उसी भक्ति के प्रभाव से साधक अजर अमर भाव प्राप्त कर पाता है अर्थात भवबंधन से मुक्त हो जाता है ।
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दादू जैसा राम अपार है, तैसी भक्ति अगाध ।
इन दोनों की मित नहीं, सकल पुकारैं साध ॥२४३॥
दादू जैसा अविगत राम है, तैसी भक्ति अलेख ।
इन दोनों की मित नहीं, सहस मुखां कहैं शेष ॥२४४॥
भगवान राम शुद्धबुद्धमुक्तस्वभाव, परात्पर एवं अगाध रूप हैं । उनकी भक्ति भी वैसी ही अगाध है । इन दोनों का कोइ निश्चित परिमाण नहीं है क्योंकि वे दोनों ही अनंत हैं ।
(क्रमशः)

बुधवार, 27 फ़रवरी 2019

= सुन्दर पदावली(१६.राग सोरठ - ८/२) =

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॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥ 
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली* 
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी, 
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान) 
*= १६. राग सोरठ =*
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(८/२) 
*किनहूं लइ औषध मूरी,* 
*किनहूं केसर कस्तूरी ।* 
*किनहूं लियौ बहुत अनाजा,* 
*किनहूं लियौ ल्हसण प्याजा ॥३॥* 
*संतनि लीयौ हरि हीरा,* 
*तिनस्यौं कीयौ हम सीरा ।* 
*दुःख दालिद्र निकट न आवै,* 
*यौं सुन्दर बनिया गावै ॥४॥* 
किसी ने स्वरोग शान्त्यर्थ औषध(जड़ी बूटी) खरीदी । किसी ने केशर या कस्तूरी ही खरीदी किसी ने बहुत सा अन्न खरीदा तो किसी ने अपने लिए लहसुन एवं प्याज ही खरीदा ॥३॥ 
परन्तु जो सन्त थे, उन ने हमसे रामरूप हीरा खरीदा । उनसे हमने अपना मेल जोड़ बढाया । तब से हमारे सामने दुःख एवं दरिद्रता की कोई समस्या नहीं रह गयी । ऐसा इस बनिया(व्यापारी) सुन्दरदास का कथन है ॥४॥
(क्रमशः)

= १५६ =

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*दादू जा कारण जग ढूंढिया, सो तो घट ही मांहि ।*
*मैं तैं पड़दा भरम का, तातैं जानत नांहि ॥*
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साभार ~ oshoganga.blogspot.com

कभी—कभी देखा न कि मनुष्य चश्मा लगाये रहता है और चश्मे को खोजता है ! चश्मा ही लगाये है और चश्मे को खोजता है। जल्दी में ट्रेन पकड़नी, कि बस पकड़नी, कि कुछ काम आ गया है तो भूल जाता है एकदम। देखा कि आदमी कान पर पेंसिल खोंसे रहता और सारी टेबल खोज डालता है। ऐसी ही कुछ भूल हो गयी है। बस ऐसी ही भूल हो गयी है।
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भीतर पड़ा है और यहां—वहां खोज रहे हैं। फिर जब नहीं मिलता यहां—वहां तो बेचैनी बढ़ती है। बेचैनी में और भूल होती है। फिर जब बिलकुल नहीं मिलता, कितना ही दौड़ते हैं, मीलों की यात्रा करते हैं, जन्मों —जन्मों की यात्रा और नहीं मिलता, तो बहुत घबड़ा जाते हैं। उस घबड़ाहट में और होश खो जाता है।
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जरा बैठें, ध्यान का इतना ही अर्थ है; जरा बैठें। दौड़े नहीं, खोजें भी नहीं; जरा शांत होकर बैठ जाएं। शायद जो तल में पड़ा है, वह प्रगट हो जाये। शायद शांत अवस्था में अपने स्वभाव का स्मरण हो जाये। बस इससे ज्यादा गुरु और क्या कर सकता है? खोया नहीं है किसी को। जिसे खोज रहे हैं, वह स्वयं ही हैं। तत्वमसि श्वेतकेतु।
‘मोह मात्र के निवृत्त होने पर और अपने स्वरूप के ग्रहण मात्र से वीतशोक और निरावृत्त दृष्टिवाले पुरुष शोभायमान होते हैं।’
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व्यामोहमात्रविरतौ स्वरूपादानमात्रत:।
वीतशोका विराजते निरावरण दृष्टय:।।
जिसका यह सपनों में मोह छूट गया। जिसने ये मन में उठती रागात्मक वृत्तियों को जाग कर देख लिया और इनका विचार छोड़ दिया और जो चीजों को सीधा—सीधा देखने लगा।
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व्यामगेहमात्रविरतौ...।
मोहमात्र जिसका निवृत्त हुआ। जो अब ऐसा नहीं कहता है कि यह मेरा है और यह मेरा नहीं है। क्या मेरा है, और क्या तेरा है?
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व्यामोहमात्रविरतौ स्वरूपादानमात्रत:।
जिसने अपने स्वरूप को ग्रहण कर लिया। शब्द का अर्थ समझें।
स्वरूप को पाना थोड़े ही है—है ही। लेकिन भूल गये हैं। भूल को सुधार लिया। दो और दो पांच जोड़ रहे थे, दो और दो चार जोड़ लिये। दो और दो चार ही थे। जब पांच जोड़ते थे तब भी चार ही थे।पचास जोड़ो तो भी चार ही रहेंगे। कुछ भी जोड़ें, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। न भी जोड़ें तो भी दो और दो चार ही हैं।
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स्वरूपादानमात्रत:।
और जिसने अब अपने स्वरूप को अंगीकार कर लिया; जो था उसे स्वीकार कर लिया, जो था उसकी स्मृति से भर गया।
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वीतशोका विराजते निरावरण दृष्टय:।
वह सारे दुख के पार हो जाता है। और एक ऐसे सिंहासन पर विराजमान हो जाता है जहां निर्मल दृष्टि है; जहां सब निर्मल है, निर्विकार है। ऐसी निर्विकार दृष्टि वाला व्यक्ति ही शोभायमान है। इस देश में ऐसे व्यक्ति की ही महिमा गायी है। धन की नहीं, पद की नहीं, सम्राटों की नहीं, साम्राज्यों की नहीं। भारतीय मनीषा एक ही साम्राज्य पर भरोसा करती हैं, वह है भीतर का, स्वभाव का स्वच्छंद, स्वयं के गीत का। ऐसा ही व्यक्ति केवल शोभायमान है।
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वीतशोका विराजते निरावरणदृष्टय:।
जिसकी दृष्टि निरावरण हो गयी। जिसकी आंख पर कोई परदा न रहा, कोई आवरण न रहा। जो देखने लगा सीधा—सीधा। जिसकी देखने की कोई आकांक्षा न रही कि ऐसा देखूं कि ऐसा हो, जो सीधा—सीधा देखने लगा। ऐसी निरावरण दृष्टि को उपलब्ध व्यक्ति ही एकमात्र जगत में शोभायमान है।

= १५५ =

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*दादू कर्त्ता हम नहीं, कर्त्ता औरै कोइ ।*
*कर्त्ता है सो करेगा, तूं जनि कर्त्ता होइ ॥*
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साभार ~ oshoganga.blogspot.com

*कर्तव्य से पैदा हुए दुखरूप सूर्य के ताप से जला है अंतर्मन जिसका !*
खयाल करें, जो भी धन इकट्ठा करते हैं, इसीलिए इकट्ठा करते हो कि सोचते हैं कि इकट्ठा कर सकते हैं ...
जो है वह मिला है, उसे इकट्ठा करने की जरूरत ही नहीं है। परमात्मा मिला ही हुआ है; उसे अर्जित नहीं करना है। वह मनुष्य मात्र का स्वभाव है। सच्चिदानंद मनुष्य है। लेकिन मनुष्य सोचता है, अर्जित करना होगा, कमाई करनी होगी, सुख के लिए इंतजाम करना होगा, तो मनुष्य कर्ता बन जाता है। वह कहता है, ऐसा करूंगा, ऐसा करूंगा, इतना—इतना कर लूंगा—फिर कर्ता बना कि जला।
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यह वचन पढ़ें, 'कर्तव्य से पैदा हुए दुखरूप सूर्य के ताप से जला है अंतर्मन जिसका।'
जो कर्ता के कारण ही दग्ध हुआ जा रहा है कि मुझे करना है। यह इतना विराट विश्व चल रहा है; कभी आंख खोल कर नहीं देखते कि कोई कर्ता नहीं दिखाई पड़ता और सब हो रहा है ! देखें खेत में लगे फूलों को। लिली के ये छोटे—छोटे फूल न तो श्रम करते हैं, न अर्जन करते हैं, फिर भी कैसे सुंदर हैं ! कैसे मनमोहक ! सम्राट भी अपनी सारी साज—सज्जा में इतना सुंदर न दिखेगा। क्या अर्थ हुआ इसका ?
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इसका अर्थ हुआ, जरा गौर से देखें, इतना विराट अस्तित्व चला जा रहा है, चल रहा है। तो जो इस विराट को चला रहा है, वही मुझे भी चला लेगा। ऐसा भाव जिसे आ गया, नमस्कार हो गया। ऐसा भाव जिसे आ गया, उसने अपनी सीमा छोड़ दी; असीम के साथ गठबंधन बांध लिया। उसने कहा : कर्ता है परमेश्वर, मैं कर्ता नहीं। उसने अपने मैं का जो केंद्र था, उसे विसर्जित कर दिया।

उसने कहा : तूने ही पैदा किया; तू ही श्वास ले रहा है, तू ही भोजन पचाता है; तू ही भोजन को खून बनाता है; तू ही जवान करता है; तू ही बूढ़ा करता है; एक दिन तू ही उठा ले जाएगा। जब सभी तू कर रहा है तो बीच में कर्ता क्यों बनें, तू सब कर ! हम सिर्फ होने देंगे। हम कर्ता न रहेंगे। हम केवल उपकरण हो जाएंगे—निमित्त मात्र। तेरी धारा हमसे बहे; जैसे बांसुरीवादक की धारा बहती है बांस की पोगरी से। बांस की पोंगरी सिर्फ खाली स्थान है जहां से स्वर बह सकते हैं। हम बांस की पोगरी होंगे।
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कबीर ने कहा है यही कि मैं बांस की पोंगरी हूं। वो गाये तो गीत बहे; वो न गाये तो गीत चुप रहे। मैं न गाऊंगा। मैं न गुनगुनाऊंगा। मैं बीच में न आऊंगा। ऐसी जो भावदशा है, वही नमस्कार है, वही नमन है। वही समर्पण है। कहें श्रद्धा, कहें प्रार्थना, भक्ति, आस्तिकता, जो भी कहना हो। लेकिन सार—सूत्र की बात इतनी है कि कर्ता परमात्मा है, हम कर्ता नहीं हैं।
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'कर्तव्य से पैदा हुए दुखरूप सूर्य से जला है जिसका अंतर्मन, ऐसे पुरुष को शांतिरूपी अमृतधारा की वर्षा के बिना सुख कहां है?' नहीं, मनुष्य के द्वारा सुख न कमाया जा सकेगा। शांतिरूपी वर्षा मनुष्य के ऊपर बरसे, कमाई नहीं जा सकती है शांति। मनुष्य केवल द्वार दे दे और प्रभु बरसे, मनुष्य के भीतर भर जाये।
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देखें, वर्षा होती है पहाड़ पर, पहाड़ खाली का खाली रह जाता है, क्योंकि पहले से ही भरा है। फिर वही वर्षा नीचे आती है, गड्डों में भर जाती है और झीलें बन जाती हैं, मानसरोवर निर्मित हो जाते हैं। क्यों? झील भर जाती है, क्योंकि झील खाली थी। जो खाली है वह भर जाएगा; जो भरा है वह खाली रह जाएगा।
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तो अगर अपने अहंकार से बहुत भरे हैं कि मैं कर्ता, मैं कर्ता, मैं धर्ता, मैं यह, मैं वह, अगर भीतर ये सब भरा है, तो खाली रह जाएंगे। परमात्मा बरसता है, लेकिन झील न बन पाएंगे। खाली हो तो उसकी अमृतधारा से भर जाएं। और तभी है शांति।
कुत: प्रशमपीयूषधारा सारमृते सुखम्। 
*उसकी अमृतधारा की वर्षा के बिना किसको शांति मिलती है ! शांति करने का परिणाम नहीं है; अकर्ता हो जाने की सहज दशा है।*

= *आसै आसण का अंग ६४(४१/४४)* =

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卐 सत्यराम सा 卐 
*जागत जहँ जहँ मन रहै, सोवत तहँ तहँ जाइ ।*
*दादू जे जे मन बसै, सोइ सोइ देखै आइ ॥*
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**श्री रज्जबवाणी** 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
*आसै आसण का अंग ६४* 
मैलों मैले मिल रसरंगा१, 
मैले उज्जवल बने न संगा । 
कन्ह२ गाय के कनै३ न आवै, 
पशुहु पेख माँहिली पावै ॥४१॥ 
मलीनों से मलीन मिलते हैं तब ही उनकी प्रेम-क्रीड़ा१ होती है, मैलों का और उज्जवलों का संग नहीं बनता, देखो, पशु भी भीतर की भावना को जान लेते हैं, ब्रह्मचारिणी२ गाय के पास३ साँड नहीं जाता । वैसे प्राणी जहाँ वासनापूर्ण हो वहाँ ही जाता है । 
वक्त्र१ बार२ ह्वै नीकसै, पैठे श्रवण सु द्वार । 
रज्जब मिलिये हि सगों से, बाकी फिर हुँ हजार ॥४२॥ 
वचन मुख१ द्वार२ से निकलते हैं और श्रवण द्वार से प्रवेश करते हैं और अपने सम्बन्धी शब्दों से मिलते हैं शेष चाहे हजार शब्दों की ध्वनि होती रहे उससे नहीं मिलते, वैसे ही प्राणी प्रेम के सम्बन्ध से ही मिलते हैं । 
तीरथ प्रीति सु मीन ह्वै, मूरति कीट पषान । 
हेतु हुताशन समंद१ जीव२, आसै३ आसण जान ॥४३॥ 
प्राणी की तीर्थ में प्रीति होती है तो मच्छी बनता है, पत्थर की मूर्ति प्रीति होती है तो पत्थर का कीट बनता है, अग्नि में प्रीति होती है तो अग्नि१ कीट२ बनता है, इसी प्रकार जिसमें प्रीति३ होती है उसी में निवास होता है । 
बगला हुदहुदमोर१ तन, साका२ शुक्ल सु स्वाँग३ ।
रज्जब पाई प्राणि ने, मन वच कर्म जो माँग ॥४४॥ 
जिसकी श्वेत भेष३ में इच्छा२ रहती है, वे बक, मुर्ग-सुलेमान१(राज मुकुट) का शरीर पाते हैं, मन, वचन, कर्म से जो भी प्राणी की माँग रही है वही उसने प्राप्त की है । 
(क्रमशः)

= निगुणा का अँग(३३ - १९/२१) =

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॥ दादूराम सत्यराम ॥
*श्री दादू अनुभव वाणी* 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
*निगुणा का अँग ३३*
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सगुणा गुण केते करै, निगुणा न माने एक । 
दादू साधू सब कहैं, निगुणा नरक अनेक ॥१९॥ 
सुगुण युक्त कृतज्ञ अपने पर किये उपकार को बहुत बढ़ाकर मानता है किन्तु सुगुण रहित कृतघ्न के कितने ही उपकार करो तो भी वह एक नहीं मानता । इसीलिए सब सँत कहते हैं - कृतघ्न को अनेक नरक प्राप्त होते हैं अर्थात् वह अनेक वर्षों तक नरक में रहता है । 
सगुणा गुण केते करै, निगुणा नाखे१ ढाहि२ । 
दादू साधू सब कहैं, निगुणा निष्फल जाइ ॥२०॥ 
सुगुण सँपन्न मानव चाहे कितने ही उपकार करे, किन्तु कृतघ्न तो उन सब के अहसास को मिटाकर२ रख१ देता है, लेश भी नहीं मानता । इसीलिए सब सँत कहते हैं कि कृघ्न ज्ञान - फल प्राप्त किये बिना ही मर जाता है ।
.
सगुणा गुण केते करै, निगुणा न माने कोइ ।
दादू साधू सब कहैं, भला कहां तैं होइ ॥२१॥
सुगुण सँपन्न पुरुष अनेक उपकार करता है किन्तु कृतघ्न किसी एक को भी नहीं मानता । इसीलिए सब सँत कहते हैं - "कृतघ्न का भला किस प्रकार से हो सकता है ?" 
(क्रमशः)

परिचय का अंग २३५/२३९

🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य ।
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ Tapasvi Ram Gopal
(श्री दादूवाणी ~ परिचय का अंग)
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संतप्रवर महर्षि श्रीदादूदयाल जी महाराज बता रहे हैं कि ::
अट्ठे पहर अर्श में, वजी जे गाहीन ।
दादू पसे तिन्न के, कितेई आहीन ॥२३५॥
वे देहाध्यास को त्यागकर सांसारिक विषयों से दूर रहते हुए अपने हृदयाकाश में प्रभु को खोजते रहते हैं । ऐसे पुरुष संसार में बहुत थोड़े होते हैं । ऐसे साधुजन दर्शनयोग्य होते हैं ।
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रस(प्रेम प्याला)
प्रेम प्याला नूर का, आशिक भर दीया ।
दादू दर दीदार में, मतवाला कीया ॥२३६॥
आनंद रस से परिप्लुत प्रेमभक्ति का अमृतपान कराकर, मुझे ह्रदय में ही दर्शन दे कर, उस प्रभु ने मुझ पर महान अनुग्रह किया है ।
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इश्क सलूनां आशिकां, दरगह तैं दीया ।
दर्द मोहब्बत प्रेम रस, प्याला भर पीया ॥२३७॥
ब्रह्मवेत्ता भी स्वभावसिद्ध, सतत, अव्यवहित, दूसरी वृत्तियों के बिना प्रत्यगभिन्न परमात्मा से अखंडाकारवृत्तिमय भक्ति, जो बिना किसी हेतु के होती है, को प्रभुकृपा से ही प्राप्त करते हैं । उसे प्राप्तकर विरहजन्य पीड़ा का अनुभव करते हुये भक्तिरस का यथेच्छ पान करते हैं । लिखा है -
गोविन्द भगवान की एकान्तिक भक्ति वही है जब भक्त सर्वत्र उसी को देखे । यह निर्गुण भक्ति है, जो बिना कारण और व्यवधानरहित होती है ।
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दादू दिल दीदार दे, मतवाला कीया ।
जहाँ अर्श इलाही आप था, अपना कर लीया ॥२३८॥
जब स्वयं भगवन ने मुझको अष्टदलकमल में दर्शन दिया तभी से मेरा मन भगवदाश्रित होकर उनके दर्शन से उद्भूत आनंद से कृतकृत्य हो गया ।
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दादू प्याला नूर दा, आशिक अर्श पीवन्न ।
अट्ठे पहर अल्लह दा, मुँह दिट्ठे जीवन्न ॥२३९॥
प्रेमी भक्त स्वहृदयाकाश में ब्रह्म का प्रेम रस पी पीकर दिनरात भगवान के मुखकमल का दर्शन करते करते मंगलमय जीवन बिताते हैं ।
(क्रमशः)

मंगलवार, 26 फ़रवरी 2019

= सुन्दर पदावली(१६.राग सोरठ - ८/१) =

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॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥ 
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली* 
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी, 
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान) 
*= १६. राग सोरठ =*
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(८/१) 
*देषहु साह रमइया ऐसा,*
*सो रहै अपरछन बैसा ॥टेक॥* 
*यहु हाट कियौ संसारा,*
*तामैं बिबिधि भांति ब्यौपारा ।* 
*सब जीव सौदागर आया,*
*जिनि बनज्या तैसा पाया ॥१॥* 
*किनहूं बनिजी षलि षारी,*
*किनहुं लइ लौंग सुपारी ।* 
*किनहूं लिये मूंगा मोती,*
*किनहूं लइ काच की पोती ॥२॥* 
ऐसे राम व्यापारी से साक्षात्कार करना चाहिये ॥टेक॥ 
यह संसार एक प्रकार की दुकान ही है । इसमें नाना प्रकार के व्यापार होते हैं । सभी प्राणी यहाँ अपनी अभीष्ट वस्तु खरीदने आते हैं । जिन ने जैसा मूल्य दिया उतने मूल्य की वस्तु उन ने प्राप्त की ॥१॥ 
किसी ने खाद एवं खल ख़रीदा तो किसी ने लौंग एवं सुपारी खरीदी । किसी ने मूंगा एवं मोती आदि रत्न ही खरीदे और किसी ने मुंह देखने के लिये शीशा(दर्पण) खरीदा ॥२॥ 
(क्रमशः)

= १५४ =


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*सब घट में गोविन्द है, संग रहै हरि पास ।*
*कस्तूँरी मृग में बसै, सूंघत डोलै घास ॥*
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साभार ~ oshoganga.blogspot.com

'समस्त जगत कल्पना मात्र है और आत्मा मुक्त और सनातन है, ऐसा जानकर धीरपुरुष बालकों की भांति क्या चेष्टा करता है !'
यह बड़ा अदभुत सूत्र है।
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समस्तं कल्पनामात्रमात्मा मुक्त: सनातन:।
इति विज्ञाय धीरो हि किमभ्यस्यति बालवत्॥
सारा जगत कल्पना मात्र है, ऐसा जिसने जाना, ऐसा जानते ही दूसरी बात भी जान ली साथ ही साथ, युगपत, कि आत्मा सनातन और मुक्त है। जब तक संसार सत्य है, आत्मा बंधन में मालूम होती है। जैसे ही संसार मालूम हुआ मिथ्या—आत्मा मुक्त है।
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संसार की भ्रांति ही बंधन है। बंधन वास्तविक नहीं है। मान रखा है कि बंधन है, इसलिए है। छोड़ दें मान्यता, छूट जाता है।
’ऐसा जान कर धीरपुरुष क्या बालकों की भांति चेष्टा करता है !'
बच्चे अभ्यास करते हैं। भाषा सीखनी है तो अभ्यास करना पड़ता है। भाषा छोड़नी हो तो भी क्या अभ्यास करना पड़ेगा? कुछ कमाना हो तो अभ्यास करना पड़ता है। कुछ गंवाना हो तो अभ्यास करना पड़ेगा?
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रामकृष्ण के पास एक आदमी ने पांच सौ मोहरें ला कर रख दीं, कहा कि आप को दान करना है। रामकृष्ण ने कहा : तू एक काम कर, दान तो हम ले लिये, हमने स्वीकार कर लिया; अब हमारी तरफ से इनको गंगा में फेंक आ। वह आदमी बड़ी मुश्किल में पड़ा।
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इंकार ही कर देते तो अपने घर तो ले जाता, यह और उपद्रव कर दिया। स्वीकार भी कर लिया और अब कहते हैं गंगा में फेंक आ। और अब कहते हैं मेरी तरफ से, इसलिए अब मेरा कोई वश भी नहीं है। वह गया। बड़ी देर लगा दी। तो रामकृष्ण ने कहा : पता लगाओ, गया कि नहीं गया ? कहां है ? कितनी देर लगा दी? इतनी देर की जरूरत क्या ?
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कोई गया तो देखा, उसने वहां भीड़ इकट्ठी कर रखी थी। वह एक—एक अशर्फी को पटकता सीढ़ी पर, बजाता, खनखनाता, फिर फेंकता और गिनती करता। तो देर लग रही थी।

रामकृष्ण भागे गये और कहा : पागल, जब कमाना हो तो गिनती करनी पड़ती है; जब फेंकना है तो गिनती किसलिए कर रहा है? यह खनखना किसलिए रहा है? अब तुझे क्या फिक्र पड़ी है कि सही है कि खोटी है, कि असली है कि नकली है। कमाते वक्त की तेरी आदत है। 
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मगर गंवाने में? फेंक, इकट्ठा फेंक !
अभ्यास करना पड़ता है, जब कमाते हैं। भोग का अभ्यास करना पड़ता है, त्याग का अभ्यास नहीं करना पड़ता। त्याग तो एक क्षण में घट जाता है। भोग तो जन्मों—जन्मों में नहीं घटता और त्याग एक क्षण में घट जाता है। त्याग के लिए समय की जरूरत ही नहीं है। ज्ञान के लिए अभ्यास की जरूरत नहीं है, क्योंकि ज्ञान स्वभाव है। अभ्यास तो उसका करना पड़ता है जो स्वभाव नहीं है।

= १५३ =

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*एक कहूँ तो दोइ हैं, दोइ कहूँ तो एक ।*
*यों दादू हैरान है, ज्यों है त्यों ही देख ॥*
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साभार ~ Atul Solanki

🌷🍀🌷 *कभी एक और एक मिलकर डेढ़ ही होगा* 🌷🍀🌷

शिवपुरी बाबा प्यारे आदमी थे। थोड़े-से आदमियों में इस सदी में, जिनके भीतर परमात्मा का वास था, एक थे।

वे कोई पैंतीस साल तक सारी दुनिया में यात्रा करते रहे–चुपचाप, एक अज्ञात आदमी की भांति ! उन यात्राओं में वे दुनिया के बड़े-बड़े लोगों से मिले। अलबर्ट आइंस्टीन से भी मिलना उनका हुआ। अलबर्ट आइंस्टीन से उनकी जो बात हुई, उसमें शिवपुरी बाबा ने कहा - “आप क्या सोचते हैं दो और दो चार होते हैं?” आइंस्टीन ने कहा - “निश्चित दो और दो चार होते हैं, इसमें भी क्या पूछने की बात है !”
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शिवपुरी बाबा ने कहाः “लेकिन मेरा एक निवेदन है, दो और दो चार नहीं हो सकते। एक और एक दो नहीं हो सकते, क्योंकि यहां दो चीजें एक जैसी हैं ही नहीं; जोड़ोगे कैसे? यहां दो “एक” एक जैसे हैं ही नहीं, प्रत्येक चीज इतनी अद्वितीय है ! एक और एक मिलकर दो हो सकते हैं, अगर एक और एक बिल्कुल एक जैसे हों। मगर कोई चीज एक जैसी नहीं है।”
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तुम कहते हो, एक आदमी कमरे में है, एक और आदमी आ गया तो दो आदमी हो गए। मगर ये दो आदमी इतने भिन्न हैं, इनको दोनों को एक-एक मानकर चलोगे, एक जैसा मानकर चलोगे? गणित में धोखा हो जाएगा। इसमें एक आदमी कृष्ण जैसा हो सकता है, एक आदमी कंस जैसा हो सकता है। दोनों भीतर जाएं तो दो नहीं होते। कृष्ण और कंस हों तो एक-दूसरे को काट देंगे। या इनमें कोई मजनू और लैला हो सकता है; ये दो भीतर जाएं तो दो जुड़कर एक हो जाएंगे, दो नहीं बचेंगे। निर्भर करेगा। सदा एक और एक दो नहीं होगा और सदा दो और दो चार नहीं होंगे। कभी एक और एक मिलकर डेढ़ ही होगा; कभी एक और एक मिलकर एक ही होगा; कभी एक और एक मिलकर दस भी हो सकते हैं। कठिन है कहना।
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कहते हैं आइंस्टीन चुप हो गया और सोचने लगा, बात तो सच थी। जिंदगी गणित से थोड़ी ज्यादा है। जिंदगी रहस्यपूर्ण है। गणित सारे रहस्यों को समाप्त कर देता है।

अजहूं चेत गंवार, प्रवचन # १६, ओशो

= *आसै आसण का अंग ६४(३७/४०)* =

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卐 सत्यराम सा 卐 
*जाके हिरदै जैसी होइगी, सो तैसी ले जाइ ।*
*दादू तू निर्दोष रह, नाम निरंतर गाइ ॥*
=============== 
**श्री रज्जबवाणी** 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
*आसै आसण का अंग ६४* 
देव सेव बहु मांड१ में, मंडी२ न मेटी जाँहि । 
रज्जब रूच सी प्राणिहिं, जाके जो मन माँहिं ॥३७॥
ब्रह्माण्ड१ में बहुत देवों की सेवा-भक्ति चलती है, और जो बनी२ है, वह मिटाई भी नहीं जा सकती है किन्तु जिसके मन में जो देव बसा उसी की सेवा उसे रुचि कर होती है । 
जो दिल में सौदागरी१, दुनी४ सु सौदा२ होय । 
रज्जब बिच व्यापार बिन, बाहर विणज३ न कोय ॥३८॥
जो मन में व्यापार१ होता है, वही व्यापार२ बाहर संसार४ में होता है, यदि मन में व्यापार नहीं हो तो बाहर भी व्यापार३ नहीं होता है । 
लक्षण लोक असंख्य कुल१, घटि घटि नगर बसंत । 
उभय एक अंग मिल रमहिं, जन रज्जब जग मंत२ ॥३९॥
शुभाशुभ लक्षण रूप असंख्य लोक हैं, उनमें मनोरथ रूप वंशों१ के नगर घड़ी घड़ी में बसते हैं, जगत के प्राणियों का यही उद्योग२ है कि लक्षण और मनोरथ दोनों को एक ही शरीर में मिलकर इच्छानुसार विचरते हैं । 
जाति पांती सब को करै, सगों१ सगाई२ होय । 
त्यों सुकृत सुकृत मिले, कुकृत कुकृत जोय ॥४०॥
अपनी अपनी जाति पांति से सभी मेल करते हैं, संबन्धियों१ से ही संबन्ध२ होता है, वैसे ही सुकृत से सुकृत मिलते हैं और कुकृत से कुकृत मिलते हैं । 
(क्रमशः)

= निगुणा का अँग(३३ - १६/१८) =

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॥ दादूराम सत्यराम ॥
*श्री दादू अनुभव वाणी* 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
*निगुणा का अँग ३३*
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दादू सगुणा गुण करे, निगुणा माने नाँहिं ।
निगुणा मर निष्फल गया, सगुणा साहिब माँहिं ॥१६॥
सुन्दर गुण वाले सँत तो सभी का उपकार ही करते हैं किन्तु गुण रहित कृतघ्न उनके उपकार रूप गुण को नहीं मानता । अत: वह ज्ञान - फल के प्राप्त हुये बिना ही मर कर अन्य शरीर को धारण करने जाता है और ज्ञान - भक्ति आदि सुन्दर गुणों से युक्त सँत ब्रह्म में लय होता है ।
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निगुणा गुण माने नहीं, कोटि करे जे कोइ । 
दादू सब कुछ सौंपिये, सो फिर बैरी होइ ॥१७॥ 
गुण न मानने वाले कृतघ्न के प्रति कोटि उपकार भी करें, तो भी वह गुण नहीं मानता । यदि उसे अपना सब कुछ भी समर्पण कर दें, तो भी वह आगे शत्रु ही बन जायेगा । 
दादू सगुणा लीजिये, निगुणा दीजे डार । 
सगुणा सन्मुख राखिये, निगुणा नेह निवार ॥१८॥ 
सुन्दर गुण युक्त कृतज्ञ को ही मित्र रूप से ग्रहण करना चाहिए और गुण न मानने वाले कृतघ्न को त्याग देना चाहिए । सुगुण युक्त कृतज्ञ को अपने पास सन्मुख ही रखना चाहिए और गुण न मानने वाले कृतघ्न से प्रेम हो, तो उससे प्रेम हटा लेना चाहिए ।
(क्रमशः)

परिचय का अंग २३०/२३४

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श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य ।
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ Tapasvi Ram Gopal
(श्री दादूवाणी ~ परिचय का अंग)
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संतप्रवर महर्षि श्रीदादूदयाल जी महाराज बता रहे हैं कि ::
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साधु महिमा महात्म
दादू अट्ठे पहर इबादती, जीवण मरण निबाहि ।
साहिब दर सेवै खड़ा, दादू छाड़ि न जाहि ॥२३०॥
अट्ठे पहर अर्श में, ऊभोई आहे ।
दादू पसे तिनके, अल्लह गाल्हाये ॥२३१॥
अट्ठे पहर अर्श में, बैठा पीरी पसन्नि ।
दादू पसे तिन्न के, जे दीदार लहन्नि ॥२३२॥
अट्ठे पहर अर्श में, जिन्हीं रूह रहन्नि ।
दादू पसे तिन्न के, गुझ्यूं गाल्हि कन्नि ॥२३३॥
अट्ठे पहर अर्श में, लुड़ींदा आहीन ।
दादू पसे तिन्न के, असां खबर डीन ॥२३४॥
निरंतर प्रभु के द्वार पर खड़े रह कर उसी का ध्यान करो । उस ध्यान में कोइ व्यवधान न पड़ने पावे । इस प्रकार जो प्रभु ही का ध्यान करता है उसको ही उसका दर्शन होता है । भक्तजन अपने विशुद्ध अंतःकरण में आठों पहर स्वचित्तवृत्ति द्वारा भगवन के सम्मुख स्थित होकर प्रभु से संवाद करते हैं । ऐसे साधकों का, अपनी कल्याणकामना से, दर्शन करना चाहिये । जिन्होंने उस परमात्मा का साक्षात्कार कर लिया, वे प्रभुदर्शन करते हुए प्रसन्न हो रहे हैं । वे स्वयं दिनरात आठों पहर उसी का दर्शन करते हैं और दूसरों को उसकी भक्ति के लिए प्रेरित करते हैं ।
भागवत में भी लिखा है - “हे राजन बड़े बड़े ऋषि मुनि या देवता अपने अंतःकरण को भगवन्मय बना कर उसे खोजते रहते हैं । भगवन के ऐसे चरणकमलों से आधे क्षण भी जो नहीं हटता, निरंतर उन चरणों की सेवा में ही लगा रहता है । यहाँ तक कि कोई स्वयं उसे त्रिलोकी की राज्यलक्ष्मी दे तो भी वह भगवत्स्मृति का तार(निरन्तरता) नहीं तोड़ता । ऐसा ही महापुरुष भगवन का मुख्य भक्त है ।”
“विवशता से नामोच्चारण करने पर भी सम्पूर्ण पापों का नाश करनेवाले स्वयं भगवन हरी जिसके ह्रदय को क्षण भर भी नहीं छोड़ते, क्यों की उसने प्रेम की रस्सी से उनके चरणकमलों को बाँध रक्खा है । ऐसे पुरुष ही भक्तों में श्रेष्ठ माने जाते हैं ।”
“कुसंग का सर्वथा त्याग करना ही उचित है । यदि किसी कारण से वह छोड़ा न जा सके तो उसको सज्जनों के साथ जोड़ना चाहिये क्यों कि सत्संग ही भवरोग की एकमात्र औषधि है”॥२३०-२३४॥
(क्रमशः)

सोमवार, 25 फ़रवरी 2019

= सुन्दर पदावली(१६.राग सोरठ - ७/२) =

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॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥ 
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली* 
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी, 
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान) 
*= १६. राग सोरठ =*
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(७/२) 
*जो गाहक लेने आवै, मन मान्यौ सौदा पावै ।* 
*देषै बहु भांति किरांना, उठि जाइ न और दुकांना ॥३॥* 
*सम्रथ की कोठी आये, तब कोठीवाल कहाये ।* 
*बनिजै हरि नांव निवासा, यह बनिया सुंदरदासा ॥४॥* 
जो भी ग्राहक कोई वस्तु खरीदने आता है, वह मनचाही वस्तु यहाँ पा ही जाता है । दूसरे व्यापारी भी इस दुकान पर बहुत गहरी दृष्टि रखते हैं । उन्हें यह भय सताता रहता है कि कहीं इसके कारण उनकी दुकान चौपट न हो जाय ॥३॥ 
समर्थ(आध्यात्मिक) व्यापारी का साथ पकड़ कर हमने यह कोठी(दुकान) खोली । तब हम इस बाजार में ‘कोठीवाल’(बड़े व्यापारी) कहलाये । हम इसमें भगवान् का नाम एवं उनका निवास स्थान बताने का ही कार्य करते हैं । इसीलिये हमारा नाम “बनियाँ सुन्दरदास” ही प्रसिद्ध हो गया है ॥४॥
(क्रमशः)

= १५२ =

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*तन मन मांहिं शोध सो लीन्हा, निरखत हूँ निज सारा ।*
*सोई संग सबै सुखदाई, दादू भाग्य हमारा ॥* 
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साभार ~ @Jignesh Patel

जो मांगता ही चलता है....
एक कहानी मैंने सुनी है। एक शहर में एक नई दुकान खुली। जहां कोई भी युवक जाकर अपने लिए एक योग्य पत्नी ढूंढ़ सकता था।
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एक युवक उस दुकान पर पहुंचा। दुकान के अंदर उसे दो दरवाजे मिले। एक पर लिखा था, युवा पत्नी; और दूसरे पर लिखा था, अधिक उम्र वाली पत्नी !
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युवक ने पहले द्वार पर धक्का लगाया और अंदर पहुंचा। फिर उसे दो दरवाजे मिले। पत्नी वगैरह कुछ भी न मिली। फिर दो दरवाजे ! पहले पर लिखा था, सुंदर; दूसरे पर लिखा था, साधारण।
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युवक ने पुनः पहले द्वार में प्रवेश किया। न कोई सुंदर था न कोई साधारण, वहां कोई था ही नहीं। सामरे फिर दो दरवाजे मिले, जिन पर लिखा था : अच्छा खाना बनानेवाली और खाना न बनानेवाली।
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युवक ने फिर पहला दरवाजा चुना। स्वाभाविक, तुम भी यही करते। उसके समक्ष फिर दो दरवाजे आए, जिन पर लिखा था : अच्छा गाने वाली और गाना न गाने वाली।
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युवक ने पुनः पहले द्वार का सहारा लिया और अब की उसके सामने दो दरवाजों पर लिखा था : दहेज लानेवाली और न दहेज लानेवाली।
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युवक ने फिर पहला दरवाजा चुना। ठीक हिसाब से चला। गणित से चला। समझदारी से चला।
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परंतु इस बार उसके सामने एक दर्पण लगा था, और उस पर लिखा था, ‘आप बहुत अधिक गुणों के इच्छुक हैं। समय आ गया है कि आप एक बार अपना चेहरा भी देख लें।’
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ऐसी ही जिंदगी है: चाह, चाह, चाह ! दरवाजों की टटोल। भूल ही गए, अपना चेहरा देखना ही भूल गए ! जिसने अपना चेहरा देखा, उसकी चाह गिरी। जो चाह में चला, वह धीरे-धीरे अपने चेहरे को ही भूल गया। जिसने चाह का सहारा पकड़ लिया, एक चाह दूसरे में ले गई, हर दरवाजे दो दरवाजों पर ले गए, कोई मिलता नहीं। जिंदगी बस खाली है।
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यहां कभी कोई किसी को नहीं मिला। हां, हर दरवाजे पर आशा लगी है कि और दरवाजे हैं। हर दरवाजे पर तख्ती मिली कि जरा और चेष्टा करो। आशा बंधाई। आशा बंधी। फिर सपना देखा। लेकिन खाली ही रहे। अब समय आ गया, आप भी दर्पण के सामने खड़े होकर देखो। अपने को पहचानो !
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जिसने अपने को पहचाना वह संसार से फिर कुछ भी नहीं मांगता। क्योंकि यहां कुछ मांगने जैसा है ही नहीं। जिसने अपने को पहचाना, उसे वह सब मिल जाता है जो मांगा था, नहीं मांगा था। और जो मांगता ही चलता है, उसे कुछ भी नहीं मिलता है।
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जिनसूत्र ओशो

= १५१ =


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*दादू दूजे अंतर होत है, जनि आने मन मांहि ।*
*तहाँ ले मन को राखिये, जहँ कुछ दूजा नांहि ॥*
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साभार ~ Gems of Osho

*भगवान महावीर और गौतम*
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गौतम उस समय का बड़ा पंडित था। हजारों उसके शिष्‍य थे, जब वह महावीर को मिला, उसके पहले उसका बड़ा नाम था, वह ब्राह्मण घर में जन्‍मा था। महावीर से विवाद करने ही आया था। गौतम, महावीर से विवाद करना ठीक उल्‍टा होगा ये उसे ज्ञात नहीं था। वह थोथे ज्ञान से भरा था। तर्क बुद्धि थी। तक्र बुद्धि आदमी को अहंकारी बना देती है। 
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महावीर को पराजित करने के लिए आया था। हरा दिये होंगे पंडित पुरोहित। जो जानकारी रखते होंगे। उसने सोचा महावीर भी जानकरी से भरा है। और उस समय महावीर का बहुत सम्‍मान और नाम था। गौतम ने सोचा अगर महावीर को हरा दूँ तो बहुत नाम हो जायेगा। अगर महावीर के पास गौतम से कम जानकारी होती तो, गौतम तो महावीर को हराने के लिए ही आया था। और गौतम ज्ञान से परिचित नहीं था। क्‍योंकि ज्ञान का तो कोई सवाल ही नहीं था, उसके पास उसके पास तो जानकारी थी। 
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गौतम को रूपांतरित करने का कोई उपाय नहीं था। पहले उसकी जानकारी उससे छीनती जाए। उसे खाली किया जाये। उसे उसके ही तर्कों से हराया जाये। आखिर गौतम भगवान महावीर से पराजित हुआ। जब वह भगवान महावीर से जानकारी में भी हार गया। तब उसने महावीर की तरफ श्रद्धा से देखा। 
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और तब महावीर ने कहा कि अब मैं तुझे वह बात कहूंगा, जिसका तुझे कोई पता नहीं है। अभी तो मैं वह कहा रहा था जिसका तुझे पता है। मैंने तुझसे जो बातें कहीं है वह तेरे ज्ञान को गिरा देने के लिए, अब तू अज्ञानी हो गया। अब तेरे पास कोई ज्ञान नहीं है। अब मैं तुझसे जो बातें कहूंगा जिससे तू वस्‍तुत: ज्ञानी हो सकता है। क्‍योंकि जो ज्ञान विवाद से गिर जाता है, उसका क्‍या मूल्‍य है? जो ज्ञान तर्क के कट जाता है, उसका क्‍या मूल्‍य है? 
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गौतम महावीर के चरणों में गिर गया। उनका शिष्‍य बन गया। गौतम इतना प्रभावित हो गया महावीर से, कि आसक्‍त हो गया,महावीर के प्रति मोह से भर गय। गौतम महावीर का प्रमुखत्‍म शिष्‍य था। प्रथम शिष्‍य, शिष्‍य, श्रेष्ठतम शिष्‍य। उनका पहला गणधर हे। उनका पहला संदेशवाहक है। 
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लेकिन, गौतम ज्ञान को उपल्‍बध नहीं हो सका। गौतम के पीछे हजारों-हजारों लोग दीक्षित हुए और ज्ञान को उपलब्‍ध हुए। और गौतम ज्ञान को उपलब्‍ध नहीं हो सका। गौतम महावीर की बातों को ठीक-ठीक लोगों तक पहुंचाने लगा। संदेशवाहक हो गया। जो महावीर कहते थे, वही लोगों तक पहुंचाने लगा। उससे ज्‍यादा कुशल संदेशवाहक महावीर के पास दूसरा नहीं था। लेकिन वह ज्ञान को उपलब्‍ध नहीं हो सका। वह उसका पांडित्य बाधा बन गया। 
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वह पहले भी पंडित था, वह अब भी पंडित था। पहले वह महावीर के विरोध में पंडित था, अब महावीर के पक्ष में पंडित हो गया। अब महावीर जो जानते थे, कहते थे, उसे उसने पकड़ लिया और उसका शस्‍त्र बना लिया। वह उसी को दोहराने लगा। हो सकता है महावीर से भी बेहतर दोहराने लगा हो। लेकिन ज्ञान को उपलब्‍ध नहीं हुआ। वह पंडित ही रहा। उसने जिस तरह बाहर की जानकारी इकट्ठी की थी, उसी तरह उसने भीतर की जानकारी भी इकट्ठी कर ली। यह भी जानकारी रही, यह भी ज्ञान न बना।
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गौतम बहुत रोता था। वह महावीर से बार-बार कहता था, मेरे पीछे आये लोग, मुझ से कम जानने वाले लोग, साधारण लोग, मेरे जो शिष्‍य थे वे, आपके पास आकर ज्ञान को उपलब्‍ध हो गये। यह दीया मेरा कब जलेगा। यह ज्‍योति मेरी कब पैदा होगी। मैं कब पहुंच पाऊंगा?
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जिस दिन महावीर की अंतिम घड़ी आयी, उस दिन गौतम को महावीर ने पास के गांव में संदेश देने भेजा था। गौतम लौट रहा है गांव से संदेश देकर, तब राहगीर ने रास्‍ते में खबर दी कि महावीर निर्वाण को उपलब्‍ध हो गये। गौतम वहीं छाती पीटकर रोने, लगा, सड़क पर बैठकर। और उसने राहगीरों को पूछा कि वह निर्वाण को उपलब्‍ध हो गये। मेरा क्‍या होगा? मैं इतने दिन तक उनके साथ भटका, अभी तक मुझे तो वह किरण मिली नहीं। अभी तो मैं सिर्फ उधार, वह जो कहते थे, वही लोगों को कहे चला जा रहा हूं। मुझे वह हुआ नहीं, जिसकी वह बात करते है। अब क्‍या होगा? उनके साथ न हो सका, उनके बिना अब क्‍या होगा। मैं भटका, मैं डूबा। अब मैं अनंत काल तक भटकूंगा। वैसा शिक्षक अब कहां? वैसा गुरु अब कहां मिलेगा? क्‍या मेरे लिए भी उन्‍होंने कोई संदेश स्मरण किया है, और कैसी कठोरता की उन्‍होंने मुझ पर? जब जाने की घड़ी थी तो मुझे दूर क्‍यों भेज दिया?
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तो राहगीरों ने यह सूत्र उसको कहा है। यह जो सूत्र है, राहगीरों ने कहा है। कि तेरा उन्‍होंने स्‍मरण किया और उन्‍होंने कहा है कि गौतम को यह कह देना। गौतम यहां मोजूदा नहीं है, गौतम को यह कह देना। यह जो सूत्र है, यह गौतम के लिए कहलवाया गया है।
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“जैस कमल शरद-कमल के निर्मल जल को भी नहीं छूता और अलिप्‍त रहता है। वैसे ही संसार अपनी समस्‍त आसक्‍तियां मिटा कर सब प्रकार के स्‍नेह-बंधनों से रहित हो जा। अत: गौतम, क्षण मात्र भी प्रमाद मत कर।”
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ये जो आखिरी शब्‍द है कि तू संसार के सागर को पार कर गया—गौतम पत्‍नी को छोड़ आया, बच्‍चों को छोड़ आया। धन को छोड़ आया, मान प्रतिष्‍ठा को, पद को अहंकार को छोड़ आया। तू प्रख्‍यात था, इतने लोग जानते थे, सैकड़ों लोगों का तू गुरु था। अब उसको छोड़ कर महावीर के चरणों में गिर गया। सब छोड़ आया। तो महावीर कहते है, तूने पूरे सागर को छोड़ दिया गौतम, लेकिन अब तू किनारे को पकड़कर अटक गया। तूने मुझे पकड़ लिया। किनारे को पकड़े लिया? अब मुझे भी छोड़।
जो श्रेष्‍ठतम गुरु है, उनका अंतिम काम यही है कि जब उनका शिष्‍य सब छोड़ कर उन्‍हें पकड़ ले, तो तब तक तो वे पकड़ने दें जब तक यह पकड़ना शेष को छोड़ने में सहयोगी हो, और जब सब छूट जाये तब वे अपने से भी छूटने में शिष्‍य को साथ दे। जो गुरु अपने से शिष्‍य को नहीं छुड़ा पाता, वह गुरु नहीं है। यह महावीर का वचन है, कि अब तू मुझे भी छोड़ दे, किनारे को भी छोड़ दे। सब छोड़ चुका, अब नदी भी पार कर गया, अब किनारे को पकड़ कर भी तो नदी में हो सकता है। और फिर किनारा भी बाधा बन जायेगा, माना किनारा नदी नहीं है, नदी तू पार कर चूका, फिर भी अभी भी नदी में ही तू तो है। किनारा चढ़ने को है, बाधा बनने को नहीं। इसे भी छोड़ दे और इसके भी पार हो जा।
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महावीर वाणी * ओशो

= *आसै आसण का अंग ६४(३३/३६)* =

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卐 सत्यराम सा 卐
*दादू मन चित आतम देखिये, लागा है किस ठौर?*
*जहँ लागा तैसा जाणिये, का देखै दादू और ॥*
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**श्री रज्जबवाणी** 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
*आसै आसण का अंग ६४*
मनवा निकस्या धूम ज्यों, सांई शून्य समान१ । 
अंश अंश कन जायगा, प्राणी पावक जान ॥३३॥ 
धुआँ अग्नि से निकल कर आकाश में लय१ होता है और अग्नि का अंश अग्नि अपने अंशी व्यापक अग्नि में समा१ जाता है, वैसे ही मन निकल कर ईश्वर के माया भाग में समाये१गा और चेतन में समायेगा । 
रत्न ॠद्धि निधि सिद्धि पदारथ, मुक्ति भक्ति हरि राज । 
रज्जब रुचे सु लेहु भज, जाके जासौं काज ॥३४॥ 
रत्न, ऋद्धि, निधि, सिद्धि, अन्यान्य पदार्थ, राज्य, भक्ति मुक्ति और हरि इनमें से जो प्रिय लगे और जिसका जिससे कार्य हो वह उसका चिन्तन करके ही प्राप्त करता है । 
ब्रह्म जीव काया करम, लिखे जु लच्छी१ माँहिं । 
रज्जब रुचे२ सु लेहि जिव, दात हिं दूषण नाँहिं ॥३५॥ 
ब्रह्म, जीव, शरीर, कर्म, लक्ष्मी१, इनमें जिसकी इच्छा करे, उसकी प्राप्ति का साधन करके उसे ही प्राप्त कर सकता है ऐसा प्राणी के भीतर अंकित है किन्तु प्राणी को जो प्रिय२ लगता है, उसे ही प्राप्त करता है । इसमें देने वाले ईश्वर का दोष नहीं दिया जा सकता । 
विविध भाँति की बंदगी, दीसै मांड१ मँझार । 
गाहक गौ२ की लेयगा, रज्जब रुचि व्यवहार ॥३६॥ 
ब्रह्माण्ड१ में नाना प्रकार की सेवाएँ दीखती हैं किन्तु ग्राहक तो अपने मतलब२ की सेवा ही ग्रहण करेगा, सभी का रुचि के अनुसार ही व्यवहार होता है । 
(क्रमशः)

परिचय का अंग २२६/२२९

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श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य ।
साभार विद्युत संस्करण ~ महामंडलेश्वर स्वामी अर्जुनदास जी महाराज,श्री दादूद्वारा बगड,झुंझुनू ।
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ Tapasvi Ram Gopal
(श्री दादूवाणी ~ परिचय का अंग)
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संतप्रवर महर्षि श्रीदादूदयाल जी महाराज बता रहे हैं कि ::
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नमाज सिजदा
दादू हौज हजूरी दिल ही भीतरि, गुसल हमारा सारं ।
उजू साजि अलह के आगे, तहाँ नमाज गुजारं ॥२२६॥
दादू काया मसीत कर पंच जमाती, मन ही मुल्ला इमामं ।
आप अलेख इलाही आगे, तहँ सिजदा करे सलामं ॥२२७॥
दादू सब तन तसबी कहै करीमं, ऐसा करले जापं ।
रोजा एक दूर कर दूजा, कलमा आपै आपं ॥२२८॥
दादू आठों पहर अलह के आगै, इकटक रहिबा ध्यानं ।
आपै आप अर्श के ऊपर, जहाँ रहै रहमानं ॥२२९॥
प्रभु प्रेमरूपी अमृत से भरा हुआ मेरा हृदय ही दर्शनरूप स्नान करने के लिए शुद्ध सरोवर है । पञ्चविषयों से रहित पाँच ज्ञानेन्द्रियों को शुद्ध करना ही प्रक्षालनकर्म(उजू) है ।
न केवल दोनों हाथ-पैर और मुंह धो लेना ही प्रक्षालनकर्म है । मैं तो, उन इन्द्रियों को पवित्र कर, उपासना करता हूँ और मेरी ये पाँचों इन्द्रियाँ ही प्रार्थना में सहायकरूप(जमाती) है और मेरा मन ही प्रधान प्रर्थना करनेवाला(बांग मारने वाला) मुल्ला है । वहीं पर मैं उपासना करता हूँ ।
इसलिए हे मुसलामानों ! तुम इस शरीर को ही माला बना कर उस दयालु परमात्मा का भजन करो । सब प्राणियों को एक भाव से देखना ही व्रत(रोजा) रखना है ।
स्वस्वरूप में स्थित रहना ही मन्त्र(कलमा) पढ़ना है । इस प्रकार की उपासना विधि के अपनाने से तुम भी मुक्त हो जाओगे । मरणपर्यन्त दिन रात प्रभु का ध्यान करना चाहिये । अपने मन को विषयों की तरफ जाने के लिये कुछ भी मौका नहीं देना चाहिये ॥२२६-२२९॥
(क्रमशः)

रविवार, 24 फ़रवरी 2019

= सुन्दर पदावली(१६.राग सोरठ - ७/१) =

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॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥ 
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली* 
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी, 
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान) 
*= १६. राग सोरठ =*
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(७/१) 
*हमारै साहु रमइया मौटा,*
*हम ताके आहि बनौटा ॥टेक॥*
*यह हाट दई जिनि काया,*
*अपना करि जांनि बैठाया ।*
*पूंजी कौ अंत न पारा,*
*हम बहुत करी भंडसारा ॥१॥*
*लई बस्तु अमोलक सारी,*
*सब छाडि बिषै षलि षारी ।*
*भरि राष्यौ सब ही भैंना,*
*कोई षाली रह्यौ न कौंना ॥२॥* 
आध्यात्मिक सिद्ध ही राम तक पहुँचाने में समर्थ – हमारे इस आध्यात्मिक व्यापार का सर्वोच्च नियन्त्रक राम प्रभु हैं । हम तो उसके एक छोटे कारिन्दा के रूप में साधारण आध्यात्मिक व्यापारी हैं ॥टेक॥ 
उस व्यापार के लिये हमारा यह शरीर ही दुकान है । मालिक(नियन्त्रक) अपना आदमी समझकर इसका उत्तरदायित्व हमको सौंपा है । इस दुकान में व्यापार में लगी हुई पूँजी का कोई अंत नहीं है । विक्रय हेतु इसमें रखी गयी वस्तुओं की भी कोई सीमा नहीं है । हमने इसमें बहुत समान एकत्र कर लिया है ॥१॥ 
इसमें निहित सभी वस्तुएँ अमूल्य हैं । हमने व्यर्थ की वस्तुओं को इस दूकान से दूर ही रखा है । मूल्यवान वस्तुओं से ही समस्त दुकान भरी पड़ी है । इसका कोई एक कोना भी खाली नहीं है ॥२॥
(क्रमशः)

= १५० =

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*योग समाधि सुख सुरति सौं, सहजैं सहजैं आव ।*
*मुक्ता द्वारा महल का, इहै भक्ति का भाव ॥* 
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साभार ~ @Punjabhai Bharadiya

ऐसा हुआ एक बहुत अदभुत जादूगर हुआ: हुदिनी। और उसके जीवन में उसने बड़े चमत्कार किए, जैसा की कोई दूसरा जादूगर कभी नहीं कर पाया है। और वह आदमी बड़े गजब का आदमी था। और उसने सदा यह स्वीकार किया है कि ये सिर्फ हाथ की सफाईयां हैं। उसने कभी धोखा न दिया। 
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उसने ऐसी हजारों बातें कीं, कि जिनको अगर वह चाहता तो दुनिया का सबसे बड़ा अवतारी पुरुष हो जाता। तुम्हारे साईबाबा इत्यादि सब फीके हैं, दो कौड़ी के हैं। हुदिनी की कला बड़ी अनूठी थी। दुनिया में ऐसा कोई ताला नहीं है, जो उसने सेकेंड में न खोल दिया हो। उसके ऊपर जंजीरें बांधी गई, हथकड़ियां बांधी गई, पानी में सागर में फेंका गया। सेकेंड न लगे और वह बाहर आ गया, सब जंजीरें अलग। जेलखानों में डाला गया; इंग्लैंड के जेलखानों में, अमेरिका के जेलखानों में, स्पेन के जेलखानों में, सख्त से सख्त जहां पहरा है, क्षणभर बाद वह बाहर खड़ा है। 
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कोई समझ नहीं पाए, कि वह कैसे बाहर आता? क्या होता? उसने सब व्यवस्था तुड़वा दी। लेकिन उसने कभी कहा नहीं, कि मैं कोई सिद्ध पुरुष हूं। उसने इतना ही कहा, कि सब हाथ की सफाई है।
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लेकिन एक बार वह मुश्किल में पड़ गया। फ्रांस में पेरिस में वह प्रयोग कर रहा था। सारी दुनिया में वह सफल हुआ, वहां आकर हार गया। एक जेलखाने में उसे डाला गया, जहां से उसे निकलकर आना था। जिंदगीभर में वह बड़े से बड़े जेलखानों से निकल गया। और ऐसी भी जंजीरें हो, उसने खोल लीं बिना किसी चाबियों के। क्या थी उसकी कला, बड़ा कठिन है कहना। और कभी उसने दावा किया नहीं, कि मैं कोई चमत्कारी हू, या कोई ईश्वरी व्यक्ति हूं, कुछ भी नहीं।
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मगर वहां वह हार गया। जो आदमी तीन सेकेंड में बाहर आ जाता और ज्यादा से ज्यादा तीन मिनट लेता, उसको तीन घंटे लग गए और वह बाहर न आया। लोग घबड़ा गए। बाहर हजारों लोगों की भीड़ थी देखने। क्या हो गया?
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मामला यह हुआ कि मजाक की थी पुलिस अधिकारियों ने। ताला लगाया ही न था, दरवाजा खुला छोड़ दिया था; और वह ताला खोज रहा था। ताला हो तो खोल ले। ताला था नहीं वह घबड़ा गया। उसे यह खयाल भी न आया घबड़ाहट में कि दरवाजा सिर्फ अटका है। वह इतना परेशान हो गया कि ताला छिपा कहां है? कहीं न कहीं ताला होगा। सब कोने-कातर छान डाले। कमरे के दूसरी तरफ छान डाला। हो सकता है, कोई धोखे का दरवाजा लगा है जो दिखाई न पड़ता हो दरवाजा और वह यह दरवाजा न हो। दीवाल का कोना-कोना छान गया लेकिन कहीं कोई ताला हो, तो मिल जाए। और जब ताला ही न हो, तो तुम्हारे पास कोई भी चाबी हो, तो क्या खाक काम आएगी?
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तीन घंटे बाद भी वह न निकलता। निकलने का कारण तो यह हुआ, कि वह इतना थक गया और पसीने-पसीने हो गया, कि बेहोश होकर गिर पड़ा। धक्का लगने से दरवाजा खुल गया। वह बाहर पड़े थे। पहली दफा जिंदगी में वह असफल हुआ। मजाक के सामने जादू हार गया।
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कारण? कारण वही है, जो हर आदमी की जिंदगी में घट रहा है। तुम परमात्मा के दरवाजे पर अगर हार रहे हो, तो कारण यह है, कि तुम ताला खोज रहे हो। और ताला वहां है नहीं।
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मुक्ता द्वार महल का--उस महल का द्वार मुक्त है, खुला है। अटका भी नहीं है। उतनी भी जरूरत नहीं है कि तुम बेहोश होकर गिरो, धक्का लगे, जब कहीं द्वार खुले। दरवाजा खुला ही है।
जोग समाधि सुख सुरति सों, सहजै सहजै आव।
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और इतनी सहजता से परमात्मा में प्रवेश हो जाता है, कि तुम नाहक ही बड़े जतन कर करके अपने को थका रहे हो, पसीना-पसीना कर रहे हो। कोई शीर्षासन लगाए खड़ा है, कोई उल्टी-सीधी कवायद कर रहा है, कोई योग साध रहा है, कोई नाक बंद किए, श्वास को रोके हुए है, कोई कानों में उंगलियां डाले हुए है, कोई आंखों को दबाकर प्रकाश देख रहा है।
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हजार तरह की नासमझियां, सारे संसार में प्रचलित हैं। वे सब कुंजियां हैं खोलने की उस ताले को, जो ताला है ही नहीं; उस द्वार को खोलने के उपाय, जो खुला ही है। तुम्हारे उपाय ही तुम्हारे द्वार को खुलने न देंगे।

ओशो.
पिव पिव लागी प्यास(प्रवचन-7)