शुक्रवार, 31 मार्च 2023

*२९. संजीवन कौ अंग ९/१२*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*२९. संजीवन कौ अंग ९/१२*
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जगजीवन जांमन मरन१, हरि भजि भरम बिलाइ ।
सकल साध जहँ रहि रह्या, तहँ मन रह्या समाइ ॥९॥
(१. जांमन मरन=जन्म मरण)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जन्म मृत्यु का संशय प्रभु भजन से मिटा दीजिये । जहाँ सभी साधुजन आनंद से रहते हैं उसी प्रभु शरण में मन समाये रखें ।
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देह बिसरजन२ आतमां, गुण तजि आगै जाइ ।
सुरति न पाछै बाहुड़ै, काल करम नहिं ताहि ॥१०॥
{२. बिसरजन=विसर्जन(त्याग)}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि देह के सभी गुण त्याग करदेह भाव छोड़़ दें कि यह मेरी है । फिर कभी ध्यान पलट कर इसमें आये ही नहीं तो जीव काल कर्म से मुक्त होता है ।
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हरि भजि आवरदा३ बधै, रांम सुमरि बच मींच ।
(कहि) जगजीवन म्रितक जिवै, अमर अमीरस सींच ॥११॥
(३. आवरदा=आयु)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हरि स्मरण से आयु बढती है राम स्मरण से मृत्यु भय मिटता है । ऐसी स्थिति में जीव अंहकार रहित हो अमर हो अमृत्व से सिंचित होता है ।
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अम्रित नांम अलेख का, सदा संजीवनि सोइ ।
कहि जगजीवन रांम हरि, भजतां होइ सो होइ ॥१२॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि प्रभु का नाम अमृत है । वह सदा संजीवनी जैसा है जो जीव को जगाये रखता है । संत कहते हैं कि स्मरण करने से अगर कुछ हो तो होता रहे संत परवाह नहीं करते हैं ।
(क्रमशः)

*नारायण भट्ट*

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*दादू दत्त दरबार का, को साधु बांटै आइ ।*
*तहाँ राम रस पाइये, जहँ साधु तहँ जाइ ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ साधु का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*नारायण भट्ट*
*छप्पय-*
*श्रीनारायण भट्ट प्रभु, ब्रज-वल्लभ१ वल्लभ२ लगे ॥*
*नाचन गावन सरस, रास मण्डल रस वर्षे ।*
*ललितादिकन विहार, देख दंपति मन हर्षे ॥*
*महिमा बहु व्रज भई, देश उद्धारक जिय की ।*
*उत्सव प्रचुर प्रमाण, चाह इक है प्रिया पिय की ॥*
*राघव संत समाज में, प्रेम मगन निशि दिन जगे।*
*श्रीनारायण भट्ट प्रभु, व्रज वल्लभ वल्लभ लगै ॥२५३॥*
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श्रीनारायण भट्ट को व्रजवल्लभ प्रभु श्रीकृष्ण१ ही प्रिय२ लगते थे।
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आपका नाचना और गाना बड़ा ही सरस होता था। रास मंडल के समय आपके द्वारा महान् आनन्द की वर्षा होती थी। ललितादिक सखियों का विहार देखकर श्रीराधाकृष्णजी का मन वा दर्शक दंपतियों का मन हर्षित होता था।
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देश के जीवों का उद्धार करने वाली व्रज महिमा आपके द्वारा बहुत बढ़ गई थी। आप बहुत प्रमाण में भगवत् संबन्धी उत्सव कराया करते थे। आपके मन में एकमात्र श्रीराधाकृष्णजी के दर्शन की ही इच्छा रहती थी।
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आप संत समाज में प्रभुप्रेम में निमग्न होकर रात्रि दिन जगते रहते थे ॥२५३॥
(क्रमशः)

गुरुवार, 30 मार्च 2023

*भावावेश में श्रीरामकृष्ण*

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*सो शर लागि प्रेम प्रकाशा, प्रकटी प्रीतम वाणी ।*
*दादू दीन दयाल ही जानै, सुख में सुरति समानी ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ पद्यांश. २०३)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*(६)भावावेश में श्रीरामकृष्ण*
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रथ के सामने कीर्तन और नृत्य करके श्रीरामकृष्ण कमरे में आकर बैठे । मणि आदि भक्त उनकी चरण-सेवा कर रहे हैं ।
भावमग्न होकर नरेन्द्र तानपूरा लेकर फिर गाने लगे - "ऐ प्राणों की पुतली, माँ, हृदयरमा, तू हृदय-आसन में आकर आसीन हो, मैं तेरा निरीक्षण करूँ ।”
"त्रिगुणरूपधारिणी, परात्परा तारा तुम्हीं हो ।" “तुम्हीं को मैंने अपने जीवन का ध्रुवतारा बना लिया है ।"
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एक भक्त ने नरेन्द्र से कहा - क्या तुम वह गाना गाओगे – ‘ऐ अन्तर्यामिनी माँ, तुम हृदय में सदा ही जाग रही हो ।’
श्रीरामकृष्ण – चल, इस समय ये सब गाने क्यों ? इस समय आनन्द के गीत हो – ‘श्यामा सुधा-तरंगिणी ।’
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नरेन्द्र गा रहे हैं । श्रीरामकृष्ण गाना सुनते ही प्रेमोन्मत्त होकर नृत्य करने लगे । बड़ी दिर तक नृत्य करने के बाद उन्होंने आसन ग्रहण किया । भावावेश में नरेन्द्र की आँखों में आँसू आ गये । श्रीरामकृष्ण को देखकर बड़ा आनन्द हुआ । रात के नौ बजे का समय होगा । अब भी भक्तों के साथ श्रीरामकृष्ण बैठे हुए वैष्णवचरण का गाना सुन रहे हैं ।
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वैष्णवचरण ने दो गाने और गाये । तब तक रात के दस-ग्यारह बजे का समय हो गया । भक्तगण प्रणाम करके विदा हो रहे हैं ।
श्रीरामकृष्ण - अच्छा, अब सब लोग घर जाओ । (नरेन्द्र और छोटे नरेंद्र की ओर इशारा करके) इन दोनों के रहने ही से हो जायेगा । (गिरीश से) क्या घर जाकर भोजन करोगे ? रहना चाहो तो कुछ देर रहो । तम्बाकू ! - अरे, बलराम का नौकर भी वैसा ही है । बुलाकर देखो - हरगिज न देगा । (सब हँसते हैं) परन्तु तुम तम्बाकू पीकर जाना ।
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श्रीयुत गिरीश के साथ चश्मा लगाये हुए उनके एक मित्र आये हैं । वे सब कुछ देख सुनकर चले गये । श्रीरामकृष्ण गिरीश से कह रहे हैं - "तुमसे तथा अन्य सभी से कहता हूँ, जबरदस्ती किसी को न ले आया करो, - बिना समय के आये कुछ नहीं होता ।"
एक भक्त ने प्रणाम किया । साथ एक छोटा लड़का है । श्रीरामकृष्ण सस्नेह कह रहे हैं - "अच्छा, बड़ी देर हो गयी है, फिर यह लड़का भी साथ है ।" नरेन्द्र, छोटे नरेन्द्र तथा दो-एक भक्त और कुछ देर रहकर घर गये ।
(क्रमशः)

*श्री रज्जबवाणी पद ~ १३०*

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*दादू सिद्धि हमारे सांइयां, करामात करतार ।*
*ऋद्धि हमारे राम है, आगम अलख अपार ॥*
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*श्री रज्जबवाणी पद ~ भाग २*
राग केदार ८(संध्या ६ से ९ रात्रि)
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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१३० अनन्यता । त्रिताल
हमारे सब ही विधि करतार,
धर्म नेम१ अरु योग यज्ञ जप, साधन सांई सार ॥टेक॥
पूजा२ अर्चा नौधा नामहि, शोधि३ किया व्यवहार ।
तीर्थ वरत सु नाम तुम्हारा, और नहीं अधिकार ॥१॥
वेद पुराण भेष पख४ भूधर८, तुझ शिर भर५ भार ।
बुधि विवेक बल ज्ञान गुसांई, और नहीं आधार ॥२॥
सकल धर्म करतूत६ कमाई, सब तुम ऊपर वार७ ।
जन रज्जब के जीवन रामा, निशि दिन मंगल चार ॥३॥११॥
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अपनी अनन्यता दिखा रहे हैं -
✦ सभी प्रकार से हमारे आश्रय सृष्टि कर्त्ता प्रभु ही हैं । धर्म, नियम१, योग, जप, सार रूप साधन, ये सब हमारे तो प्रभु ही हैं ।
✦ हमारी प्रतिष्ठा२ भी प्रभु कृपा ही है । हमारी अर्चना भक्ति तथा नवधा भक्ति प्रभु का नाम ही है । यह वचन बोलना रूप व्यवहार हमने विचार३ करके ही किया है । हमारे तीर्थ व्रत भी आपका नाम ही है । आपके बिना हम अपनत्त्व का अधिकार अन्य पर नहीं रखते अर्थात हम आपके बिना अन्य किसी को भी अपना नहीं समझते ।
✦ हे पृथ्वी८ को धारण करने वाले प्रभु ! आप ही हमारे वेद पुराण और भेष आदि की पक्ष४ हैं । आपके शिर पर ही हमारा पूरा५ भार है । प्रभो ! हमारे बुद्धि, विवेक, बल, ज्ञान आप ही हैं । आपके बिना हमारा आधार और कोई नहीं है ।
✦ हम अपना संपूर्ण धर्म और कर्म६ रूप कमाई आप पर निछावर७ करते हैं । हे राम ! आप ही हमारे जीवन रूप हैं । आप की कृपा से ही हमारे रात्रि दिन मंगल का आचार व्यवहार होता रहता है ।
(क्रमशः)

शब्दस्कन्ध ~ पद #३११

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🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
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भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामीआत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामीअर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #३११)*
*राग सोरठ ॥१९॥**(गायन समय रात्रि ९ से १२)*
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*३११. परिचय हैरान । खेमटा ताल*
*राम राइ ! मोको अचरज आवै, तेरा पार न कोई पावै ॥टेक॥*
*ब्रह्मादिक सनकादिक नारद, नेति नेति जे गावै ।*
*शरण तुम्हारी रहै निशवासर, तिनको तूँ न लखावै ॥१॥*
*शंकर शेष सबै सुर मुनिजन, तिनको तूँ न जनावै ।*
*तीन लोक रटैं रसना भर, तिनको तूँ न दिखावै ॥२॥*
*दीन लीन राम रंग राते, तिनको तूँ संग लावै ।*
*अपने अंग की युक्ति न जानै, सो मन तेरे भावै ॥३॥*
*सेवा संजम करें जप पूजा, शब्द न तिनको सुनावै ।*
*मैं अछोप हीन मति मेरी, दादू को दिखलावै ॥४॥*
इति राग सोरठ समाप्त ॥१९॥पद १४॥
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भा०दी०-हे विश्वाधिप राम ! तव साक्षात्कारं कुर्वता भयाऽऽश्चर्यमयं तव स्वरूपं दृष्टम् । तस्य पारावार न कोऽपि वेत्तुमर्हति । ब्रह्मादिदैवैः सनकादिमुनिभिर्नारदादिदेवर्षिभिनेति नेति शब्दरेव व्यवहीयन्ते । ये सततं त्वां शरणागतास्तेऽपि तवाद्यन्तं मध्यावधिं न जानन्ति । ये च तव बहुप्रिया: शङ्करशेषादयो देवा मुनयश्च दर्शनक्षमा अप्याद्यन्तं न ज्ञातवन्तः । अन्य चापि भक्ता नामप्रिया ये सततं नाम स्मरन्ति तव, तेऽप्याद्यन्त ज्ञानशून्या एव किन्तु तव भक्तिरसिका निरहंकारिणः प्रेमानुरक्ता- स्तल्लीना दीनभावेन त्वामुपासते ते त्वय्यभिन्नाः सन्तस्त्वद्रूपा भवन्ति शरीरासक्तिरहिता निष्किञ्चना भक्ता एव ते प्रिया भवन्ति । ते निरभिमानेन संयमितास्त्वां पूजयन्ति, तान्नपि त्वं वाक्यैकमपि न श्रावय । अहं तु निर्बुद्धिर्नहि बुद्धि बलेन त्वां ज्ञातुं स्पष्टुं वा शक्नोमि । किन्तु दीनभावेन निरभिमानेन च तव प्रपन्नो भक्तोऽस्मि । दयया स्वस्वरूपं दर्शय माम् ।
उक्तं वा. रा.
सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते ।
अभय सर्वभूतेभ्यो ददान्येतद्वतं मम ॥

श्री वैष्णव महारामायणे
प्रपन्नेति पदतु स्तूपाय त्वस्थानमुच्यते ।
उपायत्व भगवतस्तवेतिपदतस्तथा ॥
इति महाण्डलेश्वर श्रीमदात्मारामकृत भावार्थदीपिकायां रागसोरठः समाप्तः ॥ १९॥
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हे विश्व के स्वामी राम ! आपका साक्षात्कार करते हुए मैंने आपके आश्चर्यमय स्वरूप को देखा । आपके स्वरूप का वारापार कोई जान ही नहीं सकता । ब्रह्मा आदि देवता, सनकादि ऋषि, नारद आदि देवर्षि भी नेति-नेति शब्दों से जान पाए । जो सतत आपके ही शरण में रहते हैं, वे भी आपका आदि-अन्त को नहीं जान पाये ।
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जो आपके प्रिय शंकर, शेष आदि दर्शनों के योग्य हैं, वे भी आपके आदि-अन्त को नहीं जान सके । जो आपके भक्ति रस के रसिक निरहंकारी प्रेम में अनुरक्त आपमें लीन हुए दीन भाव से आपकी उपासना करते हैं, वे तो आपके स्वरूप ही हो गये । शरीर की आसक्ति से रहित निष्किञ्चन भक्त ही आपको प्रिय हैं । वे निरभिमानी भक्त संयम-पूर्वक आपको पूजते हैं, उनको भी आपने अपने विषय में एक वाक्य भी तो नहीं कहा । अब आप ही देखिये कि मैं तो निर्बुद्धि निर्बल हूं । अपने बुद्धि बल से तो आपको जान नहीं सकता किन्तु मैं तो आपका प्रिय भक्त हूं सो दया करके दर्शन दीजिये ।
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वाल्मीक रा. –
जो एक बार भी शरण में आकर ‘मैं आपका हूं’ ऐसा कह कर मुझ से रक्षा की प्रार्थना करता है, उसे मैं समस्त प्राणियों में अभय कर देता हूं । यह मेरा सदा का व्रत है । इस मन्त्र के प्रपन्न शब्द से प्रपत्ति शरणागति या भगवत्कृपावलम्बन को ही परम साधन या उपाय कहा है । प्रभु कृपा पर ही अवलम्बित रहना ही मन्त्र का अनुसंधानार्थ है ।
इति राग सोरठ का पं. आत्मारामस्वामीकृत भाषानुवाद समाप्त ॥१९॥
(क्रमशः)

नैंननि देषि देषि देषि

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*पारब्रह्म सूं प्रीति निरन्तर,*
*राम रसायन भर पीवै ।*
*सदा आनन्द सुखी साचे सौं,*
*कहै दादू सो जन जीवै ॥*
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*संत टीला पदावली*
*संपादक ~ ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी*
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राग मारूकनबड़ौ ॥७॥
नैंननि देषि देषि देषि१, सोभित सुंदर सुष पायौ ।
सबहिन के जीवनि प्रांन, सो मेंरैं ग्रिह आयौ ॥टेक॥
मधुर बैंन निरमल नैंन, सुंदर सुषदाई ।
अन्तरगति हरि सूं रत, रहे रांम समाई ॥
परमभाग उदै जाग, चितवत सोइ पायौ ।
निरषि नैंन मुदित बैंन, आनद बधायौ ॥
जीवनि के२ भाग देषौ, साहिब रांम पठायौ ।
टीला गुर दादू देषि, साधनि सुष पायौ ॥३९॥
(पाठान्तर : १. तीन बार ‘देषि’ न होकर दो बार है, २. कौ ।)
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महाराज दादूजी से मिलने पर टीलाजी के मन में क्या-क्या भाव आए, का विवरण इस पद में है । शोभायमान सुन्दर शरीर को देख-देखकर मेरे नेत्रों ने अपार सुख पाया । गुरु महाराज दादूजी सभी के जीवनप्राण=सर्वस्व हैं । वे मेरे गृह में आ गए । मेरे हृदय में बस गए ।
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उनके वचन मधुर हैं, नयन निर्मल हैं, वृत्ति सुन्दर-उत्तम और सुखों को देने वाली है । उनका अन्तःकरण=मन सर्वतोभावेन परात्पर-परब्रह्म हरि में रत रहता है । वे सदैव रामजी में समाए रहते हैं ।
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मेरे परमभाग्य का उदय हुआ कि गुरु धारण करने का विचार मन में आते ही वे मेरे को तत्काल मिल गए । आँखों से देखकर और हर्षित करने वाले वचनों से संभाषण करके उन्होंने मेरे आनन्द को अनन्त गुणा बढ़ा दिया ।
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जीवों के भाग्य को देखो उनको परमानन्द का लाभ देने को परमात्मा ने ही अपने स्वरूपभूत रामजी रूप दादूजी को संसार में भेजा । टीला कहता है, गुरु महाराज दादूजी को देखकर साधुओं ने अनन्तानन्त अखण्ड सुख पाया ॥३९॥
(क्रमशः)

बुधवार, 29 मार्च 2023

*२९. संजीवन कौ अंग ५/८*

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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*२९. संजीवन कौ अंग ५/८*
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जीव रहै निरजीव मंहि, नांम संजीवनि त्यागि ।
कहि जगजीवन टापरै३, ताथैं लागी आगि ॥५॥
(३. टापरै=ऊसर भूमि)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जीव प्रभु में रहे व स्मरण न करें जो कि संजीवनी जैसा है जिससे जीव स्थित है तो फिर समझिये कि ऊसर भूमि भी दह उठी हो । जो अविकारी है । उसका स्मरण न करना ही विकार हो जाता है ।
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जीव रहै सर जीव मंहि, सदा अमर सोइ साध ।
कहि जगजीवन तहँ रहै, जे हरि अलख अगाध ॥६॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जो जीव सदा प्रभु शरण में रहे वह अमर है वह वहां रहता है जहाँ प्रभु रहते हैं ।
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जाण्यां सो जीवै सुखी, अविनासी का अंग ।
जगजीवन तन खोजि हरि, निरभै पायौ संग ॥७॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जिसने प्रभु को जान लिया वह सुखी है वह प्रभु का अंग हो गया उसने देह में ही परमात्मा ढूंढ कर उनका सानिध्य पा लिया है ।
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जगजीवन हरि सेविये, पड़न४ न दीजै४ देह ।
कीजै प्रीती एक सौं, दिन दिन दूंना नेह ॥८॥
(४-४. पड़न न दीजै=गिरने न दे)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि प्रभु की सेवा प्रभु ध्यान कीजिये देह गिरने से पहले । एक परमात्मा से ही दिन दिन द्विगुणित होता स्नेह करें ।
(क्रमशः)

मंगलवार, 28 मार्च 2023

*श्रीनाथ भट्ट*

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*ज्यों ज्यों होवै त्यों कहै, घट बध कहै न जाइ ।*
*दादू सो सुध आत्मा, साधू परसै आइ ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ साधु का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*श्रीनाथ भट्ट*
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*छप्पय-*
*गोविन्द इष्ट शिर भक्त-भूप१,*
*मधुर वचन श्रीनाथ भट्ट ॥*
*श्रुति स्मृति अरु शास्त्र,*
*पुराण भारत भल खोले।*
*सब ग्रंथन को सार,*
*आप पारा ज्यौं जो ले ॥*
*पूरवजा२ जिमि कह्यो,*
*आदि श्रीरूप सनातन।*
*नारायण भट जीव,*
*हृदय धार्यो सोई पन ॥*
*गोपाल अपत्य३ कुल नाग के,*
*दास भाव प्रेमा अघट ।*
*गोविन्द इष्ट शिर भक्त भूप,*
*मधुर वचन श्रीनाथ भट ॥२५२॥*
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भक्त-राज१ श्रीनाथ भट्ट ने मस्तक पर श्रीगोविन्दजी को ही इष्ट रूप में रखा था तथा सदा मधुर वचन ही बोला करते थे।
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श्रुति, स्मृति, शाख, पुराण और महाभारतादि सद् ग्रंथों का प्रवचन भली भांति खोलकर करते थे। जैसे पारा राख में पड़े हुये जो स्वर्ण कण होते हैं, उनको संग्रह कर लेता है, उसी प्रकार आपने सब सद् ग्रन्थों का सार अपने हृदय में संग्रह कर लिया था।
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अपने से पूर्व में उत्पन्न२ हुये महापुरुष-रूप, सनातन, नारायण भट्ट और जीवगोस्वामी आदि ने जैसे भक्ति करने का प्रकार कहा था, उसी प्रकार भक्ति करने का प्रण आपने अपने हृदय में धारण किया था।
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आप ऊँचे गाँव वाले नागवंशी गोपालदासजी के पुत्र३ थे और दास भाव के भक्त थे। आपकी प्रेमा भक्ति अघट(बेजोड़ थी) अर्थात् सबसे विलक्षण थी ॥२५२॥
(क्रमशः)

सोमवार, 27 मार्च 2023

= १८ =

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*काया की संगति तजै, बैठा हरि पद मांहि ।*
*दादू निर्भय ह्वै रहै, कोई गुण व्यापै नांहि ॥*
*काया मांही भय घणा, सब गुण व्यापैं आइ ।*
*दादू निर्भय घर किया, रहे नूर में जाइ ॥*
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*साभार : @Subhash Jain*
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यह तो जिंदगी का सिर्फ उपहास है जिसे हम जिंदगी कह रहे हैं यह तो जिंदगी का र्सिफ् ढोंग है जिसे हम जिंदगी कहते हैं । यह तो जिंदगी का सिर्फ एक सपना ।
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काँटों को देखकर मत रुक जाना; पूछना हो जिंदगी का राज, फूलों से पूछना । मरनेवालों से मत पूछना, पूछना हो राज़ तो उनसे पूछना जिन्हें अमृत का कुछ अनुभव हुआ है । जिंदगी का राज़ पूछना हो तो हँसते हुए फूल से पूछना । उसे पता है मौत के बीच हँसने की कला । चारों तरफ मौत घिरी है और फूल है मुस्कुराए चला जाता है । चारों तरफ मौत धिरी है और दिया है कि जला चले जा रहा है । 
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चारों तरफ मौत तो सबके घिरी है—तुम्हारे, मेरे, बुद्ध के, कृष्ण के, क्राइस्ट के; लेकिन तुम मौत से घबड़ा रहे हो और बुद्ध मौत से नहीं घबड़ा रहे हैं, इतना ही फर्क है । तुम्हारी घबड़ाहट में तुम मौत से दबे जा रहे हो । बुद्ध निर्भय होकर मृत्यु को देख रहे हैं—जो होना है होना है, जैसा होना है वैसा होना है, जैसा हो वैसा हो, ज्यों का त्यों ठहराया । बस इसी क्षण तुम्हारे भीतर एक स्वर पैदा होता है जो शाश्वत का है, एक किरण उतरती है जो परमात्मा की है ।
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हँसने का राज़ क्या है ? हँसने का एक ही राज़ है—मौत का स्वीकार । संन्यासी ही हँस सकता है । तुम्हें पता है क्यों इस देश ने संन्यास के लिए गैरिक वस्त्र चुने ? वह अग्नि का रंग है, लपटों का रंग है । प्राचीन समय में जब किसी को संन्यास देते थे, तो उसे चिता बनाकर उस पर लिटाते थे । फिर चिता में आग लगाते थे और घोषणा करते थे कि तू अब तक जो था, समाप्त हो गया । तेरी तरह तू मर गया । 
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अब उठ और एक नए जीवन में उठ ! जलती चिता से संन्यासी उठता था, फिर उसे नया नाम देते थे, और गैरिक वस्त्र देते थे ताकि याद रखना अग्नि को, लपटों को, मृत्यु को; स्मरण रखना कि जो भी मरणधर्मा है वह तू नहीं है; स्मरण रखना कि जो भी मरेगा, वह तू नहीं है ।
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गर्दन कट जाए तो झंझट मिटे । फिर भय भी मिट जाएगा । जब कट ही गयी, तो कटने को कुछ और बचा नहीं । जब तक है, तब तक भय है । भय के ऊपर उठो ।
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ओशो

*नरेन्द्रादि भक्तों के साथ कीर्तनानन्द में*

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*मैं ही मेरे पोट सिर, मरिये ताके भार ।*
*दादू गुरु प्रसाद सौं, सिर तैं धरी उतार ॥*
*मेरे आगे मैं खड़ा, ता तैं रह्या लुकाइ ।*
*दादू प्रकट पीव है, जे यहु आपा जाइ ॥*
*दादू जीवित मृतक होइ कर, मारग मांही आव ।*
*पहली शीश उतार कर, पीछे धरिये पांव ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ जीवित मृतक का अंग)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*(५)नरेन्द्रादि भक्तों के साथ कीर्तनानन्द में*
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दिन के एक बजे का समय है । भोजन करके श्रीरामकृष्ण फिर बैठकखाने में आकर भक्तों के बीच में बैठे । एक भक्त पूर्ण को बुला लाये हैं । श्रीरामकृष्ण बड़े आनन्द में आकर कहने लगे, 'यह देखो, पूर्ण आ गया ।' नरेन्द्र, छोटे नरेन्द्र, नारायण, हरिपद और दूसरे भक्त श्रीरामकृष्ण के पास बैठे हुए उनसे वार्तालाप कर रहे हैं ।
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छोटे नरेन्द्र - अच्छा, हम लोगों में स्वाधीन इच्छा है या नहीं ?
श्रीरामकृष्ण - मैं क्या हूँ - कौन हूँ, पहले इसे खोज तो लो । 'मैं' की खोज करते ही करते 'वे' निकल पड़ेंगे । 'मैं यन्त्र हूँ, तुम यन्त्री !' चीन का बना हुआ (कलवाला) पुतला चिट्ठी लेकर दूकान चला जाता है, तुमने सुना है ? ईश्वर ही कर्ता हैं । अपने को अकर्ता समझकर कर्ता की तरह काम करते रहो ।
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"जब तक उपाधियाँ हैं, तभी तक अज्ञान हैं । मैं पण्डित हूँ, मैं ज्ञानी हूँ, मैं धनी हूँ, मैं मानी हूँ, मैं कर्ता हूँ, पिता हूँ, गुरु हूँ, यह बस अज्ञान से होता है । ‘मैं यन्त्र हूँ, तुम यन्त्री हो,’ यह ज्ञान है । उस समय सब उपाधियाँ दूर हो जाती हैं । काठ के जल जाने पर फिर शब्द नहीं होता, न ताप रहता है । सब ठण्डा हो जाता है । - शान्तिः शान्तिः शान्तिः ।”
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(नरेन्द्र से) "कुछ गाओ न ।"
नरेन्द्र - घर जाऊँगा, कई काम हैं ।
श्रीरामकृष्ण - हाँ भाई, हम लोगों की बात तुम क्यों सुनने लगे । जिसके पास पूँजी है, उसी के पीछे लोग लगे रहते हैं, और जिसके एक धोती भी साबित नहीं है उसकी बात भला कौन सुनता है ? (सब हँसते हैं)
"तुम गुहों के बगीचे तो जा सकते हो ! जब कभी मैं पूछता हूँ, 'नरेन्द्र कहाँ है ?'' - तो सुनता हूँ, 'गुहों के बगीचे में ।’ - यह बात मैं न कहता, तूने ही तो निकाली ।"
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नरेन्द्र कुछ देर चुप रहे । फिर कहा, 'बाजा नहीं हैं, कैसे गाऊँ ?’
श्रीरामकृष्ण - हमारी जैसी हालत ! - इसी में रहकर गा सको तो गाओ । इस पर बलराम का बन्दोबस्त ।
"बलराम कहता है, 'आप नाव पर ही कलकत्ता आया कीजिये, अगर कभी न बने तभी गाड़ी से आया कीजिये ।'
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(सब हँसते हैं) देखते हो, आज उसने खिलाया है, इसीलिए आज तीसरे पहर भर हम सबों को कसकर नचायेगा । (हास्य) यहाँ से एक दिन उसने गाड़ी की - बारह आने में ! मैंने पूछा, 'क्या बारह आने में दक्षिणेश्वर तक गाड़ी जायेगी ?' उसने कहा, 'हाँ, ऐसा होता है ।' रास्ते में जाते जाते गाड़ी का कुछ हिस्सा ही अलग हो गया !
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(उच्च हास्य) घोड़ा भी बीच-बीच में पैर अड़ाता था । किसी तरह चलता ही न था, गाड़ीवान जब कसकर चाबुक मारता था तब घोड़े के पैर उठते थे । इधर राम खोल बजायेगा और हम लोग नाचेंगे - राम को ताल का भी ज्ञान नहीं है । (सब हँसे) बलराम का यह भाव है, - आप लोग गाइये, बजाइये, नाचिये और मौज कीजिये !" (सब हँसते हैं)
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घर से भोजन कर क्रमश: भक्तगण आते जा रहे हैं ।
महेन्द्र मुखर्जी को दूर से प्रणाम करते हुए देखकर श्रीरामकृष्ण उन्हें प्रणाम कर रहे हैं - फिर सलाम किया । पास के एक नवयुवक भक्त से कह रहे हैं, "उसे बताओ कि इन्होंने सलाम किया - वह 'अल्काट' 'अल्काट' (थिऑसफी के एक महात्मा) ही रटता है ।"
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गृही भक्तों में से अनेकों ने अपने घर की स्त्रियों को भी साथ लाया है - वे श्रीरामकृष्ण के दर्शन करेंगी और रथ के सामने श्रीरामकृष्ण का कीर्तनानन्द देखेंगी । राम और गिरीश आदि भक्त भी आ गये हैं । नवयुवक भक्त भी बहुतसे आ गये हैं ।
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नरेन्द्र गाने लगे –
"वह प्रेम का संचार और कितने दिनों में होगा ?"
बलराम ने आज कीर्तन का बन्दोबस्त किया है - वैष्णवचरण और बनवारी का कीर्तन है । वैष्णवचरण ने गाया - "ऐ मेरी रसने, सदा दुर्गा-नाम का जप कर ।”
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गाने का कुछ अंश सुनते ही श्रीरामकृष्ण समाधिमग्न हो गये । खड़े होकर समाधिस्थ हुए थे - छोटे नरेन्द्र पकड़े हुए हैं । मुख पर हास्य की रेखा प्रकट हो गयी । कमरे भर के भक्त आश्चर्यचकित हो देख रहे हैं । स्त्रियाँ चिक के भीतर से श्रीरामकृष्ण की यह अवस्था देख रही हैं ।
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नाम जपते जपते बड़ी देर के बाद समाथि छूटी । श्रीरामकृष्ण के आसन ग्रहण करने पर वैष्णवचरण ने फिर गाया –
“ऐ विणे, तू हरिनाम कर ।”
अब एक दूसरे कीर्तनिये बनवारी 'रूप' गा रहे हैं । परन्तु वे गाते ही गाते ‘आहा हा, आहा हा’ कहकर भूमिष्ठ होकर प्रणाम करने लगते हैं । इससे कोई श्रोता हँसते हैं, किसी को विरक्ति होती है ।
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पिछला प्रहर हो आया । इस समय बरामदे में श्रीजगन्नाथदेव का वही छोटा रथ ध्वजा-पताकाओं से सुसज्जित करके लाया गया है । श्रीजगन्नाथ, सुभद्रा तथा बलराम चंदन-चर्चित तथा वसन-भूषण और पुष्पमालाओं से सुशोभित हैं । श्रीरामकृष्ण बनवारी का कीर्तन छोड़कर बरामदे में रथ के सामने चले गये । साथ साथ भक्तगण भी गये ।
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श्रीरामकृष्ण ने रथ की रस्सी पकड़ जरा खींचा, फिर रथ के सामने भक्तों के साथ नृत्य और कीर्तन करने लगे । छोटे बरामदे में रथ चलने के साथ ही कीर्तन और नृत्य हो रहा है । उच्च संकीर्तन और खोल का शब्द सुनकर बहुतसे बाहर के लोग वहाँ आ गये । श्रीरामकृष्ण भगवत्प्रेम से मतवाले हो रहे हैं । भक्तगण प्रेमोन्मत्त हो साथ-साथ नाच रहे हैं ।
(क्रमशः)

*श्री रज्जबवाणी पद ~ १२९*

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*दक्षिण जात पश्छिम कैसे आवै,*
*नैन बिन भूल बाट कित पावै ॥*
*विष वन बेलि, अमृत फल चाहै,*
*खाइ हलाहल, अमर उमाहै ॥*
(श्री दादूवाणी ~ पद ३२५)
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*श्री रज्जबवाणी पद ~ भाग २*
राग केदार ८(संध्या ६ से ९ रात्रि)
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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१२९ नाम बिना उद्धार नहीं। कहरवा
भजन बिन भूल पर्यो संसार,
पच्छिम काम जात पूरब दिश्शि, हिरदै नहीं विचार ॥टेक॥
बांछे अधर१ धरे२ सौं लागे, भूले मुग्ध३ गँवार४ ।
खाय हलाहल५ जीयो चाहै, मरत न लागे बार ॥१॥
बैठे शिला समुद्र तिरन को, सो सब बूडणहार ।
नाम बिना नाहीं निस्तारा, कबहु न पहुँचे पार ॥२॥
सुख के काज धसे६ दीरघ७ दु:ख, ताकी सुधि नहिं सार ॥
जन रज्जब यूं जगत विगूचे८, इस माया की लार ॥३॥१०॥
नाम चिन्तन बिना उद्धार नहीं होता यह कह रहे हैं -
✦ संसार के प्राणी नाम चिन्तन को छोड़ कर भ्रम में पड़ रहे हैं, हृदय में विचार न होने के कारण इनकी स्थिति ऐसी है कि - जैसे किसी मनुष्य का कार्य तो पच्छिम दिशा में हो और वह जाय पूर्व दिशा में,
✦ वैसे ही प्राणी चाहते तो ब्रह्म१ को हैं और लगे हुये हैं माया२ की सेवा में । इस प्रकार अज्ञानी४ मूर्ख३ भ्रम में पड़ रहे हैं । जो मनुष्य तीव्र५-विष खाकर जीना चाहता है, उसे मरते तो कुछ भी देर नहीं लगेगी ।
✦ वैसे ही जो नाम का चिंतन न करके मुक्त होना चाहता है, उसे संसार दु:ख में पड़ते हुये भी देर नहीं न लगेगी। समुद्र को तैरने के लिये जो शिला पर बैठ कर समुद्र में उतरते हैं, वे सब डूबने वाले ही हैं । जैसे नाव बिना समुद्र से पार कभी भी नहीं हो सकते, वैसे ही नाम चिंतन बिना उद्धार नहीं हो सकता ।
✦ सांसारिक प्राणी सुख प्राप्ति के लिये महान्७ दु:ख में घुसे६ हुये हैं और जो सुख का सार साधन प्रभु का नाम है, उसका कुछ भी ज्ञान नहीं है । इस प्रकार इस माया के पीछे पड़कर जगत् के प्राणी दु:खी८ हैं ।
(क्रमशः)

शब्दस्कन्ध ~ पद #३१०

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भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामीआत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामीअर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #३१०)*
*राग सोरठ ॥१९॥**(गायन समय रात्रि ९ से १२)*
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*३१०. उपास्य परिचय । वर्ण भिन्न ताल*
*सोई देव पूजूं, जे टांची नहिं घड़िया, गर्भवास नहीं औतरिया ॥टेक॥*
*बिन जल संजम सदा सोइ देवा, भाव भक्ति करूं हरि सेवा ॥१॥*
*पाती प्राण हरि देव चढ़ाऊँ, सहज समाधि प्रेम ल्यौ लाऊँ ॥२॥*
*इहि विधि सेवा सदा तहँ होई, अलख निरंजन लखै न कोई ॥३॥*
*ये पूजा मेरे मन मानै, जिहि विधि होइ सु दादू न जानै ॥४॥*
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भादी०-मदीय उपास्यो देवो निरञ्जननिराकारः सच्चिदानन्दघनरूपं परब्रह्मैव । येन साधनं विनैव केवलं संकल्पमात्रेणेदं ब्रह्माण्डजातमुत्पन्नं कृतम् । न च स गर्भमवतरति, जलं विनैव शुद्धं संयमितं भवति । स च परमात्मा श्रद्धया भक्या च मया पूज्यते । तस्मै प्राणार्पणमेव तुलसी- दलार्पणमस्ति । तस्मिन् प्रेम्णा मनोलयं कृत्वा सहजसमाधौ तत्समीप एव निवसामि । इत्थं तस्य देवस्य ये हृदये सततं सेवा-पूजा भवति । तस्यैतादृशी पूजैव प्रियाऽस्ति । ईदृशी पूजैव मे मनःप्रिया परन्तु सा कथं भवतीति नाहं जानामि । स: स्वयमेव स्वोपासनां जानाति न चान्यः । आमेरनगरे मानसिंह-महाराजेन कदाचित् पृष्टो यद् भवतां कीदृशी सेवापूजा भवति? साऽनेन भजनेन उक्ता उक्तं हि भगवता शङ्कराचार्येण- स्वच्छस्य पाद्यमर्थ्य शुद्धस्याचमनं कुतः । निर्मलस्य कुत: स्नानं वस्त्रं विश्वोदरस्य च ॥ एवमेव परा पूजा सर्वावस्थास सर्वदा ।
एक बुद्ध्या तु देवेश विधेया ब्रह्मवित्तमैः ॥
अत्र गर्भ नावतरतीत्यस्यायमभिप्राय: । गर्भवासो हि स्वकर्मक्रिया पाकजन्य एव जीवानां भवति, तथास्य परमात्मनो नास्ति । ऐतेनेश्वरकर्मपारतन्त्र्यं जीवानामिव निरस्तम् । अतएव प्रजापति- श्चरति गर्भे अन्तरा जायमानो बहुधा विजायते, इति श्रुतिरपि संगच्छते । अजायमानोऽपि बहुधा विजायते । अत्र हि जीवानामिव गर्भवासत्वव्यावृत्तये व्युपसर्ग: सार्थकः, अन्यथा जनी प्रादुर्भाव इति धातुमात्रस्य प्रयोग एव तावदर्थलाभात् तद्वैयर्थ्य स्पष्टमेव ॥
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मेरा उपास्य देव निरंजन सच्चिदानन्द ब्रह्म ही है । जिसने बिना ही साधन के सकल ब्रह्माण्ड को संकल्प मात्र से पैदा कर दिया । वह गर्भवास में नहीं आता । जल के बिना ही सदा संयमित रहता है । मैं उस देव की पूजा श्रद्धा-भाव से करता हूं । मेरे प्राणों का अर्पण ही तुलसी-दल का अर्पण है । उसमें मैं अपने मन को लीन कर सदा उनके पास ही रहता हूं । मेरे हृदय में ब्रह्म की सेवा पूजा की धारा सदा चलती ही रहती है । ऐसी पूजा ही मेरे मन को अच्छी लगती है, परन्तु वह पूजा कैसे होती है ? 
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मैं उसको नहीं जानता । किन्तु वह स्वयं ही अपनी पूजा को जानता है, दूसरा कोई नहीं । आमेर नगर में राजा मानसिंह ने प्रश्न किया था कि आपकी पूजा सेवा कैसी होती है ? उसका उत्तर इस भजन से दिया है । भगवान् शंकराचार्य लिखते हैं कि – जो सदा स्वच्छ है उसको पाद्य और अर्ध्य कैसे दें ? जो नित्य शुद्ध है, उसको आचमन की क्या अपेक्षा है? निर्मल को स्नान कैसा ? संपूर्ण विश्व जिसके उदर में है, उसको वस्त्र कैसा ? ब्रह्मवेत्ताओं को सर्वदा सब अवस्थाओं में इसी प्रकार एक बुद्धि से भगवान् की परा-पूजा करनी चाहिये । 
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गर्भवास में वह नहीं आता, इसका भाव यह है कि जीवात्मा अपने कर्म-फल भोगने के लिये गर्भ में आता है, क्योंकि जीव कर्माधीन है और परमात्मा गर्भ में नहीं आता क्योंकि वह स्वतन्त्र है । इससे यह श्रुति की संगति बैठ जाती है कि प्रजापति गर्भ में विचरण करता है । बिना पैदा हुए ही बहुधा रूपों को धारण करता है । अतः जीवों की तरह परमात्मा कर्मफल भोगने के लिये गर्भवास में नहीं आता । अतः विजायते में भी सार्थक हो जाता है । अन्यथा ‘जनि प्रादुर्भावे’ इस धातु मात्र से ही अर्थ का लाभ हो जाता, फिर उपसर्ग या देना व्यर्थ ही है । 
(क्रमशः)

बाबा लाज तूंनैं हो

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*दादू जिन पहुँचाया प्राण को, उदर उर्ध्व मुख खीर ।*
*जठर अग्नि में राखिया, कोमल काया शरीर ॥*
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*संत टीला पदावली*
*संपादक ~ ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी*
===========
बाबा लाज तूंनैं हो ।
तूं साहिब सिर ऊपरैं, कांई चिन्ता मूंनैं हो ॥टेक॥
बालक सोवै गोद में, माता दुलरावै हो ।
बाकौं तन की सुधि नहीं, वा दूध पावै हो ॥
गरभवास मैं राषिया, बहू च्यंता कीन्हीं हो ।
पाँचौं तत मिलाइ करि, काया करि दीन्हीं हो ॥
अनेक जुगां तैं राषिया, केताक बषांणौं हो ।
टीला कौं अब राषिलै, तौ साहिब जांणौं हो ॥३८॥
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विनती करते हुए कहते हैं, हे बाबा ! मेरी लाज तुझको है । यदि मैं तेरी शरण में रहकर भी विपदाग्रस्त हो गया, पतित हो गया, नरकगामी हो गया तो तुझको ही लज्जित होना पड़ेगा । अतः मेरी लाज रखने का दायित्व तेरा ही है । हे साहिब ! तू मेरे सिर के ऊपर है । अतः अब मुझे मेरी तनिक सी भी चिन्ता-फ़िक्र नहीं है कि मेरा क्या होगा ॥टेक॥
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बालक माता की गोदी में निश्चिन्त होकर सोता है और माता उसको दुलराती है, उससे प्रेम करती है, उसे दुत्कारती नहीं है । बालक को अपने शरीर को कोई सुध-बुध नहीं होती है । माता स्वयं ही उसकी चिन्ता करके उसके शरीर के पुष्ट्यर्थ उसको दूध पिलाती है ।
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हे परमप्रभु-परमात्मा ! आप जीव को गर्भवास-काल में रक्षा करते हैं । उसकी भलाई के लिए सर्वविध चिन्ता करके उसको वहाँ सुरक्षित रखते हैं । आहार-पानी का प्रबन्ध करते हैं । जठराग्नि से जलने से बचाते हैं । माता के गर्भ में ही पाँचों तत्त्वों को मिलाकर काया का निर्माण कर देते हैं जिसमें जीव सुखपूर्वक रह पाता है ।
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आप अनेक युगों से रक्षा करते आ रहे हैं । मैं उन उपकारों का कहाँ तक वर्णन करूँ । हे साहिब ! मैं टीला आपको साहिब तबही जानूँगा जब अबकी बार मुझे आप अपनी अभय, अक्षय, अखण्डानन्द रूप शरण में रख लोगे ॥३८॥
(क्रमशः)

रविवार, 26 मार्च 2023

= १७ =

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*दादू मेरा तेरा बावरे, मैं तैं की तज बान ।*
*जिन यहु सब कुछ सिरजिया, करता ही का जान ॥*
============
*साभार : @Subhash Jain*
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*अहोभाव*
बुद्ध ने कहा: ये तीन अग्नियां हैं, जिनमें हर आदमी जल रहा है। हर आदमी इन तीन लपटों में घिरा है। और इन तीन लपटों से तुम्हारे भीतर अहंकार पैदा होता है। क्रोध, अहंकार का भोजन है। तृष्णा, अहंकार का फैलाव है। लोभ, अहंकार का पैर जमा कर खड़ा हो जाना है।
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जो मेरा है वह मेरा है, और जो तेरा है वह भी तेरा नहीं रहने दूंगा, उसे भी मेरा करके रहूंगा ! फैलूंगा, घेर लूंगा सारी पृथ्वी को ! इन तीन लपटों में तुम जलते हो तो तीनों लपटों का जो परिणाम है—वह है अहंकार ! और अहंकार नरक है। बुद्ध ने कहा: अगर ये तीन लपटें बुझ जाएं तो अहंकार भी बुझ जाता है। क्योंकि ये तीन लपटें अहंकार के लिए ईंधन का काम करती हैं।
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जो तुम्हारे पास नहीं है, उसे चाहो मत। और जो तुम्हारे पास है, उस पर मालकियत मत रखो। प्रभु की कृपा कि तुम्हारे पास है और जब लेना चाहे ले ले! जिसने दिया है वह वापस ले ले, तो तुम अड़चन मत डालो। और, लोग अगर दौड़ रहे हैं धन पाने और तुम्हारे मार्ग में बाधा डाल देते हैं, तो क्रोध मत करो। क्योंकि तुम भी उनके मार्ग में बाधा डाल रहे हो। तुम्हें मार्ग में पाकर ही तो वे हटा रहे हैं। तो उन जगहों से हट जाओ, जहां क्रोध पैदा होता हो।
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लोभ, क्रोध और वासना—ये तीनों अगर न हों तो तुम्हारा अहंकार बुझ जाएगा। और जहां अहंकार बुझा कि शून्य पैदा हुआ। उसी शून्य में परमात्मा अवतरित होता है। उसी खाली जगह में। अहंकार जिस सिंहासन पर विराजा है, उसी सिंहासन पर परमात्मा भी बैठेगा। अहंकार को हटा दो। सिंहासन खाली करो।
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नन्हीं—नन्हीं बुंदिया मेहा बरसे, सीतल पवन सुहावन की।
और जब सब शांत हो जाता है भीतर—अहंकार, वासना, तृष्णा, मोह, लोभ, क्रोध—स्वभावतः शीतल हवाएं बहने लगती हैं। सुगंधित हवाएं बहने लगती हैं।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर, आनंद मंगल गावन की।
मीरा कहती है: आ गई घड़ी—आनंद मंगल गावन की ! आ गई घड़ी नाचने की ! आ गई घड़ी पैर में घुंघरू बांध लेने की ! आ गई घड़ी, जिसकी प्रतीक्षा थी जन्मों—जन्मों से !
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ओशो : पद घुंघरू बांध - मीरा बाई

= १६ =

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*सांई सन्मुख जीवतां, मरतां सन्मुख होइ ।*
*दादू जीवन मरण का, सोच करै जनि कोइ ॥*
============
*साभार : @Subhash Jain*
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*हम तो जीवन वहां खोज रहे हैं, जहां जीवन नहीं है।* *हम तो वहां खोज रहे हैं, जहां जीवन का कोई संबंध नहीं है।*
*°°°••••{{{ओशो}}}••••°°°*
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जब तक मैं स्वयं को नहीं जानता और जीवन के स्वर को नहीं जानता, मेरा सारा जानना, सारा पाना, क्या अर्थ रखता है ? यह प्रश्न उठ जाए तो आदमी की दुनिया में धर्म की शुरुआत हो जाती है। उस आदमी को मैं धार्मिक नहीं कहता, जो पूछता है ईश्वर है या नहीं।
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धार्मिक आदमी को ईश्वर से कोई भी प्रयोजन नहीं है। उस आदमी को मैं धार्मिक नहीं कहता, जो कहता है सृष्टि किसने बनाई। सृष्टि के बनाने के, न बनाने के प्रश्न वैज्ञानिक पूछ सकते हैं। धार्मिक आदमी को दो कौड़ी का मतलब नहीं है कि किसने बनाई। मैं उस आदमी को धार्मिक नहीं कहता, जो कहता है कितने नरक हैं, कितने स्वर्ग।
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स्वर्ग और नरक से धार्मिक आदमी को क्या प्रयोजन ! नरक की चिंता वे करते हैं, जो ऐसे काम कर रहे हों कि नरक जाना पड़े या स्वर्ग की चिंता ऐसे लोग करते हैं, जो नरक जाने के काम कर रहे हैं, लेकिन स्वर्ग का पता चल जाए, तो कुछ रिश्वत देकर स्वर्ग में भी प्रवेश पा सकें। लेकिन धार्मिक आदमी को स्वर्ग-नरक से क्या प्रयोजन।
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धार्मिक आदमी का एक ही प्रश्न है, एक ही जिज्ञासा है, उसका एक ही अल्टीमेट कनसर्न, जिसको कहें कि उसका जो आखिरी लगाव है, वह एक है, इस बात को जान लेने का कि मैं हूं, लेकिन मैं क्यों हूूं ? मेरा अस्तित्व है, लेकिन मेरा अस्तित्व क्यों है ? अगर मैं न होता तो क्या हर्ज था ? और अगर मैं हूं, तो प्रयोजन क्या है ? क्या मैं अपने इस होने को क्षुद्रतम में खोता चला जाऊं ?
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रोज सुबह उठूं और वही करूं चालीस-पचास वर्षों तक ? रोज दफ्तर, रोज दुकान, रोज मकान, रोज सोना, रोज खाना ? क्या मैं पचास वर्षों तक कोल्हू के बैल की तरह यही करता रहूं या यह भी पूछूं कि मैं क्यों हूं ? किसलिए हूं ? क्या प्रयोजन है मेरे होने का ? धार्मिक आदमी यह जानना चाहता है कि मैं क्यों हूं आखिर ?
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आखिर मेरे होने की जरूरत क्या है ? और जैसे ही कोई आदमी यह प्रश्न पूछेगा कि मेरी जरूरत क्या है, वैसे ही वह पूछना शुरू करेगा कि मैं यह भी तो जान लूं कि मैं कौन हूं, क्या हूं, कहां से हूं, क्यों हूं और इस सारी बात की खोज की तरफ अगर ध्यान चला जाए, तो जीवन को जाना जा सकता है। लेकिन हम तो जीवन वहां खोज रहे हैं, जहां जीवन नहीं है। हम तो वहां खोज रहे हैं, जहां जीवन का कोई संबंध नहीं है।
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हम वहां खोजते रहें, खोजते रहें, हम खोजते-खोजते खुद मिट जाएंगे, पर जीवन का हमें कोई पता नहीं पड़ पाएगा। मरते हुए आदमी से पूछो, वह भी यही कर रहा था, जो आप कर रहे हैं। लेकिन उसके पहले भी मरने वाले लोगों से उसने यह नहीं पूछा था। हर आदमी मर रहा है और हर आदमी वही कर रहा है, जो दूसरे मरने वाले ने किया है। और कोई भी यह नहीं पूछ रहा कि हम यह क्या कर रहे हैं ?
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एक रात एक महल के ऊपर सम्राट सोया है, सो नहीं पा रहा है, नींद नहीं लग रही है। किस सम्राट को नींद लगती है! सम्राट को नींद लगना बहुत मुश्किल है। जो बहुत लोगों की नींद छीन लेते हैं, उनकी खुद की नींद कैसे लग सकती है। वह करवटें बदल रहा है। सम्राट हमेशा ही करवटें बदलते हैं। और सम्राटों को करवट बदलने में सुविधा रहे, इसलिए बहुत अच्छे गद्दे-तकियों का इंतजाम करना पड़ता है। सोने वाला बहुत गद्दे-तकियों की फिकर नहीं करता।
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जिसे नींद आती है, उसके लिए जमीन भी बहुत बहुमूल्य गद्दी हो जाती है और जिसे नींद नहीं आती उसे गद्दियां भी कांटें ही मालूम पड़ती रहती हैं। वह करवटें बदल रहा है, आधी रात बीत गई, तब उसे ख्याल आता है कि कोई ऊपर छप्पर पर चल रहा है। वह पूछता हैः कौन है ऊपर ? वह घबड़ा गया है।
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सम्राटों के पास बंदूकें हैं, तलवारें हैं, पहरे हैं। असल में पहरे उन्हीं के पास हैं, जो भीतर बहुत डरे हुए हैं। जो भीतर डरा हुआ न हो, उसके आस-पास पहरे की कोई भी जरूरत नहीं। सिर्फ डरे हुए आदमी के आस-पास बंदूकें के पहरे होते हैं; वह एकदम डर गया। कौन है ऊपर ? उसने चिल्ला कर पूछा।
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ऊपर से किसी ने कहाः घबड़ाइए मत, परेशान मत होइए, आपसे मुझे कोई मतलब नहीं, मेरा ऊंट खो गया है। मैं अपने ऊंट को खोज रहा हूं। उस सम्राट ने कहाः कोई पागल आदमी मालूम पड़ते हो, महलों की छतों पर ऊंट खोया करते हैं, छप्परों पर, खप्पड़ों पर ऊंट खोते हैं। सम्राट ने पहरेदार को उठाया और कहा कि देखो कौन है ऊपर, पकड़ो उसे। लेकिन वह आदमी न मालूम कहां चला गया।
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लेकिन सम्राट रात भर सोचता रहा, इसका मतलब क्या है कोई आदमी छप्पर पर ऊंट खोजता है! वैसे ही नींद नहीं आई, रात भर सोचता रहा, सुबह-सुबह झपकी लगी, तो उसे सपना दिखाई पड़ा कि सपने में वह आदमी फिर छप्पर पर ऊंट खोज रहा है। वह उससे पूछता है कि क्या ऊंट छप्परों पर खोजे जाते हैं ? ऊंट छप्परों पर खोते ही नहीं हैं। तो वह आदमी उससे सपने में कहता है।
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और तुम वहां जीवन खोज रहे हो, जहां जीवन खोया ही नहीं। अगर जीवन मिल सकता है धन में, यश में, पद में, प्रतिष्ठा में, तो ऊंट भी छप्परों पर मिल सकते हैं। ऊंट तो छप्परों पर खो भी सकते हैं, लेकिन जीवन, जीवन न तो धन में खोया है, न पद में, न बाहर के सामान में, न मकानों में, जीवन तो वहां है जहां तुम...वह घबड़ा कर जाग गया।
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सुबह वह अपने दरबार में बैठा है, चिन्तित है और तभी एक आदमी दरबार में घुसता हुआ भीतर चला आया। द्वारपाल ने रोकने की कोशिश की, लेकिन वह नहीं रुका। द्वारपाल ने उससे पूछा भी, कहां जाते हो ! उस आदमी ने कहा कि मैं इस धर्मशाला में थोड़े दिन के लिए मेहमान होना चाहता हूं।
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मैं इस सराय में रुकना चाहता हूं। उस द्वारपाल ने कहा, पागल हो गए हो ! मालूम होता है इस बस्ती में पागल छूट गए हैं। रात एक पागल मकान के ऊपर चढ़ा हुआ था और जो कहता था कि ऊंट खो गया है, एक तुम पागल हो कि राजा के महल को सराय कह रहे हो, धर्मशाला कह रहे हो। यह सराय नहीं है, सम्राट का निवास स्थान है। उसने कहा कि तुमसे बात नहीं करूंगा। सम्राट से ही बात करूंगा।
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वह भीतर गया। दरबार में उसने जाकर सम्राट से कहा कि मैं इस सराय में कुछ दिन मेहमान होना चाहता हूं। आपको कोई एतराज तो नहीं ? तो सम्राट ने कहा कि बड़ी मुश्किल की बातें हैं। यह मेरा निवास स्थान है, सराय नहीं। लेकिन वह अजनबी आदमी कहने लगा निवास स्थान ! कुछ वर्षों पहले मैं आया था, तब यहां मैंने इसी सिंहासन पर दूसरे आदमी को बैठे देखा था।
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सम्राट ने कहा कि वह मेरे पिता थे। उनका देहावसान हो गया है। उस अजनबी आदमी ने कहाः मैं उनके पहले भी आया था, तब मैंने तीसरे ही आदमी को बैठे देखा था। सम्राट ने कहा, वे मेरे पिता के पिता थे, वे भी चल बसे। वह आदमी हंसने लगा, उसने कहा कि जहां मेरे देखते-देखते रहने वाले बदल जाते हैं, उसको निवास स्थान कहना उचित होगा ? तुम कितने दिन तक यहां रहोगे ?
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जहां तक मैं समझता हूं, जब मैं दोबारा आऊंगा, चैथा आदमी मिलेगा और वह कहेगा पिता जी थे वह, जो पहले बैठे थे, उनका देहावसान हो गया। इसलिए मैं इसे सराय कहता हूं और कुछ दिन यहां ठहर जाना चाहता हूं, तुम्हें कोई एतराज तो नहीं है। उस सम्राट को एकदम ख्याल आया कि यह आदमी वही होना चाहिए, जो रात को ऊंट खोज रहा था। उस सम्राट ने उतर कर उसके पैर पकड़ लिए।
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उस आदमी ने कहा, मेरे पैर मत पकड़ो, अपने ही पैर पकड़ लो, क्योंकि तुम्हारे पैर तुम्हें वहां ले जा रहे हैं, जहां तुम्हें जाना नहीं है। तुम्हारे पैर तुम्हें वहां पहुंचा रहे हैं, जहां पहुंचने को कुछ नहीं है। तुम्हारे पैर तुम्हें उस यात्रा पर गतिमान किए हुए हैं, जो शून्य में समाप्त होती है। अपने ही पैर पकड़ो और उस तरफ चलो, जहां जीवन है, जहां सत्य है।
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वह आदमी, वह सम्राट उसी दिन उस महल को छोड़ कर चला गया। उसके घर के लोग कहने लगे, महल को छोड़ कर आप कहां जा रहे हैं ? उसने कहा, महल होता तो मैं छोड़ कर न जाता, यह सराय है, जिसे छोड़ ही देना पड़ेगा।उसे पकड़ कर रखने में परेशानी ही होने को है और कुछ भी नहीं।
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लेकिन हम जिंदगी में सराय को घर समझे हुए हैं। कौड़ियों को धन समझे हुए हैं। आस-पास की भीड़ को मित्र-परिवार समझे हुए हैं। और एक चीज जिसे समझने से कुछ हो सकता था, उसको भर अंधेरे में डाले हुए हैं स्वयं के होने को अंधेरे में डाले हुए हैं।
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कोई अगर आपकी छाती पर आकर द्वार खटखटाए और पूछे कौन है भीतर, तो जैसा बायजीद ने कहा था खोज रहा हूं पचास साल से, मुझे पता नहीं चला; ऐसा आप कह सकेंगे कि खोज रहा हूं, पता नहीं चला है। खोजा ही नहीं है ! खोजा ही नहीं है ! खोजें और पता न चले, तो भी एक बात है; लेकिन खोजा ही न हो, तब तो किसी दूसरे को उत्तरदायी भी नहीं ठहराया जा सकता।
•••-=-((( ओशो )))-=-•••
••🙏🙏🏵️❤🏵️🙏🙏••
*ओशो।*
*"जीवन क्रांति के सूत्र"* -
(प्रवचन -०१)("जीवन क्या है?)
🙏🙏🏵️🏵️🏵️🏵️🙏🙏

= १५ =

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*नहिं मृतक नहिं जीवता, नहिं आवै नहिं जाइ ।*
*नहिं सूता नहिं जागता, नहिं भूखा नहिं खाइ ॥*
*न तहाँ चुप ना बोलणां, मैं तैं नांहीं कोइ ।*
*दादू आपा पर नहीं, न तहाँ एक न दोइ ॥*
============
*साभार : @Subhash Jain*
.
🦜
तुम्हारे पास धन हो सकता है, लेकिन उससे कुछ अंतर नहीं पड़ता। तुम्हारे पास धन नहीं भी हो सकता है, उससे भी कुछ अंतर नहीं पड़ता।
🦜
हो सकता है समाज ने तुम्हें बहुत इज्जत दि हो मान दिया हो, तुम्हारे पास बड़ी—बड़ी डिग्रियां हों, बड़े—बड़े पुरस्कार हों, प्रशंसा मिली हो, सर्टिफिकेट हों—उसका भी कोई आत्यंतिक मूल्य नहीं है....
🦜
यह तो एक खेल है। जब तक तुम इस खेल के पार नहीं हो जाते और तुम्हें इस बात का बोध नहीं हो जाता कि *इस खेल में तुम स्वयं को कभी न खोज पाओगे, कि तुम कौन हो* ...
🦜
तब तक समाज तुम्हें मूर्ख बनाता रहेगा और तुम्हें भ्रांत धारणाएं दिए चला जाएगा कि तुम धनी हो, विद्वान हो, हंशीयार हो, इज्जतदार हो, समझदार हो, दानी हो, दयावान हो...
🦜
और तुम उन धारणाओं में ही आस्था और विश्वास करते हुए जीए चले जाओगे। तब तुम्हारा पूरा जीवन व्यर्थ गया।
🦜
इसलिए जब पहली बार ध्यान सच में फलित होता है तो ध्यान तुम्हें मिटाने लगता है—तुम्हारा नाम खो जाता है, तुम्हारा धन बेकार दिखने लगता है, तुम्हारा ज्ञान सिर्फ एक जानकारी बन जाती है । इज्जत, मान सम्मान संभालना एक बोझ बन जाता है...
🦜
तुम्हारी जाति मिट जाती है, तुम्हारा तथाकथित धर्म बिदा हो जाता है, तुम्हारी राष्ट्रीयता समाप्त हो जाती है— धीरे — धीरे व्यक्ति अपनी विशुद्ध निर्विकार एकांत में नग्न और अकेला रह जाता है।
🦜
शुरू में थोड़ा भय भी लगता है, क्योंकि पैर जमाकर खड़े होने के लिए कहीं कोई जगह नहीं मिलती और न ही अहंकार को टिके रहने के लिए कोई जगह मिलती है। कहीं से कोई सहयोग नहीं मिलता है, उसके सभी सहारे गिर जाते हैं। और अहंकार का पुराना पूरा का पूरा ढांचा चरमरा भर गिर जाता है।तुम थोड़े भयभीत भी हो जाते है...
🦜
जब भी ऐसा हो तो एक ओर खड़े हो जाना, और खूब जोर से हंसना और *उस ढांचे को गिर जाने देना।* और इस बात पर जोर से हंसना कि अब पीछे लौटने के लिए कहीं कोई मार्ग नहीं बचा है, पीछे लौटने का कोई उपाय शेष नहीं बचा है। *गुरजीएफ* कहता है कि इस स्थिति में, साधक को मास्टर (गुरु), स्कूल(आश्रम) की जरूरत पड़ती है...
*ओशो । (संकलित)*

= १४ =

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*ऐसो खेल बन्यो मेरी माई,*
*कैसै कहूँ कछु जान्यो न जाई ॥टेक॥*
*सुर नर मुनिजन अचरज आई,*
*राम-चरण को भेद न पाई ॥१॥*
*मंदिर माहिं सुरति समाई,*
*कोऊ है सो देहु दिखाई ॥२॥*
*मनहिं विचार करहु ल्यौ लाई,*
*दिवा समान कहाँ ज्योति छिपाई ॥३॥*
*देह निरंतर शून्य ल्यौ लाई,*
*तहं कौण रमे कौण सूता रे भाई ॥४॥*
*दादू न जाणै ये चतुराई,*
*सोइ गुरु मेरा जिन सुधि पाई ॥५॥*
============
*साभार : @Subhash Jain*
.
तुम पूछते हो, यह जीवन क्या है ? यह प्रश्न इसलिए उठ रहा है कि तुमने जीवन को भीतर से जी कर नहीं देखा। बुद्धि में बस, सोच रहे हो कि जीवन क्या है ? जैसे कि कोई उत्तर मिल जाएगा !
.
जीवन कोई ऐसी चीज नहीं है कि बुद्धि उत्तर दे दे। जीवन तो जीने में है। जीवन कोई वस्तु नहीं है; इसका विश्लेषण नहीं हो सकता--कि टेबिल पर रख कर और इसका तुम विश्लेषण कर डालो, कि परखनली में रख कर और इसकी जांच-पड़ताल कर लो; कि तराजू पर तौल लो, कि गजों से नाप लो !
.
यह जीवन तो तुम्हारे भीतर है। तुम जीवित हो--और पूछते हो, जीवन क्या है ? तुम सुगंधित हो--और पूछते हो सुगंध क्या है ! तुम चैतन्य हो--और पूछते हो: जीवन क्या है ? यही है जीवन--जो तुम हो। पूछते हो, जीवन का सत्य क्या है ? कहां-कहां नहीं खोजा ? खोजते रहो; जनम-जनम से खोज रहे हो। खोज-खोज कर तो खोया है। अब खोज छोड़ो।
.
मैं यहां खोज छोड़ना सिखाता हूं। बैठ रहो। मौन हो जाओ। शब्दों में मत तलाशो। शास्त्रों में मत तलाशो। वहां शब्द ही पाओगे। और शब्द सब थोथे हैं। अपने शून्य में विराजो। और उसी शून्य में अविर्भाव होगा।
.
और जिसे कहीं नहीं पाया, उसे अपने घर में पाओगे। वह पहले से ही तुम्हारा अतिथि हुआ बैठा है ! अतिथि भी क्यों कहो--अतिथेय है। वही तुम्हारा मालिक है, जिसकी तुम खोज में चले हो। जो खोजने चला है, उसे ही खोजना है।
.
यह बात कुछ चिराग ले कर ढूंढने की नहीं है पुरुषोत्तम ! ढूंढने में ही लोग व्यस्त हैं ! ढूंढने में ही लोग परेशान हैं। ढूंढने में ही लोग चूक रहे हैं। जिंदगी है वर्तमान। जिंदगी है--अभी और यहां। और तुम कहीं-कहीं भटक रहे हो !
ओशो

= १३ =

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*रात दिवस का रोवणां, पहर पलक का नांहि ।*
*रोवत रोवत मिल गया, दादू साहिब माँहि ॥*
============
*साभार : @Subhash Jain*
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*अहोभाव*
नानक बीमार पड़े, चिकित्सक बुलाए गए। नानक की नाड़ी पर चिकित्सक ने हाथ रखा। नानक हंसने लगे। और नानक ने कहा कि देखो नाड़ी, तुम्हारे देखने की इच्छा है तो। और औषधि भी दोगे तो पी लूंगा। मगर यह बीमारी ऐसी है कि इसका कोई इलाज नहीं। तुम्हारे हाथ में नहीं।
.
घर के लोग परेशान थे क्योंकि नानक दुबले होते जाते। सोते भी नहीं, ठीक से भोजन भी नहीं करते। न मालूम कौन—सी धुन चढ़ी है ! रात—रात बैठे रोते हैं। एक रात बहुत देर तक रोते रहे। मां ने कहा कि अब सो भी जाओ। रोने से सार क्या है ? 
.
लेकिन नानक ने कहा कि जिद बंधी है एक किसी से। सुनती हो ? दूर एक पपीहा कह रहा है: पी कहां ? पी कहां ? इससे जिद बंधी है, कि जब तक यह चुप न होगा, मैं भी चुप नहीं हो सकता। मैं भी अपने प्यारे को पुकार रहा हूं : पी कहां ? और पपीहा नहीं हार रहा है तो मैं हार जाऊं ! इस प्रतियोगिता में मैं हारनेवाला नहीं हूं; रहूं कि जाऊं।
.
पी कहां ? प्यारे की खोज पर जो निकला है उसकी जिंदगी यहां तो अस्तव्यस्त होने लगेगी। इस अस्तव्यस्तता को लोग तो यही समझेंगे कि बीमारी है। तुम भी पहले यही समझोगे कि यह क्या हो गया ? भले—चंगे थे, यह सब कैसे बिगड़ गया ? मगर मैं तुम्हें भरोसा दिलाता हूं, यह सुबह की खबर है। मलय—पवन आता है। तुम्हें थोड़े अनुभव से धीरे— धीरे सुवास का पता चलेगा।
.
और जल्दी भी मत करो। यह भी मत सोचो कि इतनी देर क्यों हो रही है ? प्रतीक्षा प्रार्थना का प्राण है। और जो इंतजार में आनंदित नहीं है उसके इंतजार में कमी है और उसका इंतजार पूरा नहीं होगा।
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तुझको पा लेने में यह बेताब कैफियत कहां
जिंदगी वो है जो तेरी जुस्तजू में कट गई
पानेवालों ने कहा है कि तुझे पाया, सब ठीक, मगर वह मजा नहीं जो तेरी खोज में था, तेरे इंतजार में था, तेरी प्रतीक्षा में था। वह ललक, वह पुलक ! वे आकांक्षाओं—अभीप्साओं की लपटें।
.
तुझको पा लेने में यह बेताब कैफियत कहां
जिंदगी वो है जो तेरी जुस्तजू में कट गई
असली जिंदगी तो तब पता चलती है कि वे जो खोज के दिन थे, बड़े प्यारे थे। मंजिल तो प्यारी है ही, मगर यात्रा भी कुछ कम प्यारी नहीं; शायद ज्यादा ही प्यारी है। क्योंकि उसी यात्रा—पथ से तो हम मंजिल तक पहुंचते हैं।
.
जो मंजिल तक ले आती है उसको भी सौभाग्य की तरह स्वीकार करो। यही विरह की अग्नि, यही असह्य पीड़ा तुम्हें मंदिर तक ले आएगी। ये रास्ते के काटे... एक—एक काटा हजार—हजार फूल बनकर खिलेगा। ये रास्ते की मुसीबतें... एक—एक मुसीबत हजार—हजार अमृत के घट बनेगी।
चलते चलो। रोते चलो। पुकारते चलो। हारो मत।
'हारिए न हिम्मत, बिसरिए न राम।'
ओशो

= १२ =

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*आत्म मांहै ऊपजै, दादू पंगुल ज्ञान ।*
*कृतम् जाइ उलंघि करि, जहां निरंजन थान ॥*
*आत्म बोध बँझ का बेटा, गुरु मुखि उपजै आइ ।*
*दादू पंगुल पंच बिन, जहाँ राम तहँ जाइ ॥*
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*साभार : @Subhash Jain*
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बुद्ध रोज रात्रि को, जब उनका प्रवचन पूरा होता, तो कहते थे नियम से कि भिक्षुओ, अब जाओ। दिवस का अन्त हुआ, अब अन्तिम कार्य पूरा करो, ताकि दिवस की पूर्णाहुति हो। विश्राम के पहले कार्य पूरा कर लेना। रोज रोज कहने की जरूरत नहीं थी। मतलब था कि ध्यान करके और सो जाओ। रोज रोज क्या कहना, एक दफा समझा दिया था, हजार दफे समझा दिया था, फिर तो यह प्रतीक हो गया था कि भिक्षुओ, अब अपना अंतिम कार्य पूरा कर लो और फिर विश्राम में जाओ।
.
एक दिन सुबह उन्होंने कहा कि तुम्हें पता है भिक्षुओ, कल रात क्या हुआ ! जब मैंने तुमसे कहा कि अब उठो, अंतिम कार्य पूरा कर लो, यूं ही बहुत देर हो गयी है-तो तुम सब ध्यान करने चले गए। एक चोर भी आया हुआ था सभा में, वह एकदम चैंका वह बडा हैरान भी हुआ कि बुद्ध को कैसे पता चला कि मैं चोर हूं और मेरे काम का समय आ गया ! वह चोरी करने चला गया, कि गजब के आदमी हैं बुद्ध भी, कि खूब चेताया कि अब क्या बैठा है तू, अब उठ, अपने काम में लग! नही तो फिर पीछे पछताएगा।
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एक वेष्या भी आयी थी। वह भी किंकर्तव्यविमूढ़ हो गयी, एक क्षण अवाक हो गयी। चैंक कर उसने बुद्ध को देखा कि क्या इनको खबर मिल गयी, क्या जासुस छोड़ रखे हैं। क्योंकि वह तो कपड़े वगैरह बदल कर आयी थी कि कोई उसे पहचान भी न सके। ऐसी ही बन कर आयी थी कि जैसे भिक्षुनी हो। कैसे इनको पता चल गया ! जाऊं। रात देर हुई जाती है, ग्राहक आने लगे होंगे। अंतिम काम पूरा करूं।
.
चोर चोरी करने चला गया, वेष्या अपनी दुकानदारी पर चली गयी, भिक्षु ध्यान करने लगे। बुद्ध ने एक ही बात कही थी, तीन तरह के लोंगो ने तीन तरह के अर्थ निकाल लिए। पाण्डित्य बोध नहीं है। बोध तो ध्यान से मिलता है। बोध तो समाधि से मिलता है। पाण्डित्य मिलता है अध्ययन से,चिन्तन से, सोच-विचार से। दोनों की प्रक्रियाएं अलग हैं। बोध मिलता है निर्विचार होने से, निष्चिंत होने से, मन के पार होने से! अ-मनी दषा में बोध जगता है। और पाण्डित्य तो मन का हीे खेल है।
ओशो

शनिवार, 25 मार्च 2023

*२९. संजीवन कौ अंग १/४*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*२९. संजीवन कौ अंग १/४*
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रांम नांम की देह करि, रांम नांम ल्यौ लाइ ।
कहि जगजीवन रांमजी, सोई सरूप रहि जाइ ॥१॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि इस देह को राममय कर राम नाम में लीन हो तो फिर जीव राम स्वरूप मय हो जाता है ।
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रूप नहीं सौ रूप रहै, रहै सो कदे२ न जाइ ।
कहि जगजीवन जाइ सो, प्रांण गहे पछिताइ ॥२ ।
{२. कदे=कदापि (कभी भी)}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जो रुप हो वह न रहे उसमे परम का स्वरूप दिखे वह रुप है । वह फिर कभी नहीं जाता है जो स्वरूप चला जाये वह फिर जब तक प्राण रहे पछतावा ही रहता है ।
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साहिब जी मंहि साध है, सहज सुंनि कर सीर ।
कहि जगजीवन मिलि रहै, ज्यूं मिस्री गलि नीर ॥३॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि परमात्मा को साधु बहुत प्रिय हैं । वे बिल्कुल शून्य होकर अंहकार, विषयीदोष, मिटाकर रहते हैं । तभी प्रभु उन्हें अपनाते हैं । वे प्रभु संग यो मिलकर रहते हैं जैसे मिश्री पानी में घुलकर रहती है ।
.
साहिब जी मंहि साध हैं, साधन मांही रांम ।
कहि जगजीवन रांम मंहि, निज जन सुमिरैं नांम ॥४॥ 
संतजगजीवन जी कहते हैं कि प्रभु प्रिय साधु है, वह साधन करने से प्रभु है । संत कहते हैं कि प्रभु मय होकर भक्त जन राम नाम स्मरण करते हैं ।
(क्रमशः) 

*जीव गोस्वामी की पद्य टीका*

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*सेवा सुकृत सब गया, मैं मेरा मन मांहि ।*
*दादू आपा जब लगै, साहिब मानै नांहि ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ साधु का अंग)*
==========
*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
.
*जीव गोस्वामी की पद्य टीका*
.
*इन्दव-*
*ग्रंथ रचे बहु ग्रंथिन छेदक,*
*आत जितो धन ले जल डारै।*
*सेव करें जन पात्र न दीसत,*
*मैं जु करूं कटु कोप उचारै ॥*
*गौरव संत बढ़ाय सिखावत,*
*बोलत मिष्ठ निशा दिन सारै।*
*कौन करै निरवेद निरूपण,*
*भक्ति चरित्र करे सु अपारै ॥३२२॥*
आपने अनेक ग्रंथों की रचना की है, जो हृदय की संशय रूप दृढ़ ग्रंथियों को भली भांति काटने वाले हैं। आपके पास भक्तों की भेट आदि के रूप में जितना धन आता था, वह सब आदर पूर्वक लेकर आप यमुनाजी के जल में डाल देते थे। यह देखकर शिष्य सेवकों ने धन को साधु- सेवा में लगाने की बारंबार प्रार्थना की।
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तब आपने कहा-साधु-सेवा करने योग्य कोई पात्र तुम लोगों में दिखाई नहीं देता है। एक ने कहा- मैं भली भांति साधु-सेवा करूँगा। वह आज्ञा लेकर संतों की सेवा करने लगा। कुछ काल के बाद एक दिन एक संत ने कुसमय में भोजन माँगा। तब सेवा करने वाले ने क्रोधित होकर उनको कटु वचन कहे।
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यह सुनकर जीव गोस्वामीजी ने उसको बहुत समझाया और कहा—मैं इसीलिये कहता था कि-साधु-सेवा अति कठिन है। फिर सन्तों की महिमा अधिक रूप से कहते हुये शिक्षा दी कि सब दिन रात मधुर वचन ही बोला करो।
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आपके वैराग्य का निरूपण कौन कर सकता है? आपने अपने ऐश्वर्य से परिपूर्ण घर का त्याग करके वृन्दावन में निवास किया था। आप नारी का तो दर्शन भी नहीं करते थे। यह प्रण तो आपका मीराँ जी ने छुड़ा दिया था। वह प्रसंग मीराँजी की कथा में आ गया है। आपने भक्ति सम्बन्धी जो चरित्र तो करे हैं वे अपार हैं। आप अपने एक कृपापात्र को कुटिया सौंपकर वृन्दावन की कुञ्जों में प्रेम से उन्मत्त होकर घूमा करते थे। जीव गोस्वामी महान् दार्शनिक पंडित, भक्ति योग के पूर्ण मर्मज्ञ, महात्मा, योगी, विरक्त और पूर्ण भक्त थे। शाके १५४० आश्विन शुक्ला तृतीया को पचासी वर्ष की अवस्था में आप हरि धाम को पधार गये थे ।
(क्रमशः)