सोमवार, 31 दिसंबर 2012

= परिचय का अंग =(४/३३०-३२)

॥दादूराम सत्यराम॥

*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
*= परिचय का अंग - ४ =*
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*पीवत चेतन जब लगै, तब लग लेवै आइ ।*
*जब माता दादू प्रेम रस, तब काहे को जाइ ॥३३०॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जब तक चेतन कहिए सचेत है, तब तक दीक्षित के यहाँ आकर उपदेश और कलाल के यहाँ आने वाले रस(मदिरा) लेते रहते हैं । जब शिष्य ज्ञानामृत पीता - पीता "मतवाला" अर्थात् तृप्त हो जाता है और मद्य पीने वाला मस्त हो जाता है, तब फिर मद्य बेचने वाले के यहाँ मद्य पीने वाला नहीं जाता है और शिष्य पूर्ण ज्ञान - ग्रस्त होने पर देहाध्यास से मुक्त हो जाता है ॥३३०॥ 
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*दादू अंतर आत्मा, पीवै हरि जल नीर ।*
*सौंज सकल ले उद्धरै, निर्मल होइ शरीर ॥३३१॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! बाहर शरीर तथा भीतर सम्पूर्ण इन्द्रियाँ और अन्तःकरण, इनको अन्तर्मुख करके साधक परमेश्वर का नाम - स्मरण रूपी अमृत पान करें, तो वे अपने सम्पूर्ण मनुष्य देह की सौंज कहिए, सामग्री को सफल बनाकर अपना उद्धार कर लेते हैं ॥३३१॥ 
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*लांबी रस*
*दादू मीठा राम रस, एक घूँट कर जाऊँ ।*
*पुणग न पीछे को रहे, सब हिरदै मांहि समाऊँ ॥३३२॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जैसे अत्यन्त प्यासा पुरुष गंगा - भागीरथी के तट पर निर्मल और ठंडा जल पीकर पेट भरने पर भी उस सम्पूर्ण जल को पीने की इच्छा रखता है, वैसे ही परमेश्वर के प्रेमातुर भक्त जनों को भी यही उत्कण्ठा रहती है कि हम अखण्ड राम - रस का एक ही घूँट में पान कर लेवें, जिससे समस्त राम - रस हमारे ही हृदय में समा जावे ॥३३२॥
(क्रमशः)

= परिचय का अंग =(४/३२७-९)

॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
*= परिचय का अंग - ४ =*
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*रोम रोम रस पीजिए, एती रसना होइ ।*
*दादू प्यासा प्रेम का, यों बिन तृप्ति न होइ ॥३२७॥* 
टीका - हे प्रभु ! हमारे शरीर का प्रत्येक रोम - रोम रसना रूप वक्त्रुत्व शक्ति सम्पन्न होकर राम रस पीवे, ऐसी कृपा कीजिये । क्योंकि आपके प्रेम का जो प्यासा है, उनकी असंख्य रसनाओं के बिना नाम स्मरण व पर्याप्त अमृत रसपान की तृप्ति कैसे संभव है ? एक रसना से तो तृप्ति सम्भव नहीं ॥३२७॥ 
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*तन गृह छाड़ै लाज पति, जब रस माता होइ ।*
*जब लग दादू सावधान, कदे न छाड़े कोइ ॥३२८॥* 
टीका - हे प्रभु ! जैसे व्यवहार में पति - प्रेम में मतवाली पतिव्रता अपने तन, धन, कुटम्बी और पति की लाज को छोड़कर पूर्ण प्रेम - भाव को प्राप्त होवे है । इसी प्रकार भक्तजन भी मीरां आदि की भांति अपने तन - धन, लोक - लाज को छोड़कर पति परमेश्वर से पूर्ण अभेद होते हैं । किन्तु जब तक सब व्यवहारों में सावधान हैं और तन, गृह आदि की क्रियाओं को नहीं त्याग सकते हैं, तब तक पूर्ण प्रेम परमेश्वर का नहीं प्राप्त होता है । अथवा जैसे ही साधक आत्मानन्द को प्राप्त करने के लिये दीवाना बन जाता है, उसी समय लोक - लाज एवं शरीर के स्वामित्व रूपी अध्यासों का परित्याग कर देता है । और वह जब तक इनमें आसक्त है, वृत्ति इधर ही फँसी रहती है और शरीर का अध्यास, लोक - वासना आदि व्यवहारों का त्याग नहीं हो सकता है ॥३२८॥ 
*आंगण एक कलाल के, मतवाल रस मांहि ।*
*दादू देख्या नैन भर, ताके दुविधा नांहि ॥३२९॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जैसे व्यवहार में "कलाल" मद्य बेचने वाले के घर में मद्य पीने - वाले सभी जाति के एकत्रित होते हैं, उनमें उस समय भेदभाव नहीं होता है, इसी प्रकार सतगुरु के आंगन में और व्यापक ब्रह्म के विषय में अर्थात् चैतन्य रूपी कलाल के कहिए, अन्तःकरण में स्वस्वरूप परिचय रूपी रस - पान करके मन, इन्द्रिय और चतुष्टय अन्तःकरण तृप्त हो जाते हैं । जो पुरुष अपने स्वरूप को ज्ञान के द्वारा देख लेता है, उसके फिर द्वैतभाव नहीं रहता है ॥३२९॥ 
"देहं विनश्वरमवस्थितमुत्थितं वा सिद्धो 
न पश्यति यतोSध्यगमत् स्वरूपम् ।
दैवादुपेतमथ दैववशादपेतं वासो 
यथा परिकृतं मदिरामदान्धः ॥"
(भागवत)
ब्रह्मसाक्षात्कर्ता ज्ञानी को भेद - बुद्धि नष्ट हो जाने से देहाध्यास नहीं रहता, जैसे मदान्ध शराबी को अपने देह की सुध - बुध नहीं रहती ।
(क्रमशः)

रविवार, 30 दिसंबर 2012

= परिचय का अंग =(४/३२४-२६)

॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
*= परिचय का अंग - ४ =*
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*ज्यों ज्यों पीवै राम रस, त्यों त्यों बढै पियास ।*
*ऐसा कोई एक है, बिरला दादू दास ॥३२४॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! संतजन जैसे - जैसे राम रस पीते हैं, वैसे - वैसे ही उनकी प्यास बढ़ती जाती है । परन्तु ऐसे एक - आध ही विरहीजन भक्त हैं जो इस प्रकार राम - रस पीते हैं ॥३२४॥ 
"मनुष्याणां सहस्त्रेषु कश्चित् यतति सिद्धये । 
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्वतः ॥" 
(गीता)
सोरठा - 
"गागर गलती जोइ, जे हर सिर गंगा बहै । 
तऊ न तृपत होइ, घणैं घणैंरी नै खपै ॥"
दोहा - 
अमृत अंत न आवहि, तृप्ति न पीवनहार । 
सोखै बड़वा अनल ज्यों, पोखै सलिता धार ॥ 
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*राता माता राम का, मतवाला मैमंत ।*
*दादू पीवत क्यों रहै, जे जुग जांहि अनन्त ॥३२५॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! राम के राते रत्त और माते मत्त कहिए, मतवाले मुक्तजन "मैमंत" कहिए, प्रभु प्रेम में बेसुध हुए, ऐसे अनन्य प्रभु भक्त अनन्त युग - युगान्तर में भी भक्ति - रस का पान करके तृप्त नहीं होते हैं ॥३२५॥ 
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*दादू निर्मल ज्योति जल, वर्षा बारह मास ।*
*तिहि रस राता प्राणिया, माता प्रेम पियास ॥३२६॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! परमेश्वर की प्रखर निर्मल ज्योति से भय, अविद्या आदि दोष रहित संतृप्त धन से जिनके चैतन्य रूपी हृदयाकाश में भक्ति - जल वर्षा अनवरत होती ही रहती है, ऐसे संतजन राता = रत्त = अनुरक्त हुये, माता = मस्त रहते हैं । उनकी दिनों - दिन प्रेम की प्यास बढ़ती ही जाती है ॥३२६॥
(क्रमशः)

= परिचय का अंग =(४/३२१-२३)


॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
*= परिचय का अंग - ४ =*
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*जैसे नैना दोइ हैं, ऐसे होंहि अनंत ।*
*दादू चंद चकोर ज्यों, रस पीवैं भगवंत ॥३२१॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जैसे इस शरीर में दो नेत्र हैं, ऐसे अनेक नेत्र रोम - रोम में हो जावें, तो भक्तजन परमात्मा का अतृप्तभाव से दर्शनरूपी अमृत पान करें । जैसे चन्द्रमा का दर्शन करके चकोर अतृप्त रहता है, दर्शन की इच्छा बनी ही रहती है, वैसे ही भक्तों को परमेश्वर के दर्शन की इच्छा बनी रहती है ॥३२१॥ 
साजन दीन्हों हे सखी ! दर्शन सर्वस लोइ । 
मो मन नैन कुपात्र ज्यूं, तृप्ति न मानै कोइ ॥ 
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*ज्यों रसना मुख एक है, ऐसे होंहि अनेक ।*
*तो रस पीवै शेष ज्यों, यों मुख मीठा एक ॥३२२॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जैसे शेष जी के एक सहस्त्र मुख हैं और उनमें दो सहस्त्र जिह्वा हैं, वैसे ही हमारा रोम - रोम भी जिह्वा रूप होकर भगवान् के गुण - कीर्तन में लयलीन हो तो हम प्रभु की भक्ति पावें, तभी हमारा मुख मीठा होवे ॥३२२॥ 
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*ज्यों घट आत्म एक है, ऐसे होंहि असंख ।*
*भर भर राखै रामरस, दादू एकै अंक ॥३२३॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जिस प्रकार हमारा यह पंच भौतिक शरीर असंख्य रूप होकर असंख्य मुख, नेत्र, श्रोत्र आदि इन्द्रियों सहित राम - रस अमृत पान करे, तभी राम से अभेद होवे ॥३२३॥
(क्रमशः)

शनिवार, 29 दिसंबर 2012

= परिचय का अंग =(४/३१८-२०)


॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
*= परिचय का अंग - ४ =*
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*राम रटणि छाड़ै नहीं, हरि लै लागा जाइ ।*
*बीचैं ही अटकै नहीं, कला कोटि दिखलाइ ॥३१८॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! साधन कोटि में अपनी सुरति द्वारा अखण्ड राम की लय लगाओ और माया अपनी कोटि कला, अनन्त रिद्धि - सिद्धि, इहलोक - परलोक की अनन्त सम्पदा प्रकट करके माया दिखलाती है, परन्तु उनमें परमेश्वर के भक्त आसक्त नहीं होते हैं । प्रभु के नाम - स्मरण में ही संलग्न रहते हैं ॥३१८॥ 
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*दादू हरि रस पीवतां, कबहुँ अरुचि न होइ ।*
*पीवत प्यासा नित नवा, पीवणहारा सोइ ॥३१९॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! हरि - रस को भाव - भक्ति, ज्ञान - ध्यान आदि द्वारा पान करते हुए कहिए, धारण करते हुए कभी भी अरुचि नहीं होती है । और हरि - रस को पीते हुए भी जिन्हें नित नई प्यास और जागती है, सो ही सच्चे संत पीनेवाले हैं ॥३१९॥ 
वरुण मित्र कियो जाट को, आना मेरे गेह । 
गयो तिसायो पीगयो, अमृत कर अति नेह ॥ 
दृष्टान्त - वरुण देवता एक समय मारवाड़ में चले गए । प्यास से दुखी होकर एक जाट की झोंपड़ी में पहुँचे । जाट ने एक मतीरा निकाला और वरुण देवता को खिलाया - पिलाया, उनकी भूख - प्यास दोनों मिट गई । वरुण देवता बोले - "तूने हमें अमृत जैसा रस पिलाया है, तूँ हमारा मित्र है । दुःख पड़े, तब मेरे पास आना । समुद्र तट पर जाकर आवाज देना कि मैं तेरा मित्र आ गया हूँ, वरुण देवता ! फिर मैं भी तुझे अमृत पिलाऊंगा और तेरा दुःख दूर करूँगा ।"
एक समय काल पड़ने पर जाट समुद्र पर गया । पूर्वोक्त प्रकार सब समाचार सुनाये । वरुण देवता हाथ में अमृत का घड़ा लेकर प्रकट हो गए । जाट बोला - प्यास लगी है । तब वरुण देवता अमृत पिलाने लगे । जाट पीता - पीता तृप्त नहीं हुआ । वरुण देवता बोला - "अरे धापा कि नहीं ?" तब जाट बोला - "आज तक कोई अमृत से भी धापा है क्या ?" यह कहकर जाट बोला - "बस रहने दे" । वरुण देवता ने जाट को बहुत से रत्न दिए और विदा किया ।
इसी प्रकार भगवान् के भक्त, भक्ति रूपी अमृत से कभी तृप्त नहीं होते हैं ।
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*दादू जैसे श्रवणा दोइ हैं, ऐसे होंहि अपार ।*
*राम कथा रस पीजिये, दादू बारंबार ॥३२०॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जैसे यह दो श्रोत्र इन्द्रियां हैं, ऐसे रोम - रोम में अपार होवें, तो बारम्बार मनुष्य जन्म धारण करके राम - रस रूप कथा अमृत को पीते ही रहें ॥३२०॥ 
सुनत अरुचि नहिं हरि कथा, अचवत रस न अघात । 
जगन्नाथ सत्संग से, कबहुँ न मन अलसात ॥ 
(क्रमशः)

= परिचय का अंग =(४/३१५-७)


॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
*= परिचय का अंग - ४ =*
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*दादू माता प्रेम का, रस में रह्या समाइ ।*
*अन्त न आवै जब लगै, तब लग पीवत जाइ ॥३१५॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जो संतजन प्रेम का माता है, सो प्रेम रस में ही अभेद रहता है और अपने पंच भौतिक शरीर के अन्त तक परमेश्वर के प्रेम - रस को ही पीते हैं अथवा जब तक ब्रह्मवेत्ता पूर्ण ब्रह्मरूप नहीं होते, तब तक ब्रह्म विचार में ही मग्न रहते हैं ॥३१५॥ 
"कबीर" हरिरस अघट है, पीवत खरा मिठास । 
रसिया ताका अमिट है, अचवत अधिक पियास ॥ 
भांवता भावै सदा, कबहूँ भूख न जाइ ।
घृत होमें वासदेव, कबहूँ नाहीं अधाइ ॥ 
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*पीया तेता सुख भया, बाकी बहु वैराग ।*
*ऐसे जन थाके नहीं, दादू उनमनि लाग ॥३१६॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जितना राम रस पीया, उतना पूर्ण सुख प्राप्त हुआ है । क्योंकि अति अनुराग सहित राम रस पीते हैं और बाकी के मायाकृत पदार्था से वैराग्य बहुत है । ऐसे मुक्तजन अतृप्त भाव से, ब्रह्म स्वरूप विचार में मग्न होकर, "उनमनि" कहिए शून्य ब्रह्मभाव को प्राप्त होते हैं ॥३१६॥ 
दई सो देता ना थके, लेता थके न दास ।
जन रज्जब दोऊ अथक, जुग जुग बढे पियास ॥ 
*निकट निरंजन लाग रहु, जब लग अलख अभेव ।*
*दादू पीवै राम रस, निहकामी निज सेव ॥३१७॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! निरंजन देव परमात्मा के समीप लगे रहो । अन्तःकरण की वृत्ति को स्वरूप - चिंतन में लीन करिये । जब तक अलख, अभेव स्वरूप में मिलकर ब्रह्मरूप नहीं हो जाते, तब तक निष्काम भाव से विचार रूप परमात्मा की सेवा करो और निरंतर राम - रस पान करते रहो ॥३१७॥ 
(क्रमशः)

शुक्रवार, 28 दिसंबर 2012

= परिचय का अंग =(४/३१२-४)

॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
*= परिचय का अंग - ४ =*
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*टगा टगी जीवन मरण, ब्रह्म बराबरि होइ ।*
*परगट खेलै पीव सौं, दादू बिरला कोइ ॥३१२॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जीवन से मरण पर्यन्त "टगाटगी" अखण्ड ब्रह्म सुरति द्वारा ब्रह्मस्वरूप होकर आत्मा का साक्षात्कार करते हैं, उन्हें धन्य है । किन्तु ऐसे मुक्त पुरुष कोई बिरले ही होते हैं ॥३१२॥ 
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*दादू निबरा ना रहै, ब्रह्म सरीखा होइ ।*
*लै समाधि रस पीजिये, दादू जब लग दोइ ॥३१३॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जब तक प्राण - पिण्ड का सम्बन्ध बना हुआ है, तब तक नाम का स्मरण करता रहे । परमात्मा की भक्ति में कभी भी शिथिलता नहीं करना और लै कहिए नाम में तदाकार वृत्ति करके निदिध्यासन की परिपक्व अवस्था में स्थिर होकर ब्रह्मानन्द का पान करके ब्रह्मरूप होइये । जब तक सेवक के मन में सेव्यभाव विद्यमान है, तब तक भजन की पूर्णता नहीं है । पूर्ण ब्रह्मरूप होने तक क्षण भर भी चैन नहीं लीजिए ॥३१३॥ 
*न्यारे ने हीरा लह्यो, तो पर हेरत ठौर ।* 
*बहुरि बूझी बादशाह, अब क्यों ढूँढत और ॥* 
दृष्टान्त - एक न्यारा बैठा - बैठा मिट्टी छान रहा था । उसको एक हीरा मिल गया । बादशाह ने दूर से देखा और जान गया कि इसे अमोलक हीरा मिला है । बादशाह बोले - अब क्यों मिट्टी छानता है ? रत्न तो पा लिया तैंने । न्यारा बोला - "ढूंढता था, तभी तो पाया", अब ढूंढना कैसे छोड़ दूं ? दार्ष्टान्त में न्यारे के स्थान में जिज्ञासु है । आत्मा अनात्मा का विचार करना ही छानना है और परमात्मारूपी रत्न ही प्राप्त कर लेना है ।
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*बेखुद खबर होशियार बाशद, खुद खबर पैमाल ।*
*बेकीमत मस्तान गलतान, नूर प्याले ख्याल ॥३१४॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जो पुरुष "बाशद" = रात दिन, बेखुद = अकह, ब्रह्म वस्तु की खबर, जानकारी में तो होशियार तत्पर हैं, और जिनकी खुद की खबर, नाम, जगत और शरीर आदि का अध्यास, पैमाल = नष्ट हो गया है, वे मुक्तजन बे कीमत ब्रह्म में मस्त होकर गलतान = तद्रूप हो रहे हैं । ऐसे मुक्तपुरुषों को एक नूर स्वरूपी प्याले का भी ख्याल है ॥३१४॥ 
या साखी सुन औलिया, चल आयो आमेर । कथा करत गुरुदेव को, मुँह चालत लियो फेर ॥ 
दृष्टान्त - ब्रह्मऋषि दादू दयाल जी महाराज आमेर में विराजते थे । राजा मानसिंह के सहित सभी लोग गुरुदेव का प्रवचन सुना करते थे । एक रोज एक मुसलमान फकीर ने उपरोक्त साखी गुरुदेव की याद कर रखी थी, और विचार किया कि जिनको अपने आप की खबर नहीं है अर्थात अपने आपको भूले बैठे हैं, उनके दर्शन करना चाहिए, इस भावना को लेकर आया । 
जब दूर से गुरुदेव को प्रवचन करते देखा, तब विचार किया कि इनको तो सब खबर है । साखी में तो इन्होंने यह कहा है कि "खुद खबर पैमाल" कि हमने अपने आपको मिटा दिया है परन्तु यहाँ तो मैंने विपरीत रूप देखा । चलूं, यह विचार करके वापिस लौट चला । गुरुदेव उसके मन की बात जान गए और बुलाया "सांई, यहाँ आओ ? आप कैसे आये थे ? और कैसे लौट चले ?" पूर्वोक्त वृत्तान्त अपने मन का सतगुरु को कह सुनाया । 
सतगुरु महाराज ने इस साखी से ३१८ वीं साखी तक सांई को उपदेश किया । यह सुनकर सांई ने सतगुरुदेव को नतमस्तक प्रणाम किया और निश्चय किया कि सच्चे परमात्मा के आशिक अपने आप को मिटा देते हैं । जिन्होंने अपने अहंकार को मिटा दिया है और जो उनसे परमात्मा का मार्ग पूछने जिज्ञासुजन आते हैं, उनको दक्षता से मार्ग का उपदेश करते हैं, ऐसे महापुरुषों को धन्य है, धन्य है ।
(क्रमशः)

= परिचय का अंग =(४/३०९-११)


॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
*= परिचय का अंग - ४ =*
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*दादू जब दिल मिली दयालु सौं, तब पलक न पड़दा कोइ ।*
*डाल मूल फल बीज में, सब मिल एकै होइ ॥३०९॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जैसे वृक्ष के डाल, मूल, फल, फूल सब मिल करके बीज में एक रूप होते हैं । वैसे ही यह जीवात्मा परमानन्द में अभेद हुआ, तो फिर एक पलक का भी पड़दा अन्तराय सम्भव नहीं है अर्थात् पूर्ण अभेद एक रूप होता है ॥३०९॥ 
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*फल पाका बेली तजी, छिटकाया मुख मांहि ।*
*सांई अपना कर लिया, सो फिर ऊगै नांहि ॥३१०॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जैसे परिपक्व फल बेली को तज देता है और उस फल को खा लिया जाय या भून लिया जाय, तो फल के बीज को कहीं भी उपजाइये, वह नहीं उपजेगा । वैसे ही हरि के भजन और ज्ञान से जीवरूपी फल, पापों की निवृत्ति रूपी परिपक्व अवस्था को प्राप्त होकर शरीर रूपी बेली में अहं भावना अर्थात् विपरीत भावना से रहित अपने स्वरूप को निश्चय कर ले, तो फिर वह जीव जन्म - मरण रूपी संसार को नहीं प्राप्त होता है ॥३१०॥ 
"यथा हि भर्जितब्रीहि, बीजं नोत्पद्यते कदा ।"
जरगी जिनकी वासना, ब्रह्म अगनि के मांहि । 
"तुलसी" भूंदे अन्न ज्यों, सो फिर ऊगै नांहि ॥ 
"कबीर" सींध जल गई, आग लगी वन मांहि । 
बीज बेलि दोऊ जरी भी ऊगण की नांहि ॥ 
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*दादू काया कटोरा दूध मन, प्रेम प्रीति सों पाइ ।*
*हरि साहिब इहि विधि अंचवै, वेगा वार न लाइ ॥३११॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! इस काया रूपी कटोरे में शुद्ध मन रूप दूध है और इसमें निर्वासनिक प्रेम रूपी मिश्री मिलाओ । इस प्रकार अखण्ड प्रीति से फिर यह दूध परमेश्वर के अर्पण करो, तो परमेश्वर इस दूध को अवश्य पान करेंगे । इसमें किंचित् भी देर न लगाओ । इस मन को हरि रूप साहिब के समर्पित कर दो ॥३११॥ 
(क्रमशः)

गुरुवार, 27 दिसंबर 2012

= परिचय का अंग =(४/३०६-८)

॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
*= परिचय का अंग - ४ =*
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*दादू जब दिल मिली दयालु सौं, तब अंतर कुछ नांहि ।*
*ज्यों पाला पाणी कों मिल्या, त्यों हरिजन हरि मांहि ॥३०६॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जैसे पाला पिघल कर अपने कारण रूप पानी में मिलता है, तो फिर परस्पर में कुछ भी भिन्न - भाव नहीं रहता है । इसी प्रकार हरि के जन संतपुरुष जब प्रभु में अभेद हुए, तो अविद्या आदिक अन्तराय फिर नहीं रहते हैं ॥३०६॥ 
जल तरंग एको भई, पाला गलि जल मांहि । 
जीव ब्रह्म यों ही मिल्या, और प्रयोजन काहि ॥ 
जाका जतन करत जिसवासर, सो तो पाया ठांव । 
जतनी जतन एक ह्वै मिलिया, ये ही प्रयोजन नांव ॥ 
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*दादू जब दिल मिली दयालु सौं, तब सब पड़दा दूर ।*
*अैसैं मिल एकै भया, बहु दीपक पावक पूर ॥३०७॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जैसे बहुत से दीपकों को प्रज्वलित करके अग्नि में मिला देवें, तो वे तद्रूप हो जाते हैं । इसी तरह आत्म अभ्यास द्वारा अविद्यादिक पड़दा दूर करके संतजन ब्रह्मरूप हो जाते हैं ॥३०७॥ 
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*दादू जब दिल मिली दयालु सौं, तब अंतर नांही रेख ।*
*नाना विधि बहु भूषणां, कनक कसौटी एक ॥३०८॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जैसे स्वर्ण के नाना आभूषणों को अग्नि कसौटी देवे, तो केवल स्वर्ण शेष रहता है, उसी प्रकार संसार में जीवों के जो नानात्वरूप हैं, सो भी स्वर्ण के आभूषणों की भाँति संसार - दृष्टि से भिन्न - भिन्न प्रतीत होते हैं, किन्तु सत्य कसौटी ब्रह्मज्ञान होने पर उनमें किंचित् भी द्वैतभाव नहीं रहता है ॥३०८॥ 
(क्रमशः)

= परिचय का अंग =(४/३०३-५)

॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
*= परिचय का अंग - ४ =*
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*प्राण हमारा पीव सौं, यों लागा सहिये ।*
*पुहुप वास घृत दूध में, अब कासौं कहिये ॥३०३॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! श्री दयाल महाराज अपने को ही उपलक्षण करके, जिज्ञासुजनों के प्रति उपदेश करते हैं कि जैसे पुष्प में गंध और दूध में घृत एक रूप है, वैसे ही हमारा जीवात्मा एकाग्र होकर के अगर परमात्मा में निश्चल होवे तो पुनः यह बात किसको बतावें ? क्योंकि यह अवाच्य है ॥३०३॥ 
ईख मांझ गुड़ तेल तिलन में, पय मधि घी शुचि दार । 
यों आतम परमातमां, दीसै जुगति विचार ॥ 
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*पाहण लोह बिच वासदेव, ऐसे मिल रहिये ।*
*दादू दीन दयाल सौं, संग हि सुख लहिये ॥३०४॥* 
टीका - हे संतों ! जैसे पत्थर और लोहे में अग्नि अभेद होती है, इसी प्रकार दीन - दयाल परमेश्वर में अभेद होकर साथ में ही सुख प्राप्त करो ॥३०४॥ 
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*दादू ऐसा बड़ा अगाध है, सूक्षम जैसा अंग ।*
*पुहुप वास तैं पतला, सो सदा हमारे संग ॥३०५॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! परमेश्वर का व्यापक स्वरूप देखिये, सो वह अगाध है । अनन्त कोटि ब्रह्माण्ड उसमें समा रहे हैं और सूक्ष्म स्वरूप से देखें तो हे प्यारे ! जैसे पुष्प में सुगन्ध सूक्ष्म है, उससे भी अति बारीक होकर प्रभु अपने भक्तों के संग और नानारूप में रम रहे हैं ॥३०५॥ 
श्लोक - 
"अणोरणीयान महतो महीयान, 
आत्माSस्य जन्तोर्निहितं गुहायाम् । 
तमक्रतुं पश्यति वीतशोको, 
धातुः प्रसादात् महिमानमीशम् ॥"
"वेदान्ते सारसर्वस्वं, ज्ञानविज्ञानमेव च । 
अहमात्मा निराकारः, सर्वंव्यापी स्वभावतः" ॥ 
वेदान्तों का सार सर्वस्व यही है और यही ज्ञान विज्ञान है कि स्वभाव से सब में वर्तनेवाला वह अति सूक्ष्म और निराकार जो आत्मा है, वह मैं ही हूँ ।
ईख मांझ गुड़ तेल तिलन में, पय मधि घी शुचि दार ।
यों आतम परमातमां, दीसै जुगति विचार ॥ 
(क्रमशः)

बुधवार, 26 दिसंबर 2012

= परिचय का अंग =(४/३००-२)


॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
*= परिचय का अंग - ४ =*
.
*दादू पंचों संगी संग ले, आये आकासा ।*
*आसन अमर अलेख का, निर्गुण नित वासा ॥३००॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! यह जीवात्मा पंच ज्ञान इन्द्रियों सहित अमर अलेख के आसनरूप आकाश कहिए, हृदय स्थान में एकाग्र होकर निर्गुण ब्रह्म में नित्य निवास करता है ॥३००॥ 
.
*प्राण पवन मन मगन ह्वै, संगी सदा निवासा ।*
*परचा परम दयालु सौं, सहजैं सुख दासा ॥३०१॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! इस प्रकार से प्राण, सुरति और मन ब्रह्म में मग्न होकर संगी कहिए, परमेश्वर के साथ सदा निवास कहिए, ब्रह्म स्वरूप हो गए हैं और परमदयालु, परमेश्वर का साक्षात्कार होने से अनायास ही भक्तों को ब्रह्मानन्द की प्राप्ति हो गई है ॥३०१॥ 
.
*दादू प्राण पवन मन मणि बसै, त्रिकुटि केरे संधि ।*
*पाँचों इन्द्री पीव सौं, ले चरणों में बंधि ॥३०२॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! ध्यानावस्था में जो त्रिकुटी दर्शन होता है, उसके संधि कहिए, तीर पर प्राण पवन और मनरूपी मणि बसते हैं । इसलिये हे संतोँ ! वहाँ अपनी ज्ञान इन्द्रियों को परमेश्वर के चरणों में अर्पण करके ब्रह्म में अभेद हो जाओ ॥३०२॥
(क्रमशः)

= परिचय का अंग =(४/२९७-९)

॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
*= परिचय का अंग - ४ =*
.
*नूर न खेलै नूर सौं, तेज न खेलै तेज ।*
*ज्योतिन खेलै ज्योति सौं, दादू एकै सेज ॥२९७॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! व्यष्टि नूर रूप जीव, समष्टि चैतन्यरूप नूर से विचार द्वारा खेले तो मुक्त है, नहीं तो अमुक्त है । व्यष्टि तेज, समष्टि तेज से अभेदरूपी खेल खेले, तो मुक्त है । व्यष्टि ज्योति, समष्टि ज्योति से एकतारूप खेल खेले, इस प्रकार एक अन्तःकरणरूपी सेज पर अभेदतारूप आनन्द को अनुभव करता है ॥२९७॥ 
.
*पंच पदारथ मन रतन, पवना माणिक होइ ।*
*आतम हीरा सुरति सौं, मनसा मोती पोइ ॥२९८॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! अब सूक्ष्म माला का स्वरूप बताते हैं कि यह पंच ज्ञान इन्द्रियाँ तो मानो पांच प्रकार के नग हैं और पवित्र मन है, वह रत्न है । पांच प्राण माणिकरूप हैं, आतम कहिए साभास बुद्धि हीरा है और शुद्ध मनसारूप मोती है । सुरतिरूपी सुई द्वारा विचार रूपी धागे में यह माला पिरोइये ॥२९८॥ 
"भूमिरापोSनलो वायुः सं मनो बुद्धिरेव च ।
अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ॥" 
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*अजब अनूपम हार है, सांई सरीषा सोइ ।*
*दादू आतम राम गल, जहाँ न देखे कोइ ॥२९९॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! पूर्वोक्त प्रकार से आश्चर्यरूप, उपमा रहित जो "सांई" कहिए, परमेश्वर है, उसके लायक यह हार है । उसको अपने हृदय स्थान में, जहाँ दूसरा पामर - विषयी मानव कोई भी नहीं देख सकता है, वहाँ परमेश्वर के गले में यह हार पहनाइये तो इस जीवात्मा का जीवन धन्य है ॥२९९॥ 
*एक पुष्प कोउ पुरुष ले, हरि समर्प्यो आइ ।* 
*ता पुण्य के प्रभाव से, इन्द्र हुओ पुनि जाइ ॥* 
दृष्टान्त - एक पुरुष एक रोज बगीचे में घूमने गया । वहाँ चम्पा का महकदार पुष्प खिल रहा था । उसने तोड़ा और विचार किया कि यह पुष्प मेरी मित्र जो वेश्या है, उसको दूँगा तो वह मुझ पर बहुत प्रसन्न होगी । वह पुष्प लेकर अपनी मित्र के यहाँ गया । वह नहीं मिली । फिर विचार करने लगा, अब यह पुष्प तो मुरझा जाएगा । रास्ते में एक पंडित कथा बाँच रहा था । उसने सोचा, यह पुष्प कथा पर चढ़ा दें । फिर विचार किया कि कथा में यह न सुनाई पड़ जाये कि वेश्या के यहाँ जाना पाप होता है, पुष्प हाथ में लेकर दौड़ता हुआ फेंका तो पुष्प पुस्तक के ऊपर जाकर पड़ा । पंडित और लोग - बाग हँसने लगे । उन्होंने विचार किया कि वह पुष्प चढ़ाने का ही प्रेमी था, कथा सुनने का प्रेमी नहीं था । जब उसका अन्त समय आया तो यमदूत प्रकट हो गए । उसके लिंग शरीर को पकड़ कर यमराज के सामने ले जाकर खड़ा कर दिया । यमराज ने अपने कारिन्दा को हुक्म दिया कि इसके पाप - पुण्य देखो । कारिन्दा बोला - इसके पाप ही पाप हैं, एक पुष्प यह वेश्या के लिए लाया था, जब वह नहीं मिली तो उस पुष्प को भगवान् की कथा हो रही थी, उस जगह दौड़ते हुए फेंका, तो पुस्तक के ऊपर जा पड़ा । बस, इससे ऊपर इसका कोई अच्छा कर्म नहीं है । यमराज बोले - भगवान् की कथा पर पुष्प गिरा है इसलिए पुण्य तो जरूर हुआ है, उस पुण्य का फल दो घड़ी का सुख है । बाकी तो सब पाप का फल दुःख ही दुःख है । पहले तू कौन सा भोगेगा ? उसने विचार किया पहले सुख भोग लूं और इस यमराज को भी समझ लूं । बोला - मैं पहले सुख भोगूंगा । यमराज ने कामधेनु को बुलाया । और कहा - दो घड़ी के लिए जो यह कहे, वह काम आप करो । कामधेनु बोली - बोल भाई ! क्या चाहता है ? वह बोला - इस यमराज की गुदा में सींग देकर दो घड़ी तक इसे उठा ले । कामधेनु ज्यों ही यमराज की तरफ चली, तो यमराज आसन छोड़कर भगवान् विष्णु की तरफ दौड़ पड़े । पीछे - पीछे कामधेनु चली जा रही है । उसके पीछे - पीछे पापी चला जा रहा है और बोला - यह मैं आँख से देखूँगा । भगवान् के दरबार में तीनों जा पहुँचे । यमराज बोला - महाराज ! रक्षा करो । भगवान् बोले - जो दो घड़ी का यमराज को दुःख होता, वह इस दौड़ धूप के कष्ट से बराबर हो गया । इस पापी को ले जाओ और यमलोक की त्रास देओ । पापी बोला - महाराज ! यहाँ भी अन्याय होने लगा । भगवान् बोले - कैसे ? पापी बोला - "महाराज, जो मांगा, वह भी नहीं दिया और अब यमराज की त्रास का हुक्म दे दिया । यह अन्याय ही है । एक मेरी विनती तो आप स्वीकार करो ।" भगवान् - क्या ? पापी - "एक कागज के टुकड़े में यह लिख दो कि जो भगवान् का दर्शन करेगा, वह आज से नरक में जाकर त्रास भोगेगा ।" भगवान् - "यह तो हम नहीं लिखते ।" पापी - "क्यों महाराज ?" भगवान् - "हमारे दर्शन करने वाला किस तरह नरक में जा सकता है ?" पापी - "महाराज ! मुझे नरक में भेज रहे हो । मैं आपके दर्शन करके अब नरक में जा रहा हूँ ।" भगवान् यमराज से बोले - इसके तो सब पाप नष्ट हो गए, यह तो अब स्वर्ग में जाएगा और फिर दूसरे कल्प में इन्द्र बनेगा । वह भगवान् के एक पुष्प अर्पण करने से ही इस पद को प्राप्त हो गया ।
उपरोक्त हार जब राम को पहना दिया जाता है, तो वह जीवात्मा तो मुक्त ही हो जाता है ।
(क्रमशः)

मंगलवार, 25 दिसंबर 2012

= परिचय का अंग =(४/२९५-६)


॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
*= परिचय का अंग - ४ =*
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*चित्तन खेलै चित्त सौं, बैनन खेलै बैन ।*
*नैनन खेलै नैन सौं, दादू प्रकट ऐन ॥२९५॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! समष्टि चित्त से व्यष्टि चित्त खेले तब मुक्त है, फिर इसका बाहरी चिंतन खत्म हो जाता है । समष्टि वचन रूपी परमेश्वर से व्यष्टि वचन खेले तो बाहरी वक्त्रुत्व शक्ति खत्म हो जाती है और समष्टि नेत्ररूप परमेश्वर से जब व्यष्टि नेत्र विचार द्वारा खेले, तो फिर बहिरंग जगदाकार खेल की दृष्टि समाप्त हो जाती है अर्थात् अैन कहिए, जब स्वस्वरूप का परिचय हो जाता है, तो सभी बाहर के व्यापार रुक जाते हैं ॥२९५॥ 
.
*पाकन खेलै पाक सौं, सारन खेलै सार ।*
*खूबन खेलै खूब सौं, दादू अंग अपार ॥२९६॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! व्यष्टि पवित्र स्वरूप समष्टि पवित्र से खेले, तो फिर दुनियावी पवित्रता से अन्तर्मुख हो जाता है । व्यष्टि सार स्वरूप, समष्टि सार से खेले कहिए, अभेद होवे तो मुक्त है । व्यष्टि सुन्दरता, समष्टि सुन्दरता खूब से खेले कहिए अभेद होवे अर्थात् दृश्य अंग से आगे जो अपना अपार व्यापक चैतन्य है, जब उसको जान लिया तब और सब वासनाएँ नष्ट हो जाती हैं ॥२९६॥
(क्रमशः)

= परिचय का अंग =(४/२९२-४)


॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
*= परिचय का अंग - ४ =*
.
*दादू सूरतैं सुरति समाइ रहु, अरु बैनहुं सौं बैन ।*
*मन ही सौं मन लाइ रहु, अरु नैनहुँ सौं नैन ॥२९२॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! अपनी व्यष्टि सुरति को समष्टि सुरति रूप परमेश्वर में समा लेओ । अपने व्यष्टि बैन नाम वचन को समष्टि बैन रूप परमेश्वर में समाओ । अपने व्यष्टि मन को समष्टि मन में लय करो, क्योंकि यह उसी का स्वरूप है । अपने व्यष्टि नेत्रों को समष्टि नेत्र रूप परमेश्वर में अभेद करो ॥२९२॥ 
"खुदा नजर दे, तो सब सूरत खुदा की है ।"
.
*जहाँ राम तहँ मन गया, मन तहँ नैना जाइ ।*
*जहँ नैना तहँ आतमा, दादू सहजि समाइ ॥२९३॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! शुद्ध अन्तःकरण में जहाँ राम है, वहाँ ही मन राम रूप हो गया और वहीं नेत्रादि सम्पूर्र्ण इन्द्रियाँ परमात्मा परायण बन गई हैं और वहीं आत्मा कहिए, चिदाभास युक्त बुद्धि अपने अधिष्ठान चैतन्य में समा रही है ॥२९३॥ 
.
*जीवन मुक्ति, विषय वासना निवृत्ति*
*प्राणन खेलै प्राण सौं, मनन खेलै मन ।*
*शब्दन खेलै शब्द सौं, दादू राम रतन ॥२९४॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! व्यष्टि प्राण, समष्टि प्राण रूप परमेश्वर से खेले तो मुक्त है और नहीं तो अमुक्त है । ऐसे ही समष्टि रूप मन में व्यष्टि रूप मन खेले तो मुक्त है, नहीं तो अमुक्त है । समष्टि रूप शब्द ब्रह्म से व्यष्टि शब्द विचार द्वारा खेले तो मुक्त है, नहीं तो अमुक्त है । इस प्रकार वह राम रूपी रत्न ब्रह्म चैतन्य, हृदय - प्रदेश में स्थित है । उससे अभेद होइये ॥२९४॥
(क्रमशः)

सोमवार, 24 दिसंबर 2012

= परिचय का अंग =(४/२८९-९१)


॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
*= परिचय का अंग - ४ =*
.
*दादू सहजैं सहज समाइ ले, ज्ञानैं बंध्या ज्ञान ।*
*सूत्रैं सूत्र समाइ ले, ध्यानैं बंध्या ध्यान ॥२८९॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! स्मरण में सहज भाव होकर, सहज रूप परमेश्वर में समाइये और आत्मा के ज्ञान में संलग्न होकर अपरोक्ष ज्ञान रूप हो जाओ । इसी प्रकार "सूत्रैं" हिरण्य - गर्भ में सूत्र, व्यष्टि सूक्ष्म शरीर को अभेद करिये और ब्रह्म ध्यान में संलग्न होकर तद्रूप हो जाओ ॥२८९॥
.
*दादू दृष्टें दृष्टि समाइ ले, सुरतैं सुरति समाइ ।*
*समझैं समझ समाइ ले, लै सौं लै ले लाइ ॥२९०॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! अपनी दृष्टि को समष्टि चैतन्य रूप दृष्टि में समाओ अथवा व्यष्टि द्रष्टा को समष्टि द्रष्टा में विचार द्वारा अभेद करिये । समष्टि सुरतारूप चैतन्य में अपनी व्यष्टि सुरति को समा ले । समष्टि समझ रूप चैतन्य में अपनी व्यष्टि समझ को उसी का स्वरूप जानकर उसी में समा लो । अपनी व्यष्टि लय को समष्टि लय में लय द्वारा अभेद करो ॥२९०॥ 
.
*दादू भावैं भाव समाइ ले, भक्तें भक्ति समान ।*
*प्रेमैं प्रेम समाइ ले, प्रीतैं प्रीति रस पान ॥२९१॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! व्यष्टि भाव को समष्टि भाव में लय करिये । समष्टि भक्तिरूप परमेश्वर में अपनी व्यष्टिरूप आराधना को लय करिये । सर्व बाह्य विषयों से वृत्ति समेट कर ब्रह्म में संलग्न करके रसपान नाम आत्मरूप परमेश्वर के दर्शनामृत का अपनी आत्मा में पान करिए ॥२९१॥
(क्रमशः)

= परिचय का अंग =(४/२८६-८)


॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
*= परिचय का अंग - ४ =*
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*मन चित मनसा आत्मा, सहज सुरति ता मांहि ।*
*दादू पंचों पूर ले, जहँ धरती अंबर नांहि ॥२८६॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! मन, चित्त, बुद्धि, साभास अखण्ड अन्तःकरण, विशिष्ट जीवात्मा, पंचों इन्द्रियें, इन सबको ब्रह्म - विचार में वृत्तियों सहित संलग्न करिये । उस ब्रह्म के स्वरूप में पाँच तत्व एवं शब्दादिक गुणों का अभाव है ॥२८६॥ 
.
*दादू भीगे प्रेम रस, मन पंचों का साथ ।*
*मगन भये रस में रहे, तब सन्मुख त्रिभुवन - नाथ ॥२८७॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जब मन पंचों इन्द्रियों आदिक सहित प्रेम रस में ब्रह्म - परायण हुआ, तो फिर "मगन भये रस में रहे" अर्थात् भगवान् के प्रेम में तल्लीन होकर एकरस होते हैं । फिर उसके त्रिलोकीनाथ वश में हो जाते हैं ॥२८७॥ 
माठा तुरंग "हुसेन" मन अड़ा प्रेम की खोड़ । 
पग न धरे मग चलन को, ताजण टूटे करोड़ ॥ 
बालम चक्कर - व्यूह भो, मो मन अहमन नित्त । 
प्रेम प्रवेशा शिष्य यूं, निकसन जानत चित्त ॥ 
हुसेन भक्त कहता है - मेरा मन मादा और अड़ियल घोड़ा है जो प्रभु प्रेम की सँकड़ी गली(खोड़) में अड़ गया है । लोगों ने इसे बिरत करने हेतु बहुत प्रयत्न किये, अनेकों ताड़नाओं के चाबुक मार - मार कर तोड़ डाले, पर यह भक्ति - मार्ग से एक कदम भी नहीं हटा । गुरुपदेश से शिष्य का मन अभिमन्यु(अहमन) की भाँति प्रियतम प्रभु के प्रेमरूपी चक्रव्यूह में फँस तो गया, अब वह उससे निकल नहीं सकता ।
.
*दादू शब्दैं शब्द समाइ ले, पर आतम सौं प्राण ।*
*यहु मन मन सौं बंधि ले, चित्तैं चित्त सुजान ॥२८८॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! शब्द कहिए राम - नाम उच्चारण को अनहद शब्द में अभेद करिये, व्यष्टि शब्द समष्टि शब्द में लीन करिये और प्राण कहिए जीवात्मा को विचार के द्वारा परमात्मा में लीन करिये । इसी प्रकार इस व्यष्टि मन को समष्टि मन में जोड़िए । व्यष्टि चैतन्य को समष्टि चैतन्य में अभेद करिए । इस प्रकार पूर्ण ब्रह्म चैतन्य में अभेद हो जाइये ॥२८८॥
(क्रमशः)

रविवार, 23 दिसंबर 2012

= परिचय का अंग =(४/२८३-५)


॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
*= परिचय का अंग - ४ =*
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*अध्यात्म ध्यान
*शब्द सुरति लै सान चित्त, तन मन मनसा मांहि ।*
*मति बुद्धि पंचों आतमा, दादू अनत न जांहि ॥२८३॥* 
टीका - हे संतों ! शब्द, सुरति, चित्त, बुद्धि, पांचों ज्ञान इन्द्रियाँ, तन, मन, मनसा(इच्छा), आत्मा कहिए कारण शरीर, इन सबको एकाग्र वृत्ति करके परमेश्वर में लगाइये, अन्यत्र व्यर्थ क्यों भ्रमते हो ॥२८३॥ 
.
*दादू तन मन पवना पंच गहि, ले राखै निज ठौर ।*
*जहाँ अकेला आप है, दूजा नांही और ॥२८४॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! संतजन अपने तन, मन, प्राण और पंच इन्द्रियों को निग्रह करके स्वस्वरूप में लय लगाते हैं । और वह निज ठौर कैसा है ? जहाँ केवल ब्रह्मस्वरूप ही भासता है और द्वैतभाव का वहाँ पर अत्यन्त अभाव है । अपने शुद्ध स्वरूप में स्थित हो जाओ ॥२८४॥ 
.
*दादू यहु मन सुरति समेट करि, पंच अपूठे आणि ।*
*निकटि निरंजन लाग रहु, संगि सनेही जाणि ॥२८५॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! इस मन को, ब्राह्य सुरति समेट कर एवं पंच इन्द्रियों के विषय - व्यापार से हटाकर आत्म स्वरूप में लगाइये । आत्मा - स्वरूप परमेश्वर ही सदा परम स्नेही है । वह निरंजनदेव अपने हृदय में ही स्थित है । अपनी वृत्ति को उसी में लगाइये ॥२८५॥
(क्रमशः)

= परिचय का अंग =(४/२८०-२)

॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
*= परिचय का अंग - ४ =*
.
*भक्ति भक्ति सब कोइ कहै, भक्ति न जाने कोइ ।*
*दादू भक्ति भगवंत की, देह निरन्तर होइ ॥२८०॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! सर्व ही संसारीजन परमेश्वर की भक्ति का भाव दर्शाते हैं । किन्तु भक्ति का जो मर्म है, उसको संतों के अतिरिक्त और कोई भी नहीं जानते हैं, क्योंकि परमेश्वर की भक्ति शरीर के भीतर ही होती है और संसारीजन बाह्य साधनों में भटकते हैं ।
ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि - संन्यस्य मत्पराः । 
अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते ॥ 
तेषामहं समुद्धर्ता मृत्यु - संसार - सागरात् । 
भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम् ॥ 
नमःस्तुति अरु कर्म समर्पण, 
पूजा चरण ध्यान पुनि जान । 
कथा श्रवण षट् अंग भक्ति के, 
नीके हेतु इन्हें पहिचान ॥ 
.
*देही मांही देव है, सब गुण तैं न्यारा ।*
*सकल निरंतर भर रह्या, दादू का प्यारा ॥२८१॥* 
टीका - सत्व, रज, तम एवं आकाश आदिक गुणों से शून्य निरंजनदेव इस शरीर में व्यापक है और हे जिज्ञासुओं ! जो शरीर में व्यापक है, वही सारे ब्रह्माण्ड में भरपूर व्याप रहा है और वही प्रीतम प्यारा कहिए हमारा स्वस्वरूप है ॥२८१॥ 
देहो देवालयः प्रोक्तः स जीवः केवल: शिवः । 
त्यजेदज्ञाननिर्माल्यं सोSहम्भावेन पूजयेत् ॥ 
सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् । 
असक्तं सर्वभृच्चेव निर्गुणं गुणभोक्त्रु च ॥ 
अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः ।
शरीस्थोSपि कौन्तेय ! न करोति न लिप्यते ॥ 
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*जीव पियारे राम को, पाती पंच चढाइ ।*
*तन मन मनसा सौंपि सब, दादू विलम्ब न लाइ ॥२८२॥* 
टीका - हे प्यारे जीव ! अपनी ज्ञान इन्द्रियादिक पंच पाती को परमेश्वर परायण करके तन, मन और बुद्धि आदिक को परमात्मा के अर्पण करो । इसमें देरी नहीं करो ॥२८२॥ 
"कायेन वाचा मनसेन्द्रियैर्वा, 
बुद्धयात्मना वाSनुसृतस्वभावात् ।
करोति यद्यत् सकल परस्मै, 
नारायणायेति समर्पयेत् तत् ॥"
(भागवत)
(क्रमशः)

शनिवार, 22 दिसंबर 2012

= परिचय का अंग =(४/२७७-९)


॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
*= परिचय का अंग - ४ =*
.
*ये चारों पद पलंग के, साँई की सुख सेज ।*
*दादू इन पर बैस कर, साँई सेती हेज ॥२७७॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! इस साखी के चारों पद ही परमात्मा की हृदयरूपी सेज के मानो पाये हैं । अहंकार की निवृत्ति, अन्तःकरण की शुद्धि, वृत्ति की लय दिशा और स्वस्वरूप स्थिति, ये उस निर्विकल्प समाधिरूप पलंग के चार पाये हैं । ऐसे पलंग पर बैठकर परमात्मा से अति अनुराग करो ॥२७७॥ 
प्रथम विवेक वैराग्य पुनि, समाधि षट् सम्पत्ति । 
कहि चतुर्थ मुमुक्षुता, ये चव साधन सत्ति ॥ 
"विचार - सागर" ग्रन्थ में प्रतिपादित उक्त चार साधन भी चार पाये रूप ही जानिये ।
.
*प्रेम लहर की पालकी, आतम बैसे आइ ।*
*दादू खेलै पीव सौं, यहु सुख कह्या न जाइ ॥२७८॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! परमेश्वर के प्रेम की लहर ही मानो पालकी है, जिसमें "आतम बैसे आइ" अर्थात् आत्मज्ञानी पुरुष, तन - मन की सर्व वृत्तियाँ अन्तर्मुख करके स्वस्वरूप प्रेम में ही लयलीन होते हैं । इस प्रकार मुक्तजन अपने प्रीतम स्वरूप में ही रम रहे हैं और अब अकथनीय परमानन्द का अनुभव करते हैं ॥२७८॥ 
.
*अर्चना भक्ति*
*दादू देव निरंजन पूजिये, पाती पंच चढाइ ।*
*तन मन चंदन चर्चिये, सेवा सुरति लगाइ ॥२७९॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! पंच इन्द्रियों के शब्द आदिक को परमेश्वरार्थ विषयों को त्याग कर एवं ईश्वर अर्पण करके निरंजन को पूजिये और चन्दनरूप तन - मन को परमेश्वर में लीन करके परमेश्वर में अखंड सुरति लगा कर सेवा कीजिये ॥२७९॥ 
(क्रमशः)

= परिचय का अंग =(४/२७४-६)

॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
*= परिचय का अंग - ४ =*
.
*तेज पुंज "को बिलसना", मिलि खेलें इक ठांव ।*
*भर भर पीवै राम रस, सेवा इसका नांव ॥२७४॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! संतजन परमेश्वर का स्वरूप अनुभव करके उसी में अभेद होते हैं । "भर भर पीवैं राम रास" भक्तिभाव में पूर्ण लीन होकर भी संत भक्तिरस से तृप्त नहीं होते और अतृप्त भाव से निरंतर राम - रस में ही रत्त रहते हैं ॥२७४॥ 
.
*अरस परस मिल खेलिये, तब सुख आनंद होइ ।*
*तन मन मंगल चहुँ दिशि भये, दादू देखे सोइ ॥२७५॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! स्वस्वरूप का साक्षात्कार करके मुक्तजन परम सुखी होते हैं । ऐसे मुक्तजनों के तन,मन और चारों दिशायें मंगलमय हो जाती हैं और ये सर्वत्र परमात्मा को ही प्रत्यक्ष करते हैं ॥२७५॥ 
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*सुन्दरी सुहाग*
*मस्तक मेरे पांव धर, मंदिर माहीं आव ।*
*सैंयां सोवै सेज पर, दादू चम्पै पांव ॥२७६॥* 
टीका - हे प्यारे स्वामिन् ! आपके मिलने की मेरी जिज्ञासा को पूरी करें और मेरे अहंकाररूपी मस्तक पर आप अपने चरण रखकर मेरे हृदयरूपी मंदिर में प्रगट होइये । हे स्वामिन् ! आप मेरी वृत्ति रूपी सेज पर विराजिये ताकि मैं आपके पुंज रूपी चरणों को स्पर्श करके, कृत - कृत्य भाव को प्राप्त हो जाऊँ ॥२७६॥ 
तेज पुंज के चरण हैं, हाड़ चाम के नाहिं । 
तुलसी वेदों वर्णिये, हृदय कमल के माहिं ॥
(क्रमशः)

शुक्रवार, 21 दिसंबर 2012

= परिचय का अंग =(४/२७१-३)



॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
*= परिचय का अंग - ४ =*
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*ज्यों रसिया रस पीवतां, आपा भूलै और ।*
*यों दादू रह गया एक रस, पीवत पीवत ठौर ॥२७१॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! अब स्वयं परमेश्वर अपने भक्तों को उपदेश करते हैं कि जैसे रस का रसिया रस का आस्वादन अपनी ही प्रसन्नता के लिये लेता है, किन्तु रस पीवतां कहिए, आपा और परायापन के भाव को भूल जाते हैं । इसी प्रकार भक्ति - रस का आस्वादन लेते हुए भक्तजन माया व ब्रह्मभाव को भूलकर भक्तिरस में ही अभेद हो रहे है । अथवा हे मुमुक्षुओं ! रसिया की भांति परमेश्वर में अभेद होइये, तो शरीर आदिक का अध्यास भूलोगे ॥२७१॥ 
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*जहँ सेवक तहँ साहिब बैठा, सेवक सेवा मांहि ।*
*दादू सांई सब करै, कोई जानै नांहि ॥२७२॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जब भक्तजन परमेश्वर की भक्ति में एकरस होते हैं, तो भक्तों के हृदय में ही प्रकाशमान होकर अपने भक्तों की योग, क्षेम आदिक सब सेवायें परमेश्वर आप स्वयं करते हैं, किन्तु इस बात को भक्तों के अतिरिक्त दूसरा कोई नहीं जान पाता ॥२७२॥ 
सांभर नूँता सात को, भोगे दादू होइ । 
एक दिवालै भाकसी, दादू देखे दोइ ॥ 
"जैमल" जप हरि नाम को, हरिजी जैमल होइ । 
सैन्य हनी रणभूमि में, मर्म न जान्यो कोइ ॥ 
दृष्टान्त - सांभर झील में जब ब्रह्मऋषि विराजते थे, एक रोज एक साहूकार ने महाराज को घर ले जाने का निमंत्रण दिया । इस प्रकार उसी दिन सात निमंत्रण आए । महाराज ने विचार किया कि प्रभु भेज रहे हैं, आप ही स्वयं भक्तों के यहाँ पधारेंगे । प्रभु की प्रेरणा से पहले निमंत्रण आया, उसके साथ ब्रह्मऋषि पधार गए । फिर बाद में ब्रह्मऋषि का रूप बनाकर भगवान स्वयं झील में बैठ गए और दूसरा आया, तो उसके साथ चले गए । इस प्रकार सात निमन्त्रण भगवान ने दादू जी के रूप में जीमे । तब भक्तों को जानकारी हुई कि आज महाराज ने अपने सात रूप बनाए और सातों भक्तों की इच्छा पूर्ति की, परन्तु भगवान ने ब्रह्मऋषि को प्रगट करने के लिए लीला रची थी ।
*दूसरा परचा* - सांभर के हाकिम ने मजहबी लोगों के कहने पर दादूदयाल ब्रह्मऋषि को बुलवाकर कारागृह में बन्द कर दिया । परमेश्वर दादूदयाल का रूप बनाकर उसी देवालय में बैठ गए और पद गाने लगे । जब हाकिम को पता चला कि वह कारागृह में भी और कुटी में भी बैठे हैं, तब कारागृह से मुक्त करके चरणों में नत - मस्तक होकर प्रणाम किया और चरणों की धूल मस्तक में रमा कर महाराज के ज्ञान को ग्रहण करके कृत - कृत्य हो गया ।
*तीसरा परचा* - जैमल जी चौहान बौंली ग्राम के जागीरदार थे । ये दादूजी के प्रधान ५२ शिष्यों में माने जाते हैं । बौंली ग्राम को प्राचीन समय में "खालड़" और आजकल सबलपुर कहते हैं । जयमलजी चौहान अपना अधिकांश समय भगवद् भजन में लगाते थे । एक दिन प्रातःकाल जब वे भगवद्भक्ति में तल्लीन थे, एक द्वेषी ठाकुर ने दल - बल के साथ उनके ठिकाने पर चढ़ाई कर दी । 
तब अपने परमभक्त पर आई विपत्ति को टालने के लिये भगवान् ने सैन्य दल - बल सहित जयमल का रूप धारण करके शत्रु से जा भिड़े और शत्रु - दल को मार भगाया । जब विजयी सैन्य - दल ने ग्राम में आकर परमवीर जयमलजी द्वारा रणक्षेत्र में प्रदर्शित अद्भुत शूरवीरता का गुणगान लोगों को सुनाया तो लोग आश्चर्यान्वित होकर कहने लगे कि राव साहब जैमलजी तो भोर से ही पूजन - पाठ व हरिनाम स्मरण में व्यस्त हैं, बाहर निकले ही नहीं, देख लो ! परन्तु सभी सैनिक दावे के साथ कह रहे थे कि वे जोश - खरोश के साथ युद्धक्षेत्र में हमारा नेतृत्व कर रहे थे । जब सबने महल में जाकर जयमलजी को नाम - स्मरण में ध्यान - मग्न देखा तो उन्हें पूर्ण विश्वास हो गया कि भक्त - वत्सल भगवान् ने ही उनका दूसरा रूप धारण कर लिया था । इससे उनकी प्रसिद्धि दूर - दूर तक फैल गयी थी ।
*ईर्ष्या* - एक दुष्ट भेषधारी ने उन्हें मारने के लिये उन पर मारण - मन्त्र(मूठ) का प्रयोग भी किया था, जिसका जयमलजी चौहान ने तत्काल "रामरक्षा मन्त्र" की रचना करके मूठ को वापस लौटा दिया था । यह राम रक्षा - मन्त्र अत्यन्त प्रभावी है, जिसका चमत्कार देखा जा सकता है । साधु लोग इसका झाड़ा देकर भूतबाधा, रोग कष्ट आदि अनेक व्याधियों से व्यथित व्यक्तियों का कष्ट - निवारण करते देखे जाते हैं ।
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*दादू सेवक सांई वश किया, सौंप्या सब परिवार ।*
*तब साहिब सेवा करै, सेवक के दरबार ॥२७३॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! भक्तजन अपने मन इन्द्रियों के समस्त विषय - व्यापार से हटकर और व्यावहारिक धन, धान्य, पुत्र, स्त्री इन सबको परमेश्वर के अर्पण करके भक्ति में अखंड लीन रहते हैं । इस प्रकार सेवक ने परमेश्वर को अपने वश में कर लिया है और फिर परमेश्वर सेवक का सर्व व्यवहार आप ही पूरा करते हैं । भक्तजन प्रभु के पूर्ण सामथ्र्य भाव को अनुभव करके सदा निश्चेष्ट रहते हैं ॥२७३॥ 
"अनन्याश्चिनायन्तो मां ये जनाः पर्युपासते । 
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं बहाम्यहम् ॥ 
(गीता ९ - २२)
बलि प्रभु जीवन वश किये, तन धन सर्वस दीन्ह । 
दरवाजे दरबान ज्यों निसदिन सेवा कीन्ह ॥ 
दृष्टान्त - भक्त प्रहलाद के पौत्र और राजा विरोचन के पुत्र का नाम बलि था । उसने अपने गुरु शुक्राचार्य के मन्त्र और अपनी शक्ति से तीनों को जीत लिया और इन्द्र पद भी प्राप्त कर लिया । देवता उससे त्रस्त थे । वे अपनी रक्षा के लिये भगवान् विष्णु की शरण गये । क्योंकि राजा बलि निष्पापी और महादानी था, अतः भगवान् उससे युद्ध तो कर नहीं सकते थे । 
विष्णु ने तपस्वी ब्राह्मण का वेश बनाकर वामन रूप में बलि के पास गये और उसकी प्रशंसा के साथ उसके पूर्वजों का भी यश - गान करने लगे । आपके पितामह प्रहलाद की दृढ़ भक्ति और भगवत्प्रेम के आगे भगवान् को स्तम्भ चीर कर नृसिंह रूप में प्रकट होना पड़ा । आपके पिता विरोचन तो इतने उदारमना थे कि विप्रवेशधारी इन्द्र को उसकी याचना पर अपनी युवावस्था प्रदान कर दी । आपके प्रपितामह भी महान् वीर थे । आप बड़े भाग्यवान् हैं । अपनी व अपने पूर्वजों की प्रशंसा से प्रसन्न होकर राजा बलि ने कहा - वामनदेव, आप जो भी चाहें, मांग लीजिये । मैं देने को तैयार हूँ । 
वामन बोले - आज प्रातः मैं किसी सेठ के आँगन पर बैठा संध्या - पूजा कर रहा था तो उसने मुझे वहाँ से भगा दिया । मेरी संध्या अपूर्ण रह गई । मैंने सोचा कि मेरी भी अपनी थोड़ी सी जमीन हो तो निःसंकोच होकर अपनी संध्या - पूजा तो कर सकूं । अतः मात्र तीन कदम भर भूमि आप मुझे दान कर दें तो आप पुण्य के भागी होंगे । राजा बलि - महाराज, आपने मात्र इतना ही क्यों मांगा ? मैं तीन कदम भूमि तो क्या तीन ग्राम दे सकता हूँ । तीन कदम भूमि देते हुए तो मुझे बड़ा संकोच और लज्जा हो रही है । 
वामन - मैं तो संतोंषी ब्रह्मचारी ब्राह्मण हूँ । आवश्यकता से अधिक की इच्छा व संग्रह लोभ कहलाता है । लोभ असन्तोष तथा संग्रह विग्रह उत्पन्न करता है । मैंने गत जन्म में किसी को कुछ भी नहीं दिया था, इसीलिये मेरी ऐसी दशा हुई कि मुझे भिखारी बनना पड़ा । यदि आप दान नहीं दोगे तो आपकी भी ऐसी ही दशा होगी । यह मैं इसलिये कह रहा हूँ कि भिखारी मात्र भीख मांगने के लिये नहीं, मधुर वचनों या संगीत के माध्यम से लोगों को सन्मार्ग का ज्ञान करावें - "भिक्षुकाः नैव भिक्षन्ति, बोधयन्ति गृहे गृहे ।"
यह सदुपदेश सुनकर राजा बलि ने विप्र वामन को तीन कदम भूमि का दान संकल्पित कर दिया । ऐसा करते ही वामन ने विराट् स्वरूप धारण कर लिया और एक ही कदम में सारी पृथ्वी नाप ली । दूसरे चरण में ब्रह्मलोक को व्याप्त कर लिया । जब कोई स्थान ही नहीं बचा तो बलि ने दैन्य भाव से अपना मस्तक झुकाकर कहा - आप अपना तीसरा चरण मेरे मस्तक पर रखिये । 
परमात्मा द्रवित होकर बोले - तुमने मुझे सर्वस्व समर्पण कर दिया तो मैं तुम्हारा ऋणी हो गया । मैंने इन्द्र को स्वर्ग का राज्य दिया है, तुम्हें पाताल का राज्य देता हूँ और द्वारपाल बनकर मैं इसकी चौकसी करूँगा । अब मैं सेवक बनकर तुम्हारी सेवा करूँगा । जो आपा(अहंकार) भेंटकर प्रभु को वन्दन करता है, वही उसे बन्धन में रख सकता है ।
(क्रमशः)

= परिचय का अंग =(४/२६९-७०ख)

॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
*= परिचय का अंग - ४ =*
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*पीव सौं खेलूँ प्रेम रस, तो जियरे जक होइ ।*
*दादू पावै सेज सुख, पड़दा नाहीं कोइ ॥२६९॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! पूर्वोक्त कही हुई जो सौंज सामग्री है, उसको धारण करके प्रेम रस से परिपूर्ण भक्तजन जब अपने प्रीतम से खेलें, कहिए, स्वस्वरूप साक्षात्कार करें, तो संतों को पूर्ण संतोंष होता है । अर्थात् हृदयरूपी सेज पर संतात्मा ब्रह्मभाव अनुभव करके निरावरण होते हैं । फिर मुक्तजनों में कोई भी इच्छा, वासना नहीं रहती है ॥२६९॥ 
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*सूक्ष्म सौंज*
*सेवक बिसरै आप कौं, सेवा बिसरि न जाइ ।*
*दादू पूछै राम कौं, सो तत्त कहि समझाइ ॥२७०क॥* 
टीका - हे प्रभु ! आपकी भक्ति में ऐसी क्या अपूर्वता है, जो आपके भक्तजन अपने आपको भी भूल जाते हैं, परन्तु आपकी भक्ति को नहीं भूलते हैं । अर्थात् आपके भक्ति अमृत का निरंतर पान करके भी तृप्त नहीं होते हैं । यद्यपि भक्ति परमेश्वर की प्राप्ति का साधन मात्र है, तथापि भक्ति की यही एक अगाध महिमा है कि भक्त जन परमेश्वर का दर्शन करके भी भक्ति अमृत से तृप्त नहीं होते हैं और परमेश्वर से भी यही मांगते हैं कि "भक्ति मांगूं बाप भक्ति मांगूं, मूनैं थारा नामनो प्रेम लागो." इस प्रकार भक्ति की ही याचना करते हैं, क्योंकि भगवान् भक्ति - प्रिय हैं ॥२७०क॥ 
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*दादू सूतां पीछे सुरति निरति सूं, बालक ज्यूं पय पीवे ।*
*ऐसे अन्तर लगन नाम सूं, आतम जुग - जुग जीवे ॥२७०ख॥* 
भागवत् में भगवान् ने उद्धव जी से कहा है - 
न साध्यति मां तु योगो, न सांख्यं धर्म उद्धव ! 
न स्वाध्याय तपस्त्यागो, यथा भक्तिर्ममोर्जिता ॥ 
हे उद्धव ! योग, ज्ञान, स्वाध्याय, तप और वैराग्य मुझे उस प्रकार वश नहीं कर सकते, जिस प्रकार की प्रबला भक्ति मुझे वश करती है ।
उमा योग जप दान तप, नाना व्रत मख नेम । 
राम कृपा नहिं करहिं तस, जसि निस केवल प्रेम ॥ 
(क्रमशः)

गुरुवार, 20 दिसंबर 2012

= परिचय का अंग =(४/२६८)

॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
*= परिचय का अंग - ४ =*
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*॥ सौंज मंत्र ॥* 
सत्यराम, आत्मा वैष्णव, सुबुद्धि भूमि, संतोंष स्थान, मूल मंत्र, मन माला, गुरु तिलक, सत्य संयम, शील शुचिता, ध्यान धोवती, काया कलश, प्रेम जल, मनसा मंदिर, निरंजन देव, आत्मा पाती, पुहुप प्रीति, चेतना चंदन, नवधा नाम, भाव पूजा, मति पात्र, सहज समर्पण, शब्द घंटा, आनन्द आरती, दया प्रसाद, अनन्य एक - दशा, तीर्थ सत्संग, दान उपदेश, व्रत स्मरण, षट् गुण ज्ञान, अजपा जाप, अनुभव आचार, मर्यादा राम, फलदर्शन, अभि अन्तर सदा निरन्तर सत्य सौंज दादू वर्तते, आत्मा उपदेश, अंतर्गति पूजा ॥२६८॥
(प्रसंग - यह सौंज मन्त्र श्री दादूदयालजी ने जयमलजी कछवाहा को शिष्य बनाते समय आमेर में दिया था ।)
*सत्य*
टीका - निर्गुण ब्रह्म है, वही सत्य है । और जो बात जैसी देखी,सुनी एवं मन में हो, उसको वैसे ही वाणी द्वारा प्रकट करनासत्य कहलाता है ।
सत्य सु दोइ प्रकार, एक सत्य जो बोलिये ।
मिथ्या सब संसार, दूजो सत्य सु ब्रह्म है ॥
साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप ।
जाके हृदय साँच है, ताके हृदय आप ॥
श्लोक - 
नहि सत्यात्परो धर्मो, नानृतात्पातकं परम् ।
नहि सत्यात्परं ज्ञानं, तत्मात्सत्यं समाचरेत् ॥
सत्य से श्रेष्ठ अन्य कोई धर्म नहीं है और झूठ के बराबर अन्य कोई पाप नहीं है । ऐसे ही सत्य से श्रेष्ठ और कोई ज्ञान नहीं है । इसलिए सत्य का ही आचरण करना चाहिए ।
श्लोक -
सत्यं धर्मस्तपो योगः, सत्यं ब्रह्म सनातनम् ।
सत्यं यज्ञः परः प्रोक्तः, सर्वं सत्ये प्रतिष्ठितम ॥
धर्म, तप, योग, परब्रह्म, जितना कुछ कल्याणस्वरूप है, वह सब सत्य ही है । सत्य में सब आ जाता है । इसलिए सदैव आत्मा के अनुकूल आचरण करो ।
श्लोक -
यत्तदग्रे विषमिव, परिणामेSमृतोपमम् ।
तत्सुखं सात्विकं प्रोक्तं, आत्म - बुद्धिप्रसादजम् ॥
जो प्रथम तो विष की तरह कटु और दुःखदायक मालूम होता है, परन्तु पीछे अमृत के तुल्य मधुर और हितकारक बनाता है, वही सच्चा सात्विक सुख है, ऐसा सुख आत्मा और बुद्धि की प्रसन्नता से उत्पन्न होता है ।
शंका - आत्मा और बुद्धि की प्रसन्नता का क्या उपाय है ?
उत्तर - मिथ्या आचरण छोड़कर मनुष्य को सदैव सत्य का ही बर्ताव करना चाहिये । इसी से मन और बुद्धि को सच्ची प्रसन्नता प्राप्त होती है और ऐसा सच्चा सुख प्राá होता है, जिसका कभी नाश नहीं होता । सत्य से ही सारा संसार चल रहा है । यदि सत्य एक क्षण के लिये भी अपना कार्य बन्द कर दे, तो प्रलय हो जाय । संसार की भौतिक शक्तियाँ भी सब सत्य से ही चल रही हैं ।
"सत्यराम के आसरे, सप्त द्वीप नौ खण्ड ।
सत्यराम होता नहीं, बह जाता ब्रह्मण्ड ॥ "
श्लोक - 
सत्येन धार्यते पृथ्वी, सत्येन तपते रविः ।
सत्येन वाति वायुश्च, सर्वं सत्ये प्रतिष्ठितम ॥
सत्य से ही पृथ्वी, रवि इत्यादि सब स्थित हैं ।
सत्यमेव जयते, नानृतम् । सत्येन पन्था विततो देवयानः ॥
सत्य की ही विजय सदैव होगी, मिथ्या की नहीं । सत्य के ही मार्ग से परमात्मा मिलेगा । सब प्रकार के कल्याण का ज्ञान सत्य से ही होगा ।
सत्यव्रतं सत्यपरं त्रिसत्यं, सत्यस्य योनौनिहितं च सत्ये ।
सत्यस्य सत्यं ऋतसत्य - नेत्रं, सत्यात्मकं त्वां शरणं प्रपद्ये ॥
हे सत्यव्रत ! हे सत्य से भी श्रेष्ठ ! हे तीनों लोक और तीनों काल में सत्यस्वरूप ! हे सत्य के उत्पत्ति स्थान ! हे सत्य में रहने वाले ! हे सत्य के भी सत्य ! हे कल्याणकारी ! सत्य के मार्ग पर ले चलने वाले सत्य की आत्मा, हम आपकी शरण आये हैं ।
दादू सांई मेरा सत्य है, निरंजन निराकार ।
नाम निरंजन निर्मला, दूजा घोर अँधार ॥
राम "रमन्ति योगिनो यस्मिन्निति रामः ।" 
जो सब में रमा हुआ है, वह राम और जिसमें योगीजन विचरण करते हैं, वही राम है ।
राम = र + अ + म = र(वैराग्य), अ(ज्ञान), म(भक्ति) ।
"रकारहेतुर्वैराग्यं परमं यच्च कथ्यते ।
अकारो ज्ञानहेतुश्च, मकारो भक्तिहेतुकः ॥(महारामायण)
रकारोSनलबीजं स्यात् ये सर्वं वाडवादयः ।
कृत्वा मनोबलं सर्वं भस्मकर्म शुभाशुभम् ॥
अकारो भानुबीजं स्यात् वेदशास्त्रप्रकाशकम् ।
नाशत्येव सद्दीप्त्याSविद्या हृदये स्थिता ॥
मकारश्चन्द्रबीजं च पीयूषपरिपूर्णकम् ।
त्रितापं हरते नित्यं शीतलत्वं करोति च ॥
सर्वेषामेव मन्त्राणां, राममन्त्रः परात्परः ।
रामनाम्नः समुत्पन्नः, प्रणवो मोक्षदायकः ॥
शतकोटिमहामंत्राः चित्तविभ्रमकारकाः ।
तेषां मध्ये एकं रत्नं, रामेति अक्षरद्वयम् ॥
यह सौ करोड़ महामंत्र मैंने रचे हैं । ये चित्त में भ्रम पैदा करने वाले हैं । इन सौ करोड़ के बीच में दो अक्षर "राम" ही रत्नरूप हैं । यही हमारा देव है ।(वाल्मिकि)
ससै शील तन उपजै, ततै ताप तन जाइ ।
ररै रोग व्यापै नहीं, ममै मुक्त ह्वै जाइ ॥(सत्तराम) ॥
शंका - ऐसा जो सत्यस्वरूपी राम है, उसका पुजारी कौन है ?
उत्तर - आत्मा वैष्णव ।
*आत्मा वैष्णव
*
दंडवत डर छाडै नहिं, निडर न कबहुँ होइ ।
करै वन्दगी वन्दना, परम वैष्णव सोइ ॥
हरि डर, गुरु डर, गांव डर, चौथा धर्म अरु धाम ।
ऐते डर जिहिं उर बसैं, क्यौं न सरै सब काम ॥
छन्द - 
इन्द्रिय दवन कृपालु, क्रोध क्षमा सत्य भाखे,
पाप रहित सम दृष्टि, निष्कामी सुचि राखे ।
कोमल चित्त उदार, धर्मदत्त धीरजवंता,
निस्पृहा हरि शरण, मान रहित धीमंता ॥
जीत्यो अन्तःकरण, सावधान गुण गावे,
भोजन अल्प अनीह, निर्विकार पद पावे ।
षट् उर्मि वश करण, वांछित बुद्धि न कोई,
चतुरदास उणतीस गुण, कहिये वैष्णव सोई ॥
(षट् उर्मि = शीत, उष्ण, सुख, दुःख, मान, अपमान)
*सुबुद्धि भूमि*
स्थितप्रज्ञा ही शुद्ध भूमि है ।
बुद्धि भूमि को शुद्ध कर, चौको चोखी चाल । कलश कमल उपदेश जल, युक्ति जगन्नाथ रसाल ॥
सुरति चौका युक्ति धोती, तिलक करणी होय । भाव भोजन "नानका" बिरला बूझे कोय ॥
*संतोंष स्थान*
देह को प्रारब्ध आगे रहै, कल्पना छोड़ निष्कल्प होई । 
यथा लाभ वेद मुनि कहत हैं, परम संतोंष शिष्य जान सोई ॥
सत्य संतोंष धीरज दया, हित रुचि शर्म स्नेह । 
जगन्नाथ जगदीश की, सेवा शिरोमणि येह ॥
श्लोक - 
सर्पाः पिबन्ति पवनं, न च दुर्बलास्ते
शुष्कैस्तृणैर्वनगजा बलिनो भवन्ति । 
कन्दैः फलैमुनिवराःक्षपयन्ति कालं
संतोंष एव पुरुषस्य परमं निधानम् ॥
सर्प हवा पीकर रहते हैं, तथापि वे दुर्बल नहीं हैं । जंगल के हाथी सूखे तृण खाकर रहते हैं, फिर भी वे बली होते हैं । मुनिवर लोग कन्द, मूल, फल खाकर ही काल - क्षेप करते हैं । संतोंष ही मनुष्य का शांति स्थान और परम धन है । वासना - रहित वृत्ति की दशा ही उसका घर है ।
*मूल मन्त्र
*
मन्त्र - तन्त्र ग्रन्थों में मन्त्र शब्द की निरुक्ति(मन + त्र) दो शब्दों से की गई है अर्थात् व्यक्ति मनन करता हुआ जिससे त्राण(मुक्ति) प्राप्त करता है - "मननं विश्वविज्ञानं त्राणं संसार - बन्धनात् । यतः करोति संसिद्धिं मंत्र इत्युच्यते तदा ।" मन्त्र का उच्चारण गुप्त रूप से किया जाता है - "मंत्र्यते गुप्तं परिभाष्यते ।" क्योंकि मंत्र का सम्बन्ध अन्तःकरण(मन और बुद्धि) से होता है । मन्त्र सिद्धि - मन्त्र में जितने वर्ण होते हैं, उतने ही लक्ष(लाख) जाप नित्य करने से लक्ष्य(सिद्धि) की प्राप्ति का विधान कहा गया है ।
"ओमिति ब्रह्म विज्ञेयं मूलं संसारकारणम् ।"
"मननं सर्ववेदित्वं त्राणं संसार्यनुग्रहः । 
मननात् त्राणधर्मत्वान्मन्त्र इत्यभिधीयते ॥ "
दादू सींचे मूल के, सब सींच्या विस्तार । 
दादू सींचे मूल बिन, बाद गई बेगार ॥
*मन माला*
सतगुरु माला मन दिया, पवन सुरति सौं पोइ । 
बिन हाथों निसदिन जपै, परम जाप यों होइ ॥
रज्जब माला मन की, जाको सतगुरु देइ । 
सो सूत कांधे काठ का, कबहुँ भार न लेइ ॥
माला बनाई काठकी, जामें डाला सूत । 
माला बेचारी क्या करे, जपने वाला कपूत ॥
पांच पचीसों त्रिगुण मन, यह माला जिय हेर । 
रज्जब हित के हाथ से, आठों पहर सु फेर ॥
त्यों तिरिया पीहर बसे, सुरति रहे पिय मांहि । 
ऐसे जन जग में रहे, हरि को भूले नांहि ॥
*गुरु तिलक*
और सबै ही फीका, हरि नाम सबन का टीका ।
तत्त तिलक तिहुं लोक में, राम नाम निज सार । 
राम नाम बिन संतदास, कोइ न उतरे पार ॥
गुरु का सत्य उपदेश ही तिलक है ।
*सत्य संयम
*
शील सांच सन्तोष शुचि, संयम यह बपु होइ । 
यह नित प्रति संयम व्रत, पावन पातक खोइ ॥
*शील शुचिता*
शील सत्य हि स्नान शुचि, मंजन वपु हिय होय । 
यह नित प्रति संजम बरत, पावन पातक खोय ॥
ब्रह्मचर्येण तपसा देवा मृत्युमुपाघ्नतः ।
ब्रह्मचर्य और तप के बल पर ही देवता लोग मृत्यु को जीत लेते हैं । अखंड ब्रह्मचर्य की रक्षा पवित्रता है ।
मरणं बिन्दुपातेन, जीवनं बिन्दुधारणात् ।
वीर्य की एक बूंद भी शरीर से गिरा देना मृत्यु है और एक बूंद की भी अपने अन्दर रक्षा करना ही जीवन है ।
मृतका जल कर बपु मल हरिये । 
हरि गुण गा मन निर्मल करिये ॥ 
रागादिक त्यागे हृद शुद्धम् । 
शौच उभै विधि कहे प्रबुद्धम् ॥
"शील व्रतेष्वनतिचारः" अनतिचार का मतलब जीवन अस्त - व्यस्त न हो, शान्त और सबल हो । रावण के विषय में कुख्यात है कि वह दुराचारी था, किन्तु यह भी उसका विख्यात विशुद्ध व्रत था कि वह किसी नारी के साथ बलात्कार नहीं करेगा । यही कारण था कि वह सीता को हरण तो कर लाया किन्तु उसका शील - भंग नहीं कर पाया । इसका प्रमुख कारण उसका "शीलव्रत" था ।
"निरतिचार" व्रत के पालन में यदि कोई गड़बड़ न हो तो आत्मा और मन पर एक ऐसी गहरी छाप पड़ती है कि खुद का निस्तार तो होता ही है, अन्य भी जो इस व्रत और व्रती के सम्पर्क में आते हैं, प्रभावित हुए बिना नहीं रहते । अनतिचार व्रत पालन की महिमा अद्भुत है ।
दृष्टान्त - एक भिक्षुक था । झोली लेकर वह एक द्वार पर रोटी मांगने पहुँचा । रूखा जवाब मिलने पर भी नाराज न होकर आगे चला गया । एक थानेदार को उस पर तरस आ गया और उसने उसे रोटी लेने के लिये बुलाया । पर भिक्षुक थोड़ा आगे जा चुका था, इसलिये थानेदार ने एक नौकर के हाथ रोटी भिजवाई । "मैं रिश्वत का अन्न नहीं खाता, भइया ।" यह कहकर वह भिक्षुक आगे बढ़ गया । नौकर ने आकर थानेदार को भिक्षुक द्वारा कही बात सुना दी । ये शब्द उस थानेदार के मन में गहरे उतर गए । उसने रिश्वत लेना छोड़ दिया । भिक्षुक के निरतिचार व्रत ने थानेदार की जिन्दगी सुधार दी ।
जो लोग गलत तरीके से रुपये कमाते हैं, वे दान में अधिक उदारता दिखाते हैं । वे सोचते हैं कि दान द्वारा धर्म इकट्ठा कर लिया जाये तो पाप कर्म दोष नष्ट हो जाता है, किन्तु धर्म ऐसे नहीं मिलता । धर्म अपने श्रम से निर्दोष रोटी कमाकर दान देने में ही है ।
*ध्यान धोवती*
धर्म धारणा धोवती, भूत दया आचार । 
बरते लय विवेक सौं, बरतन सौंज विचार ॥
*काया कलश*
अनुभव सेझा कूप का, निगम कलश हैं चार । 
जन रज्जब ता नीर की, सब पंडित पनिहार ॥
मानव शरीर है, यही पूजा के जल का कलश है ।
*प्रेम जल*
छन्द -
प्रेम लग्यो परमेश्वर से तब, भूल गयो सबही घरबारा । 
ज्यूँ उनमत्त फिरै जित ही तित, नेक रही न शरीर संभारा ॥
श्वास उच्छ्वास उठे सब रोम, चले दृग नीर अखंडित धारा । 
सुन्दर कौन करै नवधा विधि, छाक पर्यो रस पी मतवारा ॥
*मनसा मन्दिर*
मनसा मैली पापिनी, पुण्य पानी से धोइ । 
सुमिरण साबुन देइ कर, रज्जब उज्वल होइ ॥
वृत्ति में सत्वगुण स्थिर करना, यही मंदिर बनाना है ।
*निरंजन देव*
दादू देव निरंजन पूजिये, पाती पंच चढ़ाइ । 
तन मन चन्दन चर्चिये, सेवा सुरति लगाइ ॥
छन्द -
जा प्रभु तैं उत्पत्ति भई यह, सो प्रभु है उर इष्ट हमारे । 
जो प्रभु है सबके शिर ऊपर, ता प्रभु को शिर ही हम धारे ॥
रूप न रेख अलेख अखंडित, भिन्न रहै सब कारज सारे । 
नाम निरंजन है तिन को पुनि, सुन्दर ता प्रभु की बलिहारे ॥
इस मंदिर में माया अविद्या की उपाधि रहित शुद्ध चैतन्य निरंजन की प्रतिष्ठा करना है ।
*आत्मा पाती*
दादू कच्छब अपने कर लिये, मन इन्द्रिय निज ठौर । 
नाम निरंजन लागि रहु, प्राणी परिहर और ॥
इन्द्रियों को अन्तर्मुख करना ही तुलसी - पत्र चढ़ाना है ।
*पुहुप प्रीति*
पुहुप प्रेम बरसै सदा, हरिजन खेलें फाग । 
अैसा अचरज देखिया, दादू मोटे भाग ॥
पुहुप सु पंच चढ़ाइये, पाती ताहि पचीस । 
कबीर प्रेम प्रीति सौं, सेवा करै जगदीश ॥
*चेतना चंदन*
चितवन चन्दन चरचि नित, सूक्ष्म सौंज सजंत । 
कबीर अन्तर आरती, अनहद नाद बजंत ॥
धूप ध्यान ही उर धरे, दीपक ज्ञान प्रकाश । 
चरचे चंदन चेतना, चेतन अंग सुवास ॥
*नवधा नाम*
नवधा दशधा नांव में, सब संतों की साख । 
जन रज्जब सो सुमरिये, कहा करे वीतराग ॥
श्लोक - श्रवणं कीर्तनं विष्णुं, स्मरणं पाद - सेवनम् । 
अर्चनं वंदनं दास्यं, साख्यं आत्मनिवेदनम् ॥
*भाव पूजा*
छन्द - आपने भाव ते सेवक साहिब
आपने भाव सबै कोउ ध्यावै । 
आपने भाव ते अन्य उपासत
आप न भाव ते भक्त हु गावै ।
आपने भाव ते दुष्ट संहारन
आपने भाव ते बाहिर आवै । 
जैसे हि आपनो भाव है सुन्दर
ताहि कूं तैसो हि होइ दिखावै ॥
*मति पात्र*
मति बुद्धि विवेक विचार बिन, मानस पशु समान । 
समझायां समझै नहीं, दादू परम गियान ॥
संकल्प रहित जो बुद्धि है, वही पूजा के पात्र हैं ।
*सहज समर्पण*
तन भी तेरा मन भी तेरा, तेरा पिंड पराण । 
सब कुछ तेरा, तूँ है मेरा, यह दादू का ज्ञान ॥
वृत्तियों को निद्र्वन्द्व करना यही समर्पण है ।
*शब्द घंटा*
घंटाघर में घोर धुनि, अनहद नाद बजन्त । 
कबीर तहाँ बिलंबिया, जहाँ आपै आप अनन्त ॥
प्रणव ध्वनिरूप घंटा है ।
*आनन्द आरती*
बाहर भीतर दर्शन भई, हिरदै तपति गई मोहि । 
जहँ तहँ राखौं दृष्टि भरि, तहँ तहँ देखौं तोहि ॥
अविगति आरत आरती, वारिये पुनि आहलाद । 
घंटा घट में घोर धुनि, बाजा अनहद नाद ॥
*दया प्रसाद*
दया सो तीन प्रकार की, मन बच कहिए काहि । 
हतै न काहू जीव को, शब्द न कहै दुखाहि ॥
स्वस्वरूप का परिचय प्राप्त होने की दया ही प्रसाद है ।
*अनन्य एक दशा*
दादू एकै दशा अनन्य की , दूजी दशा न जाइ । 
दूजा देखत जाइगा, एकै रहै समाइ ॥
लय वृत्ति की स्थिरता, समाधि दशा, वही एक दशा है ।
*तीर्थ सत्संग*
सत्संग नित्य प्रति कीजिये, मति होइ निर्मल सार रे । 
रति प्राणपति सौं उपजे, अति लहै सुख अपार रे ॥
मुख नाम हरि हरि उच्चरे, श्रुति सुणत गुण गोविन्द रे । 
रट ररंकार अखंड धुनि, तहँ प्रगट पूर्ण चन्द रे ॥
सतगुरु बिना नहीं पाइये, यह अगम उलटा खेल रे । 
कहै दास सुन्दर देखतां, होइ जीव ब्रह्म ही मेल रे ॥
*दान उपदेश*
दान कहत हैं उभै विधि, सुनि शिष्य करहि प्रवेश । 
एक दान कर दीजिये, एक दान उपदेश ॥
एक दान उपदेश, सु तो परमार्थ होई । 
दूसर अन्न रु वस्त्र, देही कर पोषै कोई ।
पात्र कुपात्र हु देख, भलि भूमि उपजे धानम् । 
सुन्दर देख विचार, उभै विधि कहिये दानम् ॥
*व्रत स्मरण*
दया निबैरता सर्व से, यह दो व्रत विचार । 
जगन्नाथ सबसे श्रेष्ठ, व्रत हि पर उपकार ॥
आत्म-चिंतन यह व्रत है ।
*षट् गुण ज्ञान*
अमानित्वं, अदंभित्वं, अहिंसा
क्षान्तिः(क्षमा), आर्जवम्(कोमलता) । 
आचार्योपासनं शौचं, स्थैर्यं आत्मनिग्रहः ॥(गीता १३ - ७)
गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं कि परम तत्व(ब्रह्मज्ञान) के लिये अपने जीवन में ये छः गुण लाने अनिवार्य है - 
(१) अभिमान का अभाव,(२) दम्भपूर्ण आचरण का अभाव,(३) हिंसात्मक वृत्ति का अभाव,(४) क्षम्य भाव(क्रोध का अभाव),(५) सरलता वा विनम्रता(६) गुरु में श्रद्धा व सेवा भाव ।
"छह ढाला"(जैन धर्म) में वर्णित छः गुण -
"समता सम्हारैं(थुति) उचारैं वन्दना जिन देव को । 
नित करैं श्रुतिरति करैं, प्रतिक्रम तजैं तन अहमेव को ॥
(१) समता(रागद्वेष न रखना),(२) स्तुति(प्रभु - प्रार्थना),(३) वन्दना(प्रभु एवं गुरुजनों को नमस्कार),(४) स्वाध्याय(ज्ञान व वैराग्य वर्धक शास्त्रों का मनन - चिन्तन),(५) प्रतिक्रमण(प्रायश्चित्त द्वारा दोष निवारण),(६) कायोत्सर्ग(देह ममता तथा अहंभाव का त्याग)
षट कर्म उज्वल करै, पांचों इन्द्रिय चित्त । 
नाम नेम नवधा धरै, अर्चा आरंभ नित्त ॥
*अजपा जाप*
मन पवन अरु सुरति सौं, आतम पकड़े आप । 
रज्जब लावे तत्व सो, यह अजपा जाप ॥
*अनुभव आचार*
दादू अनुभै काटै रोग को, अनहद उपजै आइ । 
सेझे का जल निर्मला, पीवै रुचि ल्यौ लाइ ॥
स्वरूप निश्चय साक्षात् परिचय रूप अनुभव ही साधक का आचार है ।
*मर्यादा राम*
मर्यादा परब्रह्म की, ममता छुवै न मूल । 
भैगत भाव रु भ्रम तज, रहो निःशंक न भूल ॥
सार्वभौम आत्मा की उपादेयता से भिन्न कोई कर्म या व्यापार न करना, यही मर्यादा है ।
*फल दर्शन*
ऐसा एक अनूप फल, बीज बाकुला नांहि । 
मीठा निर्मल एक रस, दादू नैनहुँ मांहि ॥
*अभिअंतर सदा निरंतर*
दादू निरंतर पीव पाइया, तीन लोक भरपूर । 
सब सेजों सांई बसै, लोक बतावैं दूर ॥
*सत्य सौंज दादू वर्तते, आत्म उपदेश अंतर्गत पूजा ॥*
ब्रह्मऋषि दादू दयाल जी महाराज कहते हैं कि जो सच्चे साधक हैं । उनके लिए यही सामग्री पूजा की है, जिसको संतजन उत्पन्न करते हैं । अब जिज्ञासुजनों को अन्तःकरण में पूजा करने की विधि का उपदेश ही धारण करना चाहिये ।
मातृवत् परदारेषु, परद्रव्येषु लोष्ठवत् । 
आत्मवत्सर्वभूतेषु, यः पश्यति सः पश्यति ॥
व्यापक ब्रह्म उपासना, सुन्दर अजपा जाप । 
यही जाप से जात हैं, सुन्दर सब ही ताप ॥
छन्द - 
स्वामी संगा देव अभंगा, निर्मल अंगा सेवै जू ।
कर भाव अनूपं पाती पुष्पं, गंधं धूपं खेवै जू ।
नहिं कोऊ आसं काटे पासं, इहि विधि दासं निष्कामं ।
शिष्य ऐसा जाने निश्चय आने, पूजा ठाने दिनयामं ॥
 ॥ इति श्री सौंज मंत्र की टीका ॥