मंगलवार, 30 अप्रैल 2013

= साँच का अंग १३ =(१३९/१४१)

॥ दादूराम सत्यराम ॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
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*= साँच का अंग १३ =*
*कस्तूरिया मृग* 
*दादू केई दौडे द्वारिका, केई काशी जांहि ।* 
*केई मथुरा को चले, साहिब घट ही मांहि ॥१३९॥* 
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! परमेश्‍वर सब प्राणियों के अन्तःकरण में ही है, परन्तु संसारीजन उसको अन्तः करण में पहचानते नहीं हैं । जैसे कस्तूरिया मृग, कस्तूरी के लिये इधर - उधर जंगल में दौड़ता है, वैसे ही अज्ञानीजन, बहिरंग तीर्थ - व्रत आदिकों में परमेश्‍वर को ढूंढते फिरते हैं ॥१३९॥ 
पूरब दौरे, पच्छिम दौरे, दौरत दक्षिण उत्तर । 
जगन्नाथ दौरे दिसि सबही, रहे राम उर अंतर ॥ 
*पूजनहारे पास हैं, देही मांही देव ।* 
*दादू ताको छाड़ कर, बाहर मांडी सेव ॥१४०॥* 
टीका ~हे जिज्ञासुओं ! सतगुरुदेव उपदेश करते हैं कि हे सेवा पूजन करने वाले भक्त ! तेरे हृदय में ही परमेश्‍वर निवास करते हैं, उनको अपने हृदय में जानकर नाम - स्मरण रूप पूजा कर अर्थात् अपने आत्म - स्वरूप का ही निश्‍चय कर, बहिरंग साधनों का त्याग कर दे ॥१४०॥ 
*सांच* 
*ऊपरि आलम सब करैं, साधू जन घट मांहि ।* 
*दादू एता अन्तरा, ताथैं बनती नांहि ॥१४१॥* 
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! संसारीजन तो बाह्य लोक दिखावा के लिये आचरण करते हैं, अर्थात् शरीर पर चिन्ह आदि धारण करके मूर्ति पूजा आराधना में लगे रहते हैं । परन्तु संतजन अपने अन्तःकरण प्रदेश में ही स्वस्वरूप ब्रह्म का साक्षात्कार करते हैं । संतों की और सांसारिक जनों की व्यावहारिक कार्य में एकता नहीं बनती है ॥१४१॥ 
देखि सन्यासी देहुरे, बैठे बोले मूढ । 
करि डंडवत मूरति फटी, तब तत्त समझ्यो गूढ ॥ 
दृष्टान्त ~ एक ब्रह्मनिष्ठ संत मन्दिर में जाकर बैठे । पुजारी आया और बोला ~ ऐसे ही बैठा है, नमस्कार नहीं किया ठाकुर जी को । संत की गर्दन पकड़ कर उनका मूर्ति की तरफ सिर झुकाया । मूर्ति के चटाक से दो टुकड़े हो गये । तब पुजारी ने गूढ तत्त्व समझा कि यह तो कोई जबरदस्त महापुरुष हैं । उनसे क्षमा याचना की । 
(क्रमशः)

= साँच का अंग १३ =(१३६/१३८)

॥ दादूराम सत्यराम ॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
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*= साँच का अंग १३ =*
*दादू सुकृत मारग चालतां, बुरा न कबहूँ होइ ।*
*अमृत खातां प्राणिया, मुवा न सुनिया कोइ ॥१३६॥* 
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! उत्तम मार्ग पर चलने वाले का कभी बुरा नहीं होता है, जैसे अमृत पीने वाला प्राणी आज तक मरा नहीं सुना, क्योंकि अमृत पीने वाला तो अमर ही हो जाता है, जैसे ~ राहू ने अमृत पीया, एक से दो हो गये, परन्तु मरा नहीं । देवताओं ने अमृत - पान किया, तब से देवताओं का नाम अमर पड़ गया । इसी प्रकार ज्ञान अमृत को पान करने वाले भक्त भी अमर भाव को प्राप्त होते हैं ॥१३६॥ 
सुकृत मारग चालतां, विघ्न बचै संसार । 
दुःख क्लेश छूटै सबै, जे कोइ लेइ विचार ॥ 
*कुछ नाहीं का नाम क्या, जे धरिये सो झूठ ।* 
*सुर नर मुनिजन बंधिया, लोका आवट कूट ॥१३७॥* 
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! जिस निर्गुण ब्रह्म में नाम, रूप, गुण, क्रिया, इन सबका अभाव है, तब उसका नाम और रूप क्या धरें ? कदाचित् धरें तो मिथ्या ही होगा, क्योंकि सत्व प्रधान मायाकृत उपाधि से ब्रह्म में सगुणता प्रतीत होती है । परन्तु वास्तव में विचार करें तो माया ही सत्य नहीं है, तो माया से प्रभावित ब्रह्म में सगुण भावना भी यथार्थ नहीं है । इसलिये अज्ञानी जीव, सुर, नर, मुनि, सब चैतन्य स्वरूप ब्रह्म को भूलकर मिथ्या माया मोह में आसक्त होकर तीन प्रकार की तापों को प्राप्त होते हैं । ‘कूट’ कहिये - वह निश्‍चय ही, जन्म - मरण में जाते हैं ॥१३७॥ 
*कुछ नाहीं का नाम धर, भरम्या सब संसार ।* 
*साच झूठ समझै नहीं, ना कुछ किया विचार ॥१३८॥* 
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! अज्ञानी संसारीजन ‘कुछ नाहीं, कहिए - ब्रह्म का माया के प्रभाव से सगुण स्वरूप मानकर अथवा माया के कार्य देवताओं को ब्रह्म जानकर अनन्त नामों की पक्षा - पक्षी में अर्थात् खींचा - तानी में भ्रम रहे हैं । तथा माया तो मिथ्या है, परन्तु वह ब्रह्म की सत्ता से सत्यवत् प्रतीत होती है । उसको सत्य मानकर, अज्ञानी संसारीजन, माया के कार्य विषय - वासनाओं में भ्रमते हैं ॥१३८॥ 
(क्रमशः)

सोमवार, 29 अप्रैल 2013

= साँच का अंग १३ =(१३३/१३५)

॥ दादूराम सत्यराम ॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
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*= साँच का अंग १३ =*
*कंकर बंध्या गांठड़ी, हीरे के विश्‍वास ।*
*अंतकाल हरि जौहरी, दादू सूत कपास ॥१३३॥* 
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! जो मन्दबुद्धि पुरुष यह कहता है कि हमारी भावना ही सिद्ध होगी, इसके प्रत्युत्तर में उपदेश करते हैं कि जो हीरों के विश्‍वास से कंकर भर लेवे, तो वे कंकर हीरे नहीं बन जाते हैं और केवल मिथ्या विश्‍वास से ही कपास का सूत स्वतः नहीं हो जाता है । इसी प्रकार से सर्वज्ञभाव का चिन्तन किये बिना कल्पित नाना देव आदि की उपासना से आत्मा की प्राप्ति सम्भव नहीं है ॥१३३॥ 
पति तिय सौंपि कपास, आप गयो परदेश में । 
कात्यौ नहीं उदास, पति आवत प्रपंच रच्यौ ॥ 
दृष्टान्त ~ एक कोई युवक था । उसकी स्त्री उसे यह कहती कि मैं पतिव्रता हूँ । आपके बिना मुझे रोटी नहीं भाती, पानी नहीं पीती । आपकी याद में हर समय बेचैन रहती हूँ । आप विदेश जाओगे, तो मैं किस प्रकार रहूँगी ? पति ने एक कोठा रूई का भर दिया और एक चरखा दे दिया और बोला कि देख, जब तक मैं न आऊं, तब तक इस रूई को कात - कात कर सूत का ढेर लगा दे । तेरी वृत्ति इसमें स्थिर हो जाएगी और तुझे मेरी याद नहीं आएगी । इसको कातेगी, इतने समय तक मैं आ जाऊँगा । 
यह कहकर विदेश रवाना हो गया । पीछे से उस स्त्री ने एक कूकड़ी भी नहीं काती और खूब सांसारिक वासनाओं में व्यस्त रही । पर - पुरुषों के संग फिरती रहती । इसी प्रकार समय सब निकाल दिया । पतिदेव घर आये, आने के साथ ही त्रिया - चरित्र कर लिया । कहने लगी ~ जब से आप गये हो, तब से मेरे सिर का दर्द शान्त नहीं हुआ । ऐसे ही पड़ी रहती हूँ । सूत कातने के लिये तबीयत ही नहीं की । पति ने कोठा वैसे ही रूई का भरा देखा और शरीर की आकृत्ति देखकर जान गया कि यह चरित्रवती नहीं है, चरित्रहीन है । उससे अपनी प्रीति हटा ली । ऐसे ही अनन्य भक्तों से सकामी अलग ही रहते हैं । 
*दादू पहली पूजे ढूंढसी, अब भी ढूंढस बाणि ।* 
*आगे ढूंढस होइगा, दादू सत्य कर जाणि ॥१३४॥* 
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! इस मंद - बुद्धि प्राणी ने प्रथम भी शरीर के अध्यास द्वारा नाना प्रकार के देवी - देवताओं को पूजा है और अब भी वही निश्‍चय है । अज्ञानीजन जन्म भर से इस शरीर का ही अंजन - मंजन, पालन - पोषण करता है । इसलिए यह देह का अध्यास भी स्वरूप - बोध में अन्तराय करता है और आगे भी शरीर के संस्कारों से जीवात्मा देह के बन्धन में ही बँधेगा ॥१३४॥ 
*भ्रम विध्वंसण* 
*दादू पैंडे पाप के, कदे न दीजे पांव ।* 
*जिहिं पैंडे मेरा पीव मिले, तिहिं पैंडे का चाव ॥१३५॥* 
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! परमेश्‍वर से विमुख ले जाने वाले मार्ग माया, मोह, तंत्र, मंत्र, अनुष्ठान और मूर्ति - पूजा आदिक में कभी भी निश्‍चय नहीं करना और ब्रह्म विचार रूप जिस करनी से, आत्मा का साक्षात्कार होता है, उसी मार्ग का अभ्यास करो ॥१३५॥
(क्रमशः)

= साँच का अंग १३ =(१३०/१३२)

॥ दादूराम सत्यराम ॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
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*= साँच का अंग १३ =*
*कालर खेत न नीपजै, जे बाहे सौ बार ।*
*दादू हाना बीज का, क्या पचि मरै गँवार ॥१३०॥* 
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! जैसे ऊसर भूमि में बीज बोने से फसल प्राप्त नहीं होती है, बल्कि बीज का नाश ही होता है । इसी प्रकार सांसारिक पामर विषयीजनों को उपदेश देने से भी उनको चेत नहीं होता है । वह कर्त्तव्य - परायण नहीं बनते हैं । उन कृतघ्नी गंवारों को उपदेश देना, उपदेश का दुरुपयोग ही करना हैं । वे संतों में दोष ही निकालते हैं । उनसे मौन ही अच्छा है ॥१३०॥ 
*कृत्रिम कर्ता* 
*दादू जिन कंकर पत्थर सेविया, सो अपना मूल गँवाइ ।* 
*अलख देव अंतर बसै, क्या दूजी जगह जाइ ॥१३१॥* 
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! अज्ञानी संसारी मनुष्य, परमेश्‍वर को हृदय में न देखकर परमेश्‍वर से विमुख रहते हैं और अपने मूल मनुष्य देह को वृथा ही, बहिरंग कल्पित देव आदि की उपासना में खोते हैं अर्थात् कंकर पत्थर आदिक जड़ पदार्थों में पच - पच कर मरते हैं ॥१३१॥ 
हरिदास सांची कहै, साहिबजी की सूंह । 
पाहन कूँ कर्त्ता कहै, ताका काला मुँह ॥ 
*पत्थर पीवे धोइ कर, पत्थर पूजे प्राण ।* 
*अन्तकाल पत्थर भये, बहु बूडे इहि ज्ञान ॥१३२॥* 
 टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! अब प्रस्तुत साखियों का विशेष विवरण, कारण ब्रह्म की उपासना से ही तात्पर्य है जो अब कारण ब्रह्म की उपासना में ही अधिकार रखते हैं, उनको बताते हैं कि ब्रह्म सम्पूर्ण सृष्टि का कारण है । 
सत संकल्प, सर्वज्ञ, स्वतंत्र है और वह ब्रह्म मेरा ही आत्मा - स्वरूप है अर्थात् मैं ही ब्रह्म हूँ । सर्वत्र अनन्त रूपों में मेरा ही सत् चित् आनन्द स्वरूप व्यापक है । इसी रीति के सर्व पदार्थों में जड़ - भाव त्याग करके, सर्वज्ञ और चैतन्य भाव से ब्रह्मा की उपासना युक्त है । 
इसी रीति से भगवान का उपलक्षण करके, मूर्ति - पूजन का भी भगवत् की सर्वज्ञता से ही मतलब है । किन्तु अल्प बुद्धिजन, केवल मूर्ति और मन्दिर में ही परमेश्‍वर को, एक देशीय, परिछिन्न मर्यादित मानकर परमेश्‍वर की सर्वव्यापकता का भाव, जो आत्म - कल्याण के लिए इष्ट है, उसको बिसर जाते हैं, सो अयुक्त है । 
इसलिये प्रस्तुत साखियों में परमेश्‍वर की जड़ता व परिछिन्नता के निषेध और चेतनता व सर्वज्ञता के पूर्णभाव को प्रगट करने मात्र में ही गुरुवाणी का अभिप्राय है और विचार - सागर के मतानुसार, ब्रह्म का चिन्तन परब्रह्म और अपरब्रह्म रूप से दो प्रकार से माना है । 
निर्गुण ब्रह्म की उपासना को परब्रह्म का चिन्तन माना है और इसका फल मोक्ष है । परन्तु अपरब्रह्म सगुण के सकामी उपासकों के लिये परम पद ब्रह्म लोक माना है । ब्रह्मलोक में पुनः पूर्वाभ्यास से ज्ञान होने पर मोक्ष होता है । इस रीति से जिज्ञासुओं के लिये निर्गुण ब्रह्म का चिन्तन ही युक्त है । उत्तम श्रेणी के पुरुषों के लिये, सगुण उपासना का निषेध और निर्गुण ब्रह्म की उपासना की विधि, लय - चिन्तन प्रक्रिया में भी प्रस्तुत साखियों का अर्थ ज्ञेय है । सर्व स्थावर जंगम जगत में एक चेतन ब्रह्म का भाव ही है । वही ब्रह्म की उपासना है ॥१३२॥
(क्रमशः)

रविवार, 28 अप्रैल 2013

= साँच का अंग १३ =(१२७/१२९)

॥ दादूराम सत्यराम ॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
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*= साँच का अंग १३ =*
*बासण विषय विकार के, तिनको आदर मान ।*
*संगी सिरजनहार के, तिन सौं गर्व गुमान ॥१२७॥* 
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! अज्ञानी संसारीजन, विषय - विकारी मनुष्यों को तो आदर सम्मान देते हैं, परन्तु परमेश्‍वर के भक्तों से गर्व, गुमान और द्वेष रखते हैं । उनके संसार - बन्धन और जन्म - मरण के दुःख कभी नहीं कटेंगे ॥१२७॥ 
कूबा की तिय भ्रात हित, खीर करी मतिहीन । 
संतन को करी राबरी, कूबा लीन्हा चीन्ह ॥ 
संतां आयां उनमनी, भाया आयां सूरी । 
केवल कूबा यों कहै, निकल घर की पूरी ॥ 
दृष्टान्त ~ पाली मारवाड़ के झीथड़ा गाँव में कुम्हार जाति के केवलकूबा भक्त थे । उनकी स्त्री कम्ब‘त थी । केवलकूबा जी के यहाँ संत खूब आते और सत्संग होता रहता । भगवान् के गुणानुवाद आप गाते और संतों से सुनते । परन्तु उनकी स्त्री संतों के लिए रसोई बनाती तो, मन में बहुत दुखी रहती और यह सोचती कि रोज - रोज नये मोडे सन्यासी आवें सैं, कोई जटावाला सै, कोई घोट - मोट आवै सै, कोई भगवां भेष वाला आवै सै, कोई टीके काढने वाला सै । मन में बड़ी रुष्ट रहती । 
केवलकूबा जी संतों को देखकर हरे हो जाते । एक रोज संतों की मण्डली आ गई । केवलकूबा जी संतों के दर्शन करके प्रफुल्लित हो गए । उधर स्त्री के भाई भी आ गये । भाइयों को देखकर स्त्री बहुत राजी हुई । केवलकूबा जी बोले ~ आज संत भी आये हैं और तेरे भाई भी आये हैं, खीर का भोजन बना ले । वह बोली ~ “संत तो रोज ही यहाँ आते रहते हैं, मेरे भाई तो आज ही आए हैं । संतों के लिए खीर क्या बनाऊँगी ? इनके लिये जहर घोलूंगी ।” 
केवलकूबा जी ने खूब बढिया दूध मंगवा दिया । उसने खीर चढा दी । इधर अड़ौस - पड़ौस से खट्टी लस्सी लाई, उसमें जौ का आटा घोल दिया, एक आंजला नमक का डाल दिया । इधर भाइयों के लिए खीर बनाई, संतों के लिए राबड़ी बनाई । 
केवलकूबा जी ने देखा कि खीर तैयार हो गई । संतों को बुलाया और चरण धोए । जितना परिंडे में पानी भरा था, उससे संतों के करमण्डलु वगैरा भर दिये, बाकी का गिरा दिया । स्त्री से बोले - “खीर तैयार हो गई ? पानी नहीं है, पानी भर ल्या, कुएँ पर सै ।” वह सोचने लगी कि निकम्मा कहीं इन मोडे - सन्यासियों को खीर न खिला दे, पर पानी तो जरूर लाना है । यह विचार कर, कुएँ पर पानी लेने गई । 
पीछे से केवलकूबा जी ने संतों को जिमाना शुरू कर दिया । तत्काल पानी लेकर लौटी । देखा तो संत खीर जीम रहे हैं । देखते ही जल भुन गई और गालियां देने लगी । संत लोग बोले ~ “भक्त जी, माता राम गालियां देती हैं । कूबाजी बोले ~ “महाराज ! यह यूं कहती है, भजन गा गा कर खाओ, चुपचाप क्यों खाते हो ?” तो किसी संत ने श्‍लोक बोल दिया, किसी ने भजन गा दिया और फिर खीर खाने लगे । जब केवलकूबा जी ने देखा कि यह ऐसे नहीं मानती है, तब आप बोले ~ 
हरि के लेखै रूखा - सूखा, बूरा - भात चमारां नै । 
ऐसा काम करै मत भाई, ले डूबेगी सारां नै ॥ 
फिर बोले ~ “मूर्ख ! यह सन्तों के प्रताप से ही सब कुछ आ रहा है, उनको तू खाटी राबड़ी पिलाती है और तू सांसारिक विषयी - पामर जीवों को खीर खिलाती है । ऐसे काम करने से दोनों कुलों को डुबोवेगी । तू घर से बाहर हो जा ।” उसके बाद स्त्री पति के चरणों में पड़ गई, अपना अपराध क्षमा चाहा और ईश्‍वर के सन्मुख होकर संतों की सेवा द्वारा अपना कल्याण कर लिया । सब पाप - ताप से मुक्त हो गई । 
*अंधे को दीपक दिया, तो भी तिमिर न जाय ।* 
*सोधी नहीं शरीर की, तासन का समझाइ ॥१२८॥* 
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! जैसे अन्धे मनुष्य को रोशनी दिखाने पर भी उसका अहंकार नहीं मिटता है, वैसे ही जिन पुरुषों का मन पवित्र और निर्वासनिक नहीं बना है, उनको ज्ञान उपदेश देने से भी उनके अज्ञान रूप अन्धकार का नाश नहीं होता है ॥१२८॥
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*सगुरा निगुरा* 
*दादू कहिए कुछ उपकार को, मानै अवगुण दोष ।* 
*अंधे कूप बताइया, सत्य न मानै लोक ॥१२९॥* 
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! जैसे अंधा मनुष्य मार्ग के कूप आदि बताने वाले पुरुष पर क्रोध करता है और उसकी आज्ञा नहीं मानता है, उसका फल तो अंधे का कूप में गिरना है । इसी प्रकार सांसारिक विषयी - पामर अज्ञानियों को संतजन उपदेश करें कि कुछ तन - मन - धन से उपकार किया करो, अर्थात् दीन - दुखी गरीबों की सेवा किया करो और ईश्‍वर का नाम स्मरण करो, तो वह अज्ञानी उस शिक्षा को अवगुण रूप समझते हैं और उनसे द्वेष करते हैं । वे इस संसार रूपी कूप में ही गिरते हैं ॥१२९॥ 
(क्रमशः)

= साँच का अंग १३ =(१२४/१२६)

॥ दादूराम सत्यराम ॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
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*= साँच का अंग १३ =*
*दादू पानी के बहु नाम धर, नाना विधि की जात ।*
*बोलणहारा कौन है, कहो धौं कहाँ समात ॥१२४॥*
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! संसारीजन एक ही पानी के चड़स का जल, मटके का जल आदि, बहुत से नाम रखकर भ्रम में उलझ रहे हैं । इसी प्रकार ‘धौं’ कहिए, निश्‍चय ही अज्ञानीजन चेतन सत्ता के अनेकों नाम धरकर जाति - पांति, नाम रूप, ऊंच - नीच आदि में बांध रखा है । परन्तु हे अज्ञानियों ! वास्तविक विचार कर देखो कि यह बोलने वाला जीवात्मा कौन है ? और अन्त समय में यह किसमें समाता है अर्थात् जीवात्मा का शुद्ध रूप क्या है ? इसका कोई भी विचार नहीं करते हैं ॥१२४॥ 
*जब पूरण ब्रह्म विचारिये, तब सकल आत्मा एक ।*
*काया के गुण देखिये, तो नाना वरण अनेक ॥१२५॥*
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! उपरोक्त साखी के सिद्धान्त को ही स्पष्ट करते हैं अर्थात् जब ब्रह्म की पूर्ण सर्व - व्यापकता का विचार करिये तो सब जीवात्मा एक ही रूप हैं, क्योंकि सर्व में एक ही चेतन की सत्ता भासती है । और जो शरीर के गुणों और स्वभावों का विचार करें तो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य आदिक अनेक वर्ण हैं तथा सर्व की आकृति भी अलग - अलग देखने में आती है, परन्तु ये सब मिथ्या हैं । एक चेतन सत्ता ही सत्य है ॥१२५॥ 
एक एव हि भूतात्मा भूते भूते व्यवस्थितः । 
एकधा बहुधा चैव दृश्यते जलचन्द्रवत् ॥ 
*अमिट पाप प्रचण्ड*
*भाव भक्ति उपजै नहीं, साहिब का प्रसंग ।*
विषय विकार छूटै नहीं, सो कैसा सत्संग ॥१२६॥*
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! जहाँ ईश्‍वर की चर्चा में श्रद्धा - प्रेम उत्पन्न नहीं होवे और सांसारिक विषय - विकारों का छुटकारा नहीं होता, तो वहाँ कैसा सत्संग है ? ऐसा संग तो निष्फल होता है, वह तो कुसंग ही है ॥१२६॥
(क्रमशः)

शनिवार, 27 अप्रैल 2013

= साँच का अंग १३ =(१२१/१२३)

॥ दादूराम सत्यराम ॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
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*= साँच का अंग १३ =*
*सांप गया सहनाण को, सब मिलि मारैं लोक ।*
*दादू ऐसा देखिए, कुल का डगरा फोक ॥१२१॥*
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! जैसे सांप के निकल जाने पर लीक पीटने से कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होता है, अर्थात् सांप नहीं मरता है, इसी प्रकार प्राणी के प्राणान्त होने पर फिर मृतक के निमित्त श्राद्ध और क्रिया - कर्म कराने से मुक्ति प्राप्त नहीं होती । सतगुरु भगवान् उपदेश करते हैं कि रूढि मर्यादा ये सब मिथ्या हैं । इनसे आत्म - कल्याण नहीं होता है किन्तु यह तो गधा - खुजाल धर्म है ॥१२१॥ 
गया पिंड धोती खुली, सुत पुनि तैसे धारि । 
पीर फूलो तीर पै, बालक को जु उतारि ॥ 
दृष्टान्त ~ एक वैश्य था । वह अपने लड़के को साथ लेकर, अपने बाप के पिंड भराने गयाजी गया । फलगु नदी में जब पिंड भरा दिये, पंडा बोला ~ “सूर्य को अर्घ्य दो ।” तो दोनों हाथों में जल लेकर जब खड़ा होने लगा, तो पीछे से धोती का पल्ला एड़ी के नीचे दबकर खुल गया । 
तब लड़के ने पिता की तरफ देखा, अपने मन में उस बात को रख लिया । जब सूर्य को अर्घ्य दे चुका, तो धोती की लांग अच्छी तरह टांग ली । पंडे को दक्षिणा वगैरा देकर घर आ गये । जब उसका शरीर बर्त गया, तब वह लड़का अपने बाप के पिंड भराने गया । पिंड भराये । पंडा बोला ~ “सूर्य को अर्घ्य दो ।” 
लड़का अपनी धोती की लांग खोलने लगा । पंडा ने पूछा ~ “यह क्या करते हो ?” लड़का बोला ~ “हमारे कुल का धर्म है कि सूर्य को लांग खोलकर जल देते हैं । मेरे पिता के साथ मैं आया था, तब उनने जब सूर्य को जल दिया, तो धोती लांग खोलकर जल दिया था ।” पंडा बोला ~ ऐसा नियम नहीं है । लड़का ~ हमारे तो यह कुल का नियम है । मैं तो वैसे ही अर्घ्य दूँगा, जैसे मेरे बाप ने दिया था । इसको रूढिवाद कहते हैं ।
दूसरा दृष्टान्त ~ ऐसे ही किसी कारण से, एक गृहस्थी ने अपने बच्चे का जङूला नदी के किनारे पीर के उतारा । वहाँ बहुत कौए थे । उनको उड़ाने के लिए उस आदमी ने एक सींक(बतौर तीर) हाथ में ले ली । पीछे वालों ने अपना धर्म बना लिया कि हम उस पीर के हाथ में सींक(तीर) लेकर ही अपने बच्चों के जड़ूले उतरवावेंगे । इसे रूढिवाद कहते हैं ।
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*दादू दोन्यूँ भरम हैं, हिन्दू तुरक गंवार ।*
*जे दुहुवाँ थैं रहित है, सो गहि तत्त्व विचार ॥१२२॥* 
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! क्या हिन्दू और क्या मुसलमान, दोनों ही भ्रम में बंधे हैं अर्थात् सकाम कर्मों में फँसे हैं । परन्तु आत्मा में न तो हिन्दूपना है और न ही मुसलमान पना है, इन दोनों से ही आत्मा रहित है । आत्मा का न कोई गुण स्वभाव ही है, क्योंकि आत्मा निर्गुण है । इसलिए मुक्त पुरुष संसार के व्यावहारिक चाल - चलन से छूटे हुए हैं, अर्थात् आत्मस्वरूप के चिंतन में मग्न रहते हैं ॥१२२॥ 
हिन्दू को हिन्दुवाना भावै, तुरकन को तुरकाना । 
जगन्नाथ दोऊ सौं न्यारा, पुरुस पंथ मनमाना ॥ 
कुरान कहै पश्‍चिम दिसा, पूरब दिसि कहै वेद । 
‘रज्जब’ दिल हि दीवान था, गुरु बताया भेद ॥ 
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*अपना अपना कर लिया, भंजन मांही बाहि ।*
*दादू एकै कूप जल, मन का भ्रम उठाहि ॥१२३॥* 
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! एक कूप के जल को, अपने अपने बर्तन में भरकर संसारीजन अपने अपनेपन का मिथ्या अभिमान करते हैं । इसी तरह जाति - पांति, ऊँच - नीच, भेद - भाव, नाम रूप, अनेक नाम, अनेक रूप, आदि का मिथ्या भ्रम उठाकर झगड़ते हैं । इसको तत्त्वज्ञान से अर्थात् आत्म - विचार से दूर करिये । क्योंकि चैतन्य सत्ता सबमें समान रूप से ही विद्यमान है ॥१२३॥ 
(क्रमशः)

= साँच का अंग १३ =(११८/१२०)

॥ दादूराम सत्यराम ॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
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*= साँच का अंग १३ =*
*भ्रम विध्वंसण*
*अपनी अपनी जाति सौं, सब को बैसैं पांति ।* 
*दादू सेवग राम का, ताके नहीं भरांति ॥११८॥* 
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! अपनी - अपनी जाति में सब कोई मिलकर बैठते हैं, परन्तु राम के सेवक जो हैं, वे किसी से भेद भ्रान्ति नहीं करते । केवल एक राम की सत्ता को सर्वत्र अनुभव करते हैं ॥११८॥ 
*चोर अन्याई मसखरा, सब मिलि बैसैं पांति ।* 
*दादू सेवक राम का, तिन सौं करैं भरांति ॥११९॥* 
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! अज्ञानी संसारीजन जातीय पक्षपात करके चोर, अन्यायी, मखौली, सबको अपनी पंगति में बैठाते हैं, किन्तु परम पवित्र भक्तों से भ्रान्ति करते हैं । तथापि मुमुक्षुजन, “ईश्‍वर की ही व्यापकता का निश्‍चय करके सब प्राणियों में समता का भाव रखते हैं ॥११९॥” 
धाम सौंप शिष्य को गयो, तीरथ बद्रीदास । 
फिर आयो बहु काल में, रोटी देत उदास ॥ 
दृष्टान्त ~ एक बद्रीदास नाम का बैरागी साधु था । उसके मन्दिर, जमीन जायदाद बहुत थी । उसके एक चेला था । चेला जब बड़ा हो गया, तब बद्रीदास बोले ~ “भाई ! यह मन्दिर, जमीन, जायदाद, यह नकद रुपया, तू संभाल और मैं चार धाम तीर्थ करने जा रहा हूँ ।” 
बद्रीदास यात्रा करने चल पड़े । जहाँ - तहाँ भ्रमण करता हुआ चारों धाम करके बहुत काल में वापिस लौटा । पीछे से चेले ने अपनी शादी कर ली । दो चार बाल - गोपाल हो गये । परन्तु उसकी स्त्री बड़ी फूहड़ थी । कहीं मन्दिर में मक्खियां भिन - भिना रही हैं, कहीं गन्दगी पड़ी है, कहीं जूठे बर्तन पड़े हैं, कहीं कुत्ते चाट रहे हैं । ‘फूहड़ चालै नौ घर हालै’ - ऐसा हाल हो रहा था । 
उधर से बद्रीदास जी सांयकाल को आये । जब मन्दिर में घुसने लगे, तब वह बोली ~ “कहाँ घुसता है अन्दर ? कुछ उठा कर ले जाएगा क्या ? बाहर बैठ ।” बद्रीदास इधर - उधर देखने लगे । इतने में चेला आया, बद्रीदास को नमस्कार, प्रणाम नहीं किया और टेढा - मेढा देखता हुआ मन्दिर में चला गया । 
तब बद्रीदास बोले ~ “भाई ! देख, ठाकुर जी का मन्दिर है, इसमें पवित्रता रहनी चाहिये । पहले हम कैसी पवित्रता रखते थे । अब यह तैंने क्या कर रखा है ?” चेला बोला ~ “अब ठाकुर जी इसी प्रकार राजी हैं, तुम्हारी पवित्रता से राजी नहीं हैं । अपनी पवित्रता अपने पास रखो ।” दो रोटी फेंक कर मारी “खाले, खानी हैं तो; नहीं तो अपनी झोंपड़ी अलग बांध ले ।” रोटी देने में भी उदासीनता दिखलाता है । स्त्री के भाई - बन्धु आये, उनसे प्यार करने लगा । बद्रीदास देखकर उदास हो गये । सांसारिक प्राणी राम के सेवकों से भ्रान्ति करते हैं । 
*दादू सूप बजायां क्यों टलै, घर में बड़ी बलाइ ।* 
*काल झाल इस जीव का, बातन ही क्यों जाइ ?१२०॥* 
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! संसारी जीव मंत्र, तंत्र, सकाम कर्मों का अनुष्ठान करने से ही अन्तःकरण के काम, क्रोध, लोभ, मोह, विषय - वासना रूप काल की झाल से नहीं बचेंगे । केवल शब्दों के ज्ञान से ही इनको हटाना चाहे तो, यह तो सूप का बजाना है । जैसे किसी के घर में शेर आ घुसे और वह सूप बजाकर निकालना चाहे, तो वह नहीं निकलता, वह तो उनको भक्षण ही कर जाएगा । ऐसे ही आशा - तृष्णा रूप काल की लपट इस जीव को नहीं छोड़ेगी ॥१२०॥ 
जानि दलिद्र घर तज्यो, फिर्यौ तेल के काज । 
जोड़ी चुपड़त देख तब, पूछी कित जाइ भाज ॥ 
दृष्टान्त ~ एक दुखी मनुष्य अपने घर में दलिद्र का वासा जानकर घऱ का त्याग करके चल दिया । किन्तु जूतियों के तेल लगाने के लिए वापस घर लौटा और अपनी जूतियों को बैठा - बैठा चुपड़ने लगा । इतने में एक पुरुष सामने आकर खड़ा हो गया । बोला ~ “तू मुझे छोड़कर कहाँ भाग रहा है ? मैं तो तेरे साथ ही रहूँगा, तू जहाँ भी जायेगा ।” वह बोला ~ “तू कौन है ?” बोला ~ “मैं तेरा दरिद्र हूँ, तूं मुझे छोड़ता है पर मैं तुझे नहीं छोड़ूंगा ।” जो पूर्व कर्मों का फल है, वह तो भोगना ही पड़ेगा । भागने से नहीं छूटेगा, भोगने से छूटेगा । 
(क्रमशः)

शुक्रवार, 26 अप्रैल 2013

= साँच का अंग १३ =(११५/११७)

॥ दादूराम सत्यराम ॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
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*= साँच का अंग १३ =*
*पतिव्रत व्यभिचार*
*दादू औरैं ही औला तके, थीयां सदै बियंनि ।* 
*सो तू मीयां ना घुरै, जो मीयां मीयंनि ॥११५॥* 
टीका ~ हे मीयां ! तू भगवान को तो स्मरण नहीं करता है, जो सब बड़ों से बड़ा है । परन्तु तैने तो और ही पीर - पैगम्बरों का आश्रय ले रखा है, इसी से तू मन्दभागी है । ‘थीयां’ कहिए राम की भक्ति तो अचल है, उसको धारण कर । उसी का कथन - श्रवण करने से इस जीव का कल्याण है ॥११५॥ 
*सत्य असत्य गुरु पारख लक्षण* 
*आई रोजी ज्यों गई, साहिब का दीदार ।* 
*गहला लोगों कारणैं, देखै नहीं गँवार ॥११६॥* 
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! प्रथम तो भक्तिरूप कमाई को सेवक - सेविकाओं को परचा दिखाने में वृथा गमा दी, और इसी प्रकार अज्ञानी विषयासक्त मनुष्य ने स्त्री, पुत्र, धन आदि में मोह ममता के कारण इस मनुष्य शरीर को वृथा ही नष्ट कर दिया । यह मनुष्य देह परमात्मा की प्राप्ति के लिये मिला था । जैसे - कोई अपनी रोजी को गमा दे, वैसे ही अज्ञानी जीव इस मनुष्य देह को गमा बैठा है ॥११६॥ 
धर्म तज्यो धन कारणै, नर निर्धन अज्ञान । 
ज्यूं बालक नग छाड़ि दे, देखै नेक मिष्ठान ॥ 
मोहम्मद गयो न भिस्त को, ऊम्मत बिना लगार । 
रान्यौं साहिब तास को, यौं जन लग ह्वै ख्वार ॥ 
दृष्टान्त ~ मोहम्मद को लेने को फरिश्ता आए । मोहम्मद साहब बोले ~ “मैं, मेरी सम्पूर्ण ऊम्मत(अनुयायियों की जमाअत) को साथ ले चलूँगा ।” खुदा ने कहा ~ “तुम, तुम्हारी कमाई से बहिश्त में आ सकते हो अन्य नहीं ।” खुदा की आज्ञा नहीं मानी, तब मोहम्मद साहब को(रान्यों) भारी कष्ट उठाना पड़ा । ऐसे ही जगत् से झूठी प्रीति करके भक्त अपने आपको गिरा देता है । 
*पतिव्रत निष्काम* 
*दादू सोई सेवक राम का, जिसे न दूजी चिंत ।* 
*दूजा को भावै नहीं, एक पियारा मिंत ॥११७॥* 
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! सोई राम का सच्चा सेवक है, जिसके अन्तःकरण में राम के भजन से अलग और दुनियावी किसी प्रकार की चिन्ता नहीं रहती है । ‘दूजा’ कहिए नामरूप जगत की प्रीति अच्छी नहीं लगती है । एक सजातीय - विजातीय स्वगत भेद रहित परमेश्‍वर का ही पतिव्रत है ॥११७॥ 
कबीर चिन्ता तो हरि नाम की, और न चिन्ता दास । 
जे कुछ चितवै राम बिन, सोई काल की पाश ॥ 
पीर पैगम्बर सब भले, अपनी अपनी ठौर । 
आसिक को भावै नहीं, अलह बिना कोई और ॥ 
(क्रमशः)

= साँच का अंग १३ =(११२/११४)

॥ दादूराम सत्यराम ॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
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*= साँच का अंग १३ =*
*ब्रह्मा विष्णु महेश का, कौन पंथ गुरुदेव ।*
*सांई सिरजनहार तूं, कहिये अलख अभेव ॥११२॥* 
टीका ~ हे वादी ! ब्रह्मा, विष्णु, महेश इनका कौनसा पंथ था ? और इनका गुरुदेव कौन था ? तू विचार कर । वह सांई परमेश्‍वर सबको उत्पन्न करने वाला, अलख, मन वाणी का अविषय कहिए, उसी के पंथ में ये सब हैं और वही इन सबका अन्तःप्रेरक गुरुदेव है । वही हमारा गुरु है, उसी के पंथ में हम हैं ॥११२॥ 
नेति नेति जेहि वेद निरूपा । निजानन्द निरूपाधि अनूपा ॥ 
संभु विरंचि विष्नु भगवाना । उपजहिं जासु अंस तैं नाना ॥ 
- बालकाण्ड(तुलसी) 

कवित्त ~ 
ब्रह्मादिक गुरु कौन, कौन गुरु आदि महेश्‍वर । 
सनकादिक गुरु कौन, कौन गुरु नौ जोगेश्‍वर ॥ 
ऋषभ देव गुरु कौन, कौन गुरु जनक विदेही । 
कदरज का गुरु कौन, पिंगला रूप सनेही ॥ 
ऋषि जड़भरत पुरुरवा, कहै बालकराम विवेक उर । 
अष्टावक्र दत्त कपिल के, कौन मंत्र उपदेश गुर ? 
ब्रह्मऋषि से वादी ने उपरोक्त साखियों में प्रश्‍न किया । वैसे ही, बालकराम जी महाराज से किसी पंडित ने प्रश्‍न किया कि ब्रह्मऋषि दादू दयाल का गुरु कौन हैं ? उसके प्रति उत्तर में बालकराम जी ने कहा ~ उपरोक्त कवित्त में जिन पुरुषों का नाम है, उनका गुरु कौन था ? और कौनसा उनके मंत्र था । पंडित लज्जित होकर बोला - “आप ही कृपा करके बतलावें ।” 

कवित्त ~ 
ब्रह्मादिक गुरु ब्रह्म, ब्रह्म गुरु आदि महेश्‍वर । 
सनकादिक गुरु ब्रह्म, ब्रह्म गुरु नौ जोगेश्‍वर ॥ 
ऋषभ देव गुरु ब्रह्म, ब्रह्म गुरु जनक विदेही । 
कदरज का गुरु ब्रह्म, पिंगला ब्रह्म सनेही ॥ 
ऋषि जड़भरत पुरुरवा, कहै बालकराम विवेक उर । 
अष्टावक्र दत्त कपिल के, ब्रह्म अनुग्रह ज्ञान गुर ॥ 
हे भाई ! इन सबके गुरू परमेश्‍वर ही थे, और उनकी दया की दृष्टि से ही, इनको ज्ञान हुआ और उन्होंने ही अर्न्तज्ञान मंत्र दिया । 

*मुहम्मद किसके दीन में, जिब्राईल किस राह ?* 
*इनके मुर्शिद पीर की, कहिये एक अल्लाह ॥११३॥* 
टीका ~ किसी काजी ने ब्रह्मऋषि से प्रश्‍न किया कि आप किसके दीन में हो ? परम गुरुदेव काजी से बोले ~ हे काजी ! मोहम्मद साहब किसके दीन में थे ? जिब्राईल फरिश्ता किस के मार्ग में चले ? इनका पीर कौन था ? काजी नम्र होकर बोले ~ आप ही कृपा करें । तब परम गुरुदेव बोले ~ हे काजी ! इनका गुरु पीर एक अल्लाह, कहिए तल स्पर्श रहित एक परमात्मा ही था, उसी के दीन में हम हैं ॥११३॥ 
*दादू ये सब किसके ह्वै रहे, यहु मेरे मन मांहि ।* 
*अलख इलाही जगत - गुरु, दूजा कोई नांहि ॥११४॥* 
टीका ~ उपरोक्त सम्पूर्ण प्रकरण का भावार्थ ~ ब्रह्मा, विष्णु, महादेव का कौन पंथ है ? और मोहम्मद का धर्म क्या है ? एवं जिब्राईल धर्मराज फरिश्ता की कौन राह है ? इनके मुर्शिद कहिए गुरु किस पंथ में हैं ? हे जिज्ञासु ! चराचर, लौकिक, अलौकिक, सभी पदार्थ चैतन्य की सत्ता मात्र से सब समान हैं । उत्तम पुरुषों को एक परमात्मा का ही पतिव्रत है ॥११४॥ 
(क्रमशः)

गुरुवार, 25 अप्रैल 2013

= साँच का अंग १३ =(१०९/११)

॥ दादूराम सत्यराम ॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
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*= साँच का अंग १३ =*
*बेखर्च व्यसनी*
*दादू बगनी भंगा खाइ कर, मतवाले मांझी |* 
*पैका नांही गांठड़ी, पातशाह खांजी ||१०९||* 
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! भांग आदि का नशा करके मतवाले हो रहे हैं | अर्थात् अनेक प्रकार के विषयों में फँस कर, विषय - रस को पान करके मतवाले मांझी बन रहे हैं | एक पैसा तो पास में है नहीं और मन में बादशाह और खांसाहब बन रहे हैं | ऐसे पुरुष ईश्‍वर विमुख ही सदा बने रहते हैं ||१०९|| 
*दादू टोटा दालिदी, लाखों का व्यौपार |* 
*पैका नांही गांठड़ी, सिरै साहूकार ||११०||* 
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! टोटा तो इतना है, जो एक पैसा भी पास में नहीं है | ऐसे दरिद्री लोग बातों में लाखों का व्यापार करते हैं और साहूकारों में अपने आपको सबसे श्रेष्ठ बतलाते हैं | इसी प्रकार वाचक ज्ञानी वेदों का शब्द - ज्ञान करके अति अभिमानी हो रहे हैं एवं भक्ति - ज्ञान वैराग्य का उनमें अंश मात्र भी नहीं है | जो करणी रूप धारणा से तो अति दरिद्री विषयी हैं, परन्तु वाचक उपदेश से अपने को ज्ञानी मानते हैं, ऐसे वाचक ज्ञानियों का कल्याण होना असम्भव है ||११०||
ज्ञान ध्यान रेचक नहीं, नहीं सील संतोंष | 
भगत कहावै राम को, ‘मोहन’ व्यर्थ भरोस || 
निम्नलिखित चार साखियां प्रश्‍नोत्तर रूप में हैं | 
*मध्य निष्पक्ष - सब मतों का निशाना एक* 
*दादू ये सब किसके पंथ में, धरती अरु आसमान |* 
*पानी पवन दिन रात का, चंद सूर रहमान ||१११||* 
टीका ~ ब्रह्मऋषि सतगुरुदेव से किसी वादी ने प्रश्‍न किया कि आप किसके पंथ में हैं ? तब सतगुरुदेव बोले ~ हे वादी ! यह धरती, आकाश, चन्द्रमा, सूर्य, पानी, पवन, दिन, रात जिसके पंथ में हैं, उसी रहमान, परमेश्‍वर की आज्ञारूप पंथ में हम हैं ||१११|| 
हिन्दू तुर्क न भूमि, तुर्क हिन्दू नहिं पानी | 
हिन्दू तुर्क न अग्नि, समझ बिन दुखी अज्ञानी || 
हिन्दू तुर्क न पवन, तुर्क हिन्दू न अकासा | 
चन्द सूर निर्पक्ष, रात दिन करैं प्रकासा || 
एक आतमा सर्व में, हिन्दू तुर्क न जानिये | 
कहिं ‘बालकराम’ पायो मरम, वर्ण आश्रम भ्रम भानिये ||
(क्रमशः)

= साँच का अंग १३ =(१०६/८)

॥ दादूराम सत्यराम ॥

*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
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*= साँच का अंग १३ =*
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*अनाधिकारी*
*दादू कथनी और कुछ, करणी करैं कछु और ।*
*तिन थैं मेरा जीव डरै, जिनके ठीक न ठौर ॥१०६॥*
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! कहते तो कुछ और हैं और करते कुछ और हैं, ऐसे पुरुषों से हमारा जीव डरता है, क्योंकि उनका कोई ठीक ठिकाना नहीं है । वे बाचाल लोग हैं ॥१०६॥ 
वाक्य मांहि जो देखिये, गात मांहि सो नांहि । 
जन रज्जब ता सब्द सौं, सुरता ठहरै नांहि ॥ 
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*अन्तरगत औरै कछु, मुख रसना कुछ और ।*
*दादू करणी और कुछ, तिनको नांही ठौर ॥१०७॥*
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! अन्तःकरण में तो कपट भरी और ही बातें हैं, और मुख से रसना द्वारा कुछ और ही बात बोलते हैं, शरीर द्वारा कुछ और ही करते हैं । ऐसे पुरुषों को परमेश्‍वर के दरबार में कोई जगह नहीं है । वे जन्म - मरण के चक्र में ही घूमते रहते हैं ॥१०७॥ 
मनस्येकं वचस्येकं कर्मण्येकं महात्मनाम् । 
मनस्यन्यद वचस्यन्यत् कर्मण्यन्यद् दुरात्मनाम् ॥ 
(महात्माओं के मन वचन कर्म इकसार होते हैं, जबकि दुष्टों के मन वचन कर्म में भिन्नता होती है ।)
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*मन प्रबोध*
*दादू राम मिलन की कहत हैं, करते कुछ औरे ।*
*ऐसे पीव क्यौं पाइये, समझि मन बौरे ॥१०८॥*
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! कनिष्ठ श्रेणी वाले जो मनुष्य हैं, वे आत्मा की तो चर्चा करते हैं, और उनका व्यवहार सांसारिकजनों की तरह देखने में आता है, उनको आत्म - साक्षात्कार किस प्रकार होगा ? हे भोले ! अज्ञानी मन ! अर्थात् हे प्राणधारी ! यह सत्य समझ कि करणी बिना केवल कथनी से आत्म - प्राप्ति नहीं होगी ॥१०८॥ 
कर्म करे मन मंद अति, चाहे दरस गंभीर । 
रांधी खाटी राबड़ी, कैसे खावै खीर ॥
(क्रमशः)

बुधवार, 24 अप्रैल 2013

= साँच का अंग १३ =(१०३/५)

॥ दादूराम सत्यराम ॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
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*= साँच का अंग १३ =*
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*दादू कहतां कहतां दिन गये, सुनतां सुनतां जाइ ।*
*दादू ऐसा को नहीं, कहि सुनि राम समाइ ॥१०३॥* 
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! उपदेश करते - करते तो वक्ता की आयु समाप्त हो गई और उपदेश सुनते - सुनते श्रोताओं की आयु पूरी होती जा रही है । परन्तु उन वक्ता और श्रोताओं में ऐसा कोई भी नहीं है, जो परमेश्‍वर की महिमा कहते - कहते और सुनते - सुनते परमेश्‍वर में समा जाय । क्योंकि धारणा शक्ति बिना केवल कथन और श्रवण से स्वस्वरूप लाभ प्राप्त नहीं होता ॥१०३॥ 
बिन करनी के कथन को, आदर नहीं भव मांहि । 
वेश्यां यदि पतिव्रत कहै, त्रियगण मानैं नांहि ॥ 
पढै सुनावैं और को, पंडित भये अनेक । 
मन समझावै आपणां, सो रज्जब कोई एक ॥ 
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*मध्य निरपक्ष*
*मौन गहैं ते बावरे, बोलैं खरे अयान ।*
*सहजैं राते राम सौं, दादू सोई सयान ॥१०४॥*
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! साधक पुरुषों को हितकारक और सीमित वचन बोलना ही युक्ति - युक्त है तथा प्रभु भजन से मौन रहना भी अयुक्त ही है । जो पुरुष संसार के वातावरण से अपनी वाणी का संयम नहीं रखता, वह दुनियावादी मौनियों से भी मन्द बुद्धिवाला कहा जाता है । अर्थात् ऐसे पुरुष ही चतुर और ज्ञानी हैं, जो सहज स्वभाव से ही परमेश्‍वर में लीन रहते हैं, तथा परमेश्‍वर सम्बन्धी वार्ता तो बोलते हैं, परन्तु सांसारिक वातावरण से मौन रहते हैं ॥१०४॥ 
गिणे - मिणे बोले वचन, सो साधू तत सार । 
तुलसी खाली कुंभ ज्यूं, बकबो करै गँवार ॥ 
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*करुणा*
*कहतां सुनतां दिन गये, ह्वै कछू न आवा ।*
*दादू हरि की भक्ति बिन, प्राणी पछतावा ॥१०५॥*
टीका ~ ब्रह्मऋषि सतगुरुदेव कहते हैं कि हे परमेश्‍वर ! हे नाथ ! सम्पूर्ण आयु आपकी भक्ति बिना निष्फल ही जा रही है । आप दया करके आपकी भक्ति का दान देना, जिससे हमारा पश्‍चात्ताप मिटे । अथवा हे जिज्ञासुओं ! परमेश्‍वर की भक्ति के अतिरिक्त व्यावहारिक कथन - श्रवण में जो दिन जाते हैं, सो सब विफल हैं, क्योंकि भक्ति बिना प्राणी को प्राणान्त समय में केवल पश्‍चात्ताप ही रहता है ॥१०५॥ 
(क्रमशः)

= साँच का अंग १३ =(१००/१०२)

॥ दादूराम सत्यराम ॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
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*= साँच का अंग १३ =*
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*कागद काले कर मुए, केते वेद पुराण ।*
*एकै अक्षर पीव का, दादू पढै सुजान ॥१००॥*
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! कितने ही पंडित वेद और पुरानों को लिख - लिख कर अर्थात् काले कागज कर - करके मर गये हैं, कुछ भी हाथ नहीं पड़ा । वही मनुष्य चतुर व सुजान है, जो जन्म प्राप्त करके पीव, कहिए मुख प्रीति का अविषय आत्मारूप परमेश्‍वर के एक अक्षर रूप ओम् या ररंकार, सोऽहं इत्यादि, शब्दों को श्रद्धा से पढ़ता है अर्थात् विचार करता है, वही परम पद को प्राप्त होता है ॥१००॥ 
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*एकै अक्षर प्रेम का, कोई पढेगा एक ।*
*दादू पुस्तक प्रेम बिन, केते पढ़ैं अनेक ॥१०१॥*
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! मुखप्रीति का विषय जो परमेश्‍वर है, उसका एक अक्षर स्वरूप ओम्, इसको कोई उत्तम पुरुष श्रद्धा भक्ति से स्मरण करेगा । और तो अनेकों मनुष्य प्रेम के बिना दिखावे के लिये अथवा सकाम भावना से पुस्तक पढ़ते हैं, परन्तु वह वास्तविक फल से वंचित ही रहते हैं ॥१०१॥ 
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*दादू पाती प्रेम की, बिरला बांचै कोइ ।*
*बेद पुरान पुस्तक पढै, प्रेम बिना क्या होइ ॥१०२॥* 
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! विरह सहित प्रेम की पत्रिका तो कोई बिरले भक्त ही गोपियों की तरह बांचते हैं । प्रेम के बिना रोजी चलाने के लिये, सकाम भावना से, अनेकों पंडित वेद पुराण आदि धार्मिक पुस्तकों को, पढ़ते हैं, परन्तु इससे मोक्ष - फल प्राप्त नहीं होता ॥१०२॥ 
(क्रमशः)

मंगलवार, 23 अप्रैल 2013

= साँच का अंग १३ =(९७/९९)

॥ दादूराम सत्यराम ॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
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*= साँच का अंग १३ =*
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*पढ पढ थाके पंडिता, किनहूँ न पाया पार ।*
*कथ कथ थाके मुनिजना, दादू नाम अधार ॥९७॥*
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! आत्म - साक्षात्कार करने का एक गुरु उपदेश ही श्रेष्ठ साधन है और वाचक पंडित धर्म ग्रन्थों को, पुराणों को, शास्त्रों को पढ - पढ करके थकित हो रहे हैं, परन्तु उस परब्रह्मा स्वरूप का किसी ने पार, कहिए अन्त नहीं पाया । मुनि वशिष्ठ, वाल्मीकि, व्यास, आदि कथन करते - करते यानी पुराणों की रचना करते - करते थक गये । परन्तु उस परमेश्‍वर का अन्त किसी ने भी नहीं पाया । सभी ने एक नाम का ही आधार अन्त में बतलाया है ॥९७॥ 
*काजी कजा न जानहीं, कागद हाथ कतेब ।*
*पढतां पढतां दिन गये, भीतर नांहि भेद ॥९८॥*
टीका ~ हे काजी ! तुम अपनी मृत्यु को नहीं जानते हो और पुस्तकें पढते - पढते आयु के दिन बीत रहे हैं, किन्तु तुमने भीतर का भेद कहिए, मर्म अर्थात् स्वस्वरूप को नहीं पहचाना है ॥९८॥ 
काग हंस का न्याव को, अरु तेली को बैल । 
तीजो धेलि कूँस को, मिल्यो बादशाह सैल ॥ 
दृष्टान्त ~ एक कव्वा उड़ता उड़ता मानसरोवर पहुंच गया । वहाँ हंस - हंसनी रहते थे । उन्होंने विचार किया कि यह काला हंस है । उसका अतिथि - सत्कार करने के लिए मानसरोवर से मोती लाकर सामने भोजन के लिये रखे । कव्वे ने चौंच मार कर छोड़ दिये । हंस - हंसनी ने देखा कि यह कोमल भोजन करता है, तो क्षीर - समुद्र से दूध की डलियां उठा कर लाये । कव्वे के सामने रखा । 
कव्वा उठाकर खाने लगा और बोला, “यह तो कोई भोजन भी है, पहले तो कंकर थे वे ।” हंस बोला ~ “आप लोग क्या काले रंग के हंस हो ?” कव्वा ~ “हाँ ।” तब कव्वा वहाँ ‘त्रिशंक त्रिशंक’ बोलने लगा । हंस - हंसनी बोले ~ आप त्रिशंक को बहुत याद करते हो, वह क्या है ? कव्वा बोला ~ हमारा आश्रम है । 
दो चार रोज कव्वे की खूब सेवा की । कव्वे ने विचार किया कि इस हंस की हंसनी को उड़ा लें । तब बोला ~ “आप लोग भी हमारे समुद्र पर चलो ।” हंस - हंसनी साथ हो गये । तीनों उड़ते - उड़ते कई रोज में एक गाँव के बाहर गन्दी तलाई के किनारे एक तीन शाखाओं का एक ठूंठ खड़ा था, कव्वा आकर एक शाखा पर बैठ गया, एक - एक पर हंस - हंसनी बैठ गये । अब त्रिशंक नहीं बोलता है । 
हंस ने पूछा ~ अब आपका समुद्र कितनी दूर है ? कव्वा ~ “यही तो है । भोजन लाऊं ?” तलाई के अन्दर गया और एक मेंडक की टांग पकड़ कर लाया । हंस ~ अरे ! दूर, दूर, इसको अलग रखो । कव्वा ~ “लो दूसरा लाऊं ?” तब मछली की टांग पकड़ कर लाया । हंस ~ “अलग रखो ।” हंस हंसनी को बोला ~ “प्रिये ! हम तो ठग्गी में आ गए ।” 
हंस कौवे से बोला ~ “अच्छा । हम लोग अब चलें ।” कव्वा ~ “तूं जा, यह तो मेरी कव्वी है, इसे कहाँ ले जाता है ?” हंसनी बोली ~ “मैं तेरी नहीं हूँ ।” कव्वा ~ “तुझे इसने बहका लिया । अभी मैं थाने में जाता हूँ ।” कव्वा थानेदार के पास पहुँचा और बोला ~ “उस हंस की हंसनी मुझे दिला दो, तुम्हें तुम्हारी सात पीढ़ी के दर्शन करा दूंगा ।” थानेदार आया । बोला ~ “क्या है ?” हंस बोला ~ “मेरी हंसनी को यह अपनी स्त्री बताता है ।” थानेदार ~ “हाँ , ठीक है, इसको तो हम कव्वे के पास कई दिनों से देख रहे हैं, यह तो कव्वे की ही स्त्री है ।” 
हंस चुप हो गया । थानेदार कव्वे को बोला, “हमारी सात पीढ़ी के दर्शन कराओ ।” पास में मैला पड़ा था, कव्वे ने जाकर उसमें से एक कीड़ा उठाया और कहा ~ “यह तुम्हारा बाप है ।” दूसरा कीड़ा फिर उठाया, बोला “यह तुम्हारा दादा है ।” इस प्रकार सात कीड़े उठा - उठाकर थानेदार को बोलता रहा । थानेदार बोला ~ “अबे ! हमारे दादा, पड़ दादा क्या नरक के ही कीड़े बने हैं ?” तब हंस बोला ~ “ऐसे फैसले करने वालों के तो पूर्वज कीड़े ही बनते हैं ।” कव्वे को थानेदार ने गोली से उड़ा दिया । हंस अपनी हंसनी को लेकर मानसरोवर उड़ गया ।
दूसरा दृष्टान्त ~ एक रोज बादशाह के बैल को पानी पिलाने ले जा रहा था । तेली का लड़का भी घाणी से बैल को खोलकर पानी पिलाने जा रहा था । बैल हाथ से छूट गया, राजा के बैल को देखकर अकड़ा और राजा के बैल के पेट में टक्कर मारी, तो सींग अन्दर घुस गया । बैल की मृत्यु हो गई । बादशाह ने जब यह वृत्तान्त सुना, तो गुस्सा होकर तेली को बुलाया और काजी जी को बोला ~ “इसका फैसला करो ।” काजी ~
लाल कतेब कहत है यों, 
तेली बैल लड़ावै क्यों । 
खली खुवाय किया मुस्टंड, 
बैल का बैल और बीस रुपया दंड ॥ 
तीसरा दृष्टान्त ~ दो मनुष्य आपस में लड़ पड़े । एक ने न्यायालय में जाकर दावा कर दिया । दोनों जब न्यायाधीश के सामने पेश हुए, बयान लिये । न्यायाधीश ने फैसला सुनाया ~ “इसने उसके एक जूता मारा है, इससे एक धेली जुर्माना लिया जाय ।” इसने न्यायाधीश के सामने ही एक जूता - खोलकर उसके एक और मार दिया और एक रुपया देकर बोला ~ “साहब ! मैं अब तुड़वाने कहाँ जाऊंगा ? रुपया ही जमा कर लो ।” बादशाह इस केस का फैसला सुनकर हँस पड़े ।
ब्रह्मऋषि कहते हैं कि काजी ! लाल किताब पढ़ते - पढ़ते आयु के दिन बीत रहे हैं ।
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*मसि कागज के आसरे, क्यों छूटै संसार ?*
*राम बिना छूटै नहीं, दादू भ्रम विकार ॥९९॥*
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! केवल स्याही और कागज से बनी पुस्तकों के लिखने - पढ़ने - सुनने मात्र से संसार - बन्धन कैसे छूट सकता है ? निरंजन राम के भजन बिना अन्य उपाय से भ्रम और कामादिक विकार नष्ट नहीं होते । अतः नाम - स्मरण ही भव - बंधन से मुक्त होने का सरलतम साधन है ॥९९॥ 
(क्रमशः)

= साँच का अंग १३ =(९४/९६)

॥ दादूराम सत्यराम ॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
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*= साँच का अंग १३ =*
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*दादू निवरे नाम बिन, झूठा कथैं गियान ।*
*बैठे सिर खाली करैं, पंडित वेद पुरान ॥९४॥*
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! जिनका अन्तःकरण तो नाम के बिना खाली है और मिथ्या ज्ञान कथन करते हैं । माया की आशा रखकर, जगत में बैठे हुए देह अध्यासी पंडित, वेद और पुरानों से निरर्थक ही माथा मारते हैं ॥९४॥ 
चित्र माहिं केहरी कियो, तासूं डरै न कोइ । 
यों ‘मोहन’ करनी बिना, कथनी तैं क्या होइ ॥ 
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*दादू केते पुस्तक पढ़ मुये, पंडित वेद पुरान ।*
*केते ब्रह्मा कथ गये, नांहिन राम समान ॥९५॥*
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! राम - नाम के स्मरण के बिना कितने ही पंडित, पंडिताई करते - करते मर गये और कितने ही ब्रह्मा, ऋषि, मुनि, वेद पुरानों की रचना करते करते थक गये । परन्तु राम - नाम की भक्ति के बिना मुक्ति प्राप्ति करने का और कोई भी साधन नहीं है ॥९५॥ 
वेदशास्त्रं शतं वापि तारयन्ति न तं नरम् । 
यस्तु स्वमनसा वाचा न करोति हेरो रतिम् ॥ 
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*सब हम देख्या सोध कर, वेद कुरानों मांहि ।*
*जहाँ निरंजन पाइये, सो देश दूर, इत नांहि ॥९६॥*
टीका ~ ब्रह्मऋषि सतगुरुदेव उपदेश करते हैं कि हमने विचारपूर्वक वेद व कुरानों का निश्‍चय किया है कि निरंजन की उपासना रूपी देश दूर है । अर्थात् वेद - पुरानों व कुरानों की कथनी से करनी का देश कठिन है । ‘नेति’ कहिए ‘इत नांहि’ वेद आदिकों के कथने से आत्मा की प्राप्ति सम्भव नहीं है क्योंकि ब्रह्मतत्त्व अनिर्वचनीय होने से वेद आदि का अविषय है अर्थात् गुण, क्रिया, जाति और सम्बन्ध वाली वस्तु का वेद वर्णन करता है । ब्रह्म इनसे रहित है । शक्ति - वृत्ति से वेद ब्रह्म का वर्णन नहीं कर सकता है, इसलिये वेद का अविषय है ॥९६॥ 
(क्रमशः)

सोमवार, 22 अप्रैल 2013

= साँच का अंग १३ =(९१/९३)

॥ दादूराम सत्यराम ॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
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*= साँच का अंग १३ =*
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*करणी बिना कथनी*
*शूकर स्वान सियाल सिंह, सर्प रहैं घट मांहि ।*
*कुंजर कीड़ी जीव सब, पांडे जाणैं नांहि ॥९१॥*
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! अज्ञानी संसारीजन पशु - वृत्ति वाले, जिनके अन्तःकरण में नाना प्रकार की विषय - भोगों की फुरणायें होती रहती हैं, परन्तु शरीरधारी यह नहीं समझता कि ये अन्तःवृत्तियां त्यागने योग्य हैं जैसे स्वजाति द्वेष से कुत्ते की भांति भौंकना, कायर वृत्ति गीदड़ की, कीड़ी की वृत्ति दूसरे के छिद्रों(दोषों) को ढूंढते रहना, शेर की वृत्ति क्रोध करना, संशय वृत्ति सर्प की, हाथी की काम वृत्ति । ब्रह्मऋषि जगतगुरु कहते हैं ‘कि हे पांडे ! ये सब स्वभाव जीवों के, अपने अन्दर वर्तते हैं । परन्तु इस बात को गाल बजाने वाले बाचक पंडित और साधारण प्राणी नहीं जान पाते हैं कि शरीर से मनुष्याकृति लिये हम वृत्तियों से पशु - तुल्य ही है ॥९१॥ 
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*दादू सूना घट सोधी नहीं, पंडित ब्रह्मा पूत ।*
*आगम निगम सब कथैं, घर में नाचै भूत ॥९२॥* 
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! अन्तःकरण तो ज्ञान, भक्ति, वैराग्य के बिना शून्य है जिनका, और वाचक पंडित अपने को ब्रह्मा का पुत्र वशिष्ट के समान मानते हैंऔर आगम शास्त्र, निगम वेदों के ज्ञाता बताते हैं । उनके अन्तःकरण रूपी घर में तो पंच ज्ञानेन्द्रिय विषय और काम, क्रोध आदि भूत नाच रहे हैं । उनको वे नहीं देख पाते ॥९२॥ 
ज्ञान भक्ति वैराग्य बिन, हिरदो सूनो जान । 
पंडित पद पाये कहा, करी न हरी पिछान ॥ 
तीन ताप में जग जलै, पंडित सप्त किसोर । 
हार जीत अरु पाठ विसर्जन, चार ताप भई ओर ॥ 
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*पढे न पावै परमगति, पढे न लंघै पार ।*
*पढे न पहुंचै प्राणियां, दादू पीड़ पुकार ॥९३॥* 
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! केवल वाचक ज्ञान के सांसारिकजनों को स्वस्वरूप का साक्षात्कार अनुभव नहीं होता है । ज्ञान के साधनों से ही सफलता प्राप्त होती है । इसलिये जिज्ञासा वृत्ति से ही संसार से पार उतरिये ॥९३॥ 
श्‍लोक ~ 
यथा खरश्चन्दन भारवाही, 
भारस्य वेत्ता न तु चन्दनस्य । 
एवं हि शास्त्राणि बहून्यधीत्य, 
चार्थेषु मूढाः खरवद् वहन्ति ॥ 
(क्रमशः)

= साँच का अंग १३ =(८८/९०)

॥ दादूराम सत्यराम ॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
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*= साँच का अंग १३ =*
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*दादू बातों ही पहुंचै नहीं, घर दूर पयाना ।*
*मारग पन्थी उठि चलै, दादू सोई सयाना ॥८८॥*
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! घर तो दूर है और बातें करने से मार्ग नहीं कटता है । चलने से ही ठिकाने पहुँचोगे । दार्ष्टान्त में, सकाम कर्म - काण्ड की बातों से छुटकारा नहीं होगा । जब सच्चे सतगुरु की शरण में जाएगा और सत्य उपदेश को श्रवण करके धारण करेगा, तभी मोक्ष होगा । ऐसा जिज्ञासु ही चतुर है ॥८८॥ 
बात करै को नगर की, मग में धरै न पग । 
‘मोहन’ कथनी स्वर्ग की, हरि सुमिरण नहिं लग ॥ 
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*बातों सब कुछ कीजिये, अंत कछू नहिं देखै ।*
*मनसा वाचा कर्मना, तब लागै लेखै ॥८९॥*
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! आत्म - साक्षात्कार रूप घर का मार्ग, कर्म - काण्ड से दूर है । उस घर में केवल बातें करने से नहीं पहुंच सकते हैं । जो उत्तम जिज्ञासु है, सतगुरु का उपदेश श्रवण करते ही जिसका मन निदिध्यासन में स्थित होता है, वही समझदार है । जो अपने को मन वचन कर्म से आत्म - अभ्यास में लगाता है, उनका ही मनुष्य जीवन सफल है ॥८९॥ 
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*समझ सुजानता*
*दादू कासौं कहि समझाइये, सब कोई चतुर सुजान ।*
*कीड़ी कुंजर आदि दे, नाहिंन कोई अजान ॥९०॥*
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! किस को कहकर क्या समझाइये ? सब ही प्राणी चींटी से लेकर हाथी तक माया - मोह के वश में हुए अपने को अपने - अपने व्यवहार में कुशल मानते हैं और अन्य से अपने को अधिक ज्ञानी समझते हैं । रंक से राजा पर्यन्त अपने आप को अज्ञानी कोई भी नहीं समझता है ॥९०॥ 
सबै सयाने हैं ‘जगन’, अपनी बुधि उनमांन । 
आ समझ समझै अपन, सोही समझो जांन ॥ 
(क्रमशः)

रविवार, 21 अप्रैल 2013

= साँच का अंग १३ =(८५/८७)

॥ दादूराम सत्यराम ॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
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*= साँच का अंग १३ =*
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*दादू राम विसार कर, कीये बहु अपराध ।*
*लाजों मारे संत सब, नांव हमारा साध ॥८५॥*
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! राम को अन्तःकरण से भूलना, प्रथम तो यह भारी अपराध है, ऐसे मनुष्य से सम्पूर्ण पाप बनते हैं । ईश्‍वर से विमुख साधु, नाम मात्र के भेषधारी, पंडित ब्राह्मण नाम मात्र के, प्रभु को भूले हुए, इस लोक परलोक की विषय - वासनाओं में आसक्त, बहुत से दोष युक्त कर्म करते हैं और अपना साधु नाम रखकर भूत, वर्तमान, भविष्य, तीनों कालों में होने वाले सच्चे संत भक्तों को लज्जित करते हैं ॥८५॥ 
स्वांग पहर अनरथ करै, हरि हरिजन गुरु लाज । 
‘जगजीवन’ जीवन धरत, भगवत भक्ति बाज ॥ 
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*करणी बिना कथनी*
*मनसा के पकवान सौं, क्यों पेट भरावै ।*
*ज्यों कहिये त्यों कीजिये, तब ही बन आवै ॥८६॥*
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! मन की वासना रूप पकवान बनाने से पेट नहीं भरता है । पेट तो जब ही भरेगा, जब व्यावहारिक पकवान बनेंगे । इसी प्रकार जैसा मन - वाणी से कहता है, उसी प्रकार, कायिक - वाचिक - मानसिक क्रिया से करे, तब ही सफलता को प्राप्त होगा । कहता कुछ है और करता कुछ है, ऐसे पुरुषों को मनुष्य जीवन का लाभ प्राप्त नहीं होता ॥८६॥ 
मन से खाई चीज बहु, हलवाई की हाट । 
फकीर ने रुपये दिये, यह ले, यह ले साठ ॥ 
दृष्टांत - एक फकीर हलवाई की दुकान पर बहुत प्रकार की मिठाइयां देखकर खड़ा हो गया और मन के संकल्प से खाता गया तथा उनके स्वाद की बड़ाई हलवाई को सुनाता गया । अन्त में बोला - “अब तृप्त हो गये, चलते हैं ।” हलवाई - मिठाई के पैसे तो देते जाओ । फकीर ने कहा - यह ले, मिठाइयों के साठ रुपए तुझे देता हूँ । हलवाई - “कहा ही है, दिया तो नहीं ।” फकीर - “तूने मिठाई भी कहाँ दी थी, हमने तो मन से ही खाई थी । अतः मन से ही रुपये दिये हैं ।” हलवाई चुप हो गया क्योंकि जैसे मन की कल्पना से फकीर का पेट नहीं भरा, वैसे ही हलवाई को कथन मात्र से रुपये नहीं मिले ।
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*दादू मिश्री मिश्री कीजिये, मुख मीठा नाहीं ।*
*मीठा तब ही होइगा, छिटकावै माहीं ॥८७॥*
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! मिश्री - मिश्री करने से मुख मीठा नहीं होता है । मुख तो मीठा तभी होगा, जब मुख में मिश्री डालोगे । ऐसे ही केवल कथनी मात्र से ब्रह्म की प्राप्ति नहीं होती है । निर्वासनिक होकर श्रवण, मनन, निदिध्यासन करने से या महावाक्यों के अर्थ के विचार से स्वस्वरूप ब्रह्म का निश्‍चय होता है ॥८७॥ 
(क्रमशः)

= साँच का अंग १३ =(८२/८४)

॥ दादूराम सत्यराम ॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
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*= साँच का अंग १३ =*
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*राम भक्ति भावै नहीं, अपनी भक्ति का भाव ।*
*राम भक्ति मुख सौं कहै, खेलै अपना डाव ॥८२॥* 
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! विषयासक्त मनुष्यों के मन में अपनी मान - प्रतिष्ठा आदि की इच्छा रहती है और राम - भक्ति मुँह से दिखाते हैं । मन विषय - वासनाओं में रचा है, कुल, कुटुम्ब, स्त्री, पुत्र, धन आदि में आसक्त हो रहा है । दिखावा रूप में राम की भक्ति करता है । मन में माया की भावना लगी रहती है । हमको राम - भक्त जान कर कोई हमारी सेवा, पूजा, प्रतिष्ठा करे । हे संतों ! ऐसा पुरुष अपना दाव खेलता है अर्थात् विषयों के व्यापार में ही लगा रहता है । ऐसे सकामी कोई भी राम के सच्चे भक्त नहीं कहे जाते ॥८२॥ 
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*भक्ति निराली रह गई, हम भूल पड़े वन माहिं ।*
*भक्ति निरंजन राम की, दादू पावै नांहिं ॥८३॥* 
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! भक्ति तो हम से अलग ही रह गई है । हम कहिये त्यागी, तपस्वी, नाम मात्र के वन में जाकर बैठ गये और इसी अहंकार में दबे जा रहे हैं कि हम दुनियां को छोड़ कर वन में बैठे हैं, परन्तु वन में तो शेर आदि पशु भी रहते हैं । राम की भक्ति भूल करके अनेक प्रकार के कष्टप्रद साधन साध रहे हैं और राज - पाट, स्वर्ग - बैकुण्ठ आदि की वासना को लिये हुए हैं । ऐसे पुरुषों को निरंजन निराकार रूप जो राम है, उनकी भक्ति कदापि प्राप्त नहीं होती ॥८३॥ 
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*सो दशा कतहूँ रही, जिहि दिशि पहुंचै साध ।*
*मैं तैं मूरख गह रहे, लोभ बड़ाई बाद ॥८४॥*
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! जिन विवेक, वैराग्य, भक्ति आदि साधनों से सच्चे निष्कामी संतजन पार पहुँचे हैं, उस मार्ग को तो अज्ञानी विषयासक्त संसारीजन भूल रहे हैं । और मैं मेरा, तूं तेरा, इस माया के मोह में तो फँसे ही हैं, ऊपर से लोभ और बड़ाई से घिरे हुए मान - प्रतिष्ठा के लिए वाद - विवाद करते हैं । ऐसे अमूल्य मनुष्य जीवन को व्यर्थ ही खो देते हैं ॥८४॥
(क्रमशः)

शनिवार, 20 अप्रैल 2013

= साँच का अंग १३ =(७९/८१)

॥ दादूराम सत्यराम ॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
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*= साँच का अंग १३ =*
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*बेखर्च व्यसनी*
*दादू सेवक नाम बुलाइये, सेवा सपनैं नांहिं ।*
*नाम धराये का भया, जे एक नहीं मन माहिं ॥७९॥*
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! परमेश्‍वर के हम सेवक हैं, इसी नाम से अपने को बुलवाते हैं, किन्तु परमेश्‍वर की सेवा स्वप्न में भी नहीं करते । केवल भक्त नाम ही रखवा लें और भक्ति को जानते नहीं । भक्ति का तो एक भी लक्षण मन में नहीं बसता है । ऐसे पुरुष अपनी इन्द्रियों के विषयों की पूर्ति के लिये ही अपना नाम रखवाते हैं ॥७९॥ 
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*नाम धरावै दास का, दासातन थैं दूर ।*
*दादू कारज क्यों सरै, हरि सौं नहीं हजूर ॥८०॥*
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! अपना नाम तो दास रखवा लें, कि हम राम के दास हैं, परन्तु दासातन भक्ति से बहुत अलग हैं । दासातन भक्ति तो करने वाले हनुमान जी थे । केवल नाम रखवाने वाले पुरुषों के अर्थात् इस लोक और परलोक के काम कैसे सिद्ध हो सकते हैं ? पापों को हरने वाले हरि, हृदय में ही निवास करते हैं, उनके तो कभी हजूरी बने ही नहीं । माया और विषय भोगों के ही सदा हजूरी बने हैं, उनका कल्याण होना असम्भव है ॥८०॥ 
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*भक्त न होवै भक्ति बिन, दासातन बिन दास ।*
*बिन सेवा सेवक नहीं, दादू झूठी आस ॥८१॥*
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! परमेश्‍वर की अनन्य भक्ति धारण किये बिना, भक्त नहीं होता और दासातन भाव को जब तक नहीं अपनावे, तब तक दास नहीं कहलाता और निष्काम सेवा को धारण करे बिना सेवक नहीं हो सकता है । उपरोक्त जो धारणा नहीं है, तो उनकी यह आशा रखना कि वह भक्त है, दास है, सेवक है, यह सब झूठ बात है । यह सब दुनियावी प्रपंच है ॥८१॥
(क्रमशः)

= साँच का अंग १३ =(७६/७८)

॥ दादूराम सत्यराम ॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
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*= साँच का अंग १३ =*
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*झूठै गुरु*
*आतम लावै आप सौं, साहिब सेती नांहि ।*
*दादू को निपजै नहीं, दोन्यूं निष्फल जांहि ॥७६॥*
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! जो गुरु, शिष्य को अपनी सेवा आदि कार्यों में ही लगाया रखे और साहिब परमात्मा की भक्ति ज्ञान का उपदेश कभी न करे । ऐसे झूठे गुरु और झूठे शिष्य, दोनों ही परमार्थ मार्ग में नहीं पनप पाते ॥७६॥ 
कबीर कान फुका गुरु हद का, बेहद का गुरु और । 
जब बेहद का गुरु मिलै, तब लगै ठिकाने ठौर ॥ 
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*तू मुझ को मोटा कहै, हौं तुझ बड़ाई मान ।*
*सांई को समझै नहीं, दादू झूठा ज्ञान ॥७७॥*
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! ऐसे झूठे गुरु, “कहैं कुछ और करैं कुछ”, ऐसे ही झूठे शिष्य गर्भवास के कौल को बिसरे हुए परस्पर दोनों ही अपने आप की प्रशंसा करते हैं । शिष्य कहता है कि मेरे गुरु तो महान् हैं और गुरु कहता है कि मेरा शिष्य तो ऐसा आज्ञाकारी है कि जैसे रामचन्द्र के हनुमान थे । परमेश्‍वर से दोनों ही विमुख हैं, उनका ज्ञान केवल मायावी है, ऐसे गुरु का संग त्यागने योग्य है ॥७७॥ 
कबीर झूठे गुरु को नमस्कार, और सांचे गुरु की सेव । 
झूठ नखावै, सांच दे, सो कहिए गुरुदेव ॥ 
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*कस्तूरिया मृग
*सदा समीप रहै संग सन्मुख, दादू लखै न गूझ ।*
*सपने ही समझै नहीं, क्यों कर लहै अबूझ ॥७८॥*
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! जैसे कस्तूरी मृग की नाभि में ही है, किन्तु मूर्ख मृग बाहर पहाड़, पर्वत, घास - फूस में कस्तूरी ढूंढता है । इसी प्रकार मनुष्य के हृदय में ही परमेश्‍वर का वास है, परन्तु परमेश्‍वर से विमुखी पशु - तुल्य, खान - पान विषय भोगों में रत्त, अज्ञानी मनुष्य, इस वार्ता को नहीं जानता है कि मेरे हृदय में ही परमेश्‍वर निवास करते हैं । इसलिए हे मुमुक्षुओं ! अपने आत्म - स्वरूप में ही ब्रह्म का अनुभव करिये ॥७८॥ 
(क्रमशः)

शुक्रवार, 19 अप्रैल 2013

= साँच का अंग १३ =(७३/७५)

॥ दादूराम सत्यराम ॥ 
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
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*= साँच का अंग १३ =*
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*चौंप चरचा*
*दादू श्रोता घर नहीं, वक्ता बकै सु बादि ।*
*वक्ता श्रोता एक रस, कथा कहावै आदि ॥७३॥* 
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! श्रोता की बुद्धि अन्तःकरण में स्थिर नहीं होवे तो, वक्ता जो आत्म उपदेश करता है, वह सब निष्फल ही जाता है । वही श्रोता और वक्ता की वार्ता सफल है, जिसमें वक्ता और श्रोता दोनों तन्मय रहें अर्थात् स्वस्वरूपाकार हो जावें । वही कथा सत्य है ॥७३॥ 
वक्ता श्रोता मिल चले, कथा करी बन आइ । 
मोक्ष भई त्रिय दोउन की, अस्थि परख जल जाइ ॥ 
दृष्टान्त ~ एक सत्य वक्ता अपनी पतिव्रता स्त्री से बोले ~ “मैं कथा सुनाने जाता हूँ ।” कितने ही गाँवों में लोगों ने उनको पूछा ~ आप कौन हैं ? वह बोला ~ मैं वक्ता हूँ, कथा सुनाने वाला । कई लोगों ने कहा ~ सुनाओ । वह बोला ~ मैं सुनाऊं वैसा श्रोता मिलेगा, तब सुनाऊंगा । 
वैसे ही एक श्रोता भी अपनी पतिव्रता स्त्री से बोला “मैं कथा सुनने जाता हूँ ।” मार्ग में कितने ही कथा - वाचक मिले, उन्होंने पूछा, “तुम कौन हो ?” वह बोला “मैं श्रोता हूँ, परन्तु मैं सुनूं, वैसी कथा सुनावे, उसकी सुनता हूँ ।” देवगति से वह सच्चा वक्ता और सच्चा श्रोता, दोनों मिल गये ।
यथायोग्य रामा - श्यामा हुई और दोनों गंगा के किनारे निर्जन स्थान में जाकर बैठे । वक्ता सिद्ध आसन से बैठकर मन इन्द्रियों को एकाग्र करके ईश्‍वर की कथा सुनाने लगा । श्रोता भी सामने सिद्ध आसन से बैठा और मन इन्द्रियों को कान के पास लाकर एक दिल होकर सुनने लगा । 
जब दोनों की वृत्ति परमेश्‍वर के स्वरूपाकार हो गई, तब उनके शरीर छूट गये और परमेश्‍वर में अभेद हो गये । उधर वक्ता की स्त्री पति को ढूंढने चली, इधर श्रोता की स्त्री भी पति को ढूंढने चली । वैसे ही देवगति से दोनों का मिलाप हो गया । फिऱ वे दोनों मिलकर पतियों की खोज करने लगी । 
इस प्रकार जब गंगा के किनारे पहुँची, तब किसी ने कहा ~ अमुक जंगल में गंगा के किनारे एक कुछ कहता था और दूसरा कुछ सुनता था, फिर वहाँ दोनों के ही शरीर छूट गए । यह सुनकर वे दोनों स्त्रियां वहीं पहुंचीं और आमने - सामने दो हडि्डयों की ढेरी को देखा । निश्‍चय किया कि ये हमारे पतियों की ही हडि्डयां हैं । 
श्रोता की स्त्री बोली ~ “बहन ! तेरे पति शब्द रूपी बाण मारते थे और मेरे पति बाणों को झेलते थे । तेरे पति ने मेरे पति का और अपना उद्धार किया है, तूं मेरा कल्याण कर ।” तब वक्ता की स्त्री बोली ~ “बहन ! जो हडि्डयां शब्द बाणों से बिंधी - बिंधी हैं वे सब तेरे पति की हैं, और जो ठोस - ठोस हडि्डयां हैं, वे सब मेरे पति की हैं । 
छांट लो, अपनी - अपनी झोली में हडि्डयां ले लो और अपने पतिदेव का मन में ध्यान करके शरीरों को छोड़ दो । इसी में हमारा कल्याण है ।” इस प्रकार वे दोनों पतिव्रताएँ परम गति को प्राप्त हो गईं । ब्रह्मऋषि सतगुरु महाराज कहते हैं कि “वक्ता श्रोता एक रस हो जावें”, तभी परमेश्‍वर की प्राप्ति होती है ।
*वक्ता श्रोता घर नहीं, कहै सुनै को राम ।*
*दादू यहु मन थिर नहीं, बाद बकै बेकाम ॥७४॥*
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! वक्ता और श्रोता दोनों केवल लोक - व्यवहार में दिखावटी परमेश्‍वर की चर्चा करते हैं, परन्तु दोनों का ही मनीराम, राम - भक्ति और ज्ञान में एकाग्र नहीं होने से कथन और श्रवण दोनों ही व्यर्थ हैं ॥७४॥ 
कथनी कथै अगाध की, चलै भेड़ की चाल । 
बोली बोलै श्याल की, कुत्ते फाड़ैं खाल ॥ 
अगाध परमात्मा का कथन करें, परन्तु चाल मायामय चलते हैं और जम्बुक जैसी आवाज लगाते हैं, ऐसे सकामी वक्ता और सकामी श्रोताओं की कालरूपी कुत्ते खाल फाड़ते हैं ।
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*विचार दृढ ज्ञान*
*अन्तर सुरझे समझ कर, फिर न अरूझे जाइ ।*
*बाहर सुरझे देखतां, बहुरि अरूझे आइ ॥७५॥*
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! अन्तर अन्तःकरण में ज्ञान - विचार के द्वारा आत्मा अनात्मा के स्वरूप को समझकर निषिद्ध वासना और सकाम कर्मों के बन्धन से मुक्त हुए हैं । ऐसे पुरुष फिऱ संसार में आसक्त नहीं होते हैं । देखा - देखी का वैराग्य धारने वाले तो, फिर - फिर कर संसार - चक्र में घूमते रहते हैं, अर्थात् माया के जाल से मुक्त नहीं हो सकते ॥७५॥ 
काम क्रोध अरु लोभ का, घर में कीजे त्याग । 
‘जैमल’ पहली समझकर पीछे ले वैराग ॥ 
जर गई मन की वासना, ब्रह्म अग्नि के माहिं । 
तुलसी भूने बीज ज्यूं, सो फिर ऊगै नाहिं ॥ 
(क्रमशः)