मंगलवार, 31 दिसंबर 2013

दादू जे साहिब कौं भावै नहीं



卐 सत्यराम सा 卐
दादू जे साहिब कौं भावै नहीं, सो हम थैं जनि होइ ।
सतगुरु लाजै आपणा, साध न मानैं कोइ ॥
दादू जे साहिब को भावै नहीं, सो सब परिहर प्राण ।
मनसा वाचा कर्मणा, जे तूं चतुर सुजाण ॥ 
दादू जे साहिब को भावै नहीं, सो जीव न कीजी रे ।
परिहर विषय विकार सब, अमृत रस पीजी रे ॥ 
दादू जे साहिब को भावै नहीं, सो बाट न बूझी रे ।
सांई सौं सन्मुख रही, इस मन सौं झूझी रे ॥

कछू न कीजे कामना


卐 सत्यराम सा 卐 
कछू न कीजे कामना, सगुण निर्गुण होहि । 
पलट जीव तैं ब्रह्म गति, सब मिलि मानैं मोहि ॥ 
घट अजरावर ह्वै रहै, बन्धन नांही कोइ । 
मुक्ता चौरासी मिटै, दादू संशय सोइ ॥ 
राम रसिक वांछै नहीं, परम पदारथ चार । 
अठसिधि नव निधि का करै, राता सिरजनहार ॥

श्री वाह्यांतर वृत्ति वार्ता(न.दि.- ४/५)


卐 दादूराम~सत्यराम 卐
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*श्री वाह्यांतर वृत्ति वार्ता*
रचना ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
नवम दिन ~
आवत जो उसको ही खावे, 
विरला कोई बचने पाव ।
यह राक्षस रत्नाकर केरा, 
नहीं काल कित है मन तेरा ॥४॥
आं वृ. - “जो आवे उसे ही खा जाता है । उससे कोई विरला ही बचने पाता है । बता वह कौन है ?’’ 
वां वृ. - “यह रत्नाकर समुद्र का वह राक्षस है, जो लंका जाते समय हनुमान जी के मार्ग में आया था । वह आकाश मार्ग से जाने वालों को अपने ऊपर आते ही नीचे खेंच कर खा जाता था । हनुमान जी ने ही उसे मारा था । उससे हनुमान जी जैसे विरले ही बच पाये थे ।’’
आं वृ. - “नहिं, सखि ! तेरा मन किधर चला जाता है । यह तो काल है; सभी को खाता है किन्तु कोई विरले ब्रह्मनिष्ठ ही इससे बच पाते हैं । तू भी भगवत् भक्ति द्वारा ब्रह्मज्ञान प्राप्त करेगी, तब ही काल चक्र से निकल पायेगी और यदि भक्ति में प्रमाद करेगी तो बारंबार मरती रहेगी ।’’
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उदय होय पीछे छिप जावे, 
फिर आवरण हटत प्रगटावे ।
छिपत चन्द्र घन से मैं जानी, 
नहिं यह संशय ज्ञान सयानी ॥५॥
आं वृ. - “एक उदय हो कर फिर छिप जाता है और पुन: आड के हटते ही प्रगट हो जाता है । बता वह कौन है ?’’ 
वां वृ. - “चन्द्रमा है । चन्द्रोदय के समय नभ में बादल हो तो वह बादल में छिप जाता है । बादल हटने पर पुन: प्रगट हो जाता है ।’’ 
आं वृ. - “नहिं, सखि ! यह तो ज्ञान है । सत्संग के द्वारा स्रदय में उदय होता है किन्तु संशय आजाने से छिप जाता है । फिर सत्संग और मनन के द्वारा अज्ञान नाश हो जाता है तब पुन: प्रगट होकर ब्रह्मानंद देता है । तू भी जब तक संशय हो, तब तक बारंबार प्रश्‍नोत्तर के द्वारा ज्ञान का अभ्यास करते रहना । जब तेरा संशय निवृत्त हो जायगा तब ज्ञान द्वारा तुझे भी परमानंद प्राप्त होगा । इसमें संशय नहीं ।’’ 
(क्रमशः)

= अ. त./३-४ =

#daduji
*श्री सन्त-गुण-सागरामृत श्री दादूराम कथा अतिपावन गंगा* ~ स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~ संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्‍वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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*(“अष्टम - तरंग” ३-४)*
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लोग कहें - सब साँभर तें इत, 
दीददयालु गुरु चलि आये ।
संत सु सिद्ध सुने हम कानन, 
नैन निहार बड़े फल पाये ।
पूरब पश्चिम उत्तर दक्षिण, 
देश विदेश सबै जन आये ।
भीर घणी दिन रैन रहै इत, 
होत उचार कथा मन भाये ॥३॥
उन भक्तजनों के द्वारा स्वामीजी की आगमन वार्ता चारों दिशाओं में सर्वत्र फैलने लगी । लोग परस्पर कहने लगे - साँभर शहर से एक सिद्ध संत पधारे है, पहले जिनकी शोभा हम कानों में ही सुनते थे, उन्हें आज आँखों से देखकर कृतार्थ हो गये । वे बहुत दयालु संत है । यों शोभा सुनकर चारों दिशाओं से भक्तजन दर्शनार्थ आने लगे । भीड़ होने लगी । संत नित्य नियम से कथा सत्संग भजन कीर्तन करते रहते ॥३॥
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*चारो दिशा से भक्त सत्संग में आने लगे*
आवत भक्त चढावत भेंट हि, 
स्वामिजु द्रव्य छुवै कछु नांही ।
छाजन भोजन संत हु पावत, 
ध्यान धरें निशि वासर मांही ।
ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य रू शूदर, 
ले उपदेश हिं भक्ति कराही ॥
ज्ञान सुनाय किये सुधि सेवक, 
संत सभा नित होवत ताही ॥४॥ 
भक्तजन भेंट चढाते रहते, किन्तु स्वामीजी किसी द्रव्य को नहीं छूते । वस्त्र, भोजन सामग्री, सम्पत्ति आदि संतों में वितरित करवा देते । स्वामीजी तो निर्लेप निरीह भाव से अहर्निश ध्यान में ही लीन रहते । चारों वर्ण जातियों के भक्तजन उपदेश सुनने आने लगे । नित्य होने वाली सत्संग सभा में ज्ञान पाकर उनके अन्त:करण शुद्ध होने लगे, भावभक्ति बढ़ने लगी ॥४॥
(क्रमशः)

= काल का अंग २५ =(२१/२२)


॥ दादूराम सत्यराम ॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*काल का अंग २५*
*सींगी नाद न बाजहि, कत गये सो जोगी ।*
*दादू रहते मढी में, करते रस भोगी ॥२१॥*
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! अज्ञानी संसारीजन, इस शऱीर रूप मढी में रहते हैं । और वे जीव प्रातःकाल प्रभु का स्मरण भूल कर अपने परिवार से प्रेम करते थे । परन्तु अन्त समय में कोई भी जन्म - मरण के दुःख को नहीं बँटा सकते । ऐसे संसारीजन अनेक भोग - वासनाओं में फंसकर, नित्य - अनित्य का विचार किये बिना, जन्म - मरण में ही भ्रमते हैं ॥२१॥
कबीर जंत्र न बाजहि, टूट गये सब तार । 
जंत्र बिचारा क्या करे, चले बजावनहार ॥
गुरु दादू आमेर थे, ढिग जोगी को थान । 
इक दिन सींगी ना बजी, मर गयो जोगी जान ॥
प्रसंग ~ आमेर में ब्रह्मऋषि दादूदयाल जी महाराज विराजते थे । उनके समीप ही, कनफटे योगियों का ही एक स्थान था । उसमें वे लोग अनेक प्रकार के भोग भोगते थे और खूब मस्ती से रहते । सुबह - शाम सींगी नाद जोर - जोर से बजाते । एक रोज प्रातःकाल सींगी नाद की आवाज नहीं हुई । परम गुरुदेव बोले ~ संतों ! वह आज काल - भगवान के भोजन बन गये, अर्थात् उनको आज काल ने खत्म कर दिया ।
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*दादू जियरा जायगा, यहु तन माटी होइ ।*
*जे उपज्या सो विनश है, अमर नहीं कलि कोइ ॥२२॥*
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! इस शरीर से चिदाभास अन्तःकरण जाएगा और यह शरीर मिट्टी में मिलेगा । इसी प्रकार जो कुछ उत्पन्न हुआ है नाम रूप जगत, उसमें कोई भी अमर रहने वाला नहीं है । अमर तो केवल परमेश्वर और परमेश्वर का नाम ही है ॥२२॥
जातस्य हि ध्रुवो मृत्युः ध्रुवं जन्म मृतस्य च ॥ - गीता
कबीर जो उग्या सो आंथवै, फूल्यो सो कुम्हलाय । 
जो चुणिया सो ढह परे, जो जाया सो जाइ ॥
(क्रमशः)

मन का आसन जे जिव जाने १०/११

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साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*मन का अंग १०/११*
*मन का आसन जे जिव जाने, तो ठौर - ठौर सब सूझै ।*
*पांचों आनि एक घर राखे, तब अगम निगम सब बूझै ॥११॥* 
दृष्टांत - 
जशवन्त नृप प्रश्‍न किया, आसन अच्छा कौन । 
दासनारायण ने कहा, दादू कहा है जौन ॥३॥ 
 जोधपूर नरेश जशवंतसिंह प्रथम ने दादूजी के पौत्र शिष्य और घडसीदासजी कड़ेल वालों के शिष्य नारायणदासजी चांपारस वाले अपने गुरुजी से पू़छा था - आसन कौनसा अच्छा है ? तब नारायणदासजी ने कहा था - जो दादूजी ने मन के अंग की ११ साखी में कहा है, वही अच्छा है । दादूजी ने उक्त ११ की साखी में कहा है - मन का आश्रय रूप आसन आत्म स्वरूप ब्रह्म है । उस ब्रह्म को जो जान जाता है, उसे सभी स्थानों में और प्रत्येक वस्तु में ब्रह्म ही भासने लगता है । उक्त आसन के समान फलप्रद कोई भी आसन नहीं है । अतः उक्त आसन ही सर्वश्रेष्ठ है ।
(क्रमशः)

सोइ शूर जे मन गहै १०/१०

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साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*मन का अंग १०/७*
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*सोइ शूर जे मन गहै, निमष न चलने देइ ।*
*जब ही दादू पग भरे, तब ही पकड़ सु लेय ॥७॥*
दृष्टांत - 
इक कन्या यह नियम किया, मोहिं परणे हो शूर ।
सिंह हता गज अरि हने, तिय तज भाजा दूर ॥१॥
एक राजकन्या ने प्रतिज्ञा की थी कि जो मेरे कथानानुसार वीरता दिखायेगा, वही शूर मेरा पाणीग्रहण करेगा । उससे विवाह करने के लिये अनेक व्यक्ति आते थे किन्तु उसके कथनानुसार वीरता दिखाने में अपने को असमर्थ समझकर लौट जाते थे । 
फिर एक सच्चा शूर भी आया और उसने कहा - आप कहैं वैसे ही शौर्य दिखा सकता हूँ । बाई ने कहा - बिना शस्त्र सिंह को मारो, मल्ल युद्ध से हाथी के दांत उखाड़ो और अपने शत्रुओं को मार कर आओ, फिर मेरा पाणिग्रहण कर सकते हो । वह वीर बाई के कथनानुसार करके आया और बोला - अब मेरे साथ विवाह करो । तब बाई ने कहा - 
सिंह विदारण हैं बली, अरु तोरण गंज दंत ।
काम कटक से मुड़ चले, एसे कायर कंत ॥२॥
यह सुनकर उक्त वीर ने कहा - हम काम कटक(सेना) को भी जीतेंगे । ऐसा कहकर तपस्या करने वन को चला गया और बाई की इच्छा पूर्ण हो गई । बाई आजन्म ब्रह्मचारिणी रहना चाहती थी किन्तु माता - पिता के आग्रह पर उसने उक्त प्रतिज्ञा की थी । भगवान् ने उसकी इच्छा पूर्ण कर दी । उक्त वीर भी वन को चला गया और बाई भी आजन्म प्रभु का भजन करके प्रभु को प्राप्त हो गई । दोनों ने अपने - अपने मन को दृढ़ता से पकड़ कर रक्खा था । यहीं उक्त ७ की साखी में कहा है - मन जीतने वाला ही शूर है । 
(क्रमशः)

सोमवार, 30 दिसंबर 2013

आपा पर सब दूर कर ९/१०

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साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*चेतावनी का अंग ९/१०*
*आपा पर सब दूर कर, राम-नाम रस लाग ।*
*दादू अवसर जात है, जाग सके तो जाग ॥१०॥*
दृष्टांत - 
वाणिक चला सुत मिलन को, मिले बीच इक ग्राम ।
रात दर्द सूत के चला, रात न लीन्हा नाम ॥४॥
एक वैश्य का पुत्र विदेश कमाने गया था । बहुत समय हो जाने से पिता को पुत्र से मिलने की इच्छा हो गई । अतः वह पुत्र के पास जाने को घर से चल पड़ा । उ़धर पुत्र भी माता पिता से मिलने चल पड़ा । बीच में एक ग्राम की धर्मशाला में दोनों एक कमरे में ठहरे थे किन्तु अंधेरा होने से परस्पर पहचान न सके दोनों थके हुये थे । बिना कु़छ बात करे ही सो गये । 
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आधी रात को पुत्र के पेट में अति तेज दर्द होने लगा । अब उस समय किसके पास जाय और किसको कहै । दर्द से व्यथित दुःख पूर्ण शब्द बोलता था तब पिता सोचता था यह दुष्ट कहां से आ गया है । सोने ही नहीं देता है । किन्तु जब सुर्योदय होने पर परस्पर पहचान में आये तब पिता पश्चाताप करने लगा मुझे रात को पता लग जाता कि यह मेरा पुत्र ही है तो मैं अवश्य उपाय करता ही किन्तु न पहचानने से बेटा तुझे अधिक दुःख उठाना पड़ा । 
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यही उक्त १० की साखी में कहा है कि उक्त पिता के समान अपने पराये का भेद न रखकर सबको ही अपने समान समझकर सब की सेवा करते हुए हरि भजन में लगना चाहिये । देर करके अपना सुअवसर नहीं खोना चाहिये ।
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इति श्री चेतावनी का अंग ९ समाप्तः
(क्रमशः)

दादू सोच करै सो सूरमा




卐 सत्यराम सा 卐 
दादू सोच करै सो सूरमा, कर सोचै सो कूर । 
कर सोच्यां मुख श्याम ह्वै, सोच कियां मुख नूर ॥ 
जो मति पीछे ऊपजै, सो मति पहली होइ । 
कबहुं न होवै जीव दुखी, दादू सुखिया सोइ ॥


सुख मांहि दुख बहुत हैं




卐 सत्यराम सा 卐
सुख मांहि दुख बहुत हैं, दुख मांही सुख होइ । 
दादू देख विचार कर, आदि अंत फल दोइ ॥

श्री वाह्यांतर वृत्ति वार्ता(न.दि.- १/३)


卐 दादूराम~सत्यराम 卐
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*श्री वाह्यांतर वृत्ति वार्ता*
रचना ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
नवम दिन ~
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कवि -
वाह्य वृत्ति नवमें दिवस, आई आंतर पास ।
बैठी सन्मुख प्रणति कर, हिय में अति उल्लास ॥१॥
आंतर लख कर वाह्य को, कहने लगी सप्रेम ।
मन देकर सम्यक सुने, अवश्य दे जो क्षेम ॥२॥
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टूट पड़त काला पर नारी, 
काला मरे हर्ष हो भारी ।
पड़त सर्प पर बिजली प्यारी ! 
अघ पर गिरे भक्ति सुखकारी ॥३॥
आं वृ. - “काले पर एक नारी गिरती है और काला मरने से घर में भारी आनन्द होता है । बता वह कौन है ?’’ 
वां वृ. - “काले सर्प पर बिजली पड़ती है । घर का सर्प मरने से घर वाले सुखी होते ही हैं ।’’ 
आं वृ. - “यह तो अघ(पाप) पर भगवत् भक्ति पड़ती है और पाप को नष्ट कर देती है । पाप नष्ट होते ही स्रदय में आनंद होता है । तू भी सभी पापों को नष्ट करने के लिये अपने स्रदय में भगवत् भक्ति को निरंतर स्थान देना जिससे तेरा स्रदय भी परम शुद्ध होकर आनंद से भर जायगा । परमानंद की प्राप्ति के लिये भगवत् भक्ति को छोड़कर अन्य कोई उत्तम साधन नहीं है । इसीलिये संतों ने भी भक्ति को ही मुख्यता दी है ।’’ 
(क्रमशः)

= अ. त./१-२ =

#daduji

*श्री सन्त-गुण-सागरामृत श्री दादूराम कथा अतिपावन गंगा* ~ स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~ संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्‍वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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*(“अष्टम - तरंग” १-२)*
*इन्दव - छन्द*
*जोबनेर धानक्या ५ दिन विराजे*
सम्वत चन्द ॠतु गुण सागर, 
चैत्र सुदी द्वितिया रवि थाये ।
दादु दयालु तजी तब साँभर, 
अम्बपुरी पुनि आप सिधाये ।
रामत करत चले सब शिष्य जु, 
ग्रामहु जोबनेर तब आये ।
धानकिया टीकम भये शिष्य जु, पंच दिना लगि वास कराये ॥१॥ 
विक्रम सम्वत् १६३७, चैत्र शुक्ला द्वितीया रविवार को श्री दादूजी ने साँभर स्थान को छोड़कर आमेर के लिये प्रस्थान किया । गमन करते हुये सब संत शिष्य जोबनेर ग्राम पहुंचे, वहां से धानकिया ग्राम पधारे, जहाँ टीकमदास जी स्वामीजी के शिष्य बने । धानकिया ग्राम में स्वामीजी पाँच दिन तक विराजे ॥१॥ 
*आमेर में विनाश किया कन्दरा मध्य*
संत सभी संग लेय गुरुजन, 
अम्बपुरी तब वास किये है ॥ 
ध्यान को थान भलो गिरि कंदर, 
संत सरोवर पास रिये है ॥ 
आवत लोग चहूं दिशि दरशन, 
दादु दयालु हिं भाव भये है ॥ 
ज्ञान गंभीर महा तप मूरति, 
शील सुमेर हिं संत थये है ॥२॥ 
फिर सभी संत शिष्यों को संग लेकर स्वामीजी आमेर पधारे । निवास एवं ध्यान के लिये सरोवर के समीपस्थ एक गिरि - कन्दरा को उचित स्थान माना, और वहाँ विराजे । ज्ञान गंभीर, महातपोमूर्ति, शील सुमेरु संत श्री दादूजी की आगमन वार्ता एवं शोभा सुनकर वहाँ भी दर्शनार्थी आने लगे ॥२॥ 
(क्रमशः)

= काल का अंग २५ =(१९/२०)

॥ दादूराम सत्यराम ॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*काल का अंग २५*
*दादू काया कारवीं, कदे न चालै संग ।*
*कोटि वर्ष जे जीवना, तऊ होइला भंग ॥१९॥*
टीका ~ हे जिज्ञासु ! यह काया रूप स्थूल शरीर कारवी कहिए, अविद्या की रची हुई, चैतन्य रूप प्राणों के साथ, कभी भी संग नहीं चलेगी । चाहे करोड़ वर्ष की आयु होवे, तब भी अन्त में यह नाश को ही प्राप्त होगी ॥१९॥
चार पुरुष भाड़ै लई, बनी कोटड़ी चार । 
कहीं भाड़ो हमरो यह, कबहुं देहुं निकार ॥
दृष्टान्त ~ चार पुरुषों ने एक कोटड़ी किराये ली । मकान मालिक ने कहा ~ मैं चाहूँगा, तभी खाली करवा लूंगा । एक ने उसमें तमाम घर का जखीरा ला कर भर दिया । दूसरे ने खाने - पकाने का सामान रखा । तीसरे ने केवल अपना बिस्तर ही लाकर रखा । चौथा उसमें खाली लेट लगाकर चला जावे । मकान मालिक ने एक रोज कहा ~ तुम लोगों ने तो अब तक किराया नहीं दिया, इसलिये कोटडी खाली कर दो । 
पहले नम्बर के मनुष्य को बहुत भारी दुःख हुआ । दूसरे को उससे कम दुःख हुआ । तीसरे को दूसरे से कम दुःख हुआ । चौथे को ना बराबर दुःख हुआ, क्योंकि वह कुछ रखता ही नहीं था । इसी प्रकार काल - भगवान से, यह शरीर नाम की कोटडी, पामर, विषयी, जिज्ञासु, मुक्त, इन चारों ने ली । पामर इसमें पूरा अध्यास कर बैठा, विषयी इसमें उससे कम, केवल विषय - सुख का उपभोग करने लगा । जिज्ञासु ने इसमें साधन साधने का ही अध्यास किया । मुक्त को इसमें किसी प्रकार का अध्यास नहीं था ।
काल - भगवान ने सहसा आदेश दिया कि कोटड़ी खाली कर दो । जितना जितना जिसको शरीर में अध्यास रूप ममत्व था, उतना उतना उनको दुःख हुआ । ज्ञानी को किंचित् भी अध्यास नहीं था, सो उसको इसके त्यागने में जरा सा भी दुःख नहीं हुआ ।
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*कहतां, सुनतां, देखतां, लेतां, देतां प्राण ।*
*दादू सो कतहुँ गया, माटी धरी मसाण ॥२०॥*
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! जिस शरीर के द्वारा चेतन कहता था, सुनता था, देखता था, लेता था, देता था, न मालूम वह चेतन रूप प्राण किधर से निकल गया और व्यावहारिक सगे - सम्बन्धी शमशान में ले जाकर जलाते हैं या दफनाते हैं ॥२०॥
चला जात बाजींद मग, ऊँट पड्या इक देखि । 
कई उठायो ना उठै, चेतन गया अलेख ॥
दृष्टान्त ~ बाजींद जी नवाब थे । दौरा करते हुए आ रहे थे । रास्ते में इनके सामान का ऊँट जा रहा था । एक जगह वह ऊँट बैठ गया । नौकरों ने सामान उतार कर अलग रख दिया । ऊँट मृत्यु को प्राप्त हो गया । पीछे से बाजींद जी आये । देखकर बोले ~ ‘‘भई ! कैसे बैठे हो ! कहा ~ हुजूर ! ऊँट मर गया ।’’ उन्होंने पूछा ~ ‘‘इसका क्या मर गया ? यह तो सोया हुआ है ।’’ चारों तरफ घूमकर देखा और बोले ~ ‘‘नखशिख तो कुछ बिगड़ा नहीं ?’’ अर्थात् इसके अवयव तो खराब नहीं हुए ? नौकर बोले ~ ‘‘इसमें चेतन था, वह निकल गया ।’’ 
वहीं बाजींद जी को भय हो गया । और बोले ~ ‘‘घर भी नहीं पहुँचाये ?’’ नौकर बोले ~ ‘‘घर पहुँचाने का कोई नेम नहीं होता है ।’’ यह सुनकर विचार किया कि इस मेरे शरीर में से भी चेतन, ऐसे ही जा सकता है, उसी वक्त राज का त्याग करके ब्रह्मऋषि दादू दयाल महाराज की शरण में आमेर पहुँच गये । परम गुरुदेव को नमस्कार किया और उनके उपदेश सुनकर हृदय में विरह - भक्ति जागृत हो गई । वह विरह के द्वारा, सत्यस्वरूप परमेश्वर को प्राप्त करके जीवन - मुक्त हो गये ।
(क्रमशः)

रविवार, 29 दिसंबर 2013

=१३२ =



卐 सत्यराम सा 卐
"You cannot transmit wisdom and insight to another person. The seed is already there. A good teacher touches the seed, allowing it to wake up, to sprout, and to grow." 
~ Thich Nhat Hanh ~ 
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शिष्य जिज्ञासा 
जिन हम सिरजे सो कहाँ, सतगुरु देहु दिखाइ। 
दादू दिल अरवाह का, तहँ मालिक ल्यौ लाइ ॥४२॥ 
टीका ~ जिस प्रभु ने हमारी रचना की है वह कहाँ है ? हे सतगुरु! कृपा करके उस अन्तर्यामी का प्रत्यक्ष ज्ञान कराओ । हे शिष्य ! जीवात्मा उसका जो दिल ह्रदय गुहा(गुफा) बुद्धि है, उसमें मालिक कहिये तेरा प्रभु विराजता है । उस जगह अर्थात् अपने आत्मस्वरूप में ही मन की वृत्तियों को तत्स्वरूप बनाओ ॥४२॥ 
पूर्व साखी में सतगुरु ने प्रभु को ह्रदय में बताया है, किन्तु अविद्या का पड़दा दूर नहीं होने से शिष्य को स्वरूप का बोध नहीं होता है । अब शिष्य पुन: सतगुरु से नम्र भाव से, अविद्या अन्धकार दूर करने की प्रार्थना करता है । 

मुझ ही मैं मेरा धणी, पड़दा खोलि दिखाइ । 
आत्म सौं परमात्मा, प्रकट आण मिलाइ ॥४३॥ 
टीका ~ हे दयामूर्ते ! यदि मेरा मालिक मेरे अन्दर ही है, तो "पड़दा'' कहिये अविद्या अन्धकार को हटा करके आत्मसाक्षात्कार कराओ । हे सतगुरो ! आप दयालु हो, इसलिए मेरे चित्त को प्रभु भक्ति में एकाग्र करके, सर्वव्यापक प्रभु का साक्षात्कार कराइए एवं अपरोक्ष रूप से मुझ अज्ञानी को प्रत्यक्ष दर्शन कराइए ॥४३॥ 

भरि भरि प्याला, प्रेम रस, अपणे हाथ पिलाइ । 
सतगुरु के सदिकै किया, दादू बलि बलि जाइ ॥४४॥ 
टीका - हे गुरुदेव! मैं तन, मन, धन, वचन, आदि आपके भेंट करता हूँ और मैं आपकी बारंबार वन्दना करता हूँ । क्यों ? किस लिए ? "भरि भरि प्याला प्रेम रस अपणे हाथ पिलाइ"- अर्थात् अपने हित भावनारूपी हाथों से प्रेमरूपी प्याला रामरस से भर-भर कर बारंबार पिलाइए । यही आपसे प्रार्थना है ॥४४॥ 

जब सतगुरु ने परमेश्वर को जिज्ञासु के हृदय में ही बताया है, तो अब शिष्य स्वयं ही आत्मसाक्षात्कार कर लेगा । आप सतगुरु की वन्दना क्यों करते हो ? इसका उत्तर कहते हैं । 
सरवर भरिया दह दिसा, पंखी प्यासा जाइ । 
दादू गुरु प्रसाद बिन, क्यों जल पीवै आइ ॥४५॥ 
टीका - दशों दिशाओं में अपार समुद्र भरा हुआ है तथापि "पक्षी प्यासा जाइ" - कहिये जलाशय यदि बिना घाट का है, तो प्यासे पक्षी आदि उसमें कैसे जल पी सकते हैं ? अर्थात् प्यासे ही उड़ जाते हैं । इसी तरह द्रष्टान्त में भी है, जो संसार है, वह दशों - दिशाओं में जलरूपी सरोवर की भाँति व्यापक है और जो आनन्द चैतन्य है, वह अगाध एवं अपार, मनन्द्रियों से न जानने योग्य है और पक्षी आदि की भाँति जो अज्ञानी जिज्ञासु - जन हैं, वे "आइ" इस संसार में आ करके प्यासा यानी आत्म-साक्षात्कार के बिना, दु:खी ही चला जाता है, क्यों ? 'दादू गुरु प्रसाद बिन क्यों जल पीवै आइ' अर्थात् सतगुरु की कृपा ही मानों इस सागर से राम-रस रूपी जल पीने का घाट है और उसके नहीं प्राप्त होने से यह जीव प्रभु की महिमा कैसे पहचान सकता है ? सतगुरु कृपा से ही मुमुक्ष का कल्याण होता हैं ॥४५॥ 
"पानी में मीन पियासी..." कबीर 
अब सतगुरु कृपा से ही आत्म-साक्षात्कार होना सम्भव है तो स्वयं सतगुरु की कृपा करके क्यों न ज्ञान देवें ? जो समर्थ होकर भी उपदेश नहीं देते हैं, तो उन्हीं को दोष होवेगा ? 

अब इसके उत्तर में निरूपण करते हैं :- 
सतगुरु बेपरवाही 
मान सरोवर मांहिं जल, प्यासा पीवै आइ । 
दादू दोष न दीजिये, घर घर कहण न जाइ ॥४६॥ 
टीका - अपार जलाशय में भरपूर जल होता है, जिसको प्यास हो, वह स्वयं पिपासु ही आकर मानसरोवर में जल पीता है । मानसरोवर किसी के घर-घर में नहीं कहता फिरता है कि निर्मल जल पीओ । इसलिए उसको कोई व्यवहार में दोष नहीं देता । इसी प्रकार सतगुरु तो मानसरोवर रूप हैं और उनमें जो आत्म-अनुभव रूप जो जल भरा हुआ है, उसको उत्तम जिज्ञासु, सतगुरु की शरण में आ करके आत्मा का अनुभव करता है । किन्तु सतगुरु "घर-घर" - कहिए अनधिकारी, बिना जिज्ञासा कहिए, बिना इच्छा वाले को आत्म-उपदेश नहीं करते हैं । इसमें सतगुरु का दोष नहीं है ॥४६॥ 
वर परमोधै आन को, पूछे तैं वरीयान । 
बतलायां बोलै नहीं, सो वरिष्ठ क र जान ॥ 
अब सतगुरु तीन श्रेणी के माने गऐ हैं :- "वर", "वरियान", "वरिष्ठ" । वर श्रेणी के सतगुरु अधिकारी अनधिकारी का विचार न करके परोपकार भावना से जीव-मात्र को सत्योपदेश करते हैं किन्तु "वरीयान" व्यवहार कोटि से मुक्त होते हैं एवं इच्छा करने पर ही शिष्य को उपदेश करते हैं । और "वरिष्ठ" श्रेणी के सतगुरु देहाध्यास से मुक्त अर्थात् विदेह होकर रहते हैं । ऐसे महात्माओं के दर्शनों से ही अपूर्व लाभ होता है । अब तीसरी श्रेणी के सतगुरु की महिमा कहते हैं । 
कवित्त 
"चन्द कमोद अचाह, अलि क द कँवल बुलावै । 
दीपक दलन पतंग, आप अहि चंदन आवै ॥ 
सरित हु समन्द निरास, धोम आकाश न आसा । 
धर उर ध्यान न धाम, होहि घर बड़ा तमासा ॥ 
मुकुर मनोरथ को न मुख पाठों पाठ न भाव ही । 
रज्जब गुरु बेसास बिधि सिरज्या सिर सो आव ही ॥ 
दोहा :- 
"निर पिलावत कहा फिरै, सायर घर घर बार । 
प्यासा होगा प्रेम का, तो पीवैगा झख मार ॥" 
सागर कदे न जायसी, घर घर प्यावन नीर । 
प्यासा भंजन भरि पीवै "साधु" सरोवर तीर ॥ 
साधुरामजी मांडोठी । 
(श्री दादूवाणी ~ गुरुदेव का अंग)

दादू जन ! कु़छ चेतकर ९/८

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साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*चेतावनी का अंग ९/८*
* दादू जन ! कु़छ चेतकर, सौदा लीजे सार ।* 
* निखर कमाई न छूटणा, अपने जीव विचार ॥८॥* 
दृष्टांत - 
एक फकीर घर गार के, बेचत लहै परलोक । 
सेठ मरा सिक्का मिला, देखे सारे थोक ॥२॥ 
एक फकीर ग्राम के पास की नदी तीर पर बैठकर मिट्टी ता घर बना रहे थे । नदी से पानी भरने वाले सिक्के ने पू़छा - इस घर का क्या करोगे ? फकीर - बेचेंगे । सिक्का - लेने वाले को क्या लाभ होगा ? फकीर - परलोक में महल मिलेगा । सिक्का - क्या लोगे ? फकीर - सवा रुपया । सिक्का ने सवा रुपया दे दिया और फकीर ने वह घर उस को दे दिया । सिक्का उसे लेजा तो सकता नहीं था । वहां ही छोड़ गया । 
फिर वहां के एक सेठ की मृत्यु हो गई । उसको परलोक में ले गये । वहां उसने देखा । एक सुन्दर भवन बन रहा है । फिर पू़छा - यह किस के लिये बन रहा है ? उत्तर मिला तुम्हारे ग्राम के सिक्के के लिये बन रहो है । फिर सेठ को देखकर यमराज ने यमदूतों को कहा - यह तो दूसरा है इसे शीघ्र इसके स्थूल शरीर में पहुँचा कर और इसी नाम का इसके वास में रहता हैं उसे लाओ, फिर सेठ पुनः जीवित हो गया । 
उसे परलोक के भवन की बात याद रही अतः जब सिक्का मिला तब उससे पू़छा - तुमने ऐसा कौन सा पुण्य किया था जिससे परलोक में तुम्हारे लिये सुन्दर भवन बन रहा है । सिक्का ने फकीर से घर लेने की बात सुना दी । 
एक दिन सेठ भी नदी पर गये और फकीर को मिट्टी का घर बनाते देखकर पू़छा - इसका क्या करोगे ? फकीर - बेचेंगे । सेठ - क्या लोगे ? फकीर - एक हजार । सेठ - सिक्के को तो सवा रुपये में दिया था, मुझसे हजार कैसे माँगते हो ? फकीर - तुम तो सब प्रत्यक्ष देखकर आये हो । सेठ - हजार रूपयों का क्या करोगे ? फकीर - परमार्थ में लगा देंगे । सेठ ने हजार रुपये दे दिये । फकीर ने सब पुण्य में लगा दिये । सोई उक्त ८ की साखी में कहा है - उक्त प्रकार सार(सत्य) सौदा(व्यापार) करना चाहिये । कारण ? शुद्ध कमाई के बिना संसार से छुटकारा कभी भी नहीं मिलता । 
===
द्वितीय दृष्टांत - 
संत एक सुकृत करे माथे ले ले दाम । 
इक अनाथ सुत बाणिक हित, हुनि बरसाई राम ॥३॥ 
एक परोपकारी संत कर्ज करके भी परोपकार करते थे । एक अनाथ वैश्य का लड़का उनकी शरण गया । तब उसके लिये वे कर्ज लाने गये किन्तु कर्ज देने वाले ने कहा - आप पहले का कर्ज चुका देंगे तब ही नया कर्ज आप को मिलेगा । आप पर बहुत कर्ज हो गया है । उसने कुछ भी नहीं दिया । 
किन्तु उस अनाथ वैश्य पुत्र की स्थिति देख कर वे संत व्याकुल हो गये थे । अतः उन्होंने भगवान् से प्रार्थना करके वैश्य पुत्र को कहा - आज ही भगवान् तेरे घर हुनि(हुण) सोना चांदि धन की वर्षा कर देंगे । यह वचन एक दूसरे वैश्य ने सुना तो उसने सोचा - बहुत धन वर्षेगा । 
अतः उसने उस अनाथ वैश्य पुत्र से कहा - हम दोनों घर बदल लें मेरे घर में तुम शरीर मात्र से आ जाओ और सपरिवार मैं तुम्हारे घर केवल तन के कपड़ों से आ जाऊंगा । यह अपने पांच पंचों के बीच लिखावट करले । वैश्य पुत्र ने कहा - ठीक है । वैसे ही कर लिया । 
अब उक्त वैश्य धन वर्षा के लिये अति व्याकुल हुआ किन्तु कु़छ भी नहीं वर्षा । तब कुल वालों ने तथा सेठ ने उक्त संत से कहा - धन वरसा तो नहीं । संत ने कहा - जिसे के लिये कहा था उसके लिये तो वरस गया । तुम्हारे लिये तो मैंने नहीं कहा था । सोई उक्त साखी में कहा है - शुद्ध कमाई से छुटकारा होता है । कपट की कमाई से तो उक्त सेठ के समान दुःख में ही पड़ता है ।
(क्रमशः)

= १३१ =


卐 सत्यराम सा 卐
The wind cannot shake a mountain. 
Neither praise nor blame moves a wise man. 
☯ Buddha 
--------------------------- 
जे निकसे संसार तैं, सांई की दिशि धाइ ।
जे कबहुँ दादू बाहुड़े, तो पीछे मार्या जाइ ॥२६॥ 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! पूर्व संसार या सतगुरु कृपा से संसार में आसक्ति का त्याग करके, परमात्मा की प्राप्ति के मार्ग भक्ति - वैराग्य में लगें, अर्थात् आत्मचिन्तन में लग कर यदि फिर वृत्ति को बहिर्मुख करें, तो वे पुरुष आवागमन में ही भ्रमते रहते हैं ॥२६॥
दादू कोई पीछे हेला जनि करै, आगे हेला आव ।
आगे एक अनूप है, नहिं पीछे का भाव ॥२७॥ 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! ‘पीछे’ कहिए, संसार के विषय - वासनाओं का चिन्तन नहीं करें, सच्चा सेवक शूरवीर होकर गुरु उपदेश आत्म - चिन्तन के मार्ग पर दृढ़ रहें । एकत्व में आनंद है । ऐसे गुणातीत पुरुषों के अन्तःकरण में विषय - वासनाओं की फुरना नहीं होती है । वे अखंड ब्रह्माकार वृत्ति में लयलीन रहते हैं ॥२७॥ 
पीछे को पग ना भरै, आगे को पग देइ ।
दादू यहु मत शूर का, अगम ठौर को लेइ ॥२८॥ 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! पीछे को कहिये, मायिक अनात्म पदार्थों में दृढ़ता न करे । विवेक वैराग्य आदि साधनों को धारण करें । सच्चे शूरवीर साधक का यही मत हैं कि वह अगम परमेश्‍वर को अन्तःकरण रूप ठौर में प्राप्त करता है ॥२८॥ 
हरि भजतां तजतां विषै, करतां साधू सेव । 
रज्जब रहता इहि जुगति, ह्वै मानुष सौं देव ॥ 
आगा चल पीछा फिरै, ताका मुँह मा दीठ ।
दादू देखे दोइ दल, भागे देकर पीठ ॥२९॥ 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! आत्म प्राप्ति के विवेक - वैराग्य आदि साधनों में चलकर और फिर वापिस प्रवृत्ति मार्ग में आवे, उसका तो मुँह भी न देखें, क्योंकि उसके दर्शनों से कोई लाभ प्राप्त नहीं होता । क्योंकि ‘दोइ दल’ कहिये, द्वन्द्वात्मक वृत्ति में उलझ कर आत्म - विमुख होवे, तो उसको आत्म - स्वरूप प्राप्ति संभव नहीं है ॥२९॥ 
दादू मरणां माँड कर, रहै नहिं ल्यौ लाइ ।
कायर भाजै जीव ले, आ - रण छाड़ै जाइ ॥३०॥ 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जो साधन क्षेत्र का मैदान छोड़कर कायरता से वापिस इस संसार के प्रवृत्ति मार्ग में आवे, वह तो कायर है । जैसे शूरवीरों के ब्रतर पहन कर रण भूमि में जावे और युद्ध को देख करके कायरता से भाग छूटे, तो वह सेनापति और राजा को क्या मुँह दिखलावे ? इसी प्रकार कायर साधक त्याग - भाव से अरण्य(वन) में गया हुआ अपनी साधना बीच में ही छोड़कर वानप्रस्थाश्रम से पुनः घर गृहस्थाश्रम में लौट आता है, वह परमेश्‍वर को नहीं प्राप्त हो सकता ॥३०॥ 
(श्री दादूवाणी ~ शूरातन का अंग)

श्री वाह्यांतर वृत्ति वार्ता(अ.दि.- २९/३३)

卐 दादूराम~सत्यराम 卐

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*श्री वाह्यांतर वृत्ति वार्ता*
रचना ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
अष्टम दिन ~ 
.
आं वृ. - 
“सखि ! यदि तेरा अनुराग, शुद्ध इस भांति रहा । 
अरु धारेगी मन मांहि, निरंतर मोर कहा ॥ 
तो तेरी मुक्ती मांहिं, कछू संदेह नहीं । 
तू जपना हरि का नाम, भूलना लव न कहीं ॥२९॥’’ 
वां वृ. - 
“मैं तो जपत रहूँगी नाम, निरंतर निज मन से । 
अरु करत रहूँगी काम, सदा शुभ इस तन से ॥ 
मैं हिय दैवी गुण धार, रहूँगी शांत सदा । 
अरु बोलूँगी अस बचन, सुनत हों सर्व मुदा ॥३०॥’’ 
आं वृ. - 
“सखि ! यदि ऐसा करेगी, होगा तव कल्याण । 
शुभाशीष मेरा तुझे, घर को करो प्रयाण ॥३१॥’’ 
कवि - 
“वाह्य वृत्ति कर प्रणति फिर, चली शीघ्र निज गेह । 
चित्त हटा भव भोग से, एक राम में नेह ॥३२॥ 
घर के सब ही काम कर, निज अधिकार समान । 
गाढ़ नींद में सो गई, करत राम का ध्यान ॥३३॥’’ 

इति श्री वाह्यांतर वृत्ति वार्ता में अष्टम दिन वार्ता समाप्त: ।
(क्रमशः)

= स. त./३८ =

#daduji
*श्री सन्त-गुण-सागरामृत श्री दादूराम कथा अतिपावन गंगा* ~ स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~ संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्‍वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
.
*(“सप्तम - तरंग” ३८)*
*गरीबदास, मसकीनदास, राम और श्याम बाईया,* 
*वरदान स्वरूप प्रगट हुये ।*
सोरठा
सम्वत् सोलह सौ बत्तीस, गरीबदास जन अवतरे ।
मस्कीना चोतीस, बाई द्वय छत्तीस सम ॥३७॥ 
श्री दादू भगवान, देव पुष्प द्विज - तिय दियो ।
सो पायो वरदान, द्विज - सेवक हर्षित भयो ॥३८॥ 
वि. सम्वत् १६३२ में गरीबदास अवतरे, और १६३४ में मसकीनदास । फिर १६३६ में दोनों कन्यायें(रामाकुमारी, और श्यामा कुमारी) ने जन्म लिया । भगवत् - स्वरूप श्री दादूजी द्वारा देव कुसुम(लवंग) का प्रसाद व वरदान पाकर द्विज सेवक दामोदर उमा अत्यन्त हर्षित रहने लगे ॥३८॥ 
.
॥ इति माधवदास विरचिते श्री संतगुण सागरामृत साँभर लीला वरणनो ॥ इति सप्तम तरंग सम्पूर्ण ॥७॥
(क्रमशः)

= काल का अंग २५ =(१७/१८)

॥ दादूराम सत्यराम ॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
.
*काल का अंग २५*
. 
*दादू काया कारवीं, मोहि भरोसा नांहि ।*
*आसन कुंजर शिर छत्र, विनश जाहिं क्षण मांहि ॥१७॥*
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! यह काया क्षण - भंगुर और कच्चे घड़े की तरह है । हमें इसका कोई विश्वास नहीं है कि यह स्थिर रहेगी ? और क्या कहैं ? हाथी के ऊपर बैठने वाले, मस्तक के ऊपर छत्रधारी, ऐसे ऐसे चक्र वर्ती राजाओं के भी शरीर एक क्षण में विनष्ट हो गये हैं ॥१७॥
.
*दादू काया कारवीं, पड़त न लागै बार ।*
*बोलणहारा महल में, सो भी चालणहार ॥१८॥*
टीका ~ यह पंच भौतिक शरीर, अविद्या रचित कच्चे घड़े की तरह है । इसके नाश होने में कोई देर नहीं लगती है । ब्रह्मऋषि कहते हैं कि इस काया रूपी महल में बोलने वाला, आभास अन्तःकरण रूप प्राण, यह भी जाने वाला है । इसलिये राम - नाम के स्मरण द्वारा अपनी रक्षा करो ॥१८॥
(क्रमशः)

दादू जे साहिब को भावे नहीं ९/२

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साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*चेतावनी का अंग ९/२*
*दादू जे साहिब को भावे नहीं, सो हम तैं जानि होय ।* 
*सद्गुरु लाजे आपना, साध न माने कोइ ॥२॥* 
दृष्टांत - 
इक बंदे किय तीन सौ, ग्रन्थ राम गुण गाथ । 
परा शब्द ऐसा भया, इनतैं मोहि न पात ॥१॥ 
एक भक्त ने राम गुण गान रूप कथाओं के तीन सौ ग्रन्थों की रचना की थी । अन्त में पराशब्द(ब्रह्मवाणी) उसे सुनाई दी कि इन गाथाओं से मेरी प्राप्ति नहीं होती है । मेरी प्राप्ति तो मेरे में परम प्रेम करने से अथवा अद्वैत निष्ठा से ही होती है । यह उक्त २ की साखी में कहा है - कि जो प्रभु को प्रिय नहीं हो, वह हमसे होना ही नहीं चाहिये ।
(क्रमशः)

शनिवार, 28 दिसंबर 2013

कछू न कीजे कामना ८/८५

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*निष्कामी पतिव्रता का अंग ८/८५*
*कछू न कीजे कामना, सहगुण निर्गुण होइ । * 
*पलट जीवतैं ब्रह्म गति, सब मिल माने मोहि ॥८५॥ * 
दृष्टांत - 
करड़ाले स्वामी रहैं, तहां इक आवत प्रेत । 
पू़छा प्रभु मैं ग्वाल था, बड़ी आयु वर लेत ॥२०॥ 
दादूजी महाराज जब करड़ाले विराजते थे तब एक दिन आरती के समय एक प्रेत ने वहां आकर कुचेष्टांयें करना आरम्भ किया, इससे आरती की लय भंग हो गई । तब दादूजी ने पू़छा - क्या बात है ? क्यों डर रहे हो ? आरती गाने वाले संत तथा भक्तों ने कहा - कोई प्रेत ज्ञात होता है । वह अपनी कुचेष्टाओं से विघ्न डाल रहा है । 
तब दादूजी ने भी उसको देखा और दया पूर्वक उस पर अपने कमण्डल का जल डालकर उसको प्रेत योनि से मुक्त कर दिया । वह सुन्दर मनुष्य बन गया और दादूजी को प्रणाम करके हाथ जोड़े हुये समाने खड़ा हो गया । दादूजी ने पू़छा - तुम कौन है ? उसने कहा - भगवन् ! मैं पहले इस ग्राम का ग्वाल था । इस पास की पहाड़ी में पशु चराया करता था । 
एक समय इस पहाड़ी पर एक संत आये थे और पहाड़ी की एक शिला पर बैठे हुये भजन ही करते थे । कहीं भी आते जाते नहीं थे । मेरी माँ मुझे दो रोटी देती थी और एक जल का पात्र भर देती थी । उनमें से एक रोटी संतजी को देता था और आधा जल पिला देता था । यह बात मैंने घर वालों को भी नहीं कही थी । 
वे संत चिरकाल तक रह कर जाने लगे तब मुझे बोले - तूने हमारी बहुत सेवा की है अतः जो इच्छा हो वही वर मांग ले । मैंने कहा - मेरी आयु बड़ी हो जाय यही वर दें । संत ने कहा - बड़ी आयु प्रेत की होती है, तू प्रेत होजा । मैंने दुःखी होकर कह - यह तो शाप है । संत - शाप नहीं वर ही है । मैंने पू़छा - कैसे ? संत - प्रेत योनि में तुझे संतप्रवर दादूजी का दर्शन होगा और प्रेत योनि से मुक्त होकर उत्तम लोक को चला जायेगा । तू चिन्ता मत कर । 
यह कहकर संत चले गये और मैं प्रेत होकर यहाँ रहने लगा । आज उन संतजी की वाणी सत्य हो गई । फिर वह दादूजी को प्रणाम करके उत्तम लोक को चला गया । कामना करने से प्रेत हुआ था । इससे उक्त ८५ की साखी में कहा है - "कुछ न कीजे कामना" इतिश्री निष्काम पतिव्रता का अंग ८ समाप्त
(क्रमशः)

दादू - औषधि मूली कु़छ नहीं ८/६६

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साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*निष्कामी पतिव्रता का अंग ८/६३*
*दादू - औषधि मूली कु़छ नहीं, ये सब झूठी बात ।*
*जे औषधि ही जीविये, तो काहे को मर जात ॥६६॥* 
दृष्टांत - 
बादशाह मरती समय, सब छाढ़े किये ल्याय । 
वैद्य शूर धन लोग कुल, सबहि देखते जाय ॥१९॥ 
एक दिन एक बादशाह के पास एक संत पहुँच गये और उसे कहा - ईश्वर का स्मरण किया करो । अन्त समय में वे ही काम देंगे । बादशाह ने कहा - अन्त समय में काम देने वाले सब साधन मेरे पास हैं, मुझे ईश्वर स्मरण की क्या आवश्यकता है ? रोग निवृत्त करने वाले चिकित्सक हैं । शत्रुओं से युद्ध करने वाली सेना है । सब विपत्ति मिटाने वाला धन है । साथ में परिवार है किन्तु उस बादशाह के मृत्यु का समय आया तब उक्त सब में से कोई भी उसे नहीं बचा सका । इसी से उक्त ६६ की साखी में कहा है - औषधि आदि कोई भी मृत्यु से नहीं बचा सके उनके भरोसे पर रहने की बात मिथ्या ही है ।
(क्रमशः)

= १३० =


卐 सत्यराम सा 卐
Sadguru Whispers ~ 
I don't ask from Thee, O Guru! To take away my karma. 
My prayer is for a way to make me remain unaffected by them. 
------------------------ 
ज्यों राखै त्यों रहेंगे, अपने बल नांही । 
सबै तुम्हारे हाथ है, भाज कत जांही ॥१६॥ 
टीका ~ हे समर्थ परमेश्‍वर ! जैसे आप हमको रखोगे, उसी प्रकार हम प्रसन्न रहेंगे सुख में या दुःख में । हमारा आपके सामने कोई बल नहीं चलता । जीवों के प्रारब्ध कर्म सब आपके हाथ में हैं, आपसे अलग हम भाग कर कहॉं जायेंगे ? हे समर्थ ! आपकी समर्थाई सर्वत्र व्यापक है ॥१६॥ 
दादू डोरी हरि के हाथ है, गल मांही मेरे । 
बाजीगर का बांदरा, भावै तहॉं फेरे ॥१७॥ 
टीका ~ हे हरि ! हमारी प्रारब्ध - कर्म रूपी डोरी आपके हाथों में है और हमारे गले में पड़ी है । जैसे बाजीगर बन्दर के गले में डोरी डालकर, जहॉं इच्छा हो, वहीं बन्दर को ले जाता है । इसी प्रकार हम तो बाजीगर के बन्दर की तरह हैं । आप प्रारब्ध कर्म डोरी को जिधर भी खींचोगे, उधर ही हम आते - जाते रहेंगे । आपकी समर्थाई सबसे ऊपर है ॥१७॥ 
कर्म डोरी गल में पड़ी, हाथ तुम्हारे मांहि । 
जगजीवन इनसे छूटि कै, भाजि कहॉं हम जांहि ॥ 
ज्यों राखै त्यों रहेंगे, मेरा क्या सारा । 
हुक्मी सेवक राम का, बन्दा बेचारा ॥१८॥ 
टीका ~ हे परमेश्‍वर ! हम तो आपकी आज्ञा में चलने वाले आपके सेवक है । जैसे आप हमारे प्रारब्ध - कर्मानुसार, हमको सुखी दुखी रखोगे, उसी प्रकार उसमें हम सुखी रहेंगे । क्योंकि इसमें मेरा क्या जोर है ? हम तो आपके हुक्म में चलने वाले आपके गरीब सेवक हैं ॥१८॥ 
साहिब राखै तो रहे, काया मांही जीव । 
हुक्मी बन्दा उठ चले, जब ही बुलावे पीव ॥१९॥ 
टीका ~ हे साहिब ! हे परमेश्‍वर ! आप इस स्थूल शरीर में जीव को जब तक रखोगे, तब तक रहेगा । और जब आपका हुक्म होगा कि ‘‘आ जाओ’’ उसी समय बन्दे की तरह हम चले आयेंगे । जैसे सेवक को स्वामी जब बुलाता है, तभी उठकर चल देता है, वैसे ही हम तो आपकी समर्थाई रूप हुक्म में हैं ॥१९॥ 
बाजींदा पूत पठाण का, किस सौं करै सनेह । 
राति बसै दिन उठि चलै, आंधी गिणै न मेह ॥ 
(श्री दादू वाणी ~ समर्थता का अंग)

= १२९ =


卐 सत्यराम सा 卐
सूक्ष्म मार्ग
दादू बिन पाइन का पंथ, क्यों करि पहुँचै प्राण ।
विकट घाट औघट खरे, मांहि शिखर असमान ॥१३५॥
टीका - आत्म - प्राप्ति का मार्ग कहिए, साधन कठिन है, क्योंकि हाथ - पाँव आदि इन्द्रियों से उस पर चलना असम्भव है । परमात्मा के मार्ग में काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, जैसे अति विकट दुर्लंघ्य पहाड़ हैं । अत: जीवात्मा वहाँ किस प्रकार पहुंच सकता है ? अर्थात सतगुरु कृपा बिना आत्म - साक्षात्कार करना अति कठिन है ॥१३५॥
.
अब परमात्मा प्राप्ति में सतगुरु कृपा का माहात्म्य कहते हैं :-
मन ताजी चेतन चढै, ल्यौ की करै लगाम ।
शब्द गुरु का ताजणां, कोइ पहुंचै साधु सुजाण ॥१३६॥
टीका - हे जिज्ञासुजनों ! पूर्वोक्त मार्ग को तय करने के लिए मन रूपी ताजी - घोड़े पर सचेत होकर जीवात्मा चढे और परमेश्वर के नाम में लय लगाना रूप लगाम साधे । ब्रह्मवेत्ता गुरु का ज्ञान उपदेश रूप हंटर मारे तो उपरोक्त साधनों के द्वारा कोई उत्तम जिज्ञासु मल - विक्षेप से रहित ब्रह्म - परायण होता है । इसी प्रकार संसारीजनों का मन अति चंचल घोड़ा है, जिसकी आत्माकार वृत्ति लगाम है और ताजणां = चाबुक(हण्टर) रूप गुरु उपदेश है । श्री सतगुरु भगवान् उपदेश करते हैं कि हे जिज्ञासुजनों ! जो पुरुष गुरु उपदेश में स्थिरता करके अपनी विषय उन्मुख वृत्तियों को आत्मपरायण बनाएंगे, वे ही मनरूपी घोड़े को अपने वश में करके उसके द्वारा प्रभु का प्रत्यक्ष दर्शन कर सकेंगे ॥१३६॥
(श्री दादूवाणी ~ गुरुदेव का अंग)
-------------------
साभार : Raman Radha ~ 
The realisation is not so cheap, to reach to the ultimate realization of truth. 
You will have to create the path by walking yourself; the path is not ready-made, lying there and waiting for you. 
It is just like the sky: the birds fly, but they don't leave any footprints. 
You cannot follow them; there are no footprints left behind. 

Raman Maharshi

श्री वाह्यांतर वृत्ति वार्ता(अ.दि.- २१/२८)


卐 दादूराम~सत्यराम 卐
.
*श्री वाह्यांतर वृत्ति वार्ता*
रचना ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
अष्टम दिन ~ 
वां वृ. - “यदपि तपादिक साधना, दुष्कर मानी जाय ।
तदपि करूँगी सहचरी, अब तो मैं मन लाय ॥२१॥’’
.
आं वृ. - “सखि ! संसारिक भी नहीं, सुगम होत सब काम ।
किन्तु उन्हें कर सरति जन, जाते हैं दुख धाम ॥२२॥
सुख चाहैं दुखप्रद करें, कार्य यही अज्ञान ।
दुखद कार्य का तू कभी, करना नहिं सन्मान ॥२३॥’’
.
वां वृ. - “कौन सुखद अरु को दुखद, मैं जानत हूं नांहि ।
बता सखी ! उनको सदा, याद रखूँ मन मांहि ॥२४॥’’
.
आं वृ. - “पर पीड़न आदिक सभी, बुरे काम दुख देय ।
सुखप्रद पर हित आदि हैं, संत चरण नित सेय ॥२५॥
सत्संगति से होयगा, तुझको सब ही ज्ञान ।
संत संग नित किया कर, होकर के निर्मान ॥२६॥
अब मेरे अभ्यास का, समय आ गया पेख ।
जा तू करना काम अब, सदा सुखद ही देख ॥२७॥’’
.
वां वृ. - “अब तुम विन मुझको सखी ! सुहात न कछू कभी ।
मैं तज दूँगी इक दिवस, जगत के भोग सभी ॥ 
पर मेरा सह अनुराग, रखोगी ध्यान जभी ।
मैं भव दुख से अनयास, होउँगी मुक्त तभी ॥२८॥’’ 
(क्रमशः)

= स. त./३५-६ =

#daduji
*श्री सन्त-गुण-सागरामृत श्री दादूराम कथा अतिपावन गंगा* ~ स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~ संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्‍वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
.
*(“सप्तम - तरंग” ३५-६)*
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*दामोदर की पत्नी उमा लूंग काली मीरच द्वारा ४ सन्तान*
लौंग फल लेत पानि, काली मिर्च दोय पुनि,
स्वामीजी प्रसन्न होत देत द्विज नारी को ।
लौंग फल पाय करि, द्विज नारी गर्भ धरि,
‘गरीब’ ‘मसकीन’ सुत होत द्विज प्यारी को ।
तांके पीछे वर्ष एक, मिर्च फल पायो नेक,
नवें मास कन्या दोय, लेय अवतारी को ।
ऐसी कृपा करीगुरु द्विज घर सुत चांरु,
संत - परसाद पाय मोद वारापारी को ॥३५॥ 
स्वामीजी ने दो लवंग और दो काली मिर्च अपने हाथ से द्विजनारी उमा को प्रसाद स्वरूप दिये । लवंग फल स्वरूप द्विजनारी ने गर्भधारण किया, और क्रमश: गरीब तथा मसकीन नामक बालकों को जन्म दिया । फिर एक वर्ष के अन्तराल के बाद काली मिर्च के प्रसाद - प्रभाव से नौवें मास युगल कन्याओं को जन्म दिया । गुरुदेव की कृपा से द्विज दामोदर के घर सुन्दर चार सन्तानें खेलने लगी । संत - प्रसाद पाकर उसके मोद का वारापार नहीं था ॥३५॥
*इन्दव छन्द*
*विप्र दामोदर उमा के गरीबदास मसकीनदास राम श्याम बाई*
अविगत की गति कोउ न जानत, 
कौन बखान सकै गुण साँई ।
ज्यूं नट की गति कोई न जानत, 
त्यूं हरि की गति कौन लखाई ।
ज्यूं विधि तें उपजै सनकादिक, 
त्यूं वर विप्र दामोदर पाई ।
च्यारुं हि सन्तति लें अवतार जु, 
दो सुत होय, भई युग बाई ॥३६॥ 
अविगत अगोचर ईश्वर की लीला कौन जान सकता है ? उसके गुणों का व्याख्यान कौन कर सकता है ? जब साधारण नट - बाजीगर की गति लीला कोई नहीं समझ सकता, तो श्री हरि जैसे जगत् को नचानेवाले महान् नट की माया साधारण जन भला कैसे जान सकता है । जैसे ब्रह्मा की मानसिक संकल्प शक्ति से सनकादिक उत्पन्न हुये, वैसे ही दादूजी के प्रसाद(वरदान) से विप्र कन्या उमा ने चार सन्तानें प्राप्त की ॥३६॥ 
(क्रमशः)

= काल का अंग २५ =(१५/१६)


॥ दादूराम सत्यराम ॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*काल का अंग २५*
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*पाव पलक की सुधि नहीं, श्वास शब्द क्या होइ ।* 
*कर मुख मांहि मेलतां, दादू लखै न कोइ ॥१५॥* 
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! एक पग उठाते ही, पलक खोलते ही, एक श्वास लेते ही, शब्द बोलते ही, कौन जाने काल की गति को, शरीर रहे या न रहे ? ब्रह्मऋषि कहते हैं कि हाथ में रोटी का ग्रास लेकर मुख में रखते ही अर्थात् न जाने, दूसरा ग्रास ले या नहीं ले, शरीर छूट जाय ? इस काल की गति को कोई भी नहीं जानते हैं ॥१५॥ (‘पाव’ के स्थान पर ‘पग’ पाठान्तर है ।) 
*दादू काया कारवीं, देखत ही चल जाइ ।* 
*जब लग श्वास शरीर में, राम नाम ल्यौ लाइ ॥१६॥* 
टीका ~ हे जिज्ञासु ! यह स्थूल शरीर रूप काया, कुम्हार के कच्चे घड़े की तरह देखते - देखते ही विनिष्ट होती जा रही है । इसलिये जब तक शरीर में प्राण हैं, तब तक सचेत होकर राम - नाम का स्मरण करना चाहिये ॥१६॥
(क्रमशः)

शुक्रवार, 27 दिसंबर 2013

= १२८ =



卐 सत्यराम सा 卐
१७८. (गुजराती) विनती(श्री दादूवाणी)
भक्ति मांगूं बाप भक्ति मांगूं,
मूने ताहरा नांऊं नों प्रेम लाग्यो ।
शिवपुर ब्रह्मपुर सर्व सौं कीजिये,
अमर थावा नहीं लोक मांगूं ॥टेक॥
आप अवलंबन ताहरा अंगनों,
भक्ति सजीवनी रंग राचूं ।
देहनें गेहनों बास बैकुंठ तणौं,
इन्द्र आसण नहीं मुक्ति जाचूं ॥१॥
भक्ति वाहली खरी, आप अविचल हरि,
निर्मलो नाउं रस पान भावे ।
सिद्धि नें रिद्धि नें राज रूड़ो नहीं,
देव पद माहरे काज न आवे ॥२॥
आत्मा अंतर सदा निरंतर,
ताहरी बापजी भक्ति दीजे ।
कहै दादू हिवे कौड़ी दत आपे,
तुम्ह बिना ते अम्हें नहीं लीजे ॥३॥
टीका ~ ब्रह्मऋषि सतगुरुदेव इसमें अनन्य भक्ति की याचना कर रहे हैं कि हे परमपिता परमेश्वर ! हम तो अब आपकी अनन्य भक्ति आपसे मांगते हैं, जिससे आपके नाम - स्मरण का हमारे अन्तःकरण में प्रेम लगे । हे नाथ ! शिवपुरी, कैलास, ब्रह्मलोक, इन सबसे मुझे क्या लेना है और अमर होकर हम क्या करेंगे ? और स्वर्ग आदि लोकों में भी जाकर क्या करेंगे ?
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आप दया करके आपके स्वरूप को प्राप्त कराने वाली आपकी अनन्य भक्ति हमको दीजिये । आपकी इस निष्काम भक्ति रूप रंग में ही हमारा मन सप्रेम लगे, क्योंकि इस अनन्य भक्ति द्वारा हम आप सजीवन स्वरूप को प्राप्त होवेंगे । न हमें देह प्राप्त करके घर में रहने की या बैकुण्ठ में बसने की ही इच्छा है, न इन्द्रासन की ही इच्छा है ।
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न हम आपसे चार प्रकार की मुक्ति ही मांगते हैं । हे परमेश्वर ! आपकी प्यारी भक्ति ही हमें खरी सच्ची लगती है । हे हरि ! जैसे आप अविचल हो, ऐसा ही आपका निष्काम नाम - स्मरण रूपी रस हमको प्रिय लगता है । न हमें सिद्धियों की इच्छा है, न रिद्धियों की, न राज - पद की ही इच्छा है और देव - पद प्राप्त करने से हमें क्या मतलब है ?
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हे बाप जी ! हमारे अन्तःकरण में आप अपनी अनन्य भक्ति दीजिये । हे प्रभु ! हमें अब आप चाहे, करोड़ों का धन दें, वह भी हम आपके बिना नहीं लेंगे ।